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Sunday, November 15, 2009

फिल्‍म समीक्षा : तुम मिले

पुनर्मिलन का पुराना फार्मूला

-अजय ब्रह्मात्‍मज

पहले प्राकृतिक हादसों की पृष्ठभूमि पर काफी फिल्में बनती थीं। बाढ़, सूखा, भूकंप और दुर्घटनाओं में परिवार उजड़ जाते थे, किरदार बिछुड़ जाते थे और फिर उनके पुनर्मिलन में पूरी फिल्म निकल जाती थी। परिवारों के बिछुड़ने और मिलने का कामयाब फार्मूला दशकों तक चला। कुणाल देशमुख ने पुनर्मिलन के उसी फार्मूले को 26-7 की बाढ़ की पृष्ठभूमि में रखा है।

मुंबई आ रही फ्लाइट के बिजनेस क्लास में अपनी सीट पर बैठते ही अक्षय को छह साल पहले बिछड़ चुकी प्रेमिका की गंध चौंकाती है। वह इधर-उधर झांकता है तो पास की सीट पर बैठी संजना दिखाई पड़ती है। दोनों मुंबई में उतरते हैं और फिर 26 जुलाई 2005 की बारिश में अपने ठिकानों के लिए निकलते हैं। बारिश तेज होती है। अक्षय पूर्व प्रेमिका संजना के लिए फिक्रमंद होता है और उसे खोजने निकलता है। छह साल पहले की मोहब्बत के हसीन, गमगीन और नमकीन पल उसे याद आते हैं। कैसे दोनों साथ रहे। कुछ रोमांटिक पलों को जिया। पैसे और करिअर के मुद्दों पर लड़े और फिर अलग हो गए। खयालों में यादों का समंदर उफान मारता है और हकीकत में शहर लबालब हो रहा है। खौफनाक भीगे माहौल में दोनों प्रेमियों का मन भी भीगता है और गलतफहमियों की मैल धुल जाती है। दोनों की समझ में आता है कि वे एक-दूसरे के लिए ही बने हैं।

महेश भट्ट की प्रस्तुति में हर निर्देशक की फिल्म रोमांस को जरूर टच करती है। उनकी फिल्मों में रोमांस को बढ़ाने और व्यक्त करने में मधुर गीतों का सुंदर इस्तेमाल होता है। भट्ट कैंप की फिल्मों में संगीत के साथ गीत के शब्दों पर अपेक्षित ध्यान दिया जाता है। शायरी नजर आती है और नए शब्दों में पुराने भाव कहे जाते हैं। तुम मिले का गीत-संगीत मधुर हैं और देर तक कानों में गूंजता रहता है।

कुणाल देशमुख बिछुड़े प्रेमियों के पुनर्मिलन की कहानी दिखाने में सफल रहे हैं, लेकिन 26 जुलाई की बाढ़ को रिक्रिएट करने में उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली है। सीमित बजट का दबाव साफ नजर आता है। मुंबईवासी 26 जुलाई की भयावहता और दहशत से आज भी नहीं निकल पाए हैं। दो दिन तेज बारिश हो जाए तो अफवाहें तैरने लगती हैं। वह भयावहता फिल्म में उभर नहीं पायी है। शहर में पानी भरने के दृश्य और सड़कों पर फंसे लोगों की अफरा-तफरी के चित्रण में कुणाल देशमुख विफल रहे हैं।

इमरान हाशमी और सोहा अली खान ने अपने चरित्रों का सुंदर और प्रभावशाली निर्वाह किया है। दोनों के अभिनय में निखार दिखता है। इस फिल्म में किरदारों की स्टाइलिंग और लुक पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया है। सोहा अली खान के परिधानों से उनके किरदार की अमीरी नहीं झलकती। वैसे भी सोहा अली खान स्टाइल और अपीयरेंस के प्रति सचेत नहीं दिखतीं।

Friday, November 13, 2009

भारत का पर्याय बन चुकी हैं ऐश्वर्या राय

-हरि सिंह
ऐश्वर्या राय के बारे में कुछ भी नया लिख पाना मुश्किल है। जितने लिंक्स,उतनी जानकारियां। लिहाजा हमने कुछ नया और खास करने के लिए उनके बिजनेस मैनेजर हरि सिंह से बात की। वे उनके साथ मिस व‌र्ल्ड चुने जाने के पहले से हैं। हरि सिंह बता रहे हैं ऐश के बारे में॥
मुझे ठीक-ठीक याद नहीं कि मैंने कब उनके साथ काम करना आरंभ किया। फिर भी उनके मिस व‌र्ल्ड चुने जाने के पहले की बात है। उन्होंने मॉडलिंग शुरू कर दी थी। मिस इंडिया का फॉर्म भर चुकी थीं। आरंभिक मुलाकातों में ही मुझे लगा था कि ऐश्वर्या राय में कुछ खास है। मुझे उनकी दैवीय प्रतिभा का तभी एहसास हो गया था। आज पूरी दुनिया जिसे देख और सराह रही है, उसके लक्षण मुझे तभी दिखे थे। मॉडलिंग और फिल्मी दुनिया में शामिल होने के लिए बेताब हर लड़की में सघन आत्मविश्वास होता है, लेकिन हमलोग समझ जाते हैं कि उस आत्मविश्वास में कितना बल है। सबसे जरूरी है परिवार का सहयोग और संबल। अगर आरंभ से अभिभावक का उचित मार्गदर्शन मिले और उनका अपनी बेटी पर भरोसा हो, तो कामयाबी की डगर आसान हो जाती है।
ऐश के साथ यही हुआ। उन्हें अपने परिवार का पूरा समर्थन मिला। मां-बाप ने उन्हें अपेक्षित संस्कार और मूल्यों के साथ पाला। अपने लंबे परिचय के आधार पर मैं यह दावे के साथ कह सकता हूं कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में इतनी संस्कार वाली दूसरी कोई अभिनेत्री नहीं है। ऐश बड़ों का मान-सम्मान करना जानती हैं। फिल्म इंडस्ट्री के किसी भी सीनियर व्यक्ति से आप बात कर लें। उन्होंने उनके साथ काम किया हो या नहीं किया हो, लेकिन अगर एक बार मिल चुके हैं, तो वे ऐश के गुण गाते मिलेंगे। वे गुणवंती हैं। आदर्श बेटी, बहन, बीवी और बहू हैं। अपने सभी रिश्तों को उन्होंने सहेज कर रखा है। उन रिश्तों को वे आदर, स्नेह और प्यार से सींचती रहती हैं। वे खुद काफी व्यस्त रहती हैं, लेकिन एक पल को भी संबंधों के बीच में व्यस्तता को आड़े नहीं आने देतीं। निश्चित ही उनके करीबी भी उनकी भावनाओं को समझते हैं और उन्हें भी पूरी जगह देते हैं। हर संबंध परस्पर व्यवहार और सम्मान से ही खिलता है।
मैं अपने अनुभवों से ही उदाहरण दूं, तो ऐश्वर्या के लिए कतई जरूरी नहीं है कि वे कभी मेरे पांव छूएं। अपने हर जन्मदिन पर वे ऐसा कर आशीर्वाद लेती हैं। इस एक सामान्य सम्मान से वे कितनी दुआएं ले लेती हैं। दिल से उनके लिए दुआ निकलती है। मुझे याद है कि शादी की रस्म निभाने के बाद जब बड़ों से आशीर्वाद लेने की बारी आई, तो उन्होंने तमाम प्रतिष्ठित लोगों के बीच भी ऐसा ही किया। अभिषेक बच्चन ने भी उनका अनुकरण किया। आज सोचता हूं, तो लगता है कि उनकी यह सहज क्रिया के पीछे कितना सम्मान और संस्कार रहा होगा। अमूमन बड़े और मशहूर होने के बाद लोग अदब भूल जाते हैं। अपने पारिवारिक और पारंपरिक मूल्यों को निभाने में भी झेंप महसूस करते हैं।
दैवीय सौंदर्य की धनी ऐश्वर्या राय की कद्र पूरी दुनिया करती है। मुझे विदेशों के लोग मिलते हैं, तो वे बताते हैं कि कैसे पूरी दुनिया के लोग उन्हें पहचानते हैं। भारत का नाम लेते ही उनके जहन में ऐश का नाम आता है। वह भारत का पर्याय बन चुकी हैं। यह बड़ी उपलब्धि है और उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी भी है। ऐश्वर्या में नैसर्गिक प्रतिभा है। उन्होंने अपनी मेहनत और लगन से उसे निखारा है। शुरू से ही वे मेहनत करने से नहीं हिचकतीं। आज नाम और पहचान होने के बाद भी वे मेहनत में ढील नहीं करतीं। आमतौर पर अपने यहां शादी के बाद हीरोइनों को नई फिल्मों के ऑफर नहीं मिलते, लेकिन उनके पास अभी चार फिल्में हैं। वे दक्षिण भारत के शंकर और मणिरत्नम के साथ काम कर रही हैं, तो हिंदी की विपुल शाह और संजय लीला भंसाली की फिल्में भी कर रही हैं। उनके साथ हर डायरेक्टर काम करना चाहता है। अगर पिछले दशक की दस बड़ी फिल्मों की सूची बनाएं, तो उसमें आधी में ऐश मिलेंगी। इस उपलब्धि का उन्हें रत्ती भर अभिमान नहीं है। जीवन में नाम और पैसा तो बहुत से लोग कमाते हैं, लेकिन लोगों का प्यार कमाना आसान नहीं होता। उससे भी मुश्किल है अपने से बड़ों का आशीर्वाद पाना। मैं तो उन्हें लगातार देख रहा हूं। उनके व्यक्तित्व में जरा भी बदलाव नहीं आया है। मैं तो कहूंगा कि वे और भी विनम्र और समझदार हो गई हैं। आने वाले समय में शायद ही कोई लड़की उनसे आगे निकल पाए। वे मिसाल हैं कि ग्लैमर की दुनिया में भी अपने संस्कारों के साथ कैसे सिर ऊंचा रखा जा सकता है। वे संस्कारी हैं और अच्छी बात यह हुई कि वे संस्कारवान परिवार में गई। उनका बच्चन परिवार की बहू बनना सोने पर सुहागा की तरह है।

