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Friday, May 29, 2015

फिल्‍म समीक्षा - वेलकम टू कराची

-अजय ब्रह्मात्‍मज
भारत और पाकिस्तावन के बीच पल रहे दुराग्रहों और पूर्वाग्रहों को तोड़ती कुछ फिल्मों की कड़ी में ‘वेलकम 2 कराची’ को भी रखा जा सकता है। दोनों देशों के बीच किरदारों के मेल-मिलाप, हंसी-मजाक और हास्यास्पद प्रसंगों से मौजूद तनाव को कम करने के साथ समझदारी भी बढ़ सकती है। ‘फिल्मिस्तान’ ने यह काम बहुत खूबसूरती के साथ किया था। अफसोस कि ‘वेलकम 2 कराची’ का विचार तो नेक, कटाक्ष और मजाक का था, लेकिन लेखक-निर्देशक की लापरवाही से फिल्म फूहड़ और कमजोर हो गई। कई बार फिल्में पन्नों से पर्दे तक आने में बिगड़ जाती हैं। 
                                      याद करें तो कभी इस फिल्मं में इरफान खान थे। अभी जो भूमिका जैकी भगनानी ने निभाई है, उसी भूमिका को इरफान निभा रहे थे। क्या उन्होंने इसी स्क्रिप्ट के लिए हां की थी या जैकी के आने के बाद स्क्रिप्ट बदली गई और उसका यह हाल हो गया? सोचने की बात है कि हर कलाकार किसी और का विकल्पय नहीं हो सकता। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के बेपरवाह रवैए की ओर भी यह फिल्म इंगित करती है। कैसे स्वार्थ और लोभ में विचारों की हत्या हो जाती है? कई बार सफल निर्माता की सोच मूल विचार पर थोपी जाती है तो उसका नतीजा ‘वेलकम 2 कराची’ के रूप में सामने आता है। हर फिल्म के निर्माण में पैसा, मेहनत और समय लगता है। ऐसी कोशिशों में सब व्येर्थ हो जाता है।
                                  दो लूजर शम्मीर और केदार एक दुर्घटना की वजह से अनजाने ही कराची पहुंच जाते हैं। उन्हें भारतीय जासूस व आतंकवादी समझा जाता है। दोनों अलग-अलग किस्म के संगठनों के हाथों इस्तेमाल किए जाते हैं। उनसे कुछ ऐसा हो जाता है कि उन्हें पाकिस्तान पहचान भी मिलती है। गलतफहमी की इस निर्दोष यात्रा में हंसी के पल आते हैं। दोनों किरदारों की टिपपणियों में कटाक्ष भी रहता है, लेकिन निर्देशक उसे बढ़ाते या गहराते नहीं हैं। वे तुरंत किसी फूहड़ एवं हास्यास्पाद स्थिति का सृजन कर जबरन हंसाने की कोशिश करते हैं। फिल्म में मोड़ से अधिक मरोड़ हैं, जो एक समय के बाद तकलीफदेह हो जाते हैं।
                      अरशद वारसी अपनी काबिलियत से भी फिल्म का नहीं बचा पाते। दरअसल, उन्हें एक कमजोर कलाकार के साथ नाथ दिया गया है, इसलिए कॉमेडी की गाड़ी ढंग से चल ही नहीं पाती। केदार को गुजराती लहजा देने का आइडिया अच्छा था, लेकिन कलाकार को भी मेहनत करनी चाहिए थी। ‘यंगिस्तान’ से जैकी भगनानी ने उम्मीए जगाई थी। इस फिल्म से वह उम्मीद धुल गई। अभिनेत्री और सहयोगी कलाकारों के लिए न तो पर्याप्त संवाद थे और न दृश्य। सही सोच और कल्प्ना न हो तो वीएफएक्सर बुरा हो जाता है। ‘वेलकम 2 कराची’ उसका भी नमूना है।
 अवधि : 131 मिनट
स्‍टार : ** दो स्‍टार

दरअसल : रेड कार्पेट पर ल‍हराती अभिनेत्रियां



-अजय ब्रह्मात्‍मज
    हर साल मई के दूसरे हफ्ते में फ्रांस के कान शहर में कान फिल्‍म समारोह का आयोजन होता है। विश्‍व भर से नामी फिल्‍मकरों की फिल्‍मों का विभिन्‍न खंडों और श्रेणियों में प्रदर्शन किया जाता है। माना जाता है कि वहां प्रदर्शित फिल्‍में कलात्‍मक दृष्टि से श्रेष्‍ठ और दर्शनीय होती हैं। भारत से इस साल दो फिल्‍में नीरज घेवन की मसान और गुरविंदर सिंह की चौथी कूट गई हैं। अफसोस की बात है कि भारतीय मीडिया में इन फिल्‍मों का नहीं के बराबर कवरेज या उल्‍लेख हुआ है। कान फिल्‍म समारोह का नाम लें तो सभी यही बताते मिलेंगे कि इस साल कट्रीना कैफ भी गई थीं। उन्‍होंने रेड कार्पेट पर रेड ड्रेस पहनी थी। उनके अलावा ऐश्‍वर्श्‍या राय और सोनम कपूर भी वहां थीं। सुना है कि मल्लिका सहरावत भी पहुंच गई थीं। इस साल तो ऐश्‍वर्या राय बच्‍चन की आगामी फिल्‍म जज्‍बा का फर्स्‍ट लुक भी वहां रिवील किया गया। बस,वास्‍जविकता की जानकारी नहीं रहेगी।
    दरअसल,कान फिल्‍म समारोह फिल्‍मों का वार्षिक मेला है,जहां फिल्‍मों के साथ दुनिया भर के वितरक और खरीददार भी पहुंचते हैं। सभी अपने देशों और बाजार के लिए फिल्‍मों की खरीद करते हैं। कान फिल्‍म समारोह के दौरान अधिकृत रूप से आमंत्रित फिल्‍मों का प्रदर्शन किया जाता है। उनके अलावा कान फिल्‍म समारोह के दौरान कोई भी अपनी फिल्‍मों का प्रायवेट प्रदर्शन कर सकता है। इस मौके लिए बने पैवेलियन में कोई भी अपनी फिल्‍म का काउंटर लगाकर बैठ सकता है। हर साल कुछ भारतीय ऐसे ही वहां अपनी फिल्‍मों का प्रदर्शन करते हैं। उन्‍हें भारत में यों प्रचारित किया जाता है कि कान मैं फलां डायरेक्‍टर और प्रोड्यूसर की फिल्‍म का प्रदर्शन किया गया। भारत के अनजान मीडियाकर्मी उन आधारहीन खबरों को प्राथमिकता और गौरव के साथ छापते हैं। उन्‍हें लगता है कि वे भारत के सम्‍मान को रेखांकित कर रहे हैं।
    फिल्‍मों की खबरें तो फिर भी ठीक हैं। विडंबना यह है कि हर साल ब्‍यूटी प्रोडक्‍ट के एंडोर्समेंट के लिए भारत से वहां ब्रांड एंबैसडर बनी अभिनेत्रियां वहां जाती हैं। भारतीय मीडिया उनकी कवरेज के लिए परेशान रहता है। बताया जाता है कि इस साल क्‍या-क्‍या होगा ? रेड कार्पेट की उनकी तस्‍वीरें छपती हैं। फिर मीन-मेख निकाला जाता है। बताया जाता है कि क्‍या-क्‍या गड़बडि़यां हुईं। इस साल भी ऐश्‍वर्या राय बच्‍च्‍न,सोनम कपूर और कट्रीना कैफ के चर्चा हुई। रेड कार्पेट पर नुमाइश बनी इन अभिनेत्रियों की तस्‍वीरें छपीं। अभिनेत्रियों की नुमाइश और तस्‍वीरों से कोई दिक्‍कत नहीं है। दिक्‍कत यह है कि उन्‍हें फिल्‍मों के साथ जोड़ कर पेश किया जाता है। पाठ‍कों और दर्शकों में गलतफहमी है कि वे रेड कार्पेट पर भारत का प्रतिनिधित्‍व कर रही होती हैं। सच्‍चाई यह है कि यह उनकी निजी यात्रा होती है। कोई शक नहीं कि विदेशी धरती पर हर भारतीय अपने देश का प्रतिनिधि होता है,लेकिन ऐसे समारोहों में अगर अधिकृत निमंत्रण नहीं हो तो आप प्रतिनिधि नहीं कहे जा सकते। दूसरे,चर्चित अभिनेत्रियां अपने प्रोडक्‍ट के प्रचार के लिए वहां रहती हैं। उन्‍हें तो यह भी पता नहीं रहता कि भारत से कौन सी फिल्‍में आई हैं या कौन से फिल्‍ममेकर आए हैं ? क्‍यों नहीं ये अभिनेत्रियां भारत की फिल्‍मों के प्रदर्शन या अन्‍य इवेंट में मौजूद होकर अपनी लोकप्रियता से उन्‍हें फायदा पहुंचाती हैं।
        भारतीय मीडिया को समझदारी से काम लेना चाहिए। भारतीय फिल्‍मकारों की फिल्‍मों के बारे में कवरेज करते हुए ब्‍यूटी प्राडक्‍ट के प्रचार में गई अभिनेत्रियों की तस्‍वीरें कम से कम सिनेमा के साथ जोड1 कर नहीं छापनी चाहिए। इस साल और अन्‍य सालों में भी भारत से अधिकृत रूप से चुनी गई फिल्‍मों का उल्‍लेख भी नहीं हो पाता। उन्‍हें आर्ट सिनेमा श्‍या फेस्टिवल फिल्‍म कह कर दरकिनार कर दिया जाता है। वक्‍त आ गया है कि हम सच्‍चाई को समझें और अपने कवरेज की प्राथमिकता बदलें।

कान में मसान को मिले दो पुरस्‍कार




-अजय ब्रहमत्‍मज

पिछले रविवार को समाप्‍त हुए कान फिल्‍म समारोह में भारत से अन सर्टेन रिगार्ड खंड में गई नीरज घेवन की मसान को दो पुरस्‍कार मिले। नीरज को संभावनाशील निर्देशक का पुरस्‍कार मिला और फिल्‍म को समीक्षको के इंटरनेशनल संगठन फिपरेसी का पुरस्‍कार मिला।
परंपरा और आधुनिकता के साथ बाकी स्थितियों की वजह से अपनी-अपनी जिंदगियों के चौमुहाने पर खड़े दीपक,देवी,पाठक,झोंटा और अन्‍य किरदारों की कहानी है मसान। इसे नीरज घेवन ने निर्देशित किया है। भारत और फ्रांस के निर्माताओं के सहयोग से बनी इस फिल्‍म की पूरी शुटिं बनारस शहर और उसके घाटों पर हुई है। मराठी मूल के नीरज घेवन परवरिश और पढ़ाई-लिखाई हैदराबाद और पुणे में हुई। नीरज खुद को यूपीवाला ही मानते हैं। बनारस और उत्‍तर भारत की भाषा,संस्‍कृति और बाकी चीजों में उनकी रुचि और जिज्ञासा बनी रही। उन्‍होंने बनारस के बैकड्राप पर एक कहानी सोच और लिख रखी थी। वे अच्‍छी-खासी नौकरी कर रहे थे और उनकी शादी की भी बात चल रही थी,लेकिन तभी फिल्‍मों में उनकी रुचि बढ़ी। वे अनुराग कश्‍यप के संपर्क में आए। अनुराग के साथ वे गैंग्‍स ऑफ वासेपुर की डायरेक्‍शन टीम में रहे। बनारस में इस फिल्‍म की शूटिंग के दौरान उन्‍होंने अपनी फिल्‍म को आकार देना शुरू किया। अनुराग चाहते थे कि नीरज उनके साथ बॉम्‍बे वेल्‍वेट की टीम में भी रहें,लेकिन नीरज ने अपनी फिल्‍म की शूटिंग के बारे में सोचा। उन्‍होंने वरूण ग्रोवर को साथ लिया। वरूण ने मसान की पटकथा और संवाद लिखे।
    गंगा के किनारे बसे बनारस शहर की पावन परंपरा रही है। नैतिकता और परंपरा का उल्‍लंघन वहां दंडनीय माना जाता है। इस पृष्‍ठभूमि में गरीब मोहल्‍ले के दीपक को किसी और जाति की लड़की देवी से प्रेम हो जाता है। देवी पढ़ाई कर रही है,लेकिन उसकी जिंदगी ठीक नहीं चल रही है। उसका प्रेमी गायब हो गया है। इसकी वजह से वह अपराध बोध में रहती है। देवी के पिता पुलिस के चक्‍कर में परेशान हैं। पैसो के कारण उन्‍होंने अपनी नैतिकता ताक पर रख दी है। एक और लड़का झोंटा है। वह अपने परिवार की तलाश में है। दरअसल,ये सभी किरदार खुद की जिंदगी में बेहतरी की तलाश में हैं। वे आधुनिकता और परंपरा के द्वंद्व में फंसे हुए हैं।
    मसान के इन किरदारों को रिचा चड्ढा,विकी कौशल,संजय मिश्रा,विनीत कुमार और श्‍वेता त्रिपाठी ने निभाया है। नीरज ने अपन फिल्‍म बनारस कसे समर्पित करने के साथ उन सभी बनारसियों का एहसान माना है,जिन्‍होंने इस सीमित बजट की फिल्‍म की शूटिंग में छोटी-बड़ी मदद‍ की। वे जल्‍दी ही यह फिल्‍म बनारस के दर्शकों के बीच ले जाना चाहते हैं।


Wednesday, May 27, 2015

मुकेश छाबड़ा की कहानी पिता ताराचंद छाबड़ा की जुबानी


मुकेश छाबड़ा के जन्‍मदिन वर चवन्‍नी का तोहफा उनके पिता के सौजन्‍य से... 
कास्टिंग डायरेक्‍टर मुकेश छाबड़ा के पिता ताराचंद छाबड़ा ने अपने बेटे के बारे में उनके बचपन के दिनों और परवरिश के बारे में विस्‍तार से लिखा है। यह पिता का वात्‍सल्‍य मात्र नहीं है। यह एक व्‍यक्ति के व्‍यक्तित्‍व बनने की कहानी भी है। फादर्स डे से पहले ही हम एक पिता के इन शब्‍दों को शेयर करें तो समझ बढ़ेगी कि कैसे संतान के बचपन की  की रुचि भविष्‍य में पेशे में भी बदल सकती है और वह भी खुशगवार.....





