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Friday, November 30, 2007

शुक्रवार,३० नवम्बर,२००७


कोई रुनझुन सुनाई पड़ रही है.चवन्नी के कानों में सुरीली झंकार की अनुगूंज है.कोई दोनों बाहें फैलाये न्योता दे रहा है.न..न.. शाहरुख़ खान नही हैं.उनके आमंत्रण में झंकार नही रहती.मोहक मुस्कान की मलिका और एक ठुमके से दर्शकों का दिल धड़का देनेवाली धक् धक् गर्ल आज देश भर के सिनेमाघरों में नया जलवा दिखाने आ रही हैं.जी हाँ चवन्नी माधुरी दीक्षित की ही बात कर रहा है।चवन्नी की सिफारिश है कि आप माधुरी के न्योते को स्वीकार करें.लगभग पांच सालों के बाद हिन्दी सिनेमा के रुपहले परदे पर जल्वाफ्रोश हो रही माधुरी का आकर्षण कम नहीं हुआ है.हालांकि इस बीच हीरोइनों का अंदाज बदल गया है और सारी की सारी हीरोइनें एक जैसी लगती और दिखती हैं,वैसे में माधुरी दीक्षित का निराला अंदाज पसंद आना चाहिए।माधुरी की आजा नचले एक लड़की दीया कि कहानी है,जो अपने गुरु की संस्था को किसी भी सूरत में बचाना चाहती है.हिन्दी फिल्मों में उम्रदराज हीरोइनों के लिए जगह नहीं होती.अमिताभ बच्चन के पहले हीरो के लिए भी नही होती थी.अमिताभ बच्चन के लिए केन्द्रीय किरदार लिखे गए.शाबान आज़मी के लिए गॉडमदर लिखी गयी थी.जाया बच्चन हजार चौरासिवें की माँ में उपयुक्त लगी थीं। नरगिस ने मदर इंडिया की थी.वैसे ही माधुरी दीक्षित के लिए आजा नचले लिखी गयी है.इस फिल्म के सहयोगी कलाकार भी खास हैं.रघुबीर यादव,अखिलेन्द्र मिश्र,विनय पाठक ,कुणाल कपूर और कोंकणा सेन को दमदार भूमिकाओं में देखना रोचक होगा।और हाँ,भूल कर भी गौरी देखने न जाये.अजन्मे बच्चे की भूता कहानी गर्भपात का विरोध करती है.२१ वीं सदी में कैसे इस तरह की धारणा पर फिल्म बनाईं जा सकती है.चवन्नी को लगता था कि अतुल कुलकर्णी समझदार ऐक्टर हैं,फिर ऐसी ग़लती कैसे कर बैठे अतुल.

Thursday, November 29, 2007

भरोसेमंद और शालीन शाहिद कपूर


-अजय ब्रह्मात्मज
एनएसडी में पंकज कपूर के क्लासमेट रहे एक सीनियर आर्टिस्ट से पिछले दिनों मुलाकात हो गई। वे रंगमंच, टीवी और फिल्मों में सक्रिय रहे हैं। उन्होंने कुछ फिल्में भी लिखी हैं। यूं ही बातचीत में शाहिद कपूर का जिक्र आ गया। वे बताने लगे, इधर तो मेरी मुलाकात नहीं हुई है शाहिद से, लेकिन मैं उसे बचपन से ही जानता हूं। सुशील स्वभाव का लड़का है और उसमें स्पार्क तो है ही। मैंने उम्मीद नहीं की थी कि वह इतने संतुलित स्वभाव का भी होगा! दरअसल.., बातचीत में करीना कपूर का प्रसंग आ गया था। शाहिद कपूर और करीना कपूर के प्रसंग में सबसे अच्छी बात यही रही कि दोनों में से किसी ने भी एक-दूसरे पर कीचड़ नहीं उछाला। आमतौर पर दिल टूटते हैं, तो विक्षुब्ध प्रेमी बकबकाने लगते हैं। दुर्भाग्य से अगर वे सेलिब्रिटी हों, तो कई बार दबाव में आकर भी अनचाहा कुछ बोल ही जाते हैं। इस प्रसंग में सामाजिक और पारंपरिक सोच के मुताबिक शाहिद कपूर की हार मानी जा रही थी। कहा यह जाता है कि प्रेम कहानियों में लड़की जिसके पास जाती है, वही हीरो होता है। हालांकि यह पर्दे पर ही नहीं, पर्दे के आगे-पीछे का भी सच है। बहरहाल, शाहिद कपूर ने रत्ती भर भी अहसास नहीं होने दिया कि वे हारे हुए प्रेमी हैं या कहीं से भी आहत हुए हैं। लोग शाहिद कपूर की स्थिति का अंदाजा लगा सकते हैं। उनकी फिल्म जब वी मेट रिलीज होने वाली थी। वे लगातार मीडिया के सामने आ रहे थे, लेकिन उनकी बातचीत और अभिव्यक्ति में कभी उदासी या नाराजगी नहीं दिखी। शायद यह देवदास का जमाना भी नहीं है, जहां पारो से ठुकराए जाने पर देवदास तुरंत शराब का सहारा ले ले और चंद्रमुखी की बांहों में चैन पाए। वैसे भी इन दिनों देवदास निराशा की प्रतिमूर्ति नहीं बन जाता, क्योंकि वह जीने के नए बहाने खोज ही लेता है। शाहिद कपूर ने अपनी खास मुस्कराहट के साथ सवालों के जवाब दिए और अपनी पूर्व प्रेमिका करीना कपूर के प्रति पूरा सम्मान भी दिखाया। शाहिद कपूर और करीना कपूर की फिल्म इस विवाद के बीच सिनेमाघरों में लगी। ऐसा लग रहा था कि फिल्म के प्रचार के लिए खड़ा किया गया प्रेम का पब्लिसिटी स्टंट रिलीज के बाद खत्म हो जाएगा, जबकि ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि रिलीज के बाद प्रेम-प्रसंग ने नई राह ले ली। हां, जब वी मेट को दर्शकों ने पसंद किया और फिल्म के हिट होने की संभावना भी बढ़ गई। संयोग ऐसा था कि अगले ही हफ्ते दो बड़ी फिल्में एक साथ रिलीज हुई और छोटी फिल्म होने के कारण जब वी मेट को सिनेमाघरों से बाहर निकलना ही पड़ा। जब वी मेट के चहेतों को तकलीफ तो हुई और ऐसा आभास भी हुआ कि सफलता की संभावना सिनेमा के बाजार के नियमों के कारण चूर-चूर हो जाएगी और तेजी से उभरता सितारा शाहिद कपूर शहीद हो जाएगा। वैसे, अतीत में ऐसे हादसे होते रहे हैं। कई बार चल रही और पसंद की जा रही फिल्मों की बलि चढ़ी है। अंतत: जब वी मेट के पोस्टर और प्रिंट्स सिनेमाघरों से हटा लिए गए।
इसे चमत्कार कहें या शाहिद कपूर का सौभाग्य.., अगले हफ्ते फिर से सिनेमा घर खाली हुए और कोई नई फिल्म नहीं मिलने के कारण सिनेमाघरों के मालिकों को फिर से जब वी मेट लगानी ही पड़ी, ताकि थिएटर खाली न रहें। शाहिद कपूर चुपके से स्टार बन गए- एक भरोसेमंद और शालीन स्टार।

