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Friday, August 31, 2007

रामू की '...आग

चवन्नी को वह पहला दिन याद है.राम गोपाल वर्मा की फैक्ट्री के आगे टीवी चैनलों को ओबी वैन लगाने की jagah नहीं मिल रही थी.कानोकान सभी को खबर लग चुकी थी कि आज एक बड़ी घोषणा होगी.इंतज़ार चल रह था.सारे चैनलों को जगह दे दी गयी थी.सभी अपने कैमरे बंदूक की तरह ताने बेसब्री से जीं पी सिप्पी के आने की प्रतीक्षा कर राहे थे.रामू के होंठों पर संगीन मुस्कराहट तैर रही थी.रामू खुश होते हैं तो उनके होंठों की रंगत बदल जाती है.खुश होने पर सभी की आंखों से नूर टपकता है.रामू कि कोशिश रहती है कि कोई उनकी खुशी पकड़ ना पाए.हैं कुछ विचित्र बातें रामू के साथ.बहरहाल,उस दिन ऐतिहासिक घोषणा हुई कि रामू 'शोले' बनायेंगे.बताया गया कि आज जीं पी सिप्पी ने रामू को ये अधिकार दे दिए.

सारे चैनलों ने उस दोपहर और शाम रामू की फैक्ट्री से सीधा प्रसारण किया.ऐसा हंगामा हुआ कि हिंदी सिनेमा की तस्वीर बदलने की संभावना दिखने लगी.रामू भी इतरा रहे थे और जो कुछ मन में आ रहा था...बोल रहे थे.चवन्नी चकित है कि आम लोगों की तो छोड़िए...मीडिया के सक्रिय संवाददाताओं की स्मृति भी इतनी कमजोर हो सकती है.उस दिन रामू के कसीदे पढ़ रहे लोग '...आग'की रिलीज के बाद किसी दमकल अधिकारी की मुद्रा में नजर आ रहे हैं.क्या मीडिया को पता नहीं था और क्या उनके जरिए आम दर्शकों को नहीं मालूम था कि रामू क्या करने जा रहे हैं.अभी ऐसी हायतौबा मची हुई है मानो रामू ने कोई अपराध कर दिया हो.
रामू से अपराध हुआ है कि उन्होंने 'शोले' की रीमेक का दुस्साहस किया.वे इस फिऊम के साथ आम दर्शकों के रिश्त को नहीं आंक पाए.'शोले' हमारी लोकरुचि क हिस्सा है.कहते हैं किसी भी समाज के मिथक,किंवदती और लोककथाओं से छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए.रामू से यह गलती हो गई.अब वे उसी की सजा भुगत रहे हैं.चवन्नी को 'शोले' के '...आग' बनने का पूरा किस्सा मालूम है.चवन्नी अपने पाठकों को नहीं बताएगा तो किसे बताएगा,लेकिन थोड़ा सब्र करना होगा...


खोया खोया चांद और सुधीर भाई-३


अपनी बात कहने के बाद सुधीर भाई मुस्कुराते हैं तो रूकते हैं... उनकी मुस्कराहट ठहर जाती है ... उन क्षणों में वह आपको समय देते हैं कि उनकी कही बातों को अ।प अपने दिमाग में प्रिंट कर लें. बोलते समय उनकी पुतलियां नाचती रहती हैं, लेकिन बातें मुद्दे पर ही टिकी रहती हैं. यह कला उन्होंने बोलते-बोलते सीख ली है. मीडिया विस्फोट के इस दौर में सुधीर भाई जैसे फिल्मकार टीवी चैनलों के लिए अत्यंत उपययोगी होते हैं, क्योंकि वे मुंह के करीब माइक अ।ते ही बोलना शुरू कर देते हैं. आप इसे कतई किसी अवगुण के रूप में न लें. यह खूबी बहुत कम लोगों में हैं. चवन्नी अपने अनुभवों से कह सकता है कि यह खूबी श्याम बेनेगल में है, महेश भट्ट में है, सुधीर मिश्र में हैं और नयी पीढ़ी के अनुराग कश्यप में है. ये सभी फिल्म पर सामाजिक.राजनीतिक ... और किसी भी ... इक के परिप्रेक्ष्य से बोल सकते हैं.
सुधीर भाई 'खोया खोया चांद' को अपनी खास फिल्म मानते हैं. उनकी नजर में, 'यह फिल्म हमारी इंडस्ट्री के उन अनछुए पहलुओं और कोणों को प्रकाशित करेगी, जिनके बारे में हम फिल्मी पत्रिकाऔं के 'गपशप' कॉलमों में चटकारे लेकर पढ़ते हैं. माफ करें, 'खोया खोया चांद' फिल्मी गॉसिप पर आधारित फिल्म नहीं है. लंबा रिसर्च हुआ है. उस दौर की फिल्में देखी गयी हैं. बोलचाल, लहजा, पहनावा और माहौल के लिए बड़ी मेहनत हुई है. कुछ लोगों को पीरियड फिल्में तमाशा लगती हैं. संजय लीला भंसाली जैसे फिल्मकारों ने तो उसे अतिसमृद्धि और वैभव की अश्लीलता दे दी है. पीरियड का मतलब विशेष कालखंड को फिल्म के लिए तैयार करना है. नितिश राय और भानु अथैया से पूछिए. भानु अथैया अकेली भारतीय हैं, जिन्हें ऑस्कर मिला है. उन्हें गांधी के कॉस्ट्यूम के लिए ऑस्कर मिला था. अ।प का मन बताने के लिए उछल रहा है न कि सत्यजित राय को भी ऑस्कर मिला था. जी, मिला था न? उनके संपूर्ण योगदान के लिए उन्हें ऑस्कर दिया गया था.

Wednesday, August 29, 2007

खोया खोया चांद और सुधीर भाई-२


सुधीर मिश्र को सभी सुधीर भाई कहना पसंद करते हैं. उन्हें भी शायद यह संबोधन अच्छा लगता है. कद में लंबे और छरहरे सुधीर भाई लंबे डग भरते हैं. वे चलते हैं तो उनके छेहर हो गए लंबे बाल हवा में अयाल की तरह लहराते हैं. प्रभावशाली और आकर्षक होता है उनका आगमन और चूंकि वह परिचित चेहरा हैं, इसलिए लोगों को वह तत्क्षण आकृष्ट कर लेते हैं. सुधीर भाई की खूबी है कि वह बेबाक और बेलाग बोलते हैं और हमेशा बोलने के लिए तैयार रहते हैं. सुधीर भाई खुद को फिल्म इंडस्ट्री के बाहर का व्यकित मानते हैं. कहते भी हैं, 'मेरे बाप-दादा ने कोई फिल्म नहीं बनायी और न ही मेरे लिए फिल्मों की कमाई (धन और यश) छोड़ी. हमें तो जिंदगी ने उछाल कर यहां पहुंचा दिया. हमें तो हादसों ने पाला और तूफानों ने संभाला है. ऐसे जीवट के व्यक्ति का निर्भीक होना स्वाभाविक है. एक तरह से सुधीर भाई के पास खोने के लिए कुछ है भी नहीं...
हां तो उस दिन पंचसितारा होटल के काफी शॉप में वह 'खोया खोया चांद' के बारे में बताने लगे. उन्होंने बताया, 'मुझे छठे-सातवें दशक के उपर एक फिल्म बनानी थी. उस दौर की उत्कृष्ट फिल्मों और फिल्मकारों को इसे मेरी श्रद्धांजलि समझ लो चवन्नी. कितने नाम गिनोगे या मैं गिनवाऊंगा . बस यों समझो कि इस फिल्म में उस दौर के नायक नायिका हैं. गुरू दत्त हैं. विमल राय हैं, कमाल अमरोही हैं, साहिर लुधायानवी हैं, महबूब खान हैं ... इसमें मीना कुमारी, मधुबाला और नर्गिस हैं. सच कहूं तो इस फिल्म का हीरो और कोई नहीं, मैं हूं... उसका नाम जफर है, लेकिन है वह सुधीर मिश्र ही. उसमें मेरे पिता की भी थोड़ी खूबियां हैं. हमारे किरदार ऐसे ही होते हैं. कल को तुम्हारी झलक किसी किरदार में मिल जाए तो नाराज न होना. चवन्नी को भला क्या नाराजगी होगी,लेकिन चवन्नी जानता है कि सुधीर भाई ऐसा कर चौंका सकते हैं.

