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Sunday, September 30, 2007

ऑस्कर के लिए मारामारी


ऑस्कर के लिए परेशान हैं सभी.चवन्नी की समझ में नहीं आ रहा है कि विदेशी पुरस्कार के लिए एेसी मारामारी क्यों चल रहीं है?याद करें तो ऑस्कर पुरस्कारों की विदेशी भाषा श्रेणी की नामांकन सूची में लगान के पहुंचने के बाद सभी भारतीय फिल्मकारों को लगने लगा है कि उनकी फिल्म इस प्रतियोगिता के लिण अवश्य भेजी जानी चाहिए.अस साल एकलव्य भेजी जा रही है या यों कहें कि भेजी जा चुकी है,लेकिन धर्म की निर्देशक भावना तलवार को लगता है िक एकलव्य के निर्माता निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा ने अपने प्रभाव से अपनी फिल्म को चुनवा लिया.फिल्म इंडस्ट्री तो क्या हर क्षेत्र में इस तरीके के मैनीपुलेशन चलते हैं.
आइए,आाप को किस्सा सुनाते हैं.ऑस्कर के नियमों के मुताबिक हर देश से एक फिल्म िवदेशी भाषा श्रेणी के पुरस्कार के लिए भेजी जा सकती हैणयमं तो हर साल एक फिल्म जाती है,लेकिन लगान के नामांकन सूची में पहुंचने के बाद फिल्म इंडस्ट्री और आम लोग इस पुरस्कार के प्रति जागरूक हुए.भारत से फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया ही ऑस्कर के लिए भेजी जाने वाली फिल्म का चुनाव करती है.इस कार्य के लिए एक ज्यूरी बनायी जाती है.इस ज्यूरी में फिलहाल मुंबई के ज्यादा सदस्य हैं.इस वजह से हर साल हिंदी फिल्म का पलड़ा भारी रहता है.दक्षिण भारत की प्रमुख चार भाषाओं मलयालम,तेलुगु,जमिल और कन्नड़ को सही प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता.बंगाली,उड़िया,असमिया और अन्य भाषाओं के निर्देशकों को मालूम ही नहीं हो पाता कि कब चयन प्रक्रिया अारंभ हुई?एक समस्या यह भी है कि िनर्दशक चाहता है,लेकिन निर्माता यत्किंचित कारणों से रुचि नहीं लेता.अब जैसे कि लोग और अनुराग कश्यप चाहते थे कि उनकी फिल्म ब्लैक फ्रायडे जाती,लेकिन निर्माता की लापरवाही से फिल्म जमा ही नहीं की गयी.
विवाद के ठोस कारण हैं.एक तो ज्यूरी के गठन और उनके चयन में पारदर्शिता नहीं है.सभी को लगता है कि चयन की प्रक्रिया पारदर्शी होने के साथ ही सही ढंग से सूचित की गयी हो.एक विचार यह भी आ रहा है कि हर साल राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त श्रेष्ठ फिल्म को ही ऑस्कर के लिए भेजा जाए.
इस साल की फिल्मों का तो आलम यह है कि एकलव्य और धार्मर् को दर्शकों ने नकार दिया था.दोनों दुहाई दे रहे हैं कि उनकी फिल्मों की विदेशामं में खूब सराहना हुई थी और हो रही है.आाप बताएं...आप क्या सोचते हैं?

Saturday, September 29, 2007

दीवाली के दिन टकराएगी सांवरिया से ओम शांति ओम


-अजय ब्रह्मात्मज

नवंबर महीने में 9 तारीख को दो बड़ी फिल्में आमने-सामने होंगी। दोनों ही फिल्मों के शुभचिंतकों की राय में इन फिल्मों को टकराना नहीं चाहिए था। इस टकराहट से दोनों का नुकसान होगा, लेकिन वहीं कुछ ट्रेड विशेषज्ञों की राय में दोनों ही फिल्मों को दर्शक मिलेंगे। इन दिनों दर्शक इतने संपन्न हो गए हैं कि फिल्में अच्छी हों, तो वे पैसे जेब से निकाल ही लेते हैं।
रिलीज डेट 9 नवंबर ही क्यों?
इस बार 9 नवंबर को दीवाली है और उस दिन शुक्रवार भी है। त्योहार के दिनों में फिल्में रिलीज हों, तो उन्हें ज्यादा दर्शक मिलते हैं। त्योहार की छुट्टियों में मौज-मस्ती और मनोरंजन के लिए सिनेमा से अधिक सुविधाजनक कोई माध्यम नहीं होता। बड़े शहरों में लोग सपरिवार फिल्में देखने जाते हैं। मल्टीप्लेक्स बनने के बाद तो सपरिवार फिल्म देखने की प्रवृत्ति महानगरों में और बढ़ी ही है। फिल्म वितरक, प्रदर्शक और आखिरकार निर्माताओं के लिए रिलीज के सप्ताहांत में दर्शकों की भीड़ मुनाफा ले आती है। संजय लीला भंसाली की सांवरिया की रिलीज की तारीख पहले से तय थी। फराह खान की ओम शांति ओम भी उसी दिन रिलीज करने की योजना बनी। बीच में ऐसी खबरें आई कि परस्पर सहमति से दोनों अपनी फिल्में आगे-पीछे कर लेंगे।
दोनों फिल्मों का इंतजार है दर्शकों को
यह तय कर पाना और अभी से बता पाना मुश्किल है कि सांवरिया और ओम शांति ओम में किसे अधिक दर्शक मिलेंगे! दोनों ही फिल्में हिट होंगी। अब देखना यह है कि कौन बड़ी हिट साबित होती है। दर्शकों को दोनों ही फिल्मों का इंतजार है। इस इंतजार के अलहदा कारण हैं। सांवरिया का सबसे बड़ा आकर्षण संजय लीला भंसाली हैं। अपनी फिल्मों से भंसाली ने फिल्म इंडस्ट्री और दर्शकों के दिल में ऐसी जगह बना ली है कि सभी को उनकी फिल्मों का इंतजार होने लगा है। ऐसी उम्मीद रहती है कि कुछ नया और अद्भुत देखने को मिलेगा उनकी फिल्म में। इसके अलावा, इस फिल्म में रणवीर कपूर और सोनम कपूर के प्रति दर्शकों की जिज्ञासा लगभग अभिषेक बच्चन और करीना कपूर की पहली फिल्म रिफ्यूजी जैसी ही है। दूसरी तरफ फराह खान की ओम शांति ओम का सबसे बड़ा आकर्षण शाहरुख खान हैं। चक दे इंडिया की कामयाबी का श्रेय ले रहे शाहरुख की लोकप्रियता ही उनकी फिल्मों के लिए दर्शक जुटाने के लिए पर्याप्त होगी। उल्लेखनीय है कि शाहरुख और फराह खान की जोड़ी की पिछली फिल्म मैं हूं ना सफल रही थी। वह सफलता फिर से दोहराई जा सकती है। फिर इस फिल्म से बैडमिंटन खिलाड़ी प्रकाश पादुकोण की बेटी दीपिका पादुकोण लॉन्च हो रही हैं। माना जा रहा है कि हाल-फिलहाल में इतनी हॉट अभिनेत्री का आगमन नहीं हुआ है। शाहरुख खान भी मानते हैं कि फिल्म ओम शांति ओम की कामयाबी दीपिका पादुकोण के लिए अहम है।
ट्रेड विशेषज्ञों की राय
ट्रेड विशेषज्ञ तरण आदर्श दोनों ही फिल्मों की सफलता को लेकर आश्वस्त हैं। वे कहते हैं, दोनों ही फिल्में चलेंगी। चूंकि दोनों ही फिल्में अच्छी दिख रही हैं और दोनों के साथ जबरदस्त आकर्षण जुड़े हैं, इसलिए मैं आश्वस्त हूं कि दोनों फिल्में चलेंगी। लेकिन क्या दर्शक एक ही हफ्ते में दो बड़ी फिल्में देखना चाहेंगे? क्यों नहीं? दीवाली का त्योहार है। खुशी का माहौल रहेगा। ऐसे में दो फिल्में देखना उनकी जेब पर भारी नहीं पड़ेगा। दोनों ही फिल्मों से भरपूर मनोरंजन की उम्मीद पूरी होगी। फिल्म ट्रेड से जुड़े लोगों की आम राय यही है कि दोनों फिल्मों की एडवांस बुकिंग अच्छी होगी। बाद में फिल्म की मेरिट के हिसाब से बिजनेस में दोनों फिल्में आगे-पीछे होंगी। कोमल नाहटा के शब्दों में, भंसाली और शाहरुख का नाम ही काफी है। दर्शक थिएटर में आएंगे और दोनों ही फिल्मों को देखने आएंगे। फिल्म पत्रकारों की राय में दोनों फिल्मों के प्रति दर्शकों का झुकाव देखना रोचक होगा। दर्शकों के झुकाव से ही सांवरिया और ओम शांति ओम का पलड़ा भारी होगा। इसके अलावा, दोनों की मार्केटिंग की रणनीति पर भी इन फिल्मों का व्यापार निर्भर करेगा।
मार्केटिंग की लड़ाई
संजय लीला भंसाली और शाहरुख खान दोनों एक-दूसरे को दोस्त मानते हैं और एक-दूसरे के लिए शुभकामनाएं भी दे रहे हैं। शाहरुख थोड़े ज्यादा खुल कर बोल रहे हैं, मैं संजय को शुभकामनाएं दे रहा हूं, लेकिन अपनी फिल्म के लिए डर भी रहा हूं। भंसाली और शाहरुख की दोस्ती और नेकनीयत पर किसी को संदेह नहीं हो सकता, लेकिन जाहिर है कि दोनों फिल्मों में पैसे निवेश कर चुकीं कंपनियां ऐसी दोस्ती नहीं निभा सकतीं। उन्हें दूसरे को पछाड़ना है। सांवरिया के साथ सोनी पिक्चर्स की इंटरनेशनल टीम है। चूंकि यह उनकी पहली हिंदी फिल्म है, इसलिए वे मार्केटिंग में कोई कोर-कसर नहीं रहने देंगे। खबर मिली है कि वे 1200 प्रिंट रिलीज करेंगे। ओम शांति ओम की मार्केटिंग इरोज पिक्चर्स कर रही है। इरोज का अपना तगड़ा मार्केटिंग नेटवर्क है। देश में लगभग 1200 प्रिंट्स और विदेशों में 300 से 400 पि्रंट्स रिलीज करने की उनकी योजना है। विदेशी दर्शकों के बीच शाहरुख की लोकप्रियता का फायदा उन्हें मिल सकता है। भंसाली विदेशों में उनसे कमजोर पड़ सकते हैं।
किसका पलड़ा भारी?
दोनों ही फिल्मों में कॉमर्शियल दृष्टिकोण से खूबियां ही खूबियां हैं। दोनों फिल्मों के स्टारों को लेकर अतुलनीय जिज्ञासा है। शाहरुख खान, दीपिका पादुकोण, रणवीर कपूर और सोमन कपूर को मोहक अंदाज में देखने के लिए दर्शक उतावले हैं। दोनों ही फिल्मों के निर्देशक बॉक्स ऑफिस पर कामयाब रहे हैं। हो सकता है कि दोनों ही फिल्मों का पलड़ा बराबर बना रहे और दर्शकों का दिल इस दीवाली में खुशी से जगमगा उठे।

Friday, September 28, 2007

राजनीतिक फिल्म है दिल दोस्ती एटसेट्रा


-अजय ब्रह्मात्मज
इस फिल्म का भी पर्याप्त प्रचार नहीं हुआ। फिल्म के पोस्टर और फेस वैल्यू से नहीं लगता कि दिल दोस्ती.. इतनी रोचक फिल्म हो सकती है। दिल दोस्ती.. लंबे अरसे के बाद आई राजनीतिक फिल्म है। इस फिल्म के राजनीतिक टोन को समझे बिना फिल्म को समझना मुश्किल होगा। ऊपरी तौर पर संजय मिश्रा (श्रेयस तलपड़े) और अपूर्व (ईमाद शाह) दो प्रमुख चरित्रों की इस कहानी में संवेदना की कई परते हैं। इस फिल्म को समझने में दर्शक की पृष्ठभूमि भी महत्वपूर्ण होगी। संजय मिश्रा बिहार से दिल्ली आया युवक है, जो छात्र राजनीति में सक्रिय हो गया है। दूसरी तरफ अपूर्व विभिन्न तबकों की लड़कियों के बीच जिंदगी और प्यार के मायने खोज रहा है। दिल दोस्ती.. विरोधी प्रतीत हो रहे विचारों की टकराहट की भी फिल्म है। मध्यवर्गीय मूल्यों और उच्चवर्गीय मूल्यों के साथ ही इस टकराहट के दूसरे पहलू और छोर भी हैं। निर्देशक मनीष तिवारी ने युवा पीढ़ी में मौजूद इस गूढ़ता, अस्पष्टता और संभ्रम को समझने की कोशिश की है। फिल्म अपूर्व के दृष्टिकोण से प्रस्तुत की गई है। अगर इस फिल्म का नैरेटर संजय मिश्रा होता तो फिल्म का अंत अलग हो सकता था।
फिल्म में गानों की गुंजाइश तो नहीं थी, लेकिन दिल दोस्ती.. के गाने अखरते नहीं हैं। कलाकारों में श्रेयस तलपड़े और ईमाद शाह ने चरित्रों को सही तरीके से निभाया है। श्रेयस की भाषा और बिहारी टोन में एकरूपता नहीं है। ईमाद शाह ने अपूर्व को उच्छृंखल होने से बचा लिया है। स्मृति मिश्रा उल्लेखनीय हैं। नई लड़की इशिता शर्मा की उपस्थिति दर्ज होती है। निकिता आनंद की अभिनय प्रतिभा संदिग्ध है।
पहले प्रयास में मनीष तिवारी आश्वस्त करते हैं और निश्चित रूप से अपने अनुभव को पर्दे पर उतारने में सफल रहे हैं। फिल्म में दिख रही दुविधा सिर्फ चरित्रों की दुविधा नहीं है। वह लेखक-निर्देशक की दुविधा भी है।

आनंद और रोमांच का संगम है जॉनी गद्दार

-अजय ब्रह्मात्मज


एक हसीना थी में श्रीराम राघवन की दस्तक फिल्म इंडस्ट्री और दर्शकों ने सुन ली थी। वह फिल्म बॉक्स आफिस पर गिर गई थी, लेकिन थ्रिलर का आनंद मिला था। उस आनंद और रोमांच को श्रीराम राघवन ने जॉनी गद्दार में पुख्ता किया है। जॉनी गद्दार एक तरफ विजय आनंद की थ्रिलर फिल्मों की याद दिलाती है तो दूसरी तरफ फिल्मों की नई शैली का परिचय देती है।
जॉनी गद्दार पांच व्यक्तियों की कहानी है। वे मिलकर कारोबार करते हैं। उनके गैंग को एक आफर मिला है, जिससे चार दिनों में उनकी किस्मत पलट सकती है। योजना बनती है, लेकिन पांचों में से एक गद्दारी कर जाता है। उस गद्दार की जानकारी हमें हो जाती है, लेकिन बाकी किरदार नावाकिफ रहते हैं। जॉनी गद्दार की यह खूबी दर्शकों को बांधे रहती है। घटनाओं का ऐसा क्रम नहीं बनता कि पहले से अनुमान लगाया जा सके। श्रीराम राघवन ने बार-बार चौंकाया है और हर बार कहानी में ट्विस्ट पैदा किया है।
श्रीराम राघवन की पटकथा और फिल्म का संपादन इतना चुस्त है कि संवाद की गति से दृश्य बदलते हैं। शार्प कट और बदलते दृश्यों की निरंतरता हिलने नहीं देती। कई प्रसंग ऐसे हैं, जहां दर्शक अपनी सुध भूल जाते हैं और फिल्म के दृश्यों में लीन हो जाते हैं। अनेक फिल्मों के बाद ऐसी फिल्म आई है, जो उलझाए रखती है और बाकी चिंताओं से काट देती है। एक अच्छी फिल्म की यही खूबी होती है। हम बेसुध होकर उसे देखते और आनंदित होते हैं। नए अभिनेता नील नितिन मुकेश का जोखिम काम आया है। आम तौर पर हिंदी फिल्मों के अभिनेता पहली फिल्म में रोमांटिक छवि पेश करते हैं और साथ में नाच-गाना एवं एक्शन के दृश्य रखते हैं। श्रीराम राघवन ने नील को ऐसा कोई दृश्य नहीं दिया है। उसकी मासूमियत बार-बार झटका देती है। हमें पता चलता है कि आवेश में व्यक्ति किस कदर क्रूर और हिंसक हो जाता है। छोटे-बड़े सभी कलाकारों का उम्दा अभिनय इस फिल्म की एक और ताकत है। धर्मेन्द्र, विनय पाठक, जाकिर हुसैन, रिमी सेन और अश्विनी कालसेकर ने अपने चरित्रों को बखूबी निभाया है। उन सभी के प्रयास से फिल्म अपने स्क्रिप्ट से ऊपर उठी है।
फिल्म का छायांकन, दृश्य परियोजना, संवाद और पा‌र्श्व संगीत उत्कृष्ट है और फिल्म के अनुरूप है। न जाने क्यों एडलैब ने इस फिल्म के प्रचार पर विशेष ध्यान नहीं दिया?

