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Wednesday, March 25, 2015

किंगमेकर बनते कास्टिंग डायरेक्टर


- स्मिता श्रीवास्तव

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डॉली अहलूवालिया, सुशांत सिंह राजपूत, राजकुमार राव, रणवीर सिंह, ताहिर भसीन, धृतिमान चटर्जी, फ्रीडा पिंटो, देव पटेल, बलजिंदन कौर, दुर्गेश कुमार में एक कॉमन चीज है। वह यह कि वे जिनकी खोज हैं, उन्हें कास्टिंग डायरेक्टर कहते हैं। साथ ही उपरोक्त अधिसंख्य नाम पॉपुलर और समर्थ कलाकार के तौर पर दर्ज हो रहे हैं। ‘काइ पो छे’ , ‘हाईवे’, ‘विकी डोनर’, ‘शाहिद’, ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ आदि फिल्मों की एक अहम धुरि कास्टिंग डायरेक्टर रहे हैं। इस तरह कि उक्त फिल्में सिर्फ कमाल की कहानियों के लिए ही विख्यात नहीं हुई, बल्कि अलहदा कलाकारों की मौजूदगी से फिल्म के रियलिच्म में चार चांद लग गए। रणवीर सिंह और ताहिर भसीन शानु शर्मा की खोज हैं तो सुशांत सिंह राजपूत, राजकुमार राव और हाईवे के दुर्गेश कुमार जैसे असाधारण कलाकार मुकेश छाबड़ा की। आंखोदेखी जैसी परफॉरमेंस केंद्रित फिल्मों में कमाल के कलाकारों की खोज भी कास्टिंग डायरेक्टरों ने की और नतीजतन वह फिल्म राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय फिल्म सर्किट से लेकर बॉक्स ऑफिस तक पर क्या कीर्तिमान रच रही है, वह सब को पता है। कास्टिंग डायरेक्टरों के द्वारा उम्दा कलाकारों की खोज से फिल्म की क्वॉलिटी पर सकारात्मक असर पडऩे लगा है। हिंदी फिल्मों की चर्चा ग्लोबल फिल्मों के गलियारों में होने लगी है। फिल्मों के फलक में भी फर्क आया है। मिसाल के तौर पर बेबी के कास्टिंग डायरेक्टर विकी सिडाना ने पाकिस्तान के कलाकार का चयन।
    देश में कास्टिंग डायरेक्टर का चलन करीब दो दशक पुराना है। स्क्रिप्ट फाइनल के बाद कलाकारों के चयन की जिम्मेदारी कास्टिंग डायरेक्टर को सौंपी जाती है। निर्देशक की मांग के अनुरुप कास्टिंग डायरेक्टर कलाकारों की तलाश में जुटता है। एक्टिंग में डिप्लोमा करने के बाद मुकेश छाबड़ा ने बतौर कास्टिंग डायरेक्टर अपने करियर की शुरुआत की। ‘काइ पो छे’, ‘पीके’, ‘चिल्लर पार्टी’, ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’, ‘हैदर’, ‘बदलापुर’, ‘तेवर’, ‘अग्ली’ समेत कई फिल्मों की कास्टिंग उन्होंने की। वह जालंधर से ताल्लुक रखते हैं। मुकेश कहते हैं,‘हमारा काम स्क्रिप्ट मिलने के बाद शुरू होता है। एक फिल्म की कास्टिंग में अममून पांच मिनट से लेकर दो से तीन महीने का समय लगता है। यह सब काफी कुछ स्क्रिप्ट और ऑडिशन पर निर्भर करता है। कई बार मेन लीड फिल्ममेकर तय रखते है। बाकी कलाकारों के चयन का काम कास्टिंग डायरेक्टर को सौंपा जाता है। नए कलाकारों की प्रतिभा ऑडिशन के समय दिख जाती है। हम उन्हें निर्माता डायरेक्टरों तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम हैं। कलाकारों का चयन करते कास्टिंग डायरेक्टरों को कई बातों का ध्यान रखना पड़ता है। मसलन फिल्म कमर्शियल, आर्ट या कॉमेडी या ड्रामा है। कलाकार की पर्सनालिटी और व्यवहार को भी ध्यान में रखना पड़ता है। कलाकार किरदार में फबे वही सही कास्टिंग होती है।’ उन्होंने ‘तमाशा’, ‘बांबे वेलवेट’, ‘फितूर’ की कास्टिंग भी की है। मुकेश की अपनी कास्टिंग कंपनी भी है। फिल्म में काम करने के इच्छुक कलाकारों को ऑडिशन के लिए कोई फीस नहीं देनी पड़ती।
कास्टिंग डायरेक्टर थिएटर, ड्रामा इंस्टीट्यूट से लेकर देश विदेश में प्रतिभाओं की तलाश करते हैं। हालिया रिलीज फिल्म बेबी में पाकिस्तानी कलाकारों की कास्टिंग करने वाले विकी सिडाना कहते हैं,‘कास्टिंग डायरेक्टर के आने से सबसे च्यादा लाभ नए कलाकारों को फायदा हुआ है। वे सीधे निर्माता-निर्देशकों से नहीं मिल सकते। मगर कास्टिंग डायरेक्टर से मिल सकते हैं। अब फेसबुक, व्हाट्स अप के कारण भी कास्टिंग डायरेक्टर से संपर्क साधना आसान हो गया है।’ विकी ने एडी के तौर पर काम शुरू किया था। उनका सपना निर्देशक बनना नहीं था। सो उन्होंने कास्टिंग डायरेक्टर बनने का फैसला किया। सूरज बडज़ात्या ने फिल्म इसी लाइफ में उन्हें पहला ब्रेक दिया। बडज़ात्या उसके निर्माता थे।
    हालांकि हिंदी सिनेमा के शुरुआती दौर में कास्टिंग डायरेक्टर नहीं हुआ करते थे। निर्माता-निर्देशक अपने आसपास उपलब्ध कलाकारों को च्यादा मौका देते थे। फिल्ममेकिंग के तौर-तरीकों में बदलाव के साथ कॉस्टिंग डायरेक्टर की जरूरत महसूस होने लगी। यह कहना है ‘कमीने’, ‘ओंकारा’, ‘सात खून माफ’, ‘फुकरे’, ‘डेल्ही बेल्ही’ और ‘डिटेक्टिव व्योमकेश बख्शी’ जैसी फिल्मों की कास्टिंग करने वाले हनी त्रिहेन का। दीपक डोगरियाल, अमोल गुप्ते, कुणाल राय कपूर, अनुराग अरोड़ा, स्वातिका मुखर्जी को लौंच करने का श्रेय उन्हें ही जाता है। वह कहते हैं,‘देश में कास्टिंग डायरेक्टर को श्रेय देने की शुरुआत शेखर कपूर ने 1991 की। उनकी फिल्म ‘बैंडिड क्वीन’ में पहली बार कास्टिंग डायरेक्टर को श्रेय दिया था। उसकी कास्टिंग तिग्मांशू धूलिया ने की थी। मैंने बतौर कास्टिंग डायरेक्टर काम नहीं शुरू किया था। मैं फिल्ममेकिंग से जुड़ा हूं। मैंने विशाल भारद्वाज के साथ बतौर एसोसिएट डायरेक्टर उनकी सभी फिल्मों में काम किया है। मैंने दिल्ली में प्ले भी निर्देशित किया। स्क्रिप्ट लिखने से पहले कहानी कही जाती है। फिर स्क्रीन प्ले और डायलाग लिखा जाता है। स्क्रीन प्ले को डाफ्ट करते समय कैरेक्टर क्लीयर हो जाते हैं। जब तक विशाल सर डायलॉग लिखते थे मैं उनकी कास्टिंग शुरू कर देता था। मेरा मानना  जितनी सिंपल फिल्म होती है उसकी कास्टिंग च्यादा चैलेंजिंग होती है। हजारों लोगों में किसी एक किरदार को चुनना काफी मुश्किल होता है। उसके लिए अपनी इंस्टिक्ट पर भरोसा करना पड़ता है।’ उन्होंने ‘उड़ता पंजाब’, ‘फैंटम’, ‘जच्बा’, ‘रईस’ की भी कास्टिंग की है। ‘रईस’ से पाकिस्तानी अदाकारा माइरा खान डेब्यू कर रही हैं। ‘फैंटम’ में सैफ अली खान और कट्रीना कैफ के अलावा पाकिस्तानी और अफगानी कलाकारों को कास्ट किया गया है। हनी कहते हैं, ‘कलाकारों को कास्ट करने में सीमाएं कभी बाधा नहीं बनती। उड़ता पंजाब में शाहिद कपूर और आलिया के अलावा 82 कैरेक्टर हैं। उन्हें पंजाब से ही कास्ट किया गया है। यह सभी नए कलाकार हैं। अगर बांबे से कलाकार लिए जाते तो पहले उन्हें पंजाबी सीखानी पड़ती। किरदार अगर कहानी में जमे न दर्शकों को फिल्म नीरस लगेगी।’ उड़ता पंजाब में वह सेकेंड यूनिट डायरेक्टर भी है। मेघना गुलजार की फिल्म ‘तलवार’ की कास्टिंग करने के अलावा वे उसके क्रिएटिव प्रोड्यूसर भी हैं। उनके मुताबिक अब देश में बनने वाली 90 प्रतिशत फिल्मोंं में कास्टिंग डायरेक्टर होने लगे हैं।
हालांकि कास्टिंग डायरेक्टर बनने के लिए कोई कोर्स उपलब्ध नहीं है। सभी कास्टिंग डायरेक्टर का कहना है कि कास्टिंग डायरेक्टर बनने के लिए एक्टिंग की बारीकियों, स्क्रिप्ट की समझ और फिल्ममेकरों के साथ अंडरस्टैंडिंग होना जरूरी है। साथ ही साहित्यिक बैकग्राउंड होना बहुत जरूरी है। जैसे डाक्टर बनने के लिए पढ़ाई की जरूरत है ठीक उसी प्रकार स्पेशलाइड जॉब के लिए खास तैयारी की जरूरत होती है। कास्टिंग डायरेक्टर का भविष्य उच्जवल है। पहले यह कोई करियर नहीं होता था। अब टीवी सीरियल, विज्ञापन से लेकर फिल्मों तक हर जगह कास्टिंग डायरेक्टर है। इसके लिए फिल्मों को देखने और इंच्वाय करने की जरूरत है।
    पिछले दस साल से कास्टिंग कर रही नंदिनी श्रीकंत कहती हैं, ‘अब कास्टिंग डायरेक्टर की अहमियत काफी बढ़ गई है। कई बार रोल ज्यादा दमदार नहीं होता पर कलाकार की परफार्मेस उसे दमदार बना देती है। कास्टिंग काउच की बातें भी हमारे स्तर पर नहीं होती। यहां से सिर्फ आपकी प्रतिभा का मूल्यांकन होता है। देश में प्रतिभावान कलाकारों की कमी नहीं है। इंजीनियर डाक्टर बनने के लिए घर में डांट मार पड़ती है। शायद ही कोई माता पिता हो जो अपने बच्चे से कहता हो जाओ जाकर हीरो बनो। जबकि यह प्रोफेशन बहुत उम्दा है। आगे वह कहती हैं कि  विज्ञापन की कॉस्टिंग फिल्मों से काफी अलग होती है। इसके लिए खूबसूरत चेहरा चाहिए होता है। डेढ़ मिनट में पूरी कहानी कहनी होती है। उसे लोगों के दिलोदिमाग में बैठाना होता है। कई बार एक्टर विज्ञापन में अच्छे होते हैं। फिल्म में नहीं। यह मीडियम टू मीडियम निर्भर करता है।’ नंदिनी विदेशी फिल्मों के लिए कास्टिंग करती हैं। उन्होंने हाल में फ्रेंच फिल्म ‘रस्ट एंड बोन’ के लिए कुछ कैरेक्टर की कास्टिंग की है। इसमें किसी चर्चित कलाकार को उन्होंने कास्ट नहीं किया है। इस समय भारतीय फिल्म इंडस्टी में कई महिला कास्टिंग डायरेक्टर सक्रिय हैं। नंदिनी कहती हैं, ‘पर्दे के पीछे काम करने वालों को इमेज नहीं बनानी होती यही वजह है कि वे क्रिएटिव होते हैं। पर्दे के पीछे रहने वाले लोग ग्लैमर के लिए नहीं आते। वे अपनी क्रिएटिव से अपनी पहचान बनाते हैं। उनका अलग मुकाम होता है। फिल्म इंडस्ट्री में महिला कास्टिंग डायरेक्टर अपने पुस्ष समकक्ष के काम करती हैं। बस फीस उनके बराबर नहीं मिलती। पर हमारे काम को पूरा सम्मान मिलता है।’ सभी कास्टिंग डायरेक्टरों ने उम्मीद जताई है कि आने वाले समय में बेस्ट कास्टिंग डायरेक्टर अवार्ड की भी शुरुआत होगी।
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Sunday, March 22, 2015

