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Tuesday, January 15, 2019

सिनेमालोक : मृणाल सेन की ‘नील आकाशेर नीचे’


सिनेमालोक
मृणाल सेन की ‘नील आकाशेर नीचे’
-अजय ब्रह्मात्मज
हाल ही में मृणाल सेन का निधन हुआ है.पत्र-पत्रिकाओं में उन्हें याद करते हुए उनकी ‘भुवन शोम’ को बार-बार याद किया गया.इसी फिल्म से भारत में पैरेलल सिनेमा की शुरुआत मानी जाती है.हिंदी अख़बारों में इसकी अधिक चर्चा इसलिए भी होती है कि इसका वायसओवर अमिताभ बच्चन ने किया था.मृणाल सेन की ‘नील आकाशेर नीचे’ फिल्म को याद करते हुए तृषा गुप्ता ने प्यारा सा लेख लिखा है. उन्होंने उल्लेख किया था कि यह फिल्म महादेवी वर्मा के रेखाचित्र पर आधारित था.मेरी जिज्ञासा बढ़ी.मैंने पहले फिल्म देखी और फिर खोज कर मूल रचना पढ़ी.महादेवी वर्मा के संस्मरण का शीर्षक है ‘वह चीनी भाई’.
सिनेमा और साहित्य के संबंधों पर संगोष्ठियाँ होती रहती हैं.पर्चे लिखे जाते हैं.मैंने खुद कई बार ऐसी संगोष्ठियों को संबोधित किया है.मैं इस कहानी और इस पर बनी फिल्म से परिचित नहीं था.धन्यवाद् तृषा गुप्ता कि एक सुंदर और ज़रूरी फिल्म से परिचय हो गया.1959 में बनी इस फिल्म में एक चीनी और एक भारतीय के समबन्ध को मानवीय स्टार पर चित्रित किया गया है.महादेवी वर्मा के संस्मरण में वह खुद भी हैं.उन्होंने इलाहाबद में मिले चीनी के बारे में लिखा है.फिल्म में कथा का विस्तार किया गया है.संस्मरण की बेक स्टोरी में बर्मा है,लेकिन मृणाल सेन ने फिल्म बनाते समय इसमें चीन का उल्लेख किया है.फिल्म दो-तीन फ्लैशबैक में चीन की कहानी चलती है.फिल्म का नायक चीन के शानतुंग प्रान्त का वांग लू है.
मृणाल सेन ने ‘नील आकाशेर नीचे’ में महादेवी वर्मा के रेखाचित्र ‘वह चीनी भाई’ को चलचित्र में बदलते समय अनेक परिवर्तन किये हैं.इलाहबाद की कहानी कोलकाता चली जाती है.चीनी भाई का नामकरण वांग लू हो जाता है.महादेवी वर्मा कांग्रेसी कार्यकर्ता में बदल जाती हैं.उनके पति,सास और नौकर भी किरदार के तौर पर जुड़ जाते हैं.फिल्म की कहानी चीन के शानतुंग भी जाती है.वहां के जमींदार और बहन के जरिये हम वांग लू की पीड़ा से परिचित होते हैं.फिल्म में खूबसूरती के साथ चीन के तत्कालीन हालत को पिरोया गया है.तब जापान ने चीन के नानचिंग शहर पर भयानक हमला किया था.इस हमले का रविंद्रनाथ टैगोर ने विरोध किया था.उन्होंने जापान के नागुची को पत्र लिखा था.मृणाल सेन ने चीन के संघर्ष और भारत की आज़ादी के संघर्ष को वांग लू और बसंती के साथ जोड़ा एक ज़मीं पर लाकर जोड़ा है.
रेखाचित्र के अनुसार फिल्म में भी चीनी भाई बताता है कि वह फारेनर नहीं है,वह तो चीनी है.उसकी चमड़ी गोरी नहीं है.उसकी आँखें नीली नहीं हैं.पिछली सदी के चौथे दशक में भारत और चीन लगभग एक जैसी स्थिति में थे और अपनी आज़ादी के सपने बन रहे थे.’नील आकाशेर नीचे’ में बगैर किसी भाईचारे के नारे के ही एक रिश्ता बनता दिखाई देता है.यह फिल्म देखि जनि चाहिए.खासकर सिनेमा और साहित्य तथा भारतीय फिल्मों में चीनी किरदारों के चित्रण के सन्दर्भ में यह ज़रूरी फिल्म है.कुछ सालों पहले होंकोंग से एक पत्रकार भारत आये थे.वे भारतीय फिल्मों में चीनी किरदारों की नेगेटिव छवि की वजह जानना चाहते थे.तब इस फिल्म की जानकारी रहती तो मैंने ख़ुशी और गर्व से उन्हें बताया होता.1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच आई खटास ने सदियों के सांस्कृतिक संबंध को खट्टा कर दिया.’नील आकाशेर नीचे’ पर भी प्रतिबन्ध लगा दिया गया था.इधर चीन भारतीय फिल्मों के बाज़ार के तौर पर उभरा है.फ़िल्मकार ध्यान दें तो चीन हिंदी और अन्य भाषाई फिल्मों के लिए उर्वर कथाभूमि हो सकती है.वहां अनेक कहानिया बिखरी पड़ी हैं,जिनके सिरे भारत से जुड़े हैं.
इस फिल्म की रिलीज के बाद निर्माता हेमेंद्र मुखर्जी(गायक हेमंत कुमार) ने प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरु और राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को यह फिल्म दिल्ली में दिखाई थी.मृणाल सेन की यह दूसरी फिल्म थी.

Sunday, January 13, 2019

संडे नवजीवन : इस साल थोडा ही बदलेगा रुपहले परदे का परिदृश्य


इस साल थोडा ही बदलेगा रुपहले परदे का परिदृश्य 
-अजय ब्रह्मात्मज
 हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का पुराना टोटका है. जनवरी के पहले हफ्ते में फिल्में रिलीज नहीं होतीँ. माना जाता है कि पहले हफ्ते में रिलीज हुई फिल्में ज्यादातर फ्लॉप होती हैं. हालाँकि बाद के हफ्तों में भी फिल्म के हिट होने की कोई गारंटी नहीं रहती, फिर भी टोटका टोटका होता है. 2019 में जनवरी के दूसरे हफ्ते मेंउरी : द सर्जिकल स्ट्राइकऔरद एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टरजैसी फिल्मों की रिलीज से शुरुआत हो रही है. 2019 के दिसंबर तक के शुक्रवार को रिलीज हो रही फिल्मों की तारीखें आ चुकी हैं. सारे त्यौहार और राष्ट्रीय पर्व के हफ्ते रिजर्व हो गए हैं. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में फिल्मों की घोषणा के साथ उसके रिलीज की तारीख तय कर देने के सिस्टम कोरिवर्स प्लानिंगका नाम दिया जाता है. इसकी सफल शुरुआत रोहित शेट्टी ने की थी.

उरी : द सर्जिकल स्ट्राइक एक हद तक पॉलीटिकल फिल्म है. पहली 2016 में भारतीय सेना के सर्जिकल स्ट्राइक की घटना पर आधारित है, जिसमें एक सैन्य अधिकारी स्पष्ट शब्दों में कहता है, ‘हिंदुस्तान अब चुप नहीं बैठेगा. यह नया हिंदुस्तान है. यह घर में घुसेगा भी और मारेगा भी.गौर करें तो यह वर्तमान केंद्र सरकार के राष्ट्रवाद की चासनी में लिपटा संवाद है, जिसमें न्यू इंडिया की आक्रामक भाषा है, इस संवाद पर सिनेमाघरों में तालियां जरूर बजेगी, जनवरी में ही कंगना रनोट कीमणिकर्णिका  द क्वीन आफ झांसीरिलीज होगी. महारानी लक्ष्मी बाई के शौर्य पर आधारित इस फिल्म का लेखन ‘बाहुबली’ के लेखक विजयेन्द्र प्रसाद ने किया है.मूल निर्देशक कृष के छोड़ने के बाद कंगना रनोट ने निर्देशन की कमान संभाली तो सोनू सूद ने फिल्म छो दी.कुछ और भी तब्दीलियाँ हुईं.

