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Saturday, August 1, 2015

दरअसल : कास्टिंग के बदलते तरीके



Jul 10




-अजय ब्रह्मात्मज
पिछले दिनों आमिर खान ने अपने होम प्रोडक्शन की आगामी फ़िल्म के लिए सोशल मीडिया पर जानकारी दी कि उन्हें 12 से 17 साल की उम्र के बीच की एक लड़की चाहिए,जो गा भी सकती हो। उन्हें रोज़ाना हज़ारों की तादाद में वीडियो मिल रहे हैं। उन्होंने सभी से वीडियो ही मंगवायें हैं। कहना मुश्किल है कि इस तरीके से उनकी फ़िल्म की कास्टिंग का काम आसान होगा या काम बढ़ जायेगा? विकल्प ज्यादा हों तो चुनाव कठिन हो जाता है। इन दिनों आये दिन फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया साइट पर फिल्मों के लिए उपयुक्त कलाकारों की खोज जारी है। कुछ कलाकारों को काम भी मिल रहा है। मुख्य भूमिकाओं के लिए अवश्य निर्देशक के दिमाग में पॉपुलर स्टार या परिचित एक्टर रहते हैं। बाकी  सहयोगी भूमिकाओं के लिए अब पहले की तरह चाँद कलाकारों में से चुनाव नहीं करना पड़ता।
दस साल पहले की फिल्मों को देखें तो स्पष्ट पता चलता है और फ़र्क़ दीखता है।पहले की फिल्मों में किरदारों के लिए कलाकार सुनिःचित से हो गए थे।मसलन पुलिस इंस्पेक्टर के रूप में इफ्तखार का आना। माँ हैं तो निरुपा राय ही दिखेंगी। ऐसे ही दोस्त,मां,चाचा और बाकी किरदारों के लिए भी कलाकार तय रहते थे। इस परंपरा के अपने लॉजिक थे। पुराने निर्देशक बताते हैं कि कलाकारों से किरदारों को तुरंत पहचान मिल जाती थी। उन किरदारों को स्थापित करने के लिए दृश्यों की ज़रुरत नहीं पड़ती थी। उनकी बात में सच्चाई दिखती है। हम प्राण या नासिर हुसैन को देखते ही अनुमान लगा लेते थे कि कैसा पिता होगा। यह बात पहले के स्टारों के साथ भी जुडी थी। सभी की अलग इमेज होती थी और वे सभी अपनी इमेज से निकलने की कोई कोशिश नहीं करते थे। अभी के स्टार प्रयोगशील हो गए हैं। इसकी एक  बड़ी वजह यही है कि अब उनकी काटिंग की जाती है। उनका ऑडिशन लिया जाता है यानि जांच जाता है क़ि वे रोल में सही लगेंगे या नहीं? फिल्मों के कास्टिंग डायरेक्टर इस काम में डायरेक्टर की मदद करते हैं।
आजकल फिल्मों के पोस्टर में कास्टिंग डायरेक्टर के नाम आने लगे हैं। वे फ़िल्म निर्माण का ज़रोइरि हिस्सा हो गए हैं। पहले भी कलकारों के चुनाव में सावधानी बरती जाती थी,लेकिन निर्देशकों के पास अधिक विकल्प नहीं रहते थे। ज्यादातर परिचित और प्रचलित कलाकारों से ही काम चलाना पड़ता था। कास्टिंग डायरेक्टर द्वारा कलाकारों के चुनाव को प्रक्रिया को समझना रोचक होगा। 'चिल्लर पार्टी' के लिए बाल कलाकारों को चुनने में मुकेश छाबड़ा 9000 बच्चों से मिले। 'दंगल' में आमिर खान की बेटियों की भूमिकाओं के लिए कलाकार फाइनल करने में मुकेश छाबड़ा को 21000 लड़कियों से मिलना पड़ा। मुकेश छाबड़ा ने कास्टिंग के काम को इज़्ज़त दिलवाई और उसे नए मुकाम पर ले आए। उनकी पहल और पहचान से कलाकारों के साथ ही फ़िल्म यूनिट का काम सुगम हुआ है। दर्शकों को फ़िल्म देखते हुए अधिक मज़ा आता है क्योंकि पता नहीं रहता कि कलाकार का क्या व्यवहार रहेगा। उनके अप्रत्याशित व्यवहार चौंकाते हैं। सबसे बड़ी बात कि नए कलाकारों को मौके मिल रहे हैं।पिछले 10 सालों में प्रति फ़िल्म नए कलाकारों की संख्या बढ़ी है।
नए कलाकारों को यह शिकायत हो सकती है कि फिल्मों में उनकी सेल्फ लाइफ कम हो गयी है। पहले पहचान मिलने पर कैरियर सुरक्षित हो जाता था। अभी ऐसा नहीं है। इस परिवर्तन की वजह से अब किरदारों की पहचान कलाकारों पर हावी रहती है। पहले कलाकारों से हम किरदारों को समझ लेते थे। अब ऐसा नहीं हो पता। निर्देशक भी नए किरदार पेश कर रहे हैं। एक तरह से ज़िन्दगी की विविधता फिल्मों में झलक रही है। किरदार एक-दूसरे से अलग हो रहे हैं।
विदेशों में कास्टिंग की लंबी परंपरा रही है। भारत में पहली बार शेख कपूर की फ़िल्म 'बैंडिट क्वीन" के समय कास्टिंग और ऑडिशन जैसे शब्द सुनाई पड़े थे।। उसकी कास्टिंग तिग्मांशु धुलिया ने की थी। तब से एक लम्बे सफ़र के बाद फ़िल्म निर्माण के इस पक्ष पर सभी का ध्यान गया है।

दरअसल : करीना और अभिषेक के 15 साल


-अजय ब्रह्मात्मज
    30 जून 2000 को जेपी दत्ता की फिल्म ‘रिफ्यूजी’ रिलीज हुई थी। 2000 की अनेक बड़ी फिल्मी घटनाओं में यह भी एक महत्वपूर्ण घटना थी। अमिताभ बच्चन-जया भादुड़ी के बेटे अभिषेक बच्चन और रणधीर कपूर-बबीता की बेटी करीना कपूर की जोड़ी एक साथ पर्दे पर आ रही थी। कुछ पाठकों को यह याद होगा कि तब बच्चन परिवार और कपूर परिवार में खास नजदीकी व गर्माहट थी। अभिषेक बच्चन और करिश्मा कपूर के बीच रोमांस चल रहा था। इस रोमांस की पृष्ठभूमि में ‘रिफ्यूजी’ की रिलीज रोचक और रोमांचक हो गई थी। फिल्म स्टारों के बेटे-बेटियों की लांचिंग फिल्मों से इतर जेपी दत्ता ने भिन्न फिल्म बनाने की कोशिश की थी,जिसे उनके शोकेस के तौर पर नहीं पेश किश गया था।
    ‘रिफ्यूजी’ अभिषेक बच्चन और करीना कपूर की यादगार फिल्म है। यादगार सिर्फ इसलिए नहीं है कि यह उन दोनों की पहली फिल्म है। फिल्म में जेपी दत्ता की निर्देशन शैली की अनेक खूबियां हैं। हालंाकि 15 सालों के बाद वे अब पुरानी व गैरजस्री लगती हैं, लेकिन वर्तमान के चलन में हमें अतीत की विशेषताओं को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। सीमित तकनीकी साधनों में ही जेपी दत्ता अपनी फिल्मों में एपिक विजुअल क्रिएट करते थे। उनकी फिल्में हमेशा ‘लार्जर दैन लाइफ’ इफेक्ट देती हैं। पृष्ठभूमि का विस्तार अपनी गहराई के साथ दिखता है। ‘रिफ्यूजी’ में सीमाओं की व्यर्थता का संदेश था। इस फिल्म के लिए लिखा जावेद अख्तर का गीत ‘पंछी नदियां पवन के झोंके ’ सरहद के सिद्धांत का विरोध करती है।
    ‘रिफ्यूजी’ की रिलीज के समय अभिषेक बच्चन पर भारी दवाब था। उनकी तुलना अमिताभ बच्चन से की गई और बाद की फिल्मों में भी उनमें अमिताभ बच्चन की झलक देखी जाती रही। अभिषेक बच्चन में कमियां हो सकती हैं, लेकिन पिता की तरह दिखना या भाव-भंगिमाओं में पिता की झलक देना अत्यंत स्वाभाविक है। नौंवे दशक के बाद आए सभी अभिनेताओं में अमिताभ बच्चन के मैनरिज्म की झलक मिलती है। अभिषेक बच्चन तो उनके बेटे हैं, जो उन्हें पर्दे के साथ घर पर भी देखते हुए बड़े हुए हैं। दरअसल, हम स्टारपुत्रों और पुत्रियों की परख की कसौटी सख्त कर देते हैं। थोड़ी देर के लिए अभिषेक बच्चन को उनके संबंधों से अलग कर देखें तो वे औसत से बेहतर अभिनेता दिखेंगे। 15 सालों के बाद भी उनकी सक्रियता से जाहिर है कि उनमें दम-खम है। बीच-बीच में उन्होंने अपनी प्रतिभा से चौंकाया भी है।
    अभिषेक बच्चन जैसा दवाब करीना कपूर पर नहीं था। उन्हें अपनी बहन करिश्मा कपूर की तरह संघर्ष नहीं करना पड़ा और न ही किसी से उनकी तुलना की गई। करीना कपूर में सहज आत्मविश्वास और नैसर्गिक प्रतिभा है। उन्होंने अपनी दमक और चमक दोनों से प्रभावित किया है। ‘चमेली’, ‘ओमकारा’ और ‘जब वी मेट’ जैसी फिल्मों में उन्होंने साबित किया है कि वह थोड़ा भी ध्यान दें तो उनके काम का गहरा असर होता है। करीना कपूर अपने करियर को लेकर कभी गंभीर नहीं रही हैं। उन्होंने खुद के लिए दिशा और मंजिल नहीं तय की, जब जैसी फिल्में मिलीं, उन्होंने कर लीं। वजहें अलग-अलग रहीं।
    मुझे लगता है कि अभिषेक बच्चन और करीना कपूर दोनों ही अपने करियर के प्रति बेपरवाह रहे। उन्होंने अभिनय को तो गंभीरता से लिया, लेकिन फिल्मों के चुनाव के प्रति गंभीर नहीं रहे। उनकी यह बेपरवाही कई बार पर्दे पर भी नजर आई। अगर दोनों को ढंग के निर्देशक मिले और वे अपने किरदारों को चुनौती के तौर पर लें तो वे ‘गुस्’ और ‘चमेली’ जैसी अनेक फिल्में दे सकते हैं। दोनों करियर और उम्र के खास मोड़ पर हैं।