Thursday, November 12, 2009

दरअसल: फिल्म की रिलीज और रोमांस की खबरें


-अजय ब्रह्मात्मज

इन दिनों हर फिल्म की रिलीज के पंद्रह-बीस दिन पहले फिल्म के मुख्य कलाकारों के रोमांस की खबरें अखबारों में छपने और चैनलों में दिखने लगती हैं। पिछले दिनों रणबीर कपूर और कट्रीना कैफ की अजब प्रेम की गजब कहानी आई। रिलीज के पहले खबरें दिखने लगीं कि रणबीर-कैट्रीना की केमिस्ट्री गजब की है। वास्तव में दोनों के बीच रोमांस चल रहा है, इसलिए उनके प्रेमी खिन्न हैं। दोनों के संबंध अपने-अपने पे्रमियों से खत्म हो चुके हैं। अखबार और चैनलों पर यही खबर थी।
अगर फिल्मों और उसके प्रचार के इतिहास से लोग वाकिफ हों या थोड़े भी सचेत ढंग से इन खबरों पर नजर रखते हों, तो उन्हें याद होगा कि यह सिलसिला पहले सुपर स्टार राजेश खन्ना के समय से चला आ रहा है। एक प्रचारक ने नियोजित तरीके से हर फिल्म की हीरोइन के साथ राजेश खन्ना के प्यार की किस्से बनाए। कभी फिल्म की युगल तस्वीरें तो कभी किसी पार्टी की अंतरंग तस्वीरों से उसने इन खबरों को पुख्ता किया। राजेश खन्ना की रोमांटिक फिल्मों को ऐसे प्रचार से फायदा हुआ। बाद में इस तरकीब को दूसरों ने अपनाया और कमोबेश उनकी फिल्मों को भी लाभ हुआ।
मीडिया विस्फोट और समाचार चैनलों की होड़ में रोमांस की ऐसी अधपकी खबरों और कयासों को ज्यादा महत्व दिया जा रहा है। कोई भी पीछे नहीं रहना चाहता। ऐसी खबरों की तिल भर सच्चाई में अपनी तरफ से कुछ-कुछ जोड़कर मीडिया ही ताड़ बनाता है। कह सकते हैं कि हम सभी प्रचारकों की रणनीति का हथियार बनते हैं, इस्तेमाल होते हैं और फिर खुद के खड़े किए ताड़ के गिर जाने पर मन मसोस कर कहते हैं -हमें तो लग रहा था कि खबर झूठी है, लेकिन सभी दिखा और बता रहे थे, तो हम क्या करते? हम नहीं करते तो हमारी नौकरी चली जाती। मीडिया में ऐसी असुरक्षा फैल गई है कि सभी झूठी खबर फैलाने में आगे निकलना चाहते हैं।
रणबीर कपूर और कट्रीना कैफ का ही मामला लें। रणबीर और दीपिका पादुकोण घोषित प्रेमी युगल हैं। दोनों विभिन्न अवसरों पर साथ दिखते हैं और एक-दूसरे की दोस्ती की दुहाई भी देते हैं। अचानक खबर आई कि दोनों के बीच सब कुछ खत्म हो गया है। ऐसा हो भी सकता है। जब वर्षो के शादीशुदा युगल अलग हो सकते हैं, तो प्रेमियों के अलग होने में कैसा आश्चर्य? लेकिन जब उसी के साथ यह खबर भी आती है कि रणबीर का चक्कर इन दिनों कट्रीना के साथ चल रहा है, जो उनकी ताजा फिल्म अजब प्रेम की गजब कहानी की हीरोइन हैं। फिर शक होता है। कहा जाता है कि प्रकाश झा की फिल्म राजनीति में भी दोनों साथ आ रहे हैं। इस तरह दो फिल्मों का साथ रोमांस की खबर के लिए काफी है। इसके साथ यह बात भी फैलाई जाती है कि सलमान खान और कट्रीना के बीच अब पुरानी गर्मजोशी नहीं रही। वे अब उस रिश्ते को नहीं ढोना चाहतीं। फिर से कहूं, तो कट्रीना के लिए यह मुमकिन है, लेकिन ठीक रिलीज के पहले इस खबर पर भरोसा नहीं होता।
फिल्म के प्रचार के लिए स्टारों की यह मिलीभगत हो सकती है। फिल्म के हीरो-हीरोइन ऑन स्क्रीन रोमांस कर सकते हैं, तो ऑफ स्क्रीन अंतरंगता का नाटक करने में उन्हें कितनी मशक्कत करनी होगी। अगर उनकी ऐसी हरकत से फिल्म को फायदा होता है, तो वे सहज ही रोमांस के अभिनय के लिए तैयार हो जाते हैं। पूछने पर कहेंगे भी कि आप अफवाहों पर यकीन न करें या यह हमारा निजी मामला है या इस पर मुझे कुछ नहीं कहना है। उनकी कोई भी प्रतिक्रिया ऐसी खबर को भड़काने के काम आती है। पिछले दिनों कट्रीना ने स्पष्ट कहा, मुझे फिल्म के प्रचार का यह तरीका पसंद नहीं है। फिर भी मीडिया उनसे रणबीर से रोमांस के बारे में पूछता रहा। वे कभी दुखी, कभी परेशान और कभी हंसते हुए जवाब देती रहीं।

Tuesday, November 10, 2009

हिंदी टाकीज द्वितीय : आय लव यू, आय लव यू नॉट, आय लव यू, आय लव यू नॉट......-स्‍वप्निल कान्‍त दीक्षित

हिंदी टाकीज द्वितीय-1

हिंदी टाकीज की 50 कडि़यों का सफर पूरा हो चुका है। द्विजीय सीरिज की शुरूआत हो रही है। उम्‍मीद है कि आप का सहयोग और योगदान मिलता रहेगा। द्वितीय सीरिज की पहली कड़ी स्‍वप्‍न‍िल ने लिखी । आप इनकी टाटा जागृति यात्रा अभियान में शामिल हो सकते हैं।


स्वप्निल कान्त दीक्षित टाटा जागृति यात्रा के एक्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर हैं। आई. आई. टी. खडगपुर से स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण (जी हाँ, उत्तीर्ण) करने के बाद दो साल कोर्पोरेट सेक्टर में कार्यरत रहने के बाद देश के युवाओं को उद्यमशीलता के लिये प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से पिछले दो साल से टाटा जागृति यात्रा आयोजित करते आ रहे हैं। उनका बचपन लखनऊ, हरदोई, बरेली, जैसे शहरों और खुदागंज (उप्र) बहादुरपुर (उप्र), घोडाखाल (उत्तराखण्ड) इत्यादि गाँवों में बीता है। ये थियेटर, स्थापथ्य कला, सांख्यिकि, संगीत और लेखन-पठन में रुचि रखते हैं।