2019 में रिलीज हो रही फिल्मों में खानत्रयी (आमिर, शाह रुख और सलमान) में से केवल सलमान खान की फिल्मभारत’ 5 जून को रिलीज होगी. बाकी दोनों खान आमिर और शाह रुख की कोई फिल्म 2019 में नहीं आएगी. आमिर ने फिल्मों से अस्थाई सन्यास लिया है और शाह रुख अभी राकेश शर्मा के जीवन पर आधारित फिल्म की शूटिंग शुरू करेंगे. पिछले साल सलमान खान कीरेस 3’ आमिर खान कीठग्स ऑफ हिंदोस्तानऔर शाह रुख खान कीजीरोअपेक्षा के मुताबिक कारोबार नहीं कर सकी. तीनों फिल्मों के साधारण कारोबार ने कुछ फिल्मी पंडितों को खान की श्रद्धांजलि लिखने का मौका दे दिया. हड़बड़ी में भविष्यवाणियां कर दी गईं कि खान का दौर खत्म हुआ. हिंदी फिल्मों में स्टारडम के प्रभाव और फिल्मों के कारोबार के जानकार ताकीद कर सकते हैं कि इन निष्कर्षों में कितनी सच्चाई है? जिन उदीयमान सितारों पर भरोसा जताया जा रहा है, उन्हें अपनी आगामी फिल्मों से साबित करना है. ऐसा नहीं कहा जा सकता कि उन पर बॉक्स ऑफिस और दर्शकों का अभी से भरोसा हो गया है. हिंदी फिल्म स्टार प्रेरित और प्रभावित होती है. किसी भी एक्टर के स्टारडम से फिल्मों की ओपनिंग निश्चित होती है. तात्पर्य कि रिलीज के पहले से दर्शकों की जिज्ञासा बनी रहती है. फिल्मों के एडवांस बुकिंग होती है.  फिल्म पहले दिन अच्छा प्रदर्शन करति है.दूसरे दिन से फिल्म का कारोबार क्वालिटी और दर्शकों की स्वीकृति से तय होता है. उदाहरण के लिएठग्स ऑफ हिंदोस्तानकी ओपनिंग इसी स्टारडम के दम पर 50 करोड़ से अधिक की थी, लेकिन फिल्म अच्छी नहीं होने की वजह से अगले ही दिन यह कलेक्शन आधा हो गया था.

2018 में आयुष्मान खुराना, विकी कौशल और राजकुमार राव की फिल्मों के 100 करोड़ी कारोबार से यह उम्मीद बंधी है कि तीनों 2019 के स्टार हैं. उनके साथ पंकज त्रिपाठी को भी नहीं भूलना चाहिए. मुख्य भूमिकाओं में तो नहीं लेकिन जोरदार सहयोगी भूमिकाओं में फिल्म की सफलता के लिए वे जरूरी बनते जा रहे हैं. उनकी मौलिकता ही उनकी प्रतिभा है. भाषा के नियंत्रण और खेल से अपने शब्दों में जादुई असर ले आते हैं. विकी को तो हम जनवरी में हीउरी…’ में देख लेंगे. बाद के महीनों में आयुष्मान खुराना और राजकुमार राव की फिल्में आएंगी. इन कलाकारों के साथ रणवीर सिंह,रणबीर कपूर, शाहिद कपूर, वरुण धवन, अर्जुन कपूर और सिद्धार्थ मल्होत्रा पर भी नजर रहेगी. इनमें से पहले तीन कोई भी चमत्कार कर सकते हैं. पत्र-पत्रिकाओं ,ऑनलाइन चैनल और टीवी की रणवीर और रणबीर की टक्कर और आगे-पीछे होने की होड़ में खास रूचि रहेगी. दोनों के पास दमदार फिल्में हैं. उनके निर्देशकों ने पिछली फिल्मों में खुद को साबित कर रखा है.
इस साल रणवीर सिंह और रणबीर कपूर की होड़ आमने-सामने की होगी.2018 में रणबीर कपूर की ‘संजू’ 300 करोड़ से अधिल का कारोबार कर उन्हें बढ़त दी है,लेकिन रणवी सिंह भी पीछे नहीं हैं.साल के शुरू में उनकी ‘पद्मावत’ ने अच्छा कारोबार किया उअर अभि उमकी ‘सिंबा’ का कलेक्शन बढ़ता ही जा रहा है.उदीयमान सितारों के अलावा रणबीर कपूर और रणवीर सिंह की भिडंत रोचक रहेगी.इनके साथ वरुण धवन और कार्तिक आर्यन पर भी नज़र रहेगी.2019 में रिलीज हो रही फिल्मों से उनका भविष्य तय होगा.इन चरों के पास पर्याप्त फ़िल्में हैं.

2019 में अनेक ऐतिहासिक और बायोपिक फिल्में आएंगी. करण जौहर कीतख़्त', अजय देवगन कीतानाजी’,चन्द्रप्रकाश द्विवेदी कीपृथ्वीराजरितिक रोशन कीसुपर 30’ के अलावा दीपिका पादुकोण,सोनम कपूर,जान्हवी कपूर और अनुष्का शर्मा की कुछ बायोपिक फिल्में भी होंगी. कंगना रनोट कीमणिकर्णिका…’ से ऐतिहासिक फिल्मों की शुरुआत हो रही है. वास्तव मेंबाहुबलीऔरपद्मावतीकी कामयाबी ने निर्माताओं को हिस्टोरिकल फिल्मों का नया विश्वास दिया है. दूसरे इन फिल्मों के जरिए राष्ट्रवाद के आड़ में भारतीय गर्व और गौरव को दिखाने और रेखांकित करने के साथ सत्तारूढ राजनीतिक पार्टी को खुश करने का बहाना भी निर्माताओं को मिल रहा है. उम्मीद की जानी चाहिए कि हिंदी फिल्मों में घुस आई राष्ट्रवाद की अतिजना सत्ता के संभावित बदलाव के साथ कम होगी.

हर साल की तरह इस साल भी फिल्म इंडस्ट्री के बेटे-बेटियों की लॉन्चिंग होगी. नेपोटिज्म के तमाम होहल्ले के बीच स्टार किड फिल्मों में आते रहेंगे. इस साल अनन्या पांडे, अहान शेट्टी, यशवर्धन, प्रनूतन और भाग्यश्री के बेटे का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है, सनी देओल के बेटे करण की फिल्म लगभग बन चुकी है. अभी ऐसा कोई संकेत नहीं है, लेकिन शाह रुख खान के बेटे आर्यन के फिल्म की घोषणा किसी सरप्राइज़ की तरह दर्शकों को हैरत में डाल सकती है.

2019 में वेब सीरीज दर्शकों का बड़ा आकर्षण होगा.सैक्रेड गेम्सकी अगली कड़ियों की शूटिंग चल रही है.मिर्जापुरऔररंगबाजकी नकल में अनेक वेब सीरीज की तैयारियां हो रही हैं. इन दिनों मुंबई में हर कलाकार और तकनीशियन किसी न किसी वेब सीरीज के साथ या तो जुड़ा है या उसकी तैयारी कर रहा है. यहां तक कि फिल्मों के लोकप्रिय स्टार भी वेब सीरीज करने के लिए आतुर दिख रहे हैं.
इस बीच एक बड़ी खबर आई है की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जीवन पर एक बायोपिक फिल्म बनेगी. इस फिल्म में विवेक ओबेरॉय अपने प्रिय नेता मोदी की भूमिका निभाएंगे.फिल्म गलियारे में कहा जा रहा है कि उनके नाम पर स्वयं नरेन्द्र मोदी ने मुहर लगायी है.ओमंग कुमार निर्देशित इस फिल्म को अं चुनाव के मौके पर रिलीज किया जायेगा कि फिल्मों के जरिये नरेन्द्र मोदी की झांकी पेश की जा सके.तीन महीने में बायोपिक बनाने और रिलीज करने की इस हड़बड़ी में हम अभि से अनुमान लगा सकते हैं कि फिल्म कितनी रोचक और विश्वसनीय होगी?


Tuesday, January 8, 2019

सिनेमालोक : चाहिए कंटेंट के साथ कामयाबी

सिनेमालोक
चाहिए कंटेंट के साथ कामयाबी
-अजय ब्रह्मात्मज
2018 में रिलीज हुई फिल्मों के आधार पर ट्रेन और निष्कर्ष उनकी बात करते हुए लगभग सभी समीक्षकों और विश्लेषको ने स्त्री अंधाधुंध और बधाई हो का उल्लेख करते हुए कहा कि दर्शक अब कंटेंट पसंद करने लगे हैं. संयोग ऐसा हुआ कि खानत्रयी(आमिर,शाह रुख और सलमान) की फिल्में अपेक्षा के मुताबिक शानदार कारोबार नहीं कर सकीं.बस,क्या था? खान से बेवजह परेशान विश्लेषकों ने बयान जारी करने के साथ फैसला सुना दिया कि खानों के दिन लद गए.27 सालों के सफल अडिग कैरियर में चंद फिल्मों की असफलता से उनके स्टारडम की चूलें नहीं हिलेंगी.हां, उन्हें अपनी उम्र के अनुसार भूमिकाएं चुनते समय दर्शकों की बदलती अभिरुचि का खयाल रखना होगा.उदीयमान सितारों राजकुमार राव,आयुष्मान खुराना और विकी कौशल को 2019 में रिलीज हो रही फिल्मों से साबित करना होगा कि वे ताज़ा स्टारडम के काबिल हैं.
इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि कंटेंट प्रधान छोटी फिल्मों का ज़िक्र करते समय हम उन फिल्मों के ही नाम गिनाते हैं,जिन्होंने 100 करोड़ या उसके आसपास का कारोबार किया.इसी लिहाज से 'स्त्री' और ' बधाई हो' उल्लेखनीय फिल्में हो गयी हैं.बेहतरीन होने के बावजूद हम 'अंधाधुन' का नाम उन दोनों के बाद ही ले रहे हैं.खुले दिल से हम भले ही स्वीकार न करें,लेकिन सच्चाई यही है कि कारोबार और कमाई ही हम सभी के लिए लोकप्रियता और श्रेष्ठता का प्रमाण है.अन्यथा 2018 की श्रेष्ठ फिल्मों की सूची में 'गली गुइयां' और 'तुम्बाड' शामिल रहती। दरअसल, कामयाबी के लिहे भी चेहरे चाहिए और 100 करोड़ का आंकड़ा.