जासूस बन देखें ‘डिटेक्टिव ब्योमकेश बख्शी’ : दिबाकर बनर्जी

-अजय ब्रह्मात्‍मज
-इस फिल्म को देखने के लिए ऑडिएंस को किस तरह तैयार होना चाहिए। दर्शक आप की फिल्मों को लेकर द्वंद्व में रहते हैं।
0 बड़ा अच्छा सवाल किया आपने, लेकिन डायरेक्टर ही दर्शकों को बताता फिरे कि मेरी फिल्म को इस तरह देखो तो वह जरा अजीब सा लगता है। बहरहाल,मेरे हिसाब से हमारी फिल्मों में आजकल खाली टाइम बढ़ गया है। मैं पाता हूं कि सीन में गाने चल रहे हैं। डायलॉग चल रहा है, पर ऑडिएंस मोबाइल पर बातें कर रहे हैं। सिनेमा के बीच से बाहर जा चक्कर लगा कर आ रहे हैं। फिर वे कहना शुरू कर देते हैं कि यार हम तो बोर हो रहे हैं। इधर हिंदी फिल्में दर्शकों को बांधकर नहीं रख पा रही हैं। साथ ही सिनेमा के प्रति दर्शकों के समर्पण में भी कमी आई है। वे भी समर्पित भाव से फिल्में नहीं देखते। मेरा कहना है कि यार इतना आरामदेह सिनेमहॉल है। बड़ी सी हाई क्वॉलिटी स्क्रीन है। डॉल्बी साउंड है। अगर हम उस फिल्म के प्रति सम्मोहित न हो गए तो फिर फायदा क्या? कॉलेज स्टूडेंट को देखता हूं कि सिनेमा हॉल में बैठ वे आपस में तफरीह कर रहे हैं। मस्ती कर रहे हैं। सामने स्क्रीन पर चल रही फिल्म तो उनके लिए सेकेंडरी चीज है। सामने कितनी ही झकझोरने वाली फिल्म क्यों न हो, दर्शक समर्पित और अनुशासित भाव से फिल्में नहीं देखते।
    ऐसे माहौल में आप अगर मेरी फिल्म देखने जाएं। खासकर ब्योमकेश को तो हर सीन में क्लू है। हर सीन में दर्शकों को एक मौका है कि वे ब्योमकेश के साथ आगे बढ़ें। पहले से पकड़ सकें कि कौन क्या है? अगर ‘डिटेक्टिव ब्योमकेश बख्शी’ देखने दर्शक बतौर जासूस जाएं तो उन्हें वह फिल्म देखने में बड़ा मजा आएगा। बस दो घंटे बीस मिनट की मेरी फिल्म एकाग्रचित होकर फिल्म देखें। यह सोचकर देखें कि मुझे ब्योमकेश को हराना है तो वे फिल्म के एक-एक क्षण का मजा ले सकेंगे।
-हिंदी फिल्मों के साथ एक और समस्या रही है कि दर्शक बड़ी आसानी से सीन स्पेक्यूलेट कर लेते हैं। कई बार तो ऐसा भी देखने को मिला है कि हम कोई डायलॉग विशेष बोलते हैं और स्क्रीन पर वही कुछ सितारे भी बोल देते हैं। आप कैसे सरप्राइज करने वाले हैं?
0 इस फिल्म में एक से बढक़र एक सरप्राइजेज हैं। आप को सांस लेने तक की फुर्सत नहीं मिलेगी। अगर आप को पहले एक-दो मिनट में फिल्म जम गई तो फिल्म के बाकी के घंटों में आप को सांस लेने की फुर्सत नहीं मिलने वाली। हमने तो ट्रेलर में भी लिख दिया, एक्सपेक्ट द अनएक्सपेक्टेड। हिंदी तर्जुमा होगा, अप्रत्याशित की प्रत्याशा करें। आप बस जासूस की तरह फिल्म को देखें। हर छोटी-बड़ी, ऊंची-नीची चीज को टटोलिए। पीछे क्या हो रहा है, सामने क्या हो रहा है, वह देखिए। इतना मैं कह सकता हूं कि आप जब यह फिल्म देख, बाहर निकलेंगे तो आप को पक्का लगेगा कि आप किसी और दुनिया में गए थे।
-ब्योमकेश नायक ने ही आप को क्यों आकर्षित किया?
0 क्योंकि ब्योमकेश भारतीय है। वह ऐसा भारतीय है, जो देसी बनने के चक्कर में अतीत या इतिहास का गुलाम नहीं बन जाता। वह ठीक वैसा ही युवक है, जैसा 20 वीं सदी में कौस्मोपॉलिटन सिटी कोलकाता में रहने वाला एक शख्स हो सकता है। उसकी अंग्रेजी भी बड़ी स्ट्रौंग है। बंगाली साहित्य भी पढ़ रखा है, पर वह धोती पहनता है। वह पान भी खाता है। उसे ठुमरी भी पसंद है तो वह अंग्रेजी जैज गाना भी सुनता है। वह आज की तारीख का आधुनिक भारतीय है, जबकि वह 1943 के भारत का है। वह जो आधुनिकता थी, आज से 50-60 साल पहले, वह आधुनिकता आज हम लोगों में भी नहीं है। वह खुलापन शायद थोड़ा सा कम ही हो गया है। ब्योमकेश उस तरह का  डिटेक्टिव है, जो पारंपरिक जासूसों की वेशभूषा व ऐट्टियूड पर प्रहार करता है। ब्योमकेश के प्रति मेरे आकर्षण की एकमात्र वजह यही थी कि वह किरदार इतना देसी गढ़ा गया था कि आप उसे भारत के सिवा और कहीं इमैजिन ही नहीं कर सकते। मैंने जब बचपन में ही उस किरदार को पढ़ा था तो उस किरदार के सोच पर बड़ा गर्व हुआ था। वह जबरन देशभक्त या इंडियन होने का दावा नहीं करता था।
-ब्योमकेश बंगाली भद्रलोक है या..?
बिल्कुल भद्रलोक है। वह सिंपल मिडिल क्लास फैमिली से आता है। उसके संवाद ‘मां-बाप कौलरा ले गए, घर-बार रिश्तेदार’ से पता भी लग जाता है कि वह क्या है।
-यह पीरियड फिल्म है और ऊपर से आप के द्वारा निर्मित। आप जैसे फिल्मकारों का एक पॉलिटिकल अंडरटोन होता है, जो बेबाकी से आता है। सन् 1943 के कलकत्ते की कौन सी तस्वीर आप पेश कर रहे हैं?
