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Tuesday, October 30, 2007

'नो स्मोकिंग' का के काफ्का नहीं कश्यप है ... अनुराग कश्यप

हिंदी फिल्मों के अंग्रेजी समीक्षकों पर चवन्नी की हैरानी बढ़ती ही जा रही है. एक अंग्रजी समीक्षक ने तो 'नो स्मोकिंग' के बजाए अनुराग कश्यप की ही समीक्षा कर दी. वे अनुराग से आतंकित हैं. उनके रिव्यू में यह बात साफ झलकती है. क्यों आतंकित हैं? क्योंकि अनुराग उन्हें सीधी चुनौती देते हैं कि आप खराब लिखते हो और हर लेखन के पीछे निहित मंशा फिल्म नहीं ... कुछ और रहती है.

'नो स्मोकिंग' को लेकर बहुत कुछ लिखा और कहा जा रहा है. अनुराग कश्यप की यह फिल्म कुछ लोगों की समझ में नहीं आई, इसलिए निष्कर्ष निकाल लिया गया कि फिल्म बुरी है. इस लॉजिक से तो हमें जो समझ में न आए, वो सारी चीजें बुरी हो गई. समझदारी का रिश्ता उपयोगिता से जोड़कर ऐसे निष्कर्ष निकाले जाते हैं. आज की पीढ़ी संस्कृत नहीं समझती तो फिर संस्कृत में लिखा सब कुछ बुरा हो गया. और संस्कृत की बात क्या करें ... आज तो हिंदी में लिखा भी लोग नहीं पढ़ पाते, समझ पाते ... तो फिर मान लें कि हम सभी हिंदी में लिखने वाले किसी दुष्कर्म में संलग्न हैं.

कला और अभिव्यक्ति के क्षेत्र में वह तुरंत पॉपुलर और स्वीकृत होता है, जो प्रचलित रूप और फॉर्म अपनाता है. जैसा सब लिखते और सृजित करते हैं, वैसा ही आप भी लिखो और सृजित करो तो तुरंत स्वीकृति मिलती है. किसी ने भी धारा के विपरीत तैरने की कोशिश की तो उसे अनाड़ी घोषित कर दिया जाता है. अनुराग कश्यप अनाड़ी साबित किए जा रहे हैं.

'नो स्मोकिंग' का के काफ्का नहीं, खुद कश्यप हैं ... अनुराग कश्यप.अगर आप के के ऊपर बढ़ रहे दबाव और उसमें आए बदलाव की प्रक्रिया पर गौर करें तो पाएंगे कि बाबा बंगाली, उसकी बीवी और उसके दोस्त सभी उसे उस व्यवहार को अपनाने के लिए कहते हैं, जिस पर चलना नैतिक रूप से सही माना जाता है. नैतिकता के वर्चस्व को स्थापित करने के पीछे निजता समाप्त करने की इच्छा है. आखिर इस समाज में कैसे के मनमर्जी से जी सकता है? आरंभ में अहंकारी दिख रहा के फिल्म के अंत में उसी सिस्टम का हिस्सा बन जाता है. आज की यही नियति है. सारे विद्रोही एक-एक कर सिस्टम का लाभ उठाने के लिए आत्मा से विमुख होकर शारीरिक उपभोग में लीन हो गए हैं. के का भी यही हश्र होता है.

के की लड़ाई और उसकी हार में हम कश्यप को देख सकते हैं. पिछले पंद्रह सालों में कश्यप ने धारा के विपरीत तैरने की कोशिश की है, लेकिन उस पर लगातार दबाव है कि वह भी दूसरों की तरह सोचना और फिल्में बनाना शुरू कर दे. 21वीं सदी में व्यक्तिगत आजादी पर एकरूपता का यह हमला वास्तव में किसी और समय से ज्यादा महीन और आक्रामक है. हम समझ नहीं पाते और अपनी विशिष्टता खोते चले जाते हैं. हमारी सफलता इसी एकरूपता पर निर्भर करती है.

वर्त्तमान परिप्रेक्ष्य में इस विसंगति और विडंबना को समझते हुए 'नो स्मोकिंग' की अन्योक्ति को पढ़ने का प्रयास करें तो फिल्म बच्चों की कविता की तरह सरल हो जाएगी. अगर हम शब्द, भाव और अभिव्यक्ति से परिचित नहीं हों तो हर कविता, कहानी और फिल्म दुरूह और अपरिचित हो जाएगी. अनुराग कश्यप पर ऐसी ही दुरूहता का आरोप है.

चवन्नी मानता है कि 'नो स्मोकिंग' को फिर से देखने की जरूरत है. बिंबों और प्रतीकों की ऐसी प्रगतिशील सिनेमाई भाषा हिंदी फिल्मों में विरल है .

Monday, October 29, 2007

रतलाम की गलियां

चवन्नी तो रवि रतलामी की वजह से रतलाम को जानता था.उसने अभी जब वी मेट फिल्म देखी.इसमें शाहिद कपूर के पीछे उतरी करीना की ट्रेन छोट जाती है तो वह शहीद पर ट्रेन पकड़वाने का दवाब डालती है.दोनों टैक्सी से रतलाम स्टेशन पहुँचते हैं.सामने प्लेटफॉर्म पर ट्रेन खड़ी है ,लेकिन करीना पानी के बोतल की ज्यादा कीमत के लिए उलझ जाती है और कंज्यूमर कोर्ट में जाने तक की बात करती है.इस बहस में उसकी ट्रेन फिर से छोट जाती है.फिर रतलाम रात की बाँहों में दिखाई पड़ता है.कुछ मनचले दिखते हैं.ऐसे मनचले हर शहर में प्लेटफॉर्म और बस स्टैंड पर मिल जायेंगे.चवन्नी को याद है कि कॉलेज के दिनों में उसके कुछ दोस्तों की शामें स्टेशन पर ही गुजरती थीं.उन्हें ट्रेन के आने-जाने का पूरा आईडिया रहता था.यहाँ तक तो सब सही लगता है।
करीना प्लेटफॉर्म से बाहर आती है तो स्टेशन के बाहर उन औरतों के बीच अनजाने में खड़ी हो जाती है ,जो रात के ग्राहकों के इंतज़ार में हैं.तभी एक युवक मोटर साइकिल पर आता है और करीना से सौदा करता है.करीना उसे समझती है कि वह उस टाइप की नही है.वह युवक पीछे ही पड़ जाता है तो भागती है.संयोग से उसे फिर से शाहिद कपूर दिखता है.वह उस से जाकर चिपक जाती है.उसकी जान बचती है और जिस्म भी.अब दोनों रात भर के लिए एह होटल में जाते हैं.डिसेंट होटल में घंटों के हिसाब से कमरे मिलते हैं.रात में होटल पर छपा पड़ता है और पता चलता है कि हर कमरे में लड़कियां अपने ग्राहकों के साथ थीं।
इम्तियाज़ अली की इस खूबसूरत फिल्म में रतलाम की गलियों की खूब तारीफ होती है.ऐसा लगता है कि कोई शायर दिल्ली की गलियों के तर्ज पर रतलाम की गलियों की तारीफ कर रहा हो।शायद पहली बार किसी फिल्म रतलाम शहर का ऐसा जिक्र हुआ है।
चवन्नी को एक बात खटकी कि क्या रतलाम की रात दिखने के लिए धन्धेवाली औरतों को ही दिखाना ज़रूरी था.रवि रतलामी बता सकते हैं कि रतलाम स्टेशन के आसपास और डिसेंट होटल का क्या माहौल है?चवन्नी को तो रतलाम की रात का यह चित्रण नही जमा.

चांद और हिन्दी सिनेमा

चवन्नी ने हाल में ही सबसे बड़ा चांद देखा.हिन्दी फिल्मों में शुरू से चांद दिखता रहा है.फिल्मी गीतों चांद का प्रयोग बहुतायत से होता रहा है।गुलजार की हर फिल्म चांद के गीत से ही पूरी होती है.चवन्नी को कुछ गीत याद आ रहे हैं.कुछ आप याद दिलाएं.

-चंदा ओ चंदा...
-चंदा है तू मेरा सूरज है तू
-चांद आहें भरेगा...
-चांद को क्या मालूम...
Show keyboardमाफ करें आज कीबोर्ड नाराज दिख रहा है।मैं अपनी सूची नहीं दे पा रहा हूं.

क्या आप सभी एक -एक गीत टिप्पणियों में देंगे?

Sunday, October 28, 2007

अभिमान निषेध

हाल ही में गोवा की एक गैर सरकारी संस्था ने शाहरुख़ खान को नोटिस भेजी है.शाहरुख़ खान को १५ दिनों के अन्दर सफ़ाई भेजनी है की वे सार्वजनिक जगहों पर क्यों धूम्रपान करते हैं.सही सवाल उठाया गया है की उनके इस उच्छृंखल व्यवहार का किशोरों पर बुरा असर पड़ता है।

फिल्म
अभिनेताओं और अभिनेत्रियों पर किसी भी प्रकार का निषेध लगाने से पहले ज़रूरी है कि उन पर अभिमान निषेध लगाया जाये.चवन्नी को इन स्टारों से मिलने के कई मौके मिले हैं और आगे भी मिलेंगे.बातचीत के दरम्यान थोडा बेतक़ल्लुफ़ होने पर इनका अभिमान जाग पड़ता है. अहम् सिर उठता है.लगभग सारे ही सितारे आत्मरति,आत्ममोह,आत्ममुग्धता और अंहकार के शिकार हैं.शाहरुख़ खान की बातचीत देखें और सुनें तो जाम की तरह छलकते उनके अहम् से आप गीले तक हो सकते हैं.सिर्फ शाहरुख़ ही क्यों ...हर स्टार केवल अपनी ही बात करता नज़र आता है।

अभिमान होना या स्वाभिमानी होना गलत नही है,लेकिन अभिमान हद से बढे तो अंहकार बनता है और अहंकारी व्यक्ति अनजाने में अपना ही नुकसान करता रहता है.फिल्म जगत के लोगों को अपने अंहकार में नष्ट होते चवन्नी ने देखा,पढा और सुना है.चवन्नी की सिफारिश है कि sabhi के अंहकार पर pabandi laga

Saturday, October 27, 2007

दर्शनीय व विमर्श योग्य है नो स्मोकिंग

-अजय ब्रह्मात्मज



अनुराग कश्यप की इस फिल्म को कृपया जॉन अब्राहम की फिल्म समझ कर देखने न जाएं। हिंदी में स्टार केंद्रित फिल्में बनती हैं, जिनमें निर्देशक का हस्ताक्षर पहचान में ही नहीं आता। अनुराग कश्यप युवा निर्देशकों में एक ऐसे निर्देशक हैं, जिनकी फिल्में अभी तक स्टारों पर निर्भर नहीं करतीं। ऊपरी तौर पर यह के (जान अब्राहम) की कहानी है। उसे सिगरेट पीने की बुरी लत है। चूंकि वह बेहद अमीर है, इसलिए उसे लगता है कि उसकी लतों और आदतों को बदलने की सलाह भी उसे कोई नहीं दे सकता। एक स्थिति आती है, जब उसकी बीवी उसे आखिरी चेतावनी देती है कि अगर उसने सिगरेट नहीं छोड़ी तो वह उसे छोड़ देगी। वह घर से निकल भी जाती है। के अपनी बीवी से बेइंतहा प्यार करता है। बीवी को वापस लाने के लिए वह सिगरेट छोड़ने की कोशिश में बाबा बंगाली से मिलता है। यहां से उसकी जिंदगी और लत को बाबा बंगाली नियंत्रित करते हैं। इसके बाद एक ऐसा रूपक बनता है, जिसमें हम इस संसार में रिश्तों की विदू्रपताओं को देखते हैं। स्वार्थ के वशीभूत दोस्त भी कितने क्रूर और खतरनाक हो सकते हैं। फिल्म के अंत में हम देखते हैं कि के भी उसी विद्रूपता का शिकार होता है।
यह फिल्म एक स्तर पर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह के लिए जूझ रहे अनुराग कश्यप की आत्मकथात्मक अभिव्यक्ति भी बन जाती है। अनुराग कश्यप ने हिंदी फिल्मों के घिसे-पिटे फार्मूले का इस्तेमाल नहीं किया है। उनकी फिल्म रूपकात्मक और बिंबात्मक है। संभव है एकरेखीय या सपाट कहानी देखने के आदी दर्शक इसकी व्यंजना समझने में मुश्किल महसूस करें। जान अब्राहम ने स्टारडम की परवाह नहीं करते हुए एक निराश और हताश युवक की भूमिका निभायी है, जो धीरे-धीरे परिस्थिति का शिकार होता है। नो स्मोकिंग का नायक जीतता या हारता नहीं, वह घोर संभ्रम की स्थिति में सिस्टम का पुर्जा बन जाता है। उसे जिन बातों पर गुस्सा आता था, वह वैसी ही बातें करने लगता है। सभ्य समाज की इस विडंबना और एकरूपता के दबाव को नो स्मोकिंग प्रतीकों से सामने ले आती है। अनुराग कश्यप का साहसिक प्रयोग दर्शनीय और विमर्श के योग्य है। जब वी मेट के निर्देशक इम्तियाज अली इसे आगे की फिल्म मानते हैं।

मुख्य कलाकार : जॉन अब्राहम, आयशा टाकिया, रणवीर शौरी, परेश रावल, जेस्सी रंधावा
निर्देशक : अनुराग कश्यप
तकनीकी टीम : निर्माता- विशाल भारद्वाज एवं कुमार मंगत, छायांकन- कुमार रवि, पटकथा- अनुराग कश्यप, संगीतकार- विशाल भारद्वाज, गीतकार- गुलजार