लेखक- ताराचंद छाबड़ा

तारीख 27 मई, वर्ष 1980. कपूर हॉस्पिटल, पूसा रोड, नई दिल्ली. सुबह 6 बजे एक डॉक्टर के मेरे पास आईं, मैं उनकी ओर एकटक देख रहा था. मैंने पूछा कि क्या हुआ, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया. फिर दूसरी, तीसरी और चौथी डॉक्टर आईं. सबकी आंखों में नींद भरी थी. लग रहा था कि सबको नींद से जगाकर बुलाया गया है. लगभग आधे घंटे के बाद मुुझे बताया गया कि बच्चा उल्टा है और डॉक्टरों ने मिलकर यह डिलीवरी करवायी है. मुझसे कहा गया कि एक कप चाय लेकर आइए, लड़का हुआ है. मैंने अपनी चिंता जाहिर की कि सब ठीक-ठाक है ना? तो एक नर्स ने हंसते हुए कहा कि सब ठीक है, केवल लड़का उल्टा पैदा हुआ है, यह कुछ अलग से नाम कमाएगा. 

मैं जच्चा-बच्चा वार्ड में गया, तो देखा कि मेरे साहिबजादे सोये पड़े थे. मैं अपने छोटे भाई को अस्पताल में छोड़कर घर लौटा. मैं गर्वमेंट ऑफ इंडिया प्रेस में नौकरी करता था. मुझे सरकार की ओर से फ्लैट मिला था. मेरी मां इंतजार कर रही थीं. वह पंजाब से आई थीं. मुझे सामने देखते ही उन्होंने पूछा कि क्या खबर है? मैंने कहा कि पांच पांडव हो गए हैं, क्योंकि मेरे बड़े भाई को तीन लड़के थे, एक मेरा बड़ा बेटा और एक हमारे नवागंतुुक साहिबजादे.

हमारे परिवार में बुजुर्ग बच्चों का नामकरण करते हैं. मेरी मां ने साहिबजादे का नाम मदन मोहन रखा. एक दिन मैं अस्पताल में इसे टीका लगवाने गया, तो नर्स ने कहा कि इतना छोटा बच्चा और नाम इतना बड़ा? उसने इसका नाम रिंकू रख दिया. तबसे हम इसे रिंकू बुलाते हैं. छुटपन में इसकी टांग फैलाकर लेटने की आदत थी, तो मेरी मां कहने लगीं कि तेरा बेटा तो डड्डू (मेंढ़क) की तरह लेटता है, तो उन्होंने इसका नाम डड्डू रख दिया. मुझे बरबस ही संगीतकार सी रामचन्द्र की याद आई. लोग उनको तीन नाम वाला एक आदमी पुकारते थे- सी रामचन्द्र, अन्ना साहिब और चितलकर. मैंने कहा कि इसके भी तीन नाम हो गए हैं, ये भी बड़ा आदमी बनेगा. डड्डू तीन साल का हो गया, तो मैं इसका दाखिला करवाने राजौरी गार्डेन कारपोरेशन स्कूल में ले गया. वहां उन्होंने इसका नाम मुकेश छाबड़ा लिख दिया. उस समय से इसका नाम मुकेश छाबड़ा हो गया. 

मैं मुकेश को रोज साइकिल से सुबह स्कूल छोड़ने जाता था और फिर बारह बजे स्कूल की छुट्टी होने के बाद लेने जाता था. हमारी प्रेस कॉलोनी में एक बड़ा मैदान था. उसमें कुछ बच्चे क्रिकेट का अभ्यास करते थे. उसमें दो नाम मनोज प्रभाकर और संजीव शर्मा थे, जो नामी क्रिकेटर हुआ करते थे. मुकेश उनको अभ्यास करते देखने जाता था. इसकी क्रिकेट में दिलचस्पी थी. वो रोज इसे गोद में उठाकर बिस्कुट दिया करते थे. यह उनका लाडला बन गया था.

लोग मुझसे कहें कि इसको पब्लिक स्कूल में पढ़ाओ, लेकिन मुझे मेरी आय पता थी. मैंने इसे गर्वमेंट स्कूल में पढ़ाया. पांचवीं तक राजौरी गार्डेन स्कूल में पढ़ाई करने के बाद छठीं कक्षा में यह राजौरी गार्डेन के मेन स्कूल में अपने आप एडमिट हो गया. मुकेश का मन पढ़ाई में कम लगता था. यह ड्रामा और संगीत की गतिविधियों में ज्यादा रूचि लेता था. यह स्कूल के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता था. मैं कई बार इसका कार्यक्रम देखने जाता था. एक बार देशभक्ति की कव्वाली में इसको फर्स्ट प्राइज मिला. सभी अध्यापक इससे प्रभावित थे. कोई भी इसकी पढ़ाई की बात नहीं करता था, सब ड्रामे वगैरह की बातें ही करते थे.

जब मुकेश सातवीं कक्षा में पहुंचा, तो हम दिल्ली की रोहिणी कॉलोनी में रहने के लिए आ गए. मैंने एक छोटा सा मकान वहां खरीद लिया था. एक दिन मार्च के महीने में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) की टीआईई की तरफ से अखबार में विज्ञापन आया कि गर्मी की छुट्टियों में जो बच्चे ड्रामा में हिस्सा लेना चाहते हैं, वो हमारे सेंटर पर संपर्क कर सकते हैं. मैं मुकेश को लेकर अशोक विहार के सेंटर पहुंचा. वहां काफी भीड़ थी. हमसे कहा गया कि हम सभी बच्चों का टेस्ट लेंगे, जो बच्चे टेस्ट में पास होंगे, हम उन्हीं को चुनेंगे. मुकेश का चयन हो गया. मैंने इसकी दो फोटो और पचास रूपए फीस एनएसडी में जमा कर दी. अगले दिन से इनको प्ले पर काम शुरू करना था. एनएसडी माता-पिता को भी समय-समय पर बुलाता रहता था ताकि हम देख सकें कि हमारे बच्चे क्या कर रहे हैं. मुकेश सभी प्रशिक्षकों का चहेता बन गया था. यह सभी गतिविधियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगा. फिर एक नाटक में माता-पिता को भी शामिल किया गया और हमने एक नाटक अपने बच्चों के साथ मिलकर किया. एक महीने के बाद सभी ग्रुप ने अलग-अलग नाटक तैयार किए और फिर पैरेंट्स को वह नाटक देखने के लिए बुलाया गया. सबको प्रमाणपत्र भी दिया गया. मुकेश ने एनएसडी में बहुत सारे दोस्त बनाए, जो आज भी मुझे इसके आस-पास दिखते हैं.

एक दिन एनएसडी से एक लेटर आया कि गोल मार्केट में एक स्कूल है. वहां पर एनएसडी एक टीआईई कोर्स शुरू कर रही है. अगर मुकेश उसमें हिस्सा लेना चाहता है, तो एनएसडी में फीस जमा कर दें. मैंने इसकी फीस जमा कर दी. यह शनिवार और इतवार को शाम चार बजे से छह बजे तक वहां नाटक सीखने लगा. फिर श्रीराम सेंटर और एलटीडी ऑडिटोरियम में इसके नाटक का मंचन हुआ, जिसकी  काफी सराहना हुई. समय-समय पर एनएसडी से नाटकों के पास और कार्यक्रमों की लिस्ट हमारे घर पर आ जाती थी. इसके दोस्तों ने धीरे-धीरे एनएसडी जाना छोड़ दिया, लेकिन इसने और मैंने नहीं छोड़ा. इसने बारहवीं की परीक्षा पास की और फिर श्रीराम सेंटर में दो साल के कोर्स का फॉर्म भर दिया. उसमें इसका चयन भी हो गया. यह रोज शाम को छह से आठ बजे तक वहां नाटक सीखने जाने लगा. सुरिन्दर शर्मा और मुश्ताक काक से इसने दिल लगाकर एक्टिंग सीखी. यह उनसे डायरेक्शन भी सीखता था. वहां हॉल नंबर 2 में इसने प्रेमचंद के कई नाटकों का मंचन किया. दो साल का कोर्स खत्म होने के बाद एनएसडी में इसे बच्चों को एक्टिंग सिखाने की नौकरी मिल गई. उसको टीआईई कहते हैं. इसी दौरान इसने अपनी स्नातक की पढ़ाई भी पूरी कर ली. मुकेश बच्चों के लिए नाटक तैयार करता था. उसके अभ्यास में दो महीने लग जाते थे. यह रोज आकर मुझसे कहता था कि पापा, मैं बहुत थक गया हूं. इसके नाटक देखने कई मशहूर लोग आए, जिनमें अनुपम खेर और गुलजार भी थे. प्रेमचंद के कुछ नाटक लेकर ये लोग चीन गए. वहां लोगों को भाषा नहीं समझ में आई, लेकिन सबने नाटक और अभिनय की जमकर सराहना की. एक नाटक अभिनेता मोहन अगाशे ने तैयार किया था. जिसमें मुकेश और बाकी लोग शामिल थे. नाटक का शीर्षक था- पर हमें खेलना है, जिसका मंचन भारत के कई शहरों में हुआ. उससे मुकेश को बहुत शोहरत मिली. वह नाटक दूरदर्शन पर भी प्रसारित हुआ था.



मुझे पढ़ने का शौक था. मुकेश एनएसडी की लाइब्रेरी से किताबें लाकर मुझे देता था. सत्यजित रे की एक किताब में प्रकाशित एक प्रसंग मुझे हमेशा याद आता है. उन्होंने लिखा था कि जब मैं छोटा था, तो एक बार शांतिनिकेतन में गुरू रविन्द्रनाथ टैगोर से मिलने गया. मैंने उन्हें एक डायरी दी और कहा कि गुरूदेव इसमें मेरे लिए कोई संदेश लिख दीजिए. उन्होंने बांग्ला में लिखा कि मैं खूबसूरती की तलाश में दुनिया में जगह-जगह घूमा लेकिन मेरे मन को शांति नहीं मिली. एक दिन मैं घर के बगीचे में सुबह टहल रहा था, तो घास के ऊपर शबनम (ओस) की बूंदों को देखकर मुझे सुकून मिला. मुझे लगा कि इससे ज्यादा खूबसूरत चीज मैंने आजतक नहीं देखी है. उनका तात्पर्य यह था कि खूबसूरती हमारे आस-पास है, लेकिन हम उसे बाहर ढूंढते हैं. यह किस्सा मैंने मुकेश को सुनाया और इसने उसको बहुत प्रभावित किया.

मुकेश अपने ग्रुप के साथ पर हमें खेलना है नाटक लेकर मुंबई गया था. ये सब दिल्ली वापस तो आ गए, लेकिन मुकेश का मन मुंबई में ही रह गया. एक दिन इसने मुझसे कहा कि पापा मैं मुंबई जाऊंगा और खूब नाम कमाऊंगा. मैं मन ही मन डरने लगा. क्योंकि मैंने सुना था कि मुंबई महंगा शहर है, वहां खाने को नहीं मिलता. मैंने इससे कहा कि मुंबई मत जाओ. एनएसडी में तुम्हे सर्विस मिल गई है, तुम वह करो. यह मेरी बात मान गया, लेकिन जैसे ही एनएसडी के साथ इसका कॉन्ट्रैक्ट खत्म हुआ, यह एनडीटीवी चैनल से जुड़ गया. यह गुस्ताखी माफ प्रोग्राम में काम करता था. लेकिन अब भी इसका मन मुंबई में ही अटका था. 

जब ये बीए के आखिरी साल में था, तब मशहूर कवि अशोक चक्रधर ने बाल विवाह के ऊपर एक फिल्म बनाई बिटिया और मुकेश को उन्होंने हीरो की भूमिका दी. उसके बाद हरियाणवी फिल्म डायरेक्टर बल्लू भाई ने अपनी फिल्म ताऊ झगड़ू में इसे हीरो के रोल में कास्ट किया. उस फिल्म की शूटिंग नोएडा के ईगल स्टूडियो में हुई. वो फिल्म दिल्ली और हरियाणा में खूब चली और मुकेश वहां काफी लोकप्रिय हो गया.

यह एनएसडी के संपर्क में रहा. एनएसडी की एक मशहूर कलाकार थीं विभा छिब्बर, जो टीआईई में सर्विस करती थीं. उन्होंने भी मुंबई आने का प्रोग्राम बनाया, तो मुकेश उनके साथ मुंबई आ गया. यह उनके साथ ही रहता था. उन्हें विदाई सीरियल में काम मिल गया. लेकिन मुकेश बड़ी कठिनाई से उनके साथ रह रहा था. इसे ढंग का खाना भी नहीं मिलता था और एक बार इसकी तबियत खराब हो गई. मैंने इसकी मां को मुंबई भेजा, जो विभा छिब्बर के घर में रहकर इसका और उनका खाना बनाने लगीं. मैंने इससे दिल्ली लौटने के लिए कहा. यह मान गया. विभा, मुकेश और मेरी पत्नी एक ही ट्रेन से लौटने वाले थे, लेकिन जिस दिन की टिकट बुक थी, ये घर से स्टेशन की ओर चले, तो रास्ते में तेज बारिश आ गई. ये तीनों स्टेशन नहीं पहुंच सके. पूरी मुंबई बरसात के पानी में डूब गई. इन्होंने वह रात एक दुकान में गुजारी और सामान इन्होंने सिर के ऊपर रखा था. कई दिन के बाद ये लोग दिल्ली पहुंचे, लेकिन मुकेश का मन नहीं लग रहा था और यह मुंबई वापस आ गया.