बँगला नं ४, बरेली कैण्ट, १९८५ से ले कर १९८९ के बीच के किसी साल की सर्दी की शाम ५ बजे बँगले के एक अहाते में निवाड से बुनी खटिया पर, और आसपास जुटाये गये मूढों पर करीब दस लोग बैठे हैं - नानी, नानी के भाई विनोद नाना जिन्होनें बासठ की लडाई में गोली खाई थी, और चीनियों की गिरफ़्त से भाग निकले थे, विनोद नाना के बच्चे - अजय माम, मीनू मौसी, गुड्डो मौसी, और शारीरिक काबलियत से सीमित मगर मस्तिष्क से पुष्ठ टिन्कू मौसी, महरी नानी - जिन्हें महानगरों में 'मेड' कहते हैं, लगभग सात से नौ वर्ष की अवस्था का मैं और शायद आसपास रहने वाले एक दो दोस्त। शुरु करो अंताक्षरी ले कर हरि का नाम, समय बिताने के लिये करना है कुछ काम! मेर जूता है जापानी, पतलून, टोपी, दिल है हिन्दुस्तानी! नाना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे.... इन्कार, इकरार .. बैठे.. ठ... ठ.. ठ... ठ १... ठ २... ठ ३.... ठ ५.... ठण्डे ठण्डे पानी से नहाना चाहिये, गाना आये या ना .. गाना चाहिये! यम्मा यम्मा.... बस आज की रात है ज़िन्दगी..... ये नहीं चलेगा.. ए है .. नही.. चाहिये में य पे ए की मात्रा होती है .. नहीं, तुम मेरी किताब में देख लो... ए है खाली... सबसे बडी गुड्डो मौसी...चुप रहो! टिन्कू बतायेगी.... टिन्कू... ये कि ए.. फ़र्स्ट या सेकन्ड... हो गया फ़ैसला...ए! ए मालिक तेरे बन्दे हम, ऐसे हो हमारे करम! मेरे सामने.. वाली खिड्की में .. रहता है! हम लाये हैं तूफ़ान से, ... निकाल के.. सँभाल के... क... क... क... क१... क२... क३.. गुड्डो मौसी! दोहा अलाउड है न! चल ठीक है, इस बार अलाउड! काल करे सो आज कर, आज करे सो अब्ब; पर में परलय होएगी, बहुरि करैगो कब्ब ब...ब....ब... ब१, ब२, ब३.... समस्या गहन है। विमर्श हो रहा है। घडी की सूई टिक-टिक बढ रही है। पेशानियों पर बल गहराते जा रहे हैं। एक जोडी होंठ केवल मुस्करा रहे हैं। गिनती गिनने वाले का भी कलेज़ा काँप रहा है - अगर उसने ना बोला, तो मैं क्या बोलूँगा! ब६, ब७, ब८, ब९.... बूढा स्वर,,, रुको! .. सब के सब नालायक! इतना भी नही जानते... बताओ ना नानी! बताओ ना! बहू बेगम! सब आश्चर्यचकित! ये क्या है! नानी का डेक्लरेशन --- अब से फ़िल्म का नाम भी अलाउड! तालियाँ.. और जाने कितने घण्टे बरबाद! ऐसा ही कुछ रहा होगा मेरा हिन्दी फ़िल्मों से परिचय! नोट करने वालों ने ध्यान दिया होगा कि फ़िल्मों का इस्तेमाल तो था, लेकिन खुलेआम नही। फ़िल्में प्रशंसित थीं पर परमिटिड नहीं (दौर भी तो लैसंस-राज का था)।

सबसे पहला सिनेमाहाली लम्हा जो याद है, वो है - दीवाली के आसपास समोसे खाने के चक्कर में मम्मीपापा के साथ जाने के लिये, परम-प्रिय नानी को छोडने को तैयार होना - समोसा मिला और साथ में एक गाना भी याद हो गया - पडोसी देखें बाजा कैसे बजे, कैसे बजे, कै-ए से-ए बजे, पडोसी देखे बाजा कैसे बजे! अब पता है कि उस सीन में प्रेमी और प्रेमिका अपनी मज़बूरी बयान कर रहे थे कि पडोसियों के देखते हुए वो 'बाजा कैसे बजाऎं' मुझे याद है कि मुझे समझ नहीं आता था कि पडोसी के देखते बाजा बजाने में क्या दिक्कत है?

उसके बाद याद है कि अजय मामा के साथ उनकी कपडो की दुकान को नौकर के भरोसे छोड कर सायकिल के डण्डॆ पर बैठ कर द्रुत गति से प्रभा सिनेमा की ओर लगभग पलायन - अजय मामा की जबरदस्त हँफाई की आवाज़ और अँधेरे कमरे में मिथुन दा की 'जाल' देखने के लिये प्रवेश। इस फ़िल्म में मिथुन दा कालेज के बास्क्टबाल कोर्ट पर करतब दिखाते हैं। एक मैच था जिसे जीतना हिरोइन के लिये अति-आवश्यक था। तब मिथुन दा ने शुद्ध साइंस का सहारा लेते हुए 'स्प्रिंग वाले जूते' नाम का एक यंत्र अपने बैग से निकाला। इस यंत्र का कमाल ये था कि इस से कोई भी पप्पू ८ से १० फ़ीट की छलाँग आसानी से लगा सकता था। अब बस हो गया काम! लेकिन इस सीन के बाद (और शायद पहले भी) मुझे पिच्चर खास समझ नहीं आई। लेकिन मुझे इस पिच्चर से ज़बरदस्त फ़ूड फ़ॉर थॉट मिला था। बहुत बाद जब आई आई टी की तैयारी का समय आया, तो मैने बाकायदा कोशिश की कि यदि एक स्प्रिन्ग वाला जूता बनाया जाये तो उसके लिये लगने वाले स्प्रिन्ग का स्प्रिन्ग कन्स्टेन्ट कितना होना चाहिये। आगे यदि मैं मटीरियल साइंस की पढाई करता तो ज़रूर ऐसा जूता तैयार करने की कोशिश करता। हिन्दी टाकीज़ लिखने वालों में से शायद मै सबसे बोरिंग और 'नर्डी' हूँ। मुझे फिल्मो का भूत चढता ही नहीं था।

कुछ जानने वाले मुझे पार्शियल लोनर भी कहते हैं। शायद इसकी नींव भी फ़िल्मों के कारण ही पडी। ऐसा नहीं कि देवदास देख कर दुखी मन से नकटिया नाले के किनारे घूमते घूमते मैं लोनर में विकसित हो गया। मेरे साथ कुछ ऐसा था कि दूरदर्शन पर आने वाली संडे शाम की पिच्चर मेरे ७ या ८ साल के दिमाग को इतनी बोरिंग लगती थी (चवन्नी पर ही महेश भट्ट का लेख बाल-फ़िल्मों पर उल्लेखनीय) कि मैंने एक दिन ऐसी ही एक पिक्चर देखते हुए ये फ़ैसला लिया कि अब मैं इन्हें देखूँगा ही नहीं - ये क्षण था जब परदे पे गाना चल रहा था - तेरे मेरे बीच में कैसा है ये बंधन अंजाना ~~~~~ आ आ ~~~~ आ आ ~~~~~~ आ आअ ````` इस आ आ की सीरीज़ ने इतना परेशान किया कि मुझ से रहा नहीं गया और मेरी संडे की शाम बदल गयी। इन पिक्चरो से भाग निकलने के लिये जब मैंने दोस्त ढूँढना शुरु किये तो पता चला कि साले सब के सब टीवी से चिपक गये है - लिहाज़ा मेरा लोनर पैदा होना शुरु हो गया। हाँ, कभी कभार एक आतंकवादी भी पैदा होता था जो सबसे कमीनी आंटी की घण्टी बजा कर भागने में माहिर था। कुछ ऐसा था कि फ़िल्मों का भूत चढता ही नहीं था - हाँ, रामलीला देखने के लिये मारा मारी करने को भी मैं तैयार रहता था।

फिर भी, एक शुद्ध हिन्दुस्तानी की तरह मैने भी स्कूल से भाग कर एक पिक्चर देखी। मैं और संजय तिवारी, जिसकी मैं बहुत इज़्ज़त करता था क्योंकि उसकी साइकिल बहुत मेन्टेण्ड रहती था, साथ साथ एक साजिश में शामिल हुए। हमने स्कूल से भागकर पिच्चर देखने का फ़ैसला किया। उस चक्कर में करीब तीन हफ़्ते लगे। सोचा गया कि बालकनी में देखी जाएगी, और मार्केट रिसर्च के तौर पर एक एक बार सारे हॉलों के दाम पता किये गये। तीन हफ़्ते तक पैसे बचाने पर हम लोग शहर के सबसे अच्छे सिनेमा प्रभा सिनेमा में पिच्चर देख सकते थे। तीन हफ़्ते पूरे होने पर पता लगा कि खाने पीने का पैसा जोडना तो भूल ही गये थे। उसे सम्मिलित करने पर हिन्द टाकीज़ का ही फ़्न्ड बच पाया था। प्रभा का सपना सपना ही रह गया। यहाँ क्योंकि पिच्चर देखना ही महत्वपूर्ण था, इस बात का कोई मतलब नहीं था कि पिच्चर है कौन सी। लिहाज़ा हिन्द टाकीज़ के बैक-स्टाल (हाय बाल्कनी) में बैठ कर करीब १० से १२ दर्शकों के साथ पिक्चर देखी गयी - हत्यारिन!