शुक्रवार, 28 सितंबर, 2007

इस हफ्ते श्रीराम राघवन की 'जॉनी गद्दार' और मनीष तिवारी की 'दिल दोस्ती एट्सेट्रा' फिल्में रिलीज हो रही हैं. श्रीराम राघवन की पिछली फिल्म 'एक हसीना थी' चवन्नी ने देखी थी. उस फिल्म से ही लगा था कि श्रीराम राघवन में पॉपुलर सिनेमा और थ्रिलर की अच्छी समझ है. अ।पको याद होगा कि अपने छोटे नवाब के एटीट्यूड में भी इसी फिल्म से बदलाव अ।या था, जिसकी परिणति 'ओमकारा' के लंगड़ा त्यागी में हुई. एक्टर को एक्टिंग से परिचित कराने का काम समर्थ डायरेक्टर करते रहे हैं. हृषीकेष मुखर्जी, गुलजार, महेश भट्ट जैसे फिल्मकारों ने समय-समय पर एक्टरों को नयी छवि दी और उन्हें खिलने के नए अ।याम दिए. धर्मेंद्र, राजेश खन्ना, संजय दत्त, जीतेन्द्र, हेमामालिनी, डिंपल कपाड़िया अ।दि एक्टरों की फिल्मों से डायरेक्टर के योगदान के इस पहलू को चवन्नी ने समझा.
बहरहाल, श्रीराम राघवन की 'जॉनी गद्दार' थ्रिलर फिल्म है. एक ऐसा थ्रिलर , जिसमें दर्शकों को मालूम है कि गद्दार कौन है? लेकिन दर्शक भी उसकी अगली हरकत से चौंकते हैं. कहते हैं, श्रीराम राघवन ने बेहद चुस्त फिल्म बनायी है. चवन्नी को अजय ब्रह्मात्मज की समीक्षा का इंतजार है.
दूसरी फिल्म 'दिल दोस्ती एट्सेट्रा' के निर्देशक मनीष तिवारी हैं. मनीष तिवारी पटना से चले और फिर दिल्ली से विदेश होते हुए मुंबई पहुंचे. अध्ययन, शोध और सामाजिक बदलाव में विशेष रुचि रखाने वाले मनीष तिवारी को मुंबई में प्रकाश झा की संगत या यों कहें की कंपनी मिल गयी. प्रकाश झा उनकी फिल्म के निर्माता हैं. 'दिल दोस्ती एट्सेट्रा' वास्तव में देश में मौजूद विभिन्न सोव और विचाराधाराओ की टकराहट की फिल्म है. चवन्नी चाहेगा कि मनीष तिवारी की अपनी बातें यहां पेश करे. उन्होंने इस फिल्म के संबंध में अपने विचार 'पैशन फॉर सिनेमा' पर प्रगट किए हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय की पृष्ठभूमि पर बनी 'दिल दोस्ती एट्सेट्रा' एक स्तर पर राजनीतिक फिल्म है. चवन्नी ऐसे फिल्मकारों क। समर्थक है, जो समाज और राजनीति से अपनी फिल्मों में दो-चार होते हैं. हमारे दृष्टिकोण में फर्क हो सकता है, लेकिन दृष्टि समाज पर होनी चाहिए.
26 सितंबर को देव अ।नंद की पुस्तक 'रोमांसिंग विद लाइफ' दिल्ली में मनमोहन सिंह ने विमोचित की. अगले दिन 27 सितंबर को मुंबई में फिर से विमोचन हुअ।. इस बार विमोचक अमिताभ बच्चन थे और इस विमोचन समारोह में अनेक फिल्मी हस्तियां अ।ई थीं. चवन्नी भी उनकी मौजूदगी में रोमांचित हुअ।, लेकिन उसे एक ही सवाल सालता रहा कि देव अ।नंद तो हिंदी फिल्मों के स्टार हैं, फिर उन्होंने अपनी अ।त्मकथा अंग्रेजी में क्यों लिखी? क्या कोई चीनी एक्टर अपनी अ।त्मकथा अंग्रेजी में लिखेगा? या कोई अमेरिकी एक्टर हिंदी में अपनी अ।त्मकथा प्रकाशित करेगा ? चवन्नी को ऐसे सवाल परेशान करते हैं.

रणबीर कपूर को जन्मदिन की बधाई


चवन्नी की मुलाकात रणबीर कपूर से हो गई.जी हां,उनका नाम हिंदी में रणबीर लिखा जाएगा.कुछ लोग रणवीर तो कुछ लोग रनबीर लिख रहे थे.कल चवन्नी ने उनसे पूछा तो उन्होंने अपना नाम रणबीर लिखा.और चवन्नी को आपको यह बताते हुए खुशी हो रही है कि आज यानी 28 सितंबर को रणबीर कपूर का जन्मदिन है. उन्हें जन्मदिन की बधाई.और हां,चैनल वालों की तरह बात करें तो आप यह याद रखिएगा कि चवन्नी ने सबसे पहने उनका सही नाम और उनके जन्मदिन के बारे में आप को बताया था.
रणबीर का आत्मविश्वास उनकी बातों से छलकता है.कपूर खानदान के इस लड़के को मालूम है कि उनसे लोगों की अपेक्षाएं बहुत ज्यादा हैं.
उन्हें मालूम है कि आरके बैनर के वारिस के तौर पर उन्हें प्रस्तुत किया जा रहा है.वे मानसिक रूप से इसके लिए तैयार हैं.छोटी सी मुलाकात में रणबीर ने भरोसा दिलाया कि आरके बैनर को सक्रिय किया जाएगा.रणबीर ने तो यह भी कहा कि एक दिन वह फिल्म निर्देशित भी करेगा.शायद आप नहीं जानते हों कि राज कपूर का पूरा नाम रणबीर राज कपूर था.ऋषि कपूर ने अपने बैटे को पिता का नाम दिया.चवन्नी चाहता है कि रणबीर अपने दादा का मुकाम हासिल करे.रणबीर की तैयारी अच्छी है और उसका दिमाग ठिकाने पर है.चवन्ली कई स्टारपुत्रों से मिल चुका है और अपने अनुभवों के आधार पर कह सकता है कि रणबीर में विनम्रता है.मुंबई के पले-बढ़े एक्टरों की तरह छूटते ही वह अंग्रेजी नहीं बोलने लगता.चवन्नी इन दिनों हिंदी बोलने को भी एक कौशल और गुणा के तौर पर लेता है.आप हाल देख ही रहे हो...सवाल हिंदी में पूछे जाते हैं और एक्टर जवाब अंग्रेजी में देते हैं.भाई... ऐसी स्थिति में चवन्नी हिंदी बोलना एक बड़ा गुण मानता है.
चवन्नी ने रणबीर से ढेर सारी बातें की हैं.फिल्म की रिलीज के समय कुछ बातें लिखेगा चवन्नी.रणबीर के मन में संजय लीला भंसाली के लिए अपार श्रद्धा है.आप कह सकते हैं या सोच सकते हैं िक संजय ने उन्हें फिल्म दी है तो यह स्वाभाविक है.चवन्नी यही बताना चाहता है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री एहसानफरामोशों से भरी है.
बहरहाल,चवन्नी की तरह आप भी रणबीर को शुभकामनाएं दें.

Thursday, September 27, 2007

फिल्म कैसे बनती है - ख्वाजा अहमद अब्बास


हर बार जब तुम अच्छी फिल्म देखने के लिए टिकट खरीदते हो तो तुम अच्छी फिल्मों के निर्माण में सहायक होते हो और जब बुरी फिल्म का टिकट खरीदते हो तो बुरी फिल्मों को बढ़ावा देते हो - ख्वाजा अहमद अब्बास

ख्वाजा अहमद अब्बास ने यह बात अ।ज से तीस साल पहले 'फिल्म कैसे बनती है' में लिखी. बच्चों को फिल्म निर्माण की जानकारी देने के उद्देश्य से लिखी गयी यह किताब नेशनल बुक ट्रस्ट ने छापी थी. अभी तक इसके बारह संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं. पिछली बार दिल्ली प्रवास में चवन्नी ने यह पुस्तक हासिल की. सिर्फ 12 रूपए मूल्य की यह पुस्तक सभी सिनेप्रेमियों को पढ़नी चाहिए. और हां, चवन्नी महसूस करता है कि इसे रिफ्रेश या अद्यतन करने की जरूत है. इस बीच सिनेमा का तकनीकी विकास बहुत तेजी से हुअ। है. विकास के इन तत्वों को जोड़कर पुस्तक को अधिक उपयोगी बनाया जा सकता है.

इस पुस्तक के अध्याय हैं -

1. पर्दे का जादू
2. चलचित्र जो चलते नहीं
3. एक समय की बात है
4. अलादीन और उसका जादुई चिराग
5. सागर तट पर पिकनिक
6. छद्म गायक
7. फिल्म का संपादन
8. लाखों के लिए संगीत
9. दुल्हन का श्रृंगार
10. सिनेमा का गणित
11. फिल्म कैसे देखें

ऊपर चवन्नी ने जो उद्धरण किया है, वह इस पुस्तक के ग्यारहवें अध्याय 'फिल्म कैसे देखें' से लिया गया है.

Khwaja Ahmad Abbas was born in 1914 in Panipat, Haryana and graduated from Aligarh Muslim University in 1933. He began his career as a journalist, writing for a newspaper based in New Delhi called the Aligargh Opinion, while studying for a law degree which he received in 1935. He worked as a film critic for the Bombay Chronicle from 1935-1947, and in 1941 he began writing the longest running political column in India's history known as The Last Page. K. A. Abbas was also a prolific novelist and screenwriter. In 1951, he founded his own production company, which became known for producing films with socially relevant themes.

Wednesday, September 26, 2007

देव आनंद: रोमांसिंग विद लाइफ





-अजय ब्रह्मात्मज

देव आनंद की आत्मकथा का इससे अधिक उपयुक्त शीर्षक नहीं हो सकता था। उन्होंने अपनी आत्मकथा पूरी कर ली है। उनके 84वें जन्मदिन के मौके पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इसका विमोचन करेंगे। हिंदी फिल्मों के इतिहास में यह एक अनोखी घटना होगी, जब देश के प्रधानमंत्री के हाथों किसी फिल्मी व्यक्तित्व की किताब का विमोचन हो रहा हो। भारतीय राजनीति और भारत सरकार सिनेमा और फिल्मी हस्तियों से एक दूरी बनाकर रहती है। हालांकि अभी संसद में कई फिल्मी हस्तियां हैं, फिर भी इस रवैए में ज्यादा फर्क अभी तक नहीं आया है। बहरहाल, देव आनंद की आत्मकथा की बात करें, तो आजादी के बाद लोकप्रिय हुई अभिनेताओं की त्रयी (दिलीप कुमार, राज कपूर और देव आनंद) में केवल देव आनंद ही अभी तक सक्रिय हैं। राज कपूर असमय काल कवलित हो गए। दिलीप कुमार केवल समारोह या अपने प्रोडक्शन की गतिविधियों में बीवी सायरा बानो के साथ दिखते हैं। दरअसल, सालों पहले उन्होंने अभिनय से संन्यास ले लिया। केवल देव आनंद ही अपनी क्रिएटिविटी के साथ मौजूद हैं और वे लगातार फिल्में बना रहे हैं और साथ ही साथ देश-विदेश घूम भी रहे हैं। अपनी कोई भी फिल्म पूरी करने से पहले ही वे अगली फिल्म का काम शुरू कर चुके होते हैं। सच तो यह है कि सृजन की ऐसी ऊर्जा विरले ही दिखाई पड़ती है। चेतन आनंद के छोटे भाई देव आनंद ने आजादी के पहले फिल्मी करियर आरंभ किया। जल्दी ही उन्होंने अपनी प्रोडक्शन कंपनी की शुरुआत की। फिर गुरुदत्त के साथ कुछ फिल्में भी कीं। उसके बाद छोटे भाई विजय आनंद के साथ उन्होंने लंबी सफल पारी खेली। देव आनंद की उम्दा फिल्में गुरुदत्त, राज खोसला और विजय आनंद के साथ ही आई। उन दिनों दिलीप कुमार ट्रेजेडी किंग थे और राज कपूर रोमांस और मसखरी के साथ दर्शकों को अपना दीवाना बना रहे थे। इन दोनों से अलग देव साहब ने आजादी के बाद देश में उभरे शहरी युवकों का सुंदर प्रतिनिधित्व किया। रोमांच और रोमांस के मिश्रण से उन्होंने रोमांटिक थ्रिलर फिल्में कीं और दिलीप कुमार और राज कपूर के छोड़े गैप को भी भरा। आज मेहश भट्ट और रामगोपाल वर्मा के बारे में कहा यह जाता है कि वे नई प्रतिभाओं को पहला मौका देते हैं, लेकिन एक सच यह भी है कि देव आनंद की नवकेतन फिल्म्स दशकों तक यही काम करती रही। अभिनेता, अभिनेत्री, निर्देशक, गीतकार, संगीत निर्देशकों की एक लंबी फेहरिस्त है, जिन्हें पहली बार देव आनंद के सौजन्य से ही काम मिला। एक जमाना वह था, जब देव आनंद की तूती बोलती थी। इसलिए उनकी लोकप्रियता की ऊंचाई की कल्पना आज के अभिनेता नहीं कर सकते। अपने आकर्षण से किंवदंती बन चुके देव आनंद ने दशकों तक दर्शकों के दिलों पर राज किया।
देव आनंद की ही फिल्म के एक गाने की पंक्ति है -मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया..। इस पंक्ति के भावार्थ को देव साहब ने अपने जीवन में उतार लिया। सचमुच उन्होंने किसी व्यक्ति या कृति से नहीं, जिंदगी से रोमांस किया और यह रोमांस ही उनकी सक्रियता की अंतत: संजीवनी बनी। प्यार में डूबा इंसान शिथिल हो ही नहीं सकता और फिर जिसने जिंदगी से प्यार किया हो, उससे तो कहते हैं कि उम्र भी हार जाती है। रोमांसिंग विद लाइफ देव आनंद की किसी भी फिल्म से ज्यादा बड़ी कृति है। इसके जरिए हम उनके साथ ही उस दौर को जानेंगे, जिसे हिंदी फिल्मों का स्वर्ण काल कहते हैं। देव साहब, आपको शत-शत नमन! आप दीर्घायु हों और इसी तरह सक्रिय रहें।

