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Tuesday, September 18, 2018

सिनेमालोक : भट्ट साहब की संगत

सिनेमालोक

भट्ट साहब की संगत
( महेश भट्ट की 70 वें जन्मदिन पर खास)
-अजय ब्रह्मात्मज
कुछ सालों पहले तक महेश भट्ट से हफ्ते में दो बार बातें और महीने में दो बार मुलाकातें हो जाती थीं.आते-जाते उनके दफ्तर के पास से गुजरते समय कभी अचानक चले जाओ तो बेरोक उनके कमरे में जाने की छूट थी. यह छूट उन्होंने ने ही दी थी. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के बात-व्यवहार को समझने की समझदारी उनसे मिली है.उनके अलावा श्याम बेनेगल ने मेरी फिल्म पत्रकारिता के आरंभिक दिनों में अंतदृष्टि दी. फिलहाल महेश भट्ट की संगत के बारे में.इसी हफ्ते गुरुवार 20 सितम्बर को उनका 70 वां जन्मदिन है.
भट्ट साहब से मिलना तो 1982(अर्थ) और 1984(सारांश) में ही हो गया था. दिल्ली में रहने के दिनों में इन फिल्मों की संवेदना ने प्रभावित किया था.समानांतर सिनेमा की दो सक्षम अभिनेत्रियों(शबाना आज़मी और स्मिता पाटिल) की यह फिल्म वैवाहिक रिश्ते में स्त्री पक्ष को दृढ़ता से रखती है.घर छोड़ते समय पूजा का जवाब ऐसे रिश्तों को झेल रही तमाम औरतों को नैतिक ताकत दे गया था.इस एक फिल्म ने शबाना आज़मी को समकालीन अभिनेत्रियों में अजग जगह दिला दी थी.कई बार फिल्म के किरदार अभिनेता-अभिनेत्रियों के व्यक्तित्व को नै छवि दे देते हैं. फिर भट्ट साहब कीसारांश' ने संवेदना और सहानुभूति के स्तर पर बी वी प्रधान की पीड़ा ने हिला दिया था.एक निर्देशक से यह दर्शक का परिचय था.
संयोग कुछ ऐसा बना कि मुंबई आना हुआ.यहां फिल्म पत्रकारिता से जुड़ने का वासर मिला. अध्ययन और शोध में रूचि होने से फिल्मों की ऐतिहासिक और सामाजिक और राजनीतिक आयामों पर विचार करने की आदत पड़ी.भट्ट साहब से दो-चार सामान्य मुलाकातें हो चुकी थीं.तभी भोपाल में आयोजित एक सेमिनार में भट्ट साहब के साथ मंच शेयर करने का मौका मिला.साम्प्रदायिकता के सवालों पर केन्द्रित उस सेमिनार में मैंने महेश भट्ट की विवादित और पुरस्कृत फिल्म  ‘ज़ख्म' के हवाले से कुछ बातें की थीं.सेमिनार में मौजूद श्रोताओं और मित्रों को आश्चर्य हुआ था की कैसे कोई भट्ट साहब की आलोचना उनके सामने कर सकता है.दूसरों की सोच से लग भट्ट साहब ने हाथ मिलाने के साथ आदतन गले से लगा लिया था.
उन दिनों मैं मुंबई में दैनिक जागरण का फिल्म प्रभारी था.फिल्म पत्रकारिता के पहलुओं को समझते हुए प्रयोग कर रहा था.मुंबई पहुँचने के दो दिनों के अन्दर ही भट्ट साहब के पीआरओ का फ़ोन आया कि भट्ट साहब तुम से मिलना चाहते हैं.इस सन्देश के साथ उसने मुझ से पूछा कि तुम ने भोपाल में ऐसा क्या बोल दिया कि वे तुम से प्रभावित हैं.आकर मिलो...तय समय पर मुलाक़ात हुई.भट्ट साहब ने फिर से गले लगाया और कहा कि फिल्म पत्रकारिता में आप जैसी सोच के पत्रकारों को अधिक सक्रिय होना चाहिए.आप मुझ से मिलते रहें.अमूमन ऐसी भिडंत के बाद फिल्मी हस्तियाँ नाराज़ हो जाती हैं और नज़रन्दाज करती हैं और यहाँ भट्ट साहब खुद ही संगत का न्योता दे रहे थे.मुझे अपनी नज़र में रख रहे थे.उसके बाद मुलाकातें बढीं और फिर एक समय आया कि उनके साथ काम करने का मौका मिला.
भट्ट साहब की संगत हमेशा प्रेरक रही.मैंने उन्हें कभी निराश और हताश नहीं देखा.कई बार नाउम्मीदी से घिरने पर उनसे संबल मिलता रहा है.रिश्तों की उलझनों की ऐसी बारीक समझ कम निर्देशकों और व्यक्तियों में मिलती है.उनकी साफगोई के पीछे अनुभवों का पुलिंदा है.फिल्मों से अलग उनका एक सांस्कृतिक और दार्शनिक व्यक्तित्व है.वे घनघोर किस्म से राजनीतिक और साम्प्रदायिकता विरोधी व्यक्ति हैं.कुछ साल पहले तक वे हर विषय और मुद्दे पर बोलने के लिए तैयार मिलते थे.अभी उन्होंने खुद को सीमित कर लिया है.कुछ तो उम्र और कुछ देश का महौल ऐसा है कि विवेकी जन भी ख़ामोशी इख़्तियार कर रहे हैं.
70 वें जन्मदिवस पर भट्ट साहब को हार्दिक बधाई.


Tuesday, September 11, 2018

फ़िल्म समीक्षा : वन्स अगेन

फ़िल्म  समीक्षा 
वन्स अगेन 
-शोभा शमी
वो खट से फोन रखती थी....... तारा. 
वो फोन पर दूसरी तरफ आंखे मींचे टूं टूं टूं सुनता था........ अमर.

तारा हर बार जब यूं फोन रखती है तब बुरा सा क्यों लगता है? हर कॉल पर लगता है कि अरे इतनी छोटी बात. अभी तो कुछ कहा ही नहीं. कोई ऐसी बात जो कुछ जता सके. ये एक दूसरे से कुछ कहते क्यों नहीं! कुछ नहीं कहते ऐसा जो शायद उन्हें कह देना था. या शायद यही खूबसूरती है कि वो कुछ नहीं कहते. 
एक अजीब सी तसल्ली है उन दोनों के फोन कॉल्स में. जो प्रेम में पड़े किन्हीं दो लोगों में आसानी से दिख जाती है. एक इच्छा जो उनके चेहरे पर साफ पढ़ी जा सकती है. बहुत बारीक. बहुत महीन. उन फोन कॉल्स में ऐसी कोई बात नहीं है सिवाए उस चाहना के जो बिना कुछ कहे सबकुछ कहती जाती है. 
दरअसल पूरी फिल्म ही ऐसी है जो कुछ नहीं कहती. जो प्रेम, चाहत और इच्छाओं की बात आखिर में करती है और बीच सारा वक्त उस प्रेम को बुनती रहती है. 
और ये असल जीवन के इतनी करीब महसूस होता है कि ऐसा लगता है कि अपनी एक किश्त की डायरी पलट ली हो पूरी. 