खोया खोया चांद और सुधीर भाई -१


चवन्नी को सुधीर मिश्र की फिल्म 'खोया खोया चांद' का बेसब्री से इंतजार है.सुधीर मिश्र ने इस फिल्म में हिंदी सिनेमा के स्वर्ण काल के कई पहलुओं को आज के संदर्भ में चित्रित किया है.सुधीर मिश्र से चवन्नी की मुलाकातें होती रही हैं.चवन्नी सुधीर मिश्र को हिंदी फिल्मों की मुख्यधारा का विरोधी स्वर मानता रहा है.चवन्नी को हमेशा वे जुझारू और कभी-कभी झगड़ालू फिल्मकार के तौर पर दिखे.चवन्नी को याद है एक मुलाकात...मुंबई के एक पंचसितारा होटल में किसी फिल्मी कार्यक्रम का अायोजन था.होटल की लॉबी में ही चवन्नी उनसे टकरा गया.न जान! उस दिन सुधीर मिश्र किस मूड में थे...उन्होंने कॉफी के लिए ऑफर किया...सकुचाता हुआ चवन्नी उनके साथ लग गया...बात 'खोया खोया चांद' पर होने लगी.कुछ दिनों पहले ही चवन्नी गोरेगांव में फिल्मिस्तान स्टूडियो में लगे उनकी फिल्म के सेट पर गया था.सुधीर मिश्र हमेशा बड़े आवेश में बातें करते हैं...उनके भाव और स्वभाव से ऐसा लगता है कि आप को उनसे सहमत होना ही होगा.वे कंधे पर हाथ रख देते हैं...अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से को विस्फारित कर आप के मन में प्रश्न पैदा करते हैं और फिर मौका मिलते ही समझाने के अंदाज में अपनी बात आप के दिमाग में कॉपी कर देंगे.फिल्मों में आने को उत्सुक उत्साही युवक उनसे प्रभावित और सम्मोहित हुए बगैर नहीं रहते.

करिश्मा और करीना

करिश्मा और करीना हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के पहले मशहूर परिवार की बेटियाँ हैं.राज कपूर जब तक जीवित और सक्रिय रहे ,तब तक उनहोंने अपने परिवार की किसी बेटी को फिल्मों में नहीं आने दिया.वजह चवन्नी समझ सकता है.चवन्नी ने राज कपूर और उनकी हीरोइनों दस काफी किस्से सुन और पढ़ रखे हैं .कहा जाता है कि राज कपूर आशिक मिजाज इन्सान थे और अपनी हीरोइनों से प्रेम कर बैठते थे.राज कपूर और नर्गिस के प्रेम के बारे में सभी जानते है.दुनिया उसे दिव्य और अदभुत मानती है,लेकिन चवन्नी लगता है कि संजय दत्त की एक समस्या नर्गिस का सार्वजनिक प्रेम रहा है.संजय दत्त के जवान होने के दिनों के किस्से पढ़ लें.वे अपनी मम्मी से काफी नाराज़ थे.जब उनकी मम्मी कैंसर से मर रही थीं तो वे बाथरूम में बंद होकर नशे के कश ले रहे थे. कोई ग्रंथि तो थी,जो बाद में किसी और शक्ल में सामने आयी.चवन्नी की यही दिक्कत है,बात कहीँ से शुरू करता है और कहीँ और चला जाता है.बात तो राज कपूर ...अरे नहीं करिश्मा और करीना कि हो रही थी.माफ़ करें यहाँ बबीता का ज़िक्र आएगा.राज कपूर के बेटे रणधीर कपूर से शादी करने के बाद बबीता को लगा था कि वह पहले कि तरह फिल्मों में काम करती रहेगी.लेकिन कपूर खानदान की बहू बनते ही उन्हें घर की क़ैद मिल गयी.बबीया और रणधीर कपूर के संबंध टूट गए.कहते हैं बबीता ने क़सम खायी थी कि अपनी बेटियों को हीरोइन बनाकर रहेगी.उन्होंने कपूर खानदान के सपोर्ट के बिना यह कर दिखाया.कितना विचित्र लगता है कि कपूर खानदान की बेटी की पहली फिल्म प्रेमकैदी थी.बहरहाल करिश्मा ने मेहनत की और अपने दम पर फिल्मों में एक जगह भी हासिल की.फिर करियर की ऊंचाई पर उनका अभिषेक बच्चन से प्रेम हुआ.दोनों की सगाई हुई आैर सगाई टूट भी गई.लोगों ने यहां भी बबीता को विलेन बना दिया,जबकि बबीता की चिंताएं एक मां की चिंताएं थीं जिसकी बेटी किसी संघर्षरत एक्टर से शादी करने जा रही थी.चवन्नी को सारा किस्सा मालूम हैणसगाइर् टूटने की वजह कुछ और थी.आज करिश्मा फिल्मों से दूर जा चुकी हैं और उनकी वापसी की संभावनाएं भी कम हैं.रही बात करीना की ताे उस पर अगली बार...

Tuesday, August 28, 2007

चुंबन और सेक्स

महेश भट्ट

शर्म और दुख की बात यह है कि रिचर्ड गैर और शिल्पा शेट्टी के बीच के औपचारिक चुंबन और व्यवहार को दुष्कर्म के रूप में पेश किया गया है। दो सार्वजनिक व्यक्तियों के बीच की सामान्य घटना को मुद्दा बनाने वालों ने अगर इसकी आधी सक्रियता भी बालिकाओं की भ्रूण-हत्या के खिलाफ दिखाई होती, तो बड़ी बात होती। सच तो यह है कि घर-परिवार और समाज में हो रही स्त्रियों की दिन-रात की बेइज्जती पर आम नागरिकों की खामोशी खलती है। क्या हमारे समाज में चुंबन और सेक्स वर्जित है? मुंबई और दूसरे शहरों में प्रेमी युगलों को पार्क और अन्य सार्वजनिक स्थलों से पुलिस द्वारा भगाने की खबरों को पढ़ कर भी हैरत होती है कि आखिर हम किधर जा रहे हैं? यकीन भी नहीं होता कि इसी देश में कभी वात्सयायन ने कामसूत्र की रचना की थी और खजुराहो के मंदिरों में हमारे पूर्वजों ने यौनाचार की मुद्राओं को पत्थरों में उकेरा था।
चुंबन और सेक्स मनुष्य की स्वाभाविक क्रियाएं हैं। एक उम्र के बाद हर मनुष्य इस अहसास से गुजरता है। हां, सामान्य रूप से समाज के बनाए नियमों का पालन करना और अभद्र और अश्लील आचरण से बचना जरूरी है, लेकिन इस अहसास को दबाना कतई जरूरी नहीं है। भारतीय समाज में हम सभी ऐसे मामलों में घर-परिवार से ज्यादा सिनेमा से प्रभावित होते हैं। अपनी बात करूं, तो लगभग चालीस साल पहले फिल्म कोहरा देखते समय इस कथित पाप का पहला आनंददायक स्फुरण हुआ था। हमारे उद्गम का मूल स्त्रोत है सेक्स, इसलिए हमारे जन्म का बीज कार्य सेक्स कैसे बुरा हो सकता है? सेक्स जीवन का सुंदर पक्ष है, वह बुरा कतई नहीं है। अगर सिनेमा में जीवन का उद्घाटन और चित्रण होता है, तो सेक्स सिनेमा का आदर्श विषय है, लेकिन वास्तव में ऐसा होता नहीं है, क्योंकि भारतीय सिनेमा में सबसे ज्यादा सेक्स को ही नजरंदाज किया गया है। अपने देश में सेक्स के मुद्दे पर लोगों का दोहरा रवैया है। पुस्तकों, परस्पर बातचीत, टीवी चैनलों और बाकी जगहों में इसे बराबर जगह मिली हुई है, लेकिन जब फिल्म की बात आती है, तो हमारा रवैया सेक्स के अस्तित्व से ही इंकार करता है।
हमने पाप किया है। औरत की पीठ कैमरे की तरफ है। हम समाज की निगाह में अपराधी हैं, पुरुष भी कहता है। शर्म से वह अपना चेहरा नहीं दिखा रहा। इन प्रेमियों ने अभी-अभी प्रेम-गीत गाकर एक-दूसरे को छूने के बाद सहवास किया है। भारतीय सिनेमा के प्रेम-गीत सहवास के पहले की रतिक्रिया ही तो है, लेकिन प्रेम के उन उदात्त क्षणों को दिखाने के लिए डायरेक्टर ने बारिश करवा दी। यह दृश्य यश चोपड़ा की फिल्म धूल का फूल का है। मुझे शक्ति सामंत की फिल्म आराधना का गीत रूप तेरा मस्ताना.. भी याद आ रहा है। राजेश खन्ना और शर्मिला टैगोर ने एक ही शॉट में इस गाने को पूरा किया था। दोनों ही फिल्मों में सहवास के प्रसंग के पहले खूब बारिश हुई थी। दोनों ही फिल्मों में विवाह पूर्व सेक्स के परिणाम दिखाए गए थे। दोनों फिल्म ऑफिस पर कामयाब हुई, लेकिन सभी यादें सुखद नहीं होतीं। जवानी की असहनीय यादें दिमाग के किसी कोने में दबी रहती हैं। एक बार मैं अपने दोस्त के साथ कहीं जा रहा था। मैंने देखा कि एक पेड़ के नीचे भीड़ एकत्रित है। खाकी वर्दी में मौजूद एक सिपाही लोगों को वहां से हटा रहा है। जिज्ञासा हुई, तो हम दोनों भी उधर गए। वहां एक भू्रण पड़ा था। चींटियों ने उसे आधा खा लिया था। भीड़ में से किसी ने दबे स्वर में कहा -धूल का फूल। धूल का फूल में भी नायिका समाज के डर से अपने नवजात बच्चे को फेंक आती है। इस भू्रण की अज्ञात मां ने भी वही किया था।
अगर शादी के बाद सेक्स उचित है, तो वह शादी के पहले भी उचित होना चाहिए। शादी से पहले या विवाहेतर सेक्स करने वालों को समाज क्यों अपराधी होने का अहसास देता है? हर समाज स्वाभाविक रूप से फासीवादी होता है और हमारी नैतिकता परपीड़क होती है। अपने मन में इस खयाल से मैं जूझता रहा। मुझे नहीं पता था कि पहली फिल्म मंजिलें और भी हैं में इस विचार को पेश करने का लंबा खामियाजा भुगतना पड़ेगा! उस फिल्म पर सेंसर बोर्ड ने 14 महीनों तक पाबंदी लगाए रखी। उनका कहना था कि मेरी फिल्म शादी जैसी पवित्र संस्था का मजाक उड़ाती है। उस फिल्म में दो भगोड़े अपराधियों और एक वेश्या के यौन संबंधों को दर्शाया गया था। वह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिरी थी। मैंने दस साल पहले इसी विषय पर नेशनल फिल्म आर्काइव्स के पी.के. नायर से बात की थी। नायर ने बताया था कि भारतीय सिनेमा के पितामह ने 1913 में ही अपनी पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र में एक स्नान दृश्य रखा था। 1929 में बनी फिल्म थ्रो ऑफ डाइस में चुंबन के अनेक दृश्य थे। इसी प्रकार दिल-ए-जिगर में भी चुंबन के कामुक दृश्य थे। केदार शर्मा ने पांचवें दशक की चित्रलेखा में स्नान दृश्य रखा था। मा. विनायक की फिल्म ब्रह्मचारी में मीनाक्षी ने पहली बार स्विमिंग शूट पहना था। सोहराब मोदी ने भरोसा में सबसे पहले अवैध संबंधों को दिखाने की हिम्मत की थी। वी. शांताराम ने दुनिया न माने में नपुंसकता को चित्रित किया था। पिछले दिनों आई मेरी फिल्म जिस्म और मर्डर देखकर कई लोगों ने हाय-तौबा की। मैं उन फिल्मों को लेकर शर्मिदा नहीं हूं। मैं जानता हूं कि अर्थ, सारांश या जख्म की श्रेणी में उन्हें नहीं रखा जा सकता, फिर भी वे वक्त की जरूरत पूरी करते हैं। जिस्म और मर्डर के प्रति शिकायत रखने वालों को मेरा सीधा उत्तर है कि अगर दर्शकों ने जख्म देखी होती, तो जिस्म बनाने की जरूरत ही नहीं पड़ती। मर्डर की नायिका उत्तेजना में अवैध संबंध कायम करती है। जब उसे प्रायश्चित होता है, वह पति के पास लौट आती है। दर्शकों ने नायिका की भूल को माफ कर दिया था।
अंत में यही कहना चाहूंगा कि चुंबन, सेक्स आदि यौन अहसास को दबाने की नहीं, उन्हें कला माध्यमों में अभिव्यक्त करने की जरूरत है। सेक्स की सम्यक शिक्षा और उचित ज्ञान से समाज का भला ही होगा। मेरी राय में सेक्स पर समाज का कोई सेंसर नहीं होना चाहिए।