यह मशहूर डायरेक्टर अनुराग कश्यप के पास गया. उन्होंने इसे रहने के लिए जगह दी. यूटीवी की चिल्लर पार्टी इसकी पहली फिल्म थी, जिसकी इसने कास्टिंग की. वह फिल्म बहुत सफल हुई. उसको बाद मुकेश को कई फिल्में मिलीं- गैंग्स ऑफ वासेपुर, काय पो छे, डी डे, हाइवे, भूतनाथ रिटर्न्स, हंसी तो फंसी, अग्ली, शाहिद, साहिब बीवी और गैंगस्टर, लव आज कल, फोर्स, सिद्धार्थ, रॉकस्टार, तृष्णा, हैदर, पीके, बॉम्बे वेलवेट आदि. गैंग्स ऑफ वासेपुर से मुकेश को बहुत लोकप्रियता मिली. इसने अपनी कंपनी शुरू कर दी- मुकेश छाबड़ा कास्टिंग कंपनी. इसकी एक बड़ी टीम है, जो दिन-रात काम करती रहती है. लोग मुंबई में कहते हैं कि मुकेश छाबड़ा से बड़ा कास्टिंग डायरेक्टर कोई नहीं है और यह भी कहते हैं कि इसने कास्टिंग में नए प्रयोग करके इसके मायने ही बदल दिये हैं. 

अब लोग मुझे मुंबई में पहचानते हैं कि ये मुकेश छाबड़ा के पिताजी हैं, तो मैं गर्व महसूस करता हूं. संतान आगे बढ़ती है, तो मां-बाप को बहुत खुशी होती है. आज अपने बेटे की वजह से मुझे भी एक पहचान मिली है. ऐसा बेटा भगवान सबको दें.




Tuesday, May 26, 2015

आज भी लगता है डर : अनुष्का शर्मा



यंग लॉट की अनुष्का शर्मा नित नई सफलता हासिल कर रही हैं। बतौर अभिनेत्री तो वे स्थापित नाम बन चुकी हैं ही, निर्माता के तौर पर भी वे अपनी एक अलग जगह बनाने में जुटी हुई हैं। उनकी अगली पेशकश ‘दिल धड़कने दो’ है। उन्होंने साझा की अदाकारी के सफर और फिल्मों को लेकर अपने अनुभव :
-अजय ब्रह्मात्मज
-फिल्मों को लेकर आप को चूजी कहा जा सकता है?
जी हां। मेरी पूरी प्राथमिकता सही फिल्में व फिल्मकारों के चयन पर केंद्रित रहती हैं। अनुराग कश्यप भी उनमें से एक थे। तभी ‘बैंड बाजा बारात’ के बाद ही ‘बॉम्बे वेल्वेट’ मेरे पास आई तो मैंने मना नहीं कर सकी। इनफैक्ट मैं उस फिल्म में कास्ट होने वाली पहली कलाकार थी। मेरे बाद धीरे-धीरे सब आए। मैं कमर्शियल फिल्में देने वालों के संग भी काम कर रही हूं और जो लीक से हटकर बना रहे हैं, उनके साथ भी। अनुराग जैसे फिल्मकार किसी भी आम या खास चीज को एक अलग तरीके से एडैप्ट कर लेते हैं। मिसाल के तौर पर ‘देवदास’ को उन्होंने ‘देव डी’ बना दिया। ‘देव डी’ का नायक डिप्रेस होकर पागल नहीं हो जाता। वह चंद्रमुखी के साथ चला जाता है। वह एंगल मुझे बहुत भाया था। मुझे खुद भी मोनोटनी से नफरत है। ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में बच्चा मुंह में ब्लेड लिए हुए है। वैसी अतरंगी चीजें दिखती नहीं हैं।
- विभिन्न किरदारों में ढलने के लिए जो विभिन्न स्टेजेज होते हैं, उनके बारे में अगर बता सकें तो?
सबसे पहले होता है डर कि मुझे कुछ नहीं आता। यह कैसे होगा? यह तो मुझे आता ही नहीं है।
-...पर आप तो सफल हो। उससे आत्मविश्वास तो आता ही है?
देखिए एक्टिंग का मामला अलग होता है। एक जजमेंट होता है कि आप स्टोरी के साथ आगे बढ़ रहे हो। फिर सेट पर सैकड़ों लोग भी रहते हैं। ढेर सारा कैमरे की निगाहें आप पर होती हैं। ऐसे में ऐसा नहीं होता कि नई कहानी के किरदारों को निभाने में आप एकदम नॉर्मल रहते ही है। कम से कम मेरे मामले में तो ऐसा ही है। मेरा फर्स्ट रिएक्शन डर का रहता है, क्योंकि मैं किरदार विशेष को परफेक्शन से निभाने की कोशिश करती हूं। खासकर, ‘एनएच-10’ और ‘बॉम्बे वेल्वेट’ जैसी फिल्में।

-सीधा सवाल करूं कि एक्टिंग क्या है तो क्या जवाब होगा?

मेरे लिए एक्टिंग साधना है। एक्शन बोलने के बाद कैमरा ऑन होता है और उसके साथ हम एक्टर ट्रांस में चले जाते हैं। वह एक ऐसा समय होता है कि अपनी किए का एहसास तुरंत हो जाता है। हमारी जिंदगी लोगों के जजमेंट पर निर्भर करती है,लेकिन कैमरे के सामने का वह क्षण पूरी तरह से हमारा होता है। उस क्षण में हम जो करते हैं वही एक्टिंग है।
- अब इमिडिएट शूट होने वाली फिल्म कौन सी है?
‘ऐ दिले मुश्किल’ है। उसकी भी कमाल की स्क्रिप्ट है। उससे पहले अगले महीने दिल धड़कने दो रिलीज होने वाली है। उसमें रणवीर सिंह मेरे अपोजिट हैं। रणवीर बहुत चार्मिंग हैं। वे बड़े नेक व्यक्ति हैं। उनमें असुरक्षा की कोई भावना नहीं है। वे किसी के बारे में बुरी बात नहीं करते। मुझे भी दूसरों में कमी निकालना अच्छा नहीं लगता। उनके साथ मैं वास्तविक किस्म की बातें कर सकती थी।  वे आप को इंप्रेस कर सकते हैं, पर वे कभी उसका नाजायज फायदा नहीं उठाते। वे बड़े हाजिर जवाब हैं। आप को निरुत्तर कर सकते हैं। फिल्म में हम दोनों की काफी कमाल की जोड़ी है। हम दोनों का मिजाज एक जैसा ही है। ढेर सारी चीजें हममें कॉमन हैं। ‘दिल धड़कने दो’ में भी हमारी केमिस्ट्री लोगों को पसंद आने वाली है। ‘बैंड बाजा बारात’ की तरह इस फिल्म की शूटिंग के दौरान भी खूब मजा आया।
- ‘एनएच-10’ की सफलता से क्या फायदा हुआ है?
यही कि अब आगे और वैसी फिल्में हम बना सकेंगे। स्टूडियो का दवाब अब बिल्कुल नहीं रहेगा हम पर कि ‘एनएच-10’ जैसी फिल्मों को कमर्शियल पैकेज का रूप दिया जाए। हम चाहते हैं कि लोगों को हार्ड हिटिंग सिनेमा मिले। उस फिल्म की सफलता से उन सभी लोगों का मुंह बंद हो गया, जो फिल्म के न चलने की आशंका जता रहे थे। उसने मेरा यकीन गहरा किया कि मैं और भी जोखिम मोल ले सकती हूं। मुझे आज तक जो भी सफलता मिली है, वह मुझे मिली है। मैंने मांगी नहीं। ऐसे में मैं अपनी नीश बनाना चाहती हूं।
-आपने कभी सोचा था कि एक दिन आप हिन्दी फिल्मों की अभिनेत्री बनेंगी?
-नहीं,कभी नहीं सोचा था कि फिल्मों में जाना है। मॉडलिंग करना चाहती थी जो मैंने किया। हां,मैंने फिल्मों के विषय में कभी भी गलत एटीट्यूड नहीं रखा कि मुझे कभी भी फिल्में नहीं करनी है। सोचिए,अगर मैं ऐसा सोचती तो आज,मैं हिपोक्रैट होती ना? मैंने हमेशा ओपन माइंड रखा कि अगर,कोई अच्छी चीज आती है और वह मेरे लिए अच्छी हो तो उसे एक्सेप्ट करने में मुझे हिचकिचाहट नहीं रहे।