Tuesday, November 27, 2007

गोवा में फिल्म फेस्टिवल

पिछले दिनों चवन्नी गोवा में था.वहाँ इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल चल रहा है और फिल्मों के जानकार,प्रेमी और पत्रकारों की भीड़ लगी है.सबसे ज्यादा तो अधिकारी मौजूद हैं.सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय,फिल्म निदेशालय और पत्र एवं सूचना विभाग के अधिकारियों के साथ ही गोवा के भी अधिकारी हैं.इनकी संख्या फिल्म देखनेवालों से ज्यादा है.तभी तो उद्घाटन समरोह में जब शाहरुख़ खान आये तो उनके साथ लगभग २० अधिकारी थे.क्या ज़रूरत थी उनकी?चवन्नी को लगता है कि ज्यादातर तो फोटो खींच और खिंचवा रहे होंगे।

भारत में आयोजित फिल्म फेस्टिवल को विदेशी फेस्टिवल की तरह ब्रांड बनने की कोशिश लंबे समय से चल रही है.गोवा में फेस्टिवल के आयोजन को चार साल हो गए,लेकिन अभी तक न तो ब्रांड बना और न गोवा फेस्टिवल की कोई पहचान बनी.सब कुछ इतना सरकारी हो जाता है कि तरकारी हो जाता है.सही ढंग से प्रचार भी नही किया जाता.मीडिया की रूचि वैसे ही कम रहती है और फिर उन्हें जिस तरीके से तंग किया जाता है कि उसमें मजबूरन वे तौबा कर लेते हैं.इस बार भी जब तक शाहरुख़ खान थे तब तक मीडिया खास कर टीवी मीडिया के लोग बने रहे.उधर शाहरुख़ निकले और इधर वे निकले।

कायदे से देखें तो यह बड़ा आयोजन है.लगभग १५० फिल्में आई थीं.३० देशों की १५० देशों की फिल्म देखने का मौका कहाँ मिलता है?अगर दूरदर्शन या कोई और चैनल नियमित रुप से इन फिल्मों के बारे में बताता तो दर्शकों का कल्याण होता.चवन्नी महसूस करता है कि अपने यहाँ सिनेमा देखने का संस्कार विक्सित नहीं हो सका.जो थोडा बहुत संस्कार था भी उसे हिन्दी की मुख्य धारा की फिल्मों ने भ्रष्ट कर दिया.जब ओम शांति ओम श्रेष्ठ फिल्म मानी जा रही हो तर्क दिया जा रहा हो कि फिल्म मनोरंजन करती है न तो क्या बहस और बातें की जा सकती हैं?

चवन्नी बहुत दुखी है.गोवा से लौटकर वह उदास हो गया है.

Monday, November 26, 2007

भटके हुए फोकस में मिस हुआ गोल

-अजय ब्रह्मात्मज

चक दे इंडिया से गोल की तुलना होना लाजिमी है। तुलना में गोल पिछड़ सकती है क्योंकि चक दे इंडिया लोकप्रिय हो चुकी है। चक दे.. अपेक्षाकृत बेहतर थी भी। गोल में निर्देशक विवेक अग्निहोत्री का फोकस कई बार भटका है। फिल्म ढीली होने के कारण लंबी लगती है। कई बार लगता है कि अनावश्यक रूप से खेल दिखाया जा रहा है।
प्राय: सभी खेल फिल्मों का यही फार्मूला है। एक कमजोर और हारी हुई टीम होती है। उसमें फिल्म के मध्यांतर तक टीम भावना और जीत की लालसा जागती है और अंत में पराजित या कमजोर टीम विजेता घोषित की जाती है। विवेक की गोल इंग्लैंड में बनी है। वहां की एशियाई बस्ती साउथ हाल के लोगों का यूनाइटेड क्लब है। क्लब कई साल से बदहाली है। टीम असंगठित है। कायदे का कोच भी नहीं है। सिटी काउंसिल के एक मेंबर के साथ ही बिल्डरों की नजर क्लब की जमीन पर लगी है। क्लब के सामने एक ही लक्ष्य है कि लीग में चैंपियन बने या जमीन से हाथ धो बैठे। कोच की तलाश होती है। पुराने खिलाड़ी टोनी (बोमन ईरानी) मिल जाते हैं। वह पहले तो कोच बनने से मना करते हैं। बाद में राजी होते हैं। उनकी समस्या है कि कमजोर टीम में जोश कैसे पैदा करें? वह खुद को ब्रिटिश समझ रहे खिलाड़ी सनी (जॉन अब्राहम) को किसी प्रकार राजी कर लेते हैं। सनी के आने के बाद टीम में जोश आता है। इस बीच क्लब बंद करवाने की साजिश में लगे लोग सनी को लालच देकर यूनाइटेड क्लब से अलग कर देते हैं। यहां निर्देशक थोड़ी एशियाई भावना और इंग्लैंड में मौजूद नस्लवाद का मसला ले आते हैं। थोड़ी चर्चा भारतीयता की होती है। तिरंगा भी दिखता है। साफ दिखने लगता है कि निर्देशक विभिन्न तबकों के दर्शकों को रिझाने की कोशिश में है। हल्के सस्पेंस और रोमांस के बाद यूनाइटेड क्लब की जीत होती है। हां, बीच में एक प्रेम कहानी भी पिरो दी गई है ताकि बिपाशा बसु के होने की सार्थकता सिद्ध की जा सके।
जॉन अब्राहम ने फिर एक बेहतर मौका गवां दिया। भावपूर्ण और नाटकीय दृश्यों में वह फिसल जाते हैं। अरशद वारसी, राज जुत्शी, दिब्येन्दु भट्टाचार्य और कुशल पंजाबी फिल्म की जॉन हैं। बोमन ईरानी ने कोच के रूप में संजीदा अभिनय किया है। कह सकते हैं कि गोल का कोच चक दे.. के कोच से अधिक वास्तविक और प्रभावशाली है।