Sunday, August 26, 2007

सावरिया या सांवरिया ?


चवन्नी परेशां है .हाल ही में संजय लीला भंसाली की नयी फिल्म सांवरिया की पहली झलक दिखी.नीले माहौल में धीमी गति में लड़का,लडकी और बाकी चीजें चलती, उड़ती, गिरती आयीं .भाई,संजय की फिल्म है,उन्हें पूरा हक है...वे चाहे जैसे दृश्य स्थापित करें.चवन्नी को फिलहाल एक ही सवाल करना है कि फिल्म के शीर्षक को सावरिया लिखना कहॉ तक उचित है ? सावारिया का सही उच्चारण सांवरिया ही होगा .यह शब्द सांवर से बना हुआ है,जो साँवल का देशज उच्चारण है।
सांवर से बने शब्द सांवरिया का उपयोग कृष्ण के लिए होता रहा है.मोरे श्याम साँवरे जैसे गीत हम सुनते रहे हैं.हिंदी फिल्मों में सांवरिया का उपयोग प्रेमी के लिए होता रहा है. हो सकता है संजय की फिल्म में इसी अर्थ में इसका इस्तेमाल जुआ हो।
चवन्नी समझ नहीं पा रहा है कि संजय से ऐसी भारी भूल कैसे हो गयी ?क्या संजय को इतनी हिंदी भी नहीं आती.
वैसे हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में फिल्मों के नाम हिंदी में लिखने का चलन खत्म हो रहा है.ज़्यादातर फिल्मों के पोस्टर में सिर्फ अंग्रेजी में नाम दिए जाते हैं.उन नामों में भी एक्स्ट्रा अक्षर जोड़ दिए जाते हैं कि फिल्म की कहानी या स्टार से नहीं तो कम से कम अक्षरों से ही किस्मत पलट जाये और कायाबी मिल जाये.फिल्म शुरू hone के पहले फिल्मों के नाम हिंदी,उर्दू और अंग्रेजी में देने का चलन था.अब केवल अंग्रेजी में फिल्म का नाम लिखकर ही जानकारी देने कि इतिश्री समझ ली जाती है.हम् बहुत ही बुरे दौर से गुजर रहे हैं.हिंदी की फिक्र किसी को नहीं है.कोई परवाह भी नही करता.

Saturday, August 25, 2007

हे बेबी


पधारिए को अगर पाद हारिए उच्चारित करने से कॉमेडी क्रिएट हो जाती है तो हे बेबी एक सफल कॉमेडी फिल्म है। कॉमेडी में अभिनय और प्रसंग के साथ संवाद का भी योगदान रहता है। साजिद खान वैसे तो वाक्पटु हैं लेकिन फिल्म में मिलाप झावेरी के ऐसे संवादों को वे क्यों नहीं सुधार पाए? कहीं कुछ गड़बड़ है..या तो फिल्म बनाने की हड़बड़ी थी या फिर सिरे से सोच गायब था। हे बेबी के हे और बेबी में अतिरिक्त वाई लगाकर कामयाबी की उम्मीद करने वाले अंधविश्वासियों का यह हश्र स्वाभाविक है। फिल्म शुरू से लड़खड़ाती है और अंत तक संभल ही नहीं पाती। अक्षय कुमार, फरदीन खान, रितेश देखमुख और विद्या बालन जैसे लोकप्रिय और बिकाऊ नाम भी बांध कर नहीं रख पाते।
तीन आवारागर्दो, आरुश (अक्षय), एल (फरदीन) और तन्मय (रितेश) की ब्रेफिक्र और मनचली जिंदगी में तब एक मोड़ आता है, जब कोई उनके दरवाजे पर एक बच्ची छोड़ जाता है। तीनों उसे पुलिस के हवाले करने के बजाय पालने का जोखिम उठाते हैं। फिर उनके स्वभाव में बदलाव शुरू होता है। बच्ची से उनका लगाव बढ़ता है, तभी बच्ची की मां ईशा आकर उसे ले जाती है। बाद में पता चलता है कि बच्ची तो आरुश की बेटी है और ईशा उसकी चोट खाई प्रेमिका। दरअसल आरुश एक बार ईशा से टकराता है और उसके साथ हमबिस्तर होने के लिए प्यार का नाटक करता है। इस नाटक का अंत तीन दिनों में ही हो जाता है। फिल्मी संयोग देखें कि ईशा एक बेटी को जन्म देती है। बेटी की तकलीफ कम करने के लिए ईशा के पिता नवजात बेटी को इन तीनों के दरवाजे पर छोड़ जाते हैं। वो ईशा को बताते हैं कि जन्म लेते ही उसकी बेटी मर गई थी। इसके बाद आरुश और ईशा में इमोशनल तनातनी होती है। इसमें एल और तन्मय भी रस्साकसी करते हैं।
साजिद खान ने न जाने क्यों इस फिल्म की पृष्ठभूमि में सिडनी शहर रखा है। आजकल विदेशी पृष्ठभूमि पर बन रही हर फिल्म के सारे कलाकार हिंदी बोलते नजर आते हैं। यह हिंदी फिल्मों का नया समाज है। हे बेबी से एक बार फिर ये साबित हो गया कि सारी सुविधाओं के बावजूद फिल्म बनाना बच्चों का खेल नहीं है? उसके लिए सही सोच जरूरी है।
हे बेबी के नाच-गाने अलग से मजा दे सकते हैं। एक ही गाने में 15 आइटम गर्ल मौजूद हैं। एक गाने में शाहरुख खान॥ बाकी फिल्म में साजिद खान का ज्ञान है, अगर आप समझ सकें तो? यह ज्ञानपूर्ण संवाद दोनों जगहों पर अंग्रेजी में ही बोला गया है, जिसका मतलब है कि बच्चे के लिए मां की ममता बहुत जरूरी है लेकिन बाप का प्यार भी होना चाहिए ़ ़ ़तालियां। हैरानी होती है हिंदी फिल्मों के लेखक, निर्देशक और निर्माता पर ़ ़ ़आखिर वे किस दर्शक समूह के लिए फिल्में बना रहे हैं।