जब वी मेट: भारतीयता का रसीला टच

-अजय ब्रह्मात्मज


इम्तियाज अली की जब वी मेट शुद्ध मनोरंजक रोमांटिक कामेडी है। फिल्म पहले ही दृश्य से बांधती है। मुंबई से भटिंडा तक के सफर में यह फिल्म आपको हंसाती, गुदगुदाती और रिझाती हुई ले जाती है। शाहिद कपूर और करीना कपूर की रोमांटिक जोड़ी फिल्म का सबसे मजबूत और प्रभावशाली आधार है।
आदित्य (शाहिद) अपने कंधों पर अचानक आ गई जिम्मेदारी से घबराकर यूं ही निकल जाता है। उसका यह निष्क्रमण गौतम बुद्ध की तरह नहीं है। वस्तुत: वह अपनी जिम्मेदारियों से पलायन करता है। ट्रेन में उसकी मुलाकात गीत (करीना कपूर) से होती है। बक-बक करने में माहिर गीत के दिल से खुशी लगातार छलक-छलक पड़ती है। जिंदगी को अपने ढंग से जीने पर आमादा गीत अपनी मुश्किलों में आदित्य को ऐसा फंसाती है कि उसे भटिंडा तक जाना पड़ता है।
जब वी मेट एक स्तर पर दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे का भारतीय और अल्प बजट संस्करण है। मुंबई से मध्यप्रदेश, फिर राजस्थान और पंजाब होते हुए हिमाचल तक की यात्रा में हम विभिन्न प्रसंगों में ऐसे दृश्य देखते हैं, जो मुंबई फिल्म इंडस्ट्री के फिल्मकारों के अनुभव और कल्पना के परे हैं। इम्तियाज अली के सटीक संवाद और दृश्य संयोजन से फिल्म दर्शकों को खुश रखती है। करीना कपूर ने बिंदास सिखणी की भूमिका में अपनी प्रतिभा का निर्बाध उपयोग किया है। इम्तियाज अली ने कुछ असरकारी एक्सप्रेशन कैद किए हैं बगैर मेकअप के दिए गए शाट्स में भी करीना अच्छी लगती हैं। शाहिद ने करीना का पूरा साथ दिया है। वह नाच-गाने और इमोशनल दृश्यों में स्क्रिप्ट की जरूरतें पूरी करते हैं। फिल्म का गीत-संगीत कहानी के प्रभाव को बढ़ाता है। छोटी भूमिकाओं में दारा सिंह और पवन मल्होत्रा भी याद रह जाते हैं।
इम्तियाज अली ने हिंदी फिल्मों के फार्मूले का नया समीकरण पेश किया है। इस फिल्म में भारतीयता का रसीला टच है, जो इन दिनों हिंदी फिल्मों से गायब होता जा रहा है। भारतवंशियों को लुभाने की कोशिश में हिंदी फिल्मों की कहानी का देसी आधार खत्म होता जा रहा है। जब वी मेट इस ट्रेंड के विपरीत जाती है और देसी स्थानों एवं संदर्भो से भरपूर मनोरंजन करती है।
मुख्य कलाकार : करीना कपूर, शाहिद कपूर, सौम्या टंडन, दारा सिंह, किरन जुनेजा
निर्देशक : इम्तियाज अली
तकनीकी टीम : पटकथा और संवाद- इम्तियाज अली, छायांकन-नटराज सुब्रमण्यन, संगीतकार- प्रीतम और संदेश शांडिल्य

Friday, October 26, 2007

अनुराग कश्यप का पक्ष

(चवन्नी ने अनुराग कश्यप के ब्लॉग का एक अंश तीन दिनों पहले पोस्ट किया तह.तभी वादा किया था कि पूरा पोस्ट जल्दी ही आप पढेंगे.पेश है सम्पूर्ण पोस्ट...आप पढें और अपनी राय ज़रूर दें.एक विमर्श शुरू हो तो और अच्छा... )

कोई वास्तव में होवार्ड रोअर्क नहीं हो सकता ॥ बाकी सब 'उसकी तरह होना' चाहते हैं … आयन रैंड की सफलता इसी तथ्य में है कि उनहोंने एक ऐसे हीरो का सृजन किया, जिसकी तरह हर कोई होना चाहेगा, लेकिन हो नहीं सकेगा … वह खुद जीवन से पलायन कर अपने किसी चरित्र में नहीं ढल सकीं। दुनिया को बदलने की ख्वाहिश अच्छी है, कई बार इसे बदलने की कोशिश भी पर्याप्त है, वास्तव में बदल देना तो चमत्कार है …

हमलोग अपने इंटरव्यू में ढेर सारी बातें करते हैं, उससे ज्यादा हम महसूस करते हैं, लेकिन बता नहीं पाते हैं। अनाइस नीन के शब्‌दों में, हम सभी जो कह सकते हैं, वही कहना लेखक का काम नहीं है, हम जो नहीं कह सकते, लेखक वह कहे …' इस लेख को लिखने की वजह मुझ पर लगातार लग रहे आरोप हैं, जिनमें मैं जूझता रहा हूं … मैं ईमानदारी से सारे सवालों के जवाब देता हूं, उन जवाबों को संपादित कर संदर्भ से अलग कर सनसनी फैलाने के लिए छाप दिया जाता है … ' नो स्मोकिंग ' के बारे में दिया गया इंटरव्यू कुछ और हो जाता है और उसका शीर्षक बनता है ' यशराज हमारी परवाह नहीं करता …'हां, मैं यह कहता हूं, लेकिन जिस संदर्भ या बात के दौरान कहता हूं … वह हमेशा कट जाता है। इस से मुझे जो नुकसान होना होता है, वह तो हो ही जाता है, लेकिन जो बात रखना चाहता हूं…वह बात नहीं आ पाती … इसलिए मैंने सोचा कि मैं बगैर लाग-लपेट के बात करूं … पिछले एक महीने में मेरे और पीएफसी के प्रति लोग बलबला रहे हैं और कई उंगलियां हमारी तरफ उठ रही हैं … कई लोगों को इसमें मजा आ रहा है। एक व्यक्ति ने मुझे नए फिल्मकारों का मसीहा कहा … उन्होंने कहा कि मैं यही होना चाहता हूं … नहीं … अजय जी से बातचीत के दरम्यान उद्घृत करने लायक पंक्ति आ गई … मैं तब से लगातार उसका इस्तेमाल कर रहा हूं … ' यहां जो हो रहा है, वह गदर है, आजादी बाद में आएगी … अगर 1857 का गदर नहीं हुआ होता तो 1947 में आजादी नहीं मिली होती … ' पीएफसी पर जो हो रहा है, वह मेरा किया हुआ नहीं है, मैं पीएफसी नहीं हूं, यह मेरा साइट है, क्योंकि मैं यहां लिखता हूं … यह मेरा खरीदा हुआ साइट नहीं है, मैं मालिक नहीं हूं … मेरी राय पीएफसी की राय नहीं है, पीएफसी मुझ से ज्यादा लोकतांत्रिक है …

हां, मैं बदलाव चाहता हूं … हां, मैं लोगों को साथ लाना चाहता हूं, लेकिन मैं यहां दोस्तों का प्रचार नहीं कर रहा हूं …फिल्मकारों से मेरी दोस्ती उनकी फिल्में देखने के बाद उनकी फिल्मों से प्रेरित होने के कारण हुई … कॉफी विद करण पर केवल पलटवार किया जाता है …वहां वही मेहमान बार-बार आते हैं और एक-दूसरे को खुश करने में लगे रहते हैं। मैं तुम से प्यार करता हूं, तुम्हारे पापा और चाचा और चाची मुझे प्यारे लगते हैं …अगर अभिषेक, ऋतिक रोशन aur शाहरुख खान में से ही बड़े स्टार के बारे में पूछा जाएगा तो क्या जवाब मिलेगा …वहां आमिर का नाम क्यों नहीं लिया जाता …कॉफी विद करण परस्पर हस्तमैथुन का क्लब है …पीएफसी ऐसा नहीं है … यहां हम ' दूसरे की पीठ थपथपाते ' हैं … मुझ पर आरोप है कि मैं अपने दोस्तों की फिल्में प्रचारित करता हूं … मैंने जिन फिल्मों की बातें की थीं … उनमें से पांच रिलीज हो चुकी हैं …भेजा फ्राय, मनोरमा, जॉनी गद्‌दार, दिल दोस्ती एटसेट्रा और लॉयन्स ऑफ पंजाब … इनमें से पहली के अलावा बाकी कोई जोरदार सफलता नहीं हासिल कर सकी …लेकिन वे सभी प्रेरक हैं और बदलाव का संकेत दे रही हैं …उनमें ताजगी है और उन्हें मैं नया हिंदी सिनेमा कहना चाहूंगा …'

ऐसी फिल्में बनाना और उन्हें सिनेमाघरों तक पहुंचाना खामोश एवं सृजनात्मक गदर की तरह है ... मैं उनके बारे में इसलिए लिखता हूं कि वैसी फिल्मों में रुचि रखनेवालों को जानकारी मिल सके ... कुछ लोग ऐसे हैं, जिन्हें वैसी फिल्में कतई पसंद नहीं हैं ... कुछ समीक्षकों की इनमें रुचि रहती है और बाकी समीक्षक या तो पृथक रुचि के हैं या फिर वे हैं ' जिन्होंने बेहतर सिनेमा देखा है और सोचते हैं कि बेहतर हो सकता है ... ' इन आखिरी असंतुष्ट लोगों को हिंदी फिल्मों की आजादी चाहिए ... ये वो लोग हैं, जो कर के बताते हैं कि सही क्या है और ऐसे ही लोग बदलाव लाएंगे ... इसलिए पीएफसी का कोई उद्‌देश्य नहीं है ... हां, वह उद्‌देश्य की पूर्ति करता है ... अगला भव्य स्मारक वर्त्तमान जमीन पर ही बनेगा और अगर जमीन नहीं मिलेगी तो हम जर्जर हो चुकी व्यवस्था को तोड़ देंगे ताकि नयी व्यवस्था कायम हो ... ऐसा वे ही लोग कर सकते हैं, जिन्होंने जिंदगी जी और देखी है ... उन्होंने उम्दा पढ़ाई की है और वे अपने दिल की बात कागज और पर्दे पर रख सकते हैं ... नोबेल पुरस्कार विजेता टोनी मोरीसन को उद्घृत करना चाहूंगा ... ' अगर कोई ऐसी किताब आप पढ़ना चाहते हैं, जो अभी तक नहीं लिखी गयी है तो उसे आप जरूर लिखें।'

इस लेख को लिखने की वजह अपना इरादा बताना है ... कोई एजेंडा नहीं है, लेकिन मैं साधारणता (मीडियोक्रेटी) से थक गया हूं ... इसका मतलब यह नहीं है कि मैं खुद से बेहतर की तुलना में मीडियाकर नहीं हूं ... मैं भी उसी मीडियोक्रेटी में तैर रहा हूं, लेकिन मैं तैरते हुए देख रहा हूं कि बाकी लोग उपला रहे हैं ... वे कहीं जाना नहीं चाहते ... अपने आसपास कुछ खोजना नहीं चाहते ... उस निर्माता को गाली देने का मतलब नहीं है, जो अपनी रसोई के लिए फिल्म बना रहा है, आप मीडियोक्रेटी को चुनौती देकर या गाली देकर बदलाव नहीं ला सकते ... जरूरत है कि आप शहंशाह को चुनौती दें ... उसके चेहरे के आगे आईना रखें ... या तो वह अपना सिंहासन बचाए रखने के लिए बदले या फिर सिंहासन खाली करे ... मैं ऐसा नहीं कर सकता, कोई दूसरा व्यक्ति नहीं कर सकता ... बहुसंख्यक के आह्‌वान के बाद ही ऐसा हो सकता है ... अगर यह 'बहुसंख्यक ' पीएफसी पर है तो हमें वह ताकत देता है कि हम अपना छोटा देश बनाएं ... जो ज्यादा लोकतांत्रिक होगा ... वैसे साइट से बेहतर होगा जो मेरे एवं दूसरों के इंटरव्यू एडिट कर देते हैं ...

मैं होवार्ड रोअर्क नहीं हूं और कभी हो भी नहीं सकता ... हाल ही में मुझ पर आरोप लगा कि मैं होना चाहता हूं ... वह होने के लिए मुझे पहले अपने परिवार को मारना होगा ... होवर्ड रोअर्क वैसा इसलिए हो सका कि वह शुरू से किसी भावनात्मक बंधन में नहीं था ... हमें नहीं मालूम कि वह किस के गर्भ से आया था ... इसलिए उस पर केवल शारीरिक आक्रमण ही हो सकता था ... उसे उनकी आंखों में नहीं देखना था ... मेरी एक बेटी है और वह मुझे कमजोर बना देती है, सफलता की आकांक्षा मुझे कमजोर बनाती है, सुविधाओं की चाहत मुझे कमजोर बनाती है ... मैं कमजोर हूं, इसीलिए ऐसा हूं ... मैं बस आततायी हूं ... और यह मेरी हताश चीख है ... यह चीख बदलाव के लिए है, पहली बार अपने अस्तित्व के लिए थी, सिर्फ अपने अस्तित्व के लिए और कुछ नहीं ... मेरी पहली चीख जिंदा रहने की थी, जो बहरे कानों में पड़ी ... किसी ने नहीं सुना तो मैंने और जोर, फिर और ज्यादा जोर से चीख मारी ... मेरी चीखों ने उन्हें परेशान कर दिया ... परेशान होकर उन्होंने प्रतिक्रिया की, लेकिन वह मेरे लिए कल्पनातीत था ... वे मुझ से घबरा गए, उन्हें मैं संभावित दुश्मन लगा, इसलिए उन्होंने मुझे बर्बाद करने की कोशिश की ... इसलिए मैं अपने एटीट्‌यूड में आक्रामक हो गया और यह आक्रामकता सिर्फ अपने अस्तित्व के लिए थी ... फिर मुझे थोड़े से अपने लोग मिले ... मैं टिका रह सका ... अस्तित्व बनाए रखने में कोई बुराई नहीं है ... मैंने अपने अस्तित्व के लिए पाला नहीं बदला ... हां, वो मुझ से समय-समय पर खेलते हैं, लेकिन मैंने पाला नहीं बदला ... बहुतों के लिए यह उनकी और हमारी लड़ाई नहीं है ... मेरे लिए यह हो गई, क्योंकि मैं जूझा ... कैसे ... मैं बताता हूं।

यशराज के लोगों ने मुझ पर बांबे टाइम्स की सुर्खी ' अनुराग ने झूम बराबर झूम से खुद को अलग किया ' पढ़ का आरोप लगाया, उन्होंने कहा कि पहले वह हमें गाली देता है और फिर झूम बराबर झूम के पैसे मांगता है और फिर खुद को अलग कर लेता है, यह कैसा पाखंड है। 'मैं पैसे मांगता हूं, क्योंकि मैंने बहुत काम किया है और खुद को अलग इसलिए करता हूं कि उन्होंने बच्चे की शक्ल ही बदल दी और उन्होंने मुझ से बगैर पूछे सब कुछ बदल दिया, इसलिए खुद को अलग कर लेता हूं। अगर मैं उस फैसले में सहभागी नहीं था तो वह मेरा कैसे हो सकता है ... मैं पैसे लूंगा, क्योंकि मैं आपका नौकर था (लेखक के तौर पर मुझे यही इज्जत मिली थी) ... अगर वे कहते कि मुझे तुम्हारी स्क्रिप्ट अच्छी नहीं लगी तो मैं खरीद लेता ... लेकिन उन्होंने किया और मेरे पास नए तरीके से लिखा ड्राफ्ट भी भेज दिया ... (उसी से मुझे पता चला और मैंने तभी पुणे के स्क्रीन राइटर कांफ्रेंस में जिक्र किया) ... वे नए ड्राफ्ट में मेरी मदद चाहते थे ... वे चाहते थे कि मैं उनका काम कर दूं, क्योंकि वे यशराज हैं और मैं कुछ भी नहीं हूं ... उनसे मेरी यही शिकायत है और जब मैंने एसएमएस किया तो उन्होंने बात करने के लिए जयदीप को भेजा ... जयदीप की मैं इज्जत करता हूं, इसलिए मैं कमजोर पड़ गया ... फिल्मों में आने के पहले से शाद मेरा दोस्त है, इसलिए मैं भावुक हो गया ... इसलिए कुछ न कर सका और उबलता रहा।

जब मेरी फिल्म रोम के लिए चुनी गयी तो वहां किसी ने सेलेक्शन समिति को समझाने की कोशिश की कि मेरी फिल्म लेने का कोई तुक नहीं है, क्योंकि मेरी कोई औकात नहीं है ... लागा चुनरी में दाग लेनी चाहिए v क्योंकि वे खास हैं ... मैं केवल अपने प्रारब्‌ध को धन्यवाद दूंगा कि उन्होंने उनकी नहीं सुनी ... टोरंटो में उन्होंने सुन ली थी और ओमकारा की जगह कभी अलविदा ना कहना को चुन लिया था ... ओमकारा को अंतिम क्षणों में रद्‌द किया गया था - वे ठीक से नहीं खेलते, वे 'पावर गेम ' खेलते हैं ... मैं कहता हूं। यह भी सही है।

मैं पहली बार यह सब बता रहा हूं, क्योंकि मैं यशराज का निंदक कहलाते-कहलाते थक गया हूं ... लोग जब कहते हैं कि हम पलटवार करते हैं तो मुझे बुरा लगता है ... यहां हर पोस्ट लेखक की मर्जी से आता है ... अगर कोई ‘लागा चुनरी में दाग‘ का अच्छा रिव्यू नहीं लिखता तो क्या करें ... लेकिन उन्होंने ‘चक दे‘ की तारीफ की ... इसलिए यहां सिनेमा की भूख और चाहत बनी रहती है ... मेरा सनकीपन मेरा अपना है और अगर कोई नहीं चाहता तो न पढ़े ...