दर्शकों की पसंद-नापसंद का कोई सामान्य नियम नही है.और न कोई ऐसा फार्मूला है कि ट्रेंड और कामयाबी मापी जा सके. पिछले साल की 13 सौ करोड़ी फिल्मों पर ही नज़र डालें तो हिस्टोरिकल,सोशल,कॉमेडी,एक्शन और हॉरर फिल्में दर्शकों को पसंद आईं। दर्शकों को तो साल के आझिरी हफ्ते में रिलीज 'सिंबा' भी पसंद आई,जिसमें कुछ भी मौलिक नहीं था.जिस कंटेंट और दर्शकों की बदलती पसंद की दुहाई दी जा रही है,वह 'सिंबा' में कहां थी? दर्शकों को नई और मौलिक कहानियां पसंद आती हैं,लेकिन उन्हें समयसिद्ध फार्मूला फिल्में भी पसंद आती हैं.कंटेंट नया हो या घिसा-पिटा... अगर मनोरंजन मिल रहा है दर्शक टूट पड़ते हैं.दर्शकों को अगर भनक भी लग जाये कि निर्माता-निर्देशक उन्हें बेवकूफ बना रहे हैं तो वे लोकप्रिय स्टारों की फिल्में भी ठुकरा देते हैं.हर साल कुछ स्थापित और लोकप्रिय स्टारों और निर्देशकों को दर्शकों की तरफ से अस्वीकृति का तमाचा लगता है.कई बार दर्शक अनजाने में बेहतरीन फिल्मों तक नहीं पहुंच पाते.पर्यापत प्रचार नहीं होने से दर्शक उनसे अनजान राह जाते हैं.
वास्तव में दर्शकों को कामयाब कंटेंट चाहिए.फिल्मों का कारोबार अच्छा होता है तो वे ललकते हैं.कुछ फिल्में कलेक्शन और कारोबार की वजह दर्शकों की पसंद बन जाती हैं. सच कहें तो दर्शक और समीक्षक बेहतरीन फिल्मों के विवेक से वंचित हैं.फिलहाल बाजार हावी है.वह बहुत कुछ निर्धारित कर रहा है।

Saturday, January 5, 2019

सिनेमालोक : शहरी दर्शकों के लिए बन रहा है सिनेमा


सिनेमालोक
शहरी दर्शकों के लिए बन रहा है सिनेमा
-अजय ब्रह्मात्मज
याद करें कि ग्रामीण पृष्ठभूमि की आखिरी फिल्म कौन सी देखी थी? मैं यह नहीं पूछ रहा हूँ कि किस आखिरी फिल्म में धोती-कमीज और साडी पहने किरदार दिखे थे.बैलगाड़ी,तांगा और सायकिल भी गायब हो चुके हैं.कुआं,रहट,चौपाल,खेत-खलिहान आदी की ज़रुरत ही नहीं पड़ती.कभी किसी आइटम सोंग में हो सकता है कि यह सब या इनमें से कुछ दिख जाये.तात्पर्य यह कि फिल्म की आवश्यक प्रोपर्टी या पृष्ठभूमि में इनका इस्तेमाल नहीं होता.अब ऐसी कहानियां ही नहीं बनतीं और कैमरे को ग्रामीण परिवेश में जाने की ज़रुरत नहीं पड़ती.धीरे-धीरे सब कुछ शहरों में सिमट रहा है.किरदार,परिवेश और भाषा शहरी हो रही है.
दरअसल,फ़िल्में शहरी दर्शकों के लिए बन रही हैं.हिंदी फ़िल्में कहने को पूरे भारत में रिलीज होती हैं,लेकिन हम जानते है कि दक्षिण भारत में हिंदी फिल्मों की मौजूदगी टोकन मात्र ही होती है.तमिल और तेलुगू फिल्म इंडस्ट्री हिंदी के समकक्ष खड़ी है.कन्नड़ और मलयालम के अपने दर्शक हैं.कर्णाटक में हिंदी फिल्मों के प्रदर्शन पर हदबंदी रहती है.दक्षिण के राज्य अपनी भाषा की फिल्मों के लिए संवेदनशील हैं.उन्होंने प्रदेश की भाषाओँ की फिल्मों के प्राइम प्रदर्शन की अनिवार्यता सख्त कर दी है.महाराष्ट्र में मराठी फिल्मों का सुनिश्चित प्रदर्शन होता है.
पिछले पांच-दस सालों में मल्टीप्लेक्स की संख्या बढ़ी है और सिंगल स्क्रीन लगातार कम हुए हैं.जिन शहरों और कस्बों के सिंगल स्क्रीन टूट या बंद हो रहे हैं,उन शहरों में उनके स्थान पर मल्टीप्लेक्स नहीं आ पा रहे हैं.कुछ राज्यों में सरकारें कर में छूट और अन्य सुविधाएँ भी दे रही हैं,लेकिन सिनेमाघरों के बंद होने और खुलने का अनुपात संतुलित नहीं है.स्थिति बद से  बदतर होती जा रही है.अपने बचपन के सिनेमाघरों को याद करें तो अब वे केवल आप की यादों में ही आबाद हैं.ज़मीन पर उनका अस्तित्व नहीं रह गया है.इलाहांबाद,माफ़ करें प्रयागराज के मेरे फिल्म इतिहासकार मित्र अपने शहर के बंद हुए सिनेमाघरों की मर्मान्तक कथा लिख रहे हैं.यह जानना और समझना रोचक होगा कि कैसे और क्यों सिनेमाघर हमारे दायरे से निकल गए?
देश की सामाजिक संरचना तेज़ी से बदली है.शिक्षा के प्रसार और आवागमन की सुविधा बढ़ने हिंदी प्रदेशों के युवा राजधानियों और बड़े शहरों की तरफ भाग रहे हैं.अच्छी पढाई और नौकरी की तलाश में शहरों में युवा जमघट बढ़ रहा है.थोड़ी और अच्छी व ऊंची पढाई और फिर उसी के अनुकूल नौकरी के लिए हिंदी प्रदेशों के युवा मेट्रो शहरों को चुन रहे हैं.हिंदी फिल्मों के मुख्य दर्शक यही युवा हैं.पूरे बाज़ार का मुख्य ग्राहक युवा ही है और वही हिंदी फिल्मों का दर्शक है.कभी सर्वेक्षण होना चाहिए कि हिंदी फिल्मों के दर्शकों का प्रोफाइल कितना बदल चुका है.दर्शक फ़िल्में तो देख रहे हैं,लेकिन उनके प्लेटफार्म और माध्यम बदल चुके हैं.फिल्म देखने की वैकल्पिक सुविधा और किफ़ायत से सिनेमाघर में जाकर फिल्म देखनेवाले शहरी दर्शकों की संख्या घटी है.गंवाई और कस्बाई दर्शकों की हद में सिनेमाघर ही नहीं हैं,उनसे यह उम्मीद करना ज्यादती होगी कि फिल्म देखने के लिए वे पास के शहरों में जायेंगे.
मेट्रो शहरों और प्रदेश की राजधानियों में सिनेमाघर और दर्शक सिमट रहे हैं.हिंदी प्रदेशों के हिन्दीभाषी दर्शक अभी तक इस भ्रम में रहते हैं कि उनकी संख्या की वजह से ही हिंदी फ़िल्में चलती हैं.यह कभी सच रहा होगा.अभी की सच्चाई यह है कि हिंदी फिल्मों की सर्वाधिक कमाई मुंबई से होती है.इसके बाद दिल्ली एनसीआर का स्थान है.इधर कुछ सालों में बंगलोर में हिंदी फिल्मों के दर्शक बढे हैं.इस बढ़त की वजह सभी समझते हैं.आईटी उद्योग ने उत्तर भारतीय युवा को आकर्षित किया है.उत्तर भारत का अब शायद ही कोई ऐसा परिवार होगा ,जिसका कम से कम एक सदस्य बंगलौर में कार्यरत न हो. क्या आप जानते हैं कि बंगलौर फिल्म के बॉक्स ऑफिस कलेक्शन के मामले में मुंबई और दिल्ली के बाद तीसरे नंबर पर आ चुका है.