0 बड़ा सही सवाल किया है आपने। उन दिनों कोलकाता को लेकर जो सबसे उल्लेखनीय बात थी वह था कोलकाता पर जापान का आक्रमण। जापान वैसे तो ब्रिटेन पर आक्रमण कर रहा था, लेकिन क्योंकि भारत ब्रिटेन के अधीन था तो टेक्निकली जापान भारत पर अटैक कर रहा था। तब क्या हुआ कि भारतीय फंस गए जापान के आक्रमण में। भारतीय अंग्रेजों से त्रस्त तो थे ही। ऊपर से जापानियों को लेकर एक किस्म के भय का माहौल भी था। वह इसलिए कि जापान कोलकाता से पहले इंडोनेशिया, बर्मा व अन्य पूर्वी एशियाई इलाकों में आक्रमण कर तबाही मचाते रहे थे। वैसे भी जब कोई सामरिक शक्ति किसी मुल्क में आती है तो उसका नतीजा अच्छा नहीं होता। दूसरी तरफ अंग्रेजों के अधीन होने के बावजूद भारत उस तारीख में स्वतंत्र गणराज्य के तौर पर काम कर रहा था। पराधीनता को लेकर ग्लानि थी, मगर हमने कभी दूसरे मुल्क के आक्रमण और उसके आर्मी के घिनौने अत्याचार को कभी नहीं देखा था। अगर जापानी आर्मी भारत में आ जाती तो भारत का इतिहास बदल जाता। इस फिल्म में इतिहास का वह चक्र भी दिखाया गया है। और एक बात जो आज लोग भूल चुके हैं कि उस वक्त ब्रिटिश सरकार जापानियों के समक्ष हथियार डालने को तैयार थी। उनका प्लान था कि अगर जापानी कोलकाता पर अटैक करते हैं तो वे कोलकाता को जापानी आर्मी के हवाले कर दिया जाएगा। उसी वक्त दूसरे वल्र्ड वॉर में ही अंग्रेजों ने हिंदुस्तान से भारी मात्रा में चावल समेट कर ग्रीस भेज दिया। अपने रंगरूटों के लिए और बंगाल में हो गई भुखमरी। 60 लाख लोग मर गए। वह अंग्रेजों के द्वारा बनाया हुआ अकाल था। एक किस्म की अनिश्चितता थी कि हम किसका साथ दें। बापू साम्राज्यवादियों के अलावा मिलिट्री रूल करने वालों के भी खिलाफ थे। आज उनकी बातों की झलक पाकिस्तान के राजनीतिक हालात देखकर पता चलते हैं कि वहां आर्मी ने क्या कुछ किया है?
-ब्योमकेश किस किस्म के केसेज को सॉल्व करता है? लॉ एंड ऑर्डर प्रॉब्लम या पॉलिटिकल प्रॉब्लम?
0 उस दौर में दोनों समस्याएं घुल-मिल गईं थीं। वल्र्ड वॉर के टाइम पर ही स्मगलिंग हो रही थी। कोलकाता में दुनिया भर के जासूस थे। शहर में अंडरवल्र्ड का साम्राज्य था। बर्मा से सारा अफीम आता और बाकी देश-दुनिया में जाता। एक और चीज थी, वहां का चाइना टाउन। हालांकि वह भी अब तब्दील हो चुका है। पुराना चाइना टाउन शहर के बीचों-बीच था। वहां हमने शूट भी किया। वह उस समय शहर की शान था। वहां स्मगलिंग भी होती थी। उसी दौरान भारत छोड़ो आंदोलन भी खत्म हुआ था। नेताजी सुभाष चंद्र बोस बाहर थे। कोलकाता में एक अलग माहौल था। जापानी आक्रमण के अंदेशे भी थे। वह सब चीज हमने फिल्म में दिखाई है।
- उन सब चीजों को एक ही कहानी में पिरोना कितना चैलेंजिंग था?
0 मैंने ब्योमकेश की कहानी पर जोर दिया है। बाकी चीजें फिल्म के बैकड्रॉप में है। उस समय नौकरी की भी भारी किल्लत थी। वैसी सिचुएशन में ताजा-ताजा ग्रैजुएशन कर निकला ब्योमकेश लेक्चरार न बन सत्यानवेषी यानी डिटेक्टिव बनने का फैसला करता है। वैसा करने की क्या वजह हो सकती थी। यह फिल्म ब्योमकेश के पहले केस के इर्द-गिर्द है। मैंने अपने इंटरप्रेटेशन से ब्योमकेश को पर्दे पर उतारा है। हां शरदिंदु बंधोपाध्याय की किताब से जिन तीसों कहानियों के राइट्स मैंने लिए हैं, उनमें से कुछ चीजें लेकर मैंने ब्योमकेश के तीस सालों का सफर तो दिखाया है। दो कहानियों को लेकर फिल्म का मेन प्लॉट मैंने वल्र्ड वॉर और तत्कालीन राजनीतिक हालात के बैकड्रॉप में रखकर गढ़ा है। फिल्म में आप को पूरा विंटेज ट्रैफिक देखने को मिलेगा।
- कलाकारों के चयन की वजहें क्या कुछ रहीं?
0 सुशांत सिंह राजपूत में मुझे काफी पोटेंशियल लगा। ब्योमकेश के तौर पर मुझे यंग और वलनरेबल ब्योमकेश की दरकार थी। मैं डिटेक्टिव की टिपिकल धारणा को ध्वस्त करना चाहता था। हमारे यहां अमूमन यह होता है कि कोई अगर डिटेक्टिव है तो वह असाधारण ही होगा। उसकी पैनी नजर होगी। वगैरह-वगैरह। मेरा मानना है कि डिटेक्टिव भी इंसान ही होता है। बहरहाल मुझे एक ऐसा कलाकार चाहिए था, जो इंटेलिजेंट भी लगे, पर आम इंसानी फितरत वाला भी हो। सुशांत दोनों का बढिय़ा संतुलन साधते हैं। उन्होंने जेन्युनली खुद को ब्योमकेश में तब्दील भी किया। वे हर रात अपने कैरेक्टर स्केच के बारे में नोट्स लिखते थे। हर बारीक चीज को उन्होंने पकड़ा। आनंद तिवारी का काम मुझे जंचता है। वह चाहे उनकी ‘उड़ान’ हो या फिर कोई विज्ञापन फिल्म ही। उन के काम पर मेरी नजर ठहरती है। ब्योमकेश बख्शी के दोस्त या सहायक हम, जो कुछ कह लें के तौर पर आनंद तिवारी ने उम्दा काम किया है। वैसा अजीत ब्योमकेश बख्शी के दर्शकों ने नहीं देखा होगा। दिव्या मेनन को ढूंढा हमारे आर्ट डायरेक्टर सब्यसाची मुखर्जी ने। मेन लीड हीरोइन स्वास्तिका बंगाली फिल्मों की स्थापित अभिनेत्री हैं। उन्हें सेलेक्ट किया गया, उन्हें तो पता भी नहीं था कि हम क्या बना रहे हैं? हमारे कास्टिंग डायरेक्टर जब कोलकाता में शूट कर रहे थे तो उन्हें उड़ते-उड़ते इस फिल्म के बारे में खबर लगी। वे 15 मिनट के लिए हम लोगों से मिलने आ गईं। स्क्रीन टेस्ट दिया और चली गईं। बाद में कुछ महीनों बाद उन्हें पता चला कि उनका ऑडिशन ‘डिटेक्टिव ब्योमकेश बख्शी’ के लिए हुआ था। अंगूरी के रोल में उन्होंने जान-प्राण डाल दिए। फिर भी हम उनके चयन को लेकर सशंकित थे, क्योंकि मुंबई, दिल्ली की ऑडिएंस कहां उनसे कनेक्ट करेगी, मगर आखिर में आदित्य चोपड़ा की हामी पर उनका चयन हो गया।