Thursday, July 30, 2015

फिल्‍म समीक्षा - दृश्‍यम

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
           मलयालम, कन्नड, तेलूगु और तमिल के बाद ‘दृश्यम’ हिंदी में आई है। हिंदी में इसे दृश्य कहा जाएगा। संस्कृत मूल के इस शब्द को ही हिंदी के निर्माता-निर्देशक ने शीर्षक के तौर पर स्वीकार किया। भाषिक मेलजोल और स्वीकृति के लिहाज से यह उल्लेखनीय है। निर्माता ने फिल्म में इसे ‘दृष्यम’ लिखा है। यह गलत तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन हिंदी में प्रचलित नहीं है। इन दिनों अधिकांश निर्माता फिल्मों के पोस्टर हिंदी में लाने में रुचि नहीं लेते। लाते भी हैं तो रिलीज के समय दीवारों पर चिपका देते हैं। तब तक फिल्मों के नाम गलत वर्तनी के साथ पत्र-पत्रिकाओं में छप रहे होते हैं।
              हिंदी में बनी ‘दृश्यम’ में अजय देवगन और तब्बू हैं। दोनों उम्दा कलाकार हैं। तब्बू ने हर बार अपनी अदाकारी से दर्शकों को सम्मोहित किया है। ‘दृश्यम’ में पुलिस अधिकारी और मां की द्विआयामी भूमिका में वह फिर से प्रभावित करती हैं। दृश्यों के अनुसार क्रूरता और ममता व्यक्त करती हैं। अजय देवगन के लिए विजय सलगांवकर की भूमिका निभाने का फैसला आसान नहीं रहा होगा। पिछली कुछ फिल्मों ने उनकी छवि सिंघम की बना दी है। इससे बाहर निकलने पर वे कॉमेडी करते ही नजर आते रहे हैं। एक अंतराल के बाद उन्होंने भावपूर्ण किरदार निभाया है। उनकी अभिनय क्षमता का उपयोग हुआ है। अजय देवगन की आंखों और चाल में खास बात है। वे इनका भरपूर इस्तेमाल करते हैं। इस फिल्म में ही संरक्षक पिता और चालाक व्यक्ति के रूप में वे खुद को अच्छी तरह ढालते हैं। बड़ी बेटी का किरदार निभा रही इशिता दत्ता और छोटी बेटी के रूप में मृणाल जाधव ने दृश्यों के अनुसार नियंत्रित अभिनय किया है। मासूमियत, डर और बालपन को उसने उम्र के अनुरूप निभाया है। फिल्म में नृशंस और क्रूर पुलिस अधिकारी गायतोंडे के किरदार को कमलेश सावंत ने पूरे मनोयोग से निभाया है। फिल्म में कई बार गायतोंडे के व्यवहार पर गुस्सा आता है। 
                मलयालम में ‘दृश्यम’ को फैमिली थ्रिलर कहा गया था। हिंदी में भी इसे यही कहना उचित रहेगा। फिल्म में पर्याप्त थ्रिल और फैमिली वैल्यू की बातें हैं। खासकर मुश्किल और विपरीत स्थितियों में परिवार के सदस्यों की एकजुटता को दर्शाया गया है। स्क्रिप्ट की इस खूबी का श्रेय मूल लेखक जीतू जोसेफ को मिलना चाहिए। इसका हिंदीकरण उपेन्द्र सिध्ये ने किया है। उन्होंने हिंदी दर्शकों की रुचि का ख्याल रखते हुए कुछ तब्दीेलियां की हैं। अच्छी बात है कि निर्देशक निशिकांत कामत फिल्म के हीरो अजय देवगन की लोकप्रिय छवि के दबाव में नहीं आए हैं। यह फिल्म इस वजह से और विश्वसनीय लगने लगती है कि पिछली फिल्मों में दर्जनों से मुकाबला करने वाला एक्टर ऐसा विवश और लाचार भी हो सकता है। विजय सलगांवकर को लेखक-निर्देशक ने आम मध्यवर्गीय परिवार के मुखिया के तौर पर ही पेश किया है। विजय की युक्तियां वाजिब और जरूरी लगती हैं। 
              यह फिल्म मलयालम में रिलीज हुई थी तो तत्कालीन पुलिस अधिकारी सेनुकुमार ने आपत्तियां जताईं थीं। उनके अनुसार इस फिल्म से प्रेरित हत्याओं के अपराध सामने आए थे। इस पर बहस भी चली थी। सवाल है कि क्या ऐसी फिल्में अपराधी प्रवृति के लोगों को आयडिया देती हैं या इन्हें सिर्फ पर्दे पर चल रही काल्पनिक कथा ही समझें? अपराध हो जाने की स्थिति में सामान्य नागरिक मुश्किलों से बचने के लिए क्या कदम उठाएं? क्या परिवार को बचाने के लिए कानून को धोखा देना उचित है? ऐसी फिल्में एक स्तर पर पारिवारिकता को अपराध के सामने खड़ी करती हैं और पारिवारिकता के नाम पर सराहना भी बटोरती हैं। ऐसा भी तो हो सकता था कि पुलिस रिपोर्ट के बाद बेटी को अपराध मुक्त कर दिया जाता। यह फिल्म अमीर और संपन्न परिवारों की बिगड़ती संतानों की झलक भर देती है। वजह के विस्तार में नहीं जाती। यह फिल्म का उद्देश्य नहीं था, लेकिन चलत-चलते इस पर बातें हो सकती थीं। ‘दृश्यम’ अजय देवगन और तब्बू् की अदाकारी के लिए दर्शनीय है। 
अवधिः 163 मिनट
स्‍टार- *** तीन स्‍टार

Thursday, July 23, 2015

फिल्‍म समीक्षा : मसान

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
        बनारस इन दिनों चर्चा में है। हिंदी फिल्मों में आरंभ से ही बनारस की छवियां भिन्न रूपों में दिखती रही हैं। बनारस का आध्यात्मिक रहस्य पूरी दुनिया को आकर्षित करता रहा है। बनारस की हवा में घुली मौज-मस्ती के किस्से यहां की गलियों और गालियों की तरह नॉस्टैलजिक असर करती हैं। बनारस की चर्चा में कहीं न कहीं शहर से अनजान प्रेमी उसकी जड़ता पर जोर देते हैं। उनके विवरण से लगता है कि बनारस विकास के इस ग्लोबल दौर में ठिठका खड़ा है। यहां के लोग अभी तक ‘रांड सांढ सीढी संन्यासी, इनसे बचो तो सेवो कासी’ की लोकोक्ति को चरितार्थ कर रहे हैं। सच्चाई यह है कि बनारस भी समय के साथ चल रहा है। देश के वर्त्तमान प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र है बनारस। हर अर्थ में आधुनिक और समकालीन। प्राचीनता और आध्यात्मिकता इसकी रगों में है। 
           नीरज घेवन की ‘मसान’ इन धारणाओं को फिल्म के पहले फ्रेम में तोड़ देती है। इस फिल्मा के जरिए हम देवी, दीपक, पाठक, शालू, रामधारी और झोंटा से परिचित होते हैं। जिंदगी की कगार पर चल रहे ये सभी चरित्र अपनी भावनाओं और उद्वेलनों से शहर की जातीय, लैंगिक और आर्थिक असमानताओं को व्यक्त करते हैं। लेखक वरुण ग्रोवर और निर्देशक नीरज घेवन ने बड़े यत्न से इन किरदारों को रूप और आकार दिया है। किसी भी किरदार के साथ उनकी अतिरिक्त संलिप्तता नहीं है। ‘मसान’ हिंदी फिल्मों की नायक-नायिका की रुढि को तोड़ती है। यहां सभी किरदार प्रमुख हैं। अपने संदर्भ में उनकी स्वकतं इयत्ता है। आरंभिक सीन में ही डर से आत्महत्या कर लेने वाला पियूष भी इस नरेटिव का जरूरी हिस्सा है। न होकर भी वह फिल्म में मौजूद रहता है। ‘मसान’ का शिल्प पारंपरिक नहीं है। फिल्म पंडितों का दोष नजर आ सकता है, लेकिन यही इसकी खूबी है। कथा का नया विधान नए शिल्प से ही संप्रेषित हो सकता था।
             देवी इस फिल्म की जिद्दी और जीवित धुन है। वह आजाद खयाल और असीमित ख्वाबों की लड़की है। इंटरनेट ने उसे दुनिया से जोड़ रखा है। बगैर मां के पिता के साथ रह रही देवी की जिज्ञासाएं शारीरिक भी हैं। वह इसी प्रयत्न में पकड़ी जाती है। पुलिस अधिकारी कमाई के लिए ‘सेक्स स्कैंडल’ का सफल प्रपंच रचता है। बाप-बेटी को वह सामाजिक लांछन के खौफ में लपेट देता है। देवी इस प्रसंग से ग्लानि में है, लेकिन उसे अपने किए का कोई पछतावा नहीं है। वह मानती है कि उसने कुछ भी गलत नहीं किया है। हां, उसे पियूष के पिता का भी खयाल है। वह उनसे मिल कर उन्हें दुख और दोष से मुक्तत करती है। हिंदी फिल्मों में ऐसे और इतने स्वतंत्र महिला किरदार कम हैं। पिता के साथ के उसके रिश्ते में एक बेबाकपन है। देवी रिश्ते की मर्यादा में रहते हुए भी अपनी सोच जाहिर करने से नहीं हिचकती। देवी की इस यात्रा में हम किसी लड़की के प्रति समाज(पुरुषों) के रवैए से भी हम वाकिफ होते हैं। रिचा चड्ढा ने देवी के दर्प को सही तरीके से निभाया है।
              दीपक के भविष्य के सपनों में जिंदगी से भरपूर शालू आ जाती है। दोनों का अनायास प्रेम होता है। समाज के दो तबकों के इन प्रेमियों को मालूम है कि समाज उनकी शादी स्वीकार नहीं करेगा। उसकी नौबत आने के पहले ही फिल्म नाटकीय मोड़ लेती है। दीपक प्रेम की जगह दर्द में डूब जाता है। शालू का सहज प्रेम ही उसकी जिंदगी को असहज कर देता है। दीपक सामाजिक बेडियों को तोड़ कर आगे निकलता है, लेकिन शालू की यादें उसे जकड़े रहती हैं। जरूरी है कि वह अपनी हैरानी से बाहर निकले, जैसे कि देवी अपनी ग्लानि से निकलती है। दीपक के द्वंद्व को विकी कौशल ने पूरी ईमानदारी और भागीदार के साथ पर्दे पर उतारा है। 
            एक और किरदार है झोंटा। देवी के पिता पाठक और झोंटा के बीच अनोखा रिश्ता है। झोंटा में बालसुलभ दिशाहीनता और उत्सुकता है। वह अपने व्यवहार से घाट की जिंदगी की नई परत खोलता है। लेखक-निर्देशक ने झोंटा की कहानी को समुचित विस्तार नहीं दिया है। तीनों किरदारों की कहानियां एक-दूसरे से अलग होने के बावजूद साथ-साथ चलती हैं और अंत में जुड़ जाती हैं। ‘मसान’ चरित्र प्रधान फिल्म है। सारे चरित्रों की निजी घटनाएं ही आज के बनारस का सामाजिक चित्र रचती हैं।                         
                लेखक-निर्देशक ने बनारस की लोकप्रिय छवियों से फिल्म को दूर रखा है। घाट और श्मशान घाट के प्रसंग हैं। उन्हें फिल्म के कैमरामैन ने असरदार खूबसूरती के साथ दृश्यों का हिस्सा बना दिया है। चिताओं की चट-चट और उड़ती चिंगारियों में लहलह होते चेहरे मृत्यु और नश्वरता के बीच मौजूद जिंदगी की वास्तविकता का आभास देते हैं। ‘मसान’ आज के बनारस की ऐसी कहानी है, जो अपने चरित्रों को लेकर जजमेंटल नहीं है। वह उन्हें स्वभाव के मुताबिक आजाद छोड़ देती है। हर फिल्म में ‘क्या हुआ’ की उम्मीद लगाए बैठे दर्शकों का यह फिल्मी एक पहेली देती है। आप समय और जिंदगी से वाकिफ हैं तो उसे सुलझा लें। 
                 अच्छी बात है कि इस फिल्मी में कोई कलाकार एक्टिंग करता नजर नहीं आता। अनुभवी संजय मिश्रा से लेकर नवोदित विकी कौशल तक संयत और भावपूण हैं। देवी के किरदार में रिचा बहकती तो धार खत्म हो ताजी। शालू को पर्दे पर जीते समय श्‍वेता त्रिपाठी की चमकती शरारती आंखें गहरा और यादगार प्रभाव छोड़ती हैं। संजय मिश्रा के बारे में क्या कहना? उनकी अभिनय शैली परिचित और पड़ोसी किरदारों को पर्दे पर लोने के अवसर दे रही है। विनीत कुमार भी ध्यान खींचते हैं। पंकज त्रिपाठी सहज अभिनय से किरदार के दूषित दिमाग के बाहरी स्वच्छता का अच्छा विलोम पैदा करते है। 
               ‘मसान’ की सबसे बड़ी खूबसूरती किरदारों के आर्गेनिक इमोशन हैं। इन दिनों फिल्मों में हम सभी सिनेमाई इमोशन ही देखते हैं। फिल्मों में सब कुछ इतना घिस-पिट और प्रेडिक्टेबल हो गया है कि मौलिक और आर्गेनिक अविश्वसनीय और असंभव लगता है। नीरज घेवन और वरुण ग्रोवर बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने भावों की मौलिकता को तरजीह दी। वरुण ग्रोवर ने इस फिल्मं के गीत भी लिखे हैं। उनका गीत ‘मन कस्तूरी’ कबीर की उलटबांसी का आधुनिक इस्तेमाल करती है। साहित्य में विपर्यय के सौंदर्य से परिचित रसिक इसे सुन कर आनंदित होंगे। इंडियन ओसन का संगीत फिल्म की थीम के अनुकूल हैं। 
अवधिः 115 मिनट 
स्‍टार- **** चार स्‍टार

