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Sunday, November 23, 2014

खानाबदोश अभिनेता आदिल हुसैन



-अजय ब्रह्मात्मज
हिंदी फिल्मों के दर्शकों ने आदिल हुसैन को सबसे पहले अभिषेक चौबे की फिल्म ‘इश्किया’ में देखा था। अभिषेक चौबे ने उनका नाटक ओथेलो देख रखा था। उन्हें विद्याधर शर्मा की भूमिका के लिए आदिल हुसैन जैसा ही इंटेंस एक्टर चाहिए था। आरंभिक झिझक के बाद आदिल हुसैन मान गए थे। उसके बाद वे ‘इंग्लिश विंग्लिश’ के सतीश गोडबोले, ‘लुटेरा’ के केएन सिंह और ‘एक्सपोज’ के किरदारों में दिखे। उन सभी किरदारों में वे ग्रे शेड की डार्क भूमिकाओं में थे। अपनी बन रही इमेज से अलग भूमिका में वे डॉ.चंद्रप्रकाश द्विवेद्वी की ‘जेड प्लस’ में दिखेंगे। इस फिल्म में उन्होंने असलम खान की भूमिका निभाई है, जो फतेहपुर कस्बे में पंक्चर की दुकान चलाता है। इसी शहर में पीपल वाले पीर की दरगाह है। दरगाह में जिस दिन का वह खादिम है, उसी दिन प्रधानमंत्री का आगमन होता है। दोनों की मुलाकात में भाषा की दिक्कत से गफलत पैदा होती है। असलम को प्रधानमंत्री की जेड प्लस सुरक्षा मिल जाती है। उनके रहम से असलम की जिंदगी की दिनचर्या बदल जाती है।
    इन दिनों आदिल हुसैन ज्यादातर समय ‘जेड प्लस’ से संबंधित इंटरव्यू और प्रचार में निकल रहा है। ‘जेड प्लस’ से पहले उन्हें इस जिम्मेदारी का एहसास नहीं हुआ था। लगातार फिल्में करने के बावजूद उन्होंने अभी तक अपना ठिकाना दिल्ली रखा है। मुंबई शिफ्ट करने की जरुरत वे महसूस नहीं करते। आदिल कहते हैं, ‘मुंबई पहुंचने में दो घंटे ही लगते हैं। और फिर दिल्ली की सड़कें खुली हुईं हैं। दोस्त-परिचित हैं। सबसे बड़ी बात की घर में मेरी खिड़कियां खुलती हैं तो सामने जंगल दिखता है। वैसा माहौल मुंबई में नहीं मिल सकता। मैं मुंबई आता हूं, काम करता हूं और लौट जाता हूं।’ आदिल हुसैन को अपनी खानाबदोश जिंदगी पसंद है। आरंभ से ही इस जीवनशैली ने उन्हें देश-दुनिया से वाकिफ कराने के साथ जमीनी सच्चाई से रूबरू करा दिया है कि अनुभव, जानकारी और आत्मोत्थान की यात्रा कभी खत्म नहीं होती।
    शिक्षक पिता के घर पैदा हुए आदिल हुसैन अपने परिवार से इंग्लिश मीडियम से शिक्षा हासिल करने वाले पहले सदस्य थे। असम के ग्वालपाड़ा में उन्हें दूसरों की नकल और मिमिक्री करने में मजा आता था। घर के आगे मौजूद मैदान में मेला लगता था। वहां स्थानीय कलाकारों का मजमा लगता था। बालक आदिल जो कुछ मेले से देख कर लौटते थे, उसकी नकल दोस्तों और परिजनों को दिखाया करते थे। हाई स्कूल की परीक्षा में अपेक्षा से बेहतर रिजल्ट हुआ तो उन्होंने कॉलेज की पढ़ाई के लिए पिता से गुवाहाटी जाने की अनुमति मांगी। रिजल्ट से खुश पिता ने अनुमति दे दी। उन्हें कहां मालूम था कि वे अनजाने ही अपने बेटे को प्रदर्शन और अभिनय की दुनिया में भेज रहे हैं। गुवाहाटी आते ही आदिल के तो पंख लग गए। बचपन बंगाली और असमी साहित्य एवं भाषा के बीच बीता था। स्कूल में अंग्रेजी की सोहबत हो गई थी। स्कूल में ही पहली बार नाटक में काम करने का मौका मिला। प्रदर्शन अच्छा रहा तो वे स्कूल में पॉपुलर हो गए। आठवीं कक्षा तक आते-आते आदिल ने मन बना लिया था कि उन्हें एक्टर ही बनना है। मनाही और पिटाई के बावजूद वे नहीं माने और गुपचुप तरीके से अपनी ख्वाहिशें पूरी करते रहे। शिक्षक पिता की चाहत थी बेटा प्रोफेसर हो जाए,लेकिन बेटे को तो तो दुनिया में असर छोड़ना था।