Wednesday, August 22, 2007

नील से मिला चव्वनी चैप

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ीनील का पूरा नाम नील नितिन मुकेश है.अब शायद अ।प ने उसे पहच।न लिया हो.नील मुकेश का पोता और नितिन मुकेश क। बेटा है.फिल्म इंडस्ट्री में अ।ज कल बैठे ठाले लोग बहस कर रहे हैं कि नील के बेटे का नाम क्या रख। ज।एगा.. उसके न।म के अ।गे --- नील नितिन मुकेश लगाया जाएगा..मुंबई के लोगों को इस न।म से अचरज हो रहा है,लेकिन चवन्नी के गृह प्रदेश में तो ऐसे नामों का चलन है. बाप के नाम के स।थ द।द। का पहला न।म जुड़ा रहत। है तो बेटे के न।म में बाप का पहला न।म जुड़ा होना अ।म ब।त है.यहं। तक की बीवियां भी अपने न।म के साथ पति का पहला नाम जोड़ लेती हैं.


बहरहाल, नील ने श्रीराम राघवन की फिल्म 'ज।नी गद्दार' में खास भूमिका निभायी है. उनके साथ धर्मेन्द्र, जाकिर हुसैन, विनय पाठक और दया शेट्टी भी हैं. पांच किरदारों की इस फिल्म को 'रिवर्स थ्रिलर' कहा जा रहा है. फिल्म देखते समय दर्शकों का सारा रहस्य पहले से मालूम होगा. हां, 'जानी गद्दार' में सरप्राइज से ज्यादा सस्पेंस है.


तो बात चल रही थी नील की ... नील ने गायकी सीखी है, लेकिन वह अपने पिता और दादा की तरह गायक बनने की इच्छा नहीं रखता. उसे अभिनय का शौक है और चार साल की उम्र में यश चोपड़ा की फिल्म 'विजय' में उसने पहली बार कैमरा फेस किया था. बाद में भी एक फिल्म की थी. लेकिन चाइल्ड अ।रटिस्ट बनने के खतरे को समझते हुए उसने पढ़ाई पर ध्यान दिया. पढ़ाई पूरी करने के बाद नील नितिन मुकेश फिल्मों में अ।या है.

अमूमन जैसे स्टारपुत्रों की पहली फिल्म में उनके सारे हुनर या यों कहें कि फिल्म के लिए जरूरी हीरो के सारे गुण दिखा दिए जाते हैं, लेकिन नील को ऐसी लांचिंग पसंद नहीं थे. वह चाकलेटी हीरो नहीं बनना चाहता. उसकी उम्र भले ही कम हो, लेकिन इरादे बहुत ज्यादा हैं. वह एक.एक कर अपनी प्रतिभा के पहलू उजागर करना चाहता है. चवन्नी को तो नील पसंद अ।या है. खासकर उसकी ईमानदारी और सहजता चवन्नी को पसंद अ।ई. 'जानी गद्दार' के जितने दृश्य चवन्नी ने देखे, उनमें वह पूरे अ।त्मविश्वास में दिखा. पहली फिल्म की घबराहट नहीं थी चेहरे पर.

Tuesday, August 21, 2007

चवन्नी का किस्सा

अच्छा है अं।प पढ रहे हैं.बस यही गुजारिश है कि मेरे नाम को चवन्नी छाप उच्चारित न करें. मैं चवन्नी चैप हूं. चवन्नी छाप समूहवाचक संज्ञा है. कभी दरशकों के ख।स समूह को चवन्नी छ।प कह। ज।त। थ।.अ।ज के करण जौहर जैसे निरदेशक चवन्नी छाप को नहीं जानते. हां , विधु विनोद चोपड। ज।नते हैं,लेकिन अब वे चवन्नी छ।प दरशकों के लिए फिल्में नहीं बनाते.सिरफ विधु विनोद चोपड। ही क्यों...इन दिनों किसी भी निरदेशक को चवन्नी छ।प दरशकों की परवाह नहीं है.वैसे भी ब।ज।र में जब चवन्नी ही नहीं चलती ताे चवन्नी छ।प दरशकों की चिंता कोई क्यों करे ...मुंबई में केवल बेस्ट के बसों में चवन्नी चलती है.कंडक्टर मुंबई के बस यात्रियों को चवन्नी वापस करते हैं और बस यात्री फिर से कंडक्टर को किराए के रूप में चवन्नी थम। देते हैं.

आज के हमारे परिचित पाठक चवन्नी मे बारे में ठीक से नहीं जानते.चलिए हम अपने अतीत के बारे में बता दें.चवन्नी का चलन तब ज्यादा थ।,जब रुपए में सोलह अ।ने हुअ। करते थे और चार पैसों का एक अ।न। होता थ।.तब रुपए में केवल चौंसठ पैसे ही होते थे.देश अ।ज।द हुआ तो बाजार की सुविधा और एकरूपता के लिए रुपए के सौ पैसे किए गए तो चवन्नी की कीमत बढ़कर पच्चीस पैसे हो गई.महंगाई की मार और मुद्रा के अवमूल्यन ने पैसों को बोलच।ल से भी बाहर कर दिया.सरकारी हुक्म से नय। पैस। चलने लग।.फिर किसी को लगा कि पैस। तो पैस। होता है...उसके न।त में नय। य। पुराना क्या...तो फिर से पैस। चलन में अ। गय।,लेकिन चवन्नी और अठन्नी ब।जार में 25 पैसे और 50 पैसों में तब्दील हो गई.
रही चवन्नी छ।प दरशकों की ब।त तो सिनेमाघरों में परदे के सबसे नजदीक बैठने व।ले दरशकों के दीरघ। का टिकट चवन्नी में मिला करत। थ।.म।न। ज।त। थ। कि इस दीरघ। में बैठे दरशक सिनेमा के अ।म दरशक होते हैं और चूंकि वे सभी चवन्नी का टिकट लेते है,इसलिए उन्हें चवन्नी छ।प संज्ञ। दे दी गई.इसी समूह से निकला व्यक्ति है चवन्नी चैप...अ।प इसे चवन्नी चैप ही पुक।रें.

Sunday, August 19, 2007

सठिया गए हैं बुड्ढे

चवन्नी बड़ी उम्मीद के साथ बुड्ढा मर गया देखने गया था.इस फिल्म में अनुपम खेर,परेश रावल,ओउम पुरी,प्रेम चोपडा और रणवीर शोरी एवं मुकेश तिवारी जैसे ऐक्टर थे.अभी चवन्नी बहुत दुःखी है..ऐसे फूहड़ दृश्य तो उसने घटिया फिल्मों भी नही देखे थे.उसे चोरी-चोरी देखी वो सारी फ़िल्में याद आयीं,जो उसने स्कूल के दिनों में देखी थीं. दादा कोंद्के भी ऐसी फूहड़ कल्पना नही कर सकते थे .क्या हो गया है हमारे सीनियर और अनुभवी कलाकारों को...क्या उनके सामने भी रोजी-रोटी की समस्या है?चवन्नी उन सभी के नाम से एक राहत आरम्भ करना चाहता है ताकी उन्हें भविष्य में ऐसी घटिया फ़िल्में करने की ज़रूरत ना पडे.फिल्मों में संबंधों का ऐसा घटिया चित्रण उसने आज तक नही देखा.चवन्नी सोच रह है कि ऐसे दृश्य करते समय क्या इन अनुभवी कलाकारों को शर्म ने नही घेरा होगा?इतना लम्बा और गहरा जीवन जीं चुकें क्या महज पैसों के लिए ऐसी घटिया फिल्म कि या फिर उनकी दमित इच्छा थी कि राखी सावंत को इसी भाने चूने का मौका मिल जायेगा.इस फिल्म के तीन बुद्धों की मौत राखी के साथ सोने से होती है.चवन्नी को लगता है कि उनके अन्दर के कलाकारों की मौत हो गयी है.चवन्नी बहुत उदास है...क्या ये कलाकार ऐसी ही फ़िल्में करते रहेंगे?कैसी विडम्बना है कि हाल ही में अनुपम खेर को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है,आज वो पुरस्कार भी शरमा रहा होगा.और राहुल रवैल के बारे में क्या कहें...चवन्नी याद कर रहा है कि betaab और अर्जुन राहुल ने ही banayi थी या वो koi और था?