Tuesday, December 25, 2018

सिनेमालोक : कार्तिक आर्यन

सिनेमालोक
कार्तिक आर्यन
-अजय ब्रह्मात्मज
इस महीने के हर मंगलवार को 2018 के ऐसे अचीवर को यह कॉलम समर्पित होगा,जो हिंदी फिल्मों में बहार से आए.जिन्होंने अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर पहचान हासिल की.2018 में आई उनकी फिल्मों ने उन्हें खास मुकाम दिया.
दस महीने पहले 23 फ़रवरी को ‘सोनू के टीटू की स्वीटी’ रिलीज हुई थी. लव रंजन की इसी फिल्म के शीर्षक से ही प्रॉब्लम थी. कुछ को यह टंग ट्विस्टर लग रहा था तो अधिकांश का यही कहना था कि यह भी कोई नाम हुआ? फिल्म रिलीज हुई और सभी को पसंद आई. इस तरह के विषय की फिल्मों पर रीझ रहे दर्शक टूट पड़े तो वहीँ खीझ रहे समीक्षक इसे दरकिनार नहीं कर सके.समीक्षकों ने फिल्म के विषय की स्वाभाविक आलोचना की, लेकिन उसके मनोरंजक प्रभाव को स्वीकार किया.नतीजा यह हुआ कि खरामा-खरामा यह फिल्म 100 करोड़ के क्लब में पहुंची. फिल्म के कलाकारों में सोनू यानि कार्तिक आर्यन को शुद्ध लाभ हुआ. छह सालों से अभिनय की दुनिया में ठोस ज़मीन तलाश रहे कार्तिक आर्यन को देखते ही देखते दर्शकों और फिल्म इंडस्ट्री ने कंधे पर बिठा लिया. उन्हें फ़िल्में मिलीं,एनडोर्समेंट मिले और कार्तिक ग्लैमर वर्ल्ड के इवेंट में चमकने लगे.
22 नवम्बर 1990 को ग्वालियर के डॉक्टर दंपति के परिवार में जन्मे और पीला-बढे कार्तिक मुंबई तो आये थे इंजीनियरिंग की पढाई करने,लेकिन मन के कोने में सपना फिल्मों में एक्टिंग का था.पढाई के दौरान सपनों को पंख लगे और कार्तिक ने अभिनय के आकाश की तलाश जारी रखी. नए कलाकार फिल्म इंडस्ट्री के ताऊ-तरीकों से नावाकिफ होते हैं. सही हिम्मत और पूरा जज्बा न हो तो सपनों को चकनाचूर करने के रोड़े रास्तों में पड़े मिलते हैं.कार्तिक ने खुद ही राह बनायीं.दिक्कत का एहसास हुआ तो तैयारी की और प्रयास करते रहे. आख़िरकार 2011 में उन्हें लव रंजन की ‘प्यार का पंचनामा’ मिली.इस फिल्म में रजत का किरदार दर्शकों के ध्यान में आया.वह उन्हें याद रहा.पहली फिल्म के नए एक्टर के लिए इतना बहुत होता है.इस फिल्म में उनके लम्बे संवाद और उसकी अदायगी ने सभी को प्रभावित किया. कार्तिक के साथ ऐसा चल रहा है.उनकी फ़िल्में अपने विषय की वजह से आलोचित होती हैं,लेकिन उनका किरदार प्रशंसित होता है.कार्तिक की नयी फ़िल्में इस विरोधाभास को कम करें तो उनकी लोकप्रियता और स्वीकृति तेज़ी से बढ़ेगी.
पहली फिल्म की सफलता और चर्चा के बावजूद दूसरी फिल्म ‘आकाशवाणी’ दर्शकों ने पसंद नहीं की. अगले साल ई सुभाष घई की ‘कांची’ कब रिलीज होकर चली गयी? किसी को पता ही नहीं चला. इं दोनों फिल्मों की असफलता से कार्तिक के करियर में विराम आया.निराशा नज़दीक पहुंची.इस छोटे अंतराल में बेचैन होने के बावजूद कार्तिक ने बेसब्री में गलत फ़िल्में नहीं चुनीं.वक़्त गुजरता रहा और कार्तिक सही फिल्म के इंतजार में रहे.फिर से लव रंज आये और उन्होंने ‘प्यार का पंचनामा 2’ में कार्तिक आर्यन को अंशुल का किरदार दिया.इस फिल्म में फिर से उनके एकल संवाद की तारीफ हुई.बतौर एक्टर भी उनमें आत्मविश्वास और परफॉरमेंस की रवानी दिखी.बीच में आई ‘गेस्ट इन लंदन’ हलकी रही,लेकिन ‘सोनू के टीटू की स्वीटी’ ने परिदृश्य ही बदल दिया.
पिछले 10 महीनों में कार्तिक लगातार चौंका रहे हैं.वे सुर्ख़ियों में बने हुए हैं.उनकी फिल्मों की घोशनाएँ हो रही है.सही या गलत यह खबर भी फैल रही कि उन्होंने कौन सी फिल्म छोड़ दी.करीना कपूर के साथ रैंप वाक तो चर्चा में आये. उस इवेंट की तस्वीरों में कार्तिक का कॉन्फिडेंस देखते ही बनता है.यूँ लगता है की कार्तिक लगातार खुद को मंज रहे हैं और अभी से बड़ी चमक और खनक के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं.कार्तिक की एक अघोषित खूबी है.ग्वालियर की पृष्ठभूमि और परिवार से उन्हें हिंदी मिली है.हिंदी के उच्चारण और अदायगी में अपने समकालीनों से बहुत आगे हैं.उनके एकल संवाद प्रमाण हैं कि हिंदी पर उनकी जबरदस्त पकड़ है.
कार्तिक की ‘लुका छुपी’ की शूटिंग पूरी हो चुकी है. इसमें वह कार्तिक आर्यन के साथ हैं.’किंक पार्टी’ में वह जैक्लिन फ़र्नांडिस के साथ नज़र आयेंगे. इम्तियाज़ अली की ‘लव आजकल 2’ में सारा अली खान के साथ उनकी जोड़ी बनेगी. 2018 ने कार्तिक के सपनों को ऊंची उड़ान दी है.


Tuesday, December 18, 2018

सिनेमालोक : राधिका आप्टे


सिनेमालोक
राधिका आप्टे
-अजय ब्रह्मात्मज
पिछले दिनों ऑनलाइन स्ट्रीमिंग प्लेटफार्म नेटफ्लिक्स ने एक ट्विट किया कि ‘अंधाधुन की स्ट्रीमिंग चल रही है.यह इसलिए नहीं बता रहे हैं कि इसमें राधिका आप्टे हैं,लेकिन हाँ इसमें राधिका आप्टे हैं.’ इस ट्विट की एक वजह है.कुछ महीने पहले सोशल मीडिया पर मीम चल रही थी और दर्शक सवाल कर रहे थे कि नेटफ्लिक्स के हर हिंदी प्रोग्राम में राधिका आप्टे ही क्यों रहती है? संयोग कुछ ऐसा हुआ कि ‘लस्ट स्टोरीज’,’सेक्रेड गेम्स’ और ‘गुल’ में एक के बाद एक राधिका आप्टे ही दिखीं.मान लिया गया है कि डिजिटल शो में राधिका का होना लाजिमी है.
करियर के लिहाज से देखें तो राधिका आप्टे की पहली फिल्प्म 2005 में ही आ गयी थी.उन्होंने महेश मांजरेकर के निर्देशन में ‘वह लाइफ हो तो ऐसी’ फिल्म की थी,जिसमे शहीद कपूर और अमृता राव मुख्या भूमिकाओं में थे.उस फिल्म की आज किसी को याद भी नहीं है.हिंदी,बंगाली मराठी और तेलुगू फिल्मों में छोटी-मोटी भूमिकायें करने के बाद एक तरीके से ऊब कर राधिका लंदन चली गयीं.वहां उन्होंने कंटेम्पररी डांस सीखा.वहीँ उनके लाइफ पार्टनर बेनेडिक्ट टेलर भी मिल गए.कुछ समय तक लीव इन रिलेशनशिप में रहने के बाद दोनों ने शादी कर ली.राधिका के प्रशंसक उनके पति को नहीं पहचानते,क्योंकि वह राधिका के आगे-पीछे डोलते नज़र नहीं आते.शादी के बाद राधिका ने जिस तरह की बोल्ड फ़िल्में की हैं,वह शायद आम हिन्दुस्तानी पति को गवारा नहीं होता.तमाम आज़ादी और और नारी स्वतंत्रता की बैटन के बावजूद हिंदी फिल्मों की अभिनेत्रियों को शादी के बाद अघोषित दायरे में रहना पड़ता है.
राधिका ने ऐसी कोई परवाह नहीं की.डांस और थिएटर की ट्रेनिंग से उनकी एक्टिंग की नींव पुख्ता है.धीरे-धीरे दिख रहा है कि वह हर किस्म और तबके के किरदारों को आसानी से निभा ले जाती हैं.उन्होंने ‘लस्ट स्टोरीज’ की तो ‘पैडमैन’ में घरेलू महिला की भी भूमिका निभाई.इसके पहले उन्हें ‘माझी-द माउंटेनमैन’ में भी हमने देखा था.राधिका के परफॉरमेंस में वैराइटी है.थोड़ी सी दिक्कत उनके उच्चारण और संवाद अदायगी की है.हल्का सा मराठी टच होने से उनकी भूमिकाओं का असर कम होता है.राधिका के दोस्तों और निर्देशकों को उन्हें हिंदी उच्चारण सुधारने की सलाह देनी चाहिए.
राधिका के साथ सबसे अच्छी बात है कि वह किसी एक भाषा या विधा से नहीं बंधी हैं. वह अंग्रेजी समेत 6-7 राष्ट्रीय बह्षाओं में काम कर चुकी अहै और उन्होंने आगे के लिए भी खुद को हिंदी तक सीमित नहीं किया है.फीचर के साथ शार्ट फिल्म और वेब सेरिज करने में भी उन्हें कोई गुरेज नहीं है.इं दिनों शार्ट फिल्मों की काफी चर्चा है.राधिका आप्टे ने 2015 में सुजॉय घोष के साथ ‘अहल्या’ होर्त फिल्म की थी.तब कुछ आलोचकों ने समझा और लिखा था कि फिल्मों में राधिका का करियर समाप्त सा हो गया है,इसलिए वह शार्ट फाइलों की ओर मुड़ गयी हैं.अब पलट कर देखें तो वह पायनियर जान पड़ती हैं.उन्होंने भांप लिया था कि आने वाला समय शार्ट फिल्म और वेब सीरिज का है.
इस सन्दर्भ में अनुराग कश्यप औr विक्रमादित्य मोटवानी की ‘सेक्रेड गेम्स’ में राधिका आप्टे की भूमिका की बहुत चर्चा हुई.वह और भी वेब सीरिज कर रही हैं.लगातार दिखने से भी फिल्म एक्टर दर्शकों को खटकने लगते हैं.राधिका ने ‘बाज़ार’ जैसी फिल्मों में मामूली भूमिकाएं स्वीकार कर गलती ही की.इन फिल्मों में ज्यादा कुछ करने की गुंजाईश नहीं होती.और फिर डायरेक्टर सक्षम नहीं हो तो वह कलाकार को प्रेरित भी नहीं कर पाटा.राधिका के अभिनय में एकरसता नहीं है,लेकिन उसके लिए बेहतरीन और कल्पनाशील डायरेक्टर की ज़रुरत है.और फिर हिंदी फिल्मों में लोकप्रियता हासिल करने के लिए नाच-गाने वाली आकर्षक भूमिकाएं भी करनी पड़ती हैं.राधिका का मिजाज ऐसी फिल्मों से मेल नहीं खता.यही उम्मीद की जा सकती है कि इंडी सिनेमा के नए दौर में राधिका को अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए कुछ चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं मिलें. अगले साल पिया सुकन्या के निर्देशन में उनकी ‘बंबैरिया’ रिलीज होगी.