Wednesday, July 22, 2015

मेनस्ट्रीम स्पेस में ही कुछ कहना है- कबीर खान

-अजय ब्रह्मात्‍मज
कबीर खान हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के अनोखे निर्देशक हैं। उनकी मेनस्ट्रीम फिल्मों में कंटेंट की पर्याप्त मात्रा रहती है। वे खुद को राजनीतिक रूप से जागरूक और सचेत फिल्मकार मानते हैं। उनकी फिल्में सबूत हैं। इस बार वे ‘बजरंगी भाईजान’ लेकर आ रहे हैं। उन्होंने झंकार के लिए अजय ब्रह्मात्मज से बातचीत की  ¸ ¸ ¸

-‘बजरंगी भाईजान’ में बजरंगी का सफर सिर्फ भावनात्मक है या उसका कोई राजनीतिक पहलू भी है?
भारत-पाकिस्तान का संदर्भ आएगा तो राजनीति आ ही जाएगी। मेरी कोशिश रहती है कि फिल्मों का संदर्भ रियल हो। मैं मेनस्ट्रीम सिनेमा में रियल बैकड्रॉप की कहानी कहता हूं। बिना राजनीति के कोई इंसान जी नहीं सकता। मुझे राजनीतिक संदर्भ से हीन फिल्में अजीब लगती हैं। राजनीति से मेरा आशय पार्टी-पॉलिटिक्स नहीं है। ‘बजरंगी भाईजान’ में स्ट्रांग राजनीतिक संदर्भ है।
-पहली बार किसी फिल्म इवेंट में आप के मुंह से ‘पॉलिटिक्स ऑफ द फिल्म’ जैसा टर्म सुनाई पड़ा था?
मेरे लिए वह बहुत जरूरी है। अपने यहां इस पर बात नहीं होती। समीक्षक भी फिल्म की राजनीति की बातें नहीं कहते। मैं फिल्म में कोई भी कमी बर्दाश्त कर सकता हूं। फिल्म की पॉलिटिक्स खराब हो तो मैं फिल्म नहीं देख सकता। दुर्भाग्य से लिखते समय विश्लेषण में समीक्षक और फिल्म लेखक उस पर बातें ही नहीं करते, जबकि फिल्म की पॉलिटिक्स सबसे ज्यादा जरूरी चीज है। वह सही हो तो कम से कम फिल्मकार की राजनीति समझ में आए। सहमति-असहमति दीगर बात है। मेरी सर्वाधिक प्रिय फिल्म ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ है। वह अत्यंत राजनीतिक फिल्म है। उसका एक गहरा असर है। उस फिल्म में घोषित रूप से राजनीति की बातें नहीं हैं, लेकिन वह फिल्म अपनी राजनीति की वजह से सभी को अच्छी लगती हैं। अनेक फिल्मों में क्राफ्ट बेहतर होता है, लेकिन पॉलिटिक्स नहीं रहती। वैसी फिल्में दर्शक भी नहीं देखते। ऐसी फिल्में नहीं चल पातीं।
-फिर ‘बजरंगी भाईजान’ की क्या पॉलिटिक्स है?
सिंपल है। ‘बजरंगी भाईजान’ वास्तव में नेक इंसान होना है। आप किसी भी धार्मिक और राजनीतिक विचार के हों। आप बॉर्डर के इस तरफ हो या उस तरफ... आखिरकार इंसानियत सभी सीमाओं को तोड़ देती है। हम सभी चीजों को देखने-समझने का एक स्टीरियोटाइप बना देते है। उससे हमारी सोच प्रभावित होती है। ‘बजरंगी भाईजान’ इंसानियत की बात करती है। धार्मिक, राजनीतिक, वैचारिक और अन्य सीमाओं से ऊपर उठकर बातें करती है।
- आप ने पाकिस्तान का नाम कब सुना था और क्या धारणा थी?
नाम तो बहुत पहले सुन लिया था। मेरे पिता  रसीद्दुदीन खान जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर थे। घर में एकेडेमिक माहौल था। पॉलिटिकल डिस्कसन चलता रहता था। मेरी फिल्मों में भी पॉलिटिक्स रिफ्लेक्ट करता है।
-पाकिस्तान को लेकर समाज में अनेक धारणाएं प्रचलित हैं। खास किस्म की राजनीति उसे हवा भी देती है?
समस्या यह है कि पाकिस्तान का एक पॉलिटिकल क्लास है। उनके काम की जिम्मेदारी हम अवाम पर डाल देते हैं। पाकिस्तान के प्रशासन से मेरे मतभेद हैं। वे बहुत बुरा गेम खेल रहे हैं। वहां के अवाम को हम क्यों बुरा समझें? वे उतने ही परेशान हैं, जितने हम। आतंकवाद से उनका ज्यादा नुकसान हो रहा है। पिछले दस सालों में हमने जितनी जानें गंवाई हैं, उससे कई गुना पाकिस्तान गंवा चुका है। ‘काबुल एक्सप्रेस’ के समय भी यह प्रॉब्लम थी। अफगान सुनते ही टेररिस्ट का ख्याल आता है। तालिबान के हाथों सबसे च्यादा कौन मारे गए- अफगानी। हमें समझना होगा कि देश की राजनीति और देश का अवाम दोनों अलग चीजें हैं। ‘न्यूयॉर्क’ में भी मैंने यही कहने की कोशिश की थी।
-पॉलिटिक्स पर इतना जोर क्यों देते हैं?
वह डॉक्युमेंट्री के दिनों से आया है। मैंने सईद नकवी के साथ काम किया है। पांच सालों में उनके साथ सीएनएन और बीबीसी से अलग नजरिए से घटनाओं को देखने की कोशिश में राजनीतिक समझ बढ़ती गई। दक्षिण एशिया के संदर्भ और दृष्टिकोण से में मैंने सब कुछ देखा। जो हमें बताया जाता है और जो होता है, उन दोनों के बीच से मेरी कहानियां निकलती हैं। मेरी पांचों फिल्में उसी जोन की हैं।
-डॉक्यूमेंट्री से फिल्मों में आने की क्या वजह रही?
मैं वहां सफल था। डॉक्यूमेंट्री बनाने के बाद मुझे लगा कि भारत में उनके लिए स्पेस नहीं है। मेरी फिल्में विदेशों में दिखाई जा रही थीं। उन्हें भारत के दर्शक नहीं मिल रहे थे। मुझे संतोष नहीं हो रहा था। फिर समझ में आया कि मेनस्ट्रीम सिनेमा से बड़ा प्लेटफॉर्म भारत में नहीं है। अपने देश में सिनेमा के माध्यम से कई बातें कहीं जा सकती हैं। मेरा मकसद मेनस्ट्रीम स्पेस में ही कुछ कहना है। वैकल्पिक स्पेस में कुछ कहना या बताना तो जानकारों के बीच ही रहना है। उनकी वाह-वाह से कहीं पहुंचा नहीं जा सकता है। दर्शकों की तलाश में मैं फिल्मों में आया।
-शुरू में दिक्कतें हुई होंगी? यहां आउटसाइडर को जल्दी मौके नहीं मिलते। आप का कैसा अनुभव रहा?
मुझे खुशी है कि ‘यशराज फिल्म्स’ से मुझे मौके मिले। उसके पहले मैं ‘काबुल एक्सप्रेस’ की स्क्रिप्ट लेकर घूम रहा था। सभी स्क्रिप्ट की तारीफ करते थे, लेकिन कोई पैसे देने को तैयार नहीं था। कहीं से मेरी स्क्रिप्ट आदित्य चोपड़ा के पास पहुंची। उनका फोन आया तो पहले लगा कि कोई मजाक कर रहा है। आदि ने पांच मिनट में स्क्रिप्ट फायनल कर दी। दो महीनों के बाद शूटिंग आरंभ हो गई। फिर उनकी तरफ से ‘न्यूयॉर्क’ का सुझाव आया। वे मुझे मेनस्ट्रीम तक ले आए। यशराज के लिए वह वह बड़ा जोखिम था। उसके बाद ‘एक था टायगर’ आई। इस फिल्म में सलमान से संबंध बना और फिर ‘बजरंगी भाईजान’ आ गई। अब मुझे निर्माता मिल रहे हैं। रिलीज से पहले क्या कहूं, बस इतना समझें कि ‘बजरंगी भाईजान’ सलमान खान के लिए भी अलग फिल्म है।
-कैसे बात बनी?
‘बजरंगी भाईजान’ जैसी फिल्म सलमान को लेकर ही बन सकती थी। ‘एक था टायगर’ के समय हुई दोस्ती काम आई। हम दोनों कुछ अलग करना चाहते थे। हम दोनों एक पेज पर थे। इस फिल्म में हम दोनों की परस्पर समझदारी से मदद मिली। हम दोनों को इस फिल्म में बहुत यकीन है। तभी इसकी स्क्रिप्ट सुनते ही सलमान ने कहा था कि इसे हम खुद प्रोड्यूस करेंगे। इस फिल्म में सही ब्लेंडिंग हुई। सब कुछ रियल है और मेनस्ट्रीम माउंटिंग है।
- क्या इस ट्रांजिशन में कुछ समझौते भी करने पड़े?
‘एक था टायगर’ में जरूर समझौते करने पड़े थे। इस फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है। यह फिल्म उदाहरण है कि कैसे मेनस्ट्रीम सिनेमा में कंटेंट लेकर आ सकते हैं।
-हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के अराजनीतिक माहौल में आप अपनी सोच कैसे रख पाते हैं? क्या उसे छिपा कर पेश करते हैं?
छिपा कर तो नहीं, लेकिन थोड़ी संवेदना और समझ के साथ बताना पड़ता है। फिल्मों में आप बहुत नोकदार बातें नहीं कर सकते। वैसे इस फिल्म में चुभने वाली बातें हैं। उस पर रिएक्शन होगा। इस फिल्म में मैंने चुटीली बातें मजाकिया लहजे में रखी हैं। अनेक शार्प कमेंट मिलेंगे।
-‘बजरंगी भाईजान’ शीर्षक की क्या कहानी है?
फिल्म की कहानी से निकला है यह शीर्षक। कैसे बजरंगी ‘बजरंगी भाईजान’ बन जाता है।
-कलाकारों के चुनाव के पीछे की सोच के बारे में कुछ बताएं?
सलमान खान को तो होना ही था। इस फिल्म का किरदार उनके बहुत करीब है। उन्होंने अच्छी तरह उस किरदार को  पर्दे पर पेश किया है। कैरेक्टर का एक्टर से आइडेंटिफिकेशन होना चाहिए। मैं हमेशा कास्टिंग के बाद स्क्रिप्ट लिखता हूं। एक्टर की खूबियां  उसमें डालता हूं। रीराइट करने पर एक्टर को सहूलियत होती है। मुझे भी आसानी रहती है। नवाज तो अपनी पीढ़ी के उम्दा अभिनेता हैं। कैरेक्टर लिखते समय नवाज ही ध्यान में थे।
- आप की फिल्म के शीर्षक पर आपत्ति है?
 जो आपत्ति कर रहे हैं, मेरी फिल्म उन लोगों के लिए ही है। उन्हें अपनी संकीर्णता खत्म करनी चाहिए। उन्हें इस देश की महानता की समझ नहीं है। इस तरफ और उस तरफ के कट्टरपंथियों के लिए ही फिल्म बनाई है, जिन्हें यह फिल्म देख कर शर्म आएगी।
-अभी के माहौल में आप जैसी सोच के साथ काम करना आसान है क्या?
हमें अपनी लड़ाई जारी रखनी होगी। अगर कुछ चीजें गलत हो रही हैं तो हमें बोलना होगा। उन सभी को बोलना होगा, जिनकी पहचान है। सोच-विचार के बिना आदमी होने का तो कोई मतलब ही नहीं रह जाता। उसकी वजह से हम जानवरों से अलग होते हैं। सलमान खान के स्टारडम के पॉवर का इस्तेमाल मैंने एक सही बात रखने में किया है। वे खुद ऐसी सोच में यकीन रखते हैं।
-शूटिंग के दरम्यान ही सलमान खान का मामला कोर्ट में चल रहा था। सुनवाई के आगे-पीछे सेट पर सलमान खान किस तरह पेश आते थे। कैसे नजर आते थे?
वे कभी सेट पर अपनी सच्ची भावना जाहिर नहीं करते थे। जाहिर तौर पर वे स्वयं स्ट्रेस में रहे होंगे, लेकिन उन्होंने कभी किसी को टेंशन नहीं दिया। बाहर जो भी हो रहा हो , लेकिन हमें पता था कि क्या हो सकता है? रिलीफ तो मिलना ही था। शूटिंग के आखिरी दिन तक वे पहले दिन के मूड में रहे। उनकी मौजूदगी में माहौल हल्का-फुल्का रहता है। मैं भी चाहता हूं कि फिल्ममेकिंग की जर्नी में मजा आना चाहिए। अगर प्रॉसेस में आनंद नहीं आएगा तो फिल्म बुरी हो जाएगी। अपने मामले की आंच से उन्होंने हमें दूर ही रखा।
- मुझे लगता है कि सलमान खान के फंडे स्पष्ट हैं, वे इतने सिंपल हैं कि सही रहते हैं। वे अच्छे वक्ता नहीं हैं। मुमकिन है कि वे अपनी सोच ढंग से नहीं रख पाते हों,  लेकिन उनकी फटकार में सच्चाई रहती है?
