Tuesday, October 30, 2007

'नो स्मोकिंग' का के काफ्का नहीं कश्यप है ... अनुराग कश्यप

हिंदी फिल्मों के अंग्रेजी समीक्षकों पर चवन्नी की हैरानी बढ़ती ही जा रही है. एक अंग्रजी समीक्षक ने तो 'नो स्मोकिंग' के बजाए अनुराग कश्यप की ही समीक्षा कर दी. वे अनुराग से आतंकित हैं. उनके रिव्यू में यह बात साफ झलकती है. क्यों आतंकित हैं? क्योंकि अनुराग उन्हें सीधी चुनौती देते हैं कि आप खराब लिखते हो और हर लेखन के पीछे निहित मंशा फिल्म नहीं ... कुछ और रहती है.

'नो स्मोकिंग' को लेकर बहुत कुछ लिखा और कहा जा रहा है. अनुराग कश्यप की यह फिल्म कुछ लोगों की समझ में नहीं आई, इसलिए निष्कर्ष निकाल लिया गया कि फिल्म बुरी है. इस लॉजिक से तो हमें जो समझ में न आए, वो सारी चीजें बुरी हो गई. समझदारी का रिश्ता उपयोगिता से जोड़कर ऐसे निष्कर्ष निकाले जाते हैं. आज की पीढ़ी संस्कृत नहीं समझती तो फिर संस्कृत में लिखा सब कुछ बुरा हो गया. और संस्कृत की बात क्या करें ... आज तो हिंदी में लिखा भी लोग नहीं पढ़ पाते, समझ पाते ... तो फिर मान लें कि हम सभी हिंदी में लिखने वाले किसी दुष्कर्म में संलग्न हैं.

कला और अभिव्यक्ति के क्षेत्र में वह तुरंत पॉपुलर और स्वीकृत होता है, जो प्रचलित रूप और फॉर्म अपनाता है. जैसा सब लिखते और सृजित करते हैं, वैसा ही आप भी लिखो और सृजित करो तो तुरंत स्वीकृति मिलती है. किसी ने भी धारा के विपरीत तैरने की कोशिश की तो उसे अनाड़ी घोषित कर दिया जाता है. अनुराग कश्यप अनाड़ी साबित किए जा रहे हैं.

'नो स्मोकिंग' का के काफ्का नहीं, खुद कश्यप हैं ... अनुराग कश्यप.अगर आप के के ऊपर बढ़ रहे दबाव और उसमें आए बदलाव की प्रक्रिया पर गौर करें तो पाएंगे कि बाबा बंगाली, उसकी बीवी और उसके दोस्त सभी उसे उस व्यवहार को अपनाने के लिए कहते हैं, जिस पर चलना नैतिक रूप से सही माना जाता है. नैतिकता के वर्चस्व को स्थापित करने के पीछे निजता समाप्त करने की इच्छा है. आखिर इस समाज में कैसे के मनमर्जी से जी सकता है? आरंभ में अहंकारी दिख रहा के फिल्म के अंत में उसी सिस्टम का हिस्सा बन जाता है. आज की यही नियति है. सारे विद्रोही एक-एक कर सिस्टम का लाभ उठाने के लिए आत्मा से विमुख होकर शारीरिक उपभोग में लीन हो गए हैं. के का भी यही हश्र होता है.

के की लड़ाई और उसकी हार में हम कश्यप को देख सकते हैं. पिछले पंद्रह सालों में कश्यप ने धारा के विपरीत तैरने की कोशिश की है, लेकिन उस पर लगातार दबाव है कि वह भी दूसरों की तरह सोचना और फिल्में बनाना शुरू कर दे. 21वीं सदी में व्यक्तिगत आजादी पर एकरूपता का यह हमला वास्तव में किसी और समय से ज्यादा महीन और आक्रामक है. हम समझ नहीं पाते और अपनी विशिष्टता खोते चले जाते हैं. हमारी सफलता इसी एकरूपता पर निर्भर करती है.

वर्त्तमान परिप्रेक्ष्य में इस विसंगति और विडंबना को समझते हुए 'नो स्मोकिंग' की अन्योक्ति को पढ़ने का प्रयास करें तो फिल्म बच्चों की कविता की तरह सरल हो जाएगी. अगर हम शब्द, भाव और अभिव्यक्ति से परिचित नहीं हों तो हर कविता, कहानी और फिल्म दुरूह और अपरिचित हो जाएगी. अनुराग कश्यप पर ऐसी ही दुरूहता का आरोप है.

चवन्नी मानता है कि 'नो स्मोकिंग' को फिर से देखने की जरूरत है. बिंबों और प्रतीकों की ऐसी प्रगतिशील सिनेमाई भाषा हिंदी फिल्मों में विरल है .