इस पिक्चर से मैं बहुत प्रभावित हुआ था। मुझे स्टोरी बहुत जानदार लगी थी और हिन्दे फ़िल्मों की ओर फ़िर से रुचि बढी। देखिये, तीन बिज़्नस पार्टनर थे, जिनमें से दो ने मिल कर तीसरे के साथ धोखा किया था और उसे ही नहीं, उसकी पत्नी को भी निपटा दिया। पत्नी भूत बन गयी और बदला लेने पर उतारू हो गयी। लास्ट में तांत्रिक वगैरह की मदद से भूत को शान्त किया गया, लेकिन क्योंकि हिरोइन भूत थी, उसका बदला पूरा होने पर ही वो शान्त हो सकी। सीधी से स्टोरी है लकिन क्या क्रिएटिव मोडस ओपरॉण्डी था उसका। मिसाल के तौर पर - बेईमान बिज़नस पार्टनर के बिगडे बेटे की शादी है। वो दारू के नशे में धुत्त सुहाग रात मनाने पहुँचता है और कुछ ऐसे डायलाग बोलता है जिससे कि दर्शकों के उससे रही बची सहानुभूति भी खत्म हो जाती है, जैसे - अरे मेरी अनारकली! कब से तेरे पकने का इंतज़ार कर रहा था, आज हाथ आई है तो शर्माती है। इसके जवाब में उसकी नवविवाहिता पत्नी कुछ नहीं बोलती है। तब ये बिगडा लडका कहता है कि ज़रा घूँघट तो उठा दो। ठीक इसी समय दर्शकों में रेप सीन की संभावना के चलते हलचल मचती है। पत्नी कहती कुछ नहीं, सिर्फ़ सिर होरिज़ेन्ट्ली हिला कर ना कहती है। तब बिगडा लडका रेपिस्ट वाली हँसी हँसता है और कहता है - तब क्या मैं ही उठा दूँ। इस बार पत्नी वर्टिकली सिर हिला का हामी भरती है। रेप-सीन की आशा में सधे दर्शक निराश होते हैं लेकिन 'सीन' की आशा अभी भी बरकरार रहती है। एक एक कदम घिसक कर लडका अपनी नवविवाहिता के पास पहुँचता है। उसका हाथ घूँघट की तरफ़ बढता है - और जैसे ही घूँघट हटता है, विशालकाय परदे पर सिर्फ़ भूतनी का चेहरा और स्पीकरों से बिगडे लडके की चीखें। हर बार हत्यारिन ऐसे ही कोई क्रिएटिव तरीका इख्त्यार करती थी। मैं हत्यारिन की भूतनी का फ़ैन हो कर लौटा था और मुझे तब से ले कर आज तक हीरो या हिरोएन द्वारा विलेन से लिये गये बदले मे रामलीला और हत्यारिन का मिक्स मज़ा आता है। इस फ़िल्म से मेरे जीवन में दो फ़र्क आये - एक तो मैं कभी बाल लेने के लिये पुराने मकान में नहीं गया, और दूसरा मुझे फ़ुल्लड भैया से अपना बार्न्विटा शेयर करते रहना पडा क्योंकि वो उस दिन 'हिन्द' में ही थे।

इसके बाद जीवन कतई बदल गया। मेर दाखिला सैनिक स्कूल में हो गया। वहाँ तमाम पाबंदियाँ थीं। बहुत सुबह उठना और बहुत जल्दी सोना पडता था। रैगिंग के मामले में आज के इन्जीनियरिंग कॉलेज उसका क्या मुकाबला करेंगे। पहले दिन दो सीनियर आये और पूछा - बता, हम में से बेहतर कौन है? अब तो पिटना ही था तो तगडे वाले को बेहतर बता कर कमज़ोर वाले के झापड खा लिये। इन सब पाबंदियों के बावजूद वहाँ कुछ ऐसा था जिससे मेरे जीवन में फ़िल्मों को ले कर बदलाव आने वाला था। वहाँ एक ५०० सीटों वाला आडिटोरियम था जिसका नाम था रतनदीप और हर हफ़्ते वहाँ कमपलसरी फ़िल्म शो भी होता था। बडे फ़ौज़ी स्टाइल में - सबकी सीटें फ़िक्स थीं। जूनियर आगे बैठते थे और सीनियर पीछे। एक होस्टल सुपरिण्टेन्डेन्ट थे जिनका नाम लड्को ने दुधारी रखा था। वोही फ़िल्म आपरेट करते थे। हर शनिवार को दो शो होते थे - ३:३० बजे स्टाफ़ के लिये, और फ़िर ७ बजे स्टुडेन्ट्स के लिये। मैने धीरे धीरे दुधारी सर से दोस्ती कर ली और स्टाफ़ शो के दौरान फिल्म रूम में जाना शुरु कर दिया। यहाँ से शायद पहली बार फिल्मों ने मुझे प्रभावित करना शुरु किया। हर फ़िल्म मैं दो बार देखता था। स्टाफ़ शो में दुधारी सर कोई सीन नही काटते थे लेकिन स्टुडेन्ट सो में उनकी हथेली लेन्स के आगे आ कर बॉयज़ को निराश करती। यहाँ सबसे मज़ेदार बात ये थी कि हर दो हिन्दी फ़िल्मों बाद एक इंगलिश फ़िल्म आती थी और उस उम्र और समाज़ के उस हिस्से में जहाँ से मैं आया था, ये एक्स्पोज़र ज़बर्दस्त था - ओमार द डेसर्ट लायन, द लास्ट एम्पेरर, कुनैन द बारबेरियन, कुनैन द डेस्ट्रोयर, से ले कर होम अलोन, वहाँ से सलाम बाम्बे जैसे पिक्चरों से ले कर के हार्डकोर बालीवुड जैसे नैना, रिशि कपूर की 'औरत नरक का द्वार है' वाले पिक्चर, दामिनी (जिसने मुझे हिला कर रख दिया था) से होते हुए डाई हार्ड, स्पीड जैसी ज़बरदस्त ऐक्शन फिल्मों तक का सफ़र मुझे बहुत उत्तेजित करता था। शायद जाने अन्जाने यहीं थियेटर के लिये लगाव पैदा हुआ। कभी कभी आप कुछ पसन्द करने लगते है, आपको पता भी नही होता कि उसका नाम क्या है - वही हुआ। बहुत बाद में पता लगा कि मैं थियेटर करना चाहने लगा था।

इसके बाद तमाम उथल पुथल हुई जीवन में, और फ़ाइनली, तमाम मिडिल क्लासी होनहारों की भाँति मैं भी दिल्ली चला गया - आई आई टी के तैयारी करने। मुझे दिल्ली बहुत भयावह मालूम पडती थी।एक ही शहर में एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिये एक से दो घन्टे लगना मुझे कभी अच्छा नहीं लगा। ऊपर से कोचिंगो की लूट खसोट, तैयारी के नाम पर अभिभावकों से पैसों के बंडल ऐंठ कर होस्टलों के नाम पर ऐसे बेस्मेंटों में स्टुडेन्टों को टिकाना जो गैरकानूनी होने के साथ साथ सीवर से लीक होते पानी के अनौपचारिक तालाब भी होते हैं। लिहाज़ा लीवर एन्लार्ज्मेण्ट, समथिंग क्लोज़ टू हेपेटाइटिस, से ग्रसित हो कर जल्द ही स्वास्थ लाभ के लिये वापस घर जाना पडा। दो महीने बिस्तर पर रहने के बाद वापस आने पर एक ही सहारा रह गया था, ये सहारा तीन अक्षरों का था - पी वी आर! इस सहारे में रोज़ दो से तीन घन्टे लगते थे, और कुछ महीनों के प्रयास पर इस सहारे ने एक पूरा सपोर्ट ग्रुप ही तैयार कर दिया था। जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ उन टिकटों की जो पी वी आर के दो फ़्रंट रो के होते थी और सरकार के आदेशानुसार सिर्फ़ सात रुपैये में मिलते थे, जिनके लिये लोग तीन तीन घन्टा पहले लाइन लगाते थे, और जिन्हें पाकर लगभग आई आई टी के सेलेक्शन जितनी खुशी पाते थे।