बिल्कुल सही ऑब्जर्वेशन है आप का। वे इतने सिंपल हैं कि हमेशा पॉलिटिक्ली राइट रहते हैं। वे हर बार कुछ नया नहीं बोलते। उनका दिल सही जगह पर रहता है, इसलिए वे सही बातें करते और कहते हैं। शूटिंग के समय मैंने उनकी दरियादिली देखी है। अगर उनकी मदद से कुछ हो जाए तो उनकी आंखें चमकने लगती हैं। मुझे लगता है कि वे अपनी चैरिटी कामों में सबसे ज्यादा खुश होते हैं। वे बच्चों की तरह चहकने लगते हैं। मुझे तो लगता है कि अब वे फिल्में भी इसलिए करते हैं कि चैरिटी चलती रहे।
 मेरी कोशिश रहती है कि फिल्मों का संदर्भ रियल हो। मैं मेनस्ट्रीम सिनेमा में रियल बैकड्रॉप की कहानी कहता हूं। बिना राजनीति के कोई इंसान जी नहीं सकता। मुझे राजनीतिक संदर्भ से हीन फिल्में अजीब लगती हैं। राजनीति से मेरा आशय पार्टी-पॉलिटिक्स नहीं है। ‘बजरंगी भाईजान’ में स्ट्रांग राजनीतिक संदर्भ है।
-पहली बार किसी फिल्म इवेंट में आप के मुंह से ‘पॉलिटिक्स ऑफ द फिल्म’ जैसा टर्म सुनाई पड़ा था?
मेरे लिए वह बहुत जरूरी है। अपने यहां इस पर बात नहीं होती। समीक्षक भी फिल्म की राजनीति की बातें नहीं कहते। मैं फिल्म में और कोई भी कमी बर्दाश्त कर सकता हूं। फिल्म की पॉलिटिक्स खराब हो तो मैं फिल्म नहीं देख सकता। दुर्भाग्य से लिखते समय विश्लेषण में समीक्षक में समीक्षक और फिल्म लेखक उस पर बात ही नहीं करते, जबकि फिल्म की पॉलिटिक्स सबसे ज्यादा जरूरी चीज है। वह सही हो तो कम से कम फिल्मकार की राजनीति समझ में आए। सहमति-असहमति दीगर बात है। मेरी सर्वाधिक प्रिय फिल्म ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ है। वह अत्यंत राजनीतिक फिल्म है। उसका एक गहरा असर है। उस फिल्म में घोषित रूप से राजनीति की बातें नहीं हैं, लेकिन वह फिल्म अपनी राजनीति की वजह से सभी को अच्छी लगती हैं। अनेक फिल्मों में क्राफ्ट बेहतर होता है, लेकिन पॉलिटिक्स नहीं रहती। वैसी फिल्में दर्शक भी नहीं देखते। ऐसी फिल्में नहीं चल पाती।
-फिर ‘बजरंगी भाईजान’ की क्या पॉलिटिक्स है?
सिंपल है। ‘बजरंगी भाईजान’ वास्तव में नेक इंसान होना है। आप किसी भी धार्मिक और राजनीतिक विचार के हो। आप बॉर्डर के इस तरफ हो या उस तरफ... आखिरकार इंसानियत सभी सीमाओं को तोड़ देती है। हम सभी चीजोां को देखने-समझने का एक स्टीरियोटाइप बना देते है। उससे हमारी सोच प्रभावित होती है। ‘बजरंगी भाईजान’ इंसानियत की बात करती है। धार्मिक, राजनीतिक, वैचारिक और अन्य सीमाओं से ऊपर उठकर बातें करती है।
- आप ने पाकिसतान का नाम कब सुना था और क्या धारणा थी?
नाम तो बहुत पहले सुन लिया था। मेरे पिता  रसीद्दुदीन खान जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर थे। घर में एकेडेमिक माहौल था। पॉलिटिकल डिसकसन चलता रहता था। मेरी फिल्मों में भी पॉलिटिक्स रिफ्लेक्ट करता है। पॉलिटिकल बैकड्रॉप के बगैर मैं सबजेक्ट ला ही नहीं सकता।
-पाकिस्तान को लेकर समाज में अनेक धारणाएं प्रचलित हैं। खास किस्म की राजनीति उसे हवा भी देती है?
समस्या यह है कि पाकिस्तान का एक पॉलिटिकल क्लास है। उनके काम की जिम्मेदारी हम अवाम पर डाल देते हैं। पाकिस्तान के प्रशासन से मेरे मतभेद हैं। वे बहुत बुरा गेम खेल रहे हैं। वहां के अवाम को हम क्यों बुरा समझें? वे उतने ही परेशान हैं, जितने हम। आतंकवाद से उनका ज्यादा नुकसान हो रहा है। पिछले दस सालों में हमने जितनी जानें गंवाई हैं, उससे कई गुना पाकिस्तान गंवा चुका है। ‘काबुल एक्सप्रेस’ के समय भी यह प्रॉब्लम थी। अफगान सुनते ही टेररिस्ट का ख्याल आता है। तालिबान के हाथों सबसे ज्यादा कौन मारे गए- अफगानी। हमें समझना होगा कि देश की राजनीति और देश का अवाम दोनों अलग चीजें हैं। ‘न्यूयॉर्क’ में भी मैंने यही कहने की कोशिश की थी।
-पॉलिटिक्स पर इतना जोर क्यों देते हैं?
वह डॉक्युमेंट्री के दिनों से आया है। मैंने सईद नकवी के साथ काम किया है। पांच सालों में उनके साथ सीएनएन और बीबीसी से अलग नजरिए से घटनाओं को देखने की कोशिश में राजनीतिक समझ बढ़ती गई। दक्षिण एशिया के संदर्भ में मैंने सब कुछ देखा। जो हमें बताया जाता है और जो होता है, उन दोनों के बीच से मेरी कहानियां निकलती हैं। मेरी पांचों फिल्में उसी जोन की हैं।
-डॉक्यूमेंट्री से फिल्मों में आने की क्या वजह रही?
मैं सफल था। डॉक्यूमेंट्री बनाने के बाद मुझे लगा कि भारत में उनके लिए स्पेस नहीं है। मेरी फिल्में विदेशों में दिखाई जा रही थीं। उन्हें भारत के दर्शक वर्ग नहीं मिल रहे थे। मुझे संतोष नहीं हो रहा था। फिर समझ में आसा कि मेनस्ट्रीम से बड़ा प्लेटफॉर्म नहीं है। अपने देश में सिनेमा के माध्यम से कई बातें कहीं जा सकती हैं। मेरा मकसद मेनस्ट्रीम स्पेस में ही कुछ कहना है। वैकल्पिक स्पेस में कुछ कहना या बताना तो जानकारों के बीच ही रहता है। उनकी वाह-वाह से कहीं पहुंचा नहीं जा सकता है। दर्शकों की तलाश में फिल्मों में आया।
-शुरू में दिक्कतें हुईं? यहां आउटसाइडर को जल्दी मौके नहीं मिलते। आप का कैसा अनुभव रहा?
मुझे खुशी है कि ‘यशराज फिल्म्स’ से मुझे मौके मिले। उसके पहले मैं ‘काबुल एक्सप्रेस’ की स्क्रिप्ट लेकर घूम रहा था। सभी स्क्रिप्ट की तारीफ करते थे, लेकिन कोई पैसे देने को तैयार नहीं था। कहीं से स्क्रिप्ट आदित्य चोपड़ा के पास पहुंची। उनका फोन आया तो पहले लगा कि कोई मजाक कर रहा है। आदि ने पांच मिनट में स्क्रिप्ट फायनल कर दी। दो महीनों के बाद शूटिंग आरंभ हो गई। फिर उनकी तरफ से ‘न्यूयॉर्क’ का सुझाव आया। वे मुझे मेनस्ट्रीम तक ले आए। यशराज के लिए वह वह बड़ा जोखिम था। उसके बाद ‘एक था टाईगर’ आई। इस फिल्म में सलमान से संबंध बना और फिर ‘बजरंगी भाईजान’ आ गई। अब मुझे निर्माता मिल रहे हैं। रिलीज से पहले क्या कहूं, बस इतना समझें कि ‘बजरंगी भाईजान’ सलमान खान के लिए भी अलग फिल्म है।
-कैसे बात बनी?
‘बजरंगी भाईजान’ जैसी फिल्म सलमान को लेकर ही बन सकती थी। ‘एक था टाइगर’ के समय हुई दोस्ती काम आई। हम दोनों कुछ अलग करना चाहते थे। हम दोनों एक मेज पर थे। इस पिुल्म में हम दोनों की समझदारी से मदद मिली। हम दोनों को इस फिल्म में बहुत यकीन है। तभी इसकी स्क्रिप्ट सुनते ही सलमान ने कहा था कि इसे हम खुद प्रोड्यूस करेंगे। इस फिल्म में सही ब्लेंडिंग हुई। सब कुछ रियल है और मेनस्ट्रीम माइंडिंग है।
- क्या इस ट्रांजिशन में कुछ समझौते भी करने पड़े?
‘एक था टायगर’ में जरूर समझौते करने पड़े थे। इस फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है। यह फिल्म उदाहरण है कि कैसे मेनस्ट्रीम सिनेमा में कंटेट लेकर आ सकते हैं।
-हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के राजनीतिक माहौल में आप अपनी सोच कैसे रख पाते हैं? क्या उसे छिपा कर पेश करते हैं?
छिपा कर तो नहीं, लेकिन थोड़ी संवेदना और समझ के साथ बताना पड़ता है। फिल्मों में आप बहुत नोकदार बातें नहीं कर सकते। वैसे इस फिल्म में चुभने वाली बातें हैं। उस पर रिएक्शन होगा। इस फिल्म में मैंने चुटीली बातें मजाकिया लहले में रखी हैं। अनेक शार्प कमेंट मिलेंगे।
-‘बजरंगी भाईजान’ शीर्षक की क्या कहानी है?
फिल्म की कहानी से निकला यह शीर्षक। कैसे बजरंगी फिल्म में ‘बजरंगी भाईजान’ बन जाता है।
-कलाकारों के चुनाव के पीछे की सोच के बारे में कुछ बताएं?
सलमान खान को तो होना ही था। इस फिल्म का किरदार उनके बहुत करीब है। उन्होंने अच्छी तरह उस किरदार को  पर्दे पर पेश किया है। कैरेक्टर का एक्टर से आइडेंटिफिकेशन होना चाहिए। मैं हमेशा कास्टिंग के बाद स्क्रिप्ट लिखता हूं। एक्टर की खूबियां  उसमें डालता हूं। रीराइट करने पर एक्टर को सहूलियत होती है। मुझे भी आसानी रहती है। नवाज तो अपनी पीढ़ी के उम्दा अभिनेता हैं। कैरेक्टर लिखते समय नवाज ही ध्यान में थे।
- आप की फिल्म के शीर्षक पर आपत्ति है?
 जो आपत्ति कर रहे हैं, मेरी फिल्म उन लोगों के लिए ही है। उन्हें अपनी संकीर्णता खत्म करनी चाहिए। उन्हें इस देश की महानता की समझ नहीं है। इस तरफ या उस तरफ के कट्टरपंथियों के लिए ही फिल्म बनाई है, जिन्हें यह फिल्म देख कर शर्म आएगी।
-अभी के माहौल में आप जैसी सोच के साथ काम करना आसान है क्या?
कुछ नहीं कर सकते। हमें अपनी लड़ाई जारी रखनी होगी। अगर कुछ चीजें गलत हो रही हैं तो हमें बोलना होगा। उन सभी को बोलना होगा, जिनकी पहचान है। सोच और विचार के बिना आदमी होने का तो कोई मतलब ही नहीं रह जाता। उसकी वजह से हम जानवरों से अलग होते हैं। सलमान खान के स्टारडम के पॉवर का इस्तेमाल मैंने एक सही बात रखने में किया है। वे खुद ऐसी सोच में यकीन रखते हैं।
-शूटिंग के दरम्यान ही सलमान खान का मामला कोर्ट में चल रहा था। सुनवाई के आगे-पीछे सेट पर सलमान खान किस तरह पेश आते थे। कैसे नजर आते थे?
वे कभी सेट पर अपनी सच्ची भावना जाहिर नहीं करते थे। जाहिर तौर पर वे स्वयं स्ट्रेस में रहे होंगे, लेकिन उन्होंने कभी किसी को टेंशन नहीं दिया। बाहर जो भी हो रहा हो , लेकिन हमें पता था कि क्या हो सकता है? रिलीफ तो मिलना ही था। शूटिंग के आखिरी दिन तक वे पहले दिन के मूड में रहे। उनकी मौजूदगी में माहौल हल्का-फुल्का रहता है। मैं भी चाहता हूं कि फिल्ममेकिंग की जर्नी में मजा आना चाहिए। अगर प्रॉसेस में आनंद नहीं आएगा तो फिल्म बुरी हो जाएगी। अपने मामले की आंच से उन्होंने हमें दूर ही रखा।
- मुझे लगता है कि सलमान खान के फंडे स्पष्ट हैं, वे इतने सिंपल हैं कि सही रहते हैं। वे अच्छे वक्ता नहीं हैं। मुमकिन है कि वे अपनी सोच ढंग से नहीं रख पाते हों,  लेकिन उनकी फटकार में सच्चाई रहती है?
बिल्कुल सही ऑब्जर्वेशन है आप का। वे इतने सिंपल हैं कि हमेशा पॉलिटिक्ली राइट रहते हैं। वे हर बार कुछ नया नहीं बोलते। उनका दिल सही जगह पर रहता है, इसलए वे सही बातें करते और कहते हैं। शूटिंग के समय मैंने उनकी दरियादिली देखी है। अगर उनकी मदद से कुछ हो जाए तो उनकी आंखें चमकने लगती हैं। मुझे लगता है कि वे अपनी चैरिटी कामों में सबसे ज्यादा खुश होते हैं। वे बच्चों की तरह चहकने लगते हैं। मुझे तो लगता है कि अब वे फिल्में भी इसलिए करते हैं कि चैरिटी चलती रहे।