Monday, October 29, 2007

रतलाम की गलियां

चवन्नी तो रवि रतलामी की वजह से रतलाम को जानता था.उसने अभी जब वी मेट फिल्म देखी.इसमें शाहिद कपूर के पीछे उतरी करीना की ट्रेन छोट जाती है तो वह शहीद पर ट्रेन पकड़वाने का दवाब डालती है.दोनों टैक्सी से रतलाम स्टेशन पहुँचते हैं.सामने प्लेटफॉर्म पर ट्रेन खड़ी है ,लेकिन करीना पानी के बोतल की ज्यादा कीमत के लिए उलझ जाती है और कंज्यूमर कोर्ट में जाने तक की बात करती है.इस बहस में उसकी ट्रेन फिर से छोट जाती है.फिर रतलाम रात की बाँहों में दिखाई पड़ता है.कुछ मनचले दिखते हैं.ऐसे मनचले हर शहर में प्लेटफॉर्म और बस स्टैंड पर मिल जायेंगे.चवन्नी को याद है कि कॉलेज के दिनों में उसके कुछ दोस्तों की शामें स्टेशन पर ही गुजरती थीं.उन्हें ट्रेन के आने-जाने का पूरा आईडिया रहता था.यहाँ तक तो सब सही लगता है।
करीना प्लेटफॉर्म से बाहर आती है तो स्टेशन के बाहर उन औरतों के बीच अनजाने में खड़ी हो जाती है ,जो रात के ग्राहकों के इंतज़ार में हैं.तभी एक युवक मोटर साइकिल पर आता है और करीना से सौदा करता है.करीना उसे समझती है कि वह उस टाइप की नही है.वह युवक पीछे ही पड़ जाता है तो भागती है.संयोग से उसे फिर से शाहिद कपूर दिखता है.वह उस से जाकर चिपक जाती है.उसकी जान बचती है और जिस्म भी.अब दोनों रात भर के लिए एह होटल में जाते हैं.डिसेंट होटल में घंटों के हिसाब से कमरे मिलते हैं.रात में होटल पर छपा पड़ता है और पता चलता है कि हर कमरे में लड़कियां अपने ग्राहकों के साथ थीं।
इम्तियाज़ अली की इस खूबसूरत फिल्म में रतलाम की गलियों की खूब तारीफ होती है.ऐसा लगता है कि कोई शायर दिल्ली की गलियों के तर्ज पर रतलाम की गलियों की तारीफ कर रहा हो।शायद पहली बार किसी फिल्म रतलाम शहर का ऐसा जिक्र हुआ है।
चवन्नी को एक बात खटकी कि क्या रतलाम की रात दिखने के लिए धन्धेवाली औरतों को ही दिखाना ज़रूरी था.रवि रतलामी बता सकते हैं कि रतलाम स्टेशन के आसपास और डिसेंट होटल का क्या माहौल है?चवन्नी को तो रतलाम की रात का यह चित्रण नही जमा.

Sunday, October 28, 2007

चांद और हिन्दी सिनेमा

चवन्नी ने हाल में ही सबसे बड़ा चांद देखा.हिन्दी फिल्मों में शुरू से चांद दिखता रहा है.फिल्मी गीतों चांद का प्रयोग बहुतायत से होता रहा है।गुलजार की हर फिल्म चांद के गीत से ही पूरी होती है.चवन्नी को कुछ गीत याद आ रहे हैं.कुछ आप याद दिलाएं.

-चंदा ओ चंदा...
-चंदा है तू मेरा सूरज है तू
-चांद आहें भरेगा...
-चांद को क्या मालूम...
Show keyboardमाफ करें आज कीबोर्ड नाराज दिख रहा है।मैं अपनी सूची नहीं दे पा रहा हूं.

क्या आप सभी एक -एक गीत टिप्पणियों में देंगे?

Saturday, October 27, 2007

अभिमान निषेध

हाल ही में गोवा की एक गैर सरकारी संस्था ने शाहरुख़ खान को नोटिस भेजी है.शाहरुख़ खान को १५ दिनों के अन्दर सफ़ाई भेजनी है की वे सार्वजनिक जगहों पर क्यों धूम्रपान करते हैं.सही सवाल उठाया गया है की उनके इस उच्छृंखल व्यवहार का किशोरों पर बुरा असर पड़ता है।

फिल्म
अभिनेताओं और अभिनेत्रियों पर किसी भी प्रकार का निषेध लगाने से पहले ज़रूरी है कि उन पर अभिमान निषेध लगाया जाये.चवन्नी को इन स्टारों से मिलने के कई मौके मिले हैं और आगे भी मिलेंगे.बातचीत के दरम्यान थोडा बेतक़ल्लुफ़ होने पर इनका अभिमान जाग पड़ता है. अहम् सिर उठता है.लगभग सारे ही सितारे आत्मरति,आत्ममोह,आत्ममुग्धता और अंहकार के शिकार हैं.शाहरुख़ खान की बातचीत देखें और सुनें तो जाम की तरह छलकते उनके अहम् से आप गीले तक हो सकते हैं.सिर्फ शाहरुख़ ही क्यों ...हर स्टार केवल अपनी ही बात करता नज़र आता है।

अभिमान होना या स्वाभिमानी होना गलत नही है,लेकिन अभिमान हद से बढे तो अंहकार बनता है और अहंकारी व्यक्ति अनजाने में अपना ही नुकसान करता रहता है.फिल्म जगत के लोगों को अपने अंहकार में नष्ट होते चवन्नी ने देखा,पढा और सुना है.चवन्नी की सिफारिश है कि sabhi के अंहकार पर pabandi laga