Saturday, March 21, 2015

दरअसल: विधु विनोद चोपड़ा की कोशिश


अजय ब्रह्मात्मज
    पिछले हफ्ते आमिर खान और अमिताभ बच्चन ने विधु विनोद चोपड़ा की अंग्रेजी फिल्म 'ब्रोकेन हॉर्सेजÓ के ट्रेलर की लॉन्चिंग की। इन दिनों ट्रेलर लॉन्चिंग एक इवेंट बन गया है। टीवी और सोशल मीडिया के लिए फोटो और फुटेज मिल जाते हैं। हालांकि लॉन्चिंग के कुछ मिनटों के बाद ट्रेलर, गाने और प्रोमो यू-ट्यूब पर उपलब्ध हो जाते हैं। फिर भी ऐसे इवेंट का अपना महत्ब बनता और बढ़ता जा रहा है। समकालीन घटनाओं को रिकार्ड और संरक्षित करना बेहद जरूरी काम है। ऐसे इवेंट पर सोच-समझ के साथ या बेखयाली में कही गई बातों का भी ऐतिहासिक संदर्भ बनता है। 'ब्रोकेन हॉर्सेजÓ के ट्रेलर लॉन्च पर विधु विनोद चोपड़ा ने अपनी ख्वाहिशों का जिक्र किया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अगर लक्ष्य स्पष्ट हो और लगन व मेहनत में कोई कमी न रहे तो कुछ भी हासिल किया जा सकता है। उन्होंने अपनी कोशिश का उदाहरण दिया। कश्मीर के हिंदी मीडियम में डीएवी स्कूल से पढ़ा लड़का इसी लगन और मेहनत से आज अंग्रेजी फिल्म बना सका है।
    डीएवी स्कूल में पढ़ते समय विधु विनोद चोपड़ा ने पढ़ाई के साथ धर्मशिक्षा भी ली। आठवीं जमात में आने पर उन्होंने अंग्रेजी का एबीसी सीखा। तब उनकी उम्र लगभग 16 साल थी। विधु खुद कहते हैं, तब सोचा भी नहीं था कि कभी फिल्में बनाऊंगा। फिल्में हो गईं तो भी कहां सोचा था कि मैं अंग्रेजी में फिल्म बनाऊंगा। अंग्रेजी फिल्म लिखना, प्रोड्यूस करना और डायरेक्ट करना और वह भी वहां के कलाकारों के साथ। 'ब्रोकेन हॉर्सेजÓ मेरे लिए फिल्म से अधिक एक सपना है, जो पूरा हो गया। सच कहूं तो यह सनक होती है। मैंने अभिजात जोशी के साथ इसे लिखना शुरू किया और तय किया की अंग्रेजी में हॉलीवुड में फिल्म बनाएंगे। हमारी इस कोशिश पर भी फिल्म बन सकती है। इसे लिखते समय हमलोगों ने दुनिया की बेहतरीन स्क्रिप्ट अपने पास रखी। 'चाइना टाउनÓ, 'सिक्स्थ सेंसÓ, 'गॉडफादरÓ और कुरोसावा की फिल्मों की स्क्रिप्ट भी थी। अपने सीन लिखने के बाद मैं जाकर उन्हें पढ़ता था। मंशा यही थी कि हमें अच्छा काम करना है। मैं सभी जवान दोस्तों से यही कहूंगा कि अपने पैशन और सपने के पीछे पागल की तरह पड़ जाओगे तो उसे अवश्य पूरा कर लोगे।
    विधु विनोद चोपड़ा ने 'सजा-ए-मौतÓ से 'एकलव्यÓ तक के सफर में हमेशा लीक से हट कर फिल्में बनाईं। उन्होंने दूसरे निर्देशकों को भी अपने बैनर से फिल्में बनाने का मौका दिया। उनमें से राजकुमार हिरानी आज बहुत ही सफल और सार्थक निर्देशक के तौर पर उभरे हैं। उन्होंने अनेक प्रतिभाओं को भी अवसर दिए। विधु विनोद चोपड़ा थोड़े मुंहफट और स्पष्टवादी हैं, इसलिए उनकी बातों में कई बार अहमन्यता झलकती है। जो उन्हें नहीं जानते, उन्हें उनकी बातें हवाई भी लग सकती हैं। दिल और लगन के सच्चे विधु विनोद चोपड़ा ने हमेशा अपनी फिल्मों में कंटेंट को तरजीह दी। फिल्में बिजनेस कर लें तो बहुत अच्छा। अन्यथा उन्हें इसका सुकून रहता है कि कमाई के लिए उन्होंने किसी प्रकार का समझौता नहीं किया। वे एक और अच्छा काम कर रहे हैं। उन्होंने एक अंग्रेजी प्रकाशक की मदद से गुरु दत्त और राजकुमार हिरानी की फिल्मों की स्क्रिप्ट किताब के तौर पर छपवाई है। ऐसी किताबें नए लेखको, निर्देशकों और फिल्म निर्माण से जुड़े अन्य प्रतिभाओं के लिए मददगार होती हैं।
    अभी कहना मुश्किल है कि 'ब्रोकेन हॉर्सेजÓ को अंग्रेजी दर्शक किस रूप में स्वीकार करते हैं। इस फिल्म की कहानी विधु विनोद चोपड़ा की ही फिल्म 'परिंदाÓ से प्रेरित है। उन्होंने किरदार और कथाभूमि बदली है, लेकिन भावभूमि वही रखी है। अब यह कहानी अमेरिका और मैक्सिको के बॉर्डर के आसपास की हो गई है। 'ब्रोकेन हॉर्सेजÓ मुख्य रूप से विदेशी दर्शकों के बीच विदेशों में रिलीज होगी, लेकिन इसे भारत के भी दर्शक देख सकेगे। विधु विनोद चोपड़ा इसे हिंदी में नहीं लाना चाहते।
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Friday, March 20, 2015