Tuesday, July 21, 2015

मन कस्‍तूरी रे - वरुण ग्रोवर

बनारस की पृष्‍ठभूमि पर वरुण ग्रोवर का यह गीत कबीर की जमीन पर सारगर्भित तरीके से 'मसान' की थीम की अभिव्‍यक्ति है। पहली बार इसे सुनने के बाद ही मुझे वरुण के प्रयास और अभ्‍यास ने प्रभावित किया था। चंद शब्‍दों में भावों की यह उलटबांसी प्रशेसनीय है। हिंदी फिल्‍मों के गीतों की परंपरा में पंडित इसे जहां स्‍थान दे,फिलहाल यह हमारे समय की मुखर और भावपूर्ण अभिव्‍यक्ति है। इसे संगीत से इंडियन ओसन ने सजाया है। धन्‍यवाद वरुण... अल्‍लाह काे न मानते हुए भी मुहावरे में कहें तो 'अल्‍लाह करे ज़ोर-ए-क़लम और ज्‍यादा.....' 
मुखड़ा 

पाट ना पाया मीठा पानी 
ओर-छोर की दूरी रे 
मन कस्तूरी। 

Even the purest of things, river water,
Couldn't bridge the gap of this side and that side.

मन कस्तूरी रे जग दस्तूरी रे
बात हुयी ना पूरी रे 
मन कस्तूरी रे। 

Heart is like kasturiin this ritualistic world
And it doesn't get a closure ever. 

खोजे अपनी गंध ना पावे 
चादर का पैबंद ना पावे 

Searches for own essence, but can't find it
Can't find the paiband  for the torn chaadar of existence

बिखरे-बिखरे छंद सा टहले 
दोहों में ये बंध ना पावे 

Moves around like a broken verse,
Can't be composed into poetry.

नाचे हो के फिरकी लट्टू 
खोजे अपनी धूरी रे 

Revolves like a lattu
Looking for its own axis.

मन कस्तूरी रे । 

अंतरा 

उमर की गिनती हाथ ना आई 
पुरखों ने ये बात बताई 

Ageing, growing up is a mystery
And old people have told us this

उल्टा कर के देख सके तो 
अम्बर भी है गहरी खाई 

If you turn it upside down,
Even the sky is like a bottomless pit.

रेखाओं के पार नजर को,
जिसने फेंका अंधे मन से 

So if you can see beyond the 3-D world,
And see with a blinded heart (unprejudiced heart)
 
सतरंगी बाजार का खोला 
दरवाजा फिर बिना जतन के 

The door to a seven colored world,
Opens without much efforts.

फिर तो झूमा बावल हो के 
फिर तो झूमा बावल हो के 

And then it dances, like a mad man

सर पे डाल फितूरी रे 
मन कस्तूरी रे । 

With an exceptional craziness,
Heart, like Kasturi.
 