Thursday, November 15, 2007

हिंदी प्रदेशों की उपेक्षा करते हैं स्टार

-अजय ब्रह्मात्मज

हिंदी फिल्मों के बड़े स्टार हिंदी प्रदेशों के शहरों में जाने से हिचकिचाते हैं। उनकी कोशिश होती है कि पटना, लखनऊ, भोपाल, जयपुर या शिमला जाने की जरूरत न पड़े तो अच्छा। यहां तक कि फिल्मों के प्रचार के सिलसिले में भी वे दिल्ली और कोलकाता जाकर संतुष्ट हो जाते हैं। बताने की आवश्यकता नहीं है कि उनकी इस उपेक्षा से उनका ही नुकसान होता है। उत्तर भारत के शहरों में जाकर प्रचार करने से उन्हें अपनी फिल्मों के अतिरिक्त दर्शक मिल सकते हैं और फिल्मों का बिजनेस बढ़ सकता है।

हिन्दी फिल्मों का बाजार और प्रचार तंत्र मुख्य रूप से संपन्न दर्शकों से ही प्रभावित होता है। बड़े शहरों के मल्टीप्लेक्स में टिकट की कीमत इन दिनों कम से कम सौ रुपये होती है, जो पहले हफ्ते में ढाई सौ रुपये तक पहुंच जाती है। फिर एक-एक मल्टीप्लेक्स में नई फिल्मों के 20 से 36 शो तक होते हैं। इस तरह चंद दिनों में ही प्रति प्रिंट भारी रकम की वसूली हो जाती है। इसके विपरीत छोटे शहरों में सिनेमाघरों की टिकटों की अधिकतम कीमत सौ रुपये है। सिंगल स्क्रीन में फिल्म लगी हो, तो उसके ज्यादा से ज्यादा पांच शो रोजाना हो पाते हैं। अगर हिसाब लगाएं, तो सिंगल स्क्रीन की हफ्ते भर की कमाई मल्टीप्लेक्स में एक दिन में ही हो जाती है। यही कारण है कि निर्माता और स्टार सातगुनी कमाई पर विशेष ध्यान देते हैं और अपेक्षाकृत कम आमदनी के स्रोत को नजरंदाज करते हैं। छोटे शहर और छोटे शहरों के दर्शकों की उपेक्षा में उन्हें संकोच नहीं होता।

पिछले हफ्ते रिलीज हुई दो बड़ी फिल्मों के प्रचार के सिलसिले में संबंधित सितारों की सक्रियता पर नजर डालने से स्पष्ट हो जाएगा कि किस प्रकार सिर्फ मेट्रो और बड़े शहरों के दर्शकों को ही ध्यान में रखा जा रहा है। फिल्मों का प्रचार तंत्र मानता है कि मुंबई में कोई भी चर्चा हो, तो वह छन कर छोटे शहरों तक पहुंच जाती है। चूंकि ज्यादातर टीवी चैनलों के दफ्तर मुंबई में हैं और अखबारों के दफ्तर या ब्यूरो भी मुंबई में हैं, इसलिए कई बार मुंबई से बाहर गए बिना भी उनका काम चल जाता है। चूंकि मुंबई में हुआ प्रचार और कवरेज उन्हें आत्मसुख देता है, इसलिए भी उनके प्रचार अधिकारी उन पत्र-पत्रिकाओं और शहरों की तरफ ध्यान नहीं देते, जिनके कवरेज जंगल में मोर के नाच की तरह होते हैं। यहां आंखों के सामने छोटे से छोटे कवरेज भी उनके इगो की मालिश करता है। इस प्रचार तंत्र में अंग्रेजी अखबारों और समाचार चैनलों को प्रमुखता दी जाती है। प्रशंसकों से घिरे और ग्लैमर की चकाचौंध में अंधे हुए स्टार मुंबई के बाहर की सच्चाई से अपरिचित होते हैं। उन्हें यह अहसास दिला दिया जाता है कि चंद इंटरव्यू से ही काम हो जाएगा। सफल फिल्मों के आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि हिंदी प्रदेशों में उनकी कमाई का प्रतिशत क्या रहा है? ऐसा नहीं है कि हिंदी प्रदेशों के दर्शक फिल्में नहीं देखते। वे खूब देखते हैं, लेकिन उतने नहीं, जितने बड़े शहरों के दर्शक सिनेमाघरों में दिखाई देते हैं। वजह साफ है, फिल्मों से दर्शकों का रिश्ता नहीं बन पाता। पिछले दिनों रिलीज जब वी मेट के कलाकार कई शहरों में नहीं गए। अगर ये स्टार और फिल्मों के प्रचारक छोटे शहरों पर ध्यान दें, तो निश्चित रूप से हिंदी प्रदेशों में उनकी कमाई का प्रतिशत बढ़ सकता है।
कैसी विडंबना है कि हिंदी प्रदेशों के दर्शकों की तरफ हिंदी फिल्मों के निर्माता, निर्देशक और स्टारों का ध्यान नहीं है। क्या हम उम्मीद कर सकते हैं कि कभी लखनऊ, भोपाल, पटना, शिमला या जयपुर में किसी हिंदी फिल्म का भव्य प्रीमियर होगा! लंदन, न्यूयॉर्क और टोरंटो में फिल्मों के प्रीमियर से गौरवान्वित होने वाले स्टारों से हम ऐसी उम्मीद करें भी तो कैसे?

Wednesday, November 14, 2007

सितारों की बढ़ती कीमत!