Sunday, December 16, 2018

संडे नवजीवन : सेलेब्रिटी शादी : वैभव और बदली परंपरा


संडे नवजीवन
सेलेब्रिटी शादी : दिखा वैभव और बदली परंपरा

-अजय ब्रह्मात्मज
भारतीय समाज में शादी हम सभी के सामाजिक-पारिवारिक जीवन का अनिवार्य चरण है.अभिभावक और माता-पिता चाहते हैं कि उनकी संतान समय रहते शादी कर ले और ‘सेटल’ हो जाये.अभिभावक और परिवार की मर्जी व सहमति से शादी हो रही हो तो औकात से ज्यादा खर्च करने का उत्साह आम है.यूँ आये दिन शादी और दहेज़ के लिए क़र्ज़ लेने के किस्से ख़बरों में आते रहते हैं.फिर भी शादी में अतिरिक्त खर्च का सिलसिला नहीं थम रहा है.गाँव-देहात से लेकर शहरी समाज तक की शादी में दिखावा बढ़ता जा रहा है.टीवी और फिल्मों के प्रसार और प्रभाव से रीति-रिवाज से लेकर विधि-विधान तक में तब्दिली आ रही है.अपनाने की आदत इतनी प्रबल है कि फिल्मों और ख़बरों में दिखी शादियों से परिधान और विधान अपनाये जा रहे हैं.देश के सारे दूल्हे शेरवानी और सारी दुल्हनें लहंगे में नज़र आने लगी हैं.संगीत,वरमाला और जूता छिपाई की रस्में देश के कोने-कोने में दोहराई जा रही हैं.रुढियों के नाम पर हल्दी,चुमावन और विदाई जैसी आत्मीय और रागात्मक रस्मों से तौबा किया जा रहा है.सबकुछ यकसां हो रहा है.
अब तो फिल्मों के अलावा फिल्म कलाकारों और अमीर परिवारों की शादियों का छूत किसी महामारी की तरह फ़ैल रहा है.हाल-फिलहाल में संपन्न हुई चार अभिनेत्रियों की शादी के लाइव कवरेज हम देख चुके.पांचवी शादी इन पंक्तियों के लिखने के समय चल रही है,जो इस देश के सर्वाधिक अमीर अंबानी परिवार में हो रही है.इन शादियों के प्रभाव और आकर्षण का अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि देश के प्रधानमंत्री को भी इन शादियों में शामिल होना पड़ रहा है.शादी के रिसेप्शन में दूल्हा-दुल्हन के संग मंच पर खड़े किसी और प्रधानमंत्री की तस्वीर पहले नहीं दिखी.हो सकता है प्रचारप्रिय नरेन्द्र मोदी का यह व्यक्तिगत फैसला हो कि वे लोकप्रिय शादियों में शामिल होंगे ताकि उनके वैसे प्रशंसक और मतदाता खुश हों,जो इन लोकप्रिय हस्तियों के जबड़ा फैन हैं.
बहरहाल,पिछले कुछ महीनों में चार अभिनेत्रियों की शादियाँ हुईं.अनुष्का शर्मा,सोनम कपूर.दीपिका पादुकोण और प्रियंका चोपड़ा अनुष्का ने क्रिकेटर विरत कोहली से शादी की.सोनम कपूर ने बिजनेसमैन आनंद आहूजा को चुना.दीपिका की जोड़ी रणवीर सिंह के साथ बनी. और प्रियंका चोपड़ा ने निक जोनस से विवाह रचाया.मीडिया ने चारों जोड़ियों में केवल सोनम कपूर-आनंद आहूजा को कोई संक्षिप्त नाम नहीं दिया.बाकी तीन विरुष्का,दीपवीर और निक्यंका नाम से मशहूर हुए.चारों शादियों के मीडिया कवरेज में कोई कमी नहीं रही.पांचवी शादी में यह कवरेज अतिरेक पर है,लेकिन उसमें मीडिया की आत्मीयता नहीं झलक रही है.एक बड़ा फर्क यह है कि चारों अभिनेरियों की शादी में वे स्वयं मेहमानों के आगमन की धुरी थीं,जबकि ईशा अंबानी की शादी में शिरकत करने की वजह उनके पिता मुकेश अंबानी हैं.गौर करें और चारों अभिनेत्रियों बनाम एक ईशा की शादी के बड़े फर्क को महसूस करे.समृद्धि और वैभव से परिपूर्ण होने के बावजूद ईशा बनाम चारों अभिनेत्रियों की शादी में भी धन,साख और प्रभुत्व की वजह से अंतर रहा.ईशा की शादी से पहले उदयपुर में आयोजित समारोह में हिलेरी क्लिंटन से लेका मुंबई के तमाम फ़िल्मी सितारे मौजूद रहे.उन्होंने मानक पर सार्वजानिक नृत्य भी किया.भारतीय मिथक से उदहारण लें तो यह देवलोक की शादी की तरह हैं,जहाँ बेहतरीन परिधानों में सजे सभी देवी-देवता आशीर्वाद के साथ पुष्पवर्षा कर रहे हैं.देश में पहले भी उद्योगपतियों ने अपनीं संतानों की शादी में करोड़ों खर्च किये हैं.शाह रुख खान ऐसी कुछ शादियों में फीस लेकर नाचते रहे हैं.पहली बार किसी गैरफिल्मी परिवार की शादी में सितारों की ऐसी जमघट दिखी तो खबर तो बनती ही है.
चारों अभिनेत्रियों में केवल सोनम कपूर समृद्ध फ़िल्मी परिवार की बेटी हैं.बाकी तीनों अभिनेत्रियों की पृष्ठभूमि मध्यवर्गीय रही है.हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में तीनों ‘आउटसाइडर’ हैं. तीनों ने अपनी मेहनत और लगन से आज का मुकाम हासिल किया है.उनकी प्रतिभा और योग्यता ही उन्हें यहाँ तक ले आई है.अगर कभी उनके आरंभिक इंटरव्यू से गुजरेंगे तो पाएंगे कि उनमें शुरू से आत्मविश्वास था.उन्होंने अपने प्रेमी चुने और उनसे विवाह रचाया.तीनों की शादियों की तस्वीरों में चेहरे की मुस्कराहट और उल्लसित भाव-भंगिमाओं से उनकी आंतरिक ख़ुशी जाहिर होती है.सभी तस्वीरों और वीडियो में अपने प्रेमी/पति के साथ उनकी अंतरंगता झलकती है.शादी के पहले की कोर्टशिप से यह अंतरंगता गाढ़ी हुई है.इन सभी छवियों में एक उन्मुक्तता है,जो अंबानी परिवार के समारोहों में लापता है.दरअसल अनुष्का,दीपिका और प्रियंका की शादियां 21वीं सदी की लड़कियों के एटीट्युड का सार्वजनिक बयान हैं.उल्लेखनीय है कि हमारे मन-मस्तिष्क में इन शादियों में दुल्हनें प्रमुख हैं.दूल्हे सेकेंडरी महत्व के हैं.यहाँ तक कि रणवीर सिंह जैसे लोकप्रिय अभिनेता भी दीपिका के साये की तरह ही डोलते नज़र आये.दुल्हनों ने शादी की आम सोच और धारणा को अपनी तरफ झुका लिया है.भविष्य में मध्यवर्गीय समाज की लड़कियों पर इसका गहरा असर पड़ेगा.शादी की समझ बढ़ेगी.शादी में उन्हें अपनी भूमिका तय करने में प्रेरक मदद मिलेगी.इन शादियों ने विदाई की रस्म को निबटा दिया है.दुल्हन की विदाई कहीं न कहीं पितृसत्ता के पक्ष को मजबूत करने के साथ आधार देती है.मध्यवर्गीय समाज में लड़कियां मायके और सौरल के पारंपरिक धुर्वों से निकल रही हैं.शादी के पहले से उनका अपना घर होता है या शादी के बाद वे अपने घर जाती हैं,जिसे नवदम्पति ने बनाया होता है.
फिल्म अभिनेत्रियों की महंगी और खर्चीली शादी पर हायतौबा मची हुई है.कुछ आलोचक इसे वैभव का अश्लील प्रदर्शन मान रहे हैं.निश्चित रूप से ये शादिय भव्य और महंगी रही हैं.प्रदर्शन तो इन्हें मीडिया कवरेज ने बनाया.दरअसल,चहेती फिल्म अभिनेत्रियों के बारे में सब कुछ जानने और देखने की दर्शकों-प्रशंसकों की ललक ने ही मीडिया को विस्तृत कवरेज के लिए बाध्य किया.बदले हुए समय में प्रशंसक और स्टार के नए रिश्तों को समझना ज़रूरी है.अकेली सोनम कपूर ने अपनी शादी के मीडिया कवरेज का पुख्ता और प्रवेशनीय इंतजाम किया था.बाकि तीनों ने मीडिया को दूर ही रखा था.निषेध के इस परिप्रेक्ष्य में जिज्ञासा ज्यादा थी और सबसे पहले खबर व तस्वीर देने की आपाधापी मची थी.अनुष्का,दीपिका और प्रियंका सोशल मीडिया के जरिये खुद ही सूचना और इमेज देकर मीडिया की उपयोगिता को नज़रअंदाज कर रहे थे.नतीजतन मीडिया रिपोर्ट में संयम की कमी और टिप्पणियों की हड़बड़ी रही.मीडिया की खीझ और झल्लाहट में रिपोर्ट में जाहिर हो रही थी.और फिर यह कैसे तय होगा कि अपनी शादी में कौन कैसे और कितना खर्च करे?कानूनी तौर पर कोई सीलिंग नहीं लगी है.आजकल तो फैशन शो,अवार्ड समारोह और अन्य एवेब्त में रेड कारपेट पर फ़िल्मी हस्तियां इस्ससे ज्यादा लकदक,चकमक,महंगे और भडकीले परिधानों में नज़र आते हैं.शो बिज़नस के स्सरे इवेंट अब सोशल मीडिया और टीवी शो बन चुके है.फिल्म कलाकारों की लोकप्रियता छवि के खेल पर टिकी है,इसलिए यह प्रदर्शन स्वाभाविक और प्रश्नों से परे है.
जिसकी ज्यादा चर्चा नहीं हुई और जो गौरतलब है कि सोच और व्यवस्था के तमाम बदलावों के बावजूद स्सभी शादियों में रुढियों का पालन किया गया.दूल्हे और दुल्हन के परिवारों की विधियों से दो बार शादियों की रस्में पूरी हुईं.खासकर दीपिका और प्रियंका की शादियाँ दो अलग दिनों में संपन्न हुई.चरों ने अपनी शादियों में नजदीकी दोस्तों और रिश्तेदारों को आमंत्रित किया.हाँ,अपने दायरे के मुताबिक उन्होंने एक से अधिक रिसेप्शन रखे.यह जिज्ञासा है कि उनकी शादी की कौन सी तारीख मुकम्मल और रजिस्टर की गयी है? कितना ही मज़ा आता और सरप्राइजिंग रहता अगर उन्होंने कोर्ट में शादी कर ली होती या दो-चार करीबी दोस्तों के बीच फेरे ले लिए होते.तब एक नया और ज्यादा ज़रूरी आदर्श पेश करते.है कि नहीं?
फिर से इन शादियों के वीडियो देखें तो आप देख और समझ पाएंगे कि चारों अभिनेत्रियों ने अभूत कुछ तोडा और जोड़ा है.उन्होंने शादी केजष्ण की परिभाषा बदल दी है.पहले फिल्मों में दिखाई शादियां समाज पर असर डालती थीं.अब यह रील से निकलकर रियल होते ही ज्यादा करीब आने के साथ मकाल के लिए आसान हो गयी हैं. मंगनी और शादी के तौर-तरीकों में भारी फेरबदल होगा.और यकीन करें अब लड़कियों की सुनी जाएगी या लड़कियां शादी की प्लानिंग खुद करेंगी.भारतीय समाज में यह बड़ा परिवर्तन होगा.