मेरा एक मित्र जो मेरे साथ आई आई टी की तैयारी करता था और आई आई टी में भी साथ था, कई वर्षों बाद मिला। उसने एक किस्सा बताया कि एक दिन मैने उसे तनाव मुक्ति के लिये नेशनल म्यूज़ियम घूमने और फ़िल्म देखने का मशविरा दिया और ये सात रुपैये वाला राज़ बताया। वो बेचारा टिकट लेने पहुँचा तो देखता है कि इतनी लम्बी लाइन है और उस पर भी हर कोई कह रहा है कि मेरे आगे १० है, मेरे आगे १५ हैं। मुझे ये कुछ जँचा नहीं, मैं अगली बार उसके साथ गया, तो मुझे देखते ही लाइन में आगे से दूसरे या तीसरे नंबर पर शामिल कर लिया गया और दोस्त के पूछने पर ये बताया गया कि ये पर्मानेन्ट लाइन में रहते हैं और जिन पन्द्र्ह की बात आपसे की थी, उनमें से ये एक हैं। मुझे वो दिन याद आया और ये भी याद आया कि उस दिन पहली बार लगा था कि शायद दिल्ली का कुछ हिस्सा मेरा भी है। माँ कसम, मैनें शायद ही तैयारी के दिनों में कोई भी पिक्चर छोडी हो। मैं बाकायदा फ़िजिक्स की किताब ले कर लाइन में दो से तीन घण्टा पहले लग कर पढाई भी करता रहता था और पढाई के लिये स्वयं को पुरस्कृत भी। सच है कि यदि पी वी आर ना होता तो मैं उतना कभी नहीं पढ पाता।

२००१ में मैने आई आई टी खडगपुर ज्वाइन किया। उस समय शायद ही किसी कालेज होस्टल में क्म्प्यूटर नेट्वर्क और इन्टरनेट की सुविधा हो। इस सुविधा और पियर टू पियर डाउनलोड नाम के अस्त्र के चलते मैं वर्ल्ड सिनेमा की बेहद पोषक डाइट पर पलने लगा। टोरेन्टिनों से मुलाकात हुई, गुड बैड अग्ली रूपी गुग्ली खायी, कास्ट अवे, ग्रीन माइल, फ़िलेडेल्फ़िया, और फ़ोरेस्ट गम्प ने दिमाग के परखच्चे उडा दिये, और पल्प फ़िक्शन ने मरहम लगाने के बजाय खून खच्चर कर डाला। जिस दिन वनेला स्काई देख कर रुलाई छूट गयी थी, उस दिन देखा कि मैं अकेला नहीं हूँ, सब के सब रो रहे थे। डेविल्स एड्वोकेट पर अपने रेस्पान्स को तो आज तक नहीं समझ पाया हूँ। फ़िर इस मिक्स्चर के ऊपर ७० के दशक के क्लासिक रॉक म्यूज़िक की गार्निशिंग हुई और एक जबर्दस्त चीज़ हाथ लगी - गाँजा। काफ़ी दिन तक फ़िल्म, म्यूज़िक, थियेटर और गाँजे के सेवन के बाद एक पिक्चर देखी - रेक्वीम फ़ॉर अ ड्रीम, इसी समय इश्क भी हो रहा था। इश्क और रेक्वीम बाकी सब पर भारी पडी और उसका नतीज़ा ये हुआ कि मुझे कॉलेज से निकाल कर फेंक नहीं दिया गया, बल्कि मैं बाइज़्ज़्त डिग्री ले कर पास हुआ। वैसे जिन मोहतरमा के चलते हम रास्ते पर आये, वो अक्सर बिलखते हुए फोन करतीं हैं, तो हम पूछ्ते है आज कौन सी देख ली!

हिंदी फ़िल्मों को दुख के साथ अंग्रेज़ी सिनेमा से अपने पर्सनल स्कोर बोर्ड पर हारते हुए देखते रहे, और एक दोस्त ने हृशीकेष मुखर्जी से परिचय करवाया। फ़िर कई दोपहरें होस्टल के कमरे में खूबसूरत, छोटी से बात, अंगूर देखते हुए बीतीं। रंग दे बसंती वो पहली फिल्म थी जिसने कोलकाता भेजा सिर्फ़ फ़िल्म देखने के उद्देश्य से - और शायद यहाँ से ही हिन्दी फ़िल्मों से आशा भी जगनी शुरु हुई। (लगान भी अच्छी लगी थी मगर महज़ एक स्टोरी की तरह, और उसके प्रोडक्शन के लिये ज़बरदस्त इज़्ज़त है मन में, लेकिन दिमाग में आग लगा दे ऐसा उसमें कुछ नहीं था।) इसके बाद सिर्फ़ वो ही फ़िल्में देखता था जिनसे आशा होती थी और सुपरस्टार फ़िल्मों से लगभग किनारा ही कर लिया था - कहीं ना कहीं ऐसा लगता था कि सुपर स्टार फ़िल्म का मतलब ही है कि ज़रूर बकवास होगी। उसके बाद ब्लैक देखी - सिनेमाटोग्राफ़ी पर वाह वाह कर उठे, लेकिन मूल रूप से अमिताभ के चरित्र से घृणा ही हुई क्योंकि वो मार पीट इत्यादि का सहारा लेते दिखाय गये थे, बल्कि गलोरिफ़ाई भी किये गये थे। लेकिन फ़िर भी कभी ना कभी कुछ ना कुछ मिलता रहा है हिन्दी फ़िल्मों से - सज्जनपुर, तारे ज़मीं पर, कमीने, ओमकारा जैसी फ़िल्में आती हैं, तो मन मचल उठता है देखने के लिये।

कुल मिला कर फ़िल्मों का जीवन पर बहुत असर पडा है, और कहीं ना कहीं ऐसी इच्छा है कि एक दिन कंधे पर कैमरा होगा और मेरा बनाया भी कोई देखेगा।

दस पसंदीदा हिन्दी फ़िल्में - रंग दे बसंती, तारे ज़मीं पर, मिली, छोटी सी बात, अंगूर, मुन्नाभाई, ओंमकारा, गाइड, नमकहलाल, दिल से और स्वदेश (शाहरुख के बावज़ूद)

Saturday, November 7, 2009

दरअसल :फेस्टिवल सर्किट में नहीं आते हिंदी प्रदेश

-अजय ब्रह्मात्‍मज

कुछ समय पहले इंदौर में एक फिल्म फेस्टिवल हुआ था। वैसे ही गोरखपुर और लखनऊ में भी फेस्टिवल के आयोजन होते हैं। भोपाल से भी खबर आई थी। अभी दिसंबर में हरियाणा के यमुनानगर में फेस्टिवल होगा। ये सारे फेस्टिवल स्थानीय स्तर पर सीमित बजट और उससे भी सीमित फिल्मों को लेकर आयोजित किए जाते हैं। स्थानीय दर्शक, फिल्म प्रेमी और मीडिया के छात्रों के उत्साह का आकलन ऐसे फेस्टिवल में जाकर ही किया जा सकता है। फिर भी हिंदी प्रदेशों के फेस्टिवल राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित हो रहे फेस्टिवल सर्किट में शामिल नहीं किए जाते। अक्टूबर में दिल्ली में ओसियान फेस्टिवल हुआ। गुलजार, विशाल भारद्वाज, इम्तियाज अली और अनुराग कश्यप की फिल्मों के विशेष उल्लेख के साथ उनकी सराहना की गई। साथ में विदेशों से लाई गई फिल्में भी दिखाई गई। निश्चित ही दिल्ली के फिल्म प्रेमियों को लाभ हुआ होगा। अक्टूबर के अंतिम हफ्ते में मुंबई में मामी फिल्म फेस्टिवल हुआ। एक बड़ी कंपनी ने इसे प्रायोजित किया। पुरस्कारों की रकम बढ़ा दी गई। ऐसा माना जा रहा है कि अगर उक्त कंपनी का संरक्षण मिलता रहा, तो अपनी पुरस्कार राशि की वजह से मामी फेस्टिवल एशिया का महत्वपूर्ण फेस्टिवल हो जाएगा, क्योंकि पहली फिल्म के निर्देशक और निर्माता को मोटी रकम दी जा रही है।