    1983 में गुवाहाटी आने के बाद आदिल स्टैंडअप कॉमेडी के एक ग्रुप में शामिल हो गए। चार सदस्यों के इस ग्रुप के युवतम सदस्य थे आदिल। उनका स्टैंडअप कॉमडी ग्रुप इतना पॉपुलर रहा कि उन्होंने अपने ऊपर वीडियो फिल्म बना ली। असमी की वह पहली वीडियो फिल्म थी। ट्रैडिशनल ‘ ओजा पाली’ के पारंपरिक फॉर्म में शासक और सिस्टम पर व्यंग्य किए जाते थे। उस लहजे में प्रदर्शन से आदिल को दुनिया को देखने का सूक्ष्म नजरिया दिया। उसी दौरान उन्हें टीवी, फिल्में और डॉक्युमेंट्री में मौके मिले और ये सारी गतिविधियां परिवार को बगैर बताए चल रही थीं। फिर किसी ने एनएसडी के बारे में बताया तो आदिल अनुभवों का पुंज लेकर दिल्ली पहुंच गए। 1990-93 बैच के छात्र रहे। आदिल के सहपाठियों में अनूप सोनी और रोहिताश्व गौड़ थे। एनएसडी से ग्रेजुएट होते ही उन्हें लंदन से स्कॉलरशिप मिल गई। आदिल इंग्लैंड गए, लेकिन अपनी पढ़ाई से नाखुश रहे। वहां से लौट कर दिल्ली आ गए। दिल्ली में एनएसडी के शिक्षक खालिद तैय्यब से फिर से मुलाकात हुई। आदिल ने उनकी संगत करनी चाही तो उन्होंने कहा कि पहले एक मोटरसायकिल खरीदो और अपने खर्चे के लिए एक लाख रुपए का इंतजाम कर लो।
    आदिल के लिए एक लाख रुपए का का इंतजाम एक चुनौती थी। घर से मदद मिल नहीं सकती थी। एक रास्ता निकला। उन्होंने असम लौटकर मोबाइल थिएटर ज्वॉइन कर लिया। दो महीने के रिहर्सल बाद सात महीनों तक रोजाना परफॉर्म करने के लिए 1 लाख 60 हजार रुपए का करार हुआ। खालिद तैयब की संगत और पढ़ाई के लिए यह जरूरी था। पैसे और मोटरसायकिल खरीदने के बाद वे अभिनय गुरू खालिद तैय्यब से मिलने लौटे तो वे बस्तर जा चुके थे। उन्होंने वहीं बुलाया। बस्तर की उस जिंदगी ने आदिल को हमेशा के लिए जमीन से जोड़ दिया। हालांकि उसके बाद विदेश की यात्राएं, अध्यापन, रंगकर्म के मौके मिले। लौटने पर टीवी, थिएटर और फिल्में मिलीं, लेकिन आदिल आज भी उन दिनों के अनुभव से ही सिंचित होते हैं। अपरिग्रह जीवन की प्रेरणा वहीं से मिली। यही कारण है कि ग्लमैर जगत का हिस्सा होने के बावजूद वे यहां की चकाचौंध से भ्रमित नहीं हैं। उन्हें ऐसा कोई अफसोस भी नहीं है कि विशाल अनुभव और ज्ञान के बावजूद वे फिल्मों में छोटी-मोटी भूमिकाओं में रमे हुए हैं। आदिल कहते हैं, ‘मुझे अपनी हकीकत और जरूरत मालूम है। मैंने फिल्मों को कुछ वक्त दिया है। अगर संतुष्ट रहा तो सब कुछ यों ही चलता रहेगा। मन नहीं लगा और बेचैनी बढ़ी तो फिर से थिएटर और अध्यापन में लौटने में मुझे हिचक नहीं होगी।’
    आदिल हुसैन ने अभी तक फिल्मों में सहयोगी भूमिकाएं ही निभाई हैं। फिर भी उनकी एक पहचान है। पर्दे पर उनकी मौजूदगी नजरअंदाज नहीं हो सकती। वजह पूछने पर वे मुस्कुराते और कहते हैं, ‘अभिनय जल की तरह होता है। पारदर्शी, तरल और प्यास बुझाना ही हमारा स्वभाव है। किरदारों में ढलना और उसे जीते हुए अपने शरीर की सीमाओं से निकल दर्शकों को प्रभावित और आनंदित करना ही तो काम है। ओथेलो करते समय मुझे एहसास हुआ था कि निगेटिव और पॉजिटिव सारे भाव हमारे अंदर हैं। शब्द और दृश्य हमारे उन भावों को जगाते और दर्शकों तक पहुंचाते हैं।’