Tuesday, December 11, 2018

सिनेमालोक :आयुष्मान खुराना



सिनेमालोक
आयुष्मान खुराना
-अजय ब्रह्मात्मज
इस महीने के हर मंगलवार को 2018 के ऐसे अचीवर को यह कॉलम समर्पित होगा,जो हिंदी फिल्मों में बहार से आए.जिन्होंने अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर पहचान हासिल की.2018 में आई उनकी फिल्मों ने उन्हें खास मुकाम दिया.

2018 में दो हफ़्तों के अन्दर आयुष्मान खुराना की दो फ़िल्में कामयाब रहीं.श्रीराम राघवन निर्देशित ‘अंधाधुन’ और अमित शर्मा निर्देशित ‘बधाई हो’. दोनों फिल्मों का फलक अलग था.दोनों के नायक हिंदी फिल्मों के पारंपरिक नायक से अलग थे.आयुष्मान की ताहि खासियत उन्हें विशिष्ट बनाती है.शूजित सरकार की ‘विकी डोनर’ से लेकर ‘बधाई हो’ तक के उनके चुनाव पर गौर करें तो सभी फिल्मों में उनके किरदार अलहदा रहे हैं.धीरे-धीरे स्थापित होने के साथ ही नयी धारणा बन चुकी है की अगर आयुष्मान खुराना की कोई फिल्म आ रही है तो उसका नायक मध्यवर्गीय ज़िन्दगी के किसी अनछुए पहलू को उजागर करेगा.हाल ही में उनकी ताज़ा फिल्म ‘ड्रीम गर्ल’ का फर्स्ट लुक सामने आया है.यहाँ भी वह चौंका रहे हैं.उम्मीद करते हैं कि इस बार वह किसी शारीरिक या पारिवारिक उलझन में नहीं फंसे होंगे.
इन दिनों लोकप्रिय और बड़े स्टार भी दर्शक नहीं जुटा पाते.दर्शक निर्मम हो चुके हैं.उन्हें फिल्म पसंद नहीं आई तो वे परवाह नहीं करते कि इसमें आमिर खान हैं या अमिताभ बच्चन हैं,या फिर दोनों हैं.इस माहौल में ‘बधाई हो’ ने सिनेमाघरों में 50 दिन पूरे कर लिए.दर्शक अभी तक इसे देख रहे हैं.यह बड़ी बात है,क्योंकि आजकल कुछ फिल्मों के लिए कई बार 50 शो खींचना भी मुश्किल हो जाता है.क्या आप को याद है कि ‘बधाई हो’ के साथ ‘नमस्ते लंदन’ रिलीज हुई थी.फेसवैल्यू के लिहाज से उसमें बड़े नाम थे.चालू फार्मुले की पंजाब की चाशनी में लिपटी उस फिल्म को दर्शकों ने सिरे से नकार दिया था.दरअसल,दर्शक इन दिनों स्टार और बैनर के झांसे में पहले दिन सिनेमाघरों में चले भी जायें.अगले शो और अगले दिन तक उन्हें सही रिपोर्ट मिल चुकी होती है.
आयुष्मान के करियर को देखें तो स्टेज और टीवी शो के जरिये वह फिल्मों तक पहुंचे.चंडीगढ़ में मामूली परिवार एन पले-बढे आयुष्मान खुराना के सपने बड़े थे.चंडीगढ़ शहर भी उन सपनों के लिए छोटा पड़ गया था.पढाई के दिनों में ही उन्होंने मंडली बनायीं और सपनों को परवाज़ दिया.वक़्त रहले लोगों ने पहचाना और उन्हें उड़ने के लिए आकाश दिया.उन पारखी नज़रों को भी धन्यवाद् देना चाहिए,जिन्होंने साधारण चेहरे और कद-काठी के इस युवक को मौके दिए.आयुष्मान ने खुद की मेहनत और प्रतिभा से सभी अवसरों का भरपूर लाभ उठाया और निरंतर कामयाबी की सीढियां चढ़ते गए.आयुष्मान की कामयाबी नयी युवा प्रतिभाओं के लिए नयी मिसाल बन गयी है.
आयुष्मान खुराना की फिल्मों,किरदार और अभिनय शैली पर नज़र डालें तो उनमें हिंदी फिल्मों के हीरो के लक्षण नहीं दिखते.सभी किरदार मामूली परिवारों और परिवेश से आते हैं.ज्यादातर मध्यवर्गीय परिवार और परिवेश ही होते हैं.फिल्म शुरू होने के साथ नायक की साधारण उलझन उभर आती है.लगभग सभी फिल्मों में वे अपनी प्रेमिकाओं को रिझाने और उलझनों से निकलने की कोशिश में एक साथ लगे रहते हैं.उनकी नायिकाएं कामकाजी होती हैं.उनका अपना परिवार भी होता है.यानि आम फिल्मों की नायिकाओं की तरह उन्हें परदे पर सिर्फ प्रेम नहीं करना होता है.आयुष्मान खुराना आम हीरो जैसी मुश्किलों में नहीं फंसते,इसलिए उन्हें हीरोगिरी दिखाने का भी मौका नहीं मिलता.फिर भी यह मामूली नायक दर्शकों को पसंद आता है.कुछ आलोचक इस नए नायक को नहीं पहचान पाने की वजह से सुविधा के लिए आयुष्मान खुराना को अमोल पालेकर से जोड़ देते हैं.वास्तव में दोनों बहुत अलग कलाकार हैं.कह सकते हैं कि दोनों के निभाए किरदार समय और परिस्थिति की वजह से भी अलग मिजाज रखते हैं.
आयुष्मान खुराना की एक और खासियत है.वह गायक हैं.उनकी फिल्मों में उनकी आवाज़ का इस्तेमाल होता है.उन गीतों को परदे पर निभाते और गुनगुनाते समय  आयुष्मान खुराना की तल्लीनता देखते ही बनती है.ठीक है कि उन्हें अभि किशोर कुमार या सुरैया जैसी ऊंचाई नहीं मिली है,लेकिन यह एहसास ही कितना सुखद है कि 21वीं सदी में कोई कलाकार अभिनय के साथ गायन भी करता है.हिंदी फिल्मों की यह परमपरा विलुप्त ही हो गयी है. सुना है कि फुर्सत मिलते ही आयुष्मान खुराना जिम के बजे जैमिंग(गाने का अभ्यास) में समय बिताते हैं.