Saturday, August 18, 2007

मैरीगोल्ड

हॉलीवुड के निर्देशक विलर्ड कैरोल ने भारतीय शैली में फिल्म बनाने की सोची, तो जाहिर सी बात है कि उसमें नाच-गाना, भव्य सेट और आभूषित परिधान जोड़ दिए। मैरीगोल्ड में यह सब दिखता है। कहीं न कहीं पश्चिम के दबाव में जी रही फिल्म इंडस्ट्री की झलक भी मिलती है, लेकिन यह फिल्म चौबे गए छब्बे बनने दूबे बनकर लौटे मुहावरे को चरितार्थ करती है। फिल्म न हॉलीवुड की रह गई है, न बालीवुड की बन पाई है। इसके लिए विशेषज्ञों को कोई नया शब्द गढ़ना होगा। बहरहाल, नकचढ़ी और एक्ट्रेस होने के गुमान में अक्खड़ बन चुकी मैरीगोल्ड (अली लार्टर) एक फिल्म की शूटिंग के लिए गोवा पहुंचती है। वहां पहुंचते ही उसे खबर मिलती है कि फिल्म तो बंद हो चुकी है और उसके प्रोड्यूसर-फाइनेंसर फरार हैं। उन्होंने मैरीगोल्ड को सिर्फ एक तरफ का एयर टिकट दिया था। मैरीगोल्ड को सहारा मिलता है प्रोडक्शन टीम की एक लड़की से। वह उसे बॉलीवुड की एक फिल्म यूनिट से मिलवाती है। वहां उसे काम मिल जाता है, लेकिन उसे नाचना नहीं आता, जबकि वह फिल्म म्यूजिकल है। खैर, संभालने के लिए फिल्म का कोरियोग्राफर प्रेम (सलमान खान) आ जाता है। शाही परिवार का प्रेम अपने परिवार से झगड़ कर फिल्मों में आ गया है। दोनों एक-दूसरे से प्यार करने लगते हैं। बाद में मेलोड्रामा होता है। कुछ गलतफहमियों, मान-मनौवल और टूटने-जुड़ने के बाद आखिरकार प्रेम और मैरीगोल्ड का विवाह संपन्न होता है। कहते हैं, इस फिल्म के निर्देशक विलर्ड कैरोल को भारत से प्रेम है और उन्होंने एक सौ से अधिक हिंदी फिल्में देखी हैं। उन्हें हिंदी फिल्मों में हॉलीवुड के पांचवें-छठे दशक के म्यूजिकल की खूबियां दिखती हैं। उन्होंने इस फिल्म में भारतीय और पश्चिम की संस्कृति व फिल्म निर्माण शैली को जोड़ने का दावा किया है। उनका दावा सिर्फ बयानबाजी साबित हुआ है। फिल्म का तकनीकी पक्ष मजबूत और बेहतर है, लेकिन कहानी और ठोस किरदारों के अभाव में मैरीगोल्ड साधारण फिल्म से ऊपर नहीं उठ सकी है। सलमान के होंठ खुलते ही नहीं..वे बुदबुदाने के अंदाज में संवाद बोलते हैं। कभी सिंक साउंड में उन्होंने फिल्म करने की गलती कर ली, तो बड़ी मुश्किल होगी। इसी फिल्म में डायरेक्टर बने राकेश बेदी बोलते हैं, डॉयलाग याद न हो, तो एबीसीडी बोल देना..बाद में डब कर लेंगे। यह संवाद सलमान खान की संवाद अदायगी के लिए माकूल है। अली पार्टर ने नृत्य सीखने में जरूर मेहनत की होगी। यह फिल्म बनी अंग्रेजी में है, लेकिन अंग्रेजी के साथ हिंदी में भी डब होकर रिलीज हो रही है।

बुड्ढा मर गया

ओमपुरी, परेश रावल और अनुपम खेर..फिल्म इंडस्ट्री के तीनों बुजुर्ग कलाकारों को न जाने क्या हो गया है? उन्होंने ऐसी घटिया और बकवास फिल्म कैसे स्वीकार की और क्या फिल्म के फूहड़ दृश्यों को करते हुए उन्हें कोई शर्म नहीं आई? तौबा-तौबा..हमारे अनुभवी, प्रशिक्षित और पुरस्कृत कलाकारों को अपने प्रशंसकों से चंदा लेकर आजीविका चला लेनी चाहिए..बुढ्डा मर गया निहायत घटिया, कमजोर और बकवास फिल्म है। राहुल रवैल की समझदारी को भी क्या हो गया है? बेताब और अर्जुन जैसी कामयाब और ठीक-ठाक फिल्में बना चुके राहुल ने ब्लैक कॉमेडी के नाम पर जो परोसा है, वह उनके कैरियर पर कालिख पोत जाता है। फकीर से अमीर बने परिवारों के सदस्य ऐसे तो नहीं होते? हां, इस फिल्म के पोस्टर पर 13 चेहरे हैं, जो शायद एक किस्म का रिकॉर्ड हों।

Wednesday, August 15, 2007

महेश भट्ट का आलेख जागरण में

ऊंचे आदर्शों का अभाव
हमारे मौजूदा दौर की अजीब त्रासदी है। पहले हमारे आदर्श मूल्यों और आकांक्षाओं के प्रतीक होते थे, जैसे गांधी जी। आजकल आदर्श के स्थान पर उनके प्रतिरूप होने लगे हैं जिन्हें हम आयकॉन कहते हैं। अब तो उससे भी एक कदम आगे स्टाइल आयकॉन की बातें होने लगी हैं। आदर्श से स्टाइल आयकॉन तक के इस सफर को समझना जरूरी है। आदर्श अपने मूल्यों के प्रति समर्पित होते थे। स्टाइल आयकॉन केवल स्टाइल हैं। वे मूल्यों के संवाहक नहीं हैं। इसलिए समाज से उनका लगाव भी ऊपरी है। उनके अंदर यह प्यास भी नहीं है कि चलो अपने खोखलेपन को पूरा करने के लिए खुद को कुछ ऐसे मूल्यों से जोड़ें जो उन्हें संपूर्ण बनाए। यह पैकेजिंग इंडस्ट्री की देन है, जहां पर केवल रूप-रंग और वस्त्र ही महत्वपूर्ण हो गया है। उपभोक्ता संस्कृति और जंक मानसिकता ने इसे हमारे लिए जरूरी बना दिया है। इस दौर में हम स्टाइल आयकॉन क्रिएट करते हैं। आज हमारे स्टाइल आयकॉन वे लोग हैं जिनकी जड़ें नहीं हैं। हम जिस संस्कृति में जीते हैं उसे आदर्शीकृत करने के लिए कुछ को मुखौटा दे दिया जाता है, मगर देखने वाला जानता है और पहनने वाला भी कि यह केवल मुखौटा ही है। हमारा सामाजिक अस्तित्व स्टाइल से प्रेरित हो गया है। आजादी के बाद सपनों के टूटने से मोहभंग हुआ और हम ठोस वैचारिक आधार के अभाव में अपनी जड़ों से कटते गए। हमारी कला और संस्कृ ति में भी जड़हीनता दिखती है। सोल्जेनित्सिन कहते थे कि समाज के संभावित बदलाव की झलक पहले कला में दिखती है। किसी समाज के खोखलेपन को देखना है तो आप उसकी कला देखो। आप फिल्म संगीत ले लीजिए। मुकेश, रफी, किशोर कुमार, मन्ना डे, हेमंत कुमार के दौर से जब ढलान शुरू हुई तो नकल तो दूर अब निहायत बुरे सिंगर आ गए हैं। वे सुर में नहीं हैं और उनमें गहराई भी नहीं है। जिस समाज में नंबर वन बनना ही सबसे बड़ा मूल्य हो गया हो, जहां बैंक बैलेंस से प्रतिष्ठा मापी जाती हो और जहां न्याय और करुणा की अहमियत न हो उस समाज का कोई भविष्य नहीं है। मैं मकर संक्राति के दिन वाराणसी में था। वहां जब पचास लाख आदमी मोक्ष के लिए डुबकी लगा रहे थे तो मैंने देखा कि वहां एक लाश पड़ी थी, जिस पर कोई ध्यान नहीं दे रहा था। वहां से थोड़ी दूरी पर सारनाथ है। जहां पर गौतम बुद्ध ने अपना पहला प्रवचन दिया था। उन्होंने पुण्य भूमि बनारस की तरफ पीठ कर कहा था कि मैं उस समाज में वापस जाऊंगा जहां पर तकलीफ है, दर्द है। जब तक हर एक इंसान को मैंने मोक्ष तक नहीं पहुंचा दिया तब तक मैं खुद प्रवेश नहीं करूंगा। गौतम बुद्ध ने व्यक्तिगत मोक्ष की जगह सामाजिक मोक्ष और मुक्ति की बात की,लेकिन हमने क्या किया? हमने उनके धर्म और सिद्धांत को देश निकाला दे दिया। समाज क्या होता है? संस्कृति क्या होती है? संस्कृति के लिए मूल्य और उनके प्रति समर्पण चाहिए। जिस समाज में मूल्य नहीं रहते हैं वह पूरी तरह से उद्देश्यहीन हो जाता है। उद्देश्यहीन समाज ही स्टाइल आयकॉन पैदा करता है। फिर वह वह आम आदमी के अंदर हीनता बोध पैदा करता है। वह पूरे समाज को दिगभ्रमित करता है। सफलता और लोकप्रियता का कंफ्यूजन होता है। गांधी और अमिताभ को समान महत्व मिलने लगे तो समझो मामला गड़बड़ है। सफलता गांधी हैं और लोकप्रियता अमिताभ। अगर समाज के अंदर यह द्वंद्व चल रहा है कि अमिताभ या शाहरुख खान अन्य ऐसा कोई स्टाइल आयकॉन बन जाएं तो समाज का भविष्य चिंतनीय है। स्टाइल आयकॉन मेन्यू की तरह होते हैं। वे खुराक नहीं हैं। स्टाइल आयकॉन विचार नहीं बांट रहे हैं। वे जीवन दर्शन नहीं, केवल जीवनशैली की बातें करते हैं। क्या खाओ, क्या पहनो और क्या खरीदो? इन दिनों प्रदर्शन पर ज्यादा जोर है। अच्छा दिखना है, अच्छा बनना नहीं है। आज दिखने पर पूरा जोर है। सब कुछ दिखावा है। लिखना और बोलना भी दिखावटी है। जिस जरह अपना तन ढकने के लिए हम वस्त्र पहन लेते हैं वैसे ही मन छिपाने के लिए विचार ओढ़ लेते हैं। हम लफ्ज पहनने लगे हैं। यह ऐसा दौर है जब कलम के शिल्पी भ्रष्ट राजनेताओं के लिए भाषण लिखने लगे हैं। वे अपने भाषणों से देश को गुमराह कर रहे हैं। समाज के इसी दौर की अभिव्यक्ति है स्टाइल आयकॉन। मुझे अपने बचपन की याद है: बलराज साहनी ब्रीच कैंडी के आगे खड़े हो गए थे, क्योंकि आजादी के बाद भी वहां हिंदुस्तानी लोगों को प्रवेश करने का अधिकार नहीं था। नेहरू मुंबई आते थे तो फिल्मों के लोग उनसे जाकर मिलते थे। इन मुलाकातों में उन्हें अपनी कमतरी का एहसास रहता था। उस जमाने के लोग एंटरटेनर और रीयल लाइफ आयकॉन का अंतर समझते थे। आज की तारीख में यह है कि एंटरटेनर का कद राजनेताओं से बड़ा हो गया है, क्योंकि राजनेताओं में नैतिकता नहीं रह गई है। ऐसे में स्टाइल आयकॉन का कद बड़ा तो हो ही जाएगा। आज काल्पनिक दुनिया के लोग ज्यादा अहमियत रखने लगे हैं। समाज की समस्याएं सिनेमा हाल में नहीं सुलझ सकतीं। आप ही बताएं क्रिकेट, टेनिस और सिनेमा के आयकॉन, जिनका असलियत से कोई लेना-देना नहीं वे क्या कर सकेंगे? वे जीवन नहीं बदल सकते, लेकिन वे हमारी-आपकी जीवनशैली बदलने की मुहिम में शामिल हैं और बाजार उनके समर्थन में खड़ा है। मुझे बड़ा तरस आता है हिंदुस्तान पर, खासकर मीडिया के एक वर्ग के रवैये पर। संजय दत्त मेरा दोस्त है। साधारण सा व्यक्ति है। गिरता-पड़ता यहां तक आ गया। उसके जीवन में पिता का बहुत योगदान रहा है, जिसकी वजह से वह आग की लपटों से बचा रहा। उसकी फिल्म मुन्नाभाई.. एक फिल्म मात्र थी। यदि आप फिल्म के एक रोल को उसकी असलियत समझ लेंगे और उसे आयडियल बना देंगे तो यह एक त्रासदी होगी।