    आदिल हुसैन डॉ. द्विवेद्वी की पारखी नजर की कद्र करते हैं। वे बताते हैं, ‘डॉक्टर साहब मुझ से मिले। उन्होंने मुझे असलम पंचरवाला की भूमिका के लायक समझा। मेरी छवि तो निगेटिव और ग्रे शेड के किरदारों की रही है। वे परिस्थितियों में फंसे ऐसे साधारण व्यक्ति को मुझ में देख सके। मैंने कोशिश की है कि असलम को शिद्दत से निभा सकूं। फिल्मों में ऐसे किरदार अभी कहां दिखते हंै। असलम हमारे गांव-कस्बे का आम किरदार है। वर्तमान सिस्टम उसकी परवाह नहीं करता। इस फिल्म में मिली सरकारी सुविधाओं से असलम की जिंदगी तबाह होती है।’


Friday, November 21, 2014

रंग रसिया - फिल्मी पर्दे को कैनवस में बदलता सिनेमा : मृत्युंजय प्रभाकर

रंग रसिया जब से देखी थी तब से मेरे भीतर एक खास तरह की बेचैनी घर कर गई थी। मुझे इस फिल्म पर लिखना ही था। इस बीच कई सांसारिक बाधाएं बीच में आईं जिनके कारण लिखना संभव नहीं हो पा रहा था लेकिन इस फिल्म के ऊपर अपनी बात दर्ज करने का मौका मैं किसी भी तरह जाया नहीं करना चाहता था। सो लिख रहा हूं या कहें मेरे अंदर का चेतस मुझसे लिखवा ले रहा है। 
रंग रसियापर लिखने या कुछ कहने से पहले मैं यह साफ कर देना चाहता हूं कि मैं इसे एक महान फिल्म की श्रेणी में नहीं रखता। वैश्विक तो छोड़ दीजिए भारत में बनी महान फिल्मों की श्रेणी में भी इसे नहीं रखा जा सकता। हां, इसे एक बेहतर फिल्म मानने में कोई गुरेज नहीं है।मिडल आॅफ रोड सिनेमाकी श्रेणी में बनी फिल्मों में एक बेहतर फिल्म जो आम दर्शकों को भी ध्यान में रखकर बनाई गई है।मिडल आॅफ रोड सिनेमाकला और व्यावसायिक फिल्मों के बीच की एक ऐसी श्रेणी है जिसे दोनों वर्गों को ध्यान में रखकर बनाई जाती है। इधर के दिनों में 1970-80 के दशक में कला फिल्में बनाकर चर्चा में आए कई निर्देशकमिडल आॅफ रोड सिनेमाकी श्रेणी की फिल्में ही बना रहे हैं। निश्चित तौर पर उन्होंने यह तमीज अपने लंबे अनुभव से अर्जित की है कि अंततः जो फिल्म वो बना रहे हैं उसे अगर दर्शक ही मिलें तो फिर उनका हासिल ही क्या है?
रंग रसिया सिर्फ एक फिल्म के तौर पर बल्कि अपनी कथा के तौर पर भी बहुत ही गंभीरता से यही बात सामने लाती है। इस फिल्म की सबसे बड़ी चिंता और इस फिल्म के नायक की भी सबसे बड़ी चिंता यही है कि आखिर इतनी मेहनत से वो जो बना रहे हैं वे किसके लिए है? राजा रवि वर्मा भी अगर दूसरे चित्रकारों की तरह राजा-महाराजाओं के पोट्रेट बनाकर और उन्हें राजमहल की दीवारों पर टंगवाकर खुश हो जाते तो निश्चित तौर पर राजा रवि वर्मा होते हुए भी तो इतनी चर्चा में होते ही आज भी लोग उनपर बात कर रहे होते। आप ही जरा अपने दिमाग पर जोर डालकर राजा रवि वर्मा के समय के पांच और बड़े चित्रकारों के नाम याद करने की कोशिश करके देखिए तो आपको इस सवाल का जवाब मिल जाएगा।         