Sunday, May 24, 2015

अहंकार की स्पेलिंग मुझे नहीं मालूम : अमिताभ बच्चन


-अजय ब्रह्मात्‍मज 
-‘पीकू’ को लोगों का बेशुमार प्यार मिला। आप के संग-संग आप के सहयोगी कलाकारों का परफॉरमेंस भी काफी सराहा और स्वीकार किया गया। क्या इतनी बड़ी सफलता की उम्मीद थी?
नहीं, बिल्कुल नहीं। हमें तो किसी फिल्म से उम्मीद नहीं रहती। फिर भी कहीं न कहीं इसकी उम्मीद जरूर थी कि जिस तरह की साधारण कहानी है, उसकी सरलता अगर लोगों को अपनी जिंदगी से ही संबंधित लगे तो एक तसल्ली होगी। बहरहाल, जब फिल्म बन रही थी तो उतनी उम्मीद नहीं थी, लेकिन लोगों ने इसे जिस तरह अपनाया है और जिस किसी ने इसकी प्रशंसा की। हमसे बातें की, सबने यही कहा कि सर आपने हमारी जिंदगी का ही एक टुकड़ा निकाल कर दर्शाया है। कोई कह रहा है उन्हें उनके दादाजी की याद आ गई तो कोई कह रहा उन्हें उनके नानाजी की याद आ गई। बहुत सी लड़कियां कह रही हैं कि उन्हें उनके पिताजी की याद आ रही है। यानी कहीं न कहीं एक घनिष्ठता सी बन गई है।
-कई लोगों को भास्कोर में अपने पिताजी और  दादाजी महसूस हुए हैं?
जी बिल्कुल। ऐसा हर परिवार में होता है। अच्छी बात यह कि फिल्म के तार परिवार से जुड़ गए हैं। हमें तो बड़ी खुशी है कि फिल्म बॉक्स ऑफिस पर अच्छा कर रही है। बड़ी फिल्मों के साथ तो हम मुकाबला कर नहीं सकते, लेकिन एक छोटी फिल्म जो बड़ी ही नीट और क्लिन है और वह अच्छा करे तो उसका सारा श्रेय लेखिका जूही चतुर्वेदी और निर्देशक शुजित सरकार को जाना चाहिए। हां और सिनेमाघरों में फिल्म के जाने के बाद फिल्म की सफलता का श्रेय जनता को जाना चाहिए। वे अगर दूसरों को भी अच्छी फिल्म देखने को प्रेरित करें तो उसके लिए वे शुक्रिया के हकदार हैं।
-भास्कोर को निभाने को लेकर आप के निजी जीवन के कोई परिचित निगाह में थे, क्योंकि निजी जीवन में आप का व्यवहार भास्कोर बनर्जी जैसा तो दूर-दूर तक नहीं है?
एक तो जूही और शुजित ने जब हमें पटकथा सुनाई तो हमारी काफी बैठकें हुई। उस समय काफी बातचीत हुई कि भास्कोर का गेटअप कैसा होगा? उसका व्यवहार कैसा होगा? वह कैसे बोलेगा? तो शुजित के मन में कहीं न कहीं एक आइडिया था कि हमारा भास्कोर कैसा दिखेगा? उसका पेट होगा, थोड़ा बड़ा। मोटे-मोटे चश्मे होंगे। बाल इस तरह का होगा। एक बार जब कलाकार गेटअप में आ जाता है। जिस तरह से वातावरण बनता है सेट पर, वह सब प्रभावित करता है कि हम उस किरदार को कैसे निभाएं। दूसरी बात यह थी कि सात साल काम किया है कलकत्ते में मैंने तो वहां के वातावरण से परिचित हूं मैं और फिर घर में बंगाली हैं। जया बंगाली हैं। और फिर फिल्म उद्योग में आने के बाद हृषी दा , बासु चटर्जी, शक्ति सामंत हैं। आर.डी.बर्मन। उन सब के साथ उठना-बैठना रहता था तो उनका असर भी है।
-शुजित से जब हम बातें कर रहे थे तो वे आप की व इरफान की जुगलबंदी को अल पचीनो व रॉबर्ट डिनेरो जैसी बता रहे थे?.
ऐसी तुलना करना सही नहीं होगा। वे अपनी जगह हैं, हम अपनी जगह। हां, इरफान के साथ काम कर बहुत अच्छा लगा। वे बहुत ही सक्षम और क्या कहा जाए.. वे चेहरे से न बोलते हुए भी काफी कुछ बोल जाते हैं।
-उनकी एक्टिंग को आप डिफाइन कैसे करना चाहेंगे, क्योंकि उन्होंने पहली बार आप की एक्टिंग डिफाइन करने में मेरी बहुत मदद की? अब तक आप के अधिसंख्य डायरेक्टर और सह कलाकार आप की एक्टिंग डिफाइन नहीं करते। वे बस इतना भर कह देते रहे कि आप समय के पाबंद हैं?
जैसा मैंने कहा वे न कहकर भी काफी कुछ कह जाते हैं। उस किस्म की महारथ तभी मुमकिन है, जब आपने अपने किरदार को बखूबी समझा है। इरफान जो कर देते हैं, वह बड़ा कठिन काम है, क्योंकि कलाकार तो संवाद पर ही जीवित रहता है। किसी दृश्य में कुछ ना बोलते हुए चुपचाप खड़े रह कर सब की निगाहें अपनी ओर आकृष्ट कर लेना बहुत बड़ी कला है।
-आप पब्लिक इवेंट में बाबूजी की चर्चा तो करते हंै, पर मां की कम, क्या आप बाबूजी के ज्यादा करीब रहे थे?
यह बात नहीं है। कुछ प्रश्न ऐसे पूछे जाते हैं कि हमें बाबूजी का वर्णन करना पड़ता है, लेकिन मां जो होती है वह मां होती है। उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। मां अद्भुत होती है। कुछ बातें जीवन में ऐसी होती हैं, जो व्यक्तिगत होती हैं। उन्हें व्यक्तिगत ही रहने दीजिए।
- अभिषेक किनके ज्यादा करीब हैं, आप के या जया जी के? किन के साथ वे खुलकर बातें कर पाते हैं?
मैं तो कहना चाहूंगा कि हम ने दोनों में कभी कोई अंतर नहीं रखा।  हमने श्वेता और अभिषेक को तो समान रूप से देखा है। हां, बेटी शादीशुदा हो गई तो वह चली गई है, घर छोड़कर। हमने कभी उन दोनों में विभेद नहीं किया। मेरा मानना है कि उन दोनों के मन में भी यही अवधारणा होगी। अभिषेक के जन्म से पहले मैंने सोचा हुआ था कि यदि मुझे पुत्र हुआ तो उसे मित्र मानूंगा। अभिषेक मेरे लिए मित्र जैसे ही हैं। जो भी बातें होती हैं वे मित्र की तरह ही होती हैं। हालांकि मैं आप को यह भी बता दूं कि परिवार में अगर कोई निर्णय लेना हो तो हम सबसे पहले श्वेता को फोन करते हैं। उस पर उनका क्या दृष्टिकोण रहता है, वह हम सुनते हैं। उनकी सलाह मानते हैं। घूम-फिरकर मैं यह कहना चाहूंगा कि एक सामूहिक वातावरण है। सब मिल-जुल कर राय-मशविरा करते हैं। मैं नहीं मानता कि अभिषेक मेरे ज्यादा करीब हैं या फिर अपनी माताजी के।
-भारतीय समाज में माना जाता है कि पिता तो मजबूत होता ही है उसे इमोशनल सपोर्ट की क्या जरूरत? इस फिल्म को देखते हुए महसूस होता है कि पिता भी चाहता है कि बेटा हो या बेटी, वह उसका ख्याल रखे। तो आप के अपने बाबूजी व अब अभिषेक के अनुभव से जानना चाहेंगे कि बीते 40-50 सालों में पिता की स्थिति बदली है?
देखिए कई बार ऐसा सुनने को मिलता है। खासकर बड़े शहरों में कि बच्चे घर छोड़कर चले जाते हैं। वे माता-पिता ा ख्याल नहीं रखते हैं। हमने तो कभी ऐसा सोचा नहीं। हमारी तो सोच यही रही कि हम जल्दी से जल्दी अपने पैरों पर खड़े हो जाएं और सुबह-शाम अपने परिजनों का आशीर्वाद मिलता रहे। हमारे आस-पास भी ऐसा ही वातावरण बना रहे, उसकी कोशिश हमने की है। अगर अन्य घरों में समन्वय और सौहार्द का वातावरण नहीं है तो उसके लिए जिम्मेवार परिस्थितियां कौन सी हैं, वह भी एक मसला है। हमारी भारतीयता यह सिखाती है कि हम बड़ों का सम्मान करें। कमरे में बड़े बोलते रहें तो आप शांति से सुनते रहें। बड़ों के मन में संतान को लेकर केयरिंग की ही भावना रहती है। उनके लिए उनके बच्चे बड़े होने पर भी छोटे ही रहते हैं। जब मां-बाबूजी घर में थे तो हमारी तो यह प्रथा थी कि मां-बाबूजी के चरण छूकर घर से बाहर जाना। उन्हें अपनी गतिविधियों के बारे में कह कर जाना। वह प्रथा, संयम सदा कायम रही। वह संस्कार है हमारा। हम भले इंडिपेंडेंट हो गए हैं, पर उनकी नजरों में हम आज भी बच्चे हैं। जाने लगते थे तो पूछते थे कि कहां जा रहे हो? अच्छा शूटिंग पे, जल्दी आ जाना। रात को घर लौटने पर पूछते थे कि खाना खाया कि नहीं। खा लो।
- कह सकते हैं कि एक सामान्य मध्यवर्गीय चिंताएं ही रहती हैं?
जी। बच्चों का वह कर्तव्य तो बनता है। हालांकि मैं अपने बच्चों पर दवाब नहीं डालता कि आप मेरी देख-रेख करें। यह दवाब मैं कभी नहीं डालूंगा। मैं तो बल्कि इतना कुछ कर जाऊंगा कि उन्हें किसी किस्म की तकलीफ न हो।
- यानी आप भास्कोर जैसे तो बिल्कुल नहीं हैं?
वह तो एक लिखा हुआ किरदार है। भूमिका थी वह।
-निजी जिंदगी के संबंध पर्दे पर नहीं आते हैं। शूट के दौरान क्या कभी दीपिका के जेस्चर या रिएक्शन में आप को श्वेता का अक्स दिखा?
नहीं वैसे नहीं सोचना चाहिए। श्वेता मेरी पैदाइशी बेटी हैं। पीकू में दीपिका भास्कोर बनर्जी की बेटी हैं। उनके प्रति लगाव रहेगा। हालांकि दीपिका जो हैं, उनका स्वभाव बड़ा ही मिलनसार है। जब भी वे मिलती हैं या घर पर आती हैं तो हम उन्हें बेटी की तरह प्यार करते हैं। मेरे ख्याल से उनके मन में भी वैसी ही भावनाएं उत्पन्न होती होंगी।
-बतौर एक्टर दीपिका के बारे में क्या कहना चाहेंगे?
वे चमत्कार हैं। इतनी जल्दी इतना बड़ा बदलाव, बहुत बड़ी बात है। एक अजूबा हैं वे। हम सब यही कहते हैं कि कैसे हो गया..। एकदम नैचुरल परफॉरमेंस हैं उनका। कहीं नहीं लगता कि वे एक्ट कर रही हों। शूट के दौरान कभी लगा ही नहीं कि हम एक्ट कर रहे हों। बल्कि जब शूटिंग समाप्त हुई तो हम सब बड़े दुखी हो गए कि अरे और शूट नहीं है क्या? दीपिका बहुत ही सक्षम कलाकार बन गई हैं।
- आप की लंबाई को लेकर आपत्ति थी शुरू में। दीपिका की भी लंबाई को लेकर भी आपत्तियां थी। सब कहते थे कि अरे वे तो अपने हीरो से भी लंबी लगती हैं। अब वे उसको लेकर भी सुरक्षित महसूस करती हैं?
उनसे कहिए कि वे लगातार मेरे संग काम करती रहें।
- एक और सवाल यह कि सफलता से अमूमन अहंकार आ जाता है। उससे कैसे बचा जाए? आप की विनम्रता प्रभावित करती है?
पहले तो मुझे अहंकार की स्पेलिंग नहीं आती। शब्दकोश में ढूंढना होगा उसे। प्रतिदिन को चुनौती मानना चाहिए।  हम सफलता निर्धारित नहीं कर सकते। प्रतिदिन हमें प्रयत्न करना चाहिए कि जो चुनौती हमें मिली है, उसे सफलता से निभाते चले। यह समझना भी चाहिए कि अगली पीढ़ी आप को रिप्लेस करेगी। वह तो आती-जाती चीजें हैं। आप को अपने काम से संतुष्ट रहना चाहिए।
- आखिरी सवाल  आप की आगामी फिल्में?
वजीर है। बिजॉय नांबियार बना रहे हैं। फरहान अख्तर हैं, अदिति राव हैदरी हैं और हम हैं। बस यह है कि यह एक ड्रैमेटिक थ्रिलर है।



Saturday, May 23, 2015

हिमांशु शर्मा का इंटरव्‍यू

गजेन्‍द्र सिंह भाटी ने 'तनु वेड्स मनु रिटर्न्‍स' के लेखक हिमांशु शर्मा का विस्‍तृत इंटरव्‍यू किया है। उनके ब्‍लॉग फिलम सिनेमा से इसे साभार लिया गया है चवन्‍नी के पाठकों के लिए।




-गजेन्‍दं सिंह भाटी

क्वीनके बाद कंगना रणौत को पीछे मुड़कर नहीं देखना पड़ा। उन्हें शीर्ष कलाकारों ने निजी तौर पर बधाई दी। अपनी कतार में आने का आभास दिया। लेकिन तनु वेड्स मनुन होती तो क्वीनभी न होती और कंगना को सकारात्मक छवि नहीं मिलती। एक बाग़ी, खिलंदड़, वर्जित कार्य करने वाले ऐसी नायिका पहले यूं न दिखी। बदल रहे वक्त में हिमांशु शर्मा ने तनु का पात्र सही टाइमिंग से लिखा। हालांकि फिल्म के अंत को लेकर आपत्तियां हैं लेकिन शुरुआत के लिए ही सही फिल्म उपलब्धि थी। बहुत समय बाद लोकगीतों वाली मिठास तब मन्नू भय्या का करिहैंगाने में चखी गई। कानपुर या अन्य उत्तर भारतीय शहरों के मध्यम वर्गीय लोगों और उनके संतोषों का चित्रण भी मौलिक तरीके से पेश हुआ।

बाद में निर्देशक आनंद राय के साथ हिमांशु की लेखनी रांझणालेकर आई। बनारस और दिल्ली स्थित देसी पात्रों की कहानी। अब तनु वेड्स मनुरिटर्न्स ला रहे हैं। शुक्रवार 22 मई को रिलीज से पहले हिमांशु से बात हुई। वे मृदुभाषी, खुले, विनम्र, आत्म-विश्वासी और चतुर हैं। वे लखनऊ से ताल्लुक रखते हैं। दिल्ली में कॉलेज की पढ़ाई कर चुके हैं। टशनमें उन्होंने असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर सीमित काम किया। फिर फिल्म लेखन की ओर मुड़ गए। तनु वेड्स मनु रिटर्न्सके बाद वे आनंद के साथ एक अन्य फिल्म पर काम करेंगे। वे बतौर निर्देशक भी एक फिल्म बनाएंगे। ये भी लखनऊ में ही स्थित होगी। स्क्रिप्ट लिख रहे हैं। आने वाले पांच-छह वर्षों के लिए उनके जेहन में कुछ कहानियां हैं।

उनसे बातचीत:

संक्षेप में या विस्तार से अपनी अब तक की जर्नी को कैसे देखते हैं?
मुझे लगता है अभी मैंने जीवन में उतना काम किया नहीं है। कि मुड़कर देखूं और सोचूं कि जर्नी कैसी रही है। मेरे पास बहुत बॉडी ऑफ वर्क नहीं है। किसी एक लेवल पर निरंतरता के साथ अच्छा काम करने के लिए आपको कुछ और फिल्में चाहिए होती हैं। जितने भी बड़े राइटर्स हैं उनका एक बॉडी ऑफ वर्क रहा है। मुझे नहीं पता कि अभी मेरी जर्नी को जर्नी कहा भी जाना चाहिए या नहीं। ये महज तीसरी फिल्म है मेरी जो मैंने लिखी है। ये जरूर कहूंगा कि पहली फिल्म में भी वही लिखा जो मुझे ठीक लगा कि हां ये मजा दे रहा है, या ये मुझे उदास कर रहा है, या ये मुझे हंसा रहा है। मुझे हंसा रही है तो कहानी सबको हंसाएगी, उसी उम्मीद के साथ मैंने कोई भी अपना काम किया है। तो रांझणाऔर तनु मनु-1’ तक तो ठीक ही लग रहा है मामला। अब बाकी इसमें देखते हैं कितना पसंद आता है सबको।

आपकी पहली फिल्म थी स्ट्रेंजर्स’, उसका एक डायलॉग है (जिमी शेरगिल का किरदार बोलता है), “मुझे लगता है कि लिखने में और शिट करने में कोई खास फर्क नहीं होता। ये एक ही चीज है। जो आपको परेशान कर रहा है वो सब आप निकाल देते हो। ये भी राइटिंग के साथ है”..
(
हंसते हुए) दरअसल वो कॉन्सेप्ट मेरा था लेकिन उसे लिखा मेरे एक दोस्त हैं गौरव सिन्हा उन्होंने था। स्क्रीनप्ले और डायलॉग्स पूरे उनके थे। लेकिन, हां वो बड़ी अजीब लाइन है..