Tuesday, September 25, 2007

सांवरिया: रंग,रोगन और रोमांस


-अजय ब्रह्मात्मज
अभी सिर्फ एक मिनट तीस सेकॅन्ड का ट्रेलर आया है और बातें होने लगी हैं। सभी को संजय लीला भंसाली की अगली फिल्म का इंतजार है। इस फिल्म का नाम अंग्रेजी में सावरिया लिखा गया है, जबकि बोलचाल और प्रचलन में सांवरिया शब्द है। सांवरिया शब्द सांवर से बना है, जो सांवल का अपभ्रंश और देशज रूप है। स्वयं सांवल शब्द श्यामल से बना है। गौरतलब यह है कि श्यामल और उसके सभी उच्चारित रूपों का उपयोग कृष्ण के लिए होता रहा है। हिंदी फिल्में कई स्तरों पर मिथकों से प्रभावित हैं। फिल्मों के लेखक, निर्देशक और गीतकार अनेक शब्दों, स्थितियों और भावों का उत्स जाने बगैर उनका उपयोग करते रहते हैं। ऐसे ही सांवरिया शब्द धीरे-धीरे प्रेमी और पति का पर्याय बन गया। मालूम नहीं कि भंसाली ने अपनी फिल्म के नाम में सांवरिया/सावरिया का उपयोग किस अर्थ में किया है! सांवरिया शब्द में से बिंदी गायब होने का एक कारण यह हो सकता है कि महाराष्ट्र में आनुनासिक ध्वनि का उच्चारण नहीं होता, क्योंकि मराठी भाषी हिंदी बोलते समय हैं नहीं है ही बोलते हैं। ऐसा लगता है इसी उच्चारण दोष से सांवरिया सावरिया बन गया है। वैसे, यहां यह बता दें कि हिंदी फिल्मों के पोस्टर पर जमाने से मराठी प्रभाव में गलत हिंदी लिखी जाती रही है। भंसाली की फिल्म के प्रति दर्शकों की जिज्ञासा स्वाभाविक है। अभी जो डेढ़ मिनट की झलक दिखी है, उसमें सब कुछ नीम अंधेरे यानी नीले प्रकाश में दिख रहा है। नीली छटा के कारण बाकी रंग बदले-बदले से नजर आ रहे हैं। वैसे, संजय लीला भंसाली ने सोच-समझ कर ही यह रंग चुना होगा। याद करें, तो संजय की हम दिल दे चुके सनम का रंग सुनहरा और देवदास का रंग लाल था। सुनहरे और लाल के बाद नीले रंग से संजय लीला भंसाली की रंगत्रयी पूरी हो जाएगी।
इस फिल्म में रणवीर कपूर और सोनम कपूर हैं। रणवीर कपूर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के पहले परिवार की चौथी पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं। उनकी पीढ़ी की बहनें करिश्मा और करीना कपूर पहले से ही आ चुकी हैं, लेकिन भारतीय समाज में असली वारिस लड़के ही होते हैं, इसलिए माना यह जा रहा है कि कपूर खानदान और आर.के. की परंपरा रणवीर से जिंदा होगी। करिश्मा और करीना कपूर ने कपूर खानदान की परम्परा खंडित और भ्रष्ट की थी, ऐसा मानने वाले कई लोग हो सकते हैं। सोनम के पापा अनिल कपूर हैं। एक रोचक जानकारी दें कि सोनम के दादा सुरिन्दर कपूर ने अपने करियर की शुरुआत प्रोडक्शन असिस्टेंट और सेक्रेटरीशिप से की थी। वे कभी शम्मी कपूर की पत्नी गीता बाली के सेके्रटरी थे। यह हिंदी फिल्म इंडस्ट्री है। यहां कुछ भी संभव है। आज सेक्रेटरी की पोती और बॉस के बड़े भाई का पोता एक ही साथ एक फिल्म में आ रहे हैं और हम सभी प्रतीक्षा में हैं।
संजय लीला भंसाली की अन्य फिल्मों की तरह सावरिया में भी वैभव है। उनकी फिल्मों की प्रस्तुति अति समृद्ध होती है। वैभव और विलास से लकदक उनकी फिल्में आम दर्शकों को नयनाभिरामी और आकर्षक लगती हैं। आम दर्शकों को अपनी निर्धनता के वर्तमान में संजय लीला भंसाली की फिल्मों की संपन्नता मायालोक में ले जाती है। चंद घंटों के लिए फिल्म के पर्दे पर आम दर्शक इस समृद्धि की चकाचौंध में अपनी रोजमर्रा की तकलीफ भूल जाते हैं।
आखिर में सांवरिया को सावरिया में बदलने का कारण मालूम हो जाए, तो अच्छा है। अन्यथा यह नाम हिंदी भाषी क्षेत्रों में पढ़ने और सुनने में उतना ही खराब लगेगा, जितना अंत को अत, संन्यासी को सन्यासी और चंदन को चदन लिखना, पढ़ना और सुनना। वैसे भंसाली की फिल्म है, तो नाम कुछ भी हो, लोग देखने जाएंगे ही!

Monday, September 24, 2007

अनिल-सोनम कपूर:चार भावमुद्राएं

पिता अनिल कपूर निहार रहे हैं बेटी सोनम कपूर को...

क्या ख़ूब है बाप-बेटी का इठलाना
दोहरी खुशी का वक़्त



बेटी के कंधे पर सिर टिकाने का भरोसा


Sunday, September 23, 2007

महानतम क्रांति है ब्लॉग-शेखर कपूर


मशहूर फिल्मकार शेखर कपूर नियमित रूप से ब्लॉग लिखते हैं.उन्होंने अपने ब्लॉग पर इसके महत्व के बारे में लिखा है...मेरे विचार से ब्लॉग हमारे समय की महानतम क्राति है.अभी तो हम इसकी परिधि ही देख सके हैं.अपनी बात रखने का यह परम लोकतांत्रिक माध्यम है.यह अपने संविधान से मिली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ही नया रूप है.आप अपनी बात नहीं कह सकते तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का क्या अर्थ रह जाता है. निहित स्वार्थ से नियंत्रित मीडिया का विकल्प है यह...मुझे ब्लॉग लिखने में आनंद आता है.मैं पूरी दुनिया से सीधे संबंध स्थापित कर लेता हूं और वह भी दोतरफा...

Saturday, September 22, 2007

आमिर खान के ब्लॉग से



कल से आगे ...

मुझे लगता है कि तारे जमीं पर के बैकग्राउंड संगीत का काम ठीक चल रहा है. हमलोगों ने अ।श्चर्यजनक तरीके से तेज काम किया. और हमलोगों ने लाइव रिकार्डिंग भी की. फिल्मों में पिछले 15 सालों से ... जी हां, 15 सालों से ऐसी रिकार्डिंग नहीं की जा रही है.
अ।पको बताऊं, जब हमलोग बैकग्राउंड संगीत डालते हैं तो सबसे पहले कोई दृश्य/प्रसंग लेते हैं, फिर तय करते हैं कि उस दृश्य में संगीत कहां से अ।रंभ हो और उसे कहां खत्म हो जाना चाहिए ... और क्या बीच में हम कोई बदलाव भी चाहते हैं... अ।दि..अ।दि. यह सब तय होने के बाद, और क्रिएटिव की स्पष्टता होने के बाद रिकार्डिंग अ।रंभ होती है. अ।जकल यह तकनीकी प्रक्रिया हो गयी है. सारे कीबोर्ड कंप्यूटर से जुड़े होते हैं और कंप्यूटर पर फिल्म डाल दी जाती है. उस पर अ।रंभ बिंदु लगा देते हैं, एक ग्रिड तैयार हो जाता है, संगीत की गति ग्रिड की लंबाई से तय होती है ... इसका मतलब ढेर सारा काम गणितीय ढंग का होता है. यह सब कंप्यूटर के अ।विष्कार से हुअ। है. मेरी राय में यह कार्य करने का स्वाभाविक तरीका नहीं है, लेकिन निश्चित ही नियंत्रित और व्यावहारिक तरीका है. इसे सिक्वेसिंग/प्रोग्रामिंग कहते हैं. इस तरह सिक्वेंस/प्रोग्राम बनाने के बाद अ।प फिल्म से उसक। तालमेल बिठा देते हैं.
लाइव करने का मतलब है कि वाद्ययंत्र बजा रहे संगीतज्ञ कंप्यूटर नहीं निहारते .. इसके बदले वे स्क्रीन पर फिल्म देखते हुए वाद्ययंत्र बजाते हैं, एक कंडक्टर उन्हें संगीत की छड़ी से इशारे देता है. वह समय बताता है, वही संगीत की गति भी बताता है. इस तरह वे फिल्म से तालमेल बिठाते हुए वाद्ययंत्र बजाते हैं. वे ग्रिड का अनुसरण नहीं करते. वे फिल्म और किरदार के मनोभाव का अनुसरण करते हैं. अगर कोई गलती हो गई तो फिर से शुरू करना पड़ता है. अगर 'टेक' में सही फीलिंग नहीं अ। रही हो तो भी सब कुछ फिर से शुरू करना पड़ता है. 15-20 साल पहले ऐसे ही बैकग्राउंड संगीत तैयार किया जाता था.
सच कहें तो हम लोग इससे भी एक कदम अ।गे अ।ए, हमलोग दृश्य पर 'इन' या 'चेंज ओवर' का क्रॉस मार्क लगाए बगैर ही काम कर रहे थे. इसमें 'इन पाइंट' महसूस किया जाता था.. उसे पहले से चिह्नित नहीं किया जात था. या उसकी गणना नहीं की जाती थी. यहां तक कि संगीत की स्वरलिपि भी नहीं लिखी जाती थी, इसलिए लॉय या एहसान या शंकर या टब्बी (उनका एक संगीतज्ञ ) वाद्ययंत्र बजाते समय हर टेक के साथ सुधार भी करते जा रहे थे. एक बार हमें एक टुकड़े के लिए हार्मोनिका की जरूरत हुई. अगर मुंबई में होते तो कोई समस्या नहीं रहती... फोन करते ही हार्मोनिका और उसे बजाने वाला मिल जाता. लेकिन हमलोग पंचगनी में थे. (हमें सिंथेस।इजर की हार्मोनिका ध्वनि नहीं चाहिए थी .. हमें तो सही हार्मोनिका चाहिए था.) लॉय ने सचिन को पंचगनी के बाजार में हार्मोनिका खोजने के लिए भेजा... सचिन खोज भी लाया... अ।श्चर्च ही है. लॉय ने हार्मोनिका बजाया और उस अ।ठ इंच के धातु के वाद्ययंत्र में जान फूंक दी. और यह सब किसी स्टूडियो में नहीं... एक घर में हो रहा था.
वास्तव में चूंकि मैं यह खुद पहली बार कर रहा हूं (18 साल पहले एसिस्टैंट डायरेक्टर के तौर पर मैंने बैकग्राउंड संगीत का काम किया था.) तो लगा कि यही काम करने का स्वाभाविक तरीका है. शंकर एहसान और लॉय को भी मजा अ।या, क्योंकि उन्होंने भी सालों से या शायद पहले कभी ऐसे संगीत नहीं तैयार किया था. मुझे लगता है कि उन्होंने पहले मुझे पागल समझा और बाद में उन्हें खुद ही मजा अ।ने लगा.
एहसान ने बहुत सारी तस्वीरें और वीडियो फुटेज लिए हैं. मैं लौटने के बाद उन्हें ब्लॉग पर डालूंगा.
गणेश, मैं वादा नहीं कर सकता कि हर साल मेरी दो फिल्में रिलीज हो, लेकिन कोशिश करूंगा. सच तो यह है कि मैं जिस गति से काम कर रहा हूं, उससे ज्यादा तेज काम नहीं कर सकता. मुझे मुझे एहसास है कि तारे जमीं पर के रिलीज के समय तक फना को रिलीज हुए डेढ़ साल हो जाएंगे. अक्सरहां, चीजें हमारी योजना के मुताबिक नहीं हो पातीं, चीजों के गड़बड़ हो जाने पर भी मेरी कोशिश रहती है कि सही कदम उठाऊं... और उसमें समय लगता है.
रुथ, मुझे अफसोस है कि चले चलो के डीवीडी में सबटाइटल नहीं हैं. उसकी वजह यह है कि उसका एक अंग्रेजी संस्करण 'मैडनेस इन द डेजर्ट भी बना है. दरअसल, हमें हिंदी-अंग्रेजी दोनों एक ही डीवीडी पर रिलीज करना चाहिए था, लेकिन वैसा नहीं हुअ।, क्योंकि यह डीवीडी केवल भारत में ही रिलीज करने के इरादे से तैयार किया गया था. अब लगता है कि हमें दानों भाषा में रिलीज करना चाहिए था, मेरी गलती है. हम इसमें सुधार कर रहे हैं, हम हिंदी-अंग्रेजी का डीवीडी एक साथ ला रहे हैं. दर्शक डीवीडी देखते समय अपनी पसंद से भाषा चुन सकते हैं.

जोअ।ना, मैंने राजा हिंदुस्तानी के क्लाइमेक्स पर अ।पकी टिप्पणी पढ़ी. मैं अ।पसे पूरी तरह सहमत हूं कि फिल्मों में बच्चों के साथ काम करते समय अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए और इस फिल्म में हमसे दो-तीन बार चूक हुई. उस समय यह सब करने के लिए मैं अ।ज शर्मिंदा हूं और अफसोस जाहिर करता हूं. ईश्वर की कृपा से बच्चा सुरक्षित रहा और सब कुछ ठीक से हो गया. यह कहने के साथ मैं यह बताना चाहता हूं कि अधिकांश दृश्य में हमने गुड्डे का इस्तेमाल किया जो पर्दे पर पकड़ में नहीं अ।ता है.
अच्छा तो अपनी फ्लाइट की सूचना के पहले मैं जरा जल्दी से इसे पोस्ट कर दूं.

चियर्स!