-अजय ब्रह्मात्मज

हिंदी फिल्मों का इतिहास बताता है कि आजादी के बाद से ही सितारों की तूती बोलती रही है। स्टूडियो सिस्टम के टूटने और बैनरों का प्रभाव कम होने के बाद सितारों का भाव बढ़ा, क्योंकि किसी भी फिल्म की शुरुआत, निर्माण और बाजार के लिए फिल्म के स्टार प्रमुख होते गए। दिलीप कुमार से लेकर अक्षय कुमार तक सितारों ने अपनी लोकप्रियता की पूरी कीमत वसूली है। उन्हें मालूम है कि लोकप्रियता की चांदनी चार दिनों से ज्यादा नहीं रहती, इसलिए अंधेरी रात के आने के पहले जितना संभव हो, बटोर लो।

पिछले दिनों सलमान खान सुर्खियों में रहे। ऐसा कहा गया कि अपेक्षाकृत एक नई प्रोडक्शन कंपनी ने उन्हें भारी रकम देने के साथ ही लाभ में शेयर देने का वादा किया है। इतना ही नहीं, 15 साल के बाद फिल्म का नेगॅटिव राइट भी उन्हें मिल जाएगा। अगर बहुत संकुचित तरीके से भी इस अनुबंध को रकम में बदलें, तो कुल राशि 25-30 करोड़ का आंकड़ा पार कर जाएगी। जिस देश में प्रति व्यक्ति औसत आय हजारों में चल रही हो, वहां करोड़ों की यह रकम चौंकाती है। लगता है कि सितारे करते क्या हैं कि उन्हें करोड़ों की रकम दी जाती है?

सितारों को मिलने वाली भारी कीमत का समीकरण समझने के लिए हिंदी फिल्मों के वर्तमान बाजार को समझना होगा। संजय लीला भंसाली और आशुतोष गोवारीकर जैसे इक्के-दुक्के निर्देशकों को छोड़ दें, तो फिलहाल ज्यादातर निर्देशक और निर्माताओं की फिल्में पॉपुलर स्टारों की हां पर निर्भर करती हैं। दरअसल, उन्हें फिल्म के मुहूर्त से लेकर प्रदर्शन तक सितारों पर ही निर्भर करना पड़ता है। इन दिनों किसी भी फिल्म को आरंभिक दर्शक सितारों से ही मिलते हैं। हां, फिल्म अच्छी न हो, तो सितारे भी दर्शकों को बांध नहीं पाते। शाहरुख खान की पहेली और सलमान खान की जानेमन उदाहरण हैं। बॉक्स ऑफिस पर मुंह के बल लुढ़कने के बावजूद बड़े सितारों के बाजार भाव में कमी नहीं आती। आज भी शाहरुख और सलमान की कीमत किसी दूसरे स्टार से ज्यादा है। इसके साथ ही हमें यह भी गौर करना चाहिए कि अक्षय कुमार जैसे सितारे धीरे-धीरे लोकप्रियता के दायरे में आकर अपनी कीमत बढ़ाते हैं, तो कुछ स्टारों की मांग घटने से कीमत घटती भी है।

चूंकि अभी तक विषय, निर्देशक और स्वयं फिल्म की निजी इयत्ता नहीं है, क्योंकि सब कुछ सितारों की मौजूदगी पर आश्रित है। इसलिए हर सितारा अपनी लोकप्रियता को भुनाता है। निर्माता को लगता है कि अगर अमुक सितारे के हां कहने पर उसे फिल्म की फलां कीमत मिल जाएगी, तो वह उसका बड़ा हिस्सा सितारे को देने में नहीं हिचकिचाता। पहले सितारे केवल पारिश्रमिक से संतुष्ट हो जाते थे, लेकिन अब फिल्मों के बढ़ते बाजार को देखते हुए वे दूसरे जरिए से भी रकम या हिस्सा चाहते हैं। वीडियो राइट, सैटेलाइट राइट, नेगॅटिव राइट, ओवरसीज राइट, टेरिटरी राइट आदि फिल्म बिजनेस से जुड़े अतिरिक्त माध्यमों से सितारों की कमाई होने लगी है। इसमें निर्माताओं का नुकसान नहीं दिखता, क्योंकि फिल्म के सफल होने पर मुनाफा शेयर करने में उन्हें अपनी तिजोरी से कुछ भी नहीं देना पड़ता। आज के सितारे ज्यादातर समझदार हो गए हैं। वे अपनी लोकप्रियता की क्षणभंगुरता को समझते हैं, इसलिए लोकप्रियता के शीर्ष पर रहते समय भरपूर कीमत वसूलते हैं।

Tuesday, November 13, 2007

क्यों नए नए से दर्द की फिराक में तलाश में उदास है दिल

चवन्नी आज स्वानंद किरकिरे का पूरा गीत यहाँ पेश कर रहा है.आप यह गीत सुनें और फिर इन पंक्तियों को पढें तो ज्यादा आनंद मिलेगा।
आज शब जो चांद ने है रुठने की ठान ली
गर्दिशों में हैं सितारे बात हम ने मान ली
अंधेरी स्याह ज़िन्दगी को सूझती नहीं गली
कि आज हाथ थाम लो एक हाथ की कमी खली

क्यों खोया खोया चांद की फ़िराक में तलाश में उदास है दिल
क्यों अपने आप से खफ़ा खफ़ा जरा जरा सा नाराज़ है दिल

ये मन्ज़िले भी खुद ही तय करेये रास्ते भी खुद ही तय करे
क्यों तो रास्तों पे फिर सहम सहम के संभल संभल के चलता है ये दिल
क्यों खोया खोया चांद की फ़िराक में तलाश में उदास है दिल

जिंदगी सवालों के जवाब ढूंढने चली
जवाब में सवालों की एक लंबी सी लड़ी मिली
सवाल ही सवाल है सूझती नहीं गली
कि आज हाथ थाम लो एक हाथ की कमी खली

जी में आता है सितारे नोच लूं
इधर भी नोच लूं उधर भी नोच लूं
एक दो पांच क्या मैं फिर सारे नोच लूं
इधर भी नोच लूं उधर भी नोच लूं
सितारे नोच लूं, मैं सारे नोच लूं

क्यों तो आज इतना वहशी है मिजाज में मजाज है ऐ गम-ए-दिल
क्यों अपने आप से खफा खफा जरा जरा सा नाराज है दिल

दिल को समझाना कह दो क्या आसान है
दिल तो फितरत से सुन लो ना बेईमान है
ये खुश नहीं जो मिला बस मांगता ही है चला
जानता नहीं हर लगी का दर्द है बस सिला
जब कभी ये दिल लगा दर्द ही हमें मिला
दिल की हर लगी का सुन लो दर्द ही है एक सिलसिला