मैं इस संदर्भ में पूछ रहा था कि तनु वेड्स मनुलिखने से पहले क्या कुछ परेशान कर रहा था या सिर्फ लोगों का मनोरंजन करना था?
कोई ऐसी नीड नहीं थी। पढ़ रहा था दिल्ली में। यहां काम ढूंढ़ रहा था। असिस्टेंट डायरेक्टर बना। वाहियात किस्म का असिस्टेंट डायरेक्टर था मैं। बहुत ही बुरा। मैंने टशनमें असिस्ट किया विजय कृष्ण आचार्य जी को। उस दौरान मुझे लगा कि भई ये काम तो नहीं हो सकता। अगर मुझे फिल्म डायरेक्ट करनी हो और मुझे ऐसा एडी (असिस्टेंट डायरेक्टर) मिले तो मैं तो गोली मार देता। मैं बहुत ही बुरा था। मेरे पास और कोई चॉइस नहीं थी। लिखने का मन था तो उसके बाद लगा कि भई एडीगिरी तो नहीं हो सकती। तो लिखना शुरू किया फिर तनु वेड्स मनुलिखी। ठीक रहा उसका हिसाब-किताब। तो रांझणालिखी फिर। ऐसा कुछ नहीं था कि उथल पुथल चल रही है कहानी कहने की या कुछ बात बोलने की। ऐसा नहीं है। वो बड़ा मजबूरी का काम था। कि भईया ये काम नहीं हो सकता, ये काम कर लो। हां, ‘राझंणाके वक्त... मैं ये जरूर कहूंगा कि तनु-मनुलिखने के बाद मैं जिस जगह खुद को, अपने दिमाग को, मन को पा रहा था वहां मैं कुछ ऐसा अटेंप्ट करना चाहता था जो इमोशन और ड्रामा के लिहाज से बहुत ओवरवेल्मिंग (भावुक, जोरदार) हो। तो वो कहानी बहुत दिल से निकली। क्योंकि सब कह रहे थे कि तनु मनुचल गई है तो तुम्हे टू’ (सीक्वल) लिखनी चाहिए। या कुछ इस जॉनर (श्रेणी) का लिखना चाहिए। लेकिन मैं रांझणालिखना चाहता था और वो बहुत इमोशनल नीड थी मेरी। वो कहानी आजमाने की। तनु मनुलिखते वक्त मैं सिर्फ असिस्टेंट डायरेक्शन से भागना चाहता था।

तनु का किरदार आपने क्यों रचा? क्योंकि जैसे सिंगल स्क्रीन के आधारभूत दर्शक को तब देखा, वो एक बार के लिए चकरा गया कि ये लड़की कर क्या रही है? इस लड़के से इतना बुरा सलूक क्यों कर रही है? और हम इतनी बिगड़ी हीरोइन वाली फिल्म क्यों देख रहे हैं? इससे पहले हीरोइन उन्होंने ऐसी देखी थी मसलन, दक्षिण की तकरीबन सभी फिल्मों की जो अपनी मूर्खता और नाज़-नखरे से हीरो को रिझाती रहती है और दर्शक भी खुश होता है। वो भी ये समझता है कि मैं राजकुमार हूं और ये मुझे एंटरटेनमेंट दे रही है। कमर्शियल सिनेमा के उन पारंपरिक दर्शकों के बारे में सोचा था कि लिख रहे हैं और प्रतिक्रिया कैसी आएगी?
औरत या मर्द होने से पहले इंसानी तौर पर आप उस चीज को देखें तो मुझे ऐसा कोई बहुत चमत्कारिक काम नहीं लग रहा था। मतलब मेरी खुद की कॉलेज के टाइम में ऐसी बहुत सी दोस्त रही हैं। और एक छोटा सा एनार्किक नेचर होना या एक तरीके की खुदपसंदी कहना ज्यादा बेहतर होगा इसे.. खुदपसंदी ऐसी है कि बाकी कुछ दिखाई नहीं दे रहा है। तो मुझे ये बड़ा नेचुरल, बहुत ह्यूमेन लगा। बहुत ही आम लड़की जैसा लगा। और मुझे लगता है बहुत सारी चीजें हमारी फिल्मी समझ से बनती हैं। क्योंकि हमने ऐसा खुद देखा है तो वही लिख रहे हैं। या वही बना रहे हैं। अपना जो देखा है आप उसे एक बार ट्राई तो करिए। और मेरा ये सिंपल रूल है कि आपको खुद ये काम करते हुए मजा आ रहा है ... मैं कोई प्रशिक्षित राइटर नहीं हूं, मैंने कहीं से कोई ट्रेनिंग नहीं ली है ऐसे ही काम चल रहा है भगवान भरोसे - तो उसमें ये है कि एक सीन के बाद दूसरा सीन देखने में अगर मुझे मजा आ रहा है तो बाकी लोगों को भी आएगा यार। मैं थोड़े ही न मार्स (मंगल) से आया हूं। जमीन से ही उठा हुआ इंसान हूं। लखनऊ में परवरिश हुई। 120-130 करोड़ की जनता के बारे में सोचकर अपना काम करेंगे तो कनेक्ट करेगा। मैंने जब तनु का किरदार लिखा तो मेरे मन में ऐसा नहीं था कि ओ, मैं बड़ा पाथब्रेकिंग कुछ लिख रहा हूं। मुझे यही आता था। मुझे ये ही लड़की पता थी। मुझे ये ही लड़की लिखनी थी। उसके अलावा कुछ और लिखने के काबिल भी नहीं था। तो आई थिंक उसमें कोई प्लानिंग नहीं थी ऐसी। मुझे जो समझ में आया मैंने वो काम किया। अब बाकी वो दस में से छह लोगों को पसंद आया है कि दो लोगों को, वो अलग बात है।

फिल्म की आलोचना भी हुई। कौन सी आलोचना आपको उचित लगी? लगा कि आपको आने वाले काम में कुछ बेहतर करने में मदद करेगी?
ज्यादातर क्रिटिकल इवैल्युएशन (आलोचनात्मक मूल्यांकन) पर ध्यान देना मैं बेहतर समझता हूं। जो चीज पसंद आई वो तो बहुत अच्छी बात है, हमें थैंकफुल होना चाहिए। लेकिन पसंद आई ये दोबारा, बार-बार पढ़कर के आप क्या कर लेंगे? उस पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए कि कौन सी चीजों ने काम नहीं किया। बहुत सारी शिकायतें थीं, अच्छे-खासे लोगों ने दिक्कतें जताई थीं। चाहे वो रांझणाहो या तनु मनुहो, दोनों में ही ऐसा हुआ। ..पर मुझे लगता है एक क्रिटीक और एक राइटर में फर्क होता है। मुझे लगता है एक क्रिटीक का एक ऑब्जेक्टिव व्यू (वस्तुपरक नजरिया) होता है। एक लिट्ररेरी डिसकोर्स के साथ वो उसको देखता है या समझ उसकी एक अलग तरीके की होती है बनिस्पत उस शख्स के जो खुद लिख रहा है। मुझे नहीं लगता कि दुनिया में कोई अनबायस्ड राइटिंग (पूर्वाग्रह-रहित लेखन) होती है। आपका झुकाव कहीं न कहीं होगा! बिलकुल होगा! आपका अपना अनुभव, आपका अपना चरित्र झलकेगा और वो होना चाहिए। आप निबंध नहीं लिख रहे। आप एक कहानी लिख रहे हैं। तो उसमें कुछ अच्छी चीजें भी होंगी और कुछ बुरी चीजें भी होंगी। और मुझे लगता है वो इमपरफेक्शन जो है वो भी आपका ही हिस्सा है। उससे आप घबराएं मत। उससे दिल छोटा करने की जरूरत नहीं है। हां, ये भी है कि आप मुंह भी न मोड़े उस आलोचना से। आपको लगता है कि आपकी राइटिंग में आगे क्राफ्ट के लिहाझ से आलोचना मदद कर पाएगी तो आप निश्चित तौर पर उसे समझें।

एक आलोचना ये रही कि अंत में आखिर आपने तनु को संस्कारी बना ही दिया? शादी ही आखिरी रास्ता रखा? अगर आप उसे वैसा ही रहने देते तो क्या ये फिल्म खास नहीं हो जाती?
रैट्रोस्पेक्ट में सोचूं तो हां बिलकुल, कहानी को ऐसे भी रखा जा सकता था। मेरे दिमाग में नहीं आया। शायद मुझे यही करते हुए ज्यादा यकीन आ रहा था अपनी कहानी पर। देखिए साब, इसी कहानी को कोई एक राइटर दूसरे तरीके से लिखेगा, एक डायरेक्टर दूसरे तरीके से बनाएगा। इसी कहानी को मैं इस तरीके से लिखना पसंद करूंगा और आनंद राय इसी तरीके से बनाना पसंद करेंगे। तभी तो इतनी मात्रा में भिन्न-भिन्न फिल्में हैं। क्योंकि इतने सारे दृष्टिकोण हैं। मुझे लगता है ऐसा हो सकता था लेकिन हो तो कुछ भी सकता था। होने को क्या नहीं हो सकता? किसी भी कहानी में। मैंने वही लिखा जिसमें मेरा खुद का भरोसा था।

तनु के किरदार को लेकर कंगना ने आपसे क्या चर्चा की? और आमतौर पर फिल्म के कलाकार स्क्रीनराइटर से मिलकर अपने रोल को कितना समझते हैं?
बिलकुल, एक्टर्स मिलते हैं, चर्चा करते हैं। एक्टर्स अमूमन अब खुल गए हैं। उनमें एक स्तर की इंटेलिजेंस, स्मार्टनेस, दृष्टिकोण, मैक्रो लेवल पर कहानी को समझने की ताकत ... ये आई है। बढ़ी है। आपने भी देखा होगा कि अचानक से जो स्टार परसोना हुआ करता था वो बदला है। सोशल मीडिया के उदय के बाद से। एक कनेक्ट अलग हुआ है, स्टार्स का। उनका तरीका अलग हुआ है अपने दर्शकों से बात करने का। मुझे नहीं लगता कि अब कोई भी सिंहासन पर ऊपर बैठा है जिस पर 60 और 70 के दशक में स्टार्स बैठा करते थे। आज की डेट में ट्विटर पर आप अमिताभ बच्चन साहब को भी बोल देते हैं, शाहरुख साहब को भी आप कुछ बोल देते हैं, रणबीर कपूर से भी आप कुछ बोल सकते हैं। और वो जवाब भी देते हैं आपको। इनकी अप्रोच बहुत बदली है अपने स्टारडम को लेकर। इसी का परिणाम मैक्रो लेवल पर कहानी में उनकी दिलचस्पी के रूप में आया है। कंगना जी की बात करूं तो उनकी कहानी को लेकर बहुत अच्छी समझ है। किरदार को लेकर हमारी पहली फिल्म में भी बात हुई थी। बहुत खुलकर बात हुई। उन्होंने अपने बिंदु रखे। वो सारी बातें जो उन्हें लग रही थीं। और स्क्रिप्ट ही है, कुरआन तो है नहीं कि ऊपर से लिखकर आई है। जिस एक्टर को परफॉर्म करना है वो स्क्रिप्ट से कम्फर्टेबल होना चाहिए। एक बात मोटा-मोटी समझ में आ गई उसके बाद लाइन्स तो बदली जा सकती हैं।

एक लेखक या निर्देशक (भविष्य के) के तौर पर आपकी आंखों में आज के किन एक्टर्स के देखकर चमक आती है जो आपके किरदारों को एक अलग ही धरातल पर ले जा सकते हैं?
मुझे लगता है कि रणबीर कपूर बहुत कमाल के एक्टर हैं। उनसे मिलना भी हुआ है। मुझे जितनी समझ उनकी दिखती है या उनके काम में दिखती है वो बेदाग़ है। वो बहुत नया काम कर रहे हैं। भविष्य में अगर उनके काबिल स्क्रिप्ट हुई तो जरूर उनके साथ काम करना चाहूंगा।

तनु वेड्स मनुकी तेलुगु रीमेक मि. पेल्लीकोडुकूसे आप कितने संतुष्ट थे? क्या आपको नहीं लगता उसमें आपके पात्रों की सेंसेबिलिटीज इतनी बदल गई थीं कि मर गई थीं?
मैंने ट्रेलर देखा था उसका। मुझे लगा कि यार बेकार में पैसे खर्च किए और राइट्स लिए। ऐसे ही बना लेना चाहिए था। ये तो वो फिल्म है ही नहीं। आपने यूं ही पैसे खर्च कर दिए।

तनु वेड्स मनु रिटर्न्सकी कहानी वाकई में आपको कहनी थी कि कमर्शियल वजहों से ही लिखी?
मुझे कहनी ही थी। मजेदार बात बताता हूं आपको। तनु मनुके बाद सबने बोला कि ये काम कर रही है तुम पार्ट-2 लिख दो। लेकिन कुछ दिमाग में आ ही नहीं रहा था। मैंने कहा क्या लिख दो? खत्म है ये कहानी। तब मैं रांझणालिखना चाहता था। लिखी। फिर रांझणाके दौरान दिमाग में ये कहानी आई। एक कॉन्सेप्ट बना। मुझे लगा कि हां यार ये मजेदार है। ये कहानी कही जा सकती है और मेरा कहने का मन है। इसमें एक पैसे की भी दूसरी बात नहीं थी। अगर कमर्शियल पहलू की वजह से बनानी होती तो मैं तुरंत ही बना देता। तनु मनु-1’ के बाद ये आ जाती। रांझणाबनाने के बाद जब लगा कि इस दुनिया में जाया जा सकता है तभी गए। वरना मैं कहां से लिख लेता। जबरदस्ती की कहानी तो दिखाई दे जाती।
Characters of Datto and Manu in a scene from the film.
इसमें दत्तो का किरदार आपने हरियाणा का ही क्यों लिया, किसी और प्रदेश का रख सकते थे?
आप फिल्म देखेंगे तो बिलकुल समझ आएगा कि ये हरियाणा से ही क्यों है। ये कहीं और की नहीं हो सकती थी। ये बहुत नेचुरल और ऑर्गेनिक तरीके से आया, ज्यादा गणित लगानी ही नहीं पड़ी। कि ये कहां की हो, अरे इसे वहां का बना दें तो ज्यादा मजा आएगा। ऐसा बिलकुल नहीं था। मुझे लगता है कोई भी कहानी अपना चरित्र और अपनी पृष्ठभूमि खुद ही बता देती है। रांझणाजैसी कहानी लखनऊ में नहीं घट सकती थी, ‘तनु मनुजैसी कहानी बनारस में नहीं घट सकती थी। क्योंकि बनारस उतनी इंटेंसिटी देता है जो रांझणामें थी। एक इमोशनल ओवरवेल्मिंगनेस देता है। और कुंदन का चरित्र जो है वो लखनऊ में नहीं पाया जाता। वो बनारस की पैदाइश है। वो बनारस में ही पनप सकता है। तनु मनुकी कहानी भी लखनऊ में ही सेट हो सकती थी। इसलिए दत्तो का कैरेक्टर सिर्फ हरियाणा से ही आ सकता था। मेरी समझ से कम से कम। तो बहुत नैचुरली आया है वो। इसके लिए मैंने कोई एक पैसे का गणित नहीं लगाया है।