शुक्रवार ,२६ अक्टूबर ,२००७

अक्टूबर महीने का आखिरी शुक्रवार है.तीन फिल्में रिलीज हो रही हैं.सबसे पहले उन फिल्मों की बाट कर लें।

विक्रम भट्ट अब फिल्में पेश करने लगे हैं.लगातार १० फ्लॉप फिल्में बनाने के बाद उनका यह फैसला दर्शकों के लिए कितना खुशगवार होगा...यह टू वक्त ही बताएगा.इस हफ्ते उनकी पहली पेशगी 'मुम्बई सालसा' आ रही है.इसे मनोज त्यागी ने दिरेक्ट किया है.अगर आप मेट्रो शहरों में नही रहते तो अपने जोखिम पर ही इस फिल्म को देखने जाएं.सेक्स,रोमांस और रिश्तों की ऐसी उलझन समझना छोटे शहरों के दर्शकों की कल्पने से परे है।

इम्तियाज़ अली की 'जब वी मेट 'रोमांटिक कॉमेडी है.चवन्नी गारंटी लेता है की इस फिल्म पर खर्च किया आप का एक भी पैसा फिजूल नही जायेगा.हंसने,खुश होने और राहत महसूस करेंगे आप यह फिल्म देख कर.दीवाली के पहले की छुट्टी या रविवार को पूरे परिवार के साथ भी आप यह फिल्म देख सकते हैं.इस फिल्म की खूबियों के बारे में आप बताएं.चवन्नी की राय में शहीद कपूर और करीना कपूर की जोड़ी को इतने रोमांटिक अंदाज़ में पहले नही देखा.इम्तियाज़ अली की पीठ थपथपाप्यें और छोटे शहरों से आये निर्देशकों को बढावा दें तो और भी ऐसी फिल्में देखने के मौके मिलेंगे।

आखिर में अनुराग कश्यप की फिल्म 'नो स्मोकिंग' की बाट करें.यह फिल्म आप का अतिरिक्त ध्यान मांगती है.इसे जॉन अब्राहम की फिल्म समझ कर देखने की गलती न कर बैठें.यह पूरी तरह से अनुराग कश्यप की फिल्म है और एक नयी कहन शैली के साथ आज के समाज की विद्रूपताओं को सामने लाती है.अनुराग ने क्या सोच कर यह फिल्म बनायीं है...यह तो वे देर-सबेर बताएँगे ही,लेकिन आप इसे ज़रूर देखें और अपनी राय चवन्नी को बताएं।

इस हफ्ते की फिल्मी तमाशेबाजी में सलमान खान मीडिया के सामने आये और अपने जवाबों से सभी का मनोरंजन किया.संजय दत्त फिर से जेल चले गए हैं.शाहरुख़ खान अपनी देहयष्टि दिखा कर दर्शकों को सिनेमाघरों में खींचने की कोशिश में लगे हैं.

Thursday, October 25, 2007

नया हिंदी सिनेमा -अनुराग कश्यप

(अनुराग कश्यप ने अपने ब्लोग पर नये पोस्ट में नया हिन्दी सिनेमा को लेकर अपना पक्ष रखा है.चवन्नी आज उसका एक अंश प्रस्तुत कर रहा है.पूरा आलेख एक-दो दिनों में आपके सामने होगा)

कोई वास्तव में होवार्ड रोअर्क नहीं हो सकता .. बाकी सब 'उसकी तरह होना' चाहते हैं … आयन रैंड की सफलता इसी तथ्य में है कि उनहोंने एक ऐसे हीरो का सृजन किया, जिसकी तरह हर कोई होना चाहेगा, लेकिन हो नहीं सकेगा … वह खुद जीवन से पलायन कर अपने किसी चरित्र में नहीं ढल सकीं। दुनिया को बदलने की ख्वाहिश अच्छी है, कई बार इसे बदलने की कोशिश भी पर्याप्त है, वास्तव में बदल देना तो चमत्कार है …

हमलोग अपने इंटरव्यू में ढेर सारी बातें करते हैं, उससे ज्यादा हम महसूस करते हैं, लेकिन बता नहीं पाते हैं। अनाइस नीन के शब्‌दों में, हम सभी जो कह सकते हैं, वही कहना लेखक का काम नहीं है, हम जो नहीं कह सकते, लेखक वह कहे …' इस लेख को लिखने की वजह मुझ पर लगातार लग रहे आरोप हैं, जिनमें मैं जूझता रहा हूं … मैं ईमानदारी से सारे सवालों के जवाब देता हूं, उन जवाबों को संपादित कर संदर्भ से अलग कर सनसनी फैलाने के लिए छाप दिया जाता है … ' नो स्मोकिंग ' के बारे में दिया गया इंटरव्यू कुछ और हो जाता है और उसका शीर्षक बनता है ' यशराज हमारी परवाह नहीं करता …'हां, मैं यह कहता हूं, लेकिन जिस संदर्भ या बात के दौरान कहता हूं … वह हमेशा कट जाता है। इस से मुझे जो नुकसान होना होता है, वह तो हो ही जाता है, लेकिन जो बात रखना चाहता हूं…वह बात नहीं आ पाती … इसलिए मैंने सोचा कि मैं बगैर लाग-लपेट के बात करूं … पिछले एक महीने में मेरे और पीएफसी के प्रति लोग बलबला रहे हैं और कई उंगलियां हमारी तरफ उठ रही हैं … कई लोगों को इसमें मजा आ रहा है। एक व्यक्ति ने मुझे नए फिल्मकारों का मसीहा कहा … उन्होंने कहा कि मैं यही होना चाहता हूं … नहीं … अजय जी से बातचीत के दरम्यान उद्घृत करने लायक पंक्ति आ गई … मैं तब से लगातार उसका इस्तेमाल कर रहा हूं … ' यहां जो हो रहा है, वह गदर है, आजादी बाद में आएगी … अगर 1857 का गदर नहीं हुआ होता तो 1947 में आजादी नहीं मिली होती … ' पीएफसी पर जो हो रहा है, वह मेरा किया हुआ नहीं है, मैं पीएफसी नहीं हूं, यह मेरा साइट है, क्योंकि मैं यहां लिखता हूं … यह मेरा खरीदा हुआ साइट नहीं है, मैं मालिक नहीं हूं … मेरी राय पीएफसी की राय नहीं है, पीएफसी मुझ से ज्यादा लोकतांत्रिक है …

हां, मैं बदलाव चाहता हूं … हां, मैं लोगों को साथ लाना चाहता हूं, लेकिन मैं यहां दोस्तों का प्रचार नहीं कर रहा हूं …फिल्मकारों से मेरी दोस्ती उनकी फिल्में देखने के बाद उनकी फिल्मों से प्रेरित होने के कारण हुई … कॉफी विद करण पर केवल पलटवार किया जाता है …वहां वही मेहमान बार-बार आते हैं और एक-दूसरे को खुश करने में लगे रहते हैं। मैं तुम से प्यार करता हूं, तुम्हारे पापा और चाचा और चाची मुझे प्यारे लगते हैं …अगर अभिषेक, ऋतिक रोशन aur शाहरुख खान में से ही बड़े स्टार के बारे में पूछा जाएगा तो क्या जवाब मिलेगा …वहां आमिर का नाम क्यों नहीं लिया जाता …कॉफी विद करण परस्पर हस्तमैथुन का क्लब है …पीएफसी ऐसा नहीं है … यहां हम ' दूसरे की पीठ थपथपाते ' हैं … मुझ पर आरोप है कि मैं अपने दोस्तों की फिल्में प्रचारित करता हूं … मैंने जिन फिल्मों की बातें की थीं … उनमें से पांच रिलीज हो चुकी हैं …भेजा फ्राय, मनोरमा, जॉनी गद्‌दार, दिल दोस्ती एटसेट्रा और लॉयन्स ऑफ पंजाब … इनमें से पहली के अलावा बाकी कोई जोरदार सफलता नहीं हासिल कर सकी …लेकिन वे सभी प्रेरक हैं और बदलाव का संकेत दे रही हैं …उनमें ताजगी है और उन्हें मैं नया हिंदी सिनेमा कहना चाहूंगा …'

Monday, October 22, 2007

गुड्डी में जया की जगह डिंपल आ जातीं तो....

चवन्नी इन दिनों सैबल चटर्जी की गुलज़ार पर लिखी किताब द लाइफ एंड सिनेमा ऑफ़ गुलज़ार पढ़ रहा है.इस किताब में एक रोचक प्रसंग है.आदतन चवन्नी आप को बता रहा है।

आनंद के बाद हृषिकेश मुखर्जी और गुलज़ार गुड्डी पर काम कर रहे थे।इस फिल्म के लिए नयी अभिनेत्री की ज़रूरत थी। हालांकि यह ज़रूरत आखिरकार जया भादुड़ी ने पूरी की,लेकिन उसके पहले किसी और के नाम का सुझाव आया था.गुलज़ार तब एच एस रवैल के यहाँ आया-जाया करते थे। उनकी पत्नी अंजना भाभी से उनकी छनती थी.गुलज़ार ने वहाँ एक लड़की को आते-जाते देखा था.एक दिन अंजना भाभी ने गुलज़ार को बताया कि वह रजनी भाई की बेटी है और फिल्मों में काम करना चाहती है। उसका नाम डिंपल कापडिया है।
गुलज़ार ने हृषिकेश मुखर्जी को डिंपल के बारे में बताया,लेकिन हृषिकेश मुखर्जी के दिमाग में पहले से जया भादुड़ी थीं। हृषिकेश मुखर्जी ने पूना के फिल्म संस्थान में एक फिल्म देखी थी.उस फिल्म कि लड़की उन्हें अपनी फिल्म गुड्डी के लिए उपयुक्त लगी थी.उनहोंने गुलज़ार को सलाह दी कि जाकर पूना में उस से मिल आओ।

गुलज़ार और हृषिकेश मुखर्जी के छोटे भाई हृषिकेश मुखर्जी से लगातार पूछते रहे कि कब पूना चलना है। डैड अपनी व्यस्तता के कारण टालमटोल करते रहे। आखिरकार एक दिन दादा को जबरदस्ती पूना ले जाया गया.वहाँ तीनों ने डिप्लोमा फिल्म देखी और जया को गुड्डी फिल्म का प्रस्ताव दिया। बाद में हृषिकेश मुखर्जी और गुलज़ार दोनों ने जया भादुड़ी के साथ कई यादगार फिल्में बनाईं।
अगर गुड्डी में डिंपल आ गयी होतीं तो बॉबी कैसे बनी होती.हिन्दी फिल्मों के दर्शक जया भादुड़ी से वंचित रह जाते और बॉबी भी डिंपल के साथ नही देख पाते.

Sunday, October 21, 2007

आमिर की ईमानदारी

चवन्नी को आमिर खान पसंद हैं.अपनी बातों और प्रतिक्रियाओं से वे इस में इजाफा करते हैं.पिछले दिनों उनके भाई फैसल को लेकर कई तरह की खबरें आयीं.मीडिया का एक तबका आमिर के पीछे लगा ही रहता है.उसे मौका मिल गया .उन सभी ने फैसल की मानसिक बीमारी के लिए आमिर को जिम्मेदार ठहराया और उनकी लानत-मलामत की.आमिर आदतन चुप रहे.यह वक्त भी नही है कि आमिर चिल्ला कर सबको दिल की बाट बताएं।
बहरहाल,आमिर ने अपने प्रशंसकों से वादा किया है कि वे अपनी हर बात उनसे शेयर करेंगे सो उनहोंने अपने वेब साईट पर चंद पंक्तियों में अपनी दशा का ज़िक्र किया है.उनहोंने लिखा है कि .... मुझे माफ़ करें दोस्तों,मेरी परिस्थितियां ऐसी हो गयी हैं कि में आप से किसी भी प्रकार का सार्थक संवाद नही कर सकता.कृपया मेरी तकलीफ समझें.यह वक्त मेरे लिए और मेरे परिवार के लिए अत्यंत मुश्किल है.उम्मीद करता हूँ कि जल्दी ही कुछ लिखूंगा।
चवन्नी के एक पत्रकार मित्र ने बिलकुल सही लिखा कि आमिर के भाई फैसल को माइक की नही मेडीसिन की ज़रूरत है।
आमिर के पिता ताहिर हुस्सैन के बारे में सभी जानते हैं.आमिर की मां के साथ वे नही रहते.उनकी आमिर से अलग किस्म की खटपट है.वे आमिर को नीचा दिखाने का कोई भी मौका हाथ से नही जाने देते.आमिर और फैसल के संबंधों की बात करें तो आमिर ने फैसल के कैरीअर के लिए हर संभव मदद की.फैसल मानसिक रूप से यह स्वीकार नही कर पाते कि उनका भाई इतना सफल है और वे अपनी ज़िंदगी में कुछ भी हासिल नही कर सके.इस मानसिक दशा का इलाज ज़रूरी है।
चवन्नी उम्मीद करता है कि आमिर पहले की तरह इस मुश्किल से भी निकल आयेंगे.