Friday, October 26, 2007

दर्शनीय व विमर्श योग्य है नो स्मोकिंग

-अजय ब्रह्मात्मज



अनुराग कश्यप की इस फिल्म को कृपया जॉन अब्राहम की फिल्म समझ कर देखने न जाएं। हिंदी में स्टार केंद्रित फिल्में बनती हैं, जिनमें निर्देशक का हस्ताक्षर पहचान में ही नहीं आता। अनुराग कश्यप युवा निर्देशकों में एक ऐसे निर्देशक हैं, जिनकी फिल्में अभी तक स्टारों पर निर्भर नहीं करतीं। ऊपरी तौर पर यह के (जान अब्राहम) की कहानी है। उसे सिगरेट पीने की बुरी लत है। चूंकि वह बेहद अमीर है, इसलिए उसे लगता है कि उसकी लतों और आदतों को बदलने की सलाह भी उसे कोई नहीं दे सकता। एक स्थिति आती है, जब उसकी बीवी उसे आखिरी चेतावनी देती है कि अगर उसने सिगरेट नहीं छोड़ी तो वह उसे छोड़ देगी। वह घर से निकल भी जाती है। के अपनी बीवी से बेइंतहा प्यार करता है। बीवी को वापस लाने के लिए वह सिगरेट छोड़ने की कोशिश में बाबा बंगाली से मिलता है। यहां से उसकी जिंदगी और लत को बाबा बंगाली नियंत्रित करते हैं। इसके बाद एक ऐसा रूपक बनता है, जिसमें हम इस संसार में रिश्तों की विदू्रपताओं को देखते हैं। स्वार्थ के वशीभूत दोस्त भी कितने क्रूर और खतरनाक हो सकते हैं। फिल्म के अंत में हम देखते हैं कि के भी उसी विद्रूपता का शिकार होता है।
यह फिल्म एक स्तर पर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह के लिए जूझ रहे अनुराग कश्यप की आत्मकथात्मक अभिव्यक्ति भी बन जाती है। अनुराग कश्यप ने हिंदी फिल्मों के घिसे-पिटे फार्मूले का इस्तेमाल नहीं किया है। उनकी फिल्म रूपकात्मक और बिंबात्मक है। संभव है एकरेखीय या सपाट कहानी देखने के आदी दर्शक इसकी व्यंजना समझने में मुश्किल महसूस करें। जान अब्राहम ने स्टारडम की परवाह नहीं करते हुए एक निराश और हताश युवक की भूमिका निभायी है, जो धीरे-धीरे परिस्थिति का शिकार होता है। नो स्मोकिंग का नायक जीतता या हारता नहीं, वह घोर संभ्रम की स्थिति में सिस्टम का पुर्जा बन जाता है। उसे जिन बातों पर गुस्सा आता था, वह वैसी ही बातें करने लगता है। सभ्य समाज की इस विडंबना और एकरूपता के दबाव को नो स्मोकिंग प्रतीकों से सामने ले आती है। अनुराग कश्यप का साहसिक प्रयोग दर्शनीय और विमर्श के योग्य है। जब वी मेट के निर्देशक इम्तियाज अली इसे आगे की फिल्म मानते हैं।

मुख्य कलाकार : जॉन अब्राहम, आयशा टाकिया, रणवीर शौरी, परेश रावल, जेस्सी रंधावा
निर्देशक : अनुराग कश्यप
तकनीकी टीम : निर्माता- विशाल भारद्वाज एवं कुमार मंगत, छायांकन- कुमार रवि, पटकथा- अनुराग कश्यप, संगीतकार- विशाल भारद्वाज, गीतकार- गुलजार

जब वी मेट: भारतीयता का रसीला टच

-अजय ब्रह्मात्मज


इम्तियाज अली की जब वी मेट शुद्ध मनोरंजक रोमांटिक कामेडी है। फिल्म पहले ही दृश्य से बांधती है। मुंबई से भटिंडा तक के सफर में यह फिल्म आपको हंसाती, गुदगुदाती और रिझाती हुई ले जाती है। शाहिद कपूर और करीना कपूर की रोमांटिक जोड़ी फिल्म का सबसे मजबूत और प्रभावशाली आधार है।
आदित्य (शाहिद) अपने कंधों पर अचानक आ गई जिम्मेदारी से घबराकर यूं ही निकल जाता है। उसका यह निष्क्रमण गौतम बुद्ध की तरह नहीं है। वस्तुत: वह अपनी जिम्मेदारियों से पलायन करता है। ट्रेन में उसकी मुलाकात गीत (करीना कपूर) से होती है। बक-बक करने में माहिर गीत के दिल से खुशी लगातार छलक-छलक पड़ती है। जिंदगी को अपने ढंग से जीने पर आमादा गीत अपनी मुश्किलों में आदित्य को ऐसा फंसाती है कि उसे भटिंडा तक जाना पड़ता है।
जब वी मेट एक स्तर पर दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे का भारतीय और अल्प बजट संस्करण है। मुंबई से मध्यप्रदेश, फिर राजस्थान और पंजाब होते हुए हिमाचल तक की यात्रा में हम विभिन्न प्रसंगों में ऐसे दृश्य देखते हैं, जो मुंबई फिल्म इंडस्ट्री के फिल्मकारों के अनुभव और कल्पना के परे हैं। इम्तियाज अली के सटीक संवाद और दृश्य संयोजन से फिल्म दर्शकों को खुश रखती है। करीना कपूर ने बिंदास सिखणी की भूमिका में अपनी प्रतिभा का निर्बाध उपयोग किया है। इम्तियाज अली ने कुछ असरकारी एक्सप्रेशन कैद किए हैं बगैर मेकअप के दिए गए शाट्स में भी करीना अच्छी लगती हैं। शाहिद ने करीना का पूरा साथ दिया है। वह नाच-गाने और इमोशनल दृश्यों में स्क्रिप्ट की जरूरतें पूरी करते हैं। फिल्म का गीत-संगीत कहानी के प्रभाव को बढ़ाता है। छोटी भूमिकाओं में दारा सिंह और पवन मल्होत्रा भी याद रह जाते हैं।
इम्तियाज अली ने हिंदी फिल्मों के फार्मूले का नया समीकरण पेश किया है। इस फिल्म में भारतीयता का रसीला टच है, जो इन दिनों हिंदी फिल्मों से गायब होता जा रहा है। भारतवंशियों को लुभाने की कोशिश में हिंदी फिल्मों की कहानी का देसी आधार खत्म होता जा रहा है। जब वी मेट इस ट्रेंड के विपरीत जाती है और देसी स्थानों एवं संदर्भो से भरपूर मनोरंजन करती है।
मुख्य कलाकार : करीना कपूर, शाहिद कपूर, सौम्या टंडन, दारा सिंह, किरन जुनेजा
निर्देशक : इम्तियाज अली
तकनीकी टीम : पटकथा और संवाद- इम्तियाज अली, छायांकन-नटराज सुब्रमण्यन, संगीतकार- प्रीतम और संदेश शांडिल्य