पिछली तनु..में जुगनी..गाना रखा गया था, इसमें भी बन्नो..गाने में नायिका के लिए संबोधन जुगनी है। क्या जुगनी का कोई संदर्भ है, कोई बैक स्टोरी है?
जुगनी तो हमारा फोक का ही गाना है पंजाब का। और जुगनी किसी भी संदर्भ में बहुत तरीके से इस्तेमाल की गई है। वो कभी आपकी माशूका होती है, कभी कुछ और होती है, कभी सिर्फ एक विचार होती है। आपको जो बात कहनी है, वो हर बात जुगनी कह सकती है। जुगनी का कोई चेहरा नहीं है। वो विचारात्मक लेवल पर ऑपरेट करने वाली टर्म है। आपको अगर डर लग रहा है सीधे कहने में तो जुगनी के नाम पर कह दीजिए। चाहे आरिफ लोहार हों या पंजाब के दूसरे लोक गायक हों, उनके द्वारा जुगनी का अलग-अलग तरह से, अलग-अलग रेनडिशन में अलग-अलग बात के लिए इस्तेमाल किया गया है। ये तो बहुत पारंपरिक विचार है। कि जुगनी है जो ये बात कह सकती है। जुगनी कौन है, मुझे लगता है ये तो किसी को नहीं पता।

पहली फिल्म में आपने जुगनी..गाना रखा, सीक्वल में बन्नो..गाना है। इन पुराने गीतों को रिवाइव करने की वजहें थीं?
बन्नो..ये रहा कि कनिष्क और वायु जो फिल्म के म्यूजिक डायरेक्टर हैं, हमसे फिल्म के मिड में मिले। बहुत सारे म्यूजिक डायरेक्टर्स अपना कुछ-कुछ भेज रहे थे। साथ काम करने का मन था सभी का। ये गाना सुनते ही हम लोगों को बड़ा मजेदार लगा। और फिल्म की दुनिया का लगा। ऐसा नहीं लग रहा था कि अरे, जबरदस्ती कोई गाना ठूसना पड़ रहा है। बहुत नेचुरल ऑर्गेनिक तरीके से वो उस फिल्म में घुल रहा था। तो ले लिया। और एक ट्रेडिशनल वैल्यू भी थी उसकी। फोक बेस्ड गाना है वो।

पहली फिल्म में रंगरेज..गाना था इसमें घणी बावरी..है... क्या आपको लगता है धुन प्रधान भविष्य में लिरिक्स बचे रह पाएंगे?
राजशेखर जो लिरिक्स लिखते हैं हमारे, वे कॉलेज के वक्त से साथ हैं हमारे। हमेशा उन्होंने विचार पर गाना लिखा है। शब्दावली पर वो आदमी उतना निर्भर नहीं रहता जितना विचार पर रहता है। उनसे हमेशा एक नया थॉट मिलता रहा है चाहे वो रंगरेज..हो, ‘घणी बावरी..या ओ साथी मेरे..जो सोनू जी ने गाया है। वो विचार प्रधान लिखते आए हैं और हमें भी वही जंचता है। कुछ बात जैसी बात हो तो आप बोलिए।

बन्नो..गाने में बोल हैं – ‘बन्नो तेरा स्वैगर लागे सेक्सी..यहां सेक्सी शब्द के मायने क्या हैं?
मेरे लिए सेक्सी का अर्थ था तेवर। एक टशन जो होता है न। बन्नो की इस स्वैगर में टशन है यार। एक बात है इसमें। एक उम्फ फैक्टर है। तो मुझे लगता है हमने उसे यूं लिया था।

रांझणामें एक दृश्य है जहां जेएनयू (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली) में धनुष को स्टूडेंट घेर लेते हैं कि वो चोर है। और सुबह तक बैठकर ये जान पाते हैं कि वो चोर क्यों बना क्योंकि वो गरीब है? क्या ये तंज जरूरी था और क्या जेएनयू में होने वाली बौद्धिक चर्चाओं को आप सतही और खोखली मानते हैं?
नहीं, नहीं ये वाकया सच में हुआ है। मैं जेएनयू या वहां के बौद्धिक एलीट या नॉन-एलीट, या शिक्षाविदों के खिलाफ हूं ऐसी कोई बात नहीं है। पर ये वाकया (फिल्म वाला) वहां घटा है और मुझे पता है इसीलिए मैंने उसको लिखा।

मतलब ओवरऑल जेएनयू या वहां के विचारों का ये प्रतिनिधित्व नहीं करता?
मुझे लगता है हिंदुस्तान का सबसे प्रेमियर इंस्टिट्यूट है वो। वहां से जितने लोग निकले हैं उनकी राजनीतिक समझ और उनका योगदान अभूतपूर्व है। इसके लिए तो उन्हें किसी के सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है। उस किस्से से कोई लेना देना नहीं था। वो चरित्र जो अभय देओल का था मुझे लगा कि ये इस दुनिया में एक अच्छापन देगा।

आनंद से आप पहली बार कब मिले थे? आप दोनों इतने लंबे भागीदार किन कारणों से बन पाए?
मैं 2004 में पहली बार उनसे मिला था। वो एक कंपनी में कुछ नौकरी टाइप वाला काम कर रहे थे। उससे पहले उन्होंने बहुत सारा टेलीविजन किया था। और अब उन्होंने अपना टेलीविजन करना छोड़ दिया था, वो प्रोड्यूस भी कर रहे थे, डायरेक्ट भी कर रहे थे और काफी अच्छा कर रहे थे। पर वो भी उकता गए उसी काम को करते हुए। वो भी ऐसे ही घूम रहे थे। मैं 2004 में बॉम्बे पहुंचा ही था। उनसे मुलाकात हुई तो उन्होंने कहा कि फिल्म तो यार ऐसी कुछ है नहीं पर मैं बनाने की कोशिश कर रहा हूं। बाकी तुम बता दो तुम्हारा खर्चा कितने में चल जाएगा महीने में। मैं उतने का जुगाड़ करवा देता हूं तुम्हारा और कुछ करते हैं साथ में। तो उस तरीके से शुरू हुआ। बट, मुझे लगता है वो एसोसिएशन चलने का एक बहुत बड़ा कारण ये रहा कि मैं कभी भी कमीशन्ड राइटिंग नहीं कर पाया। कि मतलब किसी का एक सबजेक्ट हो और आप बस स्क्रीनप्ले लिख दीजिए, डायलॉग लिख दीजिए। शायद इसीलिए न मैं बाहर काम भी नहीं कर पाया। मैं वही लिख सकता हूं जो मेरा मन है। और आनंद अपना मूड बना लेते हैं वही काम करने का जो मेरा मन है। तो अगर इसके बाद मेरा मन एक एक्शन फिल्म लिखने का है तो दो-तीन महीने में ही जब तक मैं इस कहानी पर काम कर रहा होऊंगा वो अपना मन बना लेंगे कि अगली एक्शन बनानी है। एक तरीके से उनका मन नहीं होता मेरा मन हो जाता है कि किस जॉनर में काम करना चाहिए। मेरा मन था रांझणाकरने का और उन्होंने अपने मन में उस तरीके से ढाल लिया। एक ट्रैजिक कहानी लिखने का मेरा मन था, वो उनका नहीं था पर वो ढाल लेते हैं खुद को। और वो उस तरह के नहीं कि बोले, दस सीन हो गए आओ बैठ कर बात करें। नहीं। पूरी स्क्रिप्ट जब मैं सुनाता हूं तब वो सुनते हैं। निश्चित तौर पर हम रोज मिलते हैं, रोज ऑफिस में बैठकर बातें होती हैं। खाना साथ हो जाता है। उन सबके चलते एक बातचीत रहती है। वो दुनिया मैं उनको दिखा देता हूं। पर जो सीन-दर-सीन प्रोग्रैशन कहानी का वो उन्हें बाद में ही पता चलता है। और उस पर मुझे नहीं याद उन्होंने कभी कोई बदलाव बताए हों, उन्हें दिक्कत लगी हो। लेकिन उनको जो चीज करनी होती है उसे वो करते हैं। यही सबसे बड़ी वजह है कि हम बहुत अच्छे से घुलते हैं। मुझे इसीलिए उनके साथ काम करने में हमेशा मजा आया है।
Himanshu with Anand.
दोनों में कोई रचनात्मक मतभेद नहीं होते? होते हैं तो सुलझाते कैसे हैं?
होते हैं बिलकुल होते हैं, जैसे सबके साथ होते हैं। वो जिस किस्म के डायरेक्टर हैं उन्हें जोर किसी चीज पर अच्छा नहीं लगता। जैसे, आपको लगता है कि कहानी में बहुत भारी ट्विस्ट है, वो उसे ऐसे पेश करते हैं जैसे कोई बात ही न हो। और जो आपको एवेंई सी बात लगती है उसे वे बड़ा बना देते हैं। तो उनका एक बड़ा रोचक तरीका है काम करने का। उससे कई बार नाइत्तेफाकी रहती है मेरी। उन चीजों को लेकर हमारी कई बार बहस हुई है। लेकिन वो ज्यादा-कम बहस तक ही रही है। उसकी वजह से ऐसा कोई अंतर नहीं आ गया।

वो कौन सी घटना, किताब या बात थी जिससे आप फुल टाइम राइटर बने?
सच बताऊं तो ऐसा कुछ न था। ऐसा तो था नहीं कि मैं बड़ा इलाहाबाद का कलेक्टर लगा था और छोड़कर आ गया। कॉलेज खत्म किया। फिर एक साल एनडीटीवी में काम किया। वहां एक हेल्थ शो लिखता था मैं। नॉन-फिक्शन काम में मजा नहीं आया, बॉम्बे आ गया। कुछ दोस्त आ रहे थे। उनके साथ आ गया। कुछ दिन असिस्टेंट डायरेक्शन किया। उसमें लगा कि यार ये काम मेरी सर्वश्रेष्ठ कोशिश नहीं है। .. फिर लिखने का मन था। कि यार लिख सकता हूं कोई कहानी। कहानियों के प्रति एक रूझान रहा है। लिट्रेचर का स्टूडेंट रहा हूं। तो उस तरीके से एक झुकाव था लिखने पे। मेरे पास ऐसा कोई भारी कारण नहीं है कि मैं क्यों लिख रहा हूं और न मैं सोचता हूं इस तरीके से। मुझे कतई नहीं लगता कि बड़ा भारी काम आप कर रहे हैं फिल्में बनाके। इससे बेहतर और जरूरी काम भी हैं दुनिया में। अभी मेरी किसी से यही बात हो रही थी कि इतना घमंड और इतना इतराना, ये किस बात का? आप पेट्रोल नहीं पैदा कर रहे न। स्टील नहीं बना रहे। देश आप पर निर्भर नहीं है। आप अच्छे समय के दोस्त हैं। आप लेजर (आनंद, विलासिता) बिजनेस में हैं। जब लोगों के पेट भरे होंगे, उनको तब आपकी याद आएगी। पहले बंदर नाचता था, भालू नाचता था। अब आप ये करके दिखा दीजिए।

अपने परिवार के बारे में कुछ बताएं। और परवरिश के दौरान की वो चीजें या वाकये जिन्होंने आपको आज ऐसा बनाया?
मैं एकमात्र हूं घर में जो फिल्मों में हूं। बाकी मेरे घर में सारे ही गवर्नमेंट जॉब्स में रहे। मेरे पिताजी उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग में थे। दो साल पहले रिटायर हुए। मेरी मम्मी हाउसवाइफ हैं। मैं सबसे बड़ा हूं बच्चों में, उसके बाद एक बहन है और एक भाई है। बहन मेरी सिंगापुर में सेटल्ड है और भाई इंजीनियर है। और आप यकीन जानिए ग्रैजुएशन सैकेंड ईयर तक मैं यूपीएससी की तैयारी कर रहा था। पर उस दौरान मैं थियेटर भी करने लगा था। किरोड़ीमल कॉलेज में जहां से मैंने अपना ग्रैजुएशन किया। वहां उनका थियेटर ग्रुप था द प्लेयर्स। एमेच्योर लेवल का ग्रुप है ये। प्रफेशनल नाटक नहीं होते। पर वो तीन साल मेरी जिंदगी के निर्णायक बिंदु हैं। वहां पर जाकर बहुत सीखा। वहां स्टाफ एडवाइजर थे केवल अरोड़ा। उन्होंने द प्लेयर्स के सारे ही लोगों की जिंदगी को बहुत प्रभावित किया। उससे पहले लखनऊ में ही मैंने स्कूलिंग की थी। पर वहां आकर के... वो आपको ये नहीं बताते कि कैसे बेहतर एक्टर बन जाएं या कैसे बेहतर राइटर बन जाएं या कैसे बेहतर स्टेज डायरेक्टर बन जाएं लेकिन एक बेहतर इंसान बनना, एक बेहतर सोच आना वो उस संस्था ने जरूर सिखाया। हम सभी को। राजशेखर जो हमारी फिल्म के गीतकार हैं, वो भी वहीं से हैं। और काफी लोग हैं। विजय कृष्ण आचार्य वहीं से हैं। कबीर खान जो हैं, वो वही से हैं। तो बहुत कमाल के वो तीन साल गुजरे मेरे। और उसमें काफी कुछ बदला। उससे पहले निश्चित तौर पर एक जबान, एक लहजा, स्मॉल टाउन की तमीज़ लखनऊ से ही आई। उस सिटी का बहुत एहसानमंद हूं।