मनोरमा सिक्स फीट अंडर


रियल सिनेमा है मनोरमा सिक्स फीट अंडर

=अजय ब्रह्मात्मज नाच-गाना, विदेशी लोकेशन, हीरो-हीरोइन के चमकदार कपड़े, बेरंग रोमांस से ऊब चुके हों और चाहते हों कि कुछ रियल सिनेमा देखा जाए तो आप मनोरमा सिक्स फीट अंडर देखने जा सकते हैं। अपने देश के गांव-कस्बों और छोटे शहरों की कहानियां ऐसी ही होती हैं। मनोरमा ़ ़ ़ मध्यवर्गीय परेशानियों और आकांक्षाओं की फिल्म है। युवा निर्देशक नवदीप सिंह ने कुछ अलग कहने और दिखाने की कोशिश की है।
राजस्थान के छोटे से शहर लाखोट में रह रहे सत्यवीर (अभय देओल) के जीवन में कोई उमंग नहीं है। वह सिंचाई विभाग में जूनियर इंजीनियर है। मामूली सी नौकरी, सरकारी क्वार्टर, चखचख करती बीवी और कुछ ज्यादा ही जिज्ञासु पड़ोसी से ऊब चुका सत्यवीर जासूसी कहानियां लिखने में सुख पाता है। उसे रियल जासूसी का एक आफर मिलता है तो इंकार नहीं कर पाता। स्थानीय नेता और पूर्व महाराज पीपी राठौड़ की बीवी उसे अपने पति के खिलाफ जासूसी के लिए लगाती है। बाद में पता चलता है कि वह औरत तो पीपी राठौड़ की बीवी ही नहीं थी। पूरा मामला उलझता है और उसे सुलझाने के चक्कर में सत्यवीर और ज्यादा फंस जाता है। नए अभिनेताओं में अभय देओल ने अभी तक कोई भी फार्मूला फिल्म नहीं की है। इस फिल्म में भी उन्होंने नई कोशिश की है। वह नेचुरल एक्टर हैं और हिंदी फिल्मों में प्रचलित ओवर एक्टिंग से कोसों दूर हैं। सत्यवीर की उलझन और परेशानियों को अभय ने बखूबी पर्दे पर उतारा है। बीवी की भूमिका में गुल पनाग स्वाभाविक लगी हैं। अन्य किरदारों में सारिका, राइमा सेन और कुलभूषण खरबंदा दी गई भूमिकाएं सहजता से निभा ले गए हैं। हां, विनय पाठक ने छोटे शहर के इंस्पेक्टर ब्रजभूषण के रोल को जीवंत कर दिया है। छोटे शहरों के अनुभवी दर्शकों को लगेगा कि वह किसी परिचित इंस्पेक्टर को देख रहे हैं।
नवदीप सिंह ने अमेरिकी फिल्मों की नोयर शैली अपनाई है। नीम रोशनी, साधारण किरदार, अपराध और रहस्य के पहलुओं को लेकर उन्होंने वास्तविक कहानी बुनी है। इस छोटी सी फिल्म में कई घटनाएं और कथाएं एक-दूसरे से जोड़ी गई हैं। इसकी वजह से मूल कहानी की संप्रेषणीयता थोड़ी कम होती है। मनोरमा ़ ़ ़ की सबसे बड़ी खूबी यही है कि इसमें कोई अतिरंजना नहीं है। बेहतर और अलग सिनेमा देखने के इच्छुक दर्शकों को मनोरमा ़ ़ ़ देखनी चाहिए।

ढोल


-अजय ब्रह्मात्मज
प्रियदर्शन की फिल्मों का एक ढर्रा बन गया है। ढोल भी उसी ढर्रे की फिल्म है। फिल्म में एक ही नयापन है कि कुणाल खेमू पहली बार कामेडी करते नजर आए और निराश भी नहीं करते। शरमन जोशी, तुषार कपूर और राजपाल यादव फिल्म में घिसे-पिटे किरदारों में खुद को दोहराते हैं।
लंपट और मूर्ख नौजवानों के अमीर बनने की ख्वाहिश पर इस बीच आधा दर्जन फिल्में आ चुकी हैं। इन फिल्मों का हास्य अब फूहड़ता की सीमा में प्रवेश कर चुका है। फिर भी भद्दे मजाक, उल्टे-सीधे प्रसंग और कामेडी की कसरत देखते हुए दर्शक हंस ही देते हैं। वास्तव में कामेडी फिल्में दर्शकों को पहले से उस मनोदशा में ले जाती हैं, जहां हाथ का इशारा भी गुदगुदी पैदा करता है। हिंदी फिल्मों के निर्माता-निर्देशक इसी का बेजा फायदा उठा रहे हैं, लेकिन ढोल जैसी फिल्में कामेडी की पोल खोल रही हैं। सावधान हो जाएं प्रियदर्शन और उन जैसे अन्य निर्देशक।

Friday, September 21, 2007

मैं जिंदा हूं, हां जिंदा हूं-आमिर खान



बुधवार, 19 सितंबर, 2007

अ।उच! 2000 से ज्यादा पोस्ट मिले अ।पके. लगता है मेरी मुश्किलें बढ़ेंगी. फिर भी यही कहूंगा कि नंबर बढ़ता देख खुशी होती है.
सभी को मेरा हेलो! इतने दिनों तक गायब रहा. अ।पसे कटा महसूस करता रहा, खासकर जब देखता हूं कि अ।प हूं कि अ।प मेरे बगैर भी अपने काम में मशगूल हैं. लगता है कि मैं पीछे छूट गया.
सोच रहा हूं कि पहले अ।पके पोस्ट पढूं या अपना पोस्ट लिखूं... अभी पूरी नहीं पढ़ पाया हूं. कुछ पन्नों को पढ़ कर ही लग रहा है कि मजेदार चीजें छूट रही थीं. ठीक है, मैं अपना काम जल्दी कर लूं.
मैं अभी ब्रुसेल्स में हूं... मुंबई के रास्ते में. एक सम्मेलन के सिलसिले में 4-5 दिन अमेरिका में था.
मैं वादा करता हूं कि तारे जमीं पर का पहला क्रिएटिव मेरे ब्लॉग पर अ।एगा. अ।प लोग सबसे पहले उसे देखेंगे. अ।ज कल मैं उसी पर काम कर रहा हूं.
शंकर... अ।पको अपने ब्लॉग पर देखकर खुशी हो रही है. पंचगनी में सब कुछ रहा.
दोस्तों मशहूर शंकर एहसान लॉय के शंकर की बात कर रहा हूं. शायद अ।प सभी को मालूम होगा कि वे ही तारे जमीं पर के संगीतकार हैं. शंकर पंचगनी की याद दिला रहे हैं. हमलोग तारे जमीं पर के बैकग्राउंड संगीत पर वहां काम कर रहे थे. पंचगनी में मेरा एक घर है. मुंबई से चार घंटे की दूरी पर बसा यह एक हिल स्टेशन है. इसे अंग्रेजों ने गर्मी के अ।रामगाह के तौर पर विकसित किया था. चित्रों की तरह सुंदर यह छोटा शहर शांत और नीरव है. घाटी का सुंदर नजारा मिलता है. एक छोटा सा बाजार है. 50 के लगभग बोर्डिंग स्कूल हैं और कुछ पुरानी शैली के सुंदर मकान हैं. मैं भाग्यशाली हूं कि पिछले साल मैंने वहां पर एक मकान खरीदा. स्थानीय लोग मैत्री भाव रखते हैं और गर्मजोशी से मिलते हैं. पिछले कुछ सालों में पंचगनी मुंबई और पुणे के लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय हो गया है. लोग घूमने अ।ते हैं. घाटी में तैरते पैराशूट देखकर मैं कह सकता हूं कि यह पैराग्लाइडिंग के लिए भी मशहूर हो रहा है.
संयोग ही है कि हमलोगों ने तारे जमीं पर की अधिकांश शूटिंग पंचगनी में ही की.
शेष कल ...

शुक्रवार,२१ सितंबर



माफ़ करें -चवन्नी ने आप से वादा किया था कि हर शुक्रवार को आप से बात करेगा]लेकिन अगले ही हफ्ते उसे मुम्बई से बाहर निकलना पड़ा.कुछ ऐसी व्यस्तता रही कि चाह कर भी चवन्नी कुछ लिख नही सका.एक माफ़ी तो मिल ही सकती है।इस हफ्ते कई बड़ी बातें हुईं.सांवरिया और ओम शांति ओम फिल्मों के मुजिक रिलीज हुए.बड़ा जलसा रहा .सांवरिया में दोनों कपूर परिवार मौजूद था तो ओम शांति ओम में शाहरुख़ खान का जलवा था.अजीब बात है कि दोनों फ़िल्में एक ही दिन रिलीज हो रही है.चवन्नी के पाठकों में से ज़्यादातर पहले दिन सांवरिया देखने की योजना बाना राहे हैं।
आज ३ फ़िल्में रिलीज हुई हैं.मनोरमा सिक्स फीट अंडर,ढोल और लायंस ऑफ पंजाब रिलीज हुई हैं.इनमें से नवदीप सिंह की की मनोरमा उल्लेखनीय आर दर्शनीय फिल्म है.समाज के काले और अंधेरे सच को नवदीप ने वास्तविकता के साथ चित्रित किया है.ढोल जैसी दर्जनों फिल्में आप देखा चुके हैं,इसलिए चवन्नी की राय है कि मनोरमा ही देखने जाएं.लायंस ऑफ पंजाब चवन्नी के पाठकों की फिल्म नहीं है.वैसे भी वह अंग्रेजी में बनी है.इधर मल्टीप्लेक्स आने से अंग्रेजी सिनेमा कं दर्शक बढ़े हैं.चवन्नी वैसे दर्शकाें की परवाह भी नहीं करता.

दरअसल...कॉमेडी का गिरता स्तर


-अजय ब्रह्मात्मज



कॉमेडी फिल्मों का बाजार गर्म है। दर्शक देख रहे हैं, इसलिए निर्माता-निर्देशकों को कॉमेडी फिल्मों में मुनाफा दिख रहा है। दरअसल, आजकल निर्माता कॉमेडी फिल्मों में निवेश के लिए तैयार हो जाते हैं। डेविड धवन, प्रियदर्शन, इंद्र कुमार और नीरज वोरा सरीखे निर्देशकों की चांदी हो गई है। किसी निर्देशक ने एक भी सफल कॉमेडी फिल्म बना ली है, तो उसे प्रोड्यूसर और एक्टर की दिक्कत नहीं होती।
पहले कॉमेडी फिल्मों में कॉमेडियन की जरूरत पड़ती थी। बाद में संजीव कुमार, धर्मेद्र और अमिताभ बच्चन ने अपनी फिल्मों में कॉमेडी की और धीरे-धीरे वे ऐसी फिल्मों के नायक भी बन बैठे। पिछले एक दशक में सारे एक्टर कॉमेडी में किस्मत आजमा चुके हैं। हर तरफ हंसी बिखेरी जा रही है। तर्क दिया जा रहा है कि सोसायटी में इतना टेंशन है कि दर्शक रिलीफ के लिए सिनेमाघर में आता है। अगर वहां भी दर्शकों की लाइफ का टेंशन ही चित्रित किया जाए, तो उन्हें क्या खाक मजा आएगा?
एक जमाना था, जब हिंदी की रोमांटिक और सामाजिक फिल्मों में कॉमेडी ट्रैक रखे जाते थे। तब के डायरेक्टर यह मानते थे कि तीन घंटे की फिल्म देखते समय दर्शकों को थोड़ी राहत मिलनी चाहिए। जॉनी वॉकर से लेकर जॉनी लीवर तक यह परंपरा किसी-न-किसी रूप में चलती रही। इधर उनकी पोजिशन कमजोर हो गई है। एक वजह तो यही है कि सारे हीरो कॉमेडी करने लगे हैं। इधर की कॉमेडी फिल्में देखें, तो इन में हास्य का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। साधारण लतीफों और हास्य दृश्यों को जोड़कर फिल्में बनाई जा रही हैं। डेविड धवन और प्रियदर्शन ने अपनी फिल्मों की एक शैली पकड़ ली है और वे खुद को लगातार रिपीट कर रहे हैं। डेविड मुख्य रूप से मेनस्ट्रीम के स्टारों को लेकर ही कॉमेडी फिल्में बनाते हैं। उनकी फिल्मों में कहानी और संवाद से ज्यादा जोर स्टारों पर रहता है। उनकी फिल्मों में सलमान खान, गोविंदा और दूसरे स्टार अपनी हरकतों से हंसाते हैं। प्रियदर्शन की फिल्मों में अक्षय कुमार और परेश रावल स्थायी चेहरे हो गए हैं। इधर राजपाल यादव भी उनकी फिल्म में रेगुलर दिख रहे हैं। ये सारे किरदार कन्फ्यूजन क्रिएट करते रहते हैं। फिल्म के क्लाइमेक्स तक कन्फ्यूजन इतना बढ़ जाता है कि दर्शक हैरान होते हैं और फिल्म नुकसान में रहती है।
दरअसल.., कॉमेडी को फटाफट कमाई का जरिया समझ लिया गया है। इसमें अन्य खर्चे कम हो जाते हैं। दो स्टार भी हों, तो बाकी कैरेक्टर और जूनियर आर्टिस्ट को लेकर फिल्म बन जाती है। कई दर्शक सवाल पूछते हैं कि अब पहले जैसी कॉमेडी फिल्में क्यों नहीं बनतीं? निर्माता-निर्देशकों ने मान लिया है कि दर्शक इंटेलिजेंट कॉमेडी को समझ नहीं पाते। अगर अभी कोई निर्माता जाने भी दो यारो बनाएगा, तो दर्शक उसे जाने भी दो निर्देशक महोदय कहते नजर आएंगे। ऐसा माना जा रहा है कि तुरंत खुशी की तलाश में दर्शक हंसने के लिए दिमाग पर जोर नहीं डालना चाहते। सच्चाई क्या है? उदाहरण के लिए पार्टनर और धमाल जैसी फिल्में काफी हैं.

Thursday, September 20, 2007

काटी चिकोटी दीया के...

चवन्नी चटखारे लेने के लिए यह सच्चा किस्सा नही सुना रहा है.हुआ यों कि संजय गुप्ता गोआ में अपनी नयी फिल्म अलीबाग की शूटिंग कर राहे थे.आम तौर पर आउटडोर शूटिंग में पारिवारिक माहौल रहता है.आप ने सुना भी होगा,फिल्म स्टार अपनी बातचीत में हमेशा कहते हैं कि फैमिली जैसा माहौल था.ऐसे ही फैमिली माहौल में दिन भर kee शूटिंग से थकी-हारी दीया मिर्ज़ा स्वीमिंग पुल में नहा रही थीं.पानी थकान दूर करता है.उन्हें क्या पता था कि स्वीमिंग पुल में आदमी की शक्ल में मगरमच्छ घुस आया है.रोहित राय नाम है इस मगरमच्छ का.दीया आराम से पानी के छापाके ले रही थीं,तभी पीछ्हे से रोहित राय आये और उनहोंने दीया मिर्ज़ा के नितम्ब में चिकोटी काट ली.दीया समझ नही पायीं.दीया ने विरोध किया और पुल से निकल आयीं.उनहोंने शोर तो नही मचाया ,लेकिन यह बात फैल गयी.चश्मदीद लोगों ने पूछा तो बेशर्म रोहित ने कह कि दीया के नितम्ब में है क्या कि मैं चिकोटी काटूंगा।
चवन्नी इस प्रसंग के जरिये आप को बताना चाहता है कि फिल्म इंडस्ट्री की हीरोइनें भी सुरक्षित नही है.उन्हें आये दिन हीरो,निर्माता और निर्देशक के हवस का शिकार होना पड़ता है.आश्चर्य है कि अभिनेत्रियाँ रपट नहीं लिख्वातीं.इस मामले में भी दीया नही चाहती कि ज्यादा चर्चा हो.संजय गुप्ता भी मामले को दबाने कि फिक्र में हैं.कोई भी रोहित को नहीं फटकार रहा है.सभी चाहते हैं कि मामला दब जाये.देखें संजय दत्त क्या करते हैं।
दीया पहली और आख़िरी शिकार नही हैं.फिल्म इंडस्ट्री में रोहित जैसे मर्दों की कमी नही है.उन्हें लगता है कि औरतों के साथ सोना ही मर्दानगी है.