राजा रवि वर्मा उस पीड़ा का नाम है जिससे हर दौर में सच्चा कलाकार होकर गुजरता है। यह हर कलाकार के सामने उपजा पहला सवाल है कि आखिर उसकी कला किसके लिए है? वह क्यों रचता है? क्यों सृजन के सुख के पीछे दुनिया से दरवेश हुआ बैठा है? क्यों उसे अपनी खुद की और अपने परिवार की सारी पीड़ा उस सृजन के सुख के छलावे के सामने बौनी नजर आती हैं? क्यों वह अपनी सृजनशीलता और अपनी रचना का लंबे समय तक आनंद नहीं उठा पाता? क्यों वह सबको पीछे छोड़ता हुआ नए सिरे से कुछ नया कुछ और बेहतर रचने की लगन में रम जाता है? क्यों वह अपने काम के द्वारा अर्जित सम्मान और धन का भी आनंद नहीं उठा पाता? आखिर उसे वह कौन सी लकीर खींचनी है कि वह दिन-रात अपनी ही धुन में लगा रहता है? पर अफसोस कि ऐसे कितने ही प्रश्नों को पीछे छोड़ती हुई इस फिल्म पर हुई सारी बहसें स्त्री-पुरुष संबंध और एक कलाकार द्वारा अपने माॅडलों के शोषण पर आकर टिक गई है। मैं नहीं कहता कि इस मुद्दे पर बात नहीं होनी चाहिए, जरूर होनी चाहिए लेकिन उतनी ही जितनी कि उसकी महत्ता है। उसे ही फिल्म का केंद्रीय पक्ष बना देना फिल्म के साथ नाइंसाफी होगी।
राजा रवि वर्मा के जीवन को देखें तो यह बात साफ तौर पर समझ में आती है कि उस कलाकार को अपने दैनंदिन जीवन में मूलभूत आवश्यकताओं की कोई कमी नहीं थी। वह अपनी कला के बल पर राजसी जीवन जीता रहा था और त्रयंबकोर के राजा के देहावसान के बाद राज्यविहीन होकर मुंबई पहंुचने पर भी उसे आम लोगों की तरह मारा-मारा नहीं फिरना पड़ा। वहां भी उसका एक उच्चवर्गीय समाज था जिसमें उसकी आवाजाही थी और उसकी कला के मुरीद और खरीदार थे। साफ शब्दों में कहें तो एक औसत आदमी जिन सुख-सुविधाओं के मोह से घिरा होता है उसे वह सब हासिल है। लेकिन उसके बावजूद भी उसके जीवन में एक खास तरह की बेचैनी है, स्फूरन है। यही कारण है कि वह कहीं भी टिकता नहीं है। नएपन की तलाश, बेहतर की तलाश और नई रचनात्मक चुनौती के लिए सदैव एक खास तरह की कशमकश से जूझ रहा होता है। यही वह कशमकश है जो उसे उसके समाज और परिवार से दूर कर देता है।
अगर हम गौर से देखें तो क्या यही कशमकश हम कलाकारों के अलावा वैज्ञानिकों, समाज विज्ञानियों, दार्शनिकों और खिलाडि़यों आदि में नहीं पाते? इन सबको किसी चीज की ऐसी लगन लग जाती है कि उन्हें उसके अलावा और कोई चीज नहीं दीखती। जाहिर है ऐसे में वे अपने आस-पास के लोगों और परिवार की अनदेखी करते हैं। यह अनदेखी उन्हें और उनके परिवार को कई बार भारी भी पड़ती है लेकिन क्या इसके लिए उन्हें देाषी करार दिया जा सकता है। दुनिया के कई वैज्ञानिकों ने अपने शोध में रूचि के कारण अपने परिवार की जरूरतों का ख्याल नहीं रखा जबकि उनके शोध ने लाखों लोगों को नई जिंदगी दी तो क्या इसके लिए भी उन्हें दोषी माना जाए। लगाने वाले ऐसा ही आरोप मनुष्यता के पक्ष में दुनिया में सबसे बड़ा दर्शन गढ़ने वाले दार्शनिक और समाज विज्ञानी कार्ल माक्र्स पर भी लगाते हैं और कहते हैं कि माक्र्स अगर अपने परिवार पर ध्यान देते तो अपनी पत्नी और बच्चों को मृत्यु के मुख में जाने से बचा सकते थे। पूंजीवाद का दर्शन गढ़ते हुए उस महामना के बच्चे पैसे के अभाव में सही ईलाज की सुविधा के बिना मर गए तो क्या उन्हें इसके लिए अपने परिवार का हत्यारा माना जाए? क्या अपने बच्चों और परिवार के लिए नौकरी करके पेट पाल लेने से मनुष्यता को इतना कुछ मिल पाता जितना कि आज हासिल है? क्या दुनिया तब उतनी ही तेजी से बदल पाती जितनी तेजी से उनके बलिदान के बाद बदली?