क्यों नए नए से दर्द की फिराक में तलाश में उदास है दिल
क्यों अपने आप से खफा खफा जरा जरा सा नाराज है दिल

Monday, November 12, 2007

क्यों अपने आप से खफ़ा खफ़ा जरा जरा सा नाराज़ है दिल

आज शब जो चांद ने है रुठने की ठान ली
गर्दिशों में हैं सितारे बात हम ने मान ली
अंधेरी स्याह ज़िन्दगी को सूझती नहीं गली
कि आज हाथ थाम लो एक हाथ की कमी खली
क्यों खोया खोया चांद की फ़िराक में तलाश में उदास है दिल
क्यों अपने आप से खफ़ा खफ़ा जरा जरा सा नाराज़ है दिल
ये मन्ज़िले भी खुद ही तय करे
ये रास्ते भी खुद ही तय करे
क्यों तो रास्तों पे फिर सहम सहम के संभल संभल के चलता है ये दिल
क्यों खोया खोया चांद की फ़िराक में तलाश में उदास है दिल

क्या आप इन पंक्तियों को सुन चुके हैं.सुधीर मिश्र की नयी फिल्म खोया खोया चाँद का यह गीत खूब पसंद किया जा रहा है.इसे स्वानंद किरकिरे ने लिखा है और संगीत शांतनु मोइत्रा का है.अगर आप पूरा गीत पढना चाहते हैं तो बताएं.चवन्नी शाम तक यह भी करेगा.सुधीर मिश्र की फिल्म छठे दशक की याद दिलाएगी.शांतनु ने संगीत और स्वानंद ने शब्दों से उस दशक को जिंदा कर दिया है.फिल्म इंडस्ट्री के इन जवान प्रतिभाओं को सलाम.शांतनु बनारस से ताल्लुक रखते हैं तो स्वानंद इंदौर के हैं।

सुधीर मिश्र ने इन्हें हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी... में मौका दिया था .तब से दोनों लगातार आगे ही बढ़ते जा रहे हैं.शुक्र है कि अभी तक दोनों भ्रष्ट नहीं हुए हैं.स्वानंद का यह गीत तो मजाज की याद दिलाता है.स्वानंद ने इसे अजय झिंगरन के साथ गया है।

चवन्नी स्वानंद,शांतनु और सुधीर को ऐसे गीत-संगीत के लिए बधाई देता है.आप भी दे सकते हैं.

Saturday, November 10, 2007

ओम शांति ओम: यथार्थ से कोसों दूर


-अजय ब्रह्मात्मज

फराह खान और शाहरुख खान की ओम शांति ओम का भी वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं है। इंटरवल तक की फिल्म फिर भी मनोरंजक और रोचक लगती है। उसके बाद पुनर्जन्म, आत्मा, न्याय और बदले का जो वितान बुना गया है, वह उबाऊ है। फराह ने अगर इंटरवल तक की कहानी पर ही पूरी फिल्म बना दी होती तो अधिक प्रभावशाली निर्मित होती।
फिल्म में दो ओम हैं, एक शांति है। एक सैंडी है, जो बाद में शांति का रूप लेती है। और एक शांति की अतृप्त आत्मा है, जो निर्माता मुकेश मेहरा से बदला लेने के बाद ही शांत होती है। चलिए थोड़ा विस्तार में चलें। ओमप्रकाश मखीजा (शाहरुख) जूनियर फिल्म आर्टिस्ट है। वह स्टार बनने के ख्वाब देखता है। उसे शांतिप्रिया से प्रेम हो गया है। वह सेट पर लगी आग से शांति को जान पर खेल कर बचाता है। शांति उसके जोखिम से प्रभावित होती है। ओम को लगता है कि शांति उसे चाहने लगी हैं। ओम का प्यार पींगें मारने लगता है। अगली बार जब मुकेश मेहरा शांति को सचमुच आग में झोंक देता है तो उसे बचाने के चक्कर में ओम जान भी गवां बैठता है। यहीं इंटरवल होता है। हमें पता चलता है कि ओम का पुनर्जन्म हो गया है। नए ओम को पिछले जन्म की बातें याद आ जाती हैं। वह शांति को न्याय दिलाने के लिए व्यूह रचता है। उस व्यूह में शांति की आत्मा आकर बदला लेती है। मालूम नहीं 21वीं सदी में मनोरंजन के नाम पर परोसे गए इस अंधविश्वास पर कितने दर्शक यकीन करेंगे? अगर यह फिल्म शाहरुख की नहीं होती तो कहानी के आधार पर इसे सी ग्रेड फिल्म कहा जाता।
शाहरुख और फराह ने इसे सेवेंटीज (आठवें दशक) की खासियत के तौर पर परोसते हुए मनमोहन देसाई की शैली से जोड़कर खुद को प्रतिष्ठित करने की कोशिश की है। माफ करें, मनमोहन देसाई की फिल्मों में लाजिक नहीं होता था लेकिन उनकी फिल्में अंधविश्वास को बढ़ावा भी नहीं देती थीं। फराह की फिल्म तो 21वीं सदी की कहानी में अंधविश्वास का सहारा लेती है। ..और यह सब मनोरंजन के नाम पर हो रहा है। आाखिर दर्शकों को क्या समझा या समझाया जा रहा है?
फिल्म का तकनीकी पक्ष उत्तम है। स्पेशल इफेक्ट से दृश्य प्रभावशाली हो गए हैं। कोशिश की गई है कि शाहरुख की देहयष्टि दिखा कर नई उम्र के दर्शकों को आकर्षित किया जाए, लेकिन उनकी देह सलमान और जान अब्राहम के समकक्ष नहीं आ पाती। अभिनय के लिहाज से इंटरवल के पहले के शाहरुख ठीक लगते हैं। बाद के शाहरुख अपने किरदार के साथ न्याय नहीं कर पाते। दीपिका पादुकोण में आकर्षण है। इस फिल्म की वह एक उपलब्धि हैं। गीत-संगीत विषय के अनुकूल है। पापुलर हो चुके गानों के फिल्मांकन व संयोजन में फराह की खूबी दिखती है। एक गाने में तो ढेर सारे कलाकार आये हैं।