नवंबर के अंत में गोवा में इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल होगा। यह भारत सरकार का अधिकृत फिल्म फेस्टिवल है। पिछले कुछ वर्षो से इसे गोवा शिफ्ट कर दिया गया है। उम्मीद थी कि गोवा के समुद्रतटों की वजह से भारत सरकार का इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल दुनिया भर के सिने प्रेमियों का प्रिय डेस्टिनेशन बन जाएगा, लेकिन वह लक्ष्य पूरा नहीं हो सका। अच्छे थिएटर और उचित व्यवस्था के अभाव में इस फेस्टिवल में दर्शकों की रुचि कम होती जा रही है। मुंबई गोवा से अधिक दूर नहीं है, फिर भी मुंबई से हिंदी फिल्मों के निर्देशक और कलाकार इस फेस्टिवल में जाने की नहीं सोचते।

इसी प्रकार कोलकाता और तिरुअनंतपुरम इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल भी लोकप्रिय हैं। पहले इन सारे फेस्टिवल में फिल्मों का पैकेज लगभग समान होता था। इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के लिए मंगवाई गई फिल्में ही सभी फेस्टिवलों में जाती थीं। अब कोशिश यह होती है कि फेस्टिवल के खंडों को देश-विदेश की फिल्मों और फिल्मकारों के आधार पर स्पष्ट रूप से विभाजित कर दिया जाए। हर फेस्टिवल का खास फोकस रहे। इसमें कामयाबी भी मिल रही है। दूसरी तरफ यह जरूरी भी है, क्योंकि सुनिश्चित फेस्टिवल नहीं होंगे, तो उनके दर्शकों में भी कमी आएगी। साधारण और रेगुलर फिल्में तो इन दिनों डीवीडी पर आसानी से उपलब्ध हैं।

इस पृष्ठभूमि में फेस्टिवल के प्रति हिंदी प्रदेशों के सरकार, संस्थान और फिल्म प्रेमियों की निष्क्रियता देखकर निराशा होती है। हिंदी प्रदेशों में सिने संस्कृति विकसित नहीं हो रही है। न फिल्म देखने का रिवाज है और न फिल्म दिखाने की प्रथा। आज भी हिंदी प्रदेशों में फिल्म देखना किशोर और नौजवानों के बिगड़ने के पहले लक्षण के रूप में देखा जाता है। हिंदी प्रदेशों से निकले फिल्मकार, कलाकार और तकनीशियन मुंबई और दूसरे शहरों में अपने प्रोफेशन में इतने व्यस्त रहते हैं कि अपने इलाकों की तरफ ध्यान नहीं दे पाते। उन पर खुद हिंदी प्रदेश ही गर्व नहीं करते। क्या उत्तर प्रदेश सरकार ने विशाल भारद्वाज और अनुराग कश्यप या झारखंड सरकार ने इम्तियाज अली को सम्मानित करने का निर्णय लिया या बिहार ने ही अपने कलाकारों की कभी सराहना की? अगर हिंदी प्रदेश के राज्यों में फिल्म फेस्टिवल के आयोजन हों तो सिने सक्रियता बढ़ेगी और फिल्मों की समझ विकसित होगी। सिनेमा के तिरस्कार से हम इस क्षेत्र में पिछड़े हुए हैं और पिछड़ें रहेंगे। हमें सिनेमा की संस्कृति पर ध्यान देना होगा। तभी हिंदी प्रदेशों में नई प्रतिभाएं मुखरित होंगी।


फिल्‍म समीक्षा : अजब प्रेम की गजब कहानी

-अजय ब्रह्मात्‍मज

यह फिल्म प्रेम यानी रणबीर कपूर की है। वह जेनी का पे्रमी है। जेनी उसे बहुत पसंद करती है। आखिरकार उसे महसूस होता है कि उसका असली प्रेमी तो प्रेम ही है। वह उसके साथ घर बसाती है।

फिल्म को देखते हुए साफ तौर पर लगता है कि राजकुमार संतोषी ने रणबीर और कैटरीना के चुनाव के बाद फिल्म की कथा बुनी है, क्योंकि हर दृश्य की शुरुआत और समाप्ति दोनों में से किसी एक कलाकार से ही होती है। इसे निर्देशक की सीमा कह सकते हैं या हिंदी फिल्मों के बदलते परिदृश्य में स्टारों का केंद्रीय महत्व मान सकते हैं।

फिल्म का उद्देश्य हंसाना है, इसलिए शुरू से आखिर तक ऐसे दृश्यों की परिकल्पना की गई है जो दर्शकों को गुदगुदा सके। यह एक सामान्य कामेडी फिल्म है, और यह कहा जा सकता है कि राजकुमार संतोषी की ही एक अन्य फिल्म अंदाज अपना अपना से इसकी कामेडी कमजोर है। यह फिल्म मुख्य तौर पर रणबीर कपूर पर निर्भर है हालांकि वह दर्शकों को निराश भी नहीं करते। प्रेम के किरदार में उनके अभिनय का आत्मविश्वास निखार पर दिखाई देता है। वह हर अंदाज में प्यारे लगते हैं, क्योंकि उन्होंने पूरे मनोयोग और विश्वास से अपने किरदार को निभाया है। उन्होंने एक प्रसंग में शम्मी कपूर की तरह खूब सिर हिलाया है।

डांस सिक्वेंस में उनकी अदाएं आकर्षक हैं। निश्चित ही रणबीर कपूर युवा पीढ़ी के अग्रणी और समर्थ स्टारों में से एक हैं। इस फिल्म में वह साबित करते हैं कि हास्य प्रधान फिल्मों में भी वह कमाल कर सकते हैं। यह फिल्म मुख्य रूप से रणबीर कपूर और कैटरीना कैफ पर केंद्रित है, इसलिए बाकी किरदारों को अपेक्षित महत्व नहीं मिला है। केवल प्रेम के पिता के रूप में दर्शन जरीवाला अपने कद्दावर व्यक्तित्व के कारण ध्यान खींचते हैं। अन्यथा गोविंद नामदेव, जाकिर हुसैन, प्रेम के चारों दोस्त और कैटरीना का मंगेतर सभी कैरी केचर हो गए हैं। जाकिर हुसैन जैसे समर्थ अभिनेता को जानी लीवर की शैली अपनानी पड़ी है। यह निर्देशक का ही दबाव होगा। अंतिम दृश्य की लंबी झड़प में कार्टून बनते किरदारों को देख कर हंसी आती है, लेकिन यह हंसी सुने गए लतीफे को फिर से सुनने की हंसी है। उससे ज्यादा और गहरा प्रभाव नहीं बन पाता।

रणबीर कपूर और कैटरीना कैफ की केमिस्ट्री की काफी चर्चा थी। इतनी केमिस्ट्री तो हर फिल्म के नायक-नायिका के बीच दिखती है। दोनों की जोड़ी सिल्वर स्क्रीन पर विशेष प्रभाव नहीं छोड़ पाई। अलबत्ता, यह जरूर कहा जा सकता है कि कैटरीना कैफ खूबसूरत गुडि़या के सांचे से बाहर निकलती दिखाई पड़ी हैं। राजकुमार संतोषी ने उनसे अभिनय करवाने की कोशिश की है।

***

Friday, November 6, 2009

फ़िल्म समीक्षा : jail

मधुर भंडारकर की फिल्मों की अलग तरह की खास शैली है। वह अपनी फिल्मों में सामाजिक जीवन में घटित हो रही घटनाओं में से ही किसी विषय को चुनते हैं। उसमें अपने नायक को स्थापित करने के साथ वे उसके इर्द-गिर्द किरदारों को गढ़ते हैं। इसके बाद उस क्षेत्र विशेष की सुनी-समझी सूचनाओं के आधार पर कहानी बुनते हैं। इस लिहाज से उनकी फिल्मों में जीवन के यथार्थ को बेहद नजदीकी से महसूस किया जा सकता है।

चांदनी बार से लेकर फैशन तक मधुर भंडारकर ने इस विशेष शैली में सफलता हासिल की है। जेल भी उसी शैली की फिल्म है जिसमें उन्होंने नए आयामों को छुआ है।