रचना और रचनाकार का संबंध सुख से कम पीड़ा से अधिक है। रचना को सुख मानने वाले लोग दरअसल रचना प्रक्रिया के बारे में बहुत कम जानकारी रखते हैं। किसी भी नई रचना के लिए रचनाकार को अपनी आत्मा को वैसे ही खुरचना पड़ता है जैसे कोई प्रसूता शिशु के जन्म के समय अपने शरीर को खुरच रही होती है। उस आत्मा की खुरचन की पीड़ा शरीर के खुरचन से कतई कम नहीं है। एक रचना को जीवन देने का, आकार देने का जो सुख है वह उस पीड़ा से बेहद कमतर और क्षणिक है जिससे होकर हर रचनाकार को गुजरना पड़ता है। रचनाकार के लिए सुख एक छलावा मात्र के अलावा और कुछ भी नहीं है।रंग रसियाएक कलाकार के अंतर्मन को हमारे सामने बिल्कुल इसी अंदाज में सामने लाता है और दर्शकों का, जो कला का उपभोक्ता है, उस कला के रचनाकार की पीड़ा से अवगत कराता है।
यह रचनाकार की प्रसव पीड़ा ही है जो राजा रवि वर्मा को बड़ौदा महाराज की अवज्ञा करने और अपनी बात मनवाने की शक्ति देता है वरना महाराजा के कहे को कैनवस पर उतारकर पैसे बना लेने वालों की कमी तब थी आज है। यह रचनाकार की प्रसव पीड़ा ही है जो राजा रवि वर्मा को महलों के ऐशो-आराम छोड़कर देश भर की खाक छानने को मजबूर कर देता है। यह रचनाकार की प्रसव पीड़ा ही है जो राजा रवि वर्मा को पेंटिंग बना लेने के बाद भी बड़ौदा महाराज से उसे जनता के लिए खुला रखने की मांग करता है ताकि वे उन्हें देख सकंे। यह रचनाकार की प्रसव पीड़ा ही है जो राजा रवि वर्मा को अपनी पेंटिंग को घर-घर पहुंचाने की जरूरत को रेखांकित करता है और वह अपना सब कुछ दांव पर लगाकर उसे घर-घर पहंुचाने की जुगत में लग जाता है। यह रचनाकार की प्रसव पीड़ा ही है जो राजा रवि वर्मा को सिनेमा रूपी नई विधा की ताकत को पहचानने में जरा भी समय नहीं लगता और वे प्रेस की बिक्री से मिलने वाली राशि का बड़ा हिस्सा अपने शिष्य को फिल्म बनाने के लिए दे देते हैं। यह रचनाकार की प्रसव पीड़ा ही है जो उसे अपने काम को हर संभव मनुष्य तक पहंुचाने की ललक प्रदान करती है। यह रचनाकार की प्रसव पीड़ा ही है जो उसे अपनी और अपने परिवार की जिंदगी से अधिक अपनी रचना की चिंता करना सिखाती है।रंग रसियाएक ऐसे ही रचनाकार की प्रसव पीड़ा का विस्तार है जो सिनेमा के पर्दे से उतरकर हमारे दिल जेहन तक पहुंच जाता है।
जिस तरहईश्वरआदमी की ऐसी आदिम तलाश है जिसके हर संभव रहस्य और सृजन की ताकत को वह गहरे में उतरकर जान लेना चाहता है वैसे ही आदमी स्त्री के हर संभव रहस्य और उसकी सृजन की ताकत को जान लेना चाहता है। मानव सृजन के दो ही द्वार उसे नजर आते हैं एकईश्वरका और दूसरेस्त्रीका।स्त्रीको कई-कई रूपों में जान-समझ लेने की एक पुरुष की आदिम अभिलाषा का मूल उसके सृजन की शक्ति में है। यह शक्ति जाहिर है स्त्री शरीर के उन अंगों में हैं जिन्हें हमारा समाजस्त्री धनके रूप देखता और वर्णित-चित्रित करता है।स्त्रीशरीर के प्रति आदमी का यह आदिम आकर्षण जितनाएंद्रियताका मसला है उतना ही उसकेरहस्यवादके उद्घाटन का, जो उनके गोपनीय अंगों में समाहित हैं। मसलन स्त्री की छाती से बच्चा होने पर दूध का निकलना एक मानी हुई बात है लेकिन आदमी के लिए आज भी वह किसी तिलिस्म से कम नहीं है वैसे ही जैसे तमाम वैज्ञानिक जानकारियों और इस्तेमाल के बाद भी उसके जेहन में तकनीक के चमत्कार के प्रति कुतुहल बना ही रहता है। यही कारण है कि कला की तमाम विधाओं में सबसे ज्यादा अनावृत जिस चीज को करने और समझने की कोशिश की गई है वह दरअसल और कुछ नहीं बल्कि स्त्री शरीर और उसकी आत्मा है। उसमें निश्चित तौर परएंद्रियताका पुट है लेकिन उसके पीछे की एक वजह स्त्री शरीर में घटने वाले चमत्कारिकरहस्यभी हैं जो चूंकि उन्हीं खास अंगों के साथ जुड़े हैं इसलिए दोनों गुथ्थम-गुथ्था हो जाते हैं।