फिल्म जैसे स्मृतियों के रंग में है. हमारी अपनी स्मृतियों में भी मुलाकातों के अलावा कुछ नहीं है. कोई शोर नहीं है. कोई आवाज नहीं है. ऐसा जैसे प्रेम की स्मृति में होता है. सिर्फ रंग और अहसास में. वो सारा शोर और बाहरी दुनिया कहीं गुम जाती है हमेशा. 

मुम्बई की भीड़भरी सड़कों और शोर से फिल्म कितनी मोहब्बत से खेलती है. नीरज कबि खुद कहते हैं कि, ‘फिल्म में मुम्बई तीसरा और स्टैटिक कैरैक्टर है’. 

तारा अपने भीड़ भड़ाके वाले कैफे में है. अचानक अमर का फोन आता है और सारा शोर एकबारगी थम जाता है. उस फोन कॉल के बाद वो अपनी दुनिया में लौटती है और शोर भर जाता है. 


तारा का मच्छी बाज़ार जाना... मछलियां कट रही हैं. मसाले कुट रहे हैं. एक पैकेट मसाला पैक हो रहा है. तारा के आस पास शोर ही शोर है और अगले ही फ्रेम में धक्क सी चुप्पी है. कोई आवाज़ नहीं है. तारा हाथों पर सिर रखे बैठी है. सामने फोन रखा है. तारा की दो दुनियाएं, दो फ्रेम में खट से हमारे भीतर उतरती हैं. 



बहुत सुंदर पैटर्न है. जिस तरह से फिल्म के बहुत से फ्रेमों में बिना किसी डॉयलॉग और म्यूजिक के सिर्फ शोर है. और अचानक अगले फ्रेम में चुप्पी. और संगीत की वो सुंदर धुन जब वो दोनों साथ होते हैं या मिलकर लौट रहे होते हैं. 

दोनों के उस प्रेम में एक बहुत सहज सा सुचकुचाहट है. एक कौतुक. एक दूसरे को ना जानने का आश्चर्य औऱ इच्छा.  
“जैसा सोचा था आप वैसे ही हैं.”
“आप हमेशा यहां आते हैं?” 
एक दूसरे को न जानने का भाव. दो जीवन का अंतर जहां एक बहुत शिद्दत है. रिश्ता भी है. लेकिन एक अंतर, एक दूरी भी है. एक दूसरे को न जानने की. जो बहुत इंटेंस है.  
“आप किसके साथ आते हैं?”
“पहली बार किसी के साथ आया हूँ.”


जब दूर छोर पर वो उसे एकटक देखती है और बस देखती रह जाती है तो आपको अपनी एक बहुत अधूरी सी मुलाकात याद आती है. बहुत बारीक. महीन.

चाह किसी तड़कती भड़कती सी पार्टी या गुलाब के फूल लिए नहीं है. वो अपने किस्म की सादगी में है. जिसमें शिद्दत है. जुम्बिश है. धड़कन है. और बहुत मासूम बातें हैं जिनपर प्यार आ जाता है.


“अच्छा आप जिद भी करते हैं?”
“मैं ज़िद ना करता तो आप मिलतीं?”

“मुझे देखकर चलेंगी तो गिर जाएंगी आप.” (तारा सच में अमर को देखकर चल रही है)
“बाकी लोगों को आपको घूरना अच्छा लगता होगा पर मुझे कोई शौक नहीं है आपको देखने का” “लेकिन मुझे आपको देखना बहुत पसंद है” (अमर तारा को देख रहा है).

अमर: “आपको तो अगली फ़िल्म में कास्ट करना चाहिए.”
पहले तो आप मुझे अफोर्ड नहीं कर पाएंगे और दूसरा मैं आपके साथ एक्टिंग नहीं करना चाहती..
अमर पूछता है वो क्यों? उस क्यों का कोई जवाब नहीं आता.. बैकग्राउंड में एक खूबसूरत गाना बजता है. और एक लॉन्ग शॉट में दोनों कार में हंस रहे हैं.

फिल्म के सारे हिस्से इतने असल हैं. प्रेम कहानी के इतर दो परिवारों के बीच की धुकधुकी. उनका आपसी सामंजस्य. हर कैरैक्टर का अपने किस्म का अकेलापन या उलझन. जो अपनी अपनी लेयर लिए चलता है. और उस सब का बैलेंस. जो कि अद्भुत है. जो कहीं भी डिगा या इधर उधर नहीं होता. बिल्कुल वैसा जैसे फ़िल्म में तारा कहती है कि एक वक्त पर पता चल जाता है कि सबकुछ कैसा होगा. अच्छा, बुरा या बहुत अच्छा.
 ये बात भी तारा फोन पर कहती है. फिर कुछ कहकर खट से फोन रखती है और अमर सुनता है..टूं टूं टू.!