फिल्‍म समीक्षा : हंटर

-अजय ब्रह्मात्‍मज

निस्संदेह 'हंटर' एडल्ट फिल्म है। फिल्म के प्रोमो से ऐसा लग सकता है कि यह एडल्ट सेक्स कामेडी होगी। फिल्म में सेक्स से ज्यादा सेक्स की बातें हैं। सेक्स संबंधी उन धारणाओं,मूल्यों और समस्याओं की चर्चा है,जिनके बारे में हम दोस्तों के बीच तो छुप कर बातें करते हें,लेकिन कभी खुलेआम उन पर बहस नहीं होती। भारतीय समाज में सामाजिक और नैतिक कारणों से सेक्स एक वर्जित विषय है। फिल्मों में दर्शकों उलझाने और लुभाने के लिए उसका अनुचित इस्तेमाल होता रहा है। हर्षवर्धन कुलकर्णी ने इस सेक्स को कहानी का विषय बनाने का सराहनीय जोखिम उठाया है। संवाद और दृश्यों में फिल्म थोड़ी सी फिसलती तो अश्लील और फूहड़ हो सकती थी। हर्षवर्धन ने संयत तरीके से इसे पेश किया है। पहली फिल्म के लिहाज से उनके चुनाव,लेखन और निर्देशन की तारीफ होनी चाहिए।

कल सई परांजपे का जन्मदिन था। 'चश्मेबद्दूर' और 'कथा' जैसी फिल्मों की निर्देशक सई परांजपे की शैली,ह्यूमर और परिप्रेक्ष्य से प्रभावित हैं हर्षवर्धन और यह कतई उनकी कमजोरी नहीं है। उन्होंने प्रयाण वहां से किया है और समय के हिसाब से 'हंटर' में ज्यादा खुले हैं। मैं इसे बोल्ड फिल्म नहीं कहूंगा। 'बोल्ड' शब्द हिंदी फिल्मों में घिस का अपना मानी खो चुका है। यह बदलते ट्रेंड और माइंड की फिल्म है। महाराष्ट्र की पृष्ठभूमि की इस फिल्म में मंदार पोंकसे की कहानी है। किशोरावस्था से ही मंदार सेक्स के प्रति जिज्ञासु है। वह पोर्नो फिल्म देखते हुए पकड़ा जाता है। लड़कियों से दोस्ती करने के लिए उत्साहित रहता है। बड़े होने पर उसका यह आकर्षण और बढ़ता है और उसकी आदत बन जाता है। वह स्वाभाविक रूप से विपरीत सेक्स के प्रति सम्मोहित रहता है। वह सूंघ लेता है। महाराष्ट्र में ऐसे लड़कों को वासु कहते हैं। मंदार की वासुगिरी चलती रहती है,जबकि उसके सारे दोस्त शादी कर घर बसा रहे हैं। मंदार पर भी दबाव है कि वह शादी कर ले। वह अपनी मजबूरी और आदत के बहाने शादी टालता रहता है। आखिरकार उसकी मुलाकात तृप्ति से होती है। तृप्ति के प्रति उसके मन में प्यार जागता है तो वह खुद को दोराहे पर पाता है। उसकी इस दुविधा और आत्मसाक्षात्कार की वजह से इस फिल्म का आशय बड़ा हो जाता है। फिल्म कुछ कहने लगती है।

हर्षवर्धन कुलकर्णी ने 2015 से कहानी शुरू की है। वे पहले मंदार के बचपन और किशोरावस्था में जाते हैं और फिर बार-बार 2015 में लौटते हैं। समय के इस आवागमन में थोड़ा कंफ्यूजन होता है। ध्यान बंटे तो कहानी और किरदारों का तारतम्य मिस भी हो सकता है। बहरहाल,हर्षवर्धन की पटकथा का ढीलापन फिल्म को जरा कमजोर करता है। यों संवाद चुटीले और थीम के अनुरूप हैं। फिल्म कई जटिल प्रसंगों को सहज तरीके से चित्रित कर देती है। निर्देशक को अपने दक्ष कलाकारों का भरपूर सहयोग मिला है। पर्दे पर केंद्रीय चरित्र के तौर पर मंदार और तृप्ति तो हैं ही बेहतर। गुलशन देवैया और राधिका आप्टे के बेहतरीन और संयत प्रदर्शन ने 'हंटर' को कथित सेक्स कामेडी होने से बचा लिया है। उन दोनों के बीच के अनेक दृश्य बेहतर तालमेल और समझदारी के उदाहरण बन सकते हैं। उन्होंने वर्जित विषय को सही संवेदना से दूश्यों में समाहित किया है। उनके साथ छोटी भूमिकाओं में आए कलाकारों ने भी पूरा सहयोग दिया है। सई तम्हाणकर,वीरा सक्सेना,सागर देशमुख और अन्य कलाकारों का अभिनय उल्लेखनीय है।

'हंटर' 21 वीं सदी के दूसरे दशक के भारत को सही तरीके से पेश करती है। हिंदी फिल्मों में सेक्स के नाम पर फूहड़ता परोसी जाती रही है। चुंबन और अंग प्रदर्शन की भोंडी तरकीबें निर्देशक इस्तेमाल करते रहे हैं। 'हंटर' के प्रचार में भी इन तौर-तरीकों का इस्तेमाल किया "या। फिल्म महज सेक्स कामेडी नहीं है। यह फिल्म सेक्स के साथ मानसिक दुविधाओं और भावनाओं को भी तरजीह देती है। अच्छी बात है कि निर्देशक ने फिल्म को फिसलने नहीं दिया है। वे अपने ध्येय में सफल रहे हैं।