राजा रवि वर्मा कास्त्रीशरीर और विन्यास के प्रति आकर्षण के मूल में वहीं दो प्रवृतियां हैं। एक स्वाभाविक आकर्षण पुरुष का स्त्री शरीर को लेकर, दूसरा एक कलाकार का स्त्री शरीर के रहस्य और उसके सौंदर्य को लेकर। दुनिया की जितनी भी सुंदर चीजें हैं वे अपने रूप और आकार में मूलतः सपाट नहीं हैं। हमें पहाड़ क्यों अच्छे लगते हैं? घाटियां क्यों अच्छी लगती हैं? समुद्र की हिलारें लेती लहरें क्यों अच्छी लगती हैं? फूल क्यों अच्छे लगते हैं? पेड़-पौधे क्यों अच्छे लगते हैं? इनमें से कोई भी सपाट नहीं है। सभी असमान धरातल के मेल से बने हैं। उनके अच्छे लगने की वजह भी उनका उतार-चढ़ाव, ऊबड़-खाबड़ होना और उनका खुरदरापन है। स्त्री शरीर भी उन्हीं अवयवों से बना है। स्त्री शरीर में एक खास किस्म का उतार-चढ़ाव है, उसका ख्ुारदरापन है, वह पुरुष शरीर की तरह सपाट नहीं है। यही कारण है कि कलाएं ज्यादातर इनकी सुंदरता को उकेर लेना अपने में समेट लेना चाहती हैं। कारण कि कला अपने में प्रकृति प्रदत्त सुंदरता का विस्तार है। राजा रवि वर्मा की कला भी इसका अपवाद नहीं है। वह अपनी कला में स्त्री सुदंरता को सहेज लेना, उकेर लेना चाहते हैं और उसे विस्तार देना चाहते हैं। वह उसके सुंदर मनोभावों और खूबसूरती बिखेरती पोजों को अपनी कला में रूढ़ कर लेना चाहते हैं ताकि स्त्री की सुंदरता को उसकी आंगिक अभिव्यक्तियों में पकड़ा जा सके। वह चाहे देवी-देवताओं की तस्वीरों के जरिए हो या फिर अप्सराओं या मिथकों में वर्णित दूसरे स्त्री पात्रों के जरिए हो। आखिर दुनिया भर के नृत्य शैलियां भी तो यही करती हैं। वह स्त्री शरीर को ऐसी-ऐसी आंगिक अभिव्यक्तियां देती हैं कि स्त्री शरीर की सुंदरता और भी उभरकर सामने सके। भारतीय नृत्य शैलियों में दुनिया भर की त्रिभंगी मुद्राएं नृत्य के सौंदर्य को स्त्री शरीर के सौंदर्य से बढ़ावा देने के लिए ही तो हैं। ऐसे में राजा रवि वर्मा पर कट्टरपंथियों द्वारा लगाया जाने वाले अश्लीलता फैलाने का आरोप और बुद्धिजीवियों द्वारा लगाया जाने वाला स्त्री शोषण का आरोप दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू नजर आते हैं।
इस फिल्म के माध्यम से स्त्रीवादियों द्वारा राजा रवि वर्मा के ऊपर लगाया जाने वाला सबसे बड़ा आरोप यह है कि वह सिर्फ स्त्री छवियों बल्कि वास्तविक स्त्रियों का भी दोहन करते हैं। कला और कल्पना का भी अपना आधार होता है। वह हवा में नहीं जातीं। आरोप लगाने वाले ज्यादातर लोग शायद ही इस बात से वाकिफ हों कि तमाम कला संस्थानों में कला अध्ययवसायियों कोन्यूड माॅडलउपलब्ध करवाए जाते हैं - वह पुरुष भी होते हैं और स्त्री भी। इन्हीं की सहायता से कला के छात्र न्यूड छवियों का अभ्यास करते हैं वैसे ही जैसे मेडिकल पढ़ने वाले छात्रांे को मृत शरीर उपलब्ध करवाए जाते हैं जिसकी चीर-फाड़ करके वे अपना अभ्यास करते हैं। यही छात्र कल को डाॅक्टरी की डिग्री हासिल करके लोगों की जान बचाते हैं और कला के छात्र अपनी सुंदर कृतियों की मार्फत दुनिया में रंग भरते हैं। राजा रवि वर्मा को भी निश्चित तौर पर ऐसे माॅडल की जरूरत थी जिन्हें देखकर वे अपना अभ्यास कर सकें या अपनी पेंटिंग को मनचाहा रूप दे सकें। अब सवाल यह है कि वह अपने माॅडल कहां से चुनते हैं। उनकी पत्नी जिसे उनकी चित्रकारी से ही दिक्कत है वह तो उनके लिए माॅडल का काम कर नहीं सकती थीं। ऐसे में उन्हें घर में काम करने वाली दासी कामिनी का सहारा मिलता है और उनके सूने कैनवस पर रंग भरने लगता है। यह उनके कलाकार की जरूरत थी और कामिनी के साथ संसर्ग उनके पुरुष होने की जिसमें दोनों की सहमति दिखाई जाती है। उस संसर्ग में कामिनी को कहीं भी उन्हें अपना बना लेने की चाहत नहीं है, ही राजा रवि वर्मा ऐसा कोई आग्रह पालते हैं। उस संसर्ग में एक स्त्री और पुरुष का प्राकृतिक मिलन है जो एक-दूसरे से गुजरकर अपने सूने जीवन में रंग भर लेते हैं। यह दोनों के लिए अप्राप्य को पा लेने जैसा है, समाज की वास्तविकता जिसकी कल्पना भी उन्हें करने की इजाजत नहीं दे सकती। एक-दूसरे को बिना बांधे सुख पा लेना ही उनकी उपलब्धि है। वही उनका ध्येय है और इसलिए उनके रिश्ते में कोई ग्रंथि नहीं है। वह भले ही एक क्षणिक आवेग की तरह आता और चला जाता है लेकिन उसमें एक तरह की संपूर्णता है। एक बहाव है।  