Saturday, October 20, 2007

कहीं से भी अपील नहीं करती स्पीड


-अजय ब्रह्मात्मज

कई बार फिल्म के शीर्षक का कहानी से कोई ताल्लुक नहीं होता। स्पीड के साथ ऐसी ही बात है। पूरी फिल्म निकल जाने के बाद सहसा ख्याल आता है कि फिल्म का नाम स्पीड क्यों रखा गया?
बहरहाल, स्पीड विक्रम भट्ट की फिल्म है। भट्ट कैंप से निकलने के बाद विक्रम भट्ट की कोई भी फिल्म दर्शकों को पसंद नहीं आई है। ऐसा क्यों होता है कि कैंप या बैनर से छिटकने के बाद युवा निर्देशक पस्त हो जाते हैं। कुछ निर्देशक दिशानिर्देश मिले तभी अच्छा काम कर सकते हैं। विक्रम भट्ट को जल्दी ही एक ठीक-ठाक फिल्म बनानी होगी अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए।
स्पीड की कहानी लंदन में घटित होती है। इस फिल्म में मोबाइल फोन का प्रचुर इस्तेमाल हुआ है। कह लें कि वह भी एक जरूरी कैरेक्टर बन गया है। वह लिंक है कैरेक्टरों को जोड़ने का। संदीप (जाएद खान) भारत से लंदन गया है अपनी प्रेमिका संजना (तनुश्री दत्ता) को समझाने। उसे एक रांग काल आता है, जो अपहृत हो चुकी युवती (उर्मिला मातोंडकर) का है। उसका अपहरण कर फिल्म का खलनायक आफताब शिवदासानी उसके पति सिद्धार्थ (संजय सूरी) से एक हत्या करवाना चाहता है। हत्या भी किसी मामूली आदमी की नहीं, भारत की प्रधानमंत्री गायत्री सिन्हा की होनी है। हंसी आ सकती है लेखक की ऐसी कल्पना पर और अपराधियों की बचकानी साजिश पर।
स्पीड किसी भी स्तर पर अपील नहीं करती। चरित्रांकन, अभिनय, दृश्य और प्रसंग हर तरह से यह फिल्म लचर है। उर्मिला मातोंडकर का अभिनय निराशा के दौर में इस स्तर तक आ गया है कि लगता ही नहीं कि कभी उन्होंने रंगीला और पिंजर जैसी फिल्में की थीं। फिल्म का गीत संगीत भी कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाता।
मुख्य कलाकार : जायेद खान, उर्मिला मातोंडकर, आशीष चौधरी, आफताब शिवदासानी, संजय सूरी, सोफी चौधरी, तनुश्री दत्ता, अमृता अरोरा
निर्देशक : विक्रम भट्ट
तकनीकी टीम : निर्माता- हैरी बवेजा, गायक- शान, सुनीधि चौहान, जॉय, सोनू निगम, अंतरा मित्रा, संगीतकार- प्रीतम चक्रबर्ती

Friday, October 19, 2007

शुक्रवार,१९ अक्टूबर,2007

फिर से आया शुक्रवार ...
आज रिलीज हो रही फिल्मों में स्पीड और बाल गणेश का उल्लेख किया जा सकता है.बाल गणेश एनीमेशन फिल्म है और बच्चों को ध्यान में रख कर बनायीं गयी है.गणेश पर एक और एनीमेशन फिल्म आ चुकी है.अब चूंकि अपने देश में एनीमेशन फिल्में अभी घुटनों के बाल चल रही हैं तो चवन्नी ज्यादा उम्मीद नही रखता और न चाहता है कि आप ही कोई उम्मीद रखें.

स्पीड विक्रम भट्ट की फिल्म है.विक्रम भट्ट पिछली कुछ फिल्मों से दर्शकों को पसंद नही आ रहे हैं.हो सकता है इस बार कोई चमत्कार हो जाये.चवन्नी चमत्कार की बात इसलिए कर रहा है कि फिल्म की कहानी और कलाकारों की सूची देख कर अधिक उम्मीद नही की जा सकती.यह फिल्म लंदन की पृष्ठभूमि पर बनी है.रहस्य,रोमांस, कर्तव्य और प्रेम की यह कहानी पसंद आ जाये तो विक्रम भट्ट का भला हो जाये.

पिछले हफ्ते करीना और सैफ के प्रेम संबंधो की खूब चर्चा रही.इस पूरे प्रसंग में मजेदार तथ्य है कि करीना या शहीद ने अभी तक यह नही कहा है कि उनके संबंध खत्म हो गए हैं.अगर यह खबर अफवाह निकली तो इस साल की सबसे बड़ी अफवाह होगी जो फिल्म के प्रचार के लिए इस्तेमाल की जा रही है.शहीद खामोश हैं.सैफ ने कहा हम साथ हैं.करीना कहती कि मैं कैरीअर पर ध्यान देना चाहती हूँ.चलिए जो भी होगा ...चवन्नी आप को बताएगा.
अन्य घटनाओं में धर्मेश दर्शन ने टीवी के कलाकारों को लेकर नयी फिल्म भंवरा की घोषणा की.राजेश खाना वाला बेहूदा प्रसंग चवन्नी आप को बता ही चुका है.
अब दो खुश खबर...एक तो चवन्नी की आमिर खान के वेब सीते की खबर को एन डी टीवी पर जगह मिली और ऑस्कर की सूची में एकलव्य के शामिल होने खबर को कल जोश१८.कॉम ने लिया.

Thursday, October 18, 2007

कहां गए खलनायक?


(चवन्नी को अजय ब्रह्मात्मज का यह आलेख दशहरा के मौक़े पर थोडे अलग ढंग का लगा.चवन्नी ने अपने पाठकों के लिए इसे जागरण से लिया है।)

निश्चित रूप से लोग भी यही सोच रहे होंगे कि चूंकि दशहरे का समय है और तीन दिनों के बाद बुराई के सर्वनाश के प्रतीक के रूप में रावण के पुतले जलाए जाएंगे, लेकिन क्या आपने सोचा और देखा कि हिंदी फिल्मों से रावण अब लगभग गायब हो गए हैं! कहने का तात्पर्य यह है कि हीरो तो हैं और विविध रूपों में हैं, लेकिन विलेन गायब हो गए हैं। थोड़े-बहुत कुछ फिल्मों में दिखते भी हैं, तो वे पिद्दी जैसे नजर आते हैं।
सबसे पहले सूरज बड़जात्या और फिर आदित्य चोपड़ा और करण जौहर ने अपनी फिल्मों से विलेन को गायब किया। तीनों की पहली फिल्म आप याद करें, तो पाएंगे कि उनमें खलनायक है ही नहीं! दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे में पिता आरंभिक विरोध करते हैं और लगता है कि वे हीरो-हीरोइन के प्रेम में विघ्न पैदा करेंगे, लेकिन हीरोइन उनसे बगावत नहीं करती और हीरो मुकाबला नहीं करता। दोनों पिता का दिल जीतते हैं, इस कहानी में हीरोइन का मंगेतर हीरो के मुकाबले में आता है, लेकिन पूरी कहानी में उसकी जगह किसी प्यादे से ज्यादा नहीं है।
संयोग ऐसा रहा कि तीनों की फिल्में सफल रहीं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में किसी फिल्म की कामयाबी को दोहराने की कोशिश में उसकी नकल आरंभ होती है। लिहाजा बाकी निर्देशकों को भी लगा कि अब फिल्मों में विलेन की जरूरत नहीं रह गई है। लंबे अर्से के बाद उम्मीद थी कि रामगोपाल वर्मा की आग में गब्बर सिंह नए अवतार में दिखेगा, लेकिन बब्बन सिंह का किरदार खलनायकी के नाम पर मजाक ही बन गया! पिछले दस सालों में तनुजा चंद्रा की फिल्म दुश्मन का गोकुल पंडित ही ऐसा विलेन आया है, जिसे देखकर घृणा होती है। हिंदी फिल्मों में इधर एक नया ट्रेंड दिखाई पड़ रहा है। पूरी फिल्म में खल चरित्र रहते हैं। बुरे और दुष्ट चरित्र ही फिल्मों के मुख्य किरदार भी होते हैं। उन्हें नायक कहना तो सही नहीं होगा। वे एंटी हीरो भी नहीं हैं। ताज्जुब की बात है कि कॉमेडी फिल्मों में भी ऐसे ही किरदारों को महत्व दिया जा रहा है। जल्दी अमीर बनने की कोशिश में लगे लंपटों की बदमाशियों और बेवकूफियों को कॉमेडी के रूप में पेश किया जा रहा है।
फिल्मों से खलनायकों की अनुपस्थिति का सबसे बड़ा नुकसान यही हुआ कि फिल्मों की कहानियों से नाटकीयता गायब हो गई है! आलोचक और सिद्धांतकार मानते हैं कि ताकतवर खलनायक के खिलाफ खड़े होने पर ही नायक के बल और गुण का पता चलता है। राम के विरोध में रावण नहीं रहता, तो रामायण का वह प्रभाव नहीं होता, जो आज है। जितना बड़ा खलनायक होगा, उतनी ही रोचक और नाटकीय कहानी होगी। सिर्फ अच्छे या बुरे चरित्रों को लेकर बनी फिल्मों का प्रभाव एक आयामी हो जाता है।
समाज में खलनायक मौजूद हैं। यों कहें कि वे ज्यादा सूक्ष्म और विकराल हो गए हैं, लेकिन हिंदी फिल्मों में वे दिखाई नहीं पड़ रहे हैं। कोई ऐसा विलेन हाल-फिलहाल में नहीं आया, जो हमारी स्मृतियों में कौंधे। यही कारण है कि नेगॅटिव किरदार निभाने वाले कलाकारों का महत्व भी कम हो गया है। लंबे समय तक सिर्फ विलेन की भूमिकाएं निभा कर प्राण सरीखे उम्दा कलाकार मशहूर हुए थे, लेकिन आज स्थिति यह है कि हिंदी फिल्मों में खलनायकों के किरदार निभाने वाले कलाकारों को दक्षिण भारत की फिल्मों में शरण लेनी पड़ रही है।

एकलव्य ही गयी ऑस्कर

ऑस्कर से जारी सूची में एकलव्य शामिल है.
देश में ऑस्कर को लेकर चल रहा विवाद घिनौने स्तर तक पहुंच गया था.मामला कोर्ट तक गया.चवन्नी नही समझ पा रहा है कि क्यों हर बार कोई भी पुरस्कार,सम्मान और प्रतिष्ठा को पहले शक की निगाह से देखा जाता है.उस पर सवाल उठाये जाते हैं.विवाद खडा होता है.कुल मिला कर स्वाद खट्टा हो जाता है.अब एकलव्य का ही प्रसंग लें.इस पर ऐसे विवाद की कोई ज़रूरत नही थी.इसके साथ यह भी ज़रूरी है की हर समिति पारदर्शी तरीके से काम करे.शक-ओ-शुबहा कि गुंजाइश ही क्यों हो?
बहहाल,एकलव्य ऑस्कर कि सूची में पहुंच गयी है.फिल्म के निर्देशल विधु विनोद चोपडा के लिए यह खुशी और जिम्मेदारी का मौका है.अब वे अपनी पूरी ताकात लगाएं और इस बात की कोशिश करें कि एकलव्य ज्यूरी के सारे सदस्य देखें.ऑस्कर में जम कर प्रचार करना पड़ता है.विधु को कुछ दिनों के लिए वहीँ डेरा डालना होगा.चवन्नी भी चाहेगा कि उसके देश की फिल्म पहले नामांकन सूची में पहुंचे और फिर पुरस्कार भी हासिल करे.चवन्नी की शुभकामनायें विधु और एकलव्य के साथ हैं।
ऑस्कर की विदेशी भाषा की श्रेणी में ग़ैर अंग्रेजी फ़िल्में भेजी जाती हैं.halanki चवन्नी के देश में दुनिया की सबसे ज्यादा फ़िल्में बनती हैं,लेकिन अभी तक किसी भारतीय फिल्म को यह पुरस्कार नही मिला है.इस शाल भारत की एकलव्य समेत ६३ देशों की फ़िल्में इस पुरस्कार के लिए स्वीकृत हुई हैं.प्रतियोगिता कठिन है,क्यों कि उन सभी देशों की भी फ़िल्में हैं,जो अभी तक पुरस्कार लेती रही हैं.कहना मुश्किल नही है कि परिणाम क्या होगा?
अरे हाँ!यह याद रखियेगा कि यह खबर सबसे पहले चवन्नी ने आप को दी.

Wednesday, October 17, 2007

तस्वीरों में ' गोल '






















निर्माता-रोनी स्क्रूवाला
निर्देशक-विवेक अग्निहोत्री
कलाकार-जॉन अब्राहम,बिपाशा बासु,दिब्येंदु भट्टाचार्य,अरशद वारसी





रिलीज के पहले का टूटना-जुड़ना


चवन्नी की तरह आप भी ख़बरें पढ़ राहे होंगे कि इन दिनों शाहिद और करीना में नही निभ रही है.कहा जा रहा है कि करीना को सैफ की संगत पसंद आ रही है.दोनों गलबहियां दिए कभी किसी होटल में तो कभी मोटर बैक पर नज़र आ राहे हैं.इधर शाहिद और करीना ने अपनी ताज़ा फिल्म जब वी मेट के प्रचार के लिए साथ में शूटिंग की.उनहोंने इस मौक़े पर आपस में कोई बात नही की और मुँह फेर कर सैट पर बैठे मिले.चवन्नी को इस किस्से पर कतई यकीं नहीं है।

शाहिद और करीना kee बेवफाई की इस कहानी पर यकीं इसलिये भी नही होता कि दोनों की दोस्ती चार साल पुरानी है और इस दोस्ती के लिए उनहोंने इतने ताने भी सुने हैं.शुरू में दोनों परिवारों को उनका मिलना-जुलना पसंद नही था.फिर एम् एम् एस के मामले में कैसे दोनों ने मीडिया का मिल कर मुक़ाबला किया था.निशित ही यह फिल्म क प्रचार के लिए अपनाया गया पुराना हथकंडा है।

इसकी शुरुआत राज कपूर ने की थी.आपको याद होगा कि संगम की रिलीज के समय उनहोंने खुद के साथ वैजयंती माला के प्रेम के किस्से छपवाए थे.यहाँ तक कि उनके बीवी कृष्ण कपूर भी प्रचार का झूठ नही समझ सकी थीं और घर छोड कर चली गयी थीं.बाद में धर्मेंद्र,राजेश खनन,अमिताभ बछां से लेकर आज कल जॉन अब्राहम और शाहिद कपूर तक यही चल रहा है.बेचारे दर्शक ...ऐसी अफवाहों पर भरोसा करते हैं .माना जाता है कि ऐसी ख़बरों से फिल्म को प्रचार मिलता है और फिल्म हिट हो जाती है।

Tuesday, October 16, 2007

क्या हैं ऐश्वर्या राय ?