अवधि: 140 मिनट

*** तीन स्‍टार

Thursday, March 19, 2015

जैगम ईमाम की कोशिश -दोज़ख़


-अजय ब्रह्मात्मज
    मैं बनारस का हूं। वहीं पैदाइश हुई और दसवीं तक की पढ़ाई भी। उसके बाद लखनऊ चला गया। फिर भोपाल और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी गया। मास कॉम की पढ़ाई की थी। दिल्ली आकर मैंने अमर उजाला में रिपोर्टर के तौर पर काम शुरू किया। प्रिंट से इलक्ट्रानिक मीडिया में जाना हुआ। न्यूज 24 और आज तक में भी काम किया। इसके बा द मैंने महसूस किया कि सिनेमा मेरे अंदर जोर मार रहा है।  तब तक मैंने दोजख नाम से उपन्यास लिख लिया था। सिनेमा की तलाश में उपन्यास लेकर मुंबई आ गया। शुरू में टीवी शो लिखने का काम मिला। एक साल के लेखन और कमाई के बाद सिनेमा ने फिर से अंगड़ाई ली। मैंने अपने ही उपन्यास को स्क्रिप्ट का रूप दिया और टीम जोडऩी शुरू कर दी। पहले लोगों ने यकीन नहीं किया। मजाक किया। जब मैंने टीम के सदस्यों को एडपांस पैसे देने आरंभ किए तो उन्हें यकीन हुआ।
    घरवालों को बताए बगैर मैंने अपने फंड तोडऩे शुरू कर दिए। नगदी जमा किया। पैसे कम थे। हिम्मत ज्यादा थी। बनारस के दोस्तों की मदद से बनारस में ही शूटिंग की प्लानिंग की। वहीं की कहानी है। सब कुछ अकेले करता रहा। 2012 के मार्च-अप्रैल महीने में हम ने शूटिंग की। खराब हालत और मुश्किलों के बीच काम होता रहा। ग्यारहवें दिन पैसे खत्म हो गए। मैंने टीम छोटी की। लगने लगा कि मैंने नाकामयाब किस्म का सपना देख लिया है। बड़े भाई मदद में आए। उन्होंने हौसला और पैसे दिए। फिल्म पूरी कर मैं मुंबई आ गया। आने के बाद फिर से टीवी लेखन आरंभ किया। पैसे जमा हुए तो पोस्ट प्रोडक्शन का काम शुरू किया। पोस्ट प्रोडक्शन में देखने पर अपनी सोच और फिल्म पर यकीन बढ़ता गया। 2013 में फिल्म पूरी होने लगी। तब मैंने बताना शुरू किया। पहला कट आया तो 92 मिनट की फिल्म बनी।
    मैंने फिल्म की डीवीडी बनवाई और विदेशी फिल्म फेस्टिवल में भेजना इारंभ किया। सात जगह से रिजेक्शन आ गया। मन टूटने लगा। मुझे भ्रम था कि मेरी फिल्म विदेशों में पसंद की जाएगी। रिजेक्शन के मेल सेे एहसास हुआ कि यह तो भारत की फिल्म है। सबसे पहले कोलकाता के फिल्म फस्टिवल ने फिल्म चुनी और प्रीमियर किया। उसके बाद भारत के अनेक फस्टिवल में इसे मौका मिला। दर्शकों की सराहना मिली। मेरे अच्छे दिन आ गए थे। मुझे अब रिलीज की चिंता सताने लगी थी। कई जगह घूमने के बाद आखिरकार पीवीआर ने उसे चुन लिया और रिलीज का अवसर दिया। आज भी यह सीमित स्तर पर रिलीज हो रही है।
     फिल्म की कहानी रामनगर की है। आमने-सामने मंदिर-मस्जिद हैं। पंडित् और मौलनी में थोड़ी खींचातानी चलती है। मौलवी अजान देता है तो पंडित घंटी बजाने लगता है। मौलवी के बेटे से पंडित हिला-मिला हुआ है। मौलवी के बेटे को रामलीला का हनुमान बहुत पसंद है। वह हनुमान बनना चाहता है। एक शाम रामलीला का हनुमान घायल हो जाता है। उस लडक़े को पंडित हनुमान बना देता है। इधर उसकी पूंछ में रावण आग लगाता है,उधर उसके अब्बा अजान देते हैं। लडक़ा घर की ओर भागता है। मौलवी उसे कहते हैं कि तू दोजख जाएगा। एक बार वह लडक़ा किसी की मैयत में जाता है। वहां सब कुछ देखने के बाद वह अपने अब्बा से कहता है कि अगर मैं मरु तो मुझे दफ्न मत करना। वहां बहुत अंधेरा रहता है। इस बीच लडक़े की अम्मी का इंतकाल हो जाता है और लडक़ा घर से गायब हो जाता है। मौलवी साहब उसे खोजने निकलते हैं तो उन्हें एहसास होता है कि उन्होंने बच्चे को सही तालीम और परवरिश नहीं दी। पंडित की भूमिका में नाजिम खान है। मौलवी की भूमिका ललित तिवारी ने निभाई है। मैंने बनारस के लोगों से भी काम करवाया है। मेरी फिल्म दोजख बनारस को अलग रंग और माहौल में में पेश करती है।
    मेरी फिल्म सेंसर में भी फंसी थी। सेंसर बोर्ड के सदस्यों के खयाल अलग-अलग थे। फिल्म रिवाइजिंग कमिटी में गई। मेरी फिल्म पर कुछ सदस्यों को आपत्तियां थीं। आखिरकार लीला सैंपसन ने इसे मंजूरी दी।
















Tuesday, March 17, 2015

हिंदी टाकीज 2 (6) फिल्‍मी हुआ मैं - आरजे आलोक

हिंदी टाकीज सीरिज में इस बार आरजे आलोक। आरजे आलोक हाजिरसवाल आरजे और फिल्‍म पत्रकार हैं। अपनी मधुर और वाक् उपस्थिति से वे हर इवेंट को जीवंत कर देते हैं। पिछले चंद सालों में ाहचान में आए फिल्‍म पत्रकारों में से एक आरजे आलोक सक्रिय और रंजक हैं।
फ़िल्मी हुआ मैं .. 

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मैं उत्तर प्रदेश के सोनभद्र ज़िले में "ओबरा " नामक स्थान से ताल्लुक़ रखता हूँ, जहां आज भी नयी फिल्में रिलीज़ होने के २ महीने बाद लगती हैं ! जब मैं छोटा था तो घर में नयी रंगीन टी वी आयी थी और वी सी आर प्लेयर किराये पर मंगा कर के महीने में १-२ बार पिताजी वीडियो कैसेट्स पर फिल्में दिखाया करते थे, आस पास से पडोसी भी आ जाया करते थे , फिल्म देखने की पिकनिक , घर में ही हो जाया करती थी ! उन दिनों में मुझे याद आता है "बड़े दिलवाला " फिल्म पूरे परिवार ने साथ देखा था , मेरे हाथ में वो वीडियो कैसेट का कवर भी था और घर के होली पर बनाये गए चिप्स को खाते हुए हम फिल्म देख रहे थे !

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(फोटो - मैं वीडियो कैसेट  के साथ ,बगल में मेरे बड़े भाई )

पहली बार मुझे याद है मुंबई दंगो पर आधारित फिल्म "बॉम्बे " रिलीज़ हुयी थी तो सिनेमा हॉल मैं अपने बड़े भाई और उनके दोस्तों के साथ गया था , और थोड़े थोड़े अरविन्द स्वामी और नीले कपडे पहनी हुयी मनीषा कोइराला याद आती है ! २१ इंच वाली साइकिल के आगे वाले डंडे पर बैठ कर सिनेमा हाल पहुंचे , और जब पता चला इस फिल्म के लिए दंगा चल रहा है तो २० मिनट की फिल्म के बाद ही हम सबको भाग कर वापिस घर आना पड़ा ! फिर वीडियो कैसेटस ही काम आते थे !आखिरी फिल्म मैंने वीडियो कैसेट पर देखी थी वो अक्षय कुमार , सुनील शेट्टी और रवीना टंडन की "मोहरा " थी , और पहली बार एक ही फिल्म के 3 वीडियो कैसेट आये थे , जिनमें पूरी फिल्म समायी हुयी थी ! मुझे ये भी याद है की फिल्म देखने के बाद अक्षय कुमार की ही तरह सिर के ऊपर गमछा ( तौलिया ) बाँध कर , एक हाथ सिर और दूसरा पेट के ऊपर रख कर के "तू चीज़ बड़ी है मस्त मस्त " पर नृत्य भी किया करता था !