सुगंधा के प्रति राजा रवि वर्मा के आकर्षण का भी कारण वही है जो कामिनी के लिए था। सुगंधा में उन्हें स्त्री सुंदरता की वह तमाम बारीकियां नजर आती हैं जिसे अपने कैनवस पर उतारकर वे उसे मूर्त रूप देना चाहते हैं। वह सुगंधा को एक माॅडल के रूप में ही देखते हैं और उसी रूप में अपने काम के लिए उसे हासिल करना चाहते हैं। यही कारण है कि सुगंधा जब उनसे पूछती है कि उनके जीवन में क्या उसकी और कोई भूमिका नहीं है तो वह टका सा जवाब देता है किउनकी कल्पना के बाहर वह मौजूद ही नहीं है सुगंधा को पाकर एक बार फिर उनकी कूची बोलने लगती है, कैनवस पर रंग बिखरने लगते हैं और वो तमाम पेंटिंग बनते हैं जिसके लिए हम राजा रवि वर्मा को जानते हैं। राजा रवि वर्मा इस बीच इस बात से अनजान रहते हैं कि सुगंधा मन नही मन उनके कलाकार रूप से सच्चा प्यार करने लगी है और चूंकि वह कलाकार और व्यक्ति के अंतर को नहीं जानती इसलिए वह राजा रवि वर्मा से उसे अपनाने की उम्मीद लगा बैठती है। राजा रवि वर्मा और सुगंधा के बीच का संबंध भी राजा रवि वर्मा के लिए स्त्री-पुरुष के बीच उपजे स्वाभाविक शारीरिक आकर्षण का प्रतिफल है। मन और दिल के एक कोने में उसके लिए प्यार के होते हुए भी वे इसे बंधन बनाने से बचते हैं। अगर उनके मन में सुगंधा के लिए प्यार और सम्मान होता तो भला वो बड़ौदा नरेश को झूठ बोलकर पहले सुगंधा को वे पेंटिंग दिखाने की जिद क्यों करते? कोर्ट से छूट जाने के बाद सुगंधा के दरवाजे पर सीधे क्यों चले जाते? संभव था वो उसके बाद सुगंधा को अपना भी लेते लेकिन क्या सच में स्त्री-पुरुष संबंध की एकमात्र नियति एक-दूसरे का होकर रह जाना मात्र है?
एक ऐसे समाज में जहां हमने हजारों वर्षों से स्त्री-पुरुष संबंध का यही एक मात्र रूप देखा है कोई अचरज नहीं कि हम इसे ही स्त्री-पुरुष संबंध का आखिरी सत्य मानें और लोगों से ऐसी ही अपेक्षा भी रखें लेकिन क्या अपने अनुभवों की रोशनी मंे ही दूसरों से भी वैसे ही व्यवहार की अपेक्षा सही है? आखिर हम राजा रवि वर्मा को क्यों इसके लिए दोषी ठहराएं कि उन्होंने सुगंधा को नहीं अपनाया इसलिए उसे अपनी जान देनी पड़ी। इसके बनिस्पत हम उस समाज को क्यों गाली दें, बुरा-भला कहें जो दो व्यक्तियों के निजी जीवन में इतनी दिलचस्पी रखता है और उसमें जबर्दस्ती दखल देता है। हम उस समाज पर उंगलियां क्यों उठाएं जो लोगों को अपनी जिंदगी का फैसला खुद लेने का हक भी छीन लेता है। क्या वास्तव में सुगंधा की मौत की जिम्मेदार राजा रवि वर्मा द्वारा सार्वजनिक जीवन में उसे अपनाना है या कि समाज द्वारा इस रिश्ते के लिए उसे प्रताडि़त करना है? यह अपने आप में अचरत की बात है कि फिल्म में इतने साफ ढंग से समाज के गलत रवैए को दर्शाए जाने के बावजूद कई स्त्रीवादी विमर्शकार राजा रवि वर्मा के व्यवहार के ऊपर ही ऐसे ही ऊंगली ताने खड़े हैं जैसे कि तत्कालीन और हमारा समकालीन समाज। स्त्री-पुरुष संबंधों के मसले पर वह उन्हीं सामंती और पूंजीवादी मूल्यों को स्थापित करने की कोशिश में लगे हैं जिसके कारण स्त्रियों को हजारों सालों की गुलामी झेलनी पड़ी है।