Friday, September 7, 2018

फिल्म समीक्षा : गली गुलियाँ

फिल्म समीक्षा
गली गुलियाँ
-अजय ब्रह्मात्मज
दिल्ली के चांदनी चौक की तंग गलियों में से एक गली गुलियाँ  से गुजरें तो एक  पुराने जर्जर मकान में खुद्दुस मिलेगा. बिखरे बाल, सूजी आंखें,मटमैले पजामे-कमीज़ में बदहवास खुद्दुस बाहरी दुनिया से कटा हुआ इंसान है. उसने अपनी एक दुनिया बसा ली है. गली गुलियाँ में उसने जहां-तहां सीसीटीवी कैमरे लगा रखे हैं. वह अपने कमरे में बैठा गलियों की गतिविधियों पर नजर रखता है. वह एक बेचैनी व्यक्ति है. उसे एक बार पीछे के मकान से मारपीट और दबी सिसकियों की आवाज सुनाई पड़ती है. गौर से सुनने पर उसे लगता है कि बेरहम पिता अपने बेटे की पिटाई करता है. खुद्दुस उसके बारे में विस्तार से नहीं जान पाता. उसकी बेचैनी बढ़ती जाती है. वह अपनी  बेचैनी को खास दोस्त गणेशी से शेयर करता है. अपने कमरे में अकेली जिंदगी जी रहे खुद्दुस  का अकेला दोस्त गणेशी ही उसकी नैतिक  और आर्थिक मदद करता रहता है. वह उसे डांटता-फटकारता और कमरे से निकलने की हिदायत देता है.खुद्दुस एक बार हाजत में बंद होता है तो वही उसे छुदाता है.पता चलता है कि गली गुलियाँ से निकल चुके अपने ही छोटे भाई से उसकी नहीं निभती.उसकी एक ही चिंता है कि कैसे वह पीछे के माकन के पिटते बच्चे को बचा ले.उसका ज़ालिम पिता कहीं उसकी जान न ले ले.
दीपेश जैन निर्देशित 'गली गुलियाँ' समाज से अलग-थलग पद गए खुद्दुस की कहानी कहती है. दीपेश जैन की यह पहली फिल्म है.उन्होंने किसी पारंगत निर्देशक की सूझ-बूझ का परिचय दिया है. उनकी तकनीकी टीम का उचित योगदान दीखता है.खास कर कैमरा,पार्श्व संगीत और संपादन में की सुघड़ता प्रभावित करती है.निश्चित ही मनोज बाजपेयी से उन्हें अतिरिक्त मदद मिली है.फिल्म में नाटकीयता नहीं है. एक अकेके व्यक्ति के मानस की खोह में उतरती यह फिल्म एक समय के बाद भावनाओं की आवृति से दर्शकों को भी मथ देती है.दर्शक चाहता है कि खुद्दुस की व्यथा का निस्तार हो ताकि वह स्वयं थोड़ी रहत महसूस करे.बन कमरे और तंग गलियों में तैर रही घबराहट दर्शकों के मन पर हावी होने लगती है.मेरे साथ तो यही हो रहा था.मैं चाहने लगा था की खुद्दुस को मुक्ति मिले.मुझे उसके व्यक्तित्वे से जुगुप्सा सी होने लगी थी.अगर वह बगल की कुर्सी पर आ बैठता तो शायद मैं उठ जाता या बैठे रहने का दवाब होने पर खुद को सिकोड़ लेता.यह दीपेश की खूबी है और मनोज बाजपेयी की खासियत है.
मनोज बाजपेयी इस दौर के बहुआयामी अभिनेता हैं.अभी वह एक तरफ 'सत्यमेव जयते' जैसी घोर कमर्शियल फिल्म के साथ 'गली गुलियाँ' कर रहे हैं.मज़ेदार यह है कि वह दोनों तरह की भूमिकाओं में सराहना पा रहे हैं.ऐसा लगता है कि 'गली गुलियाँ' के लिए उन्हें खास मशक्कत करनी पड़ी होगी.रिलीज के पहले एक बातचीत में उन्होंने ने कहा था कि 'यह मेरे जीवन की सबसे कठिन और जटिल फिल्म है. इसे करते हुए  मैं बहुत परेशान रहा. इस भूमिका ने मेरे अभिनय  की शैली और तकनीक को चुनौती दी. डेढ़ महीनों के अभ्यास में कई बार ऐसा लगा की यह मुझ से नहीं हो पाएगा. कई बार अपने अभिनेता होने पर शक हुआ. ऐसा भी लगा कि मैं जो सोचता हूं,वैसा हूं नहीं.  मुझे नई   युक्ति तलाशनी पड़ी. इस भूमिका के लिए पुरस्कार मिले तो खुद आश्वस्त हुआ यह मेरा बेहतरीन काम है.
 किसी भी भूमिका को निभाने में दो  प्रक्रियायें साथ चलती हैं. एक बाहरी होती है और एक भीतरी. किरदार के द्वंद्व और दुविधा को पकड़ पाने की मानसिक यात्रा... किरदार के सारे तत्वों को जोंड़कर चल पाना... यह एक जटिल प्रक्रिया होती है. किरदार के  मानसिक उथल-पुथल को चेहरे पर लाकर दर्शकों तक पहुंचाना ही असल चुनौती है.  इस फिल्म में संवाद कम है. किरदार खामोश रहता है. उसका संबंध सिर्फ दीवारों और सीसीटीवी मॉनिटर के साथ हैं. कमरे के पुराने पंखे और मकड़ी के जालों के साथ उसका रिश्ता है. वह कमरे में अकेला रहता है. हिंदी  फिल्मों में ऐसे किरदार कम दिखे हैं.'
अवधि :157 मिनट 
**** चार स्टार . .