Wednesday, September 19, 2007

देव डी का आइडिया-अनुराग कश्यप

अब चूंकि घोषणा हो चुकी है ... इसलिए मुझे बता ही देना चाहिए ... मैं नवंबर में देव डी अभय देओल के साथ बना रहा हूं। हमलोग पिछले साल से ही इस फिल्म के निर्माण की कोशिश में हैं, लेकिन कोई भी हाथ लगाने को तैयार नहीं है , क्योंकि इंडस्ट्री में प्रस्ताव बनते हैं ़ यहां फिल्में नहीं बनतीं ़ ़ ़ शुरू में मैं भी इस फिल्म को लेकर उतना गंभीर नहीं था, क्योंकि मैं अपना तथाकथित बाजार खराब नहीं करना चाहता था, जो अभी-अभी मेरे लिए खुला है ़ ़़ ़ मैं जिससे भी मिला, एक ही बात सुनने को मिली ़ ़ ़ अभय बहुत नैचुरल एक्टर है, लेकिन वह बिकता नहीं ़ ़ ़ मेरा जवाब होता था कि हम देवदास बेच रहे हैं, अभय नहीं ़ ़ ़ क्या भारतीयों के बीच देवदास नहीं बेच पाएंगे? क्या बात कर रहे हैं ? लेकिन वे अपनी जिद पर अड़े रहते ़ ़ ़ मैंने उन्हें नहीं बताया कि मेरी फिल्म में ' मिट्टी वजन मार्डीं' और 'हवाएं ' जैसी फिल्में कर चुकी पंजाबी अभिनेत्री पारो का रोल करेगी ़ ़ ़ देवदास के बारे में हमारी टेक से वे चौंक सकते थे ़ ़ ़ हमारा देवदास निष्ठाहीन है और पारो भी कुंवारी कन्या नहीं है। चंद्रमुखी अपनी पसंद से एस्कॉर्ट का काम करती है और मेरी अप्रदर्शित फिल्म ब्‌लैक फ्रायडे का येड़ा याकूब चुननी लाल का रोल करेगा और वह वायब्रेटर लेकर घूमेगा ़ ़ ़ क्या गड़बड़ी है तुम्हारे साथ ़ ़ ़ ? क्या आपको पता नहीं कि पालिका बाजार में सबसे ज्यादा सेक्स खिलौने बिकते हैं ़ ़ ़ क्या आपको पता नहीं कि करोलबाग के ज्यादातर होटलों में छुपे तौर पर एस्कॉर्ट का धंधा चलता है -
तो क्या आप सोशल फिल्म बना रहे हैं ?
नहीं सर
फिर आप क्या बना रहे हैं ?
मैं देवदास बना रहा हूं।
यह कैसा देवदास है
मेरे प्रकार का है
आपका प्रकार क्या है
मेरा देवदास आत्मग्लानि का शिकार नहीं है , वह खुद को नए रूप में पाता है
किस रूप में पाता है
पाता है कि वह लंपट है, पाखंडी है, वह सनसनी चाहता है, इसलिए वह आत्महंता है ़ ़ ़ लेकिन उसे मालूम नहीं कि वह खुद को खत्म कर रहा है।
क्या आपको लगता है कि इसे दर्शक स्वीकार करेंगे ?
वे इसे देखने आंएगे, वे इसे नजरअंदाज नहीं कर सकते, हो सकता है कि वे इसे देखने के बाद गालियां दें, शुद्घतावादी कुछ कहेंगे और सुभाष के झा भी
सुभाष के झा क्यों?
वे बताएंगे कि कैसे मैं देवदास करने के लिए गलत आदमी हूं, वे मुझे निंदक कहेंगे ़ ़ ़ इससे आपको प्रचार मिलेगा और मुझे अपनी फिल्म क्यों ?
क्या आप खुद को इतना खास मानते हैं कि एसकेजे रिएक्ट भी करेंगे
हो सकता है प्रिंट में न करें , लेकिन व्यक्तिगत बातचीत में जरूर जिक्र करेंगे
उससे कैसे प्रचार मिलेगा
मुझे नहीं मालूम, मैं उम्मीद कर रहा हूं
सॉरी, अगर अभय के साथ करना है तो तीन करोड़ के अंदर करें या फिर जॉन को ले आएं और जो भी बजट चाहें ले लें
लेकिन यह अभय का कांसेप्ट है , उसने पहले सोचा
फिर कुछ और करो
ओके
यही चलता रहा, मैं कुछ और सोचने का नाटक करता रहा और चुपचाप किसी और की तलाश करता रहा
और एक नयी स्क्रिप्ट मेरे दिमाग में लिखी गयी 'एक लड़की जो किसी के साथ भी सोने को तैयार है' ़ ़ ़ मैने मुराकामी से शीर्षक उधार ले लिया ़ ़ ़ उनकी किताब का एक किरदार ़ ़ ़ वे तुरंत जिज्ञासु हुए और फिर सुना और पूछा
लेकिन सेक्स कहां है?
बिल्कुल
लेकिन अनुराग हम तुम्हें समझ नहीं पा रहे हैं
क्यों, क्या गलत हो गया
अगर फिल्म में सेक्स नहीं है तो फिर ऐसा नाम क्यों
यही तो असल आइडिया है
इसके बाद उन्होंने कहा, ' अनुराग, तुम प्रतिभाशाली हो , तुमने लंबा इंतजार किया, अब तुम्हारा वक्त आया है, सभी तुम्हारे साथ काम करना चाहते हैं , तुम ऐसा मौका क्यों गंवा रहे हो , कोई कमर्शियल फिल्म करो ़ ़ ़ अपनी तरह से करो ़ ़ ़ हम नहीं कहते कि हॉलीवुड की नकल करो, लेकिन कमर्शियल करो।'
मुझे लगता है कि मैं कमर्शियल हूं , मेरे सारे विचार कमर्शियल हैं। (मैं नाराज हो उठता था) आप उसे देख नहीं पा रहे हैं।
आखिर सारे लोग मुझ में रुचि क्यों दिखा रहे हैं , ब्‌लैक फ्रायडे बॉक्स ऑफिस को हिलाना तो दूर वहां निशान भी नहीं छोड़ सकी ़ ़ ़ फिर क्यों मुझ में रुचि ली जा रही है ़ ़़ ़ क्या सिर्फ इसलिए कि किसी स्टार ने मेरी तारीफ कर दी है और उसने कह दिया है कि मैं अनुराग कश्यप के साथ काम करना चाहता हूं, फिर ऐसा क्यों होता है कि जब मैं उसे कहानी सुनाता हूं तो वह मेरी तरफ ऐसे देखता है जैसे मैं अनाप-शनाप बक रहा हूं। वे मेरी तरफ ऐसे ही हमेशा देखते हैं। मेरी फिल्म शुरू और खत्म होने के बाद कहते हैं कि हमें साथ काम करना है। मुझे लगता है कि इस इंडस्ट्री का सामूहिक आईक्यू टेस्ट होना चाहिए ़ ़ ़ और अगर कोई क्ख्0 का अंक पार कर ले तो मुझे आश्चर्य होगा
यह तुम्हारी समस्या है ़ ़ ़ तुम हमेशा नाराज रहते हो ़ ़ ़ कोई तुम से बात नहीं कर सकता ़ ़ ़ एक बात जानते हो, कोई भी तुम से इतनी घृणा नहीं करता, जितना तुम मानते हो ़ ़ ़ यहां तक कि यशराज के लोग भी कहते हैं कि वह अच्छा लड़का है ़ ़ ़ बस उसे अपना गुस्सा कम करना चाहिए ़ ़ ़ वे तुम्हारी मदद करना चाहते हैं ़ ़ ़
हेलो, क्या ऐसा लगता है कि मुझे मदद चाहिए ़ ़ ़ मेरी जरूरत है कि लोग मुझ में यकीन करें ़ ़ ़ मेरी जरूरत है कि वे मेरी मदद करने की कोशिश बंद करें, मैं आपको मेरी जिंदगी बेहतर बनाने से रोकना चाहता हूं ़ ़ ़ मैं ऐसे आदमी की तलाश में हूं जो समझ सके कि मैं किसी को दिवालिया नहीं करना चाहता, मैं आर्ट फिल्ममेकर नहीं हूं, मैं दर्शन नहीं बेचना चाहता, मैं ऐसी फिल्म बनाना चाहता हूं, जिसे सभी देखें ़ ़ ़ मैं भी उन दर्शकों के बीच पहुंचना चाहता हूं, जो सभी के लक्ष्य हैं और आप यह कैसे कह सकते हैं कि मैं नहीं पहुंच सकता ़ ़ ़ अपने मन का काम किए बगैर मैं कैसे पहुंच सकता हूं।
रोना बंद करो अनुराग
एक मीटिंग में ऐसा ही हुआ ़ ़ ़ बाकी यों ही थे ़ ़ ़ वे मुझ में रुचि नहीं रखते थे ़ ़ ़ ख् 00त्त् और ख्00े की मेरी बड़ी फिल्में सुनिश्चित हो गई हैं ़ ़ ़ हमलोग ख्0क् 0 की बातें कर रहे हैं ़ ़ ़ छोटी फिल्में अभी तक अनिश्चित हैं ़ ़ ़ और अब छोटी फिल्में भी छोटी नहीं रह गयीं ़ ़ ़ वे बड़ी फिल्मों की तुलना में छोटी है ़ ़ ़ वे साढ़े तीन से पांच करोड़ के बीच की फिल्में हैं ़ ़ ़ मैं ढीला पड़ चुका हूं।
फिर मैंने और अभय ने सोचा कि हम देव डी खुद ही प्रोड्‌यूस करेंगे और दूसरी फिल्म के लिए मैं सम्राट से मिला ़ ़ ़ और उसके लिए मैंने एक छोटी फिल्म बनायी ़ ़ ़ वह अनुभव अच्छा रहा ़ ़ ़ मुझे उसका एटीट्‌यूड सही लगा, इसलिए एक-दूसरे की तारीफ करते हुए हमने एक कंपनी स्थापित की और तय किया कि अपने मन की फिल्में बनाएंगे ़ ़ ़ जो कोई नहीं बनाएगा, उसे बनाएंगे और हमलोग वही कर रहे हैं ़ ़ ़़
फिर विकास बाही आए ़ ़ ़ उसे अच्छी तरह समझने के लिए दीवानगी चाहिए ़ ़ ़ वह यूटीवी में स्पॉटब्‌वॉय का बॉस है और उसे मेरे विचार पसंद आए। वह उन्हें बनाना चाहता है ़ ़़ ़ जिन विचारों के लिए मुझे दफ्तरों से निकाला गया ़ ़ ़ और अब वे देव डी बनाना चाहते हैं।
उम्मीद बाकी है अभी भी
पुन:श्च - शरतचंद्र ने देवदास को अपनी निकृष्ट किताब कहा ़ ़ ़ जबकि उनका सबसे ज्यादा चर्चित उपन्यास यही हो गया ़ ़ ़ भारतीय खुद पर दुखी होना पसंद करते हैं ़ ़ ़ तभी तो 'घुंघरू की तरह बजता ही रहा हूं मैं' जैसे गीत लिखे जाते हैं ...

Monday, September 17, 2007

१ मिनट की फिल्म बनायें

क्या आप को लगता है कि आप के अन्दर फिल्म बनने की प्रतिभा है तो देर किस बात की.पैशन फ़ॉर सिनेमा के लिंक पर जाएँ और वहाँ से पूरी जानकारी लेकर अपनी फिल्म बनायें.अगर आप विजेता हुए तो आप अनुराग कश्यप,हंसल मेहता,रामू रमनाथान, ओनिर और निशिकांत कामत के साथ प्रशिक्षु बन सकते हैं.इसके लिए आप को १ मिनट की फिल्म बनानी होगी.आप इस पोस्ट के दाहिने में दिए लाल रंग के पीएफसीवन के लिंक पर क्लिक करें.चवन्नी को लगा कि यह हिंदी भाषियों के लिए भी अच्छा मौका है.

Sunday, September 16, 2007

सांवरिया समारोह:ऋषि की दारु ,अनिल का ठुमका


शनिवार,१५ सितंबर की रात यादगार रहेगी.चवन्नी दिल्ली में था.वहाँ पता चला कि शनिवार को सांवरिया का म्यूजिक रिलीज समारोह है. वह भाग कर मुंबई पहुचा.समारोह का समय आठ बजे बताया गया था.रात दस बजे तक सुगबुगाहट नहीं दिखी तो चवन्नी चिंतित हो गया.उसने देर होने की वजह मालूम कि तो पता चला कि कृष्णा जी देर से आ पाएंगी.अब आप यह न पूछ बैठना कि कृष्णा जी कौन हैं?कृष्णा जी राज कपूर की पत्नी और सांवरिया से लांच हो रहे हीरो रणवीर कपूर की दादी हुईं.
हिंदी फिल्मों के निर्माण में म्यूजिक रिलीज का खास महत्व होता है.मुहूर्त के बाद यह ऐसा मौका होता है,जब फिल्म के सारे लोग एकत्रित होते हैं.आम दर्शकों को फिल्म की पहली झलक गानों से ही मिलती है.वैसे भी हिंदी फिल्मों में संगीत का हमेशा खास स्थान रहा है.इन दिनों तो फिल्म के प्रचार के लिए अलग से गाने शूट किये जाते हैं और उन्हें फिल्म के अंत या शुरू में दिखाया जता है.उसके पहले उनका उपयोग फिल्म के टीवी विज्ञापन में किया जाता है.सांवरिया संजय लीला भंसाली की फिल्म है.इस बार वे ऋषि कपूर के बेटे रणवीर कपूर और अनिल कपूर की बेटी सोनम कपूर के साथ रोमांटिक फिल्म बना रहे हैं.रणवीर को आरके बैनर के वारिस के तौर पर पेश किया जा रहा है.चवन्नी पूछना चाहता है कि क्या करीना और करिश्मा आरके बैनर से बहार की हैं?असल में वारिस तो पुरुष ही हो सकता है ना.शायद ऐसी धारणा की ही वजह से कल रात के समारोह में दोनों बहनें नही आयी थीं और उनके माँ-बाप रणधीर कपूर और बबिता भी नही दिखे।कल की रात सब रो रहे थे .सोनम् को पर देख कर अनिल कपूर और सुनीता की आंखों में आंसू थे.उधर रणवीर के पिता ऋषि कपूर की खुशी बग़ैर जाम के छलक रही थी. नीतू सिंह थोड़े शांत मिजाज की महिला हैं.उनमें कपूर परिवार का उतावलापन नहीं दिखता.कल भी वह शांत थीं.हां,ऋषि कपूर उतावले थे.वे जल्दी से जल्दी दारु की बोतल खोलना चाहते थे.अनिल कपूर में अलग तरीके का जोश था.एक तरफ उनकी आंखें खुशी से गीली थीं तो दूसरी तरफ मंच पर आने के बाद उन्होंने सांवरिया के गीत पर ठुमके भी लगाए. चवन्नी को खुशी है कि हिंदी फिल्मों के आकाश में 9 नवंबर को दो सितारों का उदय होगा और ये सितारे अनजाने में शाहरुख खान को चुनौती देंगे.उसी दिन शाहरुखा खान की ओम शांति ओम भी रिलीज हो रही है.आप तय करें कि पहले दिन का पहले शो में आप कौन सी फिल्म देखने जाएंगे?चवन्नी आप को ताजा जानकारियां देने के लिए वचनबद्ध है.अरे हां,चवन्नी यह बताना भूल रहा था कि सोनम कपूर को मंच पर सलमान खान ले आए थे और रणवीर कपूर को रानी मुखर्जी ले आई थीं.