Tuesday, December 4, 2018

सिनेमालोक : तापसी पन्नू


सिनेमालोक
तापसी पन्नू
दिसंबर आरभ हो चुका है.इस महीने के हर मंगलवार को 2018 के ऐसे अचीवर को यह कॉलम समर्पित होगा,जो हिंदी फिल्मों में बहार से आए.जिन्होंने अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर पहचान हासिल की.2018 में आई उनकी फिल्मों ने उन्हें खास मुकाम दिया.
हम शुरुआत कर रहे हैं तापसी पन्नू से.2012 की बात है.तापसी पन्नू की पहली हिंदी फिल्म ‘चश्मेबद्दूर रिलीज होने वाली थी. चलन के मुताबिक तापसी के निजी पीआर ने उनके साथ एक बैठक तय की.पता चला था कि दक्षिण की फिल्मों से करियर आरम्भ कर दिल्ली की यह पंजाबी लड़की हिंदी में आ रही है.पहली फिल्म के समय अभनेता/अभिनेत्री थोड़े सहमे और डरे रहते हैं.तब उनकी चिंता रहती है कि कोई उनके बारे में बुरा न लिखे और उनका ज़रदार स्वागत हो.तापसी भी यही चाहती रही होंगी या यह भी हो सकता है कि पीआर कंपनी ने उन्हें भांप लिया हो.बहरहाल अंधेरी के एक रेस्तरां में हुई मुलाक़ात यादगार रही थी.यादगार इसलिए कह रहा हूँ की,उसके बाद तापसी ने हर मुलाक़ात में पहली भेंट का ज़िक्र किया.हमेशा अच्छी बातचीत की.अपनी तैरियों और चिंताओं को शेयर किया.अपना हमदर्द समझा.कामयाबी के साथ आसपास हमदर्दों और सलाहकारों की भीड़ लग जाती है.ऐसे में संबंध टूटते हैं,लेकिन तापसी ने इसे संभाल रखा है.
बहरहाल,तापसी ने ‘चश्मेबद्दूर से शुरुआत कर ‘बेबी से बड़ी धमक दी.’बेबी में तापसी की भूमिका छोटी लेकिन महत्वपूर्ण थी.शबाना खान इ भूमिका ने तापसी ने अपनी फूर्ती और मेधा से चकित किया था.अक्षय कुमार के होने के बावजूद वह दर्शकों और समीक्षकों को याद रह गयी थीं.यह उस भूमिका का ही कमाल था कि बाद में नीरज पाण्डेय ने ‘नाम शबाना फिल्म बनायीं और उस किरदार को नायिका बना दिया.’नाम शबाना का निर्देशन शिवम नायर ने किया था.इसके पहले अनिरुद्ध राय चौधरी के निर्देशन में ‘पिंक आ चुकी थी.’पिंक में तापसी ने मीनल अरोड़ा की दमदार भूमिका में ज़रुरत के मुताबिक एक आधुनिक लड़की की हिम्मत का परिचय दिया था.’पिंक अपने विषय की वजह से शहरी दर्शकों के बीच खूब पसंद की गयी थी.इं दोनों फिल्मों के बाद जब तापसी ने ‘जुड़वां 2 चुनी तो उनके खास प्रशंसकों को परेशानी हुई.तब तापसी ने कहा था की वह मेनस्ट्रीम हिंदी सिनेमा और हाई कांसेप्ट सिनेमा के बीच तालमेल रखना चाहती हैं.वह अपने दर्शकों का विस्तार चाहती हैं.
2018 में तापसी पन्नू की ‘सूरमा,’मुल्क और ‘मनमर्जियाँ’ फ़िल्में आयीं हैं.तीनों ही फ़िल्में अलग मिजाज की हैं.’सूरमा में वह हाकी प्लेयर हैं,जो अपने प्रेमी संदीप सिंह से दूर जाने का मुश्किल फैसला लेती है ताकि वह अपने खेल और रिकवरी पर ध्यान दे सके.अनुभव सिन्हा निर्देशित ’मुल्क में वह वकील आरती मल्होत्रा की भूमिका में है.आरती ने मुस्लिम लड़के से शादी की है.वह अपने ससुराल के पक्ष में कोर्ट में कड़ी होती है और मुसलमानों के प्रति बनी धारणाओं को तर्कों से तोडती है.अनुराग कश्यप की ‘मनमर्जियाँ’ में वह आजाद ख्याल रूमी बग्गा के किरदार में खूब जंची हैं.यह तो स्पष्ट है कि तापसी पन्नू अभि तक किसी एक इमेज में नहीं बंधी हैं.वह प्रयोग कर रही हैं.
तापसी पन्नू हिंदी फिल्मों की टिपिकल हीरोइन बन्ने से बची हुई हैं.यह एक अभिनेत्री के लिए तो सही है,लेकिन एक स्टार अभिनेत्री को मेनस्ट्रीम हिंदी फिल्मों की ज़रुरत होती है.किसी लोकप्रिय स्टार के साथ रोमांटिक भूमिका में आने से उनके दर्शक बढ़ते हैं,तापसी भी यह चाहती हैं.अभि तक लोकप्रिय स्टार उनसे दूर-दूर हैं.अगर बात नहीं बिगड़ी होती तो वह आमिर खान की बेटी की भूमिका में ‘दंगल में दिखी होतीं. हो सकता है उसके बाद उनके करियर की दिशा अलग हो जाती. ‘दंगल न हो पाने का एक फायदा हुआ कि तापसी नए निर्देशकों की पसंद बनी हुई हैं,उन्हें लगता है कि अलग किस्म की भूमिकाओं में तापसी को चुना जा सकता है.’तड़का और ‘बदला उनकी अगली फ़िल्में हैं.
हिंदी फिल्मों में बाहर से आई अभिनेत्रियों के लिए टिक पाना ही मुश्किल होता है.ताप पन्नू ने तो अपनी पहचान और प्रतिष्ठा हासिल कर ली है.फिर भी हिंदी फिल्मों के केंद्र में अभि वह नहीं पहुंची हैं.म्हणत के साथ ही उन्हें फिल्मों के चुनाव के प्रति भी सजग रहना होगा.उन्हें बड़े बैनर और बड़े निर्देशकों के साथ फ़िल्में करनी होंगी.लोकप्रियता और स्टारडम का यही रिवाज़ है.