अनुराग कश्यप का पक्ष

(चवन्नी ने अनुराग कश्यप के ब्लॉग का एक अंश तीन दिनों पहले पोस्ट किया तह.तभी वादा किया था कि पूरा पोस्ट जल्दी ही आप पढेंगे.पेश है सम्पूर्ण पोस्ट...आप पढें और अपनी राय ज़रूर दें.एक विमर्श शुरू हो तो और अच्छा... )

कोई वास्तव में होवार्ड रोअर्क नहीं हो सकता ॥ बाकी सब 'उसकी तरह होना' चाहते हैं … आयन रैंड की सफलता इसी तथ्य में है कि उनहोंने एक ऐसे हीरो का सृजन किया, जिसकी तरह हर कोई होना चाहेगा, लेकिन हो नहीं सकेगा … वह खुद जीवन से पलायन कर अपने किसी चरित्र में नहीं ढल सकीं। दुनिया को बदलने की ख्वाहिश अच्छी है, कई बार इसे बदलने की कोशिश भी पर्याप्त है, वास्तव में बदल देना तो चमत्कार है …

हमलोग अपने इंटरव्यू में ढेर सारी बातें करते हैं, उससे ज्यादा हम महसूस करते हैं, लेकिन बता नहीं पाते हैं। अनाइस नीन के शब्‌दों में, हम सभी जो कह सकते हैं, वही कहना लेखक का काम नहीं है, हम जो नहीं कह सकते, लेखक वह कहे …' इस लेख को लिखने की वजह मुझ पर लगातार लग रहे आरोप हैं, जिनमें मैं जूझता रहा हूं … मैं ईमानदारी से सारे सवालों के जवाब देता हूं, उन जवाबों को संपादित कर संदर्भ से अलग कर सनसनी फैलाने के लिए छाप दिया जाता है … ' नो स्मोकिंग ' के बारे में दिया गया इंटरव्यू कुछ और हो जाता है और उसका शीर्षक बनता है ' यशराज हमारी परवाह नहीं करता …'हां, मैं यह कहता हूं, लेकिन जिस संदर्भ या बात के दौरान कहता हूं … वह हमेशा कट जाता है। इस से मुझे जो नुकसान होना होता है, वह तो हो ही जाता है, लेकिन जो बात रखना चाहता हूं…वह बात नहीं आ पाती … इसलिए मैंने सोचा कि मैं बगैर लाग-लपेट के बात करूं … पिछले एक महीने में मेरे और पीएफसी के प्रति लोग बलबला रहे हैं और कई उंगलियां हमारी तरफ उठ रही हैं … कई लोगों को इसमें मजा आ रहा है। एक व्यक्ति ने मुझे नए फिल्मकारों का मसीहा कहा … उन्होंने कहा कि मैं यही होना चाहता हूं … नहीं … अजय जी से बातचीत के दरम्यान उद्घृत करने लायक पंक्ति आ गई … मैं तब से लगातार उसका इस्तेमाल कर रहा हूं … ' यहां जो हो रहा है, वह गदर है, आजादी बाद में आएगी … अगर 1857 का गदर नहीं हुआ होता तो 1947 में आजादी नहीं मिली होती … ' पीएफसी पर जो हो रहा है, वह मेरा किया हुआ नहीं है, मैं पीएफसी नहीं हूं, यह मेरा साइट है, क्योंकि मैं यहां लिखता हूं … यह मेरा खरीदा हुआ साइट नहीं है, मैं मालिक नहीं हूं … मेरी राय पीएफसी की राय नहीं है, पीएफसी मुझ से ज्यादा लोकतांत्रिक है …