Sunday, August 12, 2007

सी ग्रेड फिल्मों का संसार

पिछले दिनों पानीपत से गुजरने का मौका मिला . जो पानीपत के बारे में नही जानते,उनकी जानकारी के लिये पानीपत में १५२८,१५५६ और १७६१ में तीन बडे युद्ध हुए.उसके बाद भारत का भूगोल और पॉलिटिकल इतिहास बदल gayaa .पानीपत अभी हरियाणा का प्रमुख शहर है.
बहरहाल,पानीपत की सड़कों, chauraahon, दुकानों पर लगे फिल्मों के posTer ने मेरा ध्यान खिंचा.मर्द-औरत की कामुक तस्वीरें इन पोस्तेर्स पर थीं.फिल्मों के नाम थे-हसीं रातें,मस्तानी गिर्ल्स,नादाँ तितलियाँ,गरम होंठ,प्यासीमोहब्बत,अजनबी साया…एक दोस्त ने बताया की ज़रूरी नही की सारी फिल्में हिंदी में बनी होन.येह दूब फिल्में भी हो सकती हैं.गौर से पोस्तेर्स के चेहरे देखे तो उनमे से कुछ सचमुच विदेशी थे.
सिर्फ पानीपत ही क्यों,मुम्बई और देल्ही से लेकर हर छोटे,मझोले और बडे शहरों में कुछ ठेत्रेस में ऐसी ही फिल्में चलती हैं.ठेत्रे के मलिक और दर्शक दोनों खुश रहते हैं.
-पिछले साल २०-२५ ऐसी फिल्में बनी थीं.येह तो हिंदी में बनी और सन्सोरेड फिल्में थीं.इनके अलावा और भी कितनी फिल्में दूब होकर रेलेअसे हुई होंगी.कुछ फिल्मों के तित्लेस बदल दिये जाते हैं.
-ज्यादातर शहरों की गरीब बस्तियों,रैल्वाय स्तातिओंस और बस्स स्तान्ड्स के पास के ठेअरेस ऐसी ही फिल्म्स दिखाते हैं.ट्रांसित औदडेंस को भी सुविधा रहती है.ट्रेन या बस्स का टिम होते ही वोह निकल जाते हैं.
-क्या हमारे फिल्म sameekshak और हिस्तोरिंस कभी ऐसी फिल्मों के दर्शकों के ऊपर रिसर्च करेंगे या इल्लित्रते औददिंस उनके दिस्कुस्सिओंस से बहार ही रहेंगे? अगर औददिंस हैं तो यूएन पर और उनकी रूचि के सिनेमा पर भी बात होनी चाहिये.
-सेक्स,स्लेअज़ और होर्रोर गेंरे की क ग्रेड फिल्मों की अप्पाल को महेश भट्ट,राम गोपाल वर्मा और कुछ दुसरे फिल्म्मकेर्स ने मुल्तिप्लेक्ष् तक पहुँचा दिया और मैन्स्त्रें आ और ब ग्रेड के दर्शकों को भी ऐसी फिल्मों का दीवाना बना दिया.
-एक ज़माने में मिथुन चक्रवर्ती,धर्मेंद्र और कदर खान भी ऐसी फिल्में कर राहे थे.प्रोदुसर्स उनके साथ २ से १० दिन शूट करते थे और उनका चेहरा पूरी फिल्म में दिख जता था.ऐसी फिल्मों के करण धर्मेंद्र की काफी बदनामी हुई थी.
-इधर ऐसी फिल्मों के औदडेंस को भोजपुरी फिल्मों ने हथिया लिया है.क ग्रेड फिल्मों वाले ठेत्रेस में भोजपुरी फिल्में लग रही हैं.भोजपुरी फिल्मों भी दो लहक्दार गाने तो होते ही हैं.
कभी ऐसी फिल्मों और उनके औदडेंस पर भी बात हो.लितेरतुरे में प्रेमचंद हैं,लेकिन मस्तराम के भी रेअदेर्स कम नही है.क्या हम उन्हें नज़रअंदाज करते राहे?
कुछ और फिल्मों के नाम हैं-बोलता जिस्म,बीवी की सहेली,एक बार आओ ना,एक से मेरा क्या होगा,रसभरी जवानी,तड़पती जवानी,मस्त चालाक छोकरी,होत गर्ल,आइटम गर्ल,प्राइवेट सेक्रेतार्य,रेड लिघ्त,ब्यूटी बोंद ००७…