 
 
 

Friday, July 17, 2015

फिल्‍म समीक्षा : बजरंगी भाईजान

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
सलमान खान की ‘बजरंगी भाईजान’ को देखने के कई तरीके हो सकते हैं। पॉपुलर स्टार सलमान की फिल्में समीक्षा से परे होती हैं। खरी-खोटी लिखने या बताने से बेहतर होता है कि फिल्मों की अपील की बातें की जाएं। सलमान खान की खास शैली है। एक फॉर्मूला सा बन गया है।
 ‘वांटेड’ के बाद से उनकी फिल्मों में इसी का इस्तेमाल हो रहा है। निर्देशक बदलते रहते हैं, लेकिन सलमान खान वही रहते हैं। बात तब अलग हो जाती है, जब उन्हें राजनीतिक रूप से सचेत निर्देशक कबीर खान मिल जाते हैं। मनोरंजन के मसाले मेे मुद्दा मिला दिया जाता है। स्वाद बदलता है और फिल्म का प्रभाव भी बदलता है। कबीर खान ने बहुत चालाकी से सलमान की छवि का इस्तेमाल किया है और अपनी बात सरल तरीके से कह दी है। इस सरलता में तर्क डूब जाता है। तर्क क्यों खोजें? आम आदमी की जिंदगी भी तो एक ही नियम से नहीं चलती। ‘बजरंगी भाईजान’ बड़े सहज तरीके से भारतीय और पाकिस्तानी समाज में सालों से जमी गलतफहमी की काई को खुरच देती है। पॉपुलर कल्चर में इससे अधिक की उम्मीद करना उचित नहीं है। सिनेमा समाज को प्रभावित जरूर करता है, लेकिन दुष्प्रभाव ही ज्यादा दिखते हैं। सद्प्रभाव होता है तो ‘बजरंगी भाईजान’ का स्पष्ट संदेश है कि दोनों देशों की जनता नेकदिल और मानवीय हैं।
         पवन कुमार चतुर्वेदी उर्फ बजरंगी मध्यवर्गीय हिंदू परिवार में पला भोंदू किस्म का लड़का है। हांख्वह बजरंग बली का भक्त और सच्चा एवं ईमानदार लड़का है। उसके पिता कुछ कमाने के उद्देश्य से उसे दिल्ली जाने की सलाह देते हैं। दिल्ली पहुचने पर पवन की मुलाकात रसिका से होती है। दोनों के बीच स्वाभाविक प्रेम होता है। इस बीच एक गूंगी बच्ची भी उसके जीवन में आ जाती है। भटकी लड़की को उसके मां-बाप से मिलाने की कोशिश में बजरंगी गहरे फंसता जाता है। कहानी आगे बढ़ती है और पता चलता है कि बच्ची तो पाकिसतन की है। सरल स्वभाव का पवन उसे पाकिस्तान में उसके घर पहुंचाने की ठान लेता है। इसके बाद फिल्म में तेजी से मोड़ आते हैं। कई बार तर्क और कारण पर ध्यान नहीं दिया जाता। लेखक-निर्देशक जल्दी से अपने ध्येय तक पहुंचना चाहते हैं। वे दर्शकों को भावनात्मक रूप से झकझोरना चाहते हें। इसमें उनकी सहायता पाकिस्तानी टीवी रिपोर्टर चांद करता है। फिल्म जब खत्म होती है तो सभी की आंखें नम होती हैं। गूंगी बच्ची जिसे पवन मुन्नी कहता है और जो अपने मां-बाप की शाहिदा है, उसकी अंतिम पुकार दर्शकों को हिला देती है।
        ‘बजरंगी भाईजान’ हिंदी सिनेमा के इतिहास की उन चंद फिल्मों में से एक होगी, जिसमें पाकिस्तान को दुश्मन देश के तौर पर नहीं दिखाया गया है। देशभक्ति के नाम पर गालियां नहीं दी गई हैं। उन धरणाओं के प्रसंग हैं, जिनसे गलतफहमियां जाहिर होती हैं। दोनों देशों के शासकों और राजनीतिक शक्तियों ने इस वैमनस्य का बढ़ाया है। ‘बजरंगी भाईजान’ मानवीय और सौहार्दपूर्ण तरीके से उन धारणाओं को छेड़ती है। गलतफहमियां दोनों तरु से हें। भारत में रहते हुए हम अपनी कमियों से परिचित होते हैं और पाकिस्तान पहुंचने पर वहां मौजूद गलतफमियों से रूबरू होते हैं। पवन की तरह ही भोंदू टीवी रिपोर्टर की इंसानियत जागती है। बजरंगी में भाईजान लफ्ज जुड़ता है और हम देखते हैं कि कैसे दिल पिघलते हैं। सरहद पर खींची कंटीले तारों के बीच बने फाटक के दरवाजे खुलते हें। ‘बजरंगी भाईजान’ दोनों देशों को करीब लाने का नेक प्रयास करती है। 
          कलाकारों में हर्षाली मल्होरत्रा अपनी मासूमियत से दिल जीत लेती है। वह गूंगी है, लेकिन आंखें और चेहरे से प्रेम का इजहार करती है। नवाजुद्दीन सिद्दीकी की मौजूदगी फिल्म को आगे बढ़ाने के साथ रोचक भी बनाती है। वे दर्शकों को मोहते हें। उनके किरदार और अभिनय में सादगी है। सलमान खान का किरदार इतना सरल और प्रभावशाली है कि वह दर्शकों को अपने साथ लिए चलता है। 
अवधिः 159 मिनट 
**** चार स्‍टार

Monday, July 6, 2015

दरअसल : मोहल्‍ला अस्‍सी पर मचा विवाद

-अजय ब्रह्मात्‍मज
                                                                                         पिछले कुछ समय से मोहल्‍ला अस्‍सी के अनधिकृत फुटेज को लेकर विवाद चल रहा है। किसी शरारती ने कुछ दिनों पहले फिल्‍म के कुछ दृश्‍यों को जोड़ कर यूट्यूब पर रिलीज कर दिया। उसे देख कर अनेक संगठन और अन्‍य हिमायती उठ खड़े हुए। सभी की आपत्ति है कि फिल्‍म के इस फुटेज में जिस तरह से गालियों का इस्‍तेमाल हुआ है,उससे धार्मिक भावनाओं को ठेस लगती है। बयान भी आए कि मनोरंजन के नाम पर धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ नहीं करने दिया जाएगा। मामले की त‍ह में गए बिना सभी बयान औ फैसले दे रहे हैं।
सबसे पहले बात कि यी फुटेल अनधिकृत है। यह डायरेक्‍टर की सहमति के बगैर रिलीज हुआ है। जांच एजेंसियों को पता करना चाहिए कि यह कहां से और क्‍यों अपलोड किया गया है ? अभी बगैर सांप देखे सभी लाठी पीट रहे हैं। कुछ लोगों को हल्‍ला मचाने और सुर्खियों में आने का मौका मिल गया है। कायदे से पूरे मामले की गहन जांच होनी चाहिए कि यह फुटेज किस ने अपलोड किया ? इस फुअे ज को ट्रेलर समझने की भूल कर रहे लोगों को भी देखना और समझना चाहिए कि किसभ्‍ भी ट्रेलर में निर्माता और निर्देशक का नाम अवश्‍य होता है। उनके नाम के बगैर यह फर्जी फुटेज है।
मोहल्‍ला अस्‍सी हिंदी के सुप्रसिद्ध लेखक काशीनाथ सिंह के उपन्‍यास के एक खंड पांडे कौन कुमति तोहे लागी पर आधारित है। मूल कृति के आधार पर डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने फिल्‍म की स्क्रिप्‍ट लिखी और उसक मोहल्‍ला र्अस्‍सी नाम दिया। इस फिल्‍म में संस्‍कृत और संस्‍कृति की चिंता है। बनारस के अस्‍सी घाट के धर्मनाथ पांडे के आत्‍मसंघर्ष की यह गाथा देश की राजनीति और अन्‍य हलचलों को भी फिल्‍म में पिरोती है। डॉ.. द्विवेदी ने बनारस के घाटों की उथल-पुथल को कुछ किरदारों के जरिए पेश किया है। धर्मनाथ पांडे और उनकी पत्‍नी के अलावा एक धूर्त्‍त गाइड,ण्‍क नाई और एक बहुरूपिया भी है। धर्मनाथ पांडे और बहुरूपिया की नोंक-झोंक चलती रहती है। धर्मनाथ पांडे बहुरूपिया को समझाते भी हैं कि वह भ्रगवान शिव के अलावा और कोई रूप धर ले। बहुरु‍पिया उनकी बात नहीं मानता। धर्मनाथ पांडे चाहते हैं कि बनारस में संस्‍कृत और संस्‍कृति बची रहे।
डॉ. द्विेदी ने बड़े संयम और समझदारी के साथ बनारस को पेश किया है। अचानक इस फंअेज के आने से खलबली सी मच गई है। फिल्‍म के उद्देश्‍य से फुटेज का कोई लेना-देना नहीं है। डॉ. द्विवेदी के मुताबिक यह फअेज फिल्‍म की गलत झलक देता है। किसी ने बदमाशी से फिल्‍म के वैसे दृश्‍यों को ही एकत्रित किया है,जिन्‍हें एक साथ देख का लोग उत्‍तेजित हो या भड़के। जिन्‍हें यह फुटेज अव्‍छा और विचारोत्‍तेजक लग रहा है,वे भी फिल्‍म कर गलत छवि बना रहे हैं। खुश और नाखुश समूहों को फिल्‍म के कंटेंअ में रुचि नहीं है। वे सिर्फ इस फुटेज के आधार पर मंतव्‍य और फतवे जारी कर रहे हैं।
यह सोच और चिंता का विषय है कि सोशल मीडिया के इस दौर में कोई भी कृतिकार कैसे अपनी कृति की रक्षा करे ? कृति की रक्षा में उसे तुरंत सरकारी और प्रशासनिक सहयोग नहीं मिले तो कृति की गलत छवि बनती है। साथ ही कृतिकार पर भी विवाद की आंच आती है। मोहल्‍ला अस्‍सी के संदर्भ में सच उतना ही नहीं है,जो दिख रहा है। सच इस विवाद से परे निर्माता और निर्देशक की अनबन में भी है। 2011 में पूरी हो चुकी यह फिल्‍म निहित स्‍वार्थों की वजह से अभी तक रिलीज नहीं हो सकी है। फिल्‍म एंग से रिलीज हो सच सामने आएगा। साथ ही हम सनी देओल को एक ऐसी भूमिका में देख पाएंगे,जो उनकी पॉपुलर इमेज से बिल्‍कुल अलग है। 