हां, मैं बदलाव चाहता हूं … हां, मैं लोगों को साथ लाना चाहता हूं, लेकिन मैं यहां दोस्तों का प्रचार नहीं कर रहा हूं …फिल्मकारों से मेरी दोस्ती उनकी फिल्में देखने के बाद उनकी फिल्मों से प्रेरित होने के कारण हुई … कॉफी विद करण पर केवल पलटवार किया जाता है …वहां वही मेहमान बार-बार आते हैं और एक-दूसरे को खुश करने में लगे रहते हैं। मैं तुम से प्यार करता हूं, तुम्हारे पापा और चाचा और चाची मुझे प्यारे लगते हैं …अगर अभिषेक, ऋतिक रोशन aur शाहरुख खान में से ही बड़े स्टार के बारे में पूछा जाएगा तो क्या जवाब मिलेगा …वहां आमिर का नाम क्यों नहीं लिया जाता …कॉफी विद करण परस्पर हस्तमैथुन का क्लब है …पीएफसी ऐसा नहीं है … यहां हम ' दूसरे की पीठ थपथपाते ' हैं … मुझ पर आरोप है कि मैं अपने दोस्तों की फिल्में प्रचारित करता हूं … मैंने जिन फिल्मों की बातें की थीं … उनमें से पांच रिलीज हो चुकी हैं …भेजा फ्राय, मनोरमा, जॉनी गद्‌दार, दिल दोस्ती एटसेट्रा और लॉयन्स ऑफ पंजाब … इनमें से पहली के अलावा बाकी कोई जोरदार सफलता नहीं हासिल कर सकी …लेकिन वे सभी प्रेरक हैं और बदलाव का संकेत दे रही हैं …उनमें ताजगी है और उन्हें मैं नया हिंदी सिनेमा कहना चाहूंगा …'

ऐसी फिल्में बनाना और उन्हें सिनेमाघरों तक पहुंचाना खामोश एवं सृजनात्मक गदर की तरह है ... मैं उनके बारे में इसलिए लिखता हूं कि वैसी फिल्मों में रुचि रखनेवालों को जानकारी मिल सके ... कुछ लोग ऐसे हैं, जिन्हें वैसी फिल्में कतई पसंद नहीं हैं ... कुछ समीक्षकों की इनमें रुचि रहती है और बाकी समीक्षक या तो पृथक रुचि के हैं या फिर वे हैं ' जिन्होंने बेहतर सिनेमा देखा है और सोचते हैं कि बेहतर हो सकता है ... ' इन आखिरी असंतुष्ट लोगों को हिंदी फिल्मों की आजादी चाहिए ... ये वो लोग हैं, जो कर के बताते हैं कि सही क्या है और ऐसे ही लोग बदलाव लाएंगे ... इसलिए पीएफसी का कोई उद्‌देश्य नहीं है ... हां, वह उद्‌देश्य की पूर्ति करता है ... अगला भव्य स्मारक वर्त्तमान जमीन पर ही बनेगा और अगर जमीन नहीं मिलेगी तो हम जर्जर हो चुकी व्यवस्था को तोड़ देंगे ताकि नयी व्यवस्था कायम हो ... ऐसा वे ही लोग कर सकते हैं, जिन्होंने जिंदगी जी और देखी है ... उन्होंने उम्दा पढ़ाई की है और वे अपने दिल की बात कागज और पर्दे पर रख सकते हैं ... नोबेल पुरस्कार विजेता टोनी मोरीसन को उद्घृत करना चाहूंगा ... ' अगर कोई ऐसी किताब आप पढ़ना चाहते हैं, जो अभी तक नहीं लिखी गयी है तो उसे आप जरूर लिखें।'

इस लेख को लिखने की वजह अपना इरादा बताना है ... कोई एजेंडा नहीं है, लेकिन मैं साधारणता (मीडियोक्रेटी) से थक गया हूं ... इसका मतलब यह नहीं है कि मैं खुद से बेहतर की तुलना में मीडियाकर नहीं हूं ... मैं भी उसी मीडियोक्रेटी में तैर रहा हूं, लेकिन मैं तैरते हुए देख रहा हूं कि बाकी लोग उपला रहे हैं ... वे कहीं जाना नहीं चाहते ... अपने आसपास कुछ खोजना नहीं चाहते ... उस निर्माता को गाली देने का मतलब नहीं है, जो अपनी रसोई के लिए फिल्म बना रहा है, आप मीडियोक्रेटी को चुनौती देकर या गाली देकर बदलाव नहीं ला सकते ... जरूरत है कि आप शहंशाह को चुनौती दें ... उसके चेहरे के आगे आईना रखें ... या तो वह अपना सिंहासन बचाए रखने के लिए बदले या फिर सिंहासन खाली करे ... मैं ऐसा नहीं कर सकता, कोई दूसरा व्यक्ति नहीं कर सकता ... बहुसंख्यक के आह्‌वान के बाद ही ऐसा हो सकता है ... अगर यह 'बहुसंख्यक ' पीएफसी पर है तो हमें वह ताकत देता है कि हम अपना छोटा देश बनाएं ... जो ज्यादा लोकतांत्रिक होगा ... वैसे साइट से बेहतर होगा जो मेरे एवं दूसरों के इंटरव्यू एडिट कर देते हैं ...