सांवरिया : रंग और रोमांस वास्तविक नहीं


-अजय ब्रह्मात्मज
खयालों की दुनिया और ख्वाबों के शहर में राज, सकीना, गुलाब और ईमान की कहानी में लॉजिक खोजना बेमानी है। इस सपनीली दुनिया का परिवेश भव्य और काल्पनिक है। नहर है, नदी है, पुल है, अंग्रेजों के जमाने के बार हैं और आज की अंग्रेजी मिश्रित भाषा है। सांवरिया का रंग और रोमांस वास्तविक नहीं है और यही इस फिल्म की खासियत है।
संजय लीला भंसाली के काल्पनिक शहर में राज (रणबीर कपूर) गायक है। उसे नयी नौकरी मिली है। बार में ही उसकी मुलाकात गुलाब ( रानी मुखर्जी) से होती है। दोनों के बीच दोस्ती होती है। दोस्तोवस्की की कहानी ह्वाइट नाइट्स पर आधारित इस फिल्म में दो प्रेमियों की दास्तान है। सिर्फ चार रातों की इस कहानी में संजय लीला भंसाली ने ऐसा समां बांधा है कि हम कभी राज के जोश तो कभी सकीना (सोनम कपूर) की शर्म के साथ हो लेते हैं। संजय लीला भंसाली ने एक स्वप्न संसार का सृजन किया है, जिसमें दुनियावी रंग नहीं के बराबर हैं।
रणबीर कपूर और सोनम कपूर के शो केस के रूप में बनी इस फिल्म में संजय लीला भंसाली ने खयाल रखा है कि हिंदी फिल्मों में नायक-नायिका के लिए जरूरी और प्रचलित सभी भावों का प्रदर्शन किया जा सके। साफ पता चलता है कि कॉमेडी, इमोशन, एक्शन, ड्रामा, सैड सिचुएशन, रोमांस, नाच-गाना और आक्रामक प्रेम के दृश्य तैयार किए गए हैं। फिल्म बड़ी बारीकी से राज कपूर और नरगिस की फिल्मों की याद दिलाती है। खासकर आक्रामक प्रेम और बारिश एवं छतरी के दृश्यों में हम आवारा और बरसात की झलक पाते हैं। रणबीर कपूर कभी ऋषि कपूर तो कभी राज कपूर की भावछवि चेहरे पर ले आते हैं। चूंकि ऋषि कपूर और राज कपूर की छवियां हमारे मानस में प्रचुरता से अंकित है और रणबीर कपूर उसी परिवार से आए हैं, इसलिए कई बार लगता है कि रणबीर कपूर उनकी नकल कर रहे हैं। इसके बावजूद कहा जा सकता है कि हिंदी फिल्मों को एक नया सितारा मिल गया है। इसी प्रकार सोनम कपूर में हम मीना कुमारी, वहीदा रहमान और रेखा की झलक पाते हैं।
फिल्म में सकीना का खुद को हम कहना भी उसे नॉस्टेलजिक अतीत से जोड़ देता है। सोनम में संभावनाएं हैं और उनके चेहरे में विभिन्न किरदारों को निभा सकने की खूबी है। सांवरिया में रानी मुखर्जी को कुछ नाटकीय और भावपूर्ण दृश्य मिले हैं। सलमान खान तो अपने खास रंग-ढंग में ही हैं। बेगम पारा और जोहरा सहगल की मौजूदगी सांवरिया को नया आयाम देती है। उनके बगैर यह फिल्म अधूरी रहती। संजय लीला भंसाली की सपनीली दुनिया यथार्थ से कोसों दूर है। अगर आप ऐसी दुनिया में रमना चाहते हैं तो सांवरिया देखना न भूलें।

Friday, November 9, 2007

शुक्रवार,९ नवम्बर,२००७

माफ़ करें.दीपावली कि खुशियों में थोडी देर हो गयी.चवन्नी ने सोचा था कि सवेरे ही पोस्ट कर देगा,लेकिन एक के बाद एक काम लगा रहा.और फिर रात में फिल्म देख कर देर से लौटने के कारण चवन्नी आज ज्यादा देर तक सोया ही रहा.बहरहाल इस शुक्रवार की बात करें।

आज दो फिल्में और दोनो ही बड़ी फिल्में रिलीज हुई हैं.संजय लीला भंसाली की सांवरिया और फराह खान कि ओम शांति ओम ने सभी सिनेमाघरों को भर दिया है.चवन्नी ने आप को पिछले हफ्ते बताया ही था कि इन दोनों फिल्मों के डर से २ नवम्बर को कोई फिल्म रिलीज नही हुई थी.चवन्नी आप को बता दे कि अगले हफ्ते भी कोई फिल्म रिलीज नही हो रही है।

सांवरिया में दो नए स्टार हैं.कपूर खानदान के वारिस के तौर पर पेश किये जा रहे रणबीर कपूर और अनिल कपूर कि बेटी सोनम कपूर को आप इस फिल्म में देख सकते हैं.चवन्नी ने सुना है कि रणबीर कपूर और सोनम कपूर को पसंद किया गया है.पसंद तो ओम शांति ओम की दीपिका पदुकोन को भी किया जा रहा है.चवन्नी को अजय ब्रह्मात्मज की समीक्षाओं का इंतज़ार है।

बुधवार को सांवरिया का प्रीमियर था.फिल्म जगत के ढेर सारे लोग फिल्म देखने आये थे.यह अनोखा माहौल होता है.मौका मिल तो चवन्नी कभी विस्तृत जानकारी देहा प्रीमियर की। सांवरिया देखने भी फिल्मी हस्तियों की भीड़ उमड़ी थी। वैसे हवा फली जा रही है कि सांवरिया अच्छी नही लग रही है और शांति ओम हिट हो गयी है। यह एक अलग प्रकार का खेल है,जिसके तहत हिट को फ्लॉप और फ्लॉप को हिट करवाया जाता है.

Thursday, November 8, 2007

क्यों अभिनेता बने बलराज साहनी ?