Saturday, September 15, 2007

नन्हे जैसलमेर- विश्वास, कल्पना और हकीकत का तानाबाना


-अजय ब्रह्मात्मज
विश्वास , कल्पना और हकीकत के तानेबाने से सजी समीर कर्णिक की नन्हे जैसलमेर नाम और पोस्टर से बच्चों की फिल्म लगती है। इसमें एक दस साल का बच्चा है जो जैसलमेर में रहता है। छोटी उम्र से ही पारिवारिक जिम्मेदारियां निभा रहा नन्हे काफी तेज-तर्रार और होशियार है। वह चार भाषाएं जानता है और जैसलमेर घूमने आए पर्यटकों को आसानी से खुश कर लेता है। समीर कर्णिक ने इस बार बिल्कुल अलग भावभूमि चुनी है और अपनी बात कहने में सफल रहे हैं। उन्होंने नन्हे को लेकर एक फंतासी कथा बुनी है। इस कथा में उन्होंने एक बच्चे के मनोविज्ञान को समझते हुए रोचक तरीके से संदेश भी दिया है।
नन्हे जैसलमेर बहुत छोटा था तो फिल्म स्टार बॉबी देओल ने अपनी जैसलमेर यात्रा में उसे संयोग से गोद में उठा लिया था। थोड़ा बड़ा होने पर नन्हे यह मान बैठता है कि बॉबी उसका दोस्त है। नन्हे का लॉजिक है कि बॉबी ने तमाम बच्चों के बीच से उसे ही क्यों उठाया? वह बॉबी को पत्र लिखता रहता है और अपने परिवार की ताजा जानकारियां भेजता रहता है। उसके कमरे में बॉबी की अनगिनत तस्वीरें लगी हैं। उसकी मां और बहन भी बॉबी के प्रति उसके इस लगाव से परेशान हैं। यहां तक कि जैसलमेर के लोग भी उसके इस लगाव से परिचित हैं। एक दिन नन्हे टीवी पर बॉबी की नयी फिल्म के मुहूर्त की खबर देखता है। अगले दिन लोग स्थानीय अखबार में छपी खबर उसे सुनाते हैं कि बॉबी अगली फिल्म की शूटिंग के लिए जैसलमेर आ सकता है। इस खबर को सुनने के बाद से नन्हे अपने दोस्त बॉबी की उत्कट प्रतीक्षा करता है। बॉबी आता है और फिर उसकी संगत में नन्हे के जीवन में बदलाव आरंभ होता है। मां चाहती थी कि वह पढ़ ले ़ ़ ़वह मां की इच्छा पूरी करता है। हम देखते हैं कि नन्हे बिल्कुल बदल गया है। नन्हे में आये इस परिवर्तन से दर्शक के तौर पर हम खुश होते हैं, तभी निर्देशक समीर कणिर्क का हस्तक्षेप होता है और हमें पता चलता है कि बॉबी वास्तव में आया ही नहीं था। हम जो देख रहे थे वह सब नन्हे के दिमाग में चल रहा था।
समीर कर्णिक ने फंतासी और यथार्थ का सुंदर मिश्रण किया है। हो सकता है कि उनकी यह कोशिश दर्शकों की समझ में न आए। उन्होंने पहले पूरी फंतासी गढ़ी है और फिर उस फंतासी को तोड़ कर दिखाया है। एक तरह से उन्होंने अच्छा ही किया कि फंतासी और कल्पना के सामंजस्य से पैदा हकीकत पर जोर दिया है। समीर ने संदेश दिया है कि विश्वास से कल्पना जन्म लेती है और फिर वही हकीकत का रूप लेती है। हम जो चाहते है, उसे पा सकते हैं। प्रेरक कोई भी हो सकता है। कई बार हमारे प्रिय आदर्श भी प्रेरक बन जाते हैं। नन्हे के जीवन में आया परिवर्तन वास्तव में उसके सोच से ही आया है।
नन्हे जैसलमेर में बॉबी देओल ने खुद की ही भूमिका निभायी है। कहा जा सकता है कि स्वयं की भूमिका में वे अपने अन्य पूर्व किरदारों से अधिक विश्वसनीय और आकर्षक लगे हैं। नन्हे की भूमिका में बाल कलाकार द्विज यादव की मासूमियत प्रभावित करती है। इस फिल्म की छोटी भूमिकाओं में कई किरदार अपनी सहजता से कहानी को विश्वसनीय बनाते हैं। अगर संवादों में राजस्थानी बोली का उपयोग किया गया होता तो फिल्म और भी प्रभावी होती। फिर भी समीर कर्णिक अपनी पिछली फिल्म से आगे बढ़े हैं और उन्होंने सर्वथा नवीन विषय पर फिल्म बनाने का सराहनीय प्रयास किया है। अच्छा है कि नन्हे जैसलमेर बाल फिल्म के तौर पर प्रचारित और प्रदर्शित नहीं की गई है।

Sunday, September 9, 2007

मुसलमान हीरो

पहले 'चक दे इंडिया' और फिर 'धोखा'... अ।गे-पीछे अ।ई इन दोनों फिल्मों के नायक मुसलमान हैं. और ये दोनों ही नायक हिंदी फिल्मों में सामान्य तौर पर अ।ए मुसलमान किरदारों या नायकों की तरह नहीं हैं. पहली बार हम उन्हें अ।सप।स के वास्तविक मुसलमान दोस्तों की तरह देखते हैं. याद करें तो हिंदी फिल्मों में मुसलमान किरदारों को त्याग की मूर्ति के रूप में दिखाने की परंपरा रही है. नायक का यह नेकदिल मुसलमान दोस्त दर्शकों का प्यारा रहा है, लेकिन निर्माता-निर्देशकों के लिए वह एक फार्मूला रहा है. फिर मणि रत्नम की 'रोजा' अ।ई. हालांकि काश्मीर की पृष्ठभमि में उन्होंने अ।तंकवादी मुसलमानों का चित्रण किया था, लेकिन 'रोजा'के बाद की फिल्मों में मुसलमान किरदार मुख्य रूप से पठानी सूट पहने हाथों में एके-47 लिए नजर अ।ने लगे.
'गर्म हवा', 'सरफरोश', 'पिंजर' अ।दि ऐसी फिल्में हैं, जिन में मुसलमान किरदारों को रियल परिप्रेक्ष्य में दिखाया गया. उन्हेंइन फिल्मों में किसी खास चश्मे से देखने या सांचे में ढ़ालने के बजाए वास्तविक रूप में चित्रित किया गया. हिंदी फिल्मों में न जाने किस वजह से निर्माता.निर्देशक मुसलमान किरदारों को मुख्य भूमिकाओं में लेने से बचते रहे हैं. भारतीय समाज में मुसलमान समुदाय जिस प्रतिशत में हैं, उसी प्रतिशत में उन्हें हिंदी सिनेमा के पर्दे पर प्रतिनिधित्व नहीं मिला है. और सिर्फ मुसलमान ही क्यों, बाकी समुदायों से भी हिंदी फिल्मों के निर्माता-निर्देशक परहेज करते हैं. एक तर्क दिया जात। है कि चूंकि इस देश के अधिकांश दर्शक हिंदू हैं, इसलिए मुख्य किरदारों के नाम हिंदू परिवारों में प्रचलित नाम होते हैं. किसी रोमांटिक या लव स्टोरी फिल्म के नायक-नायिका मुसलमान नहीं होते. यह एक अघोषित नियम है.
चालीस-पचास साल पहले मुसलिम सोशल के नाम पर मुसलिम परिवेश की फिल्में अ।ती थीं. इन फिल्मों में मुसलिम तहजीब, रवायत और सलीकों का सुंदर चित्रण रहता था. पर्दा, शेर-ओ-शायरी और नाच-गानों से भरपूर इन फिल्मों की अलग रंगत रहती थी. धीरे-धीरे ऐसी फिल्मों का माहौल इतना नकली और कृत्रिम हो गया कि दर्शकों ने ऐसी फिल्मों में रुचि लेना बंद कर दिया. नतीजतन ऐसी फिल्में बननी बंद हो गई. मुसलिम परिवारों को लेकर श्याम बेनेगल ने 'मम्मो', 'सरदारी बेगम' और 'जुबैदा' का निर्देशन किया. इस त्रयी का लेखन खालिद मोहम्मद ने किया था. खालिद मोहम्मद ने सचमुच मुसलिम परिवेश को उसकी धड़कनों और बारीकियों के साथ चित्रित किया थ।. बाद में उन्होंने खुद 'फिजा' बनाई तो उसमें शहरी मुसलमान युवक के द्वंद्व को सामने रखा.
'चक दे इंडिया' और 'धोखा' में मुसलमान किरदारों के चित्रण की ताजगी प्रभावित करती है. शिमित अमीन और पूजा भट्ट ने अपने नायकों को मॉडर्न मुसलमान नागरिक के तौर पर पेश किया है. 'चक दे इंडिया' में गद्दार के आरोपों से घिरा कबीर खान खुद को राष्ट्रवादी साबित करता है. वह विजेता महिला हॉकी टीम का गठन करता है. वह सवाल भी करता है कि आखिर क्यों हमें ही अपनी राष्ट्रीयता साबित करनी पड़ती है? यह एक अहम सवाल है. आखिर क्यों हर मुसलमान को शक की निगाह से देखा जात। है? 'धोखा' का नायक जैद अहमद अपनी बीवी के जेहादी हो जाने का पक्का सबूत पा जाने पर भी खुद को उससे अलग रखते हुए सच की तह तक पहुंचता है. अपने अधिकारों के लिए उसकी दृढ़ता हिंदी फिल्मों और भारतीय समाज के लिए नयी घटना है. हमें इसका स्वागत करना चाहिए और उम्मीद करनी चाहिए कि और भी निर्माता-नर्देशक ऐसे वास्तविक मुसलमान किरदारों को लेकर फिल्में बनाएंगे. एक-दूसरे के प्रति समझदारी विकसित करने में ऐसी फिल्में सहायक हो सकती हैं. साथ ही भारतीय समाज में मुसलमान नागरिकों के योगदान को भी सही परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकेगा.

Saturday, September 8, 2007

इंस्टैंट खुशी का धमाल

- अजय ब्रह्मात्मज
यह ऐसी फिल्म है जिसके पोस्टर और परदे से हीरोइन नदारद है। इंद्र कुमार ने एक प्रयोग तो कर लिया। हो सकता है सिर्फ हीरोइनों के नाम पर फिल्म देखने वाले दर्शक निराश हों।
धमाल चार बेवकूफ किस्म के लड़कों की कहानी है जो जल्द से जल्द अमीर बनना चाहते हैं। उनकी बेवकूफियों के चलते हाथ आया हर काम बिगड़ जाता है। उन्हें अचानक एक ऐसा व्यक्ति मिलता है जो मरते-मरते दस करोड़ रुपयों का सुराग बता जाता है। संयोग से उसी व्यक्ति के पीछे इंस्पेक्टर कबीर नाइक भी लगा हुआ है। काफी देर तक इनकी लुका छिपी चलती है। 10 करोड़ हासिल करने के चक्कर में वो एक-दूसरे को धोखा देने से बाज नहीं आते। आखिरकार रुपये हासिल करने में कामयाब होते हैं और पैसे आपस में बांट लेते हैं। तभी वो लाइमलाइट में आते हैं और घोषणा होती है कि एक चैरिटी संस्था में रकम देने आये हैं। उन पर भी नेकनीयती हावी होती है और वे बगैर मेहनत से अर्जित धन को दान कर संतुष्ट हो जाते हैं।
इंद्र कुमार की यह फिल्म चुटकुलों, हास्यपूर्ण परिस्थितियों और किरदारों की बेवकूफियों के कारण हंसाती है। थोड़ी देर के बाद आप तैयार हो जाते हैं कि उन चारों को कोई न कोई ऐसी गलती करनी ही है या फिर ऐसा संवाद बोलना है कि आप हंसें। इस बार इंद्र कुमार ने द्विअर्थी संवादों का सहारा नहीं लिया है। धमाल का हास्य-विनोद सतही और चालू किस्म का है। इस कारण सिनेमाघर से बाहर निकलने पर आप उन चुटकुलों और दृश्यों को भूल जाते हैं। इंस्टैंट खुशी कपूर की तरह होती है। इधर हंसे, उधर भूले। एक्टिंग के लिहाज से बात करें तो संजय की उम्र और थकान दिखने लगी है। अब वे ऐसी भूमिकाओं में नहीं जमते। अरशद वारसी और रितेश देशमुख फार्म में हैं। जावेद जाफरी कुछ विशेष करने के चक्कर में खुद को दोहराने लगते हैं। आशीष चौधरी को समझना चाहिए कि सिर्फ चिल्लाने से हंसी नहीं पैदा होती।

साधारण फिल्मों की फेहरिस्त में डार्लिग

-अजय ब्रह्मात्मज
राम गोपाल वर्मा की डार्लिग उन दर्शकों के लिए सबक है जो विवाहेतर रिश्तों में फंसे हैं। आपकी प्रेमिका भूत बनकर भी आपका पीछा कर सकती है। सो, बेहतर है कि अभी से संभल जाएं।
बीवी और वो के साथ डबल शिफ्ट कर रहे आदित्य सोमण (फरदीन खान) को लगता है कि वह डबल मजे ले रहा है। एक दिन अचानक पता लगता है कि वो गर्भवती हो गई है। उनमें हाथापाई होती है और वो को ऐसी चोट लगती है कि वह मर जाती है। किस्सा यहीं से शुरू होता है। वो यानी कि गीता मेनन (एषा देओल) बदले की भावना से आदित्य की जिंदगी और घर में प्रवेश करती है। भेद खुलने तक स्थितियां काफी उलझ चुकी होती हैं। बीवी अश्विनी की मौत हो जाती है। गीता की भटकती आत्मा अपने प्रेमी आदित्य के साथ रहने के लिए अश्विनी (ईशा कोप्पिकर) के शरीर में प्रवेश कर जाती है।
वहम, अंधविश्वास और अतार्किक घटनाओं की यह कहानी किसी भी स्तर पर नहीं छूती। राम गोपाल वर्मा की कमजोर और साधारण फिल्मों की फेहरिस्त में डार्लिग भी शामिल की जाएगी। सोच के स्तर पर इस दिवालियापन को लेकर क्या कहें?

अपना आसमान के बहाने यथार्थ का धरातल

-अजय ब्रह्मात्मज
कौशिक राय ने विशेष किस्म के बच्चों और उनके माता-पिता के रिश्तों को लेकर अत्यंत संवेदनशील फिल्म बनाई है। ऐसे विषयों पर कम फिल्में बनी हैं। सुना है कि आमिर खान की फिल्म तारे जमीं पर की भावभूमि भी यही है। वहां किरदार और रिश्ते अलग हैं।
मध्यवर्गीय परिवार के रवि (इरफान खान) और पद्मिनी (शोभना) के खुशहाल परिवार में बुद्धि (ध्रुव पियूष पंजनानी) के आने से नई खुशी आती है। एक दिन बुद्धि रवि के हाथों से गिर जाता है। बुद्धि के थोड़ा बड़ा होने पर रवि और पद्मिनी पाते हैं कि उनका बेटा अन्य बच्चों की तरह सामान्य नहीं है। वह ठीक से बोल नहीं पाता। कुछ भी सीखने में ज्यादा समय लेता है। वे उसे सामान्य रूप में देखने के लिए हर कोशिश करते हैं। डाक्टर से लेकर चमत्कार तक आजमाते हैं। एक चमत्कारी दवा से बुद्धि तेज दिमाग का लड़का बन जाता है लेकिन उसके बाद दूसरी परेशानियां आरंभ होती हैं, जो माता-पिता के साथ ही बुद्धि को भी भावनात्मक रूप से झकझोर देती हैं।
अपना आसमान का स्पष्ट मैसेज है कि अपने विशेष बच्चे की विशेषताओं को समझें और उसे उसी रूप में स्वीकार करें। उन्हें दया या सहानुभूति से अधिक प्यार और स्वीकार चाहिए। शोभना और इरफान ने माता-पिता की चिंताओं और दुविधाओं को बहुत अच्छी तरह चित्रित किया है। रवि अपनी स्थितियों में ही विनोद पैदा करता है। वह प्लास्टिक कंपनी में काम करता है। फिल्म में उसके पेशे का रूपात्मक उपयोग किया गया है। हिंदी फिल्मों के चालू मसालों से अलग किस्म की फिल्म देखने के शौकीन दर्शकों को अपना आसमान पसंद आएगी।