Tuesday, September 4, 2018

सिनेमालोक : पलटन की पृष्ठभूमि


सिनेमालोक

पलटन की पृष्ठभूमि
-अजय ब्रह्मात्मज
 इस हफ्ते जेपी दत्ता कीपलटनरिलीज होगी. उनकी पिछड़ी युद्ध फिल्मबॉर्डर’  और  एलओसी कारगिलकी तरह यह भी युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी हुई फिल्म है.बॉर्डर  और एलओसी कारगिल क्रमश: 1965 और 1999 में पाकिस्तान से हुए युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्में थीं.पलटनकी पृष्ठभूमि चीन के साथ 1967 में हुई झडप है. इस बार जेपी दत्ता भारत के पश्चिमी सीमांत से निकलकर पूर्वी सीमांत पर डटे हैं.उन्होंने छह सालों के अंतराल पर पिछले दोनों युद्ध फिल्में बना ली थीं.पलटनपंद्रह  सालों के बाद आ रही है.
1962 में हिंदी चीनी भाई-भाई के दौर में चीन के आकस्मिक आक्रमण से देश चौंक गया था. पर्याप्त तैयारी नहीं होने से उस युद्ध में भारत की हार हुई थी.  पंचशील के प्रवर्तक और चीन के मित्र भारतीय प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू को भारी सदमा लगा था. हम सभी भारतीय इस तथ्य को नहीं भूल पाए हैं कि चीन ने भारत के पीठ में छुरा घोंप दिया था. उसे युद्ध में जानमाल के नुकसान के साथ देश का मनोबल टूटा था. कहते हैं नेहरु उस सदमे से कभी नहीं निकल पाए.उस युद्ध से देश ने सबक भी लिया था.
भारत  ने पूर्वी सीमांत पर सेनाओं के चौकसी बढ़ा दी थी. हथियारों से लैस करने के साथ उन्हें किसी भी संभावित युद्ध से निबटने की ट्रेनिंग मिल चुकी थी. यही वजह है कि 5 सालों के बाद 1967 के सितंबर  महीने में जब चीन ने घुसपैठ की भारतीय सैनिकों ने मुंह तोड़ पलटवार किया. उन्हें पीछे हटने पर मजबूर किया. 11 सितंबर 1967 को चीन में नाथुला इलाके में उपद्रव किया था. इसकी भूमिका 5-6 महीने पहले से बन रही थी. भारत बार-बार चीन को आगाह कर रहा था,लेकिन चीन 1962 की जीत के मद में कुछ भी सुनने को तैयार नहीं था. उल्टा पत्र लिखकर 1962 की याद दिलाते हुए धमकी दे रहा था कि भारत को सावधान रहना चाहिए.
इस बार भारत ने नाथूला में चीन को अपनी मनमानी नहीं करने दी.चार दिनों में ही भारत के वीर सैनिकों ने चीनी सैनिकों को खदेड़ दिया और नाथूला में भारतीय झंडा फहराया. इस झड़प में चीन के सैकड़ों सैनिकों की जानें गई. आहत चीन ने अगले महीने ही स्थान बदल कर चो ला  में घुसपैठ की. यहाँ भी भारतीय सैनिकों ने उन्हें धूल चटाई. इन झड़पों में भारतीय सेना के शौर्य गाथा के बारे में आम भारतीय अधिक नहीं जानते. जेपी दत्ता कीपलटनइन झड़पों में भारत के युद्ध नीति, कौशल और विजय की रोमांचक कहानी पर्दे पर चित्रित करेंगी. अपनी पुरानी फिल्मों की तरह जेपी दत्ता ने युद्ध के चित्रण को वास्तविक रंग दिया है. सीजी और वीएफक्स की तकनीकी मदद से फिल्म का प्रभाव बढ़ाने में सुविधा मिली है.
जे पी दत्ता की पिछली दोनों युद्ध फिल्मों में उस समय के पॉपुलर स्टार थे. उनकी वजह से फिल्म का आकर्षण थोड़ा ज़्यादा था. इस बार अपेक्षाकृत कम पॉपुलर स्टारों के साथ उन्होंने यह फिल्म बनाई है. फिल्म की बहुत अधिक चर्चा और प्रचार नहीं है. पिच्च्ली दोनों फिल्मों की जबरदस्त कामयाबी और जेपी दत्ता का नाम ही मुख्य आकर्षण है. हिंदी में युद्ध फिल्में बनाने में जेपी दत्ता का सानी नहीं है. पहले भी वह इसे साबित कर चुके हैं.
1967 में 11 सितंबर को नाथूला की घटना घटी थी. 51 सालों के बाद 7 सितंबर 2018 को यह फिल्म रिलीज हो रही है. पडोसी देशों के बीच युद्ध न होना अच्छी स्थिति है, लेकिन हो चुके युद्ध को सिनेमा के पर्दे तक ले आना भी एक जरूरी काम है.


Friday, August 31, 2018

फिल्म समीक्षा : स्त्री

 फिल्म रिव्यू
स्त्री
-अजय ब्रह्मात्मज

अमर कौशिक निर्देशित ‘स्त्री’ संवादो,किरदारों और चंदेरी शहर की फिल्म है. इन तीनों की वजह से यह फिल्म निखरी है. सुमित अरोड़ा, राजकुमार राव, पंकज त्रिपाठी,अपारशक्ति खुराना,अभिषेक बनर्जी और चंदेरी शहर की खूबियों का अमर कौशिक ने रोचक मिश्रण और उपयोग किया है. हिंदी फिल्में घिसी-पिटी लकीर से किसी भी नई पगडंडी पर निकलती है तो नजारा और आनंद अलग होता है. ‘स्त्री’ प्रचार हॉरर कॉमेडी फिल्म के तौर पर किया गया है. यह फिल्म हंसाती और थोड़ा डराती है. साथ-साथ टुकड़ों में ही सही लेकर बदल रहे छोटे शहरों की हलचल,जरूरत और मुश्किलों को भी छूती चलती है.

चंदेरी शहर की मध्यवर्गीय बस्ती के विकी .बिट्टू और जना जवान हो चुके हैं. विकी का मन पारिवारिक सिलाई के धंधे में नहीं लगता. बिट्टू रेडीमेड कपड़े की दुकान पर खुश नहीं है. जना पास कोई काम नहीं है. छोटे शहरों के ये जवान  बड़े शहरों के बयान से बदल रहे हैं. बातचीत में अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल कर धौंस जमाते हैं.विकी तो ‘चंदेरी के मनीष मल्होत्रा’ के नाम से मशहूर है. उनकी ठहरी और सुस्त जिंदगी में तब भूचाल आता है, जब विकी की मुलाकात अचानक एक लड़की से हो जाती हैं. लड़की का नाम-पता विकी को भी नहीं मालूम.

शहर में चर्चा है पूजा के पहले चार दिनों मेंकोई स्त्री(चुड़ैल) आती है और मर्दों को उठा ले जाती है.वह  केवल उसके कपड़े फेंक जाती है. बिट्टू और जना को लगता है कि विकी के पीछे भी हो ना हो कोई ना कोई स्त्री है. चिंता के साथ ईर्ष्या की वजह से विकी को सावधान करते हैं. गांव के पुस्तक भंडार के मालिक रुद्र चुड़ैलों के विषय के ज्ञाता हैं.  अंदर से डरपोक लेकिन खुद को जानकार बताने वाले रूद्र इन तीनों को सलाह और मदद देते हैं. हास्य के पुट के साथ फिल्म रहस्य और डर भी रचती है. ‘ओ स्त्री कल आना’ का प्रसंग रोचक और कहानी में गुंथा हुआ है.

नई फिल्मों और नई भूमिकाओं के साथ राजकुमार राव के आयाम खुलते जा रहे हैं. इस फिल्म के सामान्य से किरदार को उन्हें शिद्दत और जरूरी भाव के साथ पर्दे पर निभाया है. छोटे शहर के युवकों की शेखी,शर्म और शरारत को वे अच्छी तरह अपनी चाल और भूल  बोलचाल के लहजे में ले आते हैं. उनके साथअपारशक्ति खुराना और अभिषेक बनर्जी की तिगड़ी जमती है. तीनों ने बहुत खूबसूरती से छोटे शहरों के युवकों की मासूमियत और शोखी पकड़ी है. दृश्यों में पंकज त्रिपाठी के आते ही निखार आ जाता है. इस फिल्म के कई दृश्यों में ऐसा लगता है कि कलाकार तत्क्षण अपनी प्रतिक्रिया और बातों से कुछ नया टांक देते हैं, जो उस दृश्य की खूबसूरती को बढ़ा देता है. सुमित अरोड़ा के संवादों का धागा तो उन्हें मिला ही हुआ है.कलाकारों में श्रद्धा कपूर इन सक्षम अभिनेताओं के साथ कदम नहीं मिला पातीं. सीमित भावों की श्रद्धा कपूर को यह सपोर्ट मिल गया है कि वह बाहर से आई लड़की हैं.