-अजय ब्रह्मात्मज
मिस व‌र्ल्ड, हिंदी फिल्मों की हीरोइन, मशहूर मॉडल या कुछ और? कई पहचानों की संश्लिष्ट अस्मिता में ऐश्वर्या राय से हम सभी ठीक से परिचित नहीं हो पाते। अगर सारी पहचानों से आंखें मूंद कर ऐश्वर्या राय के बारे में सोचें और आंखें खोलें तो कोमल खिलखिलाहट से भरी एक चंचल लडकी नजर आती है, जिसके मुस्कराते ही सतरंगी किरणें बिखरने लगती हैं और उसकी आंखों की नीली-हरी गहराई आमंत्रित करती है।
अपने समाज में लडकियों की स्वतंत्र पहचान नहीं है। इंदिरा गांधी भी आजन्म नेहरू की बेटी रहीं और आज की चर्चित नेता सोनिया गांधी भी राजीव गांधी की पत्नी हैं। लडकियां किसी भी ओहदे पर पहुंच जाएं, अपनी मेहनत और लगन से कुछ भी हासिल कर लें और अपनी मेधा से आकाश छूने का संकेत दें तो भी हम उन्हें किसी न किसी प्रकार मर्दो के घेरे में ले आते हैं। समाज उनकी उडान को सराहता है, लेकिन धीरे-धीरे उनके पंख भी कतरता रहता है। अगली बार जब वे उडान के लिए खुद को तौलती हैं तो डैनों में ताकत की कमी महसूस होती है, क्योंकि मर्यादा की आड में उनके पंख नोच लिए गए होते हैं।
बहुत जरूरी है ऐश्वर्या राय के व्यक्तित्व को समझना। वह हमारे बीच से उभरी एक ऐसी लडकी हैं, जिनका कद उनकी वर्तमान उपलब्धियों से ज्यादा है। अभी ऐश्वर्या राय के व्यक्तित्व के चंद पहलू ही सामने आए हैं। यकीन करें आने वाले सालों में उनकी पहलकदमी और चाहत से हम सभी चौंकेंगे। ऐश्वर्या राय को भी एहसास नहीं होगा कि वह कब इस ऊर्जा और क्षमता से भर गई। प्रतिभा, प्रशंसा और प्रतिष्ठा, निरंतर साधना और लक्ष्यभेद की एकाग्रता से हासिल होती है। छोटी उम्र में ही ऐश्वर्या राय को लग गया था कि वह एक दिन मशहूर होंगी। योग-संयोग तो बाद में होते हैं, पहले आत्म साक्षात्कार होता है। बुद्ध ने कहा था आत्मदीपो भव। सचमुच अंतस में चिराग जल जाए तो हर अंधेरा छंट जाता है। दुनिया रोशन होती है और रास्ते खुशगवार..। कल्पना करें सामान्य मध्यवर्गीय परिवार की एक लडकी क्या कभी शोहरत की इन बुलंदियों पर पहुंचने के ख्वाब देख सकती हैं? ऐश्वर्या ने भी नहीं सोचा होगा। हिंदी फिल्मों में कहते हैं न, दिल से ईमानदार ख्वाहिश करो तो सारी कायनात उसे पूरा करने में जुट जाती है।
घर का जोगी जोगडा, आन गांव का सिद्ध ऐश्वर्या पर यह मुहावरा चरितार्थ होता है। ऐश्वर्या राय की लोकप्रिय पहुंच की कद्र देश में नहीं हो सकी और न हो रही है। यहां हम उन्हें कभी सलमान खान, कभी विवेक ओबेराय तो कभी किसी और के साथ जोडकर चटखारे लेते हैं। ऐश्वर्या राय इन संबंधों तक सीमित नहीं हैं। वह भारत की लोकप्रिय पहचान बन चुकी हैं। मीडिया विस्फोट के इस दौर में इंटरनेशनल बाजार ऐश्वर्या राय की इमेज को सही ढंग से परख कर लाभ कमा रहा है। विदेशी शहरों और चौराहों पर मल्टीनेशनल कंपनियों के उपभोक्ता उत्पाद की प्रति आकर्षित करने में बाजार उनका इस्तेमाल कर रहा है। इसे अनायास या जुगाड कह कर नहीं टाला जा सकता कि ऐश्वर्या राय भारत की एकमात्र ऐसी अभिनेत्री हैं, जिन्होंने हॉलीवुड की फिल्मों में समान हैसियत के साथ प्रवेश किया है। हॉलीवुड की फिल्में मानदंड नहीं हो सकतीं, लेकिन इंटरनेशनल मार्केट में वैसी फिल्मों में किसी कलाकार की मौजूदगी से दबदबा बनता है। ऐश्वर्या राय एक ब्रैंड हैं। ऐश्वर्या राय यूथ आइकॉन हैं। ऐश्वर्या राय विदेशों में इंडिया का पर्याय हैं। लोकप्रिय संस्कृति और उसके प्रतिनिधियों को हिकारत से देखने वाले इस सच को स्वीकार करने से पहले नाक-भौं सिकोड सकते हैं, लेकिन आज इंडिया का नाम लेते ही महात्मा गांधी के साथ ऐश्वर्या राय का भी स्मरण होता है आम विदेशियों को लंदन के मादाम तुसाद के म्यूजियम में ऐश्वर्या राय का मुजस्समा भी लगा है।
अभिनेत्री के तौर पर बात करें तो हिंदी फिल्मों में उनकी चंद अविस्मरणीय छवियां हैं। हम दिल दे चुके सनम में कहानी शुरू होने के पहले कुलांचे भरती हुई किसी हिरणी की तरह पलटकर विस्मित नयनों से देखती ऐश्वर्या राय की चपलता को संजय लीला भंसाली ने संतुलित गति और ठहराव के साथ कैमरे में कैद किया था। संजय लीला भंसाली की ही फिल्म देवदास में पारो की जीती ऐश्वर्या अपनी समृद्धि में भी भावनात्मक विपन्नता को जाहिर करती है। पारो का दर्द और द्वंद्व दर्शकों तक पहुंचता है। गुरु की सुजाता चरित्रांकन की सीमाओं के बावजूद हमें भारतीय नारी का साक्षात्कार कराती है।
जीवन और व्यवहार में ऐश्वर्या राय की सरलता प्रभावित और सम्मोहित करती है। लोकप्रिय और प्रतिष्ठित व्यक्तियों की समस्या और दुविधा रहती है कि वे हर किसी के साथ सामान्य व्यक्ति-सा व्यवहार नहीं रखते। पेशे की जरूरतें ओर इमेज की चिंता उन्हें सार्वजनिक जीवन में सहज नहीं रहने देती। ऐश्वर्या राय के पास एक अचूक अस्त्र है , वह किसी भी असहज स्थिति में खिलखिलाती हैं और आपकी जिज्ञासा को अपनी हंसी की लहरों के साथ दिल के दरिया में डुबो देती हैं। जवाब अनकहा रह जाता है, मर्म आप समझ लेते हैं। ऐश्वर्या राय को कभी झल्लाते, कुढते या सहमते नहीं देखा। वास्तव में यह लोकप्रियता का आत्मविश्वास है, जो कानपुर से कान तक उन्हें ताकत देता है।
एक साक्षात्कार में आत्मीय उद्गारों के मध्य उन्होंने कहा था, मैं मामूली चिंताओं की औसत औरत हूं। ऐश्वर्या राय की मामूली चिंताएं दूसरी लडकियों से कम या ज्यादा नहीं हैं, फिर भी वह मीडिया और प्रशंसकों के सवालों, संदेहों और संशयों के चक्रव्यूह में फंसी रहती हैं। कई बार लगता है कि वह कुछ कहते-कहते रुक जाती हैं। उनकी तसवीरों में भी यह उद्विग्नता और अचकचाहट दिखती है। ऐश्वर्या राय ऐसी प्रतिभा हैं, जो अभी तक पूरी तरह से प्रस्फुटित नहीं हुई हैं। कहा नहीं जा सकता कि भविष्य के गर्भ में उनके और कौन से पहलू आकार ले रहे हैं इतना भरोसा किया जा सकता है कि ऐश्वर्या के प्रस्फुटन को नहीं रोका गया तो वह अपने रंग और खुशबू से हमारी दुनिया को और भी मोहक एवं रोचक बनाएंगी।

Monday, October 15, 2007

४६ ३६ ४६

इन अंकों की बात चवन्नी बाद में करेगा।
पहले इन अंकों का रिश्ता जिस से है,उसके बारे में सुनें.बीते ज़माने के इस फिल्म स्टार को सबसे पहले सुपर स्टार का दर्जा मिला था.इस सुपर स्टार की लोकप्रियता का ऐसा आलम था कि लडकियां उनकी कार को होंठों से चूम कर रंग देती थीं.वे परदे पर पलकें झाप्काते थे और इधर सिनामघरों में आहें सुने पड़ती थिनेक साल में उनकी आठ फ़िल्में हुई थीं और उनहोंने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किये थे.अपनी उसी लोकप्रियता के दिनों में उनहोंने रातोंरात स्टार बनी एक नयी अभ्नेत्री से शादी कर सभी को चौंका दिया था।
चवन्नी को lag रह है कि आप उस सत्र को पहचान गए हैं.आप नाम बताएं,इसके पहले चवन्नी ही बता देना चाहता है कि सुपर स्टार राजेश खन्ना की बात चल रही है।
चवन्नी अब जो बताने जा रह है,इस से आपका मन खट्टा हो सकता है.लेकिन यह सच है.पिछले शनिवार १३ अक्टूबर को राजेश खन्ना एक फिल्मी पार्टी में गए थे.रजा बुंदेला की नै फिल्म का मुहूर्त था.राजेश खन्ना को ही क्लैप देना था.वहाँ राज बब्बर और शत्रुघ्न सिन्हा भी आये थे.किस्सा यूं हुआ कि राजेश खन्ना उर्फ़ काका अन्दर हॉल में जाकर बैठ गए.मज़बूरी और आदत के शिकार चैनल वालों ने उन्हें घेर लिया.वे टालू अंदाज़ में जवाब देते रहे.इसी बीच एक महिला पत्रकार आयी.थोड़ी नयी लग रही थी.उस ने काका से उनका नो माँगा.मोबाइल नंबर देने के बाद काका ने खुद ही कह कि मेरा लैंड लें नंबर भी ले लो.उनहोंने तेजी से एक नंबर बताया,जिसके आख़िरी छः नंबर ४६ ३६ ४६ थे.यहाँ तक कोई खास बात नही थी.महिला ने पलटकर फिर से नाबर पूछा.वह नोट नहीं कर पायी थी.काका को ना जाने क्या सूझा.उनहोंने कह कि इटालियन औरतों को देखा है.४६ ३६ ४६.महिला पत्रकार इतालियन औरतों का संदर्भ नहीं समझ पायी.उस ने फिर से पूछा ... क्या? काका की आंखों में हवस तैर रही थी. उनहोंने इस बार इशारे से अपने हाथों को सीने के आगे के बाँध कर कहा ४६,फिर क़मर पर हाथ ले गए और कहा ३६...इसके बाद बैठे-बैठे ही उनहोंने अपने नितम्ब पर हाथ मारते हुए कहा ४६ .कम उम्र महिला पत्रकार सुपर स्टार की हरकत और बातों से झेंप कर भाग गयी।
सुपर स्टार राजेश खन्ना के चहरे पर कोई झेंप शर्म नही थी.अब आप ही बताएं कि इसे क्या कहेंगे?एक सुपर स्टार का पतन या कुछ और.संयोग अच्छा था काका के लिए कि किसी चैनल वाले ने उन्हें यह सब कहते शूट नहीं किया,अन्यथा बग़ैर खुफिया कैमरे के ही स्टिंग ऑपरेशन हो जाता.

Saturday, October 13, 2007

बनारस के रंग में रंगी फिल्म है लागा चुनरी में दाग


-अजय ब्रह्मात्मज

कहते हैं विद्या बालन ने यह फिल्म कुछ दिक्कतों के कारण छोड़ दी थी। इस नुकसान को वह फिल्म देखने के बाद समझ सकती हैं। कोंकणा सेन शर्मा ने उसे लपक कर खुद को कमर्शियल सेटअप में लाने का सुंदर प्रयास किया है।
लागा चुनरी में दाग के फ‌र्स्ट हाफ में बनारस की सुंदरता और अल्हड़पन को बड़की (रानी मुखर्जी) और छुटकी (कोंकणा सेन शर्मा) के माध्यम से प्रदीप सरकार ने चित्रित किया है। पुश्तैनी अमीरी गंवाने के बाद बदहाल जिंदगी जी रहे एक मध्यवर्गीय परिवार की बड़ी लड़की परिवार संभालने के चक्कर में जिस्मफरोशी के धंधे में फंस जाती है। बाद में जब उसके बारे में पता चलता है तो सभी उसकी मजबूरी और जिम्मेदारी के एहसास को समझ कर उसकी इज्जत करने लगते हैं।
मेलोड्रामा, भावनाओं के खेल और अश्रुविगलित कहानियां पसंद करने वाले दर्शकों को यह फिल्म पसंद आएगी, क्योंकि कई दृश्यों में रुमाल निकालने की जरूरत पड़ जाएगी। बड़की-छुटकी का बहनापा और गरीबी में पिसती मां से उनके संबंध को ऐसी संवेदना के साथ फिल्मों में कम दिखाया गया है। फिल्म में दिक्कत तब शुरू होती है, जब यह मेलोड्रामा हद से ज्यादा हो जाता है। एक-एक कर सारे किरदार त्याग की मूर्तियों में तब्दील होने लगते हैं। ऐसे दृश्यों में युवा दर्शकों को हंसी आने लगती है और फिल्म की भावनात्मक पकड़ ढीली हो जाती है।
प्रदीप सरकार ने इंटरवल के पहले फिल्म को कथ्य के लिहाज से गहरा कर दिया है, लेकिन इंटरवल के बाद वे उसी गहराई को कायम नहीं रख पाते। फिल्म उथली हो जाती है और सब कुछ इतना जाहिर हो जाता है कि नाटकीयता नकली लगने लगती है। फिल्म के कथ्य पर बाकी चीजें भारी पड़ गई हैं।
रानी मुखर्जी और कोंकणा सेन शर्मा को बड़की-छुटकी के किरदारों के लिए पूरा अंक मिलना चाहिए। मां की विवशता, दुविधा और फिक्र को जया बच्चन ने बखूबी पेश किया है। उन्हें और भी फिल्में करनी चाहिए। हीरो इस फिल्म में शो पीस की तरह हैं। सिर्फ गानों और चंद पूरक दृश्यों के लिए उनका उपयोग किया गया है। नारीवादी दर्शक खुश हो सकती हैं। फिल्म के गीत-संगीत के लिए स्वानंद किरकिरे और शांतनु मोइत्रा बधाई के पात्र हैं। उन्होंने शब्दों और धुनों से बनारस का रंग ला दिया है।