फिल्म की शुरुआत के चंद सामान्य दृश्यों के बाद फिल्म का नायक पराग दीक्षित जेल पहुंच जाता है। फिर अंतिम कुछ दृश्यों में वह जेल के बाहर दिखता है। शक के आधार पर पुलिस कस्टडी में बंद पराग दीक्षित को दो सालों के बाद सजा मिलती है। सजा मिलने के बाद आजादी की उसकी उम्मीद टूट जाती है और वह बाहर निकलने के लिए शार्टकट अपनाता है। वह जेल से निकलने की कोशिश करता है, लेकिन वार्डर नवाब की नसीहत और भरोसे के दबाव में वह फिर से जेल लौट आता है। आखिरकार एक अच्छा वकील उसे सजा से बरी करवाता है। इस दरम्यान हम जेल की अंदरूनी जिंदगी और जेल के बाहर की कड़वी सच्चाइयों से वाकिफ होते हैं। फिल्म के उदास सच की तल्खी दर्शक को सुन्न कर देती है।

मधुर भंडारकर की फिल्मों के किरदार आम जिंदगी के होते हैं, इसलिए वे घिसे-पिटे और देखे-सुने जान पड़ते हैं। उन चरित्रों के बात-व्यवहार में काल्पनिकता नहीं के बराबर होती है। इसलिए उनकी फिल्मों को देखते हुए यह एहसास होता है कि हम उन किरदारों को पहचानते हैं और उनकी बातें पहले सुन चुके हैं। मधुर की यही विशेषता उन्हें बाकी फिल्मकारों से अलग कर देती है। वे सामाजिक जीवन के क्षेत्र विशेष के अंतर्विरोधों, डिंबनाओं और मुश्किलों को प्रसंगों के माध्यम से जोड़ते हैं। उनकी फिल्मों के नैरेटिव में कहानी बहुत मजबूत नहीं रहती। वे इस पर जोर भी नहीं देते। कुछ घटनाओं और प्रसंगों का तानाबाना बुनकर मधुर अपनी फिल्म पूरी करते हैं।

जेल मधुर भंडारकर के साहसिक प्रयास का अगला कदम है। इस बार वह अधिक सधे हुए हैं। पिछली फिल्मों में कथ्य की प्रासंगिकता के बावजूद सिनेमाई भाषा और तकनीक में वे थोड़े कमजोर रहे हैं। जेल में उनकी प्रतिभा और शैली परिष्कृत रूप में नजर आती है। हालांकि इस फिल्म में भी आइटम एवं रोमांटिक गीत और लता मंगेशकर के गाए भजन जैसी चिप्पियां हैं, इसके बावजूद फिल्म में एक नीम उदासी बनी रहती है। जेल हिंदी फिल्मों की मनोरंजन की सीमाओं को तोड़कर एक नया आयाम विकसित करती है। यह प्रबोधन के स्तर पर जाती है। मधुर अपनी फिल्मों में कभी अंतर्विरोधों के निदान और समाधान तक नहीं पहुंचते। वह रुपहले पर्दे पर समाज के कुछ प्रसंगों को जिंदगी के एक टुकड़े के तौर पर रख देते हैं।

जेल की सबसे अच्छी बात यह है कि यह किसी रोमांटिक दबाव में नहीं आती। मुग्धा गोडसे के होने के बावजूद मधुर भंडारकर ने संयम से काम लिया है। नील नितिन मुकेश और मनोज बाजपेयी के बीच के कुछ अनबोले दृश्य फिल्म की खासियत हैं। नील संयत अभिनेता हैं। वे किरदारों को अंडरप्ले करते हैं। इस फिल्म में पराग दीक्षित के सदमे को उन्होंने अच्छी तरह पर्दे पर जिया है। मनोज बाजपेयी निस्संदेह उत्तम अभिनेता हैं। ऐसी फिल्मों में उनकी प्रतिभा उद्घाटित होती है। मधुर ने सहयोगी किरदारों के लिए भी आर्य बब्बर, राहुल सिंह और चेतन पंडित के रूप में बेहतरीन कलाकार चुने हैं। मुग्धा गोडसे को कम दृश्य मिले हैं, लेकिन समर्पित और दृढ़ प्रेमिका के रूप में वह अच्छी लगी हैं।

*** 1/2

फ़िल्म समीक्षा : जेल

***1/2
उदास सच की तल्खी
-अजय ब्रह्मात्मज
मधुर भंडारकर की फिल्मों की अलग तरह की खास शैली है। वह अपनी फिल्मों में सामाजिक जीवन में घटित हो रही घटनाओं में से ही किसी विषय को चुनते हैं। उसमें अपने नायक को स्थापित करने के साथ वे उसके इर्द-गिर्द किरदारों को गढ़ते हैं। इसके बाद उस क्षेत्र विशेष की सुनी-समझी सूचनाओं के आधार पर कहानी बुनते हैं। इस लिहाज से उनकी फिल्मों में जीवन के यथार्थ को बेहद नजदीकी से महसूस किया जा सकता है।
चांदनी बार से लेकर फैशन तक मधुर भंडारकर ने इस विशेष शैली में सफलता हासिल की है। जेल भी उसी शैली की फिल्म है जिसमें उन्होंने नए आयामों को छुआ है।
फिल्म की शुरुआत के चंद सामान्य दृश्यों के बाद फिल्म का नायक पराग दीक्षित जेल पहुंच जाता है। फिर अंतिम कुछ दृश्यों में वह जेल के बाहर दिखता है। शक के आधार पर पुलिस कस्टडी में बंद पराग दीक्षित को दो सालों के बाद सजा मिलती है। सजा मिलने के बाद आजादी की उसकी उम्मीद टूट जाती है और वह बाहर निकलने के लिए शार्टकट अपनाता है। वह जेल से निकलने की कोशिश करता है, लेकिन वार्डर नवाब की नसीहत और भरोसे के दबाव में वह फिर से जेल लौट आता है। आखिरकार एक अच्छा वकील उसे सजा से बरी करवाता है। इस दरम्यान हम जेल की अंदरूनी जिंदगी और जेल के बाहर की कड़वी सच्चाइयों से वाकिफ होते हैं। फिल्म के उदास सच की तल्खी दर्शक को सुन्न कर देती है।
मधुर भंडारकर की फिल्मों के किरदार आम जिंदगी के होते हैं, इसलिए वे घिसे-पिटे और देखे-सुने जान पड़ते हैं। उन चरित्रों के बात-व्यवहार में काल्पनिकता नहीं के बराबर होती है। इसलिए उनकी फिल्मों को देखते हुए यह एहसास होता है कि हम उन किरदारों को पहचानते हैं और उनकी बातें पहले सुन चुके हैं। मधुर की यही विशेषता उन्हें बाकी फिल्मकारों से अलग कर देती है। वे सामाजिक जीवन के क्षेत्र विशेष के अंतर्विरोधों, डिंबनाओं और मुश्किलों को प्रसंगों के माध्यम से जोड़ते हैं। उनकी फिल्मों के नैरेटिव में कहानी बहुत मजबूत नहीं रहती। वे इस पर जोर भी नहीं देते। कुछ घटनाओं और प्रसंगों का तानाबाना बुनकर मधुर अपनी फिल्म पूरी करते हैं।
जेल मधुर भंडारकर के साहसिक प्रयास का अगला कदम है। इस बार वह अधिक सधे हुए हैं। पिछली फिल्मों में कथ्य की प्रासंगिकता के बावजूद सिनेमाई भाषा और तकनीक में वे थोड़े कमजोर रहे हैं। जेल में उनकी प्रतिभा और शैली परिष्कृत रूप में नजर आती है। हालांकि इस फिल्म में भी आइटम एवं रोमांटिक गीत और लता मंगेशकर के गाए भजन जैसी चिप्पियां हैं, इसके बावजूद फिल्म में एक नीम उदासी बनी रहती है। जेल हिंदी फिल्मों की मनोरंजन की सीमाओं को तोड़कर एक नया आयाम विकसित करती है। यह प्रबोधन के स्तर पर जाती है। मधुर अपनी फिल्मों में कभी अंतर्विरोधों के निदान और समाधान तक नहीं पहुंचते। वह रुपहले पर्दे पर समाज के कुछ प्रसंगों को जिंदगी के एक टुकड़े के तौर पर रख देते हैं।
जेल की सबसे अच्छी बात यह है कि यह किसी रोमांटिक दबाव में नहीं आती। मुग्धा गोडसे के होने के बावजूद मधुर भंडारकर ने संयम से काम लिया है। नील नितिन मुकेश और मनोज बाजपेयी के बीच के कुछ अनबोले दृश्य फिल्म की खासियत हैं। नील संयत अभिनेता हैं। वे किरदारों को अंडरप्ले करते हैं। इस फिल्म में पराग दीक्षित के सदमे को उन्होंने अच्छी तरह पर्दे पर जिया है। मनोज बाजपेयी निस्संदेह उत्तम अभिनेता हैं। ऐसी फिल्मों में उनकी प्रतिभा उद्घाटित होती है। मधुर ने सहयोगी किरदारों के लिए भी आर्य बब्बर, राहुल सिंह और चेतन पंडित के रूप में बेहतरीन कलाकार चुने हैं। मुग्धा गोडसे को कम दृश्य मिले हैं, लेकिन समर्पित और दृढ़ प्रेमिका के रूप में वह अच्छी लगी हैं।