अवधी : 108 मिनट
***1/2

Tuesday, August 28, 2018

सिनेमालोक : हिंदी फिल्मों के दर्शक

सिनेमालोक

हिंदी फिल्मों के दर्शक
-अजय ब्रह्मात्मज

पिछले 6 सालों में दिल्ली और हिंदी प्रदेशों मैं हिंदी फिल्मों के दर्शकों की संख्या बढ़ी है. इस बढ़त के बावजूद अभी तक हिंदी फिल्मों की कमाई  में मुंबई की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा होती है. ताजा आंकड़ों के अनुसार इस साल मुंबई की हिस्सेदारी 31.37 प्रतिशत रही है.2012 में मुंबई की हिस्सेदारी 36.28 प्रतिशत थी. लगभग 5 प्रतिशत  की कमी शिफ्ट होकर दिल्ली और दूसरी टेरिटरी में चली गई है. कारोबार के हिसाब सेभारत में 13 टेरिटरी की गणना होती है. दशकों से ऐसा ही चला रहा है. इनके नए नामकरण और क्षेत्रों के विभाजन पर कभी सोचा नहीं गया.  मसलन अभी भी सीपी, ईस्ट पंजाब और निजाम जैसी टेरिटरी चलती हैं. राज्यों के पुनर्गठन के बाद इनमें से कई टेरिटरी एक से अधिक राज्यों में फैली है. पारंपरिक रूप से दिल्ली और यूपी एक ही टेरिटरी मानी जाती है.
हिंदी प्रदेशों के हिंदी भाषी दर्शक इस भ्रमित गर्व में रहते हैं हिंदी फिल्में उनकी वजह से ही चलती हैं. सच्चाई यह है राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों को मिलाने के बावजूद फिल्मों की कुल कमाई में हिंदी प्रदेशों का प्रतिशत 25 से अधिक नहीं होता. बिहार-झारखंड का ही उदाहरण लें तो इस साल बढ़त के बावजूद उनका योगदान 2.9 प्रतिशत है. मैसूर,ईस्ट पंजाब और वेस्ट बंगाल का योगदान 5 प्रतिशत से अधिक ही है. हिंदीभाषी दर्शकों को निराधार इतराने से निकलना चाहिए. कोशिश होनी चाहिए कि वे थियेटर में जाकर फिल्में देखें. जाहिर सी बात है कि हिंदी प्रदेशों में ज्यों-ज्यों  मल्टीप्लेक्स बढ़ेंगे त्यों-त्यों दशकों में इजाफा होगा.
पिछले 6 सालों में मुंबई समेत सीआई, राजस्थान, निजाम और उड़ीसा में हिंदी फिल्मों के दर्शकों की संख्या में गिरावट आई है, जबकि दिल्ली-यूपी, ईस्ट पंजाब,सीपी, मैसूर, वेस्ट बंगाल, बिहार-झारखंड, आसाम और टीएनके में हिंदी फिल्मों के दर्शक बढे हैं.यह परिवर्तन शुभ है. दर्शकों की तादाद फिल्मों के विषय तय करती है. गौर करें तो पिछले कुछ सालों में हिंदी फिल्मों की कहानियां मुम्बई से निकल कर देश के अंदरूनी इलाकों में जा रही हैं. निश्चित ही हिंदी प्रदेशों में हिंदी फिल्मों के दर्शक हैं. यह स्वाभाविक है. दिक्कत यह है कि इन दर्शकों में से अधिकांश सिनेमाघरों में जाकर फिल्में नहीं देखते.इसके कई कारण हैं. सिनेमाघर लगातार टूट और बंद हो रहे हैं.कस्बों के सिनेमाघरों पर ताले लग रहे हैं.पहले रिपीट या देर से रिलीज की सुविधा होने से छोटे सिनेमाघरों में भी फिल्में आ जाती थीं. अब नई से नई फिल्म रिलीज के दिन ही देश-विदेश में पहुंच जाती हैं.रिलीज के वीकेंड ।इन ही दर्शक फिल्में देखना चाहते हैं. सिनेमाघर न होने से वंचित दर्शक दूसरे प्लेटफार्म पर फिल्में देख लेते हैं. मुम्बई के निर्माताओं को यकीन नहीं होगा,लेकिन यही कड़वा तथ्य है कि दर्शक स्मार्टफोन पर उनकी ताज़ा फिल्में देख रहे हैं.
दर्शकों की प्राथमिकताओं का खयाल रखते हुए निर्माताआ,वितरक और प्रदर्शकों को युक्ति निकालनी पड़ेगी. मोबाइल नेटवर्क,डाटा डिस्ट्रीब्यूटर और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की मदद से वे दर्शकों तक पहुंच कर खो रहे रेवेन्यू को हासिल कर सकते हैं. छोटे और स्मार्ट सिनेमाघरों के निर्माण पर भी ध्यान देने की ज़रूरत है. काम सीटों और आधुनिक सुविधाओं से लैस सिनेमाघर हों. स्थिति यह है कि राज्यों की राजधानियों के बाहर के शहरों-कस्बों में सिनेमाघर बनाने में प्रशासन और स्थानीय व्यापारियों का ध्यान नहीं है। इसके साथ ही मौजूद मल्टीप्लेक्स में टिकट दर भी कम करना होगा.