मैं होवार्ड रोअर्क नहीं हूं और कभी हो भी नहीं सकता ... हाल ही में मुझ पर आरोप लगा कि मैं होना चाहता हूं ... वह होने के लिए मुझे पहले अपने परिवार को मारना होगा ... होवर्ड रोअर्क वैसा इसलिए हो सका कि वह शुरू से किसी भावनात्मक बंधन में नहीं था ... हमें नहीं मालूम कि वह किस के गर्भ से आया था ... इसलिए उस पर केवल शारीरिक आक्रमण ही हो सकता था ... उसे उनकी आंखों में नहीं देखना था ... मेरी एक बेटी है और वह मुझे कमजोर बना देती है, सफलता की आकांक्षा मुझे कमजोर बनाती है, सुविधाओं की चाहत मुझे कमजोर बनाती है ... मैं कमजोर हूं, इसीलिए ऐसा हूं ... मैं बस आततायी हूं ... और यह मेरी हताश चीख है ... यह चीख बदलाव के लिए है, पहली बार अपने अस्तित्व के लिए थी, सिर्फ अपने अस्तित्व के लिए और कुछ नहीं ... मेरी पहली चीख जिंदा रहने की थी, जो बहरे कानों में पड़ी ... किसी ने नहीं सुना तो मैंने और जोर, फिर और ज्यादा जोर से चीख मारी ... मेरी चीखों ने उन्हें परेशान कर दिया ... परेशान होकर उन्होंने प्रतिक्रिया की, लेकिन वह मेरे लिए कल्पनातीत था ... वे मुझ से घबरा गए, उन्हें मैं संभावित दुश्मन लगा, इसलिए उन्होंने मुझे बर्बाद करने की कोशिश की ... इसलिए मैं अपने एटीट्‌यूड में आक्रामक हो गया और यह आक्रामकता सिर्फ अपने अस्तित्व के लिए थी ... फिर मुझे थोड़े से अपने लोग मिले ... मैं टिका रह सका ... अस्तित्व बनाए रखने में कोई बुराई नहीं है ... मैंने अपने अस्तित्व के लिए पाला नहीं बदला ... हां, वो मुझ से समय-समय पर खेलते हैं, लेकिन मैंने पाला नहीं बदला ... बहुतों के लिए यह उनकी और हमारी लड़ाई नहीं है ... मेरे लिए यह हो गई, क्योंकि मैं जूझा ... कैसे ... मैं बताता हूं।

यशराज के लोगों ने मुझ पर बांबे टाइम्स की सुर्खी ' अनुराग ने झूम बराबर झूम से खुद को अलग किया ' पढ़ का आरोप लगाया, उन्होंने कहा कि पहले वह हमें गाली देता है और फिर झूम बराबर झूम के पैसे मांगता है और फिर खुद को अलग कर लेता है, यह कैसा पाखंड है। 'मैं पैसे मांगता हूं, क्योंकि मैंने बहुत काम किया है और खुद को अलग इसलिए करता हूं कि उन्होंने बच्चे की शक्ल ही बदल दी और उन्होंने मुझ से बगैर पूछे सब कुछ बदल दिया, इसलिए खुद को अलग कर लेता हूं। अगर मैं उस फैसले में सहभागी नहीं था तो वह मेरा कैसे हो सकता है ... मैं पैसे लूंगा, क्योंकि मैं आपका नौकर था (लेखक के तौर पर मुझे यही इज्जत मिली थी) ... अगर वे कहते कि मुझे तुम्हारी स्क्रिप्ट अच्छी नहीं लगी तो मैं खरीद लेता ... लेकिन उन्होंने किया और मेरे पास नए तरीके से लिखा ड्राफ्ट भी भेज दिया ... (उसी से मुझे पता चला और मैंने तभी पुणे के स्क्रीन राइटर कांफ्रेंस में जिक्र किया) ... वे नए ड्राफ्ट में मेरी मदद चाहते थे ... वे चाहते थे कि मैं उनका काम कर दूं, क्योंकि वे यशराज हैं और मैं कुछ भी नहीं हूं ... उनसे मेरी यही शिकायत है और जब मैंने एसएमएस किया तो उन्होंने बात करने के लिए जयदीप को भेजा ... जयदीप की मैं इज्जत करता हूं, इसलिए मैं कमजोर पड़ गया ... फिल्मों में आने के पहले से शाद मेरा दोस्त है, इसलिए मैं भावुक हो गया ... इसलिए कुछ न कर सका और उबलता रहा।

जब मेरी फिल्म रोम के लिए चुनी गयी तो वहां किसी ने सेलेक्शन समिति को समझाने की कोशिश की कि मेरी फिल्म लेने का कोई तुक नहीं है, क्योंकि मेरी कोई औकात नहीं है ... लागा चुनरी में दाग लेनी चाहिए v क्योंकि वे खास हैं ... मैं केवल अपने प्रारब्‌ध को धन्यवाद दूंगा कि उन्होंने उनकी नहीं सुनी ... टोरंटो में उन्होंने सुन ली थी और ओमकारा की जगह कभी अलविदा ना कहना को चुन लिया था ... ओमकारा को अंतिम क्षणों में रद्‌द किया गया था - वे ठीक से नहीं खेलते, वे 'पावर गेम ' खेलते हैं ... मैं कहता हूं। यह भी सही है।

मैं पहली बार यह सब बता रहा हूं, क्योंकि मैं यशराज का निंदक कहलाते-कहलाते थक गया हूं ... लोग जब कहते हैं कि हम पलटवार करते हैं तो मुझे बुरा लगता है ... यहां हर पोस्ट लेखक की मर्जी से आता है ... अगर कोई ‘लागा चुनरी में दाग‘ का अच्छा रिव्यू नहीं लिखता तो क्या करें ... लेकिन उन्होंने ‘चक दे‘ की तारीफ की ... इसलिए यहां सिनेमा की भूख और चाहत बनी रहती है ... मेरा सनकीपन मेरा अपना है और अगर कोई नहीं चाहता तो न पढ़े ...