खुद पर हमेशा रखना चट्टान सा भरोसा -करीना कपूर खान


-अजय ब्रह्मात्‍मज 
-क्या कुछ है ‘बजरंगी भाईजान’ और जाहिर तौर पर क्या निभा रही हैं आप?
फिल्म के साथ सबसे रोचक बात तो यह है कि सलमान के संग फिर से काम कर रही हूं। ‘बॉडीगार्ड’ सफल रही थी। आम जनता भी काफी उत्साहित है कि हम दोनों साथ आ रहे हैं। फिल्म की यूएसपी कबीर खान भी हैं। मैंने पहले कभी उनके संग काम नहीं किया। वह बड़ा रोचक अनुभव रहा। मेरा किरदार बड़ा मजेदार है। वह चांदनी चौक के एक स्कूल में टीचर है। वह कैसे सलमान के किरदार से मिलती है? कैसे एक बच्ची उनकी जिंदगी में आती है? दोनों फिर कैसे उसे उसके घर पहुंचाते हैं, वह सब कुछ फिल्म में है।
- बाकी फिल्म में गाने-वाने तो होंगे ही?
हां, पर वे सब जरा हटकर हैं। ऐसे नहीं कि लंदन में प्रेमी-प्रेमिका नाच-गाना कर रहे हैं।
-और वह टीचर कैसी है? साड़ी वाली या..?
नहीं, यंग और मॉडर्न। टिपिकल चांदनी चौक वाली। वह लुक और फील तो आएगा।
- .. लेकिन दिल्ली वाली लड़कियों का रोल तो आपने पहले भी किया है?
यह वाली बड़ी मैच्योर है। पहले थोड़े बबली, चर्पी किस्म की लड़की का किरदार निभाया था। ‘जब वी मेट’ वाला तो बिल्कुल अलग ही मामला था। हां, उसे लोग मेरा सिग्नेचर रोल कहते हैं, मगर इसमें मेरा अवतार एक बेहद मैच्योर लड़की का है।
-अच्छा और फिल्म में सुनने को मिल रहा है कि पाकिस्तान की लड़की है। वहां से आ जाती है..? अगर इस पर थोड़ी  रौशनी डाल सकें तो, क्योंकि कइयों का मानना है कि जैसे ‘हिना’ में नायक हिंदुस्तान से पाकिस्तान चला जाता है, फिर वह कैसे हिंदुस्तान आता है? यहां उलटे क्रम में वह हो रहा है?
नहीं, जैसा ट्रेलर में दिखाया गया है कि सलमान का किरदार कैसे उस बच्ची को पाकिस्तान छोड़ कर आता है? उस सफर में क्या कुछ होता है, वह है इस फिल्म में। यह ‘हिना’ जैसी नहीं है। वह तो लव स्टोरी थी। यह तो ड्रामा है।
-कबीर खान के संग क्या खास बात लगी?
मेरे ख्याल से वे हमेशा बड़ी पिक्चरें बनाते हैं, लेकिन उनमें अच्छी कहानी होती है। यह नहीं कि उनमें महज गाने चल रहे हैं। वे बड़ी रस्टिक फिल्में बनाते हैं। स्क्रीन पर उनकी फिल्म काफी विश्वसनीय लगती है, इसलिए जिस सलमान को हम उनकी बाकी की फिल्मों में देखते हैं, कबीर की फिल्मों में वह बेहद अलग होता है।
-करीना को हमने ग्रो और मैच्योर होते देखा है। आप अपनी जर्नी को किस तरह देखती हैं?
लोग अक्सर कहते हैं कि एक एक्ट्रेस की शेल्फ लाइफ दस साल की होती है।
- आप के मामले में ऐसा नहीं है?
जी हां, जिस दिन ‘उड़ता पंजाब’ रिलीज होगी, उस दिन इंडस्ट्री में मैं 16 साल पूरे कर लूंगी। एक्टिंग में इतनी ताकत और दिलचस्पी आज भी है कि क्या कहूं? मुझे वह करना पसंद है। अच्छे व निरंतर परफॉरमेंसेज करना भाता है। वह मेरी रगों में दौड़ रहा है। कुछ कमर्शियल फिल्में कई लीक से जुदा फिल्में, सब कुछ करने को मिला है।
-ऑफबीट फिल्में तो आप ने तब ही कर दी थीं, जब उनकी चर्चा नहीं होती थी?
हां, पर लोग अब कह रहे हैं। मैंने विमेन सेंट्रिक फिल्में तो काफी पहले ही कर दी थी।
- पर अब जिस गति से वैसी फिल्में आ रही हैं तो कैसा लगता है?
बड़ी खुशी होती है। आज अभिनेत्रियां अपनी मर्जी व मिजाज की फिल्में कर रही हैं, वह बहुत बड़ी बात है।
- आप वे फिल्में देख पाती हैं ?
हां, कुछ तो देखी हैं, पर सब नहीं देख पाती। हां, उनके बारे में समाचारों में जो कुछ आता है, उनके बारे काफी कुछ पढ़ जरूर पाती हूं। यह भी बड़ी अच्छी बात है कि हर दशक की टॉप अभिनेत्रियां टॉप अभिनेताओं के संग काम रही हैं। वह चाहे शर्मिला जी हों, जिन्होंने राजेश खन्ना के संग काम किया। हेमा जी धर्मेंद्र के साथ। श्रीदेवी अनिल कपूर के संग। रेखा जी अमिताभ जी के साथ। वह तो हमेशा से होता आया है, लेकिन लोग पता नहीं क्यों कहते हैं कि खान के साथ बार-बार काम नहीं करना चाहिए। उन्हें विमेन सेंट्रिक फिल्में करनी चाहिए, पर कमर्शियल फिल्मों का मजबूत वजूद तो है ही। मसाला फिल्में तो बननी ही चाहिए। आम जनता को पसंद पड़ती हैं वे और कंटेंट ड्रिवेन फिल्में भी यकीनन करनी चाहिए। एक संतुलन रहे।
-लेकिन आप खुद को किस मूड में पा रही हैं? आप ‘मूडी’ भी कही जाती हैं। आप से शिकायत रही है कि आपने इंडस्ट्री को हंड्रेड पर्सेंट नहीं दिया है?
बिल्कुल, लेकिन वह समर्पण शायद अगले पांच सालों में आप लोगों को दिखे। अभी मैं वैसा कर रही हूं। मैंने बाल्की के संग पहले कभी काम नहीं किया, उनके संग कर रही हूं। अभिषेक चौबे के साथ कर रही हूं। कबीर के संग भी पहले कभी काम नहीं किया था। उनके साथ कर रही हूं। उक्त सभी की खासियत है कि उनकी फिल्में कमर्शियल जोन में रहते हुए भी काफी रियल रहती हैं।
- यानी यह माना जाए कि सिनेमा को लेकर आप की सोच व अप्रोच में फर्क आया है। अपने सफर में आपने हर किस्म के अनुभव हासिल भी कर लिए हैं?
वाकई। 15-16 साल के सफर के बाद भी काम कर रही हूं। हर किस्म के डायरेक्टर के साथ काम कर रही हूं। उन पर मेरा व मेरा उन पर पूरा भरोसा भी है।
- मुझे तो आप का वह फेज भी याद है, जब आप के बारे में एक टाइटिल दिया गया था ‘फ्लॉप फिल्मों की हिट हीरोइन’। तो उस दौर में भी खुद को भटकने व किसी और पर नाराज न होने देने से खुद को कैसे रोका?
 मेरे ख्याल से अपनी प्रतिभा पर भरोसा होना बहुत जरूरी है। मैं ऐसी ही हूं। जब कभी लोगों ने कहना शुरू किया कि करीना नहीं कर पा रही है तो बाद मैं फिनिक्स की तरह बाहर निकली हूं। मंै बचपन से ही ऐसी हूं। वह चट्टानी इरादा मुझे मेरी मां से मिला। मेरी मॉम काफी स्ट्रौंग शख्सियत रही हैं तो इन मामलों में मैं उन जैसी ही हूं।
- अच्छा खुद को आप कितनी सिंधी और कितनी पंजाबी?
सिंधी खाना बहुत पसंद है, पर दिल से, दिमाग से पूरी पंजाबी हूं। पूरी कपूर ही हूं मैं। दिल बड़ा है और खाने का शौक है।
-सैफ के संग जुड़ने के बाद तो नवाबी रंग भी चढ़ गया?
जी हां, पर हम सब बड़े मेहनती हैं। काम के लिए जो हमारी ख्वाहिश है, जो आग है, वह आज भी अंदर जलती रहती है। मुझे पूरी उम्मीद है कि पच्चीस साल बाद भी हम जब बात कर रहे हों तो कहें कि ढाई दशक गुजर भी गए और पता भी नहीं चला।
- वैसा आप की वर्किंग से  झलक रहा है। आजकल तो 40 पार अभिनेत्रियों के लिए भी रोल लिखे जा रहे हैं?
एज को ग्रेसफुली ही लेना चाहिए। उसके खिलाफ नहीं होना चाहिए?