Tuesday, August 21, 2018

सिनेमालोक : निक और प्रियंका : प्रशंसकों की आशंका


सिनेमालोक

 निक और प्रियंका : प्रशंसकों की आशंका

-अजय ब्रह्मात्मज

 अमेरिका के गायक निक जोनस और अमेरिका में नाम कमा रही भारतीय अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा का अभीरोकाहुआ है. शादी अभी दूर है. दोनों में से किसी नेअभी तक इसका संकेत नहीं दिया है.रोका’(मंगनी) हुआ है तो देर-सवेर शादी भी होगी. दोनों सेलिब्रिटी हैं. उनके सामने उनका भविष्य और कैरियर हैं. जाहिर सी बात है कि फुरसत पर सुविधा होने पर दोनों परिणय सूत्र में बंध जाएंगे. अभी कहना मुश्किल है कि शादी के बाद उनका आशियाना भारत में होगा या अमेरिका में? किसी भी देश को वे अपना स्थायी ठिकाना बनाएं. इतना तय है कि दोनों में से कोई भी कैरियर से संन्यास नहीं लेगा.दोनों एक-दूसरे की जरूरतों का ध्यान रखते हुए परस्पर मदद ही करेंगे.
निक जोनस और प्रियंका चोपड़ा के साथ होने से दोनों के परिजन और प्रशंसक खुश हैं. परिजनों को तो मालूम रहा होगा लेकिन प्रशंसकों के लिए इतनी जल्दबाजी में सब कुछ हो जाना हैरानी की बात है. अमूमन सेलिब्रिटी शादी जैसे बड़े फैसले में वक्त लगाते हैं. ज्यादा उन्हें अपने कैरियर का ख्याल रहता है. भारत में खुद को स्थापित करने के बाद प्रियंका चोपड़ा ने अमेरिका के टीवी और फिल्म जगत में भी जोरदार दस्तक दी है. वहां उन्हें अभी और भी मंजिलें तय करनी है .वह भारत मैं हिंदी फिल्म भी कर रही हैं. उन्होंने अपने समय और फोकस को बहुत अच्छी तरह दोनों महाद्वीपों में बांट रखा है. दूसरी तरफ निक जोनस अभी अपने करियर की चढ़ाई पर हैं. उन्हें कामयाबी के अनेक पायदान चढ़ना है.इस पृष्ठभूमि में दोनों को बहुत सोच-समझकर अपने कदम उठाने होंगे. दोनों कामयाब होने के साथ इतने समझदार हैं कि वे अपने भविष्य विवाह को लेकर उचित निर्णय ले सकें.
 प्रियंका चोपड़ा और निक जोनस  की उम्र में 11 साल का फर्क है. प्रेम और विवाह में ऐसे फर्क सचमुच कोई फर्क नहीं पड़ता. फिल्म  बिरादरी में अनेक जोड़ियों के बीच उम्र का यह फासला रहा है. दिलीप कुमार और सायरा बानो की उम्र में 22 सालों का अंतर है. असल चीज होती है मोहब्बत और समझदारी.  बाकी उम्र तो एक अंक मात्र है. फिर भी उन दोनों के बीच से उम्र का यह अंतर और पूर्व एवं पश्चिम से होने की वास्तविकता से उनके प्रशंसक आशंकित हैं.रोकाके दिन ही उनके घोर प्रशंसक  पत्रकार ने चिंता व्यक्त की,’ क्या लगता है? दोनों की शादी चल पाएगी?’ मैंने उनकी चिंता की वजह पूछी. उनके पास कोई ठोस आधार नहीं था फिर भी वे  उन आशंकित प्रशंसकों की चिंता ही जाहिर कर रहे थे,जिन्हें लगता है कि निक जोनस और प्रियंका चोपड़ा की शादी टिकने वाली नहीं है.
आज मिलेनियल पीढ़ी के इस दौर में रिश्ते स्थायी होने के पहले ही दरकने लगते हैं. ऐसा माना और कहा जाता है कि नई पीढ़ी त्याग और जिम्मेदारियों से भागती है. दबाव पड़ने पर वे एक-दूसरे का सहारा बनने के बजाय पहले मौके पर कन्नी काट लेते हैं. पिछली और पुरानी पीढ़ी ने मिलेनियल पीढ़ी के बारे में गलत धारणाएं बना रखी हैं. पीढ़ियों के अंतर के बीच पल रही ऐसी गलतफहमियां नई नहीं है. फिल्मों से ही उदाहरण लें अतीत में अनेक अभिनेत्रियों ने विदेशियों से शादी की और आज सुखी दांपत्य जीवन जी रही हैं. प्रीति जिंटा,सेलिना जेटली,श्रिया सरन और राधिका आप्टे का उदाहरण मौजूद है. प्रियंका चोपड़ा बुद्धिमान है.  खुद निक जोनस उनकी बुद्धिमत्ता के कायल हैं. हम आशंकाओं को किनारे रख कर हम तो यही चाहेंगे दोनों सुखी और संपन्न रहें.


Thursday, August 16, 2018

फिल्म समीक्षा : सत्यमेव जयते

फिल्म समीक्षा : सत्यमेव जयते 

सत्य की जीत 
-अजय ब्रह्मात्मज

शब्दों को ढंग से संवाद में पिरोया जाये तो उनसे निकली ध्वनि सिनेमाघर में ताली बन जाती है.मिलाप मिलन जावेरी की फिल्म 'सत्यमेव जयते' देखते समय यह एहसास होता है कि लेखक की मंशा संवादों से तालियाँ बटोरने की है.मिलाप को 10 में से 5 मौकों पर सफलता मिलती है.

पिछले दिनों एक निर्देशक बता रहे थे कि हिंदी फिल्मों के संवादों से हिंदीपन गायब हो गया है.लेखकों से मांग रहती  है कि वे संवादों में आम बोलचाल की भाषा लिखें.कुछ फिल्मों के लिए यह मांग उचित हो सकती है,लेकिन फिल्में इक किस्म का ड्रामा हैं.उनके किरदार अगर अडोस-पड़ोस के नहीं हैं तो संवादों में नाटकीयता रखने में क्या हर्ज है. 'सत्यमेव जयते' संवादों के साथ ही चरित्र चित्रण और प्रस्तुति में भी नौवें दशक की याद दिलाती है. यह वह समय था,जब खानत्रयी का हिंदी सिनेमा के परदे पर उदय नहीं हुआ था और हिंदी सिनेमा घिसी-पिटी एकरसता से गर्त में जा रही थी. इस फिल्म के प्रीव्यू शो से निकलती एक फिल्म पत्रकार की टिपण्णी थी - बचपन याद आ गया.

'सत्यमेव जयते' हिंदी सिनेमा की मुख्यधारा की दशकों पुराणी तलछट पर बचे कर्कटों को जुटा कर बनायी गयी फिल्म है.इस फिल्म को देखना किसी नॉसटेलजिक फीलिंग से भर जाना है.थोड़े उम्रदराज दर्शकों को यह उनकी किशोरावस्था और जवानी के दिनों में ले जाएगी तो मिलेनिअल पीढ़ी को पुराने स्वाद से परिचित कराएगी. वे अपने दोस्तों के साथ इस फिल्म का मजाक उड़ाते हुए भी मज़े ले सकते हैं.फिल्म का शिल्प इतना साधारण है कि वह रस देने लगता है.