Thursday, October 25, 2007

शुक्रवार ,२६ अक्टूबर ,२००७

अक्टूबर महीने का आखिरी शुक्रवार है.तीन फिल्में रिलीज हो रही हैं.सबसे पहले उन फिल्मों की बाट कर लें।

विक्रम भट्ट अब फिल्में पेश करने लगे हैं.लगातार १० फ्लॉप फिल्में बनाने के बाद उनका यह फैसला दर्शकों के लिए कितना खुशगवार होगा...यह टू वक्त ही बताएगा.इस हफ्ते उनकी पहली पेशगी 'मुम्बई सालसा' आ रही है.इसे मनोज त्यागी ने दिरेक्ट किया है.अगर आप मेट्रो शहरों में नही रहते तो अपने जोखिम पर ही इस फिल्म को देखने जाएं.सेक्स,रोमांस और रिश्तों की ऐसी उलझन समझना छोटे शहरों के दर्शकों की कल्पने से परे है।

इम्तियाज़ अली की 'जब वी मेट 'रोमांटिक कॉमेडी है.चवन्नी गारंटी लेता है की इस फिल्म पर खर्च किया आप का एक भी पैसा फिजूल नही जायेगा.हंसने,खुश होने और राहत महसूस करेंगे आप यह फिल्म देख कर.दीवाली के पहले की छुट्टी या रविवार को पूरे परिवार के साथ भी आप यह फिल्म देख सकते हैं.इस फिल्म की खूबियों के बारे में आप बताएं.चवन्नी की राय में शहीद कपूर और करीना कपूर की जोड़ी को इतने रोमांटिक अंदाज़ में पहले नही देखा.इम्तियाज़ अली की पीठ थपथपाप्यें और छोटे शहरों से आये निर्देशकों को बढावा दें तो और भी ऐसी फिल्में देखने के मौके मिलेंगे।

आखिर में अनुराग कश्यप की फिल्म 'नो स्मोकिंग' की बाट करें.यह फिल्म आप का अतिरिक्त ध्यान मांगती है.इसे जॉन अब्राहम की फिल्म समझ कर देखने की गलती न कर बैठें.यह पूरी तरह से अनुराग कश्यप की फिल्म है और एक नयी कहन शैली के साथ आज के समाज की विद्रूपताओं को सामने लाती है.अनुराग ने क्या सोच कर यह फिल्म बनायीं है...यह तो वे देर-सबेर बताएँगे ही,लेकिन आप इसे ज़रूर देखें और अपनी राय चवन्नी को बताएं।

इस हफ्ते की फिल्मी तमाशेबाजी में सलमान खान मीडिया के सामने आये और अपने जवाबों से सभी का मनोरंजन किया.संजय दत्त फिर से जेल चले गए हैं.शाहरुख़ खान अपनी देहयष्टि दिखा कर दर्शकों को सिनेमाघरों में खींचने की कोशिश में लगे हैं.

Wednesday, October 24, 2007

नया हिंदी सिनेमा -अनुराग कश्यप

(अनुराग कश्यप ने अपने ब्लोग पर नये पोस्ट में नया हिन्दी सिनेमा को लेकर अपना पक्ष रखा है.चवन्नी आज उसका एक अंश प्रस्तुत कर रहा है.पूरा आलेख एक-दो दिनों में आपके सामने होगा)

कोई वास्तव में होवार्ड रोअर्क नहीं हो सकता .. बाकी सब 'उसकी तरह होना' चाहते हैं … आयन रैंड की सफलता इसी तथ्य में है कि उनहोंने एक ऐसे हीरो का सृजन किया, जिसकी तरह हर कोई होना चाहेगा, लेकिन हो नहीं सकेगा … वह खुद जीवन से पलायन कर अपने किसी चरित्र में नहीं ढल सकीं। दुनिया को बदलने की ख्वाहिश अच्छी है, कई बार इसे बदलने की कोशिश भी पर्याप्त है, वास्तव में बदल देना तो चमत्कार है …

हमलोग अपने इंटरव्यू में ढेर सारी बातें करते हैं, उससे ज्यादा हम महसूस करते हैं, लेकिन बता नहीं पाते हैं। अनाइस नीन के शब्‌दों में, हम सभी जो कह सकते हैं, वही कहना लेखक का काम नहीं है, हम जो नहीं कह सकते, लेखक वह कहे …' इस लेख को लिखने की वजह मुझ पर लगातार लग रहे आरोप हैं, जिनमें मैं जूझता रहा हूं … मैं ईमानदारी से सारे सवालों के जवाब देता हूं, उन जवाबों को संपादित कर संदर्भ से अलग कर सनसनी फैलाने के लिए छाप दिया जाता है … ' नो स्मोकिंग ' के बारे में दिया गया इंटरव्यू कुछ और हो जाता है और उसका शीर्षक बनता है ' यशराज हमारी परवाह नहीं करता …'हां, मैं यह कहता हूं, लेकिन जिस संदर्भ या बात के दौरान कहता हूं … वह हमेशा कट जाता है। इस से मुझे जो नुकसान होना होता है, वह तो हो ही जाता है, लेकिन जो बात रखना चाहता हूं…वह बात नहीं आ पाती … इसलिए मैंने सोचा कि मैं बगैर लाग-लपेट के बात करूं … पिछले एक महीने में मेरे और पीएफसी के प्रति लोग बलबला रहे हैं और कई उंगलियां हमारी तरफ उठ रही हैं … कई लोगों को इसमें मजा आ रहा है। एक व्यक्ति ने मुझे नए फिल्मकारों का मसीहा कहा … उन्होंने कहा कि मैं यही होना चाहता हूं … नहीं … अजय जी से बातचीत के दरम्यान उद्घृत करने लायक पंक्ति आ गई … मैं तब से लगातार उसका इस्तेमाल कर रहा हूं … ' यहां जो हो रहा है, वह गदर है, आजादी बाद में आएगी … अगर 1857 का गदर नहीं हुआ होता तो 1947 में आजादी नहीं मिली होती … ' पीएफसी पर जो हो रहा है, वह मेरा किया हुआ नहीं है, मैं पीएफसी नहीं हूं, यह मेरा साइट है, क्योंकि मैं यहां लिखता हूं … यह मेरा खरीदा हुआ साइट नहीं है, मैं मालिक नहीं हूं … मेरी राय पीएफसी की राय नहीं है, पीएफसी मुझ से ज्यादा लोकतांत्रिक है …