हारे (सितारे) को हरिनाम

कोई कहीं भी आए.जाए... चवन्नी को क्या फर्क पड़ता है? इन दिनों संजय दत्त हर प्रकार के देवतओं के मंदिरों का दरवाजा खटखटा रहे हैं. उन्हें अमर्त्य देवताओं की सुध हथियार मामले में फंसने और जेल जाने के बाद आई. आजकल तो आए दिन वे किसी न किसी मंदिर के चौखटे पर दिखाई पड़ते हैं और हमारा मीडिया उनकी धार्मिक और धर्मभीरू छवि पेश कर खुश होता है. हाथ में बध्धी, माथे पर टीका और गले में धार्मिक चुनरी डाले संजय दत्त से सभी को सहानुभूति होती है. उन पर दया अ।ती है. चवन्नी को लगता है कि संजय दत्त इन धार्मिक यात्राओं से अपने मकसद में कामयाब हो रहे हैं. अगोचर देवता तो न जाने कब कृपा करेंगे? संसार के गोचर प्राणियों की धारणा है कि बेचारा संजू बाबा नाहक फंस गया. उसने जो अवैध हथियार रखने का अपराध किया है, उसकी सजा ज्यादा लंबी होती जा रही है.
चवन्नी ने गौर किया है कि कानून की गिरफ्त में अ।ने के बाद संजू बाबा ने अपनी हिंदू पहचान को मजबूत किया है. उन्होंने मुसलमान दोस्तों से एक दूरी बनाई और सार्वजनिक स्थलों पर नजर आते समय हिंदू श्रद्धालु के रूप में ही दिखे. बहुत लोगों को लग सकता है कि यह कौन सी बड़ी बात हो गई. बड़ी बात है... इस देश के बहुसंख्यक के साथ जुड़ना या अल्पसंख्यक पहचान कायम करना हमारी सामाजिक अस्मिता का हिस्सा बनता जा रहा है. सलमान खान कोर्ट में पेशी के समय कटोरी छाप सफेद टोपी पहन लेते हैं. संजय दत्त अपनी पेशियों के समय ललाट पर लाल-काला टीका लगा लेते हैं.
किसी की श्रद्धा और अ।स्था पर सवाल नहीं उठाया जा सकत।, लेकिन अ।स्थाओं का सार्वजनिक प्रदर्शन हो और उसके पीछे कोई निहित मंशा हो तो चवन्नी चौंकता है.. क्या वजह है कि अचानक तीर्थाटन में रुचि बढ़ गई फिल्मी हसितयों की... अमिताभ बच्चन दिन-रात मंदिरों के फेरे लगाते रहते हैं, संजय दत्त का हम जिक्र कर ही रहे हैं, बाकी सब भी निजी और सार्वजनिक तौर पर भगवान की शरण में माथा टेकते हैं. चवन्नी सोचता है कि जब ऐसे कामयाब लोग धर्मभीरू और अंधविश्वासी हो सकते है तो इनको अपना आदर्श मानने वाले बेचारे दर्शक और अ।मजन क्या सोचते और करते होंगे?

Friday, September 7, 2007

शुक्रवार ७ सितंबर

चवन्नी ने तय किया है कि आज से हर शुक्रवार को वह मुम्बई की फिल्म इंडस्ट्री में चल रही चर्चाओं और बदलती हवा के रुख़ की जानकारी आप को देगा.कल देर रात चवन्नी 'धमाल' के प्रीमियर से लौटा.मुम्बई के अंधेरी उपनगर के पश्चिमी इलाक़े में कई मल्टीप्लेक्स आ गए हैं.वहीँ फिल्मों के प्रीमियर हुआ करते हैं.वैसे प्रीमियर तो अब नाम भर ही रह गया है.ना वो पहले जैसा ताम-झाम बच गया है और ना लाव -लश्कर राग गया है.प्रीमियर पैसे बचाने का साधन बन गया है।खैर,कल रात 'धमाल' के प्रीमियर में संजय दत्त आये थे.एक तरह से कहें तो उनके जमानत पर छूटने की खुशी में ही इस प्रीमियर का आयोजन हुआ था.अगर आप को याद हो तो उनकी गिरफ्तारी के समय कई कार्यक्रम रद्द कर दिए गए थे.संजय दत्त आये थे.उन्होने काली बंडी पहन रखी थी.आप ने देखा होगा कि वह झूम कर चलते हैं.कल रात उनकी चाल में पुराना जोश नही था.कानून,जेल और सजा से लोग टूट जाते हैं.संजय के साथ जो हुआ और हो रह है उस पर फिर कभी.'धमाल' चवन्नी के ख़्याल से पहली हिंदी फिल्म है,जिस में कोई हीरोइन नही है.इसके पोस्टर पर भी मर्द ही मर्द हैं.है ना अजूबी बात.लेकिन इसका मतलब यह ना लगाएं कि इस में कोई मर्दाना बात है.चार बेवकूफ हैं और उनकी बेवकूफियां हंसाती हैं.इन्द्र कुमार ने कुछ भी नया नही किया है.संजय दत्त परदे पर भी थके-थके दिखते हैं.यह मौका है ...वे थोडा आराम करें और अपने कैरियर के बारे में भी सोचें.संजय अपने पिता से भी साधारण ऐक्टर हैं.हां,इस फिल्म में अरसद वारसी और रितेश देशमुख ठीक लगे हैं.हंसी आती है.कुछ चुटकुले और हंसी-मजाक के पल हैं.लेकिन हो सकता है फिल्म देख कर सिनेमाघर से बहार आते-आते आप सब भूल जाये.आजकल यही होता है।राम गोपाल वर्मा कि हिम्मत देखिए.अभी '...आग' के खिलाफ भड़का लोगों का ग़ुस्सा ठंडा भी नही हुआ था कि वे 'डार्लिंग' कहने चले आये.भूत की यह कहानी डराती नही है.चवन्नी को तो रामू कि सोच पर हंसी आ रही है.क्या सोच कर उनहोंने ऐसी उलजलूल फिल्म बनायीं.रामू कि साधारण फिल्मों कि लिस्ट बढती जा रही है।इस हफ्ते कि संवेदनशील फिल्म 'अपना आसमान' है.आप इसे जरूर देखें और अगर आपके आसपास कोई एह बच्चा हो तो उसे समझने कि कोशिश करें.'अपना आसमान' मनोरंजक फिल्म नही है,लेकिन यह बोर नही करेगी.इरफान और शोभना के अभिनय के लिए भी इसे देख सकते हैं.इस फिल्म के कुछ दृश्य मर्मान्तक हैं.इसके अलावा यह फिल्म आप कि समझदारी में इजाफा करती है.

Wednesday, September 5, 2007

खोया खोया चांद और सुधीर भाई - 4


सुधीर भाई की फिल्मों में पीरियड रहता है, लेकिन भावनाएं और प्रतिक्रियाएं समकालीन रहती हैं. सबसे अधिक उल्लेखनीय है उनकी फिल्मों का पॉलिटिकल अंडरटोन ... उनकी हर फिल्म में राजनीतिक विचार रहते हैं. हां, जरूरी नहीं कि उनकी व्याख्या या परसेप्शन से अ।प सहमत हों. उनकी 'हजारों ख्वाहिशें ऐसी' रियलिज्म और संवेदना के स्तर पर काफी सराही गयी है और हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के अधिकांश लोग बगैर फिल्म के मर्म को समझे ही उसकी तारीफ में लगे रहते हैं. होता यों है कि सफल, चर्चित और कल्ट फिल्मों के प्रति सर्वमान्य धारणाओं के खिलाफ कोई नहीं जाना चाहता. दूसरी तरफ इस तथ्य का दूसरा सच है कि अधिकांश लोग उन धारणाओं को ही ओढ़ लेते हैं. एक बार चवन्नी की मुलाकात किसी सिनेप्रेमी से हो गयी. जोश और उत्साह से लबालब वह महत्वाकांक्षी युवक फिल्मों में घुसने की कोशिश में है. वह गुरुदत्त, राजकपूर और बिमल राय का नाम लेते नहीं थकता. चवन्नी ने उस से गुरुदत्त की फिल्मों के बारे में पूछा तो उसने 'कागज के फूल' का नाम लिया. 'कागज के फूल' का उल्लेख हर कोई करता है. चवन्नी ने सहज जिज्ञासा रखी, 'क्या अ।पने 'कागज के फूल' देखी है और कब देखी है?' युवक थोड़ी देर के लिए चौंका... फिर संभलते हुए कहा, 'हां, टीवी पर देखा था... कॉलेज के दिनों में...' चवन्नी का अगला सवाल था, 'अ।पको उस फिल्म में क्या खास बात दिखी?' इसके जवाब में उसने वही सारी बातें दोहराई जो अमूमन सारे लोग गुरुदत्त के बारे में बोलते हैं. उस युवक के पास 'कागज के फूल' का अपना विवरण या परसेप्शन नहीं था.
सुधीर भाई की बात चल रही है. चवन्नी जानना चाहेगा कि 'हजारों ख्वाहिशें ऐसी' की राजनीतिक परतों को अ।प किस रूप में देखते हैं. नक्सलवाद के पृष्ठभूमि पर बनी 'हजारों ख्वाहिशें ऐसी' से राजनीतिक विचारधारा... खासकर वामपंथी विचारधारा के दर्शकों की कितनी सहमति है? 'हजारों ख्वाहिशें ऐसी' हिंदी की चालू फार्मूला फिल्मों की तुलना में बहुत अच्छी और दर्शनीय फिल्म है, लेकिन क्या वह तत्कालीन राजनीतिक रेशों को खोल पाती है?
चवन्नी की बहकने की अं।दत छूटती नहीं. कहां तो 'खोया खोया चांद' की बात चल रही थी और कहां वह 'हजारों ख्वाहिशें ऐसी' का प्रसंग ले अ।या. लेकिन चवन्नी को लगता है कि समय-समय पर हमें अपने प्रिय फिल्मकारों की फिल्मों को भी मथते रहना चाहिए... कई नए अर्थ निकल अ।ते हैं और कई बार ऐसा भी होता है कि हम जिसे मक्खन समझ रहे होते हैं... वास्तव में वह झाग होता है. अब अ।प बेमतलब का मतलब न जोड़ बैठें?




धन्य हैं देव साहेब!


देव साहेब धन्य हैं.उनका निमंत्रण पत्र आया है.एसएमएस और ईमेल के ज़माने में उनहोंने हाथ से लिखा पत्र भेजा है.हाँ ,तकनीकी सुविधा का फायदा उठा कर उनहोंने यह पत्र स्कैन करवा कर भेजा है.आप इस पत्र को यहाँ पढ़ सकते हैं.चवन्नी ७ की शाम को बतायेगा कि उनहोंने चाय पर क्यों बुलाया था.उनकी सादगी देखिए,लिख रहे हैं अपने साथ चाय पीने का सौभाग्य दीजिए.

Tuesday, September 4, 2007

क्यों वंचित रहे चवन्नी ?



पिछले दिनों अजय ब्रह्मात्मज ने दैनिक जागरण के मनोरंजन परिशिष्ट 'तरंग' के अपने कॉलम 'दरअसल' में चवन्नी सरीखे दर्शकों की चिंता व्यक्त की. आजकल मल्टीप्लेक्स संस्कृति की खूब बात की जा रही है, लेकिन इस मल्टीप्लेक्स संस्कृति ने नए किस्म का मनुवाद विकसित किया है. मल्टीप्लेक्स संस्कृति के इस मनुवाद के बारे में सलीम आरिफ ने एक मुलाकात में बड़ी अच्छी तरह समझाया. क्या कहा,आप उन्हें नहीं जानते? सलीम आरिफ ने गुलजार के नाटकों का सुंदर मंचन किया है. रंगमंच के मशहूर निर्देशक हैं और कॉस्ट्यूम डिजाइनर के तौर पर खास स्थान रखते हैं.

बहरहाल, मल्टीप्लेक्स संस्कृति की लहर ने महानगरों के कुछ इलाकों में सिंगल स्क्रीन थिएटर को खत्म कर दिया है. इन इलाकों के चवन्नी छाप दर्शकों की समस्या बढ़ गई है. पहले 20 से 50 रूपए में वे ताजा फिल्में देख लिया करते थे. अब थिएटर ही नहीं रहे तो कहां जाएं ? नयी फिल्में मल्टीप्लेक्स में रिलीज होती हैं और उनमें घुसने के लिए 100 से अधिक रूपए चाहिए. अब चवन्नी की बिरादरी का दर्शक जाएं तो कहां जाएं ?

चवन्नी चैप जिस इलाके में रहता है. उस इलाके में 6 किलोमीटर के दायरे में लगभग पचास स्क्रीन के आधे दर्जन से ज्यादा मलटीप्लेक्स हैं. इन मल्टीप्लेक्स पर लगे नयी फिल्मों के बड़े-बड़े पोस्टर देख कर चवन्नी का मन ललचाता है, लेकिन उसे सब्र करना पड़ता है. आस-पास के सिंगल स्क्रीन में वाहियात हिंदी फिल्में या भोजपुरी फिल्में ही चलती हैं. ऐसे में चवन्नी को वीसीडी या डीवीडी की दरकार पड़ती है. चवन्नी की बिरादरी पर आरोप है कि उनकी वजह से ही पायरेटेड वीसीडी/डीवीडी का धंधा चलता है. लेकिन आप ही बताओ ना,चवन्नी क्या करें?

आप सुधी जन ही बताएं. चवन्नी क्या करे? नयी फिल्में देखने वह कहां जाए? क्या सिनेमा देखना भी अमीरों का शौक बन जाएगा? कुछ तो करें आप लोग. चवन्नी मल्टीप्लेक्स संस्कृति में वंचित नहीं रहना चाहता. चवन्नी का भी अधिकार है कि वह ताजा से ताजा फिल्म देखे, मगर कैसे? पड़ोसी केबल वाला भी तो अब डर से पायरेटेड डीवीडी नहीं चलाता. क्या अब चवन्नी को अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान और अ।मिर खान की फिल्म देखने के लिए हर बार दो महीने रूकना पड़ेगा ?