बचपन में आप क्या पढ़ते थे? लिट्रेचर, कॉमिक्स? मम्मी या दादी-नाना कुछ कहानी सुनाते थे?
हम लखनऊ में रहते थे। मेरे दादा-दादी, मतलब मेरे पिताजी दिल्ली से हैं। मम्मी मेरठ से हैं। हम मई-जून की छुट्टियों में वहां जाया करते थे। कॉमिक मैंने बहुत पढ़ी। हिंदी कॉमिक्स मतलब ध्रुव, नागराज, चाचा चौधरी उसे पढ़ने के लिए मैं बहुत पिटा हूं। और उस समय यकीन जानिए सपने में भी नहीं था कि फिल्म्स या फिल्म राइटिंग या फिल्म डायरेक्शन या इस तरीके के क्षेत्र में जाना कुछ नहीं था। मुझे लगता है कि आज के दौर में इतने एवेन्यूज यंग जेनरेशन को पता हैं पर तब 90 के दशक में डॉक्टर, इंजीनियर और यूपीएससी के अलावा क्या होता था? मसलन, जर्नलिज्म को ही ले लीजिए। कौन बोलता था कि मैं जर्नलिस्ट बनना चाहता हूं? ये इतने सारे विकल्प, एवेन्यूज बहुत बाद की बातें हैं।

अवचेतन (सब-कॉन्शियस) में आप वो जो कॉमिक्स बचपन में पढ़ते थे, आज जब लिखने बैठते हैं तो बहुत हेल्प होती है। कि अंततः ऐसे ही आप रच पाते हैं चीजें। इतना सब पढ़ा है, वो न पढ़ा होता तो शायद न लिख पाते।
हां, आई एम श्योर। सब-कॉन्शियस लेवल पर ऐसा जरूर होगा। लेकिन मैंने कभी इस पर ध्यान नहीं दिया कि मैं किन कारणों से ऐसा कर पा रहा हूं या नहीं कर पा रहा हूं। मुझे लगता है कि एक किस्सागोई वाली जो बात होती है वो उत्तर प्रदेश में आपको दिख जाएगी। टोटैलिटी में आप कह सकते हैं कि यूपी का आदमी बड़ा आलसी होता है और बातों में बड़ा मजा आता है उसे।

प्रतिभाशाली भी होते हैं।
बस वो थोड़े मेहनती हो जाएं तो बहुत अच्छा होगा। मैं उस मामले में टिपिकल यूपी से ही बिलॉन्ग करता हूं। खासा आलसी इंसान हूं। पर हां, वो किस्सागोई की बात होती हैं न कि बैठे हैं चाय पी रहे हैं और सरकारें बन गईं, सरकारें गिर गईं बातों में हीं।

आपको लेकर माता-पिता के कुछ सपने थे जो फिल्मों में आने से टूटे? और जब फिल्मों में आने का उन्हें कहा तो उनकी प्रतिक्रिया क्या थी?
सारे ही लोग चाहते थे कि यूपीएसी दो और यूपीएससी तुम्हे सीरियसली करना चाहिए। पर मेरे पिताजी काफी लिबरल टाइप के आदमी हैं। बहुत सज्जन इंसान हैं, बहुत पेशेंट हैं। उन्होंने मेरे को एक ही बात बोली थी जो बहुत सही थी कि देखो बेटा तुम लाइफ में जो कर रहे हो, ठीक है कर लो। तुम्हारी अपनी सोच है। पर बात ये है कि कल को अगर फिल्म इंडस्ट्री में जाकर के तुम बहुत नाम कमाओ और अवॉर्ड मिले तुम्हे तो तुम स्टेज पर मेरा नाम मत लेना। पर अगर तुम भीख मांग रहे हुए वहां वीटी स्टेशन पे तो भी मेरा मत लेना। तब ये न बोलना कि यार पिताजी आप तो उमर में बड़े थे, आपको समझाना चाहिए था। अपनी फेलियर के भी तुम जिम्मेदार होगे, अपनी सक्सेस के भी तुम्ही होगे। बाकी जो मन लगे तुम समझदार हो, जो करना है करो।

मां ने कुछ नहीं कहा?
मम्मी का इतना कोई विरोध नहीं रहा।

आप लखनऊ में थे, दिल्ली में थे, फिल्में देखते थे, बाहर से जो सम्मोहन होता था, आज अंदर आने के बाद और फिल्ममेकिंग की मशीनी प्रक्रिया से गुजरने के बाद क्या वो सम्मोहन आज भी बना हुआ है? या अब थोड़ी सी सामान्य हो गई है चीजें?
मुझे बड़ा मजा आता था गोविंदा की फिल्में देखने में। और यश जी की फिल्में देखने में। मैं दीवारजैसी फिल्म, ‘शोलेजैसी फिल्म या जो सुभाष घई का सिनेमा हुआ करता था उन पर पलता था। राम लखनऔर कालीचरण। मतलब मुझे ये हाइप वाले ड्रामा बड़ा मजा देते थे। पर ऐसा नहीं था कि मैं ये करना चाहता हूं। मुझे मजा आ रहा है देखने में हां ठीक है, बाकी काम तो आपको अपना कुछ करना ही होगा जीवन में। तब कभी दिमाग में भी नहीं था कि फिल्म्स बनाएंगे, फिल्म्स लिखेंगे या फिल्म्स में काम करेंगे। और अभी भी आप यकीन जानिए मैं इस जगह को (मुंबई फिल्म उद्योग) को उस तरह बिलॉन्ग भी नहीं करता। बड़ा सेक्लूजन टाइप है। मतलब अभी भी मेरे वही दोस्त हैं जो कॉलेज के टाइम से हुआ करते थे। अभी भी मेरा कोई नया सर्किट यहां बना नहीं है। अपना जो समझ में आता है, जो बातों में लगता है, एक-दूसरे से जो कहानी कहने में मजा आता है, बस उसी पे काम कर रहा हूं मैं और वही लिखता हूं। बाकी मुझे लगता है ये बड़ा ... क्या कहेंगे उसे, नकली शायद ज्यादा सख्त शब्द हो जाए, पर बड़ा भ्रम है जी ये बहुत सारा। आप चाहें तो दिन की तीन फिल्मी पार्टी रोजमर्रा के हिसाब से जा सकते हैं पर बात ये है कि आपको कहना है ये काम? मतलब आप वहां जाएं, हंसें, बोलें लेकिन कुछ अर्थ बनानी चाहिए चीजें। अभी भी जो गैदरिंग का सेंस है वो पुराने दोस्तों के साथ बैठना, बातें करना, चाय पीना उसी से आता है। मैं काफी संतुष्ट हूं। ऐसी कोई ख्वाहिश नहीं है मेरी। कि अरे ये दुनिया कुछ उस तरह से एक्सप्लोर की जाए।

फिल्में बनाने वाले लोग मुंबई में रहते हैं, महानगरीय जीवन-शैली उनकी होती है लेकिन प्रेरणा जो उनकी होती है वो छोटे शहरों से आती है। ऐसा क्यों होता है? और आप शायद मुंबई में पले-बढ़े होते तो ऐसी चीज (तनु मनु, रांझणा) शायद दे ही नहीं पाते।
बिलकुल। लेकिन तब शायद मैं कोई और कहानियां दे रहा होता। आप देखिए, यहीं पर छोटे शहरों की कहानियां भी बन रही हैं और बड़े शहरों की भी कहानियां बन रही हैं। आप जोया अख्तर का काम देखिए। बहुत अच्छा काम है उनका। चाहे उनकी पिछली फिल्म जिंदगी न मिलेगी दोबाराहो या अब दिल धड़कने दो। अब जोया जहां से आती हैं, उनको वही दुनिया पता है। वो गर्मी की छुट्टियों में स्पेन ही जाती थीं। हम मेरठ जाते थे। आप मेरठ को ज्यादा बेहतर समझते होंगे। वो पैरिस, स्पेन और रोम को ज्यादा बेहतर समझती हैं। तो वो ईमानदारी से वहां की दुनिया पेश कर रही हैं। हम ये बात बता देते हैं कि यार मेरठ में लड़का ऐसे बोलता है और इन-इन चीजों से गुजरता है। सो सबकी अलग दुनिया है। बहुत सारी कहानियां हैं इस दुनिया में तो। कोई कहीं की सुनाता है, कोई कहीं की।

आप आने वाले समय में निर्देशन भी करना चाहते हैं तो ये अर्बन, एलिटिस्ट कहानियों में आपकी रुचि है।
अच्छी कहानी में हमेशा इंट्रेस्ट रहेगा। अच्छी कहानी चाहे किसी भी दुनिया से आए आपको मजा आता है। जरूरी थोड़े ही है कि आप उस दुनिया को जानें। बैटमैन को कोई जानता थोड़े ही है या किसी का दोस्त बैटमैन है। पर मजा आता है। तो किसी भी दुनिया की कहानी हो, अच्छे तरीके से पेश की जाएगी तो क्यों नहीं मजा आएगा। आगे कोई एक अर्बन सेटअप में कहानी समझ आती है तो मैं बिलकुल लिखूंगा। बिलकुल उसको डायरेक्ट करना चाहूंगा। पर अभी जिस कहानी पर मैं काम कर रहा हूं और जो मैंने सोचा कि इससे डायरेक्शन शुरू करूंगा वो लखनऊ में सेट है। क्योंकि वो दुनिया मुझे ज्यादा करीब की जान पड़ती है।

क्या फिल्में समाज पर असर डालती हैं? अच्छा या बुरा?
मुझे लगता है इतना बड़ा कुछ है नहीं फिल्म कि समाज बदलने की ताकत रखे। ऐसा कुछ नहीं है। मुझे नहीं जान पड़ता है। हां बाकी ये जरूर है कि एक तरह का प्रतिबिंब जरूर होता है। आप किसी भी एक देश के समकालीन समय की फिल्म देखकर के उस समय की सेंसेबिलिटी जरूर समझ सकते हैं। हम सब अपने समय की ही उपज हैं। ऐसा तो है नहीं कि फिल्म देखने वाले अलग दुनिया से आ रहे हैं और बनाने वाले अलग दुनिया से। आ तो सब एक ही दुनिया से रहे हैं। तो उन मेकर्स की सेंसेबिलिटीज या बेचैनी कह लीजिए या उनकी चिंता कह लीजिए, या उनकी समझ कह लीजिए या नजरिया कह लीजिए। वो आपको जरूर समझ में आता है उस वक्त का। उस वक्त का एथोज समझ में आ जाता है उस वक्त की कहानियां देखकर के। इसीलिए सत्तर में दीवारजैसी कहानियां बनती हैं। एक गैंग्स्टर का ग्लोरिफिकेशन दिखता है। या एक स्मगलर का। क्योंकि वो एक फेज था। हम आजादी के बाद डिसइल्यूज़न्ड (मोहभंग) थे। क्योंकि हमें नहीं समझ आ रहा था। हमें लगा था कि आजादी के बाद सबके पेट भरे होंगे। जैसे कुछ चमत्कार हो जाएगा। पर कुछ नहीं हुआ और वो 20 साल में समझ आने लगा। गोरे साहब की जगह भूरे साहब आ गए। वो फिल्मों में झलकने लगा। आज जितनी फिल्में आ रही हैं उससे आपको आज के समय की समझ मिल सकती है। सामाजिक, राजनीतिक समझ। मुझे नहीं लगता कि ये इतना भारी काम है कि कोई फिल्म आकर सामाजिक परिवर्तन ला सके। और एक बात बताऊं इतना कोई बेहतरीन काम भी नहीं हो रहा। ऐसा नहीं है कि पिछले हफ्ते मुगलेआजमआई और अगले हफ्ते कैसेब्लांकाआ जाएगी। ऐसा नहीं है। बहुत ही औसत काम हो रहा है इंडस्ट्री में। पर बात ये है कि हम इतने वक्त से बिरियानी के पैसे लेकर के खिचड़ी खिला रहे हैं न लोगों को कि हल्का सा एक पुलाव भी बड़ा खुश कर जाता है। आप सोचिए कितना सस्ता वर्ड हो गया है ...कल्ट क्लासिक। अरे ये फिल्म तो कल्ट है। अच्छा? अगले फ्राइडे फिर एक कल्ट आ जाएगी। तो ये तो हालत हो गई है। और ये मैं अपने को सबसे पहले गिनकर बोल रहा हूं। मैं भी कोई बड़ा भारी ऐसा काम नहीं कर पा रहा कि दुनिया को लगे भई इन्होंने तो कुछ बड़ा बदल दिया। कुछ नहीं है, सब औसत काम कर रहे है। जिसको जो समझ में आ रहा है, कर रहा है। बस। मुझे नहीं लगता कि एक भी शख्स ऐसा है जो पेज टर्निंग वाला काम कर रहा है कि अरे ऐतिहासिक है ये।

लेखक पैदा होते हैं कि बनते हैं?
मुझे लगता है कि तीन फिल्में लिखकर के इसका जवाब देना बड़ा कठिन है। तीन ही हैं आखिरकार। मेरा कोई ऐसा बॉडी ऑफ वर्क नहीं है कि मैं अपनी एक एकेडेमिक समझ बना पाऊं।

टैरेंस मलिक ने तो पांच बनाई हैं चालीस साल में।
वो है, वो है, पर मुझे नहीं लगता कि अभी मैं उस स्थान पर हूं। मैं खुद अभी बहुत चीजों से जूझ रहा हूं। मैं खुद अपने ही काम से कई बार बोर हो जाता हूं। मुझे लगता है वही दुनिया, वही एक से सीन, वही सोच, वही अप्रोच.. कुछ बदलना चाहिए। मैं अभी अपने काम को लेकर बड़ा चिंतित रहता हूं कि कुछ ऐसा हो पाए कि यार किसी और को बाद में लगे खुद को लगे कि कुछ हुआ। तो अभी मैं अपने जीवन और करियर में इन बातों पर ध्यान लगा रहा हूं। बाकी तो ये बड़े बुढ़ापे के सवाल हैं। कि राइटर पैदा होता है कि बनता है। ठीक है साब, दस हजार काम होते हैं तो एक राइटर भी होता है।