हां, मैं बदलाव चाहता हूं … हां, मैं लोगों को साथ लाना चाहता हूं, लेकिन मैं यहां दोस्तों का प्रचार नहीं कर रहा हूं …फिल्मकारों से मेरी दोस्ती उनकी फिल्में देखने के बाद उनकी फिल्मों से प्रेरित होने के कारण हुई … कॉफी विद करण पर केवल पलटवार किया जाता है …वहां वही मेहमान बार-बार आते हैं और एक-दूसरे को खुश करने में लगे रहते हैं। मैं तुम से प्यार करता हूं, तुम्हारे पापा और चाचा और चाची मुझे प्यारे लगते हैं …अगर अभिषेक, ऋतिक रोशन aur शाहरुख खान में से ही बड़े स्टार के बारे में पूछा जाएगा तो क्या जवाब मिलेगा …वहां आमिर का नाम क्यों नहीं लिया जाता …कॉफी विद करण परस्पर हस्तमैथुन का क्लब है …पीएफसी ऐसा नहीं है … यहां हम ' दूसरे की पीठ थपथपाते ' हैं … मुझ पर आरोप है कि मैं अपने दोस्तों की फिल्में प्रचारित करता हूं … मैंने जिन फिल्मों की बातें की थीं … उनमें से पांच रिलीज हो चुकी हैं …भेजा फ्राय, मनोरमा, जॉनी गद्‌दार, दिल दोस्ती एटसेट्रा और लॉयन्स ऑफ पंजाब … इनमें से पहली के अलावा बाकी कोई जोरदार सफलता नहीं हासिल कर सकी …लेकिन वे सभी प्रेरक हैं और बदलाव का संकेत दे रही हैं …उनमें ताजगी है और उन्हें मैं नया हिंदी सिनेमा कहना चाहूंगा …'

Monday, October 22, 2007

गुड्डी में जया की जगह डिंपल आ जातीं तो....

चवन्नी इन दिनों सैबल चटर्जी की गुलज़ार पर लिखी किताब द लाइफ एंड सिनेमा ऑफ़ गुलज़ार पढ़ रहा है.इस किताब में एक रोचक प्रसंग है.आदतन चवन्नी आप को बता रहा है।

आनंद के बाद हृषिकेश मुखर्जी और गुलज़ार गुड्डी पर काम कर रहे थे।इस फिल्म के लिए नयी अभिनेत्री की ज़रूरत थी। हालांकि यह ज़रूरत आखिरकार जया भादुड़ी ने पूरी की,लेकिन उसके पहले किसी और के नाम का सुझाव आया था.गुलज़ार तब एच एस रवैल के यहाँ आया-जाया करते थे। उनकी पत्नी अंजना भाभी से उनकी छनती थी.गुलज़ार ने वहाँ एक लड़की को आते-जाते देखा था.एक दिन अंजना भाभी ने गुलज़ार को बताया कि वह रजनी भाई की बेटी है और फिल्मों में काम करना चाहती है। उसका नाम डिंपल कापडिया है।
गुलज़ार ने हृषिकेश मुखर्जी को डिंपल के बारे में बताया,लेकिन हृषिकेश मुखर्जी के दिमाग में पहले से जया भादुड़ी थीं। हृषिकेश मुखर्जी ने पूना के फिल्म संस्थान में एक फिल्म देखी थी.उस फिल्म कि लड़की उन्हें अपनी फिल्म गुड्डी के लिए उपयुक्त लगी थी.उनहोंने गुलज़ार को सलाह दी कि जाकर पूना में उस से मिल आओ।

गुलज़ार और हृषिकेश मुखर्जी के छोटे भाई हृषिकेश मुखर्जी से लगातार पूछते रहे कि कब पूना चलना है। डैड अपनी व्यस्तता के कारण टालमटोल करते रहे। आखिरकार एक दिन दादा को जबरदस्ती पूना ले जाया गया.वहाँ तीनों ने डिप्लोमा फिल्म देखी और जया को गुड्डी फिल्म का प्रस्ताव दिया। बाद में हृषिकेश मुखर्जी और गुलज़ार दोनों ने जया भादुड़ी के साथ कई यादगार फिल्में बनाईं।
अगर गुड्डी में डिंपल आ गयी होतीं तो बॉबी कैसे बनी होती.हिन्दी फिल्मों के दर्शक जया भादुड़ी से वंचित रह जाते और बॉबी भी डिंपल के साथ नही देख पाते.

Sunday, October 21, 2007

आमिर की ईमानदारी

चवन्नी को आमिर खान पसंद हैं.अपनी बातों और प्रतिक्रियाओं से वे इस में इजाफा करते हैं.पिछले दिनों उनके भाई फै