Monday, September 3, 2007

चवन्नी पर बोधिसत्व

चवन्नी को बोधिसत्व की यह टिपण्णी रोचक लगी.वह उसे जस का तस् यहाँ यहाँ प्रस्तुत कर खनक रहा है।आपकी टिपण्णी की प्रतीक्षा रहेगी.- चवन्नी चैप
चवन्नी खतरे में है। कोई उसे चवन्नी छाप कह रहा है तो कोई चवन्नी चैप। वह दुहाई दे रहा है और कह रहा है कि मैं सिर्फ चवन्नी हूँ। बस चवन्नी। पर कोई उसकी बात पर गौर नहीं कर रहा है। और वह खुद पर खतरा आया पा कर छटपटा रहा है। यह खतरा उसने खुद मोल लिया होता तो कोई बात नहीं थी। उसे पता भी नहीं चला और वह खतरे में घिर गया। जब तक इकन्नी, दुअन्नी, एक पैसे दो पैसे , पाँच, दस और बीस पैसे उसके पीछे थे वह इतराता फिरता रहा।उसके निचले तबके के लोग गुम होते रहे, खत्म होते रहे फिर भी उसने उनकी ओर पलट कर भी नहीं देखा। वह अठन्नी से होड़ लेता रहा। वह रुपये का हिस्सेदार था एक चौथाई का हिस्सेदार। पर अचानक वह खतरे के निशान के आस-पास पाया गया। उसे बनाने वालों ने उसकी प्रजाति की पैदावार पर बिना उसे इत्तिला दिए रोक लगाने का ऐलान कर दिया तो वह एक दम बौखला गया। बोला बिना मेरे तुम्हारा काम नहीं चलेगा। पर लोग उसके गुस्से पर मस्त होते रहे। निर्माताओं की हँसी से उसको अपने भाई-बंदों के साथ हुए का अहसास हुआ।अब चवन्नी के गिरने की आवाज बहुत धीमी हो गई है। वह पैर के पास गिरता है तो भी पता भी नहीं चलता। कभी-कभी तो उसे गिरता जान कर जेब खुश होती है कि अच्छा हुआ यह गिर गया। बेवजह मुझे फाड़ने पर लगा था। चवन्नी को ज्यादा दुख इस बात का भी है कि उसे गिरा पाकर कोई खुश नहीं होता। ताँबे का होता तो बच्चों के करधन और गले में नजरिया बन कर बचा लेता खुद को। जस्ते का होता तो बरतन बन कर घरों में घुस लेता। पता नहीं किस धातु से बनाया उसको बनाने वालों ने। वह बार-बार खुद को खुरच कर देखता है और समझ नहीं पाता कि किस मिट्टी का बना है वह।उसे भारत के देहातों ने पहले दुत्कारा। फिर शहरों ने । फिर सबने। वह बेताब होकर एक अच्छी खबर के लिए तरस रहा है। और उसके लिए मुंबई से एक अच्छी खबर है भी। यहाँ की बसों में उसके होने को मंजूरी दे दी गई है। और दक्षिण भारत के किसी मंदिर से उसे और अठन्नी को हर महीने करोड़ो की संख्या में लाया जाएगा। पर उसे बहुत राहत नहीं है। वह अपने नये चमकीले साथियों को न पाकर दुखी है। वह अपनी प्रजाति के पैदाइश पर रोक से हताश है। वह रातों में सोते से जाग उठता है, कि कहीं कल बसों में उसकी खपत बंद हो जाए तो। असल में वह खत्म नहीं होना चाहता । उसे इतिहास में नहीं मौजूदा समाज में अपनी जगह चाहिए। जेबों में गुल्लकों में अपनी खनक सुनना चाहता है चवन्नी। वह अपनों के बीच रहना चाहता है। पर कोई उसके होने और रोने पर विचार ही नहीं कर रहा। कोई उसकी नहीं सुन रहा जबकि वह काफी काम की बात करता सोचता है। उसके विचार अच्छे हैं, उसका नजरिया अच्छा है और उसकी, बातें, बेचैनी और दुख अपने से लगते हैंदोस्तों अपने चवन्नी को देखें- पढ़ें। उसे खुशी होगी और आप को संतोष । चवन्नी इतिहास नहीं वर्तमान में जिंदा रहेगा। हमारे आपके बीच उसकी खनक रहेगी। और खनक हमेशा अच्छी ही होती है अगर उसमें खोट ना हो।

सलमान खान के प्रशंसक ना पढ़ें


अगर आप सलमान खान के प्रशंसक हैं तो कृपया इसे ना पढ़ें.चवन्नी यहाँ कुछ ऐसी बातें करने जा रहा है ,जिससे आप को ठेस पहुंच सकती है. चवन्नी भी सलमान खान को पसंद करता है.परदे पर जब सलमान के ठुमके लगते हैं तो चवन्नी भी सीट पर उछलता है.सलमान का अंदाज़ चवन्नी को भी पसंद है.लेकिन परदे के बाहर सलमान के बर्ताव की तारीफ़ नही की जा सकती.ऐसा लगता है और यही सच भी है कि सलमान केवल अपने अब्बा के सामने खामोश और शरीफ बने रहते हैं.भाई- बहनों से उन्हें असीम प्यार है और अपने दोस्तो की भी वे परवाह करते हैं.उनको सबसे ज्यादा प्यारे माईसन और माईजान हैं ,इनके अलावा और किसी के प्रति ना तो उनके मन में इज़्ज़त है और ना ही वे परवाह करते हैं कि कौन क्या सोच रहा है.अभी जेल से छूट कर आने पर किसी टीवी पत्रकार ने उनसे पूछ दिया कि उनके घर वालों की क्या प्रतिक्रिया रही तो सामान्य तरीके से जवाब देने के बजाय उनहोंने कह कि मेरे घर वालों को मेरा जेल से आना बहुत बुरा लगा.जाहिर सी बात है कि सवाल का जवाब उनहोंने मजाक में दिया,लेकिन अमूमन उनका यही रवैया रहता है.पिछले दिनों हिंदुस्तान टाइम्स का रिपोर्टर उनसे भिड़ गया था.सलमान की आदत है कि वे सीधे मुँह किसी से बात नही करते.उनके आसपास चापलूसों की जमात रहती है,जो उन्हें सिर पर चढाये रहते हैं और उनकी हाँ में हाँ मिलाते हैं.चवन्नी ने कई बार देखा है कि वे निश्चित समय पर कहीँ नही पहुँचते.अगर पत्रकारों को १२ बजे का टाइम दिया है तो हो सकता है कि वे १२ बजे नींद से जागें.कोई उन्हें आदेश नही दे सकता.कोई उन पर दवाब नहीं दाल सकता.हमारे फिल्म स्टारों को लगता है कि दुनिया के सारे कायदे-कानून से वे ऊपर हैं.यही कारन है कि जब कभी कानून का शिकंजा कसता है तो वे सकपका जाते हैं.साड़ी हेकडी निकल जाती है.सच कहें तो सलमान निहायत बदतमीज किस्म के इन्सान हैं.एक बार एक विदेशी महिला पत्रकार ने उनसे पूछ लिया कि आप के मन में महिलाओं के लिए कोई इज़्ज़त नही है तो सलमान का छूटते ही जवाब था...महिला मेरी माँ-बहन हो तो मैं उनकी इज़्ज़त करता हूँ.आप मेरी बहन बन जाओ तो मैं आप की भी इज़्ज़त करूंगा.शूटिंग के दरम्यान कोई भी उन्हें कुछ निर्देश नही देता.चवन्नी ने देखा है कि निर्देशक सलमान से सहमती लेते है...जैसे,भाई आप ये या वो करोगे तो कैसा रहेगा.यही वजह है कि इतने सालों के कैरियर के बाद भी सलमान के पास ऐक्टर के लिहाज से उल्लेखनीय फ़िल्में नही हैं।सभी कहते हैं कि वे बहुत मददगार किस्म के इन्सान हैं.हैं ना,कभी सायिकल दे देते हैं...कभी पेंटिंग्स दान कर देते हैं...कभी कुछ और करते हैं ये सब करते हुए उनके चहरे पर गरूर रहता है.बडे ही मगरूर इन्सान हैं सलमान.एक बार किसी पत्रकार ने उनसे पूनसे उनकी हीरोइनों के बारे में पूछ दिया तो शरारती मुस्कराहट के साथ सलमान ने पूछा कि क्या बताऊं कि कब किस के साथ सोया था या किस के साथ क्या किया?आप उनके अच्छे साक्षात्कार नही पढ़ सकते,क्यों कि किसी भी सवाल के जवाब में वे सीरिअस नही रहते.चवन्नी को लगता है कि एक लोकप्रिय अभिनेता को बेहतर आदमी भी होना चाहिऐ.अफ़सोस की बात है कि सलमान इस कसौटी पर खरे नही उतरते.

Sunday, September 2, 2007

आमिर खान का ब्लॉग

आमिर खान ब्लॉग लिख रहे हैं.चवन्नी ने सोचा क्यों न उनकी बातों को हिंदी के चिट्ठाकारों और पाठकों तक पहुंचाया जाए.इसी दिशा में यह प्रयास है.इस बार थोड़ी देर हो गई है.बगली बार से उधार उन्होंने लिखा और इधर आप ने पढ़ा.

शर्म करो
रविवार,26 अगस्त,2007
आज का दिन बहुत ही उदास रहा.कल हैदराबाद में हुए बम ब्लास्ट के बारे में पढ़ा और घोर निराशा में डूब गया.दुख की बात है, और शर्म की बात है,कि लोग इतने बीमार दिमाग के हो सकते हैं.निर्दोष लोगों को मार कर भला किसी को क्या मिलेगा.मुझे लग रहा है कि इस ब्लास्ट के लिए जिम्मदर लोग दक्षिणपंथी,अतिवादी और धार्मिक समूह के होंगे...जैसा कि देश में हुए आतंक के अधिकांश हादसों में रहा है.चाहे जो भी हो,बीमार दिमाग के लोगों की ऐसी आतंकवादी गतिविधियों से निर्दोष बच्चे,औरतें और मर्द मारे जाते हैं.आप का कोई भी धर्म हो ,मैं जानना चाहता हूं कि किस धर्म में निर्दोषों की हत्या का पाठ पढाया जाता है? इतना ही नहीं ,किसी भी धर्म में निर्दोषों को नुकसान पहुचाने वालों को माफ नहीं किया जाता.जीव का अनादर मतलब ईश्वर का अनादर है.
शर्म करो!

Saturday, September 1, 2007

धोखा: सराहनीय है मौलिकता


अजय ब्रह्मात्मज

पूजा भट्ट निर्देशित फिल्म 'धोखा' समसामयिक और सामाजिक फिल्म है। 'पाप' और 'हॉली डे' में पूजा भट्ट ने व्यक्तियों के अंतर्र्सबंधों का चित्रण किया था। हिंदी फिल्मों की प्रचलित परंपरा में यहां भी फोकस में व्यक्ति है लेकिन उसका एक सामाजिक संदर्भ है। उस सामाजिक संदर्भ का राजनीतिक परिप्रेक्ष्य भी है। पूजा भट्ट की 'धोखा' का मर्म मुस्लिम अस्मिता का प्रश्न है। जैद अहमद (मुजम्मिल इब्राहिम) पुलिस अधिकारी है। एक शाम वह अपने कालेज के पुनर्मिलन समारोह में शामिल होने आया है। उसकी बीवी सारा (ट्यूलिप जोशी) किसी और काम से पूना गई हुई है। तभी उसे मुंबई में बम धमाके की खबर मिलती है। उसे पता चलता है कि धमाके में उसकी बीवी भी मारी गई है। लेकिन ऐसा लगता है कि इ स विस्फोट में वह मानव बम थी। जैद अहमद पर आरोप लगते हैं। उसकी नौकरी छूट जाती है। जैद लगातार बहस करता है कि अगर उसकी बीवी जिहादी हो गई तो इसके लिए वह कैसे दोषी हो सकता है? जैद पूरे मामले की जड़ में जाता है। वह अपने साले को जिहादी बनने से रोकता है और अपने व्यवहार से साबित करता है कि वह भी इस देश का जिम्मेदार नागरिक है। हिंदी फिल्मों में ऐसे मुस्लिम किरदार लगभग नहीं दिखे हैं। 'चक दे इंडिया' में कबीर खान गद्दारी के आरोप से निकलने के लिए जिद्दोजिहद करता है। 'धोखा' में जैद अहमद मुस्लिम अस्मिता को बगैर किसी नारे या डिफेंस के सामने रखता है। फिल्म की मौलिकता सराहनीय है। लेखक-निर्देशक का दृष्टिकोण भी प्रभावित करता है। 'धोखा' का विचार उम्दा और जरूरी है लेकिन पर्दे पर उसे उतारने में पूजा भट्ट की निर्देशकीय सोच और कल्पना सरलीकरण की सीमा में है। मुस्लिम अस्मिता के सवाल पर गहरे विमर्श के बजाय फिल्म सरल समाधान का विकल्प चुन लेती है। हमारे फिल्मकारों की यह दुविधा वास्तव में दर्शकों की रुचि-अरुचि से बनती है। देखा गया है कि हिंदी फिल्मों के दर्शक फिल्मों में गंभीर सामाजिक विमर्श से परहेज करते हैं। भट्ट कैंप ने इस फिल्म में कुछ नयी प्रतिभाओं को मौका दिया है। मुजम्मिल इब्राहिम पहले प्रयास में ही पास हो गए हैं। उनमें कैमरे के सामने खड़े होने का आत्मविश्वास है। अभिनय में कच्चापन है, जो समय के साथ निखर सकता है। ट्यूलिप जोशी बगैर ज्यादा बोले ही अपना काम कर जाती हैं। छोटी भूमिकाओं में कलाकार फिल्म को बड़ा सहारा देते हैं। विनीत कुमार, भानु उदय, अनुपम श्याम, मखीजा ने उल्लेखनीय योगदान किया है। फिल्म का गीत-संगीत भट्ट कैंप की पसंद का है, लेकिन इस बार यह उतना पापुलर नहीं हो सका। संगीतकार एम.एम. क्रीम में एक अलग मधुरता रहती है। वह संगीत के फैशन और ट्रेंड से प्रभावित नहीं दिखते।

'आग' से जख्मी हुए रामू

अजय ब्रह्मात्मज
रामगोपाल वर्मा ने आगे बढ़कर 'शोले' को फिर से बनाने का जोखिम लिया था। इस जोखिम में वह चूक गए हैं। 'शोले' इस देश की बहुदर्शित फिल्म है। इसके संवाद, दृश्य और पात्र हमारी लोकरुचि का हिस्सा बन चुके हैं। लगभग हर उम्र के दर्शकों ने इसे बार-बार देखा है। यह फिल्म रामू को भी अत्यंत प्रिय है। रामू तो पूरे खम के साथ कह चुके हैं कि 'शोले' नहीं बनी होती तो मैं फिल्मकार नहीं बन पाता। बहरहाल, घटनाएं और संवेदनाएं 'शोले' की हैं, सिर्फ परिवेश और पात्र बदल गए हैं। कहानी रामगढ़ की जगह कालीगंज की हो गई है। यह मुंबई के पास की टापूनुमा बस्ती है, जहां ज्यादातर मछुआरे रहते हैं। खूंखार अपराधी बब्बन की निगाह इस बस्ती पर लगी है। इंस्पेक्टर नरसिम्हा से उसकी पुरानी दुश्मनी है। नरसिम्हा को भी बब्बन से बदला लेना है। वह हीरू और राज को ले आता है। ये दोनों छोटे-मोटे अपराधी हैं। जो नासिक से मुंबई आए हैं रोजगार की तलाश में ़ ़ ़ बसंती यहां घुंघरू बन गई है और तांगे की जगह ऑटो चलाती है तो राधा का बदलाव दुर्गा में हुआ है, जिसका अपना नर्सिग होम है। बाकी सारे पात्र भी नाम और भेष बदलकर मौजूद हैं। 'शोले' के कुछ महत्वपूर्ण दृश्य प्रसंगों को थोड़े बदलाव के साथ पेश करने में रामू मुंह के बल गिरे हैं। रीमेक में कोई भी दृश्य मूल की तरह प्रभावशाली नहीं है। हां, कुछ नए दृश्यों में रामू अपनी छाप के साथ मौजूद हैं। गीत-संगीत और उनका फिल्मांकन रामू की अन्य फिल्मों की तुलना में भी कमजोर है। 'रामगोपाल वर्मा की आग' का कोई भी संवाद याद नहीं रहता। हां, अगर इसे नयी फिल्म की तरह देखें और याददाश्त से 'शोले' निकाल दें तो औसत फिल्मों की श्रेणी में इसे रख सकते हैं। ऐसी मेहनत, प्रतिभा और लागत के साथ रामू ने किसी नए विषय पर मौलिक फिल्म बनायी होती तो करियर और क्रियेटिविटी के लिहाज से बेहतर रहता। '़ ़ ़ आग' से खेलने में रामू जख्मी हो गए हैं। अभिनय की बात करें तो अमिताभ बच्चन और मोहन लाल को एक साथ पर्दे पर देखना किसी दर्शक के लिए यादगार अनुभव से कम नहीं। दोनों ही एक-दूसरे को उम्दा टक्कर देते हैं। '़ ़ ़ आग' का बाक्स आफिस पर जो भी हश्र हो, यह फिल्म अमिताभ की बब्बन सिंह की भूमिका के लिए याद रखी जाएगी। अजय देवगन की प्रतिभा का दुरुपयोग हुआ है। निशा कोठारी अपनी क्षमता से ज्यादा कोशिश करती नजर आती हैं। सुष्मिता सेन सादे रूप में भी अच्छी लगती हैं। नए अभिनेता प्रशांत राज निराश नहीं करते। पहली फिल्म से वह उम्मीद जगाते हैं।