कहना मुश्किल है कि अगर हंस में बलराज साहनी की कहानी छाप गयी होती तो वे फिल्मों में अभिनय के क्षेत्र में सक्रिय होते या नही?चवन्नी मानता है कि फिल्मों में उनका आना एक लिहाज से अच्छा ही रहा.हमें एक स्वभावाविक अभिनेता मिल और कई खूबसूरत फिल्में मिलीं.हाँ,अगर वह कहानी अस्वीकृत नही हुई होती तो शायद एक अच्छा लेखक भी मिलता.और यह अलग मिसाल होती जब दो भाई बडे साहित्यकार होते.बलराज साहनी कि फिल्मी आत्मकथा भी किसी साहित्य से कम नही है.किसी प्रकाशक को चाहिए कि इसे पुनः प्रकाशित करे.बलराज साहनी के अभिनेता बनने का निर्णय उन्ही के शब्दों में पढें:


विलायत से वापस आकर मैंने अंग्रजी साम्राज्य का निडरता से खुल्लम-खुल्ला विरोध करना शुरू कर दिया था. यहां तक कि मेरे दोस्त कभी-कभी मेरा ध्यान डिफेंस आफ इंडिया रूल्स की ओर भी दिलाते थे. पर इसका यह मतलब नहीं कि मैं सब.कुछ छोड़.छाड़कर स्वतन्त्रता-आन्दोलन में कूदने के लिए तैयार हो चुका था. मेरी यह प्रिक्रिया केवल मेरा अहंकार था. विलायत जाकर मैं अपने.आपको अंग्रेजों के बराबर समझने लगा था. इस अहंकार के सम्बंध में उस समय की एक और तस्वीर मेरे सामने आती है. विलायत जाने से पहले मेरी कहानियां 'हंस' में बाकायदा प्रकाशित होती रहती थी. मैं उन भाग्यशाली लेखकों में से था, जिनकी भेजी हुई कोई भी रचना अस्वीकृत नहीं हुई थी. विलायत में चार साल तक मैंने एक भी कहानी नहीं लिखी थी. अभ्यास टूट चुका था. अब मैंने उसे बहाल करना चाहा. एक कहानी लिखकर 'हंस' को भेजी, तो वह वापस आ गई. मेरे स्वाभिमान को गहरी चोट लगी. इस चोट का घाव कितना गहरा था, इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि उसके बाद मैंने कोई कहानी नहीं लिखी .
चेतन के फिल्मों में काम करने के निमन्त्रण ने जैसे इस चोट पर मरहम का काम किया. फिल्मों का मार्ग अपनाने का कारण यह अस्वीकृत कहानी भी रही.

Wednesday, November 7, 2007

तरह-तरह के प्रचार!




-अजय ब्रह्मात्मज






फिल्म ओम शांति ओम और सांवरिया दोनों फिल्में दीवाली में आमने-सामने आ रही हैं। सच तो यह है कि दर्शकों को अपनी तरफ खींचने के प्रयास में लगी दोनों फिल्में प्रचार के अनोखे तरीकों का इस्तेमाल कर रही हैं। कहना मुश्किल है कि इन तरीकों से फिल्म के दर्शकों में कोई इजाफा होता भी है कि नहीं? हां, रिलीज के समय सितारों की चौतरफा मौजूदगी बढ़ जाती है और उससे दर्शकों का मनोरंजन होता है। सांवरिया का निर्माण सोनी ने किया है। सोनी इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों की मशहूर कंपनी है। सोनी एक एंटरटेनमेंट चैनल भी है। सोनी के कारोबार से किसी न किसी रूप में हमारा संपर्क होता ही रहता है। सांवरिया की रिलीज के मौके पर सोनी उत्पादों की खरीद के साथ विशेष उपहार दिए जा रहे हैं। अगर आप भाग्यशाली हुए, तो प्रीमियर में शामिल हो सकते हैं और सितारों से मिल सकते हैं। उधर एक एफएम चैनल शाहरुख खान की फिल्म ओम शांति ओम के लिए प्रतियोगिता कर रहा है। विजेताओं को शाहरुख के ऑटोग्राफ किए टी-शर्ट मिलेंगे। टीवी के कार्यक्रमों, खेल संबंधित इवेंट और सामाजिक कार्यो में दोनों ही फिल्मों की टीमें आगे बढ़कर हिस्सा ले रही हैं। कोशिश है कि ज्यादा से ज्यादा देर तक हमारी-आपकी आंखों के सामने उनकी छवि नाचती रहे। शायद उन्हें यह भ्रम है कि इससे फिल्मों के दर्शक बढ़ते हैं!




गौर करें, तो इस तरह के हर इवेंट और प्रचार के पीछे फिल्म के निर्माता और कंज्यूमर प्रोडक्ट या इवेंट के व्यावसायिक हित जुड़े हैं। अगर सीधे रूप में पैसों का हस्तांतरण नहीं हो रहा है, तो भी परस्पर हित में मुफ्त प्रचार किया जा रहा है। कंज्यूमर प्रोडक्ट के मालिकों को लगता है कि उनके उत्पाद के बारे में दर्शकों की जानकारी फिल्मी सितारों के बहाने बढ़ रही है और फिल्म निर्माता इस गलतफहमी में खुश रहता है कि बगैर कोई पैसा खर्च किए उसकी फिल्म का प्रचार हो गया! एड व‌र्ल्ड के जानकार ही ठीक-ठीक बता सकते हैं कि ऐसे इवेंट या प्रचार से फिल्म और कंज्यूमर प्रोडक्ट को फायदा होता है या नहीं? अभी क्रिकेट का माहौल बना था, तो सांवरिया और ओम शांति ओम की टीम क्रिकेट खिलाडि़यों के साथ दिख रही थी। यहां तक कि महेंद्र सिंह धोनी और दीपिका पादुकोण के नैन-मटक्के के किस्से भी चलाए गए। कैमरा हमें दिखा रहा था, लेकिन बातें आंखों से हो रही थीं, इसलिए कुछ सुनाई नहीं पड़ रहा था। हां, रिपोर्टर का वॉयसओवर जरूर सारी बातें बता रहा था। उधर युवराज सिंह और सोनम कपूर में रोमांटिक झड़प हो गई, जिसमें सलमान खान ने बीच-बचाव किया। ताज्जुब है कि यह सब फिल्म प्रचार के नाम पर किया जा रहा है। इस प्रचार में फिल्म की कोई बात नहीं होती। केवल फिल्म वालों की बात होती है। सितारे दिखते हैं और समझ लिया जाता है कि दर्शक के दिमाग में फिल्म बैठ गई।