फिल्म में कानून के साथ और कानून अपने हाथ में लेकर चलने वाले दो किरदार हैं. दोनों आमने-सामने हैं.हम किसी एक को विलेन भी नहीं कह सकते.फिल्म की टैग लाइन 'बेईमान पिटेगा,भ्रष्टाचार मिटेगा' के अनुसार दोनों का मकसद एक ही है लेकिन उनके रास्ते अलग हैं.फिल्म रोचक तरीके से आगे बढती है.लेखक ने दोनों प्रमुख किरदारों की तनातनी को अलग अंदाज में पेश भी किया है,लेकिन जैसे ही उनके रिश्ते की जानकारी मिलती है...कहानी कमज़ोर पड़ जाती है. उसके बाद की कहानी के मोड़ दर्शक भी लिख सकते हैं.हां,यह फिल्म इतनी प्रेडिक्टेबल है. फिर भी दर्शक बंधे हुए बैठे रहेंगे,क्योंकि उनके सामने परदे पर अभिनेता मनोज बाजपेयी हैं.वे अपनी अदाकारी से हिलने नहीं देते.

कई दृश्यों में निर्देशक यूँ लिप्त हुए हैं कि सीन का उद्देश्य पूरा होने के बाद भी कैमरा बंद नहीं करते,उधर दर्शक को होने लगता है कि अब हो न गया...हम समझ गए,अगले सीन पर चलो..और एक्टर को उस सीन में हर कुछ सेकंड के बाद पूरी ऊर्जा से इमोशन के अगले पायदान पर चढ़ना होता है.थक गए होंगे मनोज बाजपेयी. इस फिल्म में  'शूल' के समर प्रताप सिंह की भी याद आती है.

अब तो जॉन अब्राहम भी एक्टिंग करते दिखने लगे हैं. 

अच्छा एक सवाल है कि हिंदी फिल्मों के ईमानदार पुलिस अधिकारी राठोड़ या प्रताप सिंह ही क्यों होते हैं? क्या उस सरनेम से ईमानदारी टपकती है,जो चौधरी,यादव या पासवान सरनेम रखने से नहीं टपकेगी?

अवधि 140 मिनट 
*** तीन स्टार 

Wednesday, August 15, 2018

फिल्म समीक्षा : गोल्ड

फिल्म समीक्षा : गोल्ड 
एक और जीत 

-अजय ब्रह्मात्मज 

इस फिल्म में अक्षय कुमार हैं और इसके पोस्टर पर भी वे ही हैं. उनकी चर्चा बाद में.

'गोल्ड' के बारे में प्रचार किया गया है कि यह 1948 में लंदन में आयोजित ओलिंपिक में आजाद भारत की पहली जीत की कहानी है.तपन दास के निजी प्रयास और उदार वाडिया के सहयोग से यह संभव हो सका था.तपन दस 1936 के उस विख्यात मैच के साक्षी थे,जब बर्लिन में बिटिश इंडिया ने गोल्ड जीता था.तभी इम्तियाज़ और तपन दास ने सोचा था कि किसी दिन जीत के बाद भारत का तिरंगा लहराएगा.आखिरकार 22 सालों के बाद यह सपना साकार हुआ,लेकिन तब इम्तियाज़ पाकिस्तानी टीम के कप्तान थे और तपन दास भारतीय टीम के मैनेजर.तपन दास भारत के पार्टीशन की पृष्ठभूमि में मुश्किलों और अपमान के बावजूद टीम तैयार करते हैं और गोल्ड लाकर 200 सालों कि अंग्रेजों कि ग़ुलामी का बदला लेते हैं.

'गोल्ड' जैसी खेल फ़िल्में एक उम्मीद से शुरू होती है. बीच में निराशा,कलह,मारपीट और अनेक रोचक मोड़ों से होते हुए फतह की ओर बढती है.सभी खेल फ़िल्में या खिलाडियों के जीवन पर आधारित फिल्मों का मूल मंत्र हिंदी फिल्मों का आजमाया मंत्र है-अंडरडॉग कि जीत.इन दिनों खेल और खिलाडियों के जीवन पर आधारित फिल्मों में राष्ट्रवाद का नवाचार चल रहा है.निर्मात,लेखक और निर्देशकों को राष्टवादी जमात में खड़ा होने का अच्छा मौका मिल जाता है.राष्ट्र गौरव की बात,देश की जीत,कुछ राष्ट्रप्रेमी संवाद और तिरंगा फहराने के साथ 'जन गन मन' का सस्वर या सांगीतिक पाठ.इन मसलों के होने पर फिल्म कीकहानी,चरित्रों के निर्वाह,प्रस्तुति और अन्विति पर दर्शकों का ध्यान नहीं जाता.वे दर्प के साथ अच्छी फीलिंग लेकर सिनेमाघरों से निकलते हैं.'गोल्ड' बिलकुल इसी प्रकार की फिल्म है.

यह सच्ची घटना पर आधारित काल्पनिक कहानी है.अगर इन्टरनेट पर भी खोज लें तो पता चल जायेगा कि पूरी टीम और खिलाडियों के नाम अलग थे.सवाल है कि ऐसी काल्पनिकता कि ज़रुरत क्यों होती है? वास्तविक खिलाडियों के नाम के साथ बी तो यह फिल्म बनायीं जा सकती थी.फिल्म में ज़िक्र होता है कि टीम पंजाब के 6 खिलाडी हैं,जबी मूल टीम में बॉम्बे के 6 खिलाडी थे.तपन दास का किरदार कमोबेश तत्कालीन टीम के कप्तान किशन लाल पर आधारित है.तथ्यों के अन अंतरों को नज़रन्दाज कर फिल्म देखें तो 'गोल्ड' निराश नहीं करती.

रीम कागटी ने आज़ादी के दौर को वास्तु,वस्र,माहौल और प्रोडक्शन के इहज से रचा है. उनकी टीम के योगदान को श्री मिलना चाहिए.केवल अक्षय कुमार और उनकी बीवी मोनी रॉय के किरदारों में थोड़ी आज़ादी इ गयी है या ढील दी गयी है.अक्षय कुमार कभी तो बंगाली लहजा ले आते हैं और कभी खालिस हिंदी बोलने लगते हैं.सहयोगी किरदारों को निभा रहे कलाकार ऐसी गलती नहीं करते.उन सभी ने अपने किरदारों को मजबूती से थम रखा है. उनकी मेहनत और लगन से ही फिल्म का प्रभाव बढ़ता है.वे किरदार याद रह जाते हैं.