आप अखबार पढ़ते होंगे। ऑनलाइन देखते होंगे। जितनी भी खबरें आती हैं। मसलन, दिल्ली के चिड़ियाघर में बाघ के पिंजरे में एक युवक के गिरने की घटना है, उसके हाथ जोड़ने की तस्वीर है, आईएसआईएस के रोज आने वाले बिहैडिंग के वीडियो हैं, धर्मांधता है, सेंसर बोर्ड है या नेट न्यूट्रैलिटी है। जब इन्हें देखते हैं तो आपके अंदर का लेखक कितनी जल्दी सक्रिय हो जाता है?
नहीं वो लेखक से उतना लेना-देना नहीं है। देश के नागरिक या मानव के तौर पर देखते हैं। उस पर विचार करते हैं। वो बहुत ह्यूमेन ग्राउंड पर असर डालता है। राइटर बाद में आता है। दुनिया ऐसे तो नहीं जी जा सकती कि कोई आपसे अपना दुख-दर्द बांट रहा है और आप अचानक से बोलें कि यार ये तो बड़ी अच्छी कहानी है। पहला रिएक्शन तो यही होता है कि सब ठीक हो जाएगा, तू चिंता मत कर भाई। तो मेरा तो वही रहता है बाकी कुछ कहानियां हैं तो अगले पांच साल तक मुझे बिजी रखने के काबिल हैं। तो अभी तो डरा हुआ नहीं हूं इतना। कहानी का उतना कोई अभाव नहीं है। जब होगा तब पेपरों को उस तरीके से पढ़ना शुरू किया जाएगा।

क्या आप अपने साथ डायरी रखते हैं, नोट लेने या अनुभव लिखने करने के लिए?
काश ये काम मुझे आते। काश मैं इतना सीरियसली अपने काम को ले रहा होता। मैंने तो आपको बोला न, खासा लेजी राइटर हूं और खासा लेजी इंसान हूं। अपना बिस्तर, अपना सोफा, अपनी चाय, अपनी खिड़की, अपनी एक गजल बड़े गुलाम अली साहब की.. उसमें मैं बड़ा खुश रहता हूं। लिखाई मेरे दिमाग में तब शुरू होती है जब मुझे लगता है कि भाई अब आनंद राय मतलब मर जाएगा अगर नहीं दिया कुछ तो। तो मैं तभी उठता हूं। पर हर फिल्म के दौरान भी लिख ही रहा होता हूं और हर फिल्म के अंत में ये वादा करता हूं खुद से और आनंद राय से कि खबरदार जो आज के बाद तुमने मुझे इस तरह पुश किया तो। अब मैं स्क्रिप्ट खत्म करूंगा और तभी तुम बनाना। तो मैं चाहता हूं कि थोड़ा अनुशासन हो राइटिंग में। मुझे लगता है उस अनुशासन की कमी ही मुझे मार रही है बहुत-बहुत वक्त से। और.. मेरा एडिटर भी यही बोलता है कि हिमांशु मुझे तुम्हारा टैलेंट नहीं चाहिए मुझे तुम्हारी मेहनत चाहिए। मैं थोड़ा कम मेहनती इंसान हूं।

राइटर्स ब्लॉक (रचनात्मक गतिरोध) आता है तो क्या करते हैं?
आता है। कई बार आप दीवार से सिर मारते रहिए। एक जगह अगर आपका चरित्र अटक गया तो अटक गया। और ये जो बातें होती हैं न जो आपने भी सुनी होंगी और मैंने भी सुनी कि इस दुनिया में आ जाइए फिर आपको चरित्र बताएगा कि उसको कहां जाना है। कोई किरदार आपको नहीं बताएगा। वो वहीं साला खड़ा रहेगा जहां पर आपने उसे छोड़ा है। आप ही को ले जाना हैं जहां उसे ले जाना चाहते हैं। वो खुद कुछ नहीं करेगा। लेकिन राइटर्स ब्लॉक बड़ा जरूरी होता है। जब तक आप उस डेड एंड पर जाकर नहीं खड़े होंगे कि जहां पर आपको लगे कि यार अब यहां से कहां निकलूं। अब वापस भागूं या इस दीवार को तोड़ कर के आगे बढ़ूं या साइड में भग जाऊं। जितना तकलीफ वो आपको देगा, उतना ही मजा आपकी स्क्रिप्ट में झलकेगा। अगर आप उस ब्लॉक तक पहुंचे हैं तो आपके साथ ऑडियंस भी तो पहुंचेगी ? मैं हमेशा कहता हूं जब फाइनली आप चंदन (सिनेमा, मुंबई) में फिल्म देखते हैं न, एक सिंगलप्लेक्स में, आपको वहां जाकर समझ आता है कि जो लोग बैठकर फिल्म देख रहे हैं वे ज्यादा बेहतर लेखक, एडिटर और निर्देशक हैं। वे आपको बताएंगे। परदे पर सीन देखकर लगता है कि ओ शिट, ये सीन न तीस सेकेंड पहले कट जाना चाहिए था। या ये लाइन मेरी वर्क नहीं कर रही है यहां जो मुझे लग रहा था करेगी। आप अपना काम थियेटर में देखिए, सारी गलतफहमियां, सारे मुगालते दो मिनट नहीं लगते दूर होने में। जब पीछे से आवाज आती है न रील नंबर छह पे नहीं सात पे थी, अबे आगे बढ़ाओ”, आपको समझ में आ जाता है सारा मामला। ये जो टर्म हैं न, पब्लिक..। पब्लिक कुछ नहीं होती। आप उन्हीं का हिस्सा हैं। जब आप ट्रैफिक में होते हैं आपको लगता है न कितना ट्रैफिक है। लेकिन आपकी साइड वाली के लिए आप ट्रैफिक हैं।

फिल्म एडिट करते समय या हर डिपार्टमेंट द्वारा काम करते समय निर्देशक या निर्माता बताता है कि हमें ये उस दर्शक को लक्ष्य करके तैयार करना है। जबकि वो दर्शक कभी किसी को मिला ही नहीं, उसे किसी ने देखा ही नहीं है। न जाने कौन सा दर्शक, कहां, किस जेहनियत के साथ, किस मानसिक अवस्था, कितने ज्ञान के साथ क्या पसंद करेगा। तो उसे ढूंढ़ पाना या उसे लेकर एक मैच्योर जगह पहुंच पाना ये कभी हो नहीं पाया। लिखते समय क्या आप उस दर्शक को ढूंढ़ पाए हैं?
नहीं, बिलकुल नहीं। और उस पर ज्यादा सोच लगानी भी नहीं चाहिए। आप वही काम कर सकते हैं जो आपको आता है। ऐसा तो नहीं है न कि किसी एक फिल्म को लिखने के लिए मैं राजकुमार हीरानी से गुद्दी उधार ले सकता हूं? अगर ले सकता तो ले लेता। आप काम वही करेंगे जो आपको आता है, जो आपकी गुद्दी आपको बताएगी, जो आपका विवेक आपको बताएगा, जो आपका दिल आपको कहेगा। आप जितनी ईमानदारी से वो अटेंप्ट कर सकें आप बस वो करें। आप मेहनत करने की कोशिश करें। ईमानदार रहें। आप झूठ न बोलें। न खुद से न किसी और से। आप वो काम करें जो आपको अच्छा लगता है। क्योंकि आपको अच्छा लगेगा न तो हो सकता है चार-पांच और लोगों को अच्छा लगे। अगर आप ज्यादा चतुर बनेंगे तो वो जो तीन-चार लोगों को पसंद आने की गुंजाइश थी वो भी खत्म समझो। आप वो लिखिए जो आपको लिखने का मन है, बाकी आपके पास चारा क्या है। कम से कम वो तो तमीज से लिख दीजिए।

वो स्क्रिप्ट जो आपको बेदाग़ लगती हैं?
दीवार। सलीम-जावेद साहब का जितना भी काम है वो। वो बहुत पके हुए और पुख़्ता राइटर्स हैं। उनका सेंस ऑफ ड्रामा, स्टोरी, कैरेक्टर। दीवारवॉटरटाइट है। उसमें से एक सीन भी हटाना... मतलब सीन हटाना तो बहुत बड़ी बात है, मुझे नहीं लगता कि उसे आप किसी तरीके से भी बदल सकते हैं। असंभव है। आप उसमें से कोई भी सीन हटाकर देखें। कुछ मिस कर देंगे आप। उसके परे मुझे कुछ नहीं दिखता। हिंदी सिनेमा में ऐतिहासिक स्क्रीनप्ले का उदाहरण है दीवार। टॉम स्टॉपार्ड ने एक स्क्रिप्ट लिखी थी जिस पर फिल्म बनी शेक्सपीयर इन लव’ (1998)। वो भी वॉटरटाइट स्क्रीनप्ले था। विदेशी में ये कमाल लगती है।

आकांक्षी फिल्म राइटर्स के लिए वो नियम जो उन्हें अपनी राइटिंग टेबल के आगे चिपकाने चाहिए।
सबसे पहले तो वो टेबल पर बैठें, क्योंकि मैं तो टेबल पर भी नहीं बैठ रहा। और दूसरी चीज, मुझे लगता है ईमानदारी। आप पूरी ईमानदारी से सही, गलत, अच्छा, बुरा, गुड-बैड-अग्ली जो भी आता है आप ईमानदारी से कह दें। ये एकमात्र चीज है जिसका मैं पालन करता हूं।

फिल्म राइटर बनने के लिए फिल्म स्कूल जाना जरूरी है?
मैं तो नहीं गया हूं। पर.. जाना चाहिए, यकीन है कुछ रोचक ही सीखने को मिलता होगा वहां।

इस साल की कोई उत्साहित करने वाली फिल्म देखी है? समकालीन लेखकों में कौन अच्छे लगते हैं?
मुझे कमाल की लगी बदलापुर। इस साल मैं ज्यादा फिल्में नहीं देख पाया पर बदलापुरमुझे आउटस्टैंडिंग फिल्म लगी। और बहुत अच्छी राइटिंग लगी उसकी। वैसे भी मुझे श्रीराम सर का काम हमेशा ही अच्छा लगा है। मैंने उन्हें काफी लंबा मैसेज भी किया। और जैसे वो हैं, उन्होंने एक लाइन में उत्तर दिया, ‘थैंक यू हिमांशु

आने वाली फिल्में कौन सी हैं। आनंद राय के साथ ही हैं?
जी, आनंद के साथ ही है। मैं अगली फिल्म भी आनंद के लिए ही लिख रहा हूं। और एक स्क्रिप्ट है जिस पर मैं अपने लिए काम कर रहा हूं। ये दो ही हैं अभी।

आनंद के साथ फिल्म किस श्रेणी यानी जॉनर की है?
रोमैंटिक ड्रामा है। जिसमें वे काफी अच्छे हैं। मैं भी अभी उसी में ही ऑपरेट कर रहा हूं।

एक फिल्म आपकी सलमान के साथ भी है?
हम उनसे मिले। बहुत मजेदार रही मुलाकात। देख रहे हैं अभी वो बहुत बिजी हैं, उनके कमिटमेंट।

जिंदगी का फलसफा क्या है? जो निराशा में भी उठ खड़ा होने और आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है?
जिंदगी चरणों में आती है। और अच्छा टाइम नहीं रुकता तो बुरा क्यों रुकेगा। जूझना चाहिए। आप इसीलिए पैदा हुए हैं कि चीजों से जूझें।

जब आप फिल्मों में आना चाहते थे तो न जाने कितने किस्से थे जो आपको कहने थे, न जाने कितनी फिल्में आपको बनानी थी, अब जब आ गए हैं तो ऐसा नहीं लगता एकदम खाली हो गए हैं?
ये मेरी लाइफ में सबसे बड़ा डर है यकीन जानिए। ये कि एक दिन मैं सोकर उठूंगा और मेरे पास कोई कहानी नहीं होगी। कि आप खाली हो गए। और जब आप खाली हो जाएं न, तो बेहतर है चुप बैठें। बेकार में कहानियां न सुनाएं। बाकी ऐसी कोई दिक्कत नहीं है, लखनऊ में घर है अच्छा और शहर बहुत पसंद आता है। जहां से आए हैं वापस लौट जाएंगे। कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन अभी तीन-चार कहानियां हैं जो पांच-छह साल तो बिजी रख देंगी। उनको लेकर मैं एक्साइटेड हूं, मुझे अच्छा लग रहा है उनके बारे में सोचकर के।

राइटर्स में आपके ऑलटाइम फेवरेट कौन हैं?
हिंदी साहित्य का स्टूडेंट रहा हूं। प्रेमचंद को बहुत पढ़ा मैंने। भारतीय लेखकों में मुझे निर्मल वर्मा बहुत पसंद हैं। धर्मवीर भारती बहुत पसंद हैं और उनकी गुनाहों का देवताजो है उसका बहुत ज्यादा प्रभाव रहा मुझ पर। बाकी आजकल एक बहुत धमाल किताब फ्रीडम एट मिडनाइट’ (1975) पढ़ रहा हूं। ज्यादा पढ़ नहीं पा रहा लेकिन सोचा हुआ है पढ़ाई करनी है फिर से लगकर। वापस दिल्ली यूनिवर्सिटी मोड में आने का विचार है मेरा।


Himanshu Sharma is a young film writer from India. He's from Lucknow, at present based in Mumbai. He's written three successful Hindi films so far - Tanu Weds Manu (2011), Ranjhanaa (2013), Tanu Weds Manu Returns (2015). The last one released on May 22 this year. For all the three films he has collaborated with director Anand Rai. He's writing two more scripts at the moment. One of them will be directed by Rai and the other one will be his directorial debut. Both will be romantic dramas situated in Lucknow.
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