शाहरूख हों या आमिर खान.., इन दोनों की फिल्मों की रिलीज के समय आवश्यक रूप से इनके द्वारा प्रचारित किसी न किसी कंपनी के नए प्रोडक्ट बाजार में जरूर आते हैं। चूंकि फिल्म की रिलीज के समय ये आसानी से उपलब्ध होते हैं, इसलिए कंपनियां भी लाभ उठाने की कोशिश करती हैं। प्रचार के इन अनोखे तरीकों से स्टारों का बाजार भाव और प्रभाव जरूर बढ़ता है और कंज्यूमर प्रोडक्ट का प्रचार भी हो जाता है। अगर थोड़ा पलटकर देखें, तो इस तरह के प्रचार से फिल्मों का कोई फायदा नहीं होता। फिल्म अच्छी और रोचक होती है, तभी चलती है। दर्शक पहले दिन के पहले शो तक में सिनेमाघरों का रुख नहीं करते। हां, इन दिनों चल रहे अनोखे प्रचार से उनका मनोरंजन और टाइम पास जरूर होता है, जो बगैर पैसे खर्च किए टीवी और अखबारों से मिल जाता है।

Tuesday, November 6, 2007

बलराज साहनी की नज़र में फिल्मों की पंजाबियत

चवन्नी यह बात जोर-शोर से कहता रहा है कि हिन्दी फिल्मों में पंजाब और पंजाबियत का दबदबा है.कुछ लोग इसे चवन्नी की उत्तर भारतीयता से जोड़ कर देखते हैं.आप खुद गौर करें और गिनती करें कि अभी तक जितने हीरो हिन्दी फिल्मों में दिखे हैं ,वे कहाँ से आये हैं.आप पाएंगे कि ज्यादातर हीरो पंजाब से ही आये हैं.बलराज साहनी भी इस तथ्य को मानते हैं।
बलराज साहनी की पुस्तक मेरी फिल्मी आत्मकथा के पृष्ठ २४ पर इसका उल्लेख हुआ है.बलराज साहनी के शब्द हैं:

और यह कोई अनहोनी बात भी नहीं थी. पंजाब प्राचीन काल से ही आर्यों, युनानी, तुर्की और अन्य गोरी हमलावर कौमों के लिए भारत का प्रवेश-द्वार रहा है। यहां कौमों और नस्लों का खूब सम्मिश्रण हुआ है। इसी कारण इस भाग में आश्चर्यचकित कर देने की सीमा तक गोरे, सुन्दर लोग देखने में आते हैं. इसकी पुष्टि करने के लिए केवल इतना ही कहना पर्याप्त है कि पंजाब सदैव से हीरो-हीरोइनों के लिए फिल्म-निर्माताओं की तलाशगाह रहा है. दिलीप कुमार, राजकपूर, राजकुमार, राजिन्दर कुमार, देव आनन्द, धर्मेन्द्र, शशि कपूर, शम्मी कपूर, तथा अन्य कितने ही हीरो इसी ओर के लोग हैं. इस लिहाज से हमारा पिंडी-पिशौर तो और भी ज्यादा मुमताज रहा है.
इस नाचीज लेखक की भी उसके फिल्मी जीवन में कई बार गैरी कपूर, रोनाल्ड कोलमैन, हम्फरी, एन्थनी क्विन आदि से तुलना की गई है. देव आनन्द के भारतीय ग्रैगरी पैक कहलाने से तो सब परिचित हैं.
अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए शेष भारत में भारतीयों ने गांधीजी का अनुसरण किया. पर पंजाबियों के लिए नकल की राह पर चलना बहुत लाभदायक रहा, और इसे वे इस स्वतन्त्रता के युग में भी छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं. बल्कि सच तो यह है कि बाकी हिन्दुस्तान भी गांधीजी की राह छोड़कर उन्हीं के रास्ते की ओर खिंचता चला आ रहा है.
हमारी फिल्म इंडस्ट्री में भी कभी गांधी तथा टैगोर से प्रेरणा लेकर राष्ट्रीय भावनाएं जागी थीं और न्यू थियेटर और प्रभात फिल्म कम्पनी जैसी संस्थाएं बनी थीं. लेकिन आज पंजाबियों के प्रभाव के कारण इस क्षेत्र में भी नकल का झंडा बड़ी मजबूती से गाड़ा जा चुका है.

Monday, November 5, 2007

शुक्रवार,२ नवम्बर ,२००७

ब्लॉग की दुनिया में पोस्टदेखी चलती है.आप का पोस्ट दिखता है तो लोग पढ़ते हैं और टिपण्णी भी करते हैं.आप पोस्ट न करें तो किसी को याद भी नही रहता कि आप ब्लॉग पर सक्रिय थे.बोधिसत्व अपवाद है,क्योंकि वे अभय तिवारी को याद करते हैं.चवन्नी किसी ग़लतफ़हमी में नही है कि उसका पोस्ट खूब पढ़ जाता है या कोई इंतज़ार करता है. शुक्रवार का यह पोस्ट २ नवम्बर को नही लिखा गया।

चवन्नी आप को याद रहे न रहे ...वह लिखता रहेगा.पिछले शुक्रवार को चवन्नी शहर से दूर था और पोस्ट लिखने कि स्थिति में नही था.अब इसे संयोग ही कहें कि २ नवम्बर को कोई फिल्म रिलीज नही हुई.एक तरह से अच्छा ही रहा।वैसे आपको चवन्नी बता दे कि सांवरिया और ओउम शांति ओउम के दर से कोई निर्माता इस हफ्ते फिल्म रिलीज करने कि हिम्मत नही कर सका.किसी ने बताया कि दीवाली के पहले के हफ्ते में पिछले पच्चीस सालों से फिल्में रिलीज नही होती.अगर आप लोगों में से किसी को जानकारी हो तो बताएं.

चलिए थोडी बासी खबरें ही जान लें.पिछले हफ्ते ऐश्वर्या राय और शाहरुख़ खान का जन्मदिन था.चवन्नी उन्हें बधाई देता है... देर से ही सही.उम्मीद है कि आप ने उन्हें बधाई भेज दी होगी.दोनों ही सुपर स्टार हैं और खूब चमक रहे हैं।

चवन्नी ने इधर बलराज साहनी की फिल्मी आत्मकथा पढी.जल्दी ही उस किताब के कुछ अंश आप पढ़ सकेंगे.फिलहाल इतना ही।

चवन्नी की पोस्टदेखी बात को गंभीरता से न लें.चवन्नी तो ऐसे ही दुखी हो जाता है.