इस फिल्म में सनी कौशल और विनीत कुमार सिंह संक्षिप्त भूमिकाओं के बावजूद प्रभावी हैं.उन्हें कुछ प्रभापूर्ण दृश्य मिले हैं और उन्होंने उन दृश्यों अपनी क्षमता का परिचय दिया है.किरदार के मूल स्वाभाव को समझ कर जब किरदार हव-भाव और संवाद अदायगी पर मेहनत करते हैं तो किरदार निखारते है.दिखने लगते हैं.इन दोनों के साथ अमित साध और कुनाल कपूर भी कदम मिला कर चलते हैं.अमित ने ठाकुर परिवार के एटीट्युड को साधा है और अंत तक निभाया है.

अक्षय कुमार का अभ्यास कहें या रीमा कागटी का प्रयास मानें...इस फिल्म में अक्षय कुमार कुछ दृश्यों में सधे और सटीक अभिनय से प्रभावित करते हैं.उम्र,अनुभव और विषयों की विविधता से उनके अभिनय में आया गुणात्मक बदलाव इस फिल्म में दिखता है.

रीमा कागती और उनकी टीम ने बेहतरीन प्रयास किया है.इस फिल्म का पार्श्व संगीत फिल्म की थीम को असरदार बनता है.

अवधि 153 मिनट
*** 1/2 साढ़े तीन स्टार 

Tuesday, August 14, 2018

सिनेमालोक : इस 15 अगस्त को

सिनेमालोक

 इस 15 अगस्त को 

-अजय ब्रह्मात्मज

कल 15 अगस्त है. दिन बुधवार... बुधवार होने के बावजूद दो फिल्में रिलीज हो रही हैं. अमूमन हिंदी फिल्में शुक्रवार को रिलीज होती हैं, लेकिन इस बार दोनों फिल्मों के निर्माताओं ने जिद किया कि वे दो दिन पहले ही अपनी फिल्में लेकर आएंगे. रिलीज की तारीख को लेकर वे टस से मस ना हुए. दोनों 15 अगस्त की छुट्टी का लाभ उठाना चाहते हैं. इस तरह उन्हें पांच दिनों का वीकेंड मिल जाएगा. इन दिनों शुक्रवार को रिलीज हुई फिल्मों के बारे में रविवार इन दिनों में पता चल जाता है एक ऐसा व्यवसाय करेगी?  इस बार परीक्षा के लिए दोनों फिल्मों को पांच दिनों का समय मिल जाएगा.देखना रोचक होगा इन दोनों फिल्मों को दर्शक क्या प्रतिसाद देते हैं? रीमा कागटी कीगोल्डऔर मिलाप मिलन झावेरी की फिल्मसत्यमेव जयतेआमने-सामने होंगी.

पहली फिल्मगोल्डकी पृष्ठभूमि में हॉकी है. हॉकी खिलाड़ी तपन दास के नेतृत्व में 1948 में भारत ने पहला गोल्ड जीता था. पिछले रविवार को इस उपलब्धि के 70 साल होने पर देश के सात स्थापत्यों और जगहों को सुनहरी रोशनी से आलोकित किया गया था.रीमा कागटी ने सच्ची घटना पर इस फिल्म की कहानी लिखी है. कहते हैं तपन दास के बारह सालों के अथक प्रयासों से यह मुमकिन हो पाया था. आजाद भारत में इंग्लैंड की धरती पर देश का पहला गोल्ड मेडल जीता था. राष्ट्र गौरव के क्षण को हाईलाइट करने के साथ ही जीत के संघर्ष और तैयारी पर भी रीमा ध्यान देंगी. विजेता टीम बनाना उसमें जीत का जोश भरना आसान काम नहीं रहा होगा. अक्षय कुमार इस फिल्म में तपन दास की भूमिका निभा रहे हैं.  उनकी टीम में विनीत कुमार सिंह, कुणाल कपूर, अमित साध  और सनी कौशल जैसे कलाकार हैं.

 ‘गोल्डके सामनेसत्यमेव जयतेरहेगी. मिलाप मिलन झावेरी ने आज के दौर की फिल्म में भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाया है. हम सभी जानते हैं कि भ्रष्टाचार ने देश को ग्रस्त रखा है. सीधा और ईमानदार नागरिक भ्रष्टाचारियों के चंगुल में फंसते हैं. देश को आर्थिक नुकसान होता है. प्रगति और विकास की योजनाएं रुक जाती हैं.सत्यमेव जयतेमें  जॉन अब्राहम और मनोज बाजपेयी की टक्कर दिखेगी. पहली बार दोनों कलाकार किसी फिल्म में एक साथ आ रहे हैं. इस फिल्म की कैच लाइन है -  ‘बेईमान पिटेगा, करप्शन मिटेगा’. मनोज बाजपेयी एक बार फिर पुलिस अधिकारी की भूमिका में बहादुरी दिखाएंगे. हाल ही में उन्हें ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न मेंगली गुलियां' फिल्म के लिए  एक्टर अवार्ड मिला है.

गौर करें तो दोनों ही फिल्मों की थीम राष्ट्र और देश प्रेम है. इसी वजह से उनके निर्माताओं ने रिलीज के लिए 15 अगस्त का दिन चुना है. राष्ट्रीय भावना से लबरेज इस दिन को थिएटर जा रहे दर्शकों में यह फिल्में देश प्रेम और राष्ट्रीयता का संचार करेंगी. इन दिनों हिंदी फिल्मों में राष्ट्रवाद का नवाचार चल रहा है. फिल्में किसी भी जोनर की हों . लेखक और निर्देशक की कोशिश रहती है कि किसी दृश्य, संवाद या गाने में राष्ट्र से संबंधित कुछ संदेशात्मक बातें हों.यह तरीका बहुतों को पसंद आ रहा है. अक्षय कुमार इस दौर केभारत कुमारबन गए हैं. कवि मनोज कुमार को हम इस नाम से जानते थे.  अक्षय कुमार के ठीक पीछे जॉन अब्राहम खड़े हैं. उन्होंने परमाणु’  में संकेत दिया  कि वे भी अक्षय कुमार के रास्ते पर चल रहे हैं.

देखना रोचक होगा की इस हफ्ते दर्शक किस राष्ट्रप्रेमी को अधिक पसंद करते हैं. दोनों फिल्मों के निर्माताओं और कलाकारों ने प्रचार का हर जोर लगा रखा है. वे दर्शकों को अपनी फिल्मों के लिए लुभा रहे हैं.