भूल भुलैया :फिल्म की प्रस्तुति में कंफ्यूजन

-अजय ब्रह्मात्मज
सबसे पहले तो भूलभुलैया को दो शब्द भूल भुलैया बना देने का सवाल है। इसका जवाब कोई नहीं देता। न निर्माता, न निर्देशक और न फिल्म के कलाकार। जैसे कि संजय लीला भंसाली की फिल्म सांवरिया को अंग्रेजी में सावरिया लिखा जा रहा है। क्यों? किसी को नहीं मालूम।
भूलभुलैया प्रियदर्शन की फिल्म है। हिंदी में पिछले कुछ समय से आ रही उनकी कॉमेडी फिल्मों के कारण यह इंप्रेशन बनता है कि हम कॉमेडी फिल्म देखने आए हैं। फिल्म की शुरुआत से भी लगता है कि हम कॉमेडी फिल्म ही देखेंगे, लेकिन बाद में हॉरर का समावेश होता है। फिल्म का प्रचार और इसका लोकप्रिय गाना हरे कृष्णा हरे राम कुछ अलग तरह से आकर्षित करते हैं और फिल्म पर्दे पर कुछ और दिखती है।
इस फिल्म की प्रस्तुति में कंफ्यूजन है। बनारस के घाटों के आरंभिक दृश्य आते हैं और पुरबिया मिश्रित हिंदी के संवाद से लगता है कि यह बनारस के आसपास की फिल्म होगी, लेकिन महल और वेशभूषा में राजस्थानी टच है। एक तरफ लैपटाप और मोबाइल का इस्तेमाल हो रहा है। दूसरी तरफ, चौथे-पांचवें दशक की मोटरकार दिखाई जा रही है। अब कहां ऐसे पंडित-पुजारी दिखते हैं, जिनकी चुटिया आकाश की तरफ खड़ी होती है? साबू सिरिल देश के प्रतिष्ठित कला निर्देशक हैं। उनसे ऐसी भूलें कैसे हो गईं या उनको समझा दिया गया कि हिंदी की कमर्शियल फिल्म में कुछ भी दिखा दो।
शहर से लौटे सिद्धार्थ को अपने चाचा की बातों पर विश्वास नहीं है कि पुराने महल में किसी भूत का आवास है। वह अपनी नई-नवेली पत्नी अवनी के साथ वहीं रहता है। बाद की घटनाएं विवश करती हैं कि वह महल की अनहोनी घटनाओं का रहस्य समझे। वह अपने मनोवैज्ञानिक दोस्त डॉक्टर आदित्य श्रीवास्तव को बुलाता है। डॉक्टर श्रीवास्तव उस रहस्य का वैज्ञानिक हल करते हैं और हमें पता चलता है कि जिसे हम भूत का प्रकोप समझ रहे थे, वह वास्तव में एक मुख्य किरदार का मानसिक रोग है।
निश्चित ही मलयालम में 13 साल पहले बनी इस फिल्म ने दर्शकों को प्रभावित किया होगा, लेकिन हिंदी में भूलभुलैया वही प्रभाव नहीं बनाए रख पाती। रीमेक में कुछ छूट गया है। हिंदी के हिसाब से बनाने में फिल्म की मूल संवेदना उभर नहीं पाई है। विद्या बालन ने उत्तम अभिनय किया है और साबित किया है कि वे जटिल किरदारों के मनोभावों को भी व्यक्त करने में समर्थ हैं। अक्षय कुमार अपने किरदार के मजाकिया स्वरूप को निभा ले जाते हैं। अन्य कलाकारों में मनोज जोशी का अभिनय उल्लेखनीय है। राजपाल यादव की मसखरी अब खिझाने लगी है। फिल्म के लोकप्रिय गीत हरे कृष्णा हरे राम को लास्ट के्रडिट के साथ दिखाकर उस गाने को देखने गए दर्शकों के साथ छल हुआ है।
मुख्य कलाकार : अक्षय कुमार, विद्या बालन, अमीषा पटेल, शाईनी आहूजा, असरानी, परेश रावल, मनोज जोशी, विनीत, विक्रम गोखले
निर्देशक : प्रियदर्शन

हम परिवर्तन नहीं ला सकते: अमिताभ बच्चन


११ अक्टूबर को अमिताभ बच्चन का जन्मदिन था.उसी अवसर पर अजय ब्रह्मात्मज ने उनका साक्षात्कार लिया.यहाँ कुछ अलग सवाल अमित जी के सामने रखे गए.अमित जी ठीक मूड में होन तो रोचक जवाब देते हैं.चवन्नी दैनिक जागरण में प्रकाशित अमिताभ बच्चन का साक्षात्कार अपने पाठकों के लिए पेश कर रह है ।
अमिताभ बच्चन भारतीय सिनेमा की धुरी हैं, इसमें कोई दो राय नहीं। धुरी इसलिए हैं, क्योंकि हिंदी सिनेमा के इतिहास में उनका अहम योगदान है। हर रंग की भूमिकाएं निभाने में माहिर होने की वजह से ही उन्हें कई उपनाम भी मिले। बातचीत अमिताभ बच्चन से..
आपका उल्लेख होते ही एंग्री यंग मैन की छवि उभरती है, जबकि आपने दूसरी तरह की फिल्में भी की हैं। क्या वजह हो सकती है?
वजह तो आप लोग ज्यादा अच्छी तरह बता सकते हैं। वैसे, यह सही है कि जब कहीं पर क्रोध होता है या कहीं पर हिंसा होती है, तो लोगों का उधर ध्यान जरूर जाता है। आप सड़क पर चल रहे हैं और अगर एक लड़का-लड़की हाथ पकड़े जा रहे हैं, तो आप शायद एक बार देखकर अपना मुंह मोड़ लेंगे, लेकिन अगर वही लड़का-लड़की एक-दूसरे को चपतियाने लगें और चप्पल उतार कर मारने लगें, तो आप रुक जाएंगे। उसे देखेंगे। दस-बारह लोग जमा हो जाएंगे। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी आप देखिए, वहां मारपीट, दुष्कर्म और मर्डर की खबरें आपको ज्यादा दिखाई देंगी बजाए इसके कि एक नेक आदमी ने कोई नेक काम किया हो। वैसी खबर आए भी, तो चर्चा नहीं होती। यह मान लेना गलत होगा कि मैंने एंग्री यंग मैन की ही भूमिकाएं निभाई। जब एक दीवार बनी, तो एक अमर अकबर एंथनी भी बनी। शक्ति या शहंशाह बनी, तो चुपके चुपके भी बनी है और नमक हलाल भी।
पिछले कुछ वर्षो से आप इंटरनेशनल मंचों से हिंदी फिल्मों को मिली नई पहचान का जिक्र जरूर करते हैं। क्या सचमुच हिंदी फिल्मों का प्रभाव बढ़ा है?
कॉमर्शियल फिल्मों को अपने ही दम पर विदेशों में पहचान मिल रही है। आप याद करें, तो विदेशों में हमारी फिल्मों का उपहास किया जाता था। वे लोग हमारी फिल्मों की निंदा करते थे, आलोचना करते थे। ये नाच-गाना क्या है? आप लोग, तो ओवर द टॉप किस्म की फिल्में बनाते हैं। ऐसा जीवन में थोड़े ही होता है, लेकिन उन्हें क्या मालूम कि हमारे देश की जनता कैसी है? हमारा हाव-भाव कैसा है? हम रियलिस्टिक सिनेमा नहीं बना सकते, क्योंकि एक गरीब दिन भर मेहनत कर पांच रुपये कमाता है और उसमें से दो रुपये का सिनेमा देखता है, तो वह अपने ही जीवन के ऊपर फिल्म थोड़े ही देखना चाहेगा! वह अपनी तकलीफों को भूलने के लिए सिनेमा देखता है। यही विदेशी, जो कभी मजाक और आलोचना करते थे, आज हमारी फिल्मों पर शोध कर रहे हैं। बहुत से लोग पूछते हैं कि आप ऐसी फिल्में क्यों बनाते हैं? कुछ और बनाने को नहीं है क्या? लेकिन जो हमारा प्लस प्वॉइंट है, उसे हम क्यों खोएंगे?
आपके बारे में कहा जाता है कि आपने कभी दूसरी तरह की फिल्मों में अधिक रुचि नहीं दिखाई?
किस तरह की फिल्मों में? ब्लैक के बारे में क्या कहेंगे.. जिसके लिए पुरस्कार मिला! उसे किस श्रेणी में डालेंगे! ऋषिदा के साथ की गई फिल्मों के बारे में क्या कहेंगे? अभिमान, मिली, चुपके चुपके, देव, मैं आजाद हूं को किस श्रेणी में डालेंगे! साथ-साथ दूसरे मिजाज की फिल्में भी आती रही हैं।
आप हमेशा कहते हैं कि मुझे जब जो मिला, मैंने किया..। इस तरह कहीं न कहीं आप अपने योगदान से किनारा कर लेते हैं?
मैंने कुछ नहीं किया। किया उन लोगों ने, जिन्होंने इसे लिखा और बनाया। मैं केवल एक कलाकार था। रास्ते पर खड़ा था। बस स्टैंड पर खड़ा था। बस आई, उस पर बैठ गया। जिस तरह की कहानी हमारे सामने आएगी, उसमें भाग लेने की क्षमता होगी, तो हम काम करेंगे, लेकिन सारा श्रेय उन्हें ही मिलना चाहिए.., वे सलीम-जावेद हों, या मनमोहन देसाई हों, या प्रकाश मेहरा हों या रमेश सिप्पी, यश चोपड़ा, करण जौहर या आदित्य चोपड़ा हों। ऐसा सोचना गलत है कि हम लोग परिवर्तन लाते हैं या ला सकते हैं। हम में इतनी क्षमता कहां कि परिवर्तन ला सकें!
इधर ढेर सारे युवा डायरेक्टों के साथ आपने फिल्में कीं। क्या खास फर्क नजर आया?
सिनेमा बदल गया है। आज कल ज्यादा जवान और समझदार लोग आ गए हैं। युवा डायरेक्टर पूरी तैयारी के साथ सेट पर आते हैं और अपने काम से जरा भी नहीं भटकते। उनके साथ यंग लोगों की टीम होती है। फिल्म मेकिंग में आए तकनीकी विकास से उन्हें मदद मिल रही है। युवा पीढ़ी इंटरनेशनल सिनेमा से परिचित है, इसलिए आप देखेंगे कि आज की फिल्में प्रस्तुति में इंटरनेशनल स्तर की हैं, लेकिन उन फिल्मों का मिजाज भारतीय है। सच तो यह है कि आज के भारत को ही ये निर्देशक फिल्मों में ला रहे हैं।

Friday, October 12, 2007

सल।म सलीम बाबा!




नॉर्थ कोलकाता में रहते हैं सलीम बाबा. दस साल की उम्र से वे सिनेमाघरों के बाहर फेंके फिल्मों के निगेटिव जमा कर उन्हें चिपकाते हैं और फिर चंद मिनटों की फिल्म टुकड़ियों की तरह अपने अ।सपास के बच्चों को दिखाते हैं. यह उनका पेशा है. यही उनकी अ।जीविका है. ऐसे ही फिल्में दिखाकर वे पांच बच्चों के अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं.
चवन्नी को पता चला कि टिम स्टर्नबर्ग ने उन पर 14 मिनट की एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म 'सलीम बाबा' बनायी है. यह डॉक्यूमेंट्री फिल्म ऑस्कर भेजी गयी थी. खुशी की बात है कि 'सलीम बाबा' अंतिम अ।ठ की सूची में अ। गयी है. अगर ज्यूरी को पसंद अ।ई तो यह नामांकित भी होगी. 'सलीम बाबा' का पूरा नाम सलीम मोहम्मद है. उन्हे अपने पिता से यह प्रोजेक्टर विरासत में मिला है. इसे हाथ से चलाया जाता है. सलीम बाबा की फिल्में देखने बच्चे जमा होते हैं. सिनेमाघरों में जाकर फिल्में देख पाने में असमर्थ बच्चे अपने चहेते स्टारों की चंद झलकियां या फिल्म टुकड़ियां देख कर ही मस्त हो जाते हैं.
सलीम बाबा के पास जो हस्तचालित प्रोजेक्टर है, उस पर भी विदेशियों की नजर है. ऐसे प्रोजेक्टर दुनिया में बहुत कम बचे हैं. सलीम बाबा को इसकी मुंहमांगी कीमत मिल सकती है, लेकिन सलीम बाबा हैं कि इसे खुद से अलग नहीं करना चाहते. वे चाहते हैं कि उनके बेटे भी इस विरासत को अ।गे ले जांए. अभी उनके बेटे मदद करते हैं. लेकिन फिल्में जिस तरह से डिजीटल हो रही हैं… उस स्थिति में कुछ सालों के बाद उन्हें फिल्मों के निगेटिव कहां से मिलेंगे?
'सलीम बाबा' वास्तव में सिनेमा के विकास की जिंदा कड़ी हैं. चवन्नी सलीम बाबा को सलाम करता है और चाहता है कि उनका प्रोजेक्टर सुरक्षित रहे और वह सिनेमा के मनोरंजन से वंचित बाल-बच्चों को सिनेमा से जोड़े रखे. चवन्नी टिम स्टर्नबर्ग को बधाई देता है. वह चाहता है कि 'सलीम बाबा' पहले ऑस्कर की डॉक्यूमेंट्री श्रेणी में नामांकित हो और फिर अंतिम पुरस्कार भी हासिल करे.

सलाम सलीम बाबा !

शुक्रवार,१२ अक्टूबर, 2007


लो आ गया सुहाना शुक्रवार.आज प्रियदर्शन की फिल्म भूल भुलैया और प्रदीप सरकार की लागा चुनरी में दाग रिलीज हो रही हैं.प्रियदर्शन की फिल्म पहले तमिल और मलयालम में बन चुकी है और चवन्नी को किसी ने बताया कि दोनों भाषाओं में यह सफल भी रही थी.देखना है कि हिंदी में क्या हश्र होता है.चवन्नी को तो अजय ब्रह्मात्मज की समीक्षा का इंतज़ार है.वैसे इस बार प्रियदर्शन ने अक्षय कुमार,परेश रावल और राजपाल जैसे पालतू कलाकारों के साथ ही शाइनी आहूजा और विद्य बालन को जोडा है.