बिल्कुल नहीं, मुझे तो वह सब पसंद नहीं है।
-तो आगे की क्या रूपरेखा है? सैफ के संग इल्युमिनाटी में सक्रिय होंगी?
जी नहीं। मुझे प्रॉडक्शन में बिल्कुल इंट्रेस्ट नहीं है। अभी इतने अच्छे किरदार गढ़े जा रहे हैं। नए निर्देशक काफी अच्छा कर रहे हैं,मैं उनके साथ अभिनय करूंगी। प्रोडक्शन की ओर जरा भी ध्यान नहीं है।
-...नहीं पर जैसे अभी अनुष्का ने किया। दीपिका कर रही हैं। प्रियंका ने भी किया ताकि फिल्मों की लागत कम हो जाए। ऐसा कभी ख्याल आया हो या कोई डायरेक्टर पसंद है, जिनके संग काम करना चाहें?
जी हां डायरेक्टर तो कई पसंद हैं, जहां तक लागत कम करने की बात है तो आजकल जैसे प्रॉफिट शेयरिंग हो रही है। पहले किया भी है। वह मैं कर सकती हूं, पर एक्टिव प्रोड्यूसर होना मुमकिन नहीं। मेरी उसमें दिलचस्पी भी नहीं है।
-एक्टिंग से फुर्सत मिलते ही कहां भागती हैं?
घूमने का शौक है। दुनिया देखने निकल पड़ती हूं। फैमिली के साथ, सैफ के संग, क्योंकि हम दोनों बिजी रहते हैं। घूमना तो अच्छा भी लगता है। हर तीन-चार महीने में कोशिश रहती है कि घूमने पर निकल जाएं।
-किस तरह की यात्राएं भाती हैं?
जाड़ों में तो राजस्थान या फिर लंदन।
-राजस्थान इसलिए तो नहीं कि वहां राजे-रजवाड़े रहे हैं?
नहीं-नहीं। वहां जिस किस्म के होटल हैं। मौसम है। वहां का खाना बहुत पसंद है मुझे। घूमने का टाइम आता है तो खाना तो अहम हो ही जाता है।
-‘चमेली’ जैसी फिल्म फिर से करने का इरादा है?
वैसा कुछ तो ‘तलाश’ में भी किया था, जो मुझे बहुत अच्छी लगी थी। आज की तारीख में तो वैसे रोल लिखे जा रहे हैं। खासकर नए निर्देशकों के द्वारा तो वैसी कहानी, भूमिका आती है तो मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है वह सब करने में।
-इन दिनों यह बात भी उठ रही है कि अभिनेत्रियों को भी अभिनेताओं के बराबर फीस मिलनी चाहिए, क्योंकि कंगना की फिल्म 100 करोड़ करती है तो ...?
बिल्कुल बराबरी होनी चाहिए। हम भी उतनी ही मेहनत करते हैं, जितनी अभिनेता। खूबसूरत लगना भी बहुत टफ है। वह एक ऐडेड रेसपॉन्सिबिलिटी है। हीरोइन के बना हीरो भी कम है। एक अधूरापन तो रह ही जाता है।
-वह अधूरापन तो खैर जिंदगी की बाकी चीजों में भी है। दोनों के परस्पर जुड़ने व अच्छे व्यवहार से ही जिंदगी सरल-सहज बनती है?
बिल्कुल सही। रिश्ता भी लंबा निभता है तब। हीरोइन के संग भी वैसी ही बात है। वह भी बिना हीरो के अधूरी ही है। नमक होना चाहिए फिल्म में।
-‘उड़ता पंजाब’ के बारे में बता सकती हैं थोड़ा बहुत? नाम बड़ा अजीब है?
बिल्कुल। यह ड्रग ड्रामा पर बेस्ड है। बड़ी एजी फिल्म है। अलग है उसकी कहानी। कास्ट भी बड़े प्यारे हैं। सब का रोल अलहदा है। मैं उसमें ड्रग रिहैब में एक डॉक्टर का रोल प्ले कर रही हूं। मैं बड़ी एक्साइटेड हूं। लोगों ने मुझे उस सेटिंग में नहीं देखा है।
-सेटिंग मतलब क्या, लो कॉस्ट या कुछ और?
नहीं लोगों ने अब तक मुझे ग्लैमरस अवतार में ही देखा है। इस बार पहली दफा वे मुझे रियल व डीग्लैम अवतार में देखेंगे।
-और दूसरी जो आर. बाल्की वाली फिल्म है, वह उनके मिजाज वाली ही है?
यकीनन। जैसी फिल्में बनाने में उनको महारथ हासिल है। मिसाल के तौर पर ‘चीनी कम’ जैसी। उसके बाद तो अन्य स्क्रिप्ट सुन ही रही हूं, क्योंकि अभी ‘उड़ता पंजाब’ की शूटिंग खत्म ही की है। फिर बाल्की की फिल्म की शूटिंग प्रारंभ होगी। तीन-चार महीने उसमें जाएंगे।
- सलमान के बारे में क्या कुछ कहना चाहेंगी?
वे सक्सेस व फेल्योर से बहुत आगे की चीज हैं। वे इंडिया के सबसे महान कलाकार हैं।
-कोई पर्सनल एक्सपीरिएंस अगर शेयर कर सकें?
पहली बार तो उनसे भप्पी सोनी की ‘निश्चय’ के सेट पर मिली थी। मैं दस साल की थी तब। आज मैं 34 की हूं। तो बचपन से लेकर शादी से पहले तक। अब शादी के बाद हमारा एक लंबा सफर रहा है। तब से लेकर आज तक उनके नेचर में कोई बदलाव नहीं आया है। तभी वे ग्रेट हैं। बस,तब उनके मसल्स बढ़े हुए थे।
- पर बतौर एक्टर उनकी खासियत क्या है?
मेरे ख्याल से उनकी स्माइल। वह सुपरस्टार वाली स्माइल है। पूरी दुनिया उस पर फिदा हो जाए।
- आप की भी एक आभा है। उनकी भी है। आप दोनों से सालों से हम मिल भी रहे हैं। आप लोग समझ पाते हैं कि सामने वाला आप की आभा से प्रभावित हो रहा है?
मुझे तो महसूस नहीं होता। मेरे ख्याल से जो कलाकार अपने आप को ज्यादा सीरियसली नहीं लेते, उनका सदा अच्छा होता है। स्टारडम को सीरियसली नहीं लेना चाहिए। अगर लोग मेरे आभामंडल से प्रभावित होते हैं तो मैं समझ जाती हूं, पर मैं रिएक्ट नहीं करती। वैसे भी एक सुपरस्टार की इफेक्ट होनी तो चाहिए।
-नहीं, क्योंकि सोसायटी में आप जितना कंट्रीब्यूट करते हो उस अनुपात में आप लोगों को मिल नहीं रहा। मिसाल के तौर पर आप एयरपोर्ट पर जाती हैं तो वहां के सभी लोग आप को देख अलग किस्म की खुशी महसूस करते हैं?
वही हमारी कमाई है। वह अच्छा भी लगता है। लोगों में रेस्पेक्ट की भावना है। आंखों की शरम उनमें है। मैं इस मामले में लकी हूं कि लंबे समय तक काम करने के अलावा मैं जिस परिवार से ताल्लुक रखती हूं, उसको लेकर भी पब्लिक प्लेस पर लोग मुझे बहुत सम्मान देते हैं।
-क्योंकि सलमान ने भी एक बात कही थी कि लोग जब उनकी  फिल्म देखने आते हैं तो उसी फिल्म भर में उन्हें नहीं देख रहे होते। उनकी पूरी पर्सनैलिटी के साथ उनका किरदार पर्दे पर देखा जाता है?
तभी तो लोगों में उनको लेकर क्रेज है, जो लोग समझ नहीं पाते। वही एक फैन का नशा है, जो सलमान को, करीना को, शाह रुख को उस अवतार में बार-बार देखना पसंद करते हंै।



Thursday, June 25, 2015

दरअसल : पहली छमाही की उपलब्धि रहीं कंगना


-अजय ब्रह्मात्‍मज

पहली छमाही खत्‍म होने पर आ गई है। इस छमाही में अन्‍य सालों की तुलना में कम फिल्‍में रिलीज हुई हैं। लगभग 60 फिल्‍मों की रिलीज तो हुई,लेकिन उनका बिजनेस प्रतिशत भी पिछले सालों की तुलना में कम रहा। इस साल अभी तक केवल तनु वेड्स मनु रिटर्न्‍स ही स्‍पष्‍ट तौर पर 100 करोड़ का आंकड़ा पार कर सकी है। छह महीनों में सिर्फ एक फिल्‍म की सौ करोड़ी कामयाबी शुभ संकेत नहीं है। पहले छह महीनों में पॉपुलर स्‍टारों की फिल्‍में भी आई हैं,लेकिन उनमें से किसी ने भी बाक्‍स आफिस पर धमाल नहीं मचाया। जिन फिल्‍मों से बेहतरीन प्रदर्शन और कमाई की उम्‍मीद थी,उन फिल्‍मों ने अधिक निराश किया। किसी भी फिल्‍म ने चौंकाया नहीं। तनु वेड्स मनु रिटर्न्‍स ने तो पहले प्रोमो से ही दर्शकों के दिल में जगह बना ली थी। हां,ट्रेड पंडित यह समझने में लगे हैं कि कैसे कंगना रनोट की फिल्‍म ने ऐसा चमत्‍कारिक कारोबार किया? हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री के घाघ तनु वेड्स मनु रिटर्न्‍स की सफलता को पचा नहीं पा रहे हैं। वे अस्‍वीकार की मुद्रा अपना चुके हैं। अब आंकड़ों को कौन झुठला सकता है?
हिंदी की सर्वाधिक कारोबार करने वाली फिल्‍मों की सूची में तनु वेड्स मनु रिटर्न्‍स’ 142 करोड़ के बिजनेस से अभी तेरहवें स्‍थान पर है। थिएटर से निकलने तक यह कुछ और ऊपर जा सकती है। किसी हीरोइन की फिल्‍म ने अभी तक ऐसा कारोबार नहीं किया है। निश्चित ही इस फिल्‍म की कामयाबी में कंगना की बड़ी भूमिका है। उनके प्रति दर्शकों का रवैया सकारात्‍मक है। पर क्‍या आनंद राय के योगदान को नकारा जा सकता है ? उन्‍होंने हिमांशु शर्मा के लेखन को अपने निर्देशन से पर्दे तक पहुंचाया और सभी दर्शकों की पसंद बना दिया। इस फिल्‍म के कंटेंट को लेकर बातें हो सकती हैं। आनंद राय तो स्‍वीकार करते हैं कि वे अपनी फिल्‍मों में क्रांति नहीं कर सकते। वे सामान्‍य किस्‍म की मनोरंजक फिल्‍में ही बना सकते हैं। इसे कोई आनंद राय का डिफेंस मान स‍कता है। सभी प्रकार की आश्‍ंकाओं और आरोपों के बावजूद तनु वेड्स मनु रिटर्न्‍स पहली छमाही की बड़ी हिट है। इसे ब्‍लॉकबस्‍टर या सुपरहिट कहते हैं। और कंगना रनोट इस छमाही की उपलब्धि हैं।
तनु वेड्स मनु रिटर्न्‍स के साथ बदलापुर’,’दम लगा के हइसा’,’एनएच 10’,’हंटर और पीकू पहली छमाही की हिट फिल्‍में हैं। इन फिल्‍मों के कलाकारों और कंटेंट पर गौर करें तो कुछ समान तथ्‍य निकलते हैं। इन सभी फिल्‍मों में कोई मेल सुपरस्‍टार नहीं है। छह में से तीन फिल्‍में नायिका प्रधान है। उन फिल्‍मों में अनुष्‍का शर्मा,दीपिका पादुकोण और कंगना रनोट ने साबित किया है कि लेखक और निर्देशक ढंग से उनका इस्‍तेमाल करें तो वे अपनी करतब से बजब ढा सकती है। उक अकेली बदलापुर ऐसी फिल्‍म है,जिसमें अपेक्षाकृत पॉपुलर स्‍टार था। वरुण धवन को अभी सुपरस्‍टार नहीं कहा जा सकता। उस फिल्‍म में सहयोगी कलाकारों की भूमिका उल्‍लेखनीय रही। इन सभी फिल्‍मों के निर्देशक नए और प्रयोगशील हैं। उन्‍होंने हिंदी फिल्‍मों के पारंपरिक ढांचे में ही रह कर कुछ नया किया है। अच्‍छी बात है कि इनमें रेगुलर प्रेमकहानी भी नहीं है। और न ही  हिंदी फिल्‍मों के बाकी प्रचलित मसालों का इस्‍तेमाल किया गया है।

2015 की दूसरी छमाही में पॉपुलर स्‍टारों की फिल्‍में आएंगी। इन फिल्‍मों की शुरूआत सलमान खान की फिल्‍म बजरंगी भाईजान से हो रही है।पहली छमाही में रह गई कसर दूसरी छमाही की फिल्‍मों की कमाई से शायद संतुलित हो जाए। दो-चार सौ करोड़ी फिल्‍में भी आ जाएं। देखना रोचक होगा कि कंगना की छलांग को कौन-कौन पार कर पाता है ?