 फिल्मों का क्रेज़ कुछ इस कदर हुआ करता था की जो भी फिल्म रिलीज़ होती थी , उसी अंदाज़ में दोस्तों से संवाद भी किया करते थे , अच्छी तरह से मुझे याद है की अग्निपथ फिल्म जब रिलीज़ हुयी थी तो उसके डायलाग हम क्रिकेट खेलते वक़्त बार बार बोलते थे - " विजय दीनानाथ चौहान पूरा नाम , हायें " , 

आज भी याद आता है जब सिर्फ दूरदर्शन ही मनोरंजन का साधन हुआ करता था , तब रविवार को ही फिल्में देख पाते थे हम सब , और आने वाली फिल्म का प्रचार देख कर हम पूरे परिवार के साथ तय कर लिया करते थे की आज रात ये फिल्म देखनी है , खाना पीना खाकर , हम सब सिर्फ इंतज़ार करते थे की कब बजेगा 9 , और शुरू होगी फिल्म !


"त्रिदेव , अमर अकबर एंथोनी , मशाल , क्रांति , कर्मा और ना जाने कितनी फिल्में हम सबने सिर्फ दूरदर्शन पर देखी और फिर DD2 की एंट्री हुयी और जिस पर अनोखे कार्यक्रमों के साथ साथ गुरूवार वाली फिल्में काफी प्रसिद्ध हुयी और याद आता है जब लोग डिश के  केबल पर अपने अपने तार बिछा देते थे , और कुछ लोग एंटेना को बाँध कर रखते थे ताकि फिल्म के वक़्त कोई भी परेशानी ना हो , और जब हम गाँव में होते थे तो ट्रक और ट्रैक्टर की बैटरी को तैयार रखते थे , की अगर बिजली गयी तो कम से कम बैटरी का सहारा रहेगा ! 

फिल्मों का देखना टी वी पर होता था और रही सही कसर मेरी माँ पूरा कर देती थी , हर एक गीत को आल इंडिया रेडियो पर सुना देती थी , माँ काम करती  हुई रेडियो को खुला छोड़ कर रखती थी , और हरेक गीत ज़ेहन में घर कर जाता था ! किशोर मुकेश रफ़ी लता आशा भोसले के साथ बड़ा हुआ हूँ मैं !

आज भी वो दिन याद आते हैं , तो लगता है की बचपन से ही फिल्मों का जूनून और जज़्बा नब्ज़ में आज फिल्म इंडस्ट्री के बीच हूँ , उन्ही सितारों को देखता हूँ , उनसे बातें करने का मौका मिलता है और अतीत की याद आती है ...आज भी वो दिन याद आते हैं , तो लगता है की बचपन से ही फिल्मों का जूनून और जज़्बा नब्ज़ में बहता था जो आज भी उसी तीव्र वेग से बहता रहता है !
सादर 
आर जे आलोक (Twitter-@oyerjalok)
Radio Jockey Cum Bollywood Reporter
Mumbai 
FB - RJ ALOK 


Monday, March 16, 2015

अश्लील नहीं है हंटर- हर्षवर्द्धन कुलकर्णी

-अजय ब्रह्मात्‍मज

    प्रोफेसर और पोएट जीवी कुलकर्णी के बेटे हर्षवर्द्धन कुलकर्णी को घर में साहित्यिक और सृजनशील माहौल मिला। पिता कर्णाटक के धारवाड़ से मुंबई आ गए थे। हर्षवर्द्धन की परवरिश मुंबई में ही हुई। पढ़ाई-लिखाई में अच्छे थे तो मध्यवर्गीय परिवार के दबाव में इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। कॉलेज के दिनों में थिएटर की संगत रही। भाई की सलाह पर पुणे पढऩे गए। पुणे में सांस्कृतिक माहौल मिला। पुणे प्रवास के दौरान हमेशा एफटीआईआई के सामने की सडक़ से आना-जाना होता था तो वह बुलाता था। मन में हूक सी होती थी कि यहां से कुछ करना है।पढ़ाई पूरी करने के बाद हर्षवद्र्धन मुंबई आ गए। यहां प्रदीप उप्पुर सीआईडी के निर्देशक बीपी सिंह के साथ मिल कर ‘आहट’ आरंभ करने जा रहे थे। यह 1995 की बात है। ‘आहट’ के लिए छह-सात महीने काम करने का अनुभव हुआ और वे चीफ असिस्टैंट तक बन गए थे। इस बीच एफटीआईआई में एडमिशन मिल गया। उस समय सभी ने मना किया,लेकिन बीपी सिंह ने स्पष्ट सलाह दी कि मुझे जाना चाहिए। अपना स्वर हासिल करना चाहिए। अब लगता है कि उनकी सलाह नेक और दूरगामी प्रभाव की थी।
    एफटीआईआई में हर्षवर्द्धन ने एडीटिंग की पढ़ाई की। डायरेक्शन के क्षेत्र में आने में एडीटिंग से मदद मिली। 1999 में मुंबई में आने के बाद फिल्मों से जुडऩा हुआ। यह तय का लिया था कि किसी का असिस्टैंट नहीं बनना है। हर्षवर्द्धन कहते हैं,‘मैं मुंबई से ही था। मुझे बेसिक स्ट्रगल नहीं करना था। मैंने एक दोस्त कीर्ति नाकवा के साथ टेलरमेड कंपनी बनाई। इरादा था कि जल्दी से फिल्म बनाएंगे,लेकिन ऐड और कारपोरेट फिल्मों के लंबे चक्कर में पड़ गए। हमलोग फिक्शन नहीं कर पा रहे थे। मेरे जूनियर विरील मैथ्यू ने एक चैनल के लिए टेलीफिल्म लिखने की बात की। उसे हम ने प्रोड्यूस भी किया। 75 मिनट की टेलीफिल्म थी ‘द चोजेन वन’। उस फिल्म के बाद मजा आया। अच्छा रेस्पांस मिला। इस सराहना से फिल्म का इरादा मजबूत हुआ। मेरे पास एक कहानी थी। मैंने उसे ‘वासु’ नाम से लिखना शुरू किया। शुरू में थोड़ा डर था कि लोग उसे सेमी पोर्न फिल्म न समझ लें। लिखने के बाद लगा कि यह बीच का सिनेमा है,जो सई परांजपे जैसे फिल्ममेकर बनाते रहे।’
    हर्षवर्द्धन कुलकर्णी खुद को सई परांजपे जैसे फिल्मकारों से प्रभावित मानते हैं,‘मेरा सेंस ऑफ ह्यूमर उन जैसा ही है। मैंने लिख ली। मेरी नजर में कमर्शियल फिल्म थी,लेकिन किसी फार्मूले में नहीं थी। हमलोग सभी के पास गए। बीच में पीवीआर ने हरी झंडी भी दी,लेकिन तभी बाजार में मंदी आ गई। हमलोग फिर से कारपोरेट में चले गए। इस दरम्यान विनील मैथ्यू बड़े ऐड डायरेक्टर बन गए तो लोग उन्हें फिल्म बनाने के लिए प्रेरित करने लगे। उनके कहने पर मैंने ‘हंसी तो फंसी’ लिखी। उसके बाद फिर से अपनी फिल्म का खयाल आया। एक खयाल आया कि अपनी फिल्म मराठी में बना लें। फिर लगा कि रिस्क ही लेना है तो हिंदी में ही बनाएं। हिंदी में बनाने पर व्यापक दर्शक तक पहुंचेंगे।’
    हर्षवर्द्धन कुलकर्णी ‘हंटर’ की विशेषताओं के बारे में बताते हैं,‘मेरी फिल्म में एक तो मुंबई का माहौल मिलेगा और मैंने किरदारों पर बहुत काम किया है। मुंबई के कुछ फिल्मकारों के लिए फिल्में ही जिंदगी हैं। उनके रेफरेंस फिल्मों से आते हैं। यह गलत भी नहीं है। मेरी फिल्में जिंदगी के किरदारों से बनती हैं। उसमें मेरी गली आती है। मोहल्ला आता है। मैं घटनाओं पर फिल्म नहीं लिख सकता। मैं अपने दोस्तों को ही किरदार बना देता हूं। बहाहाल, एक खास बजट में मुझे ‘हंटर’ बनानी थी। इस फिल्म की कास्टिंग भी मुश्किल थी। मेरी फिल्म का नायक औरतों के पीछे लगा रहता है। उनका चुनाव करना आसान नहीं रहा। ऐसी फिल्म में खतरा रहता है। कलाकार पूरी फिल्म को नहीं समझ पाते। मैंने 75 लोकेशन पर शूटिंग की है। एक-एक दिन में चार लोकेशन पर भी शूट किए।’
    ‘हंटर’ की शूटिंग रुक-रुक कर आग बढ़ती रही। आखिरकार फैंटम से जुडऩे के बाद गाड़ी पटरी पर आई और अब यह फिल्म रिलीज के लिए तैयार है। हर्षवर्द्धन कुलकर्णी स्पष्ट शब्दों में कहते हैं,‘मेरी फिल्म अश्लील या सेमी पोर्न नहीं है। यह एक बोल्ड सब्जेक्ट पर है,जिसके बारे में बातें करने से हम हिचकते हैं। स्त्रियों के प्रति एक मर्द के अतिरिक्त आकर्षण की कहानी है।’