विद्य बालन इधर आ गयीं और उधर अपने पहले निर्देशक प्रदीप सरकार की फिल्म लगा चुनरी में दाग छोड दी.इस फिल्म में दादा ने उन्हें कोंकणा का रोल दिया था.लगा चुनरी में दाग बनारस की पृष्ठभूमि पर बनी पारिवारिक फिल्म है.दो बहने हैं.बड़ी को परिवार की जिम्मेदारी संभालनी पड़ती है ताकि छोटी पढ़ाई कर सके.बड़ी ज़िन्दगी की अँधेरी गुफाओं में समां जाती है और फिर जब एक बार छोटी को उसकी सच्चाई कि जानकारी मिलती है तो उसे अपना वजूद सालने लगता है.

दादा प्रदीप सरकार से उम्मीद है कि वे एक पारिवारिक फिल्म दिखायेंगे.

इस हफ्ते शाहरुख़ खान ओम शांति ओम की टीम के साथ रैंप पर उछल-कूद करते रहे.चवन्नी ने अपना असमंजस कल आपके सामने रखा ही था.अरे हाँ आशुतोष गोवारिकर की जोधा अकबर और आमिर खान की तारे ज़मीन पर के ट्रेलर एक साथ सिनेमाघरों में पहुंच रहे हैं.कुछ लोग इसे दोस्तो के मुक़ाबले के रूप में पेश कर रहे हैं.फिर से आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार रहेगा.

Thursday, October 11, 2007

रैंप पर क्यों चलते हैं सितारे ?

माफ करें, चवन्नी नहीं समझ पाता कि किसी फिल्म की रिलीज के पहले उस फिल्म के सितारों के रैंप पर चलने से क्या फायदा होता है? क्या फिल्म के दर्शक बढ़ जाते है अगर ऐसा होता तो 'सलाम-ए-इश्क' का सल।म दर्शकों ने कुबूल किया होता. अभी हाल में शाहरुख खान रैंप पर दिखे. वे अकेले नहीं थे. उनकी पूरी यूनिट अ।ई थी और फिर से माफ करें ... अपने हाव, भाव और फोटो के लिए दिए गए अंदाज से साफ लगा कि वे अ।ठवें दशक के कलाकारों के मैनरिज्म का मजाक उड़ा रहे हैं.
फराह खान और शाहरुख खान को लगता है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का अ।ठवां दशक ही बॉलीवुड है. उनकी यह समझ विदेश की यात्राओं और विदेशियों की सोच से बनी है. अगर हिंदी फिल्मों के अ।म दर्शक से बॉलीवुड का मतलब पूछें तो शायद वह बता ही नहीं पाए. चवन्नी को बॉलीवुड शब्द पसंद नहीं है. इससे एक तरफ हीन भावना और दूसरी तरफ हेय भावना प्रकट होती है.
शाहरुख खान और फराह खान 'ओम शांति ओम' को बेचने के तमाम हथकंडे अपना रहे हैं. इसमें कोई बुराई नहीं है. फेरीवाला भी अ।वाज देता है तभी हम समझ पाते हैं कि वह गली में अ। गया है. मछली बाजार है फिल्म इंडस्ट्री ... निश्चित ग्राहकों को भी बुलाने के लिए अ।वाज देने की अ।दत पड़ गयी है. अब तो लुभाने, फंसाने और दिखाने के नए.-नए उपकरण अ। गए हैं, फिर भी दर्शक बच जाते हैं. चवन्नी के साथी दर्शक होशियार हो गए हैं. वे सूंघ लेते हैं और सिनेमाघरों का रूख ही नहीं करते . फिर सलमान हों या शाहरुख . . .

Wednesday, October 10, 2007

चालू हो गया आमिर खान का वेब साईट


चवन्नी ने कल आप को एक दुख भरी खबर के साथ ही सुखद सूचना दी थी.उस सूचना के अनुसार आज ठीक १२ बज कर १ मिनट पर आमिर खान ने अपना वेब साईट आरम्भ कर दिया.यह वेब साईट अन्य फिल्म स्टारों की तरह केवल दिखाने या लुभाने के लिए नहीं है.आप अगर पंजीकरण कर लेते है तो आप आमिर खान से बात कर सकते हैं.आमिर ने वादा किय है कि वे बार-बार यहाँ आएंगे और सभी से बातचीत करेंगे.आमिर बहस के लिए भी तैयार हैं.
चवन्नी के कुछ पाठकों को लग सकता है कि ऐसा क्या है कि चवन्नी हमेशा आमिर की ही बातें करता है.चवन्नी को लगता है कि अगर कोई स्तर अपने प्रशंसकों से बहस और बातचीत के लिए तैयार है तो उसकी जानकारी हिंदी के प्रशंसकों और पाठकों को भी मिलनी चाहिऐ.अब आप ही कहो कि आप ऐसा मौका गंवाना चाहेंगे.
आमिर खान के वेक साईट पर फिलहाल चैट और ब्लॉग के लिंक शुरू किये गए हैं.आज रात में ९ से १० के बीच आमिर चैट रूम में रहेंगे.सोच क्या रहे हैं ,लौग कीजिये अपना सवाल रखिये .अपनी जिज्ञाशाएं शांत कीजिये।
आमिर खान के वेक साईट का पता है...http://www.aamirkhan.com/

Tuesday, October 9, 2007

बंद हुआ आमिर खान का ब्लॉग


चवन्नी बडे दुख के साथ आप को बता रह है कि आमिर खान ने अपने ब्लॉग को बंद करने का फैसला ले लिया है.उनहोंने अपने आख़िरी ख़त में लिखा है कि उन्हें भी इस बात के बेहद तकलीफ है,क्यों कि ब्लॉग के जरिये कई नए दोस्त बने थे और कुछ नयी बातें सामने आयी थीं.आमिर ने लिखा है कि एक तो उनके पास समय नही है और फिर ब्लॉग का बैंडविड्थ भी नही मिल पायेगा.हम सभी जानते हैं कि काम के पक्के आमिर खान एक बार में एक ही काम करते हैं और पूरे मनोयोग से करते हैं.जैसे अगर वह आप से मिल राहे हैं तो उनका पूरा ध्यान सिर्फ आप पर रहता है.
इस दुख भरी खबर से चवन्नी भी काफी दुःखी हुआ था...आमिर थोड़े मजाकिया मिजाज के आदमी हैं.उनहोंने ब्लॉग पर लिखे अपने आख़िरी ख़त में एक लम्बा स्पेस देने के बाद बताया है कि अब उनका ब्लॉग नयी जगह पर जा रह है और उसका नया पता होगा.यहाँ पर और भी कई खूबियां रहेंगी.आमिर अपना वेब साईट लेकर आ राहे हैं.उस वेब साईट का चैट रूम चौबीस घंटे खुला रहेगा.वहाँ आमिर कभी बता कर तो कभ बिना बताये आएंगे और सभी से बातें करेंगे.अगर कोई दिलचस्प बात कर रह होगा तो वे उसके साथ चैट रूम में अलग से बात करेंगे।
http://www.aamirkhan.com/ वेब साईट आज रात मध्य रात्री में आरम्भ होगा.आमिर कल पहली बार यहाँ लाइव चैट करेंगे.अगर बातचीत करनी हो तो आज रात में ही अपना पंजीकरण कर लें.ज्यादा जानकारी के लिए उनके ब्लॉग पर जाएँ.यह आज रात ११.५९ तक चालू रहेगा.ब्लॉग देखने के लिए चवन्नी के लिंक्स में आमिर खान का नाम देखें.

Monday, October 8, 2007

जोधा अकबर की पहली झलक

चवन्नी को याद नही कि कभी किसी निर्माता या निर्देशक ने अपनी फिल्म के ट्रेलर बेखने के लिए मीडिया को औपचारिक निमंत्रण दिया हो.आशुतोष गोवारिकर ने १० तारीख को ट्रेलर देखने का निमंत्रण भेजा है.जोधा अकबर में ऐश्वर्या राय जोधा की भूमिका निभा रही हैं और अकबर बने हैं हृतिक रोशन .यह फिल्म पहले १२ अक्तूबर को रिलीज होने वाली थी.अब यह अगले साल आएगी.१० तारीख को पहली झलक देखने के बाद चवन्नी आप को ट्रेलर के बारे में बतायेगा.

जॉन-बिपाशा:अंतरंग पल












जॉन अब्राहम और बिपाशा बसु को लेकर पत्र-पत्रिकाओं में तरह-तरह की बातें छपती रहती हैं.कुछ गॉसिप लेखक दोनों को अलग करने में तुले हैं.चवन्नी दोनों से अलग-अलग और एक साथ भी मिल चूका है.दो अंतरंग प्रेमियों की भाव और दैहिक मुद्राओं से कोई अनुमान लगा सकता है कि प्रेमियों के संबंध कितने गहरे हैं.ठीक है कि दोनों ऐक्टर हैं,लेकिन दोनों मनुष्य भी तो हैं।
चलिए चवन्नी आप के लिए दोनों के अंतरंग पलों को बयां करती तसवीरें ले आया है.ये तसवीरें बिपाशा बसु के ब्लोग से ली गयी हैं।
http://bipashabasunet।com/cms/ बिपाशा का पर्सनल वेब पोर्टल

Sunday, October 7, 2007

चवन्नी सर्वेक्षण

चवन्नी के पाठक बढ़ रहे हैं.यह तो खुशी की बात है.इस ब्लौग पर चवन्नी ने दो सर्वेक्षण किये.उसे अच्छा लगा कि पाठकों ने सर्वेक्षण में हिस्सा लिया।पहला सर्वेक्षण था.चवन्नी पर आने से क्या मिलता है? चार विकल्प थे.१.उपयोगी फिल्म समीक्षा,२.बढती है जिज्ञासा,३.मिलती है जानकारी और४.होती है सनसनी।सचमुच खुशी की बात है कि किसी पाठक को चवन्नी सनसनी नही देता.४१% को चवन्नी पर अजय ब्रह्मात्मज की फिल्म समीक्षा उपयोगी लगी.३४% ने मत दिया कि चवन्नी पढने से जिज्ञासा बढती है और २५% की राय में चवन्नी उनकी जानकारी बढाता है।दुसरे सर्वेक्षण में पूछा गया था कि सांवरिया और ओम शांति ओम में से आप पहले कौन सी फिल्म देखेंगे.तीसरा विकल्प था कोई नही.३०% ने कहा कि वे कोई फिल्म नहीं देखेंगे.चवन्नी अपने इन पाठकों की नाराजगी नहीं समझ पा रहा है. बहरहाल सांवरिया और ओम शांति ओम दोनों को बराबर मत मिले.दोनों फिल्मों को चवन्नी के पाठकों ने ३५-३५% मत दिए।चवन्नी अपने पाठकों को और सक्रिय रूप में देखना चाहता है।

Saturday, October 6, 2007

अच्छे विषय पर बुरी फिल्म है इट्स ब्रेकिंग न्यूज



-अजय ब्रह्मात्मज

अच्छे विषय पर बुरी फिल्म का उदाहरण है इट्स ब्रेकिंग न्यूज। मीडिया के बढ़ते प्रभाव और मीडिया में अपनाए जा रहे तरीकों पर सवाल उठाती यह फिल्म पटकथा और विषय की समझ के अभाव में शुरू से ही लड़खड़ा जाती है। हालांकि फिल्म के कुछ प्रसंगों से मीडिया के अंदर चल रही गतिविधियों से दर्शक परिचित और चकित होंगे। सच दिखाने का दावा करने वाले अंदरूनी तौर पर कितने झूठे और दिखावटी हो सकते हैं? मीडिया को बेनकाब करने और मीडिया कवरेज की मर्यादा पर सवाल उठाने में यह फिल्म नाकाम रहती है। फिल्म की मुख्य अभिनेत्री कोयल पुरी अपने किरदार को निभाने में कमजोर साबित हुई हैं। फिल्म के नायक अभिमन्यु सिंह छोटी सी भूमिका में प्रभावित करते हैं। उन्हें अपनी संवाद अदायगी पर ध्यान देने की जरूरत है।

मुख्य कलाकार : कोयल पुरी, अभिमन्यु सिंह, हर्ष छाया, स्वाति सेन, शिशिर शर्मा
निर्देशक : विशाल ईनामदार
तकनीकी टीम : निर्माता-श्रेयस म्हासकर, पटकथा-जयंत पवार, संवाद-संजय मोरे, संगीत-कौशल ईनामदार

थ्रिलर व कॉमेडी के बीच पिस गयी गो


-अजय ब्रह्मात्मज

क्लिक..क्लिक.. यह है राम गोपाल वर्मा फ्लिक राम गोपाल वर्मा जितनी फिल्में बनाते हैं.. उनकी कंपनियों के नाम भी उतने ही हैं। कभी फैक्ट्री तो कभी आरजीवी फिल्म्स तो कभी यह फ्लिक.. इरादा क्या है? शायद दर्शकों को लगातार तंग करना..।
राम गोपाल वर्मा फ्लिक की गो के निर्देशक मनीष श्रीवास्तव हैं। उन्होंने इस फिल्म की योजना क्यों और कैसे बनाई, उसे रामू ने क्यों मंजूर किया? यह तो दोनों से मिल कर ही पूछा जा सकता है। फिलहाल फिल्म हमारे सामने है, जिसमें नायक अभय (गौतम) और नायिका वसु (निशा कोठारी) गा रहे हैं बैंड बजा दे। वो अपना तो क्या बैंड बजाएंगे.. दर्शकों का बैंड बजाने पर जरूर लगे हैं। शायद ये भी बता रहे हैं कि रामू का भी बैंड बज गया है।
दो युवा प्रेमी अपने माता-पिता से नाराज होकर घर से भागते हैं। उन्हें नहीं मालूम कि अनजाने में किन चंगुलों में फंसते जा रहे हैं। ऐसे विषय पर एक रोमांचक फिल्म बन सकती थी, लेकिन मनीष श्रीवास्तव कभी थ्रिलर तो कभी कॉमेडी का सहारा लेते दिखते हैं। हम सभी जानते हैं कि दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय.. गो भी चकनाचूर हो जाती है।
उम्दा एक्टर के।के. मेनन अधपके किरदार को निभाने में निराश करते हैं। गलती उनकी इतनी है कि उन्होंने रोल क्यों लिया? राजपाल यादव अब जॉनी लीवर के ट्रैक पर जा रहे हैं। अपने लाउड अभिनय से वह प्रशंसकों को दुखी कर रहे हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में अच्छे एक्टरों की हत्या का यह पुराना तरीका है। उन्हें कोशिश कर इस दुष्चक्र से बाहर आ जाना चाहिए।

मुख्य कलाकार : गौतम, निशा कोठारी, राजपाल यादव, गोविंद नामदेव, केके
निर्देशक : मनीष श्रीवास्तव
तकनीकी टीम : निर्माता-राम गोपाल वर्मा, गीत-स्वानंद किरकिरे, राहुल सेठ, संगीत-स्नेहा खानवलकर।

Friday, October 5, 2007

शुक्रवार, 5 अक्तूबर, 2007

चवन्नी की सलाह मानें तो इस हफ्ते किसी नयी फिल्म को देखने का जोखिम न उठाएं. 'इट्स ब्रेकिंग न्यूज', 'गो', 'छोड़ो न यार'और '50 लाख' फिल्में रिलीज हुई है. इनमें से '50 लाख' चवन्नी ने नहीं देखी है, इसलिए उसके बारे में कुछ भी कहना गलत होगा. बाकी तीन औसत से कमजोर फिल्में हैं. रामू कैंप की 'गो' का तो गाना ही है . बैंड बजा दे. लगता है राम गोपाल वर्मा अपना और अपनी टीम का बैंड बजा कर ही रहेंगे. चवन्नी निराश है, लेकिन हताश नहीं है. चवन्नी को उम्मीद है कि रामू 'सरकार राज' से लौटेंगे. 'इट्स ब्रेकिंग न्यूज' तो अ।पके धैर्य को ब्रेक करने वाली फिल्म है. कोयल पुरी को अभिनय की अच्छी और पूरी ट्रेनिंग लेनी चाहिए और अपना हिंदी उच्चारण भी दुरूस्त करना चाहिए. 'छोड़ो न यार' का शीर्षक ही बता देता है कि उसे दर्शकों से क्या उम्मीद है.