Saturday, August 11, 2007

ब्लू अम्ब्रेला

इस फिल्म का नाम नीली छतरी रखा जाता तो क्या फिल्म का प्रभाव कम हो जाता? विशाल भारद्वाज या रोनी स्क्रूवाला ही इसका जवाब दे सकते हैं। रस्किन बांड की कहानी पर बनी ब्लू अंब्रेला एक पहाड़ी गांव के बाशिंदों के मनोभाव और स्वभाव को जाहिर करती है। एक पहाड़ी गांव है। खास मौसम में वहां से विदेशी टूरिस्ट गुजरते हैं। चहल-पहल हो जाती है। एक बार कुछ टूरिस्ट गांव की लड़की बिनिया के लाकेट (जो भालू के नाखून से बना है) के बदले उसे नीली छतरी दे जाते हैं। छतरी के मिलते ही गांव में बिनिया की चर्चा होने लगती है। गांव का साहूकार नंद किशोर खत्री (पंकज कपूर) छतरी हथियाना चाहता है। वह बिनिया को कई तरह के प्रलोभन देता है। बिनिया टस से मस नहीं होती तो वह शहर जाकर वैसी छतरी खरीदने की सोचता है। कंजूस साहूकार महंगी छतरी नहीं खरीद पाता। एक दिन बिनिया की छतरी चोरी हो जाती है। उसे शक है कि उसकी छतरी साहूकार ने ही चुराई है। इस बीच साहूकार खत्री के पास दूसरे रंग की वैसी ही छतरी पार्सल से आती है। अब साहूकार की गांव में प्रतिष्ठा बढ़ जाती है। फिर एक दिन भेद खुलता है और फिर..पंकज कपूर ने साहूकार की भूमिका में पूरी तरह ढल गए हैं। उसके मनोभाव और मनोविज्ञान को संवाद, अभिनय व प्रतिक्रिया के जरिए जाहिर करते हैं। विशाल भारद्वाज ने पहाड़ी गांव के माहौल और मिजाज को बहुत सुंदर तरीके से सेल्युलाइड पर उतारा है। इस फिल्म की खूबसूरती लोकेशन, लोग और गंवई लावण्य में है। एक-दो प्रसंगों में फिल्म खिंचती सी लगती है। उसे नजरअंदाज कर दें तो ब्लू अंब्रेला बच्चों के लिए मनोरंजक और शिक्षाप्रद फिल्म है। गुलजार के गीत और विशाल भारद्वाज के संगीत का जादू थोड़ा अलग होता है। खासकर बालगीतों में दोनों ने उल्लेखनीय सहयोग किये हैं

चक दे इंडिया

सिनेमा के परदे पर ही सही भारतीय महिला हाकी टीम को व‌र्ल्ड कप जीतते देखकर अच्छा लगता है। कमजोर, बिखरी और हतोत्साहित टीम आखिरकार व‌र्ल्ड कप भारत ले आती है। महिला हाकी टीम को यह जीत कोच कबीर खान की मेहनत और एकाग्रता से मिलती है। कबीर खान की भूमिका शाहरुख खान ने निभायी है। बड़े स्टारों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत है कि वे फिल्म चाहे जैसी भी करें ़ ़ ़ अपना स्टारडम नहीं छोड़ पाते। इस फिल्म के अंतिम प्रभाव को स्टार शाहरुख खान कमजोर करते हैं।कबीर खान भारतीय हाकी टीम के कप्तान हैं। व‌र्ल्ड कप में पाकिस्तान के खिलाफ भारतीय टीम की जीत का मौका वह गंवा देते हैं। उन पर कई आरोप लगते हैं। आरोप इतने गहरे और मर्मातक हैं कि उन्हें अपना पुश्तैनी घर तक छोड़ना पड़ता है। उनके घर की चहारदीवारी पर गद्दार लिख दिया जाता है। इसके बाद वह सात साल तक कहां रहते हैं ़ ़ ़ यह सिर्फ लेखक-निर्देशक को मालूम है। सात साल बाद वह महिला हाकी टीम के कोच बनने की ठानते हैं और उसे विजयी टीम में बदलने का प्रण लेते हैं। मुश्किलों, अड़चनों, दिक्कतों और समस्याओं के बीच वे महिला खिलाडि़यों में जोश व जज्बा पैदा करते हैं। आखिरकार टीम इंडिया विजयी होती है। हमें एक दर्शक के तौर पर पर खुशी होती है, क्योंकि तब तक हम भी टीम इंडिया में शामिल हो चुके होते हैं। चक दे इंडिया में विषय की नवीनता है, लेकिन शिल्प की नवीनता नहीं है। पटकथा वैसे ही घिसे-पिटे तरीके से चलती है। कमजोर और हारी हुई टीम के विजयी होने की कहानी अधिकांश दर्शकों को इसलिए अच्छी लगती है कि हम सब कहीं न कहीं जीत की भावना रखते हैं। मनोवैज्ञानिक स्तर पर यह फिल्म असर करती है। भावोद्रेक होता है। आंखों में नमी आती है। गला रूंधता है। फिल्म के कई दृश्य ह्दयस्पर्शी है।अभिनय के लिहाज से शाहरुख स्टार ही हैं। उन्होंने दाढ़ी जरूर बढ़ा ली है पर बाकी मैनरिज्म पूरी तरह से छोड़ नहीं पाए हैं। खेल के मैदान में उनके सलीकेदार और इस्तरी किए कपड़े हैरत में डालते हैं। सत्तर मिनट के मैच के बाद भी वह तरोताजा दिखते हैं, क्योंकि वह स्टार हैं। अगर वे अपने स्टारडम से निकल पाते तो फिल्म बेहद सटीक और प्रभावशाली हो जाती। लड़कियों ने बहुत अच्छा और स्वाभाविक काम किया है। उसकी वजह यह हो सकती है कि उनमें से कोई भी जाना-पहचाना एक्टर नहीं है।इस फिल्म का काल निश्चित नहीं है। एक जगह कहा जाता है कि देश की 25 करोड़ महिलाओं में से हाकी टीम की 16 लड़कियां चुनी गई हैं। यानी तब देश की आबादी 50-52 करोड़ रही होगी। तब देश में टीवी न्यूज चैनल कहां से आ गए? इसी प्रकार रात में शाहरुख की दाढ़ी काली और घनी नजर आती है, सुबह वह कटी-छंटी दिखती है। शाहरुख के घर की चहारदीवारी पर लिखा गया गद्दार शब्द शायद मिटाने के लिए सात साल तक वैसे ही रहता है। ऐसे कई झटके हैं, जिन्हें सिनेमाई आजादी के नाम पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।फिल्म का गीत-संगीत कमजोर है। जोशीले और प्रेरक गीतों की जरूरत थी। सिर्फ शीर्षक गीत को सुखविंदर सिंह अपनी आवाज से जोशीला बना पाते हैं। पा‌र्श्व संगीत एकरस और माफ करें, कहीं-कहीं कर्णकटु हो गया है। गनीमत है कि यशराज फिल्म्स की चक दे इंडिया इस साल रिलीज हो चुकी तारा रम पम और झूम बराबर झूम से अच्छी और रोचक है।

Thursday, August 9, 2007

अमिताभ बच्चन की खबर जागरण में

संजय लीला भंसाली की फिल्म ब्लैक के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार पाने के बाद अमिताभ बच्चन खुशी से फूले नहीं समा रहे हैं। अपनी खुशियों के कुछ क्षण मीडिया के साथ बांटते हुए बिग बी ने यह भी कहा कि देश की गरीब जनता के चेहरे पर हंसी और सुकून के दो पल सिर्फ मनोरंजक फिल्में ही दे सकती हैं, न कि रियलिस्टिक फिल्में। मिलेनियम सुपरस्टार के लिए भी राष्ट्रीय पुरस्कार का खास महत्व है। उन्हें पुरस्कार की खबर 7 अगस्त को हैदराबाद से राम गोपाल वर्मा की फिल्म सरकार राज की शूटिंग से लौटने पर मिली। गौरतलब है कि 2005 के राष्ट्रीय पुरस्कारों की घोषणा पर न्यायालय की रोक के कारण इस सर्वज्ञात खबर पर सभी खामोश थे। कैसा संयोग है कि अमिताभ बच्चन को मिली यह खुशी भी विवादों में लिपटी मिली? पिछले कुछ समय से अमिताभ की हर खुशी के आगे-पीछे विवाद लिपटे जा रहे हैं। क्या वजह हो सकती है? अमिताभ दबी मुस्कराहट के साथ जवाब देते हैं, मुझे तो कोई वजह नहीं दिखती। अगर आप लोगों को ऐसा लगता है, तो आप ही इसका जवाब भी दे दीजिए। अमिताभ ने विशेष बातचीत के लिए पत्रकारों को बांद्रा के महबूब स्टूडियो में आमंत्रित किया था। यहां वह रवि चोपड़ा की फिल्म विवेक शर्मा निर्देशित भूतनाथ की शूटिंग कर रहे हैं। इस बीच मुंबई के अंग्रेजी सांध्य दैनिक के फोटोग्राफर ने उनसे अपनी तरफ देखने का आग्रह किया तो अमिताभ ने चुटकी लेते हुए कहा कि छापोगे भी या यूं ही खींच रहे हो क्योंकि मैने सुना है कि मीडिया ने मुझे बैन कर दिया है। अमिताभ को तीसरी बार राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है। इसके पहले सात हिंदुस्तानी और अग्निपथ के लिए भी वे राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं। अमिताभ जैसी शख्सियत के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार का क्या महत्व है? इस पर बेहद विनम्रता के साथ उन्होंने कहा कि सरकार की तरफ से कुछ भी मिले, तो उसकी एक अलग प्रतिष्ठा होती है। मैं अपने आपको भाग्यशाली समझता हूं कि मुझे इस पुरस्कार के लायक समझा गया। ब्लैक में अपने रोल के संबंध में बिग बी ने बताया कि इस फिल्म का केंद्रीय किरदार न देख सकता था, न सुन सकता था, न बात कर सकता था। वह अपने आपको कैसे व्यक्त करे? सबसे बड़ी चुनौती यही थी। मेरा किरदार उसकी भाषा को समझ सकता था। मुझे एक साथ दर्शकों और उस किरदार को समझाना था। एक तरह से मेरा दोगुना काम था। मुझे रानी मुखर्जी की भी बात बतानी पड़ती थी और फिर अपनी बात करनी पड़ती थी। यह बहुत ही मुश्किल था। अमिताभ नहीं मानते कि उन्होंने सिर्फ एंग्री यंग मैन का ही रोल किया है बल्कि उन्होंने विविधतापूर्ण भूमिकाओं को जिया है। दुनियाभर में कमर्शियल सिनेमा के बढ़ते महत्व को रेखांकित करते हुए बिग बी ने कहा कि पहले विदेशों में लोग हमारी फिल्मों को नीची नजर से देखते थे, लेकिन हमारी फिल्मों ने अपने ही दम पर पहचान हासिल की है। पहले लोग कहते थे कि यह नाच-गाना क्या है? आप तो ओवर द टॉप फिल्में बनाते हैं। उन्हें क्या मालूम कि हमारे देश में जनता क्या चाहती और देखती है? हम रियलस्टिक सिनेमा नहीं बना सकते, क्योंकि एक गरीब दिनभर मेहनत करके थोड़े से रुपए कमाता है और फिर उन रुपयों से फिल्में देखने जाता है। वह अपनी ही जिंदगी पर बनी फिल्म देखने हरगिज नहीं जाएगा। यही वजह है कि हम सिर्फ मनोरंजक फिल्में बनाते हैं। अब हमारी फिल्मों की निंदा और उनका मजाक उड़ाने वाले विदेशियों को ही हिंदी फिल्में खूब पसंद आ रही हैं। अमिताभ के प्रशंसकों और आलोचकों को लगता है कि आज वे इस स्थिति में हैं कि अपनी पसंद की गंभीर फिल्में बनवा सकते हैं। वह कहते हैं कि फिल्मी दुनिया में मुझे तकरीबन चालीस साल हो रहे हैं। आज भी शोले की चर्चा होती है, जबकि मैने ब्लैक और तमाम यादगार फिल्में की हैं। मैं सिर्फ एक कलाकार हूं और निर्देशक जो कहते हैं, कर देता हूं। मुझमें न तो इतनी क्षमता है और न ही इतना दम कि फिल्मों में बदलाव ला सकूं। बहरहाल वह काफी खुश हैं और यह खुशी उनकी पूरी बातचीत में छलकती रही।