Sunday, November 25, 2018

संडे नवजीवन : जीवित पात्रों का जीवंत चित्रण वाया मोहल्ला अस्सी


संडे नवजीवन
जीवित पात्रों का जीवंत चित्रण वाया मोहल्ला अस्सी
अजय ब्रह्मात्मज
हिंदी फिल्मों के इतिहास में साहित्यिक कृत्यों पर फ़िल्में बनती रही हैं.और उन्हें लेकर विवाद भी होते रहे हैं.ज्यादातर प्रसंगों में मूल कृति के लेखक असंतुष रहते हैं.शिकायत रहती है कि फ़िल्मकार ने मूल कृति के साथ न्याय नहीं किया.कृति की आत्मा फ़िल्मी रूपांतरण में कहीं खो गयी.पिछले हफ्ते डॉ. काशीनाथ सिंह के उपन्यास ‘काशी का अस्सी पर आधारित ‘मोहल्ला अस्सी देश के चंद सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई.इस फिल्म के प्रति महानगरों और उत्तर भारत के शहरों की प्रतिक्रियाएं अलग रहीं.यही विभाजन फिल्म के अंग्रेजी और हिंदी समीक्षकों के बीच भी दिखा.अंग्रेजी समीक्षक और महानगरों के दर्शक ‘मोहल्ला अस्सी के मर्म को नहीं समझ सके.फिल्म के मुद्दे उनके लिए इस फिल्म की बनारसी लहजे(गालियों से युक्त) की भाषा दुरूह और गैरज़रूरी रही.पिछले कुछ सालों में हम समाज और फिल्मों में मिश्रित(हिंग्लिश) भाषा के आदी हो गए हैं.इस परिप्रेक्ष्य में ‘मोहल्ला अस्सी में बोली गयी हिंदी को क्लिष्ट कहना लाजिमी है.
रिलीज से दो दिनों पहले डॉ. काशीनाथ सिंह के शहर बनारस में ‘मोहल्ला अस्सी का विशेष शो रखा गया था.फिल्म के निर्माण के समय निर्देशक डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी और लेखक डॉ. काशीनाथ सिंह ने सोचा था कि फिल्म का प्रीमियर बनारस में रखा जायेगा. प्रीमियर में काशी और अस्सी के निवासियों और उपन्यास के पात्रों को आमंत्रित किया जायेगा.ऐसा नहीं हो सका.फिल्म की रिलीज में हुई देरी और निर्माता-निर्देशक के बीच ठनी अन्यमनस्कता से प्रदर्शन के समय जोश और उत्साह नज़र नहीं आया.यह विडंबना ही है कि हिंदी उपन्यास पर बनी हिंदी फिल्म ‘मोहल्ला अस्सी का कोई पोस्टर हिंदी में नहीं आया.हिंदी दर्शकों तक पहुँचने के लिए हॉलीवुड के निर्माता तक अपनी फिल्मों के पोस्टर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओँ में लेन लगे हैं.बनारस स्थित लेखक डॉ. काशीनाथ सिंह की शिकायत थी कि शहर में फिल्म के प्रचार के लिए ज़रूरी पोस्टर भी दीवारों पर नहीं लगे हैं.यूँ लगा कि रिलीज की रस्म अदायगी भर कर दी गयी.
बहरहाल,बनारस में आयोजित विशेष शो में ‘काशी का अस्सी के लेखक अपने पात्रों और मित्रों-परिचितों के साथ मौजूद रहे.ढाई सौ दर्शकों का स्क्रीन खचाखच भर गया था,क्योंकि पात्र और मित्र अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ आ गए थे.डॉ. काशीनाथ सिंह के लिए यह ख़ुशी का मौका था. वे अपने उपन्यास के पत्रों के साथ फिल्म देख रहे थे. लगभग 20-22 सालों पहले जिन व्यक्तियों के साथ उनका उठाना-बैठा था,जिनसे बहसबाजी होती थी....वे सभी ही अपने संवादों के साथ उपन्यास के पात्र बने.उन पात्रों को डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने खास सोच-समझ से आकार दिया और ‘मोहल्ला अस्सी का चरित्र बना दिया.फिर उन चरित्रों के अनुरूप कलाकारों का चयन किया गया.उन कलाकारों ने निर्देशक के निर्देश और अपनी समझदारी से निभाए जा रहे पात्रों को परदे पर जीवंत किया और उन्हें एक किरदार दिया..व्यक्ति,पात्र,चरित्र,अभिनेता और किरदार की यह प्रक्रिया सृजनात्मक चक्र पूरा कर उन व्यक्तियों के साथ परदे पर चल्तिफिरती नज़र आ रही थी.दर्शकों के बीच पप्पू भी मौजूद थे.वही पप्पू,जिनकी दुकान बनारस के अस्सी के लिए किसी संसद से कम नहीं थी. अंग्रेजी में इसे ‘सररियल’ अनुभव कह सकते हैं.25 सालों की फिल्म पत्रकारिता के करियर में अतीत में कभी ऐसा अनुभव नहीं हुआ,जब परदे के जीवंत किदर जीवित व्यक्ति के रूप में सिनेमाघर में मौजूद हों.इधर उनकी साँसें चल रही हो और उधर रील.रील औए रियल का यह संगम और समागम दुर्लभ अनुभव रहा.’मोहल्ला अस्सी के प्रदर्शन में डॉ.काशीनाथ सिंह,डॉ.गया सिंह,रामजी राय,वीरेंद्र श्रीवास्तव,पप्पू और कुछ दूसरे पात्र(जो फिल्म में नहीं आ पाए) भी आये थे. फिल्म देखने के बाद आह्लादित डॉ. काशीनाथ सिंह की अंतिम पंक्ति थ,’मैं संतुष्ट हूँ.’
प्रदर्शन के बाद की बातचीत में सभी पात्र अपने किरदारों को निभाए कलकारों के अभिनय और संवाद अदायगी की चर्चा मशगूल हुए. डॉ. गया सिंह का मन्ना था की वे पूरा तन कर चलते हैं लाठी की तरह,जबकि उन्हें निभा रहे कलाकार कमर से लचके हुए थे.हां,आवाज़ की ठसक उन्होंने पकड़ ली थी.वीरेंद्र श्रीवास्तव का किरदार राजेंद्र गुप्ता ने निभाया है.वीरेंद्र श्रीवास्तव खुश थे कि राजेंद्र गुप्ता उन्हीं की तरह लहते हैं और उन्होंने बोलने का अंदाज भी सही पकड़ा था.फिल्म में पप्पू की खास भूमिका नहीं थी.वह तो चाय ही बनता रहा,लेकिन प्रदर्शन के दिन वह भी पत्रों में शामिल होकर खुद को उनके समकक्ष महसूस कर रहा था.रवि किशन के भाव,अंदाज और चंठपन से सभी मुग्ध थे कि उन्होंने ने अस्सी के ‘अड़ीबाज’ को आत्मसात कर लिया है.उनके प्रणाम और हर हर महादेव में बनारसी बेलौसपन था.दुर्भाग्य है कि ‘मोहल्ला अस्सी निर्माण और वितरण-प्रदर्शन की आधी-अधूरी रणनीति और असमर्थ हस्तक्षेप की वजह से अपने दर्शकों तक सही संदर्भों के साथ नहीं पहुँच सकी.फिल्मों में चित्रित भारतीय समाज के लिए ‘मोहल्ला अस्सी एक ज़रूरी पाठ के तौर पर देखी और पढ़ी जाएगी.
‘मोहल्ला अस्सी नौ सालों की म्हणत और इंतज़ार का नतीजा है.मुंबई से वाराणसी की एक फ्लाइट में डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने उषा गांगुली के नाटक ‘काशीनामा की समीक्षा पढ़ कर इतने प्रभावित हुए कि उसी नाम की किताब खोजने लगे.बाद में पता चला कि वह डॉ. काशीनाथ सिंह का उपन्यास ‘काशी का अस्सी पर आधारित नाटक है.खैर,अपने मित्र और लेखक के परिचित अतुल तिवारी के साथ बनारस जाकर 2009 में उन्होंने उपन्यास के अधिकार लिए.2010 में उन्हें निर्माता विनय तिवारी मिले.2011 में मुंबई शूटिंग आरम्भ हुई और मार्च तक ख़त्म भी हो गयी.निर्माता-निर्देशक के बीच विवाद हुआ.फिल्म की रिलीज खिसकती गयी.2012 में रिलीज करने की योजना पर पानी फिर गया.2015 में पहले अवैध ट्रेलर और फिर फिल्म लीक होकर इन्टरनेट पर आ गयी.फिल्म अटक गयी.उसके बाद सीबीएफसी का लम्बा चक्कर चला.आख़िरकार दिल्ली हाईकोर्ट ने फिल्म की रिलीज की अनुमति दी और साथ ही कहा कि कला माध्यमों में सृजनात्मक अभिवयक्ति की आज़ादी मिलनी चाहिए.
‘काशी का अस्सी उपन्यास के ‘मोहल्ला अस्सी फिल्म के रूप में रूपांतरण की रोचक कथा पर पूरी किताब लिखी जा सकती है.