इस हफ्ते सुनील दत्त और नरगिस के जीवन पर लिखी नम्रता एवं प्रिया दत्त की लिखी किताब विमोचित हुई. बांद्रा के एक पंचसितारा होटल में अ।योजित इस कार्यक्रम में दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन, महेश भट्ट, संजय खान, सायरा बानो और दत्त दंपति के बेटे संजय दत्त अ।ए थे. किताब की जानकारी अगले हफ्ते देगा चवन्नी.

Tuesday, October 2, 2007

गांधी और फिल्म

{चवन्नी को अजय ब्रह्मात्मज का यह आलेख बापू की जयंती पर प्रासंगिक लगा।}

-अजय ब्रह्मात्मज
यह संयोग किसी फिल्मी कहानी की तरह ही लगता है। फैमिली फिल्मों में किसी संकट के समय नालायक बेटा कुछ ऐसा कर बैठता है, जिससे परिवार की प्रतिष्ठा बच जाती है। 'लगे रहो मुन्ना भाई' ऐसे ही नालायक माध्यम का सृजन है, जिसे गांधी जी बिल्कुल पसंद नहीं करते थे। उन्होंने फिल्मों के प्रति अपनी बेरूखी और उदासीनता छिपा कर नहीं रखी। समय-समय पर वे इस माध्यम के प्रति अपनी आशंका जाहिर करते रहे। फिल्में देखने का उन्हें कोई शौक नहीं था और वह फिल्मी हस्तियों के संपर्क में भी नहीं रहे। उनकी मृत्यु के 59सालों के बाद उसी माध्यम ने उन्हें फिर से चर्चा में ला दिया है। 'लगे रहो मुन्ना भाई' ने विस्मृति की धूल में अदृश्य हो रहे गांधी को फिर से प्रासंगिक बना दिया है। किशोर और युवा दर्शक गांधी के मूलमंत्र सत्य और अहिंसा से परिचित हुए हैं और जैसी खबरें आ रही हैं, उससे लगता है कि गांधी का दर्शन हमारे दैनिक एवं सामाजिक व्यवहार में लौट रहा है।
गांधी पुरातनपंथी नहीं थे, लेकिन तकनीकी आधुनिकता से उन्हें परहेज था। कुटीर उद्योग के हिमायती गांधी औद्यौगिकीकरण और नियमित जिंदगी में मशीन के उपयोग को अधिक जरूरी नहीं मानते थे। वह खुद पेंसिल से लिखना पसंद करते थे और अपने जीवनकाल में आ चुके टाइपरायटर को उन्होंने हाथ नहीं लगाया। खादी उनका प्रिय कपड़ा था। चलती-फिरती तस्वीरों से अधिक भरोसा वे छपे हुए शब्‌दों पर करते थे। फिल्म इंडस्ट्री और फिल्मी हस्तियों ने उनसे संपर्क करने और उनके विचार जानने की असफल कोशिशें की। सन्‌ 1927 में इंडियन सिनेमेटोग्राफ कमेटी ने उनकी राय जानने के लिए एक प्रश्नावली भेजी तो उन्होंने उसका नकारात्मक जवाब दिया। उन्होंने लिखा, 'मैं आपकी प्रश्नावली के उत्तर के लिए अनुपयुक्त व्यक्ति हूं। मैंने कभी कोई सिनेमा नहीं देखा और मैं इसके प्रभाव से अनभिज्ञ हूं। अगर इस माध्यम में कोई अच्छाई है तो वह अभी सिद्घ होना बाकी है।' कुछ सालों के पश्चात भारतीय सिनेमा की रजत जयंती के अवसर पर स्मारिका के संदेश के लिए जब उनसे आग्रह किया गया तो उनके सचिव ने लिखा, 'नियमत: गांधी केवल विशेष अवसरों पर संदेश देते हैं और वह भी ऐसे उद्देश्यों के लिए जिनके गुणों पर कोई संदेह न हो। सिनेमा इंडस्ट्री की बात करें तो इसमें उनकी न्यूनतम रुचि है और इस संदर्भ में किसी को उनसे सराहना की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।' अपनी पत्रिका 'हरिजन' में एक संदर्भ में उन्हों स्पष्ट लिखा, 'मैं तो कहूंगा कि सिनेमा फिल्म ज्यादातर बुरे होते हैं।'
गाधी जी के ऐसे विरोधी विचारों को देखते हुए ही ख्वाजा अहमद अब्‌बास ने उन्हें एक खुला पत्र लिखा था। इस पत्र में उन्होंने गांधी जी से फिल्म माध्यम के प्रति सकारात्मक सोच अपनाने की अपील की थी। अब्‌बास के पत्र का अंश है - 'आज मैं आपकी परख और अनुमोदन के लिए अपनी पीढ़ी के हाथ लगे खिलौने - सिनेमा को रखना चाहता हूं। आप सिनेमा को जुआ, सट्‌टा और घुड़दौड़ जैसी बुराई मानते हैं। अगर यह बयान किसी और ने दिया होता, तो हमें कोई चिंता नहीं होती ़ ़ ़ लेकिन आपका मामला अलग है। इस देश में या यों कहें कि पूरे विश्व में आपको जो प्रतिष्ठा मिली हुई है, उस संदर्भ में आपकी राय से निकली छोटी टिप्पणी का भी लाखों जनों के लिए बड़ा महत्व है। दुनिया के एक सबसे उपयोगी आविष्कार को ठुकराया या इसे चरित्रहीन लोगों के हाथों में नहीं छोड़ा जा सकता। बापू, आप महान आत्मा हैं। आपके हृदय में पूर्वाग्रह के लिए स्थान नहीं है। हमारे इस छोटे खिलौने सिनेमा पर ध्यान दें। यह उतना अनुपयोगी नहीं है, जितना दिखता है। इसे आपका ध्यान, आर्शीवाद और सहिष्णु मुस्कान चाहिए।'
ख्वाजा अहमद अबबास के इस आग्रह पर गांधी जी की प्रतिक्रिया नहीं मिलती। गांधीजी अपने विचार नहीं बदल सके। अगर वह आजादी के बाद के वर्षों में जीवित रहते और फिल्मों के प्रभाव को करीब से देख पाते तो निश्चित ही अपनी राय बदलते,क्योंकि गांधीजी अपने विचारों में कट्‌टरपंथी नहीं थे और दूसरों से सीखने-समझने के लिए हमेशा तैयार रहते थे।
भारतीय समाज और विश्व इतिहास में महात्मा गांधी के महत्व के संबंध में दो राय नहीं हो सकती। गांधी के सिद्घांतों ने पूरी मानवता को प्रभावित किया। बीसवीं सदी में दो विश्व युद्घों की विभीषिका के बीच अपने अहिंसक आंदोलन और सत्याग्रह से उन्होंने अनुकरणीय उदाहरण पेश किया। भारतीय मानस में गांधी अचेतन रूप से मौजूद हैं। आज कुछ शिक्षकों और समाजशास्त्रियों को लग रहा है कि 'लगे रहो मुन्नाभाई' की वजह से गांधी पुनर्जीवित और प्रासंगिक हो गए हैं। सिनेमा के तात्कालिक प्रभाव को महत्वपूर्ण समझ रहे विश्लेषकों को यह नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय समाज में अप्रत्यक्ष रूप से मौजूद गांधी के विचारों को ही राजकुमार हिरानी ने रेखांकित किया है। राजकुमार हीरानी के प्रयास को कम किए बगैर हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि गांधी की विचारों की स्वीकृति के पीछे उन विचारों की महानता ही है। कल्पना करें, यदि गांधी इतने लोकप्रिय और हर दिल में मौजूद नहीं रहते तो क्या 'लगे रहो मुन्नाभाई' का यही प्रभाव होता ़ ़ ़ कतई नहीं होता।
हां, गांधीवाद को गांधीगिरी का नाम देकर राजकुमार हीरानी ने गांधी के सिद्घांतों को आम बना दिया। मुन्नाभाई गुंडागिरी के तर्ज पर गांधीगिरी का शब्‌द का इस्तेमाल करता है और अपनी मासूम मुस्कान से हमारे दिल में जगह बना लेता है। दिल का भला यह मुन्ना बहुत पहले कभी राजू नाम से रुपहले पर्दे पर आता था और अपनी ईमानदारी से हमें रुलाता और प्रेरित करता था। राज कपूर ने वो राजू की छवि को ही अपनी फिल्मों में भुनाया, जो परिस्थिति का शिकार है, लेकिन अपनी दुष्टताओं के बावजूद नेकदिल इंसान है।
राजकुमार हीरानी ने गांधी के किरदार की फंतासी गढ़ी और फिल्म की पटकथा में ऐसा पिरोया कि वह पर्दे पर आने के वक्त भी खटकता नहीं है। ऐसा लगता ही नहीं कि वह फिल्म के अन्य किरदारों की तरह हाड़-मांस का बना व्यक्ति है। 'लगे रहो मुन्नाभाई' में गांधी जी हैं और नहीं भी हैं। साक्षात दिखते समय भी मुन्ना उनको छू नहीं सकता, क्योंकि वह मुन्ना के दिमाग में हैं। उसके दिमाग का केमिकल लोचा ही दर्शकों के दिमाग में लोचा पैदा करता है और हम सभी गांधी से प्रभावित होकर सिनेमाघरों से निकलते हैं।
गांधी जी के परपोते तुषार गांधी ने 'गांधीगिरी' शब्‌द के प्रयोग पर सहमति जतायी और बिल्कुल सही कहा कि अगर गांधी जी आज जीवित होते तो शायद अपने सिद्घांतों के लिए गांधीगिरी शब्‌द का ही इस्तेमाल करते। गांधीगिरी में गांधीवाद के तत्व नहीं बदले हैं। सत्य और अहिंसा कारगर अस्त्र हैं गांधीवाद के और 'लगे रहो मुन्नाभाई' में उनका असर दिखता है।

Monday, October 1, 2007

बिंदास बिपाशा बसु


बिपाशा बसु से चवन्नी की चंद मुलाकातें हैं. सब से पहले एतबार के सेट पर मुलाकात हुई थी और खूब लंबी बात हुई थी.बिपाशा की कही बातें चवन्नी अभी तक नहीं भूल सका है.अरे भूल गया पहली मुलाकात तो बांद्रा के एक फ्लैट में हुई थी,जहां वह पेइंग गेस्ट के तौर पर रहती थी.फिल्मों में आए अभी ज्यादा वक्त नहीं हुआ था.बांद्रा में महबूब स्टूडियो की पीछे की गलियों में एक छोटे फ्लैट में उसने डेरा डाला था.तब उसकी अजनबी पूरी हो गयी थी.करीना कपूर ने कुछ उल्टा-सीधा बोल दिया था. अपनी करीना न ...चवन्नी को दिल की साफ लगती है.उसे जो समझ में आता है...बोल देती है.उसकी बातें जाहिर है उसकी समझ से तय होती हैं.कपूर खानदान की टूटे परिवार की लड़की की सोच की कल्पना चवन्नी कर सकता है.एक बातचीत में उसने चवन्नी को बताया था कि वह रोल पाने के लिए किसी डायरेक्टर के घर जाकर खाना नहीं बनाती या शॉपिंग पर नहीं जाती.अरे...रे..रे.. चवन्नी क्या बताने लगा.वैसे रोल हथियाने और पाने के लिए लड़कियां क्या -क्या करती हैं...इस पर कभी अलग से चवन्नी लिखेगा.
तो बात हो रही थी बिपाशा की.बिपाशा छोटी उम्र में ही दुनियादार हो गयी.वह खुद मुंबई आयी और उसने फैशन एवं मॉडलिंग की दुनिया में कदम रखा.सफलता मिली और अपने बिंदासपन को उसने हथियार बना लिया. जल्दी ही उसे अब्बास-मस्तान की फिल्म अजनबी मिल गयी.फिर उसने पलट कर नहीं देखा.संभल-संभल कर वह आगे बढ़ती गयी.उन दिनों डिनो मोरिया उसके दोस्त थे.चवन्नी को मालूम है कि कैसे अपनी पहली फिल्म एतबार में जॉन अब्राहम पहली मुलाकात में ही बिपाशा के दीवाने हो गए थे.वह दीवानगी आशिकी में बदली और फिर उनके प्रेम के सार्वजिनक किस्सों से सभी वाकिफ हुए.बिपाशा में गहन आत्मविश्वास है और यह आत्मविश्वास उसमें कामयाबी के पहले से है.उसने चवन्नी को एक छोटी,लेकिन बहुत ही खास बात कही थी कि जब मेरी उम्र की लड़कियां प्रेम पत्र लिखना सीख रही होती है,तब मैं जिंदगी के दांव-पेंच सीख रही थी.अपनी उम्र से पहले वयस्क हो गयी बिपाशा बसु को आप कितना जानते हैं या समझते हैं?