Tuesday, November 3, 2009

फिल्‍म समीक्षा: लंदन ड्रीम्‍स

ईर्ष्‍या और दोस्‍ती के बीच
-अजय ब्रह्मात्‍मज

विपुल शाह ने पंजाब और लंदन को एक बार फिर जोड़ा है। इस बार भी पंजाब का एक सीधा-सादा मुंडा लंदन पहुंचता है और वहां सभी का चहेता बन जाता है। अनजाने में वह अपने दोस्त के लिए ही बाधा बन जाता है। ईष्र्या जन्म लेती है और फिर एक दोस्त अपनी आकांक्षाओं के लिए दूसरे का दुश्मन बन जाता है।

अर्जुन और मन्नू बचपन के दोस्त हैं। अर्जुन मेहनती और लगनशील है। वह संगीत की दुनिया में अपना नाम रोशन करना चाहता है। परिवार में हुए एक हादसे की वजह से कोई नहीं चाहता कि अर्जुन संगीत का अभ्यास करे। दूसरी तरफ मन्नू हुनरमंद है। उसमें जन्मजात प्रतिभा है। बड़ा होने पर अर्जुन लंदन पहुंच जाता है और मन्नू पंजाब में ही रह जाता है। वह स्थानीय राजा-रानी बैंड में म्यूजिसियन बन गया है। उधर अर्जुन लंदन में धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है। उसने अपने बैंड का नाम लंदन ड्रीम्स रखा है। लंबे समय बाद दोनों दोस्त मिलते हैं। मन्नू भी लंदन पहुंचता है। वह अपने बेपरवाह अंदाज से सभी का प्रिय बन जाता है। यहां तक कि वह दोस्त की प्रेमिका का भी दिल जीत लेता है। यहीं से अर्जुन के मन में कसक पैदा होती है। वह मन्नू का दुश्मन बन जाता है। विपुल शाह ने दोस्तों के बीच की ईष्र्या के भाव पर फिल्म केंद्रित की है, लेकिन उसे पूरी तरह उभार नहीं पाए हैं। लंदन ड्रीम्स में चुस्त पटकथा की कमी महसूस होती है। आरंभ में पात्रों के संबंध विकसित होने और द्वंद्व स्थापित करने की कडि़यां मजबूत नहीं बन पाई हैं। इंटरवल के पास जब फिल्म पूरी तरह से लंदन पहुंच जाती है, तो दर्शकों को बांधती है। मन्नू के रूप में सलमान खान अपने बेफिक्राना अंदाज से फिल्म के दूसरे चरित्रों के साथ दर्शकों का भी दिल जीतते हैं। उनकी अदाएं अच्छी लगती हैं, लेकिन वह थोड़ा ध्यान दें और अपने दृश्यों को संवादों से भरें तो ये अदाएं गहरी भी हो जाएंगी। सलमान खान अपने किरदारों को निजी एटीट्यूड के करीब ले आते हैं। यह कई बार भाता है, लेकिन उसका प्रभाव लंबे समय तक नहीं रहता। अजय देवगन ने ईष्र्यालु दोस्त की भूमिका अच्छी तरह निभायी है। पूरी फिल्म में वे लूजर और कमजोर दिखते हैं। अंतिम दृश्य में मन्नू से माफी मांग कर उनका चरित्र उदात्त बनता है।

चूंकि फिल्म में अजय देवगन और सलमान खान हैं। फिल्म की कहानी दोस्ती, ईष्र्या और द्वंद्व है, इसलिए अपेक्षा रहती है कि दोस्तों की टकराहट के नाटकीय दृश्य होंगे। फार्मूला फिल्म में ऐसे ड्रामा कारगर होते हैं। टकराहट और मनौव्वल के दृश्यों में अधिक दम नहीं है। उन्हें संवाद अदायगी और प्रसंगों से अधिक नाटकीय करने की जरूरत थी। फिल्म की नायिका की खास भूमिका नहीं थी। वह एक पर्स की तरह हैं, जिन्हें सलमान खान ने अजय देवगन की जेब से निकाल कर अपनी जेब में डाल लिया। कृपा कर, महिला किरदारों को सिर्फ नाचने-गाने और आंसू बहाने के लिए या पर्स की तरह न रखें।

लंदन ड्रीम्स म्यूजिकल फिल्म है, किंतु इसका संगीत अधिक प्रभावशाली नहीं है। रॉक स्टार किरदारों की फिल्म का संगीत राकिंग होना चाहिए था। प्रसून जोशी के बोल में अप्रचलित शब्दों का प्रयोग अच्छा लगता है, किंतु वह प्रयोग संगीत की चाशनी में घुल जाए तो सार्थक होता है।



फिल्‍म समीक्षा: अलादीन

फैंटैसी से सजी है अलादीन
-अजय ब्रह्मात्‍मज

अलादीन और उसके जादुई चिराग का जिन्न हिंदी फिल्मों में आए तो हिंदी फिल्मों की सबसे बड़ी समस्या प्यार में उलझ गए। लड़के और लड़की का मिलन हिंदी फिल्मों की ऐसी समस्या है, जो हजारों फिल्मों के बाद भी जस की तस बनी हुई है। हर फिल्म में यह समस्या नए सिरे से शुरू होती है। अलादीन को जिन्न मिलता है, लेकिन अलादीन की तीन इच्छाएं प्रेम तक ही सीमित हैं- जैसमीन, जैसमीन और जैसमीन। अलादीन को जैसमीन से मिलाने में ही जिन्न का वक्त निकलता है। बीच में थोड़ी देर के लिए खलनायक रिंग मास्टर आता है।

सुजॉय घोष ने अलादीन और उसके जिन्न को लेकर आधुनिक फैंटेसी गढ़ी है। इस फैंटैसी में स्पेशल इफेक्ट का सुंदर और उचित उपयोग किया गया है। काल्पनिक शहर ख्वाहिश और उसका विश्वविद्यालय भव्य हैं। इस शहर में ऐसा लगता है कि मुख्य रूप से स्टूडेंट ही रहते हैं, क्योंकि शहर की गलियों में दूसरे चरित्र नहीं दिखाई पड़ते। हां, डांस सीन हो, पार्टी हो या नाच-गाना हो तो अचानक सैकड़ों जन आ जाते हैं। फैंटेसी फिल्म है, इसलिए कुछ भी संभव है। ऊपर से हिंदी फिल्म की फैंटेसी है तो लेखक-निर्देशको हर तरह की छूट लेने की आजादी है। सुजॉय घोष ने आजादी लेकर रोचक तरीके से फिल्म बनाई है।

अलादीन स्पेशल इफेक्ट, जिन्न की जादूगरी और अलादीन चटर्जी के भोलेपन के कारण बच्चों को अच्छी लग सकती है। वयस्क दर्शकों के लिए यह फिल्म अनर्गल और अनुचित हो सकती है, लेकिन बच्चों को अलादीन और जिन्न की अतार्किक कहानी और फैंटेसी में सृजित दुनिया भा सकती है। किरदारों का चमत्कारिक व्यवहार बाल दर्शकों को ज्यादा पसंद आता है। अलादीन में कामिक्स के तत्व हैं। खास कर अमिताभ बच्चन और संजय दत्त की वेशभूषा और स्टाइल अच्छी लगती है। अमिताभ बच्चन के मसखरे अंदाज में एक मस्ती रहती है। हम देखते हैं कि उनकी उम्र सहज हास्य में आड़े नहीं आई है।

इस फिल्म में रितेश देशमुख अपने भोलेपन से प्रभावित करते हैं। उनके चेहरे में एक मासूमियत है, जो लगातार हास्य किरदारों को निभाने की वजह से अपने प्रति दर्शकों की सहानुभूति गढ़ लेती है। इस फिल्म में वह अकेले नायक हैं। हालांकि उन्हें अमिताभ बच्चन और संजय दत्त का साथ मिला है, लेकिन अपने दृश्यों को उन्होंने उचित तरीके से निभाया है।

अलादीन में स्पेशल इफेक्ट प्रभावशाली है और बताता है कि हम तकनीकी रूप से कितना आगे बढ़ चुके हैं। कहीं भी झटका नहीं लगता। कुछ भी नकली नहीं लगता। सुजॉय की तकनीकी टीम ने उत्कृष्ट काम किया है।