इन दोनों पक्षों के इतर फिल्म का और राजा रवि वर्मा के जीवन का एक तीसरा पक्ष भी है जिसे ज्यादातर लोगों ने स्त्री-पुरुष संबंधों वाले सवाल को प्राथमिकता देने के कारण लगभग भुला ही दिया है। वह है समाज के एक तबके द्वारा धर्म और संस्कृति के नाम पर कला और जीवन की स्वतंत्रता पर लगाई जाने वाली कई तरह की रोेकें। समाज के ये रक्षक हर समय में धार्मिक रुढि़यों, अंधविश्वासों, कुसंस्कारों और समाज पर अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए धर्म और संस्कृति का सहारा लेते रहे हैं। कला और व्यक्ति के जीवन की स्वतंत्रता को धर्म और संस्कृति पर खतरा बताते हुए हमला बोलते रहे हैं। यह हमले तब राजा रवि वर्मा पर भी हुए थे और हाल के वर्षों में उन्हीं जमातों द्वारा हमारे समय के महान पेंटर एम.एफ. हुसैन के ऊपर भी सुनियोजित तरीके से किए गए। हबीब तनवीर के नाटकों के प्रदर्शन को जगह-जगह रोका गया। बड़ौदा फाईन आर्टस काॅलेज छात्रों की परीक्षा में शामिल प्रदर्शनी में तोड़-फोड़ की गई। फिल्मों के बनने से लेकर उनके प्रदर्शन तक पर बार-बार हमले किए गए। यह फिल्म उन प्रतिक्रियावादी ताकतों की जमात को भी इतिहास से लेकर वर्तमान तक उनके विरोध और तर्कों के साथ नंगा खड़ा करती है। इस तरह यह फिल्म कला और जीवन की स्वतंत्रता की पैरोकार बनकर सामने आती है और यह संदेश देती है कि दोनों ही आपके निजी चुनाव हैं कि आप अपनी कला और जीवन के साथ क्या करते हैं। इसमें किसी भी तीसरे का हस्तक्षेप कहीं से भी वांछित नहीं है। दिन प्रति दिन कलाओं पर हो रहे हमले औरकिस आॅफ लवके आंदोलन के इस समय में यह फिल्म हमारी स्वतंत्र चेतना की पैरोकार बनकर खड़ी होती है। राजा रवि वर्मा फिल्म के दृश्य में कहते भी हैं - मेरी कला तो हमेशा से स्वतंत्र है। उसके आगे की पंक्तियां जो वह नहीं कहते और हमारे मन में गूंजती है वह यह कि - स्वतंत्रता की जरूरत देश, समाज और मनुष्यता को है।
जैसा कि मैंने पहले कहा यह फिल्म कोई महान फिल्म नहीं है लेकिन इसके बावजूद इस फिल्म का छायांकन, पटकथा और संवाद तारीफ के काबिल हैं। इन तीनों का अद्भूत मेल इस फिल्म में देखने में आता है और यह फिल्म इन्हीं तीनों के बल पर अपनी दो घंटे से ज्यादा की अवधि की यात्रा सफलतापूर्वक तय करती है। फिल्म में राजा रवि वर्मा के किरदार में रणदीप हुड्डा निरंतर अच्छा करने का प्रयास करते और अपने किरदार में जाने की कोशिश करते नजर आते हैं लेकिन वह कुछ-कुछ दृश्यों में ही सफल हो पाते हैं। निर्देशक को इस किरदार के लिए और भी मंजे हुए कलाकार को मौका देना चाहिए था क्योंकि राजा रवि वर्मा एक विचारवान कलाकार थे और हुड्डा उनके किरदार में पूरी तरह फिट नहीं बैठते। सुंगधा के किरदार में नंदना सेन ने कुछ दृश्यों में शानदार काम किया है और वह उस किरदार की पीड़ा को उभारने में सफल रही हैं। फिल्म में पर्दे पर वह अपने ग्लैमरस भूमिका में जितना जीवन डालती हैं उससे कम उस किरदार की भावनाओं में नहीं डालती। यही उनकी सफलता का मूल कारण है और शायद यही कारण है कि आधे समय के बाद दर्शकों को सुगंधा के किरदार की ओर खींच ले जाती हैं और समीक्षक भी उसे ही केंद में रखकर बात करने लगते हैं। इनके अलावा दर्शन जरीवाला, परेश रावल और सचिन खेड़कर ने भी अपनी भूमिकाओं में जान डाला है। एक निर्देशक के तौर पर केतन मेहता कि यह उपलब्धि ही मानी जाएगी। मिर्च मसाला के बाद यह उनकी दूसरी फिल्म होगी जिसके लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा। जितनी खूबसूरती से उन्होंने इसका कथानक बुना है उतनी ही खूबसूरती से उन्होंने इसे फिल्माया भी है। फिल्म के कुछ दृश्यों में उन्होंने कुछ इस कदर जान और रंग डाले हैं कि वे दृश्य अनायास ही आंखों में तैर जाते हैं। उन्होंने फिल्म के पर्दे को ही कलाकार के कैनवस में बदल देने जैसा जादू इस फिल्म के मार्फत रचा है। केतन मेहता इस फिल्म के लिए निश्चित तौर पर बधाई के पात्र हैं।