Saturday, August 4, 2007

कैश

'धूम' और 'दस' जैसी फिल्मों की विधा में बनी 'कैश' मुख्य रूप से किशोर और युवा दर्शकों की फिल्म है। फिल्म में एक्शन के रोमांचकारी दृश्य है और गीतों का सुंदर फिल्मांकन है। वर्तमान दौर में ऐसी फिल्मों का आकर्षण है। खासकर शहरी युवा मन को ऐसी 'सिटएक्ट'(सिचुएशनल एक्शन) फिल्में पसंद आती हैं। गौर करें तो निर्देशक अनुभव सिन्हा ने एक्शन के दस-बारह दृश्य तैयार करने के बाद उनके इर्द-गिर्द किरदारों को जोड़ा और कहानी को चिपकाया है। इस फिल्म में आधा दर्जन से ज्यादा कलाकार हैं और सभी के लिए दो-चार दृश्य गढ़ने में ही फिल्म पूरी हो गई है। अफसोस यही है कि कोई भी किरदार उभर कर नहीं आता। पारंपरिक तरीके से देखें तो इस फिल्म में हीरो-हीरोइन नहीं हैं। एक दूसरी बात कि सारे ही निगेटिव किरदार हैं। हां, उनमें से कुछ नैतिकता का पालन करते हैं और एक है जो निजी लाभ के लिए किसी नैतिकता को नहीं मानता। सारे बुरे चरित्रों में अधिक बुरा होने के कारण हम उसे खलनायक मान सकते हैं। सिर्फ खल चरित्रों की फिल्में देश के दर्शक दिल से पसंद नहीं कर पाते। ऐसी फिल्में उन्हें सिर्फ नाच, गाने और एक्शन के कारण ही अच्छी लगती हैं। हां, अनुभव सिन्हा के इस प्रयोग की सराहना करनी होगी कि उन्होंने हिंसा वाले दृश्यों को एनीमेशन में दिखाकर छोटी उम्र के दर्शकों का भी खयाल रखा है। कहीं भी खून बहते या गोली चलते या तड़प कर मरते लोग नहीं दिखाई पड़ते। अनुभव सिन्हा म्यूजिक वीडियो के उस्ताद माने जाते हैं। 'कैश' के गीतों के फिल्मांकन में उनकी उस्तादी दिखती है। विशाल शेखर ने कुछ 'भूलने योग्य' धुनें दी हैं। अगर आप अजय देवगन के प्रशंसक हैं तो आपको अनुभव से ज्यादा अजय पर गुस्सा आएगा कि वे इस फिल्म में क्या कर रहे हैं? क्यों उन्होंने इस रोल को स्वीकार किया? दीया मिर्जा पहली बार ग्लैमरस दिखी हैं। एषा देओल और जाएद खान को अभी अभिनय का और प्रशिक्षण लेना चाहिए।

गाँधी माई फ़ादर

कथा कहने (नैरेशन) और काल (पीरियड) में सही सामंजस्य हो तो फिल्म संपूर्णता में प्रभावशाली होती है। किसी एक पक्ष के कमजोर होने पर फिल्म का प्रभाव घटता है। 'गांधी माई फादर' में निर्देशक फिरोज अब्बास खान और कला निर्देशक नितिन देसाई की कल्पना व सोच तत्कालीन परिवेश को गढ़ने में सफल रहे हैं। हां, चरित्र चित्रण और निर्वाह में स्पष्टता व तारतम्य की कमी से फिल्म अपने अंतिम प्रभाव में उतनी असरदार साबित नहीं होती। महात्मा 'बनने' से पहले ही गांधी और उनके बेटे के बीच तनाव के बीज पड़ गए थे। गांधी की महत्वाकांक्षा और व्यापक सोच के आगे परिजनों का हित छोटा हो गया था। हर बे टे की तरह हरिलाल भी अपने पिता की तरह बनना चाहते थे। उनकी ख्वाहिश थी कि वह भी वकालत की पढ़ाई करें और पिता की तरह बैरिस्टर बनें। बेटे की इस ख्वाहिश को गांधी ने प्रश्रय नहीं दिया। वे अपने बेटे को जीवन और समाज सेवा की पाठशाला में प्रशिक्षित करना चाहते थे। पिता-पुत्र के बीच मनमुटाव बढ़ता गया। फिल्म में यह मनमुटाव अनेक प्रसंगों और घटनाओं से सामने आता है। हरिलाल अपनी सीमाओं के चलते ग्रंथियों से ग्रस्त होते चले गए। उन्हें लगता था कि गांधी उसके पिता न होते तो बेहतर होता। बेटे को न समझा पाने और सही राह पर न ला पाने की तकलीफ गांधी के मन में भी रही। वह अंतिम दिनों में हरिलाल से मिलना भी चाहते थे, किंतु परिस्थितियों ने पिता-पुत्र को दो छोरों पर ले जाकर खड़ा कर दिया था। अक्षय खन्ना ने हरिलाल की भूमिका में तकनीकी टीम की मदद से रूप तो ले लिया है, लेकिन उस चरित्र में उनका कायांतरण नहीं हो सका है। निर्देशक की हिदायतों से कुछ दृश्यों में वे हरिलाल को जीवंत करते दिखते हैं। कामर्शियल फिल्मों के एक्टर की यह बड़ी समस्या है। वे अपने मूल हाव-भाव को भूल नहीं पाते। गांधी की भूमिका में दर्शन जरीवाला और 'बा' की भूमिका में शेफाली शाह स्वाभाविक और दृश्यानुरूप लगे। गांधी की छवि के रूप में बेन किंग्सले की याद इतनी सशक्त है कि बाकी अभिनेता गांधी की भूमिका में कमजोर नजर आते हैं। हरिलाल की पत्नी गुलाब की भूमिका में भूमिका चावला इसलिए भी अच्छी लगती हैं कि हम गुलाब के बारे में पहले से कुछ नहीं जानते। निर्माता अनिल कपूर बधाई के पात्र हैं। उन्होंने घोर व्यावसायिक दौर में ऐसे विषय पर फिल्म बनाने की हिम्मत दिखाई है। 'गांधी माई फादर' इसलिए भी दर्शनीय है कि वह महात्मा गांधी के व्यक्तिगत जीवन के दुखद पहलू को प्रकाशित करती है। कला निर्देशक नितिन देसाई और कास्ट्यूम डिजाइनर सुजाता शर्मा ने परिवेश गढ़ने में निर्देशक की पूरी मदद की है। पियूष कनौजिया का संगीत काल और परिवेश के हिसाब से उपयुक्त है।