   


Sunday, March 15, 2015

बांध लिया एनएच 10 की स्क्रिप्‍ट ने - अनुष्‍का शर्मा


-अजय ब्रह्मात्मज
 ‘एनएच 10’ की घोषणा के समय एक ही सवाल गूंजा कि अनुष्का शर्मा को इतनी जल्दी निर्माता बनने की जरूरत क्यों महसूस हुई ? पहले हिंदी फिल्मों की हीरोइनें करिअर की ढलान पर स्वयं फिल्मों का निर्माण कर टेक लगाती थीं। या फिर रिटायरमेंट के बाद करिअर ऑप्शन के तौर पर प्रोडक्शन में इंवेस्ट करती थीं। फिल्मों सब्जेक्ट इत्यादि में उनकी राय नहीं चलती थी। अनुष्का शर्मा ने ‘एनएच 10’ के निर्माण के साथ नवदीप सिंह को निर्देशन का मौका भी दिया। नवदीप सिंह ‘मनोरमा सिक्स फीट अंडर’ के बाद अगली फिल्म नहीं बना पा रहे थे। किस्सा है कि नवदीप सिंह ने पढऩे और सोचने के लिए अनुष्का के पास स्क्रिप्ट भेजी थी। अनुष्‍का को स्क्रिप्ट इतनी अच्छी लगी कि वह लीड रोल के साथ प्रोडक्शन के लिए भी तैयार हो गईं। अनुष्का से यह मुलाकात उनके घर में हुई। इन दिनों फिल्म स्टार इंटरव्यू के लिए भी किसी पंचतारा होटल के कमरे या स्टूडियो के फ्लोर का चुनाव करते हैं। घर पर बुलाना बंद सा हो गया। प्रसंगवश बता दें कि अनुष्का के घर की सजावट में सादगी है। लगता नहीं कि आप किसी फिल्म स्टार के घर में बैठे हों। फिल्मों की चमक से परे है उनका घर। घर की दीवारों पर सामान्य कलाकृतियां औा एनलार्ज की गई तस्वीरें हैं। सब कुछ स्नेहिल और सहज है। अनुष्का का व्यवहार और बातचीत भी।
    अनुष्का ने क्यों ‘एनएच 10’ के साथ निर्माता बनने की ठानी। जाहिर सी बात है कि फिल्म निर्माण चैरिटी नहीं है। यह फैसला यक-ब-यक नहीं लिया गया होगा। वह कहती हैं,‘मेरे पास फिल्म आई तो इसकी स्क्रिप्ट ने मुझे बांध लिया। कभी-कभी ऐसी स्क्रिप्ट मिलती है,जो चुनौती के साथ ऊर्जा देती है कि इसे तो कर के दिखाना है। मैं स्पष्ट थी कि कमर्शियल संभावना के बावजूद यह कमर्शियल फिल्म नहीं है। मुझे लगा कि अगर मैं निर्माता के तौर पर जुट जाऊं तो फिल्म में लगा निवेश फिल्म के निर्माण में खर्च होगा। मैंने हमेशा अपने फैसले शुद्ध भाव से लिए हैं। मुझे एहसास हुआ कि करना चाहिए। फिर मैंने परवाह नहीं की कि कौन क्या कहेगा? मैं दो और दो जोड़ कर नहीं देखती। मैं क्रिएटिव पर्सन हूं। मैंने अंदर की आवाज सुनी और प्रोड्यूस करने का डिसीजन ले लिया। मुझे नवदीप का इरादा सही लगा। वे अपना काम जानते हैं। को-प्रोड्यूसर फैंटम को मैं जान रही थी। सोच के स्तर पर हम एक ही पेज पर थे। इसे आप मेरा आत्मविश्वास भी कह सकते हैं।’
    ‘एनएच 10’ थ्रिलर फिल्म है। अनुष्का को थिलर फिल्में पसंद हैं। वह अपने अनुभव बताती हैं,‘इस फिल्म को करते हुए मैंने महसूस किया कि थ्रिलर फिल्में शूट करने में भी मजा आता है। यह वर्किंग कपल की कहानी है। गुडग़ांव में वे रहते हैं। फिल्म में मेरा बर्थडे है। उसके लिए हम बाहर जा रहे हैं। रास्ते में ऐसे मामले में फंस जाते हैं कि हमारा प्लान कबगड़ जाता है। उसके बाद यह सेल्फ रियलाइजेशन की कहानी है। हमें पता नहीं होता कि हम क्या-क्या कर सकते हैं। मुश्किल स्थिति में फंसने पर ही पता चलता है। अपने ही अनजान पहलुओं की जानकरी मिलती है। संक्षेप में यह ‘रोड ट्रिप गॉन रौंग’ की कहानी है।’
    अनुष्का ने ज्यादातर कमर्शियल और मेनस्ट्रीम फिल्मों के डायरेक्टर के साथ काम किया है। रियलिस्ट डायरेक्टर नवदीप सिंह के साथ कैसा तर्जुबा रहा? अनुष्का ज्यादा सोचती नहीं। वह बताती हैं,‘हर डायरेक्टर का अप्रोच अलग होता है। एक्टर में लचीलापन होना चाहिए कि वह नए सांचों में ढल सके। मैंने एक साथ ही ‘पीके’,‘बांबे वेलवेट’ और ‘एनएच 10’ में काम किया। मुझे तीनों में अपने किरदार के हिसाब से बदलना पड़ता था। फिल्म की थीम के हिसाव से ‘एनएच 10’ रियल और नैचुरल है। म़झे यह जरूरी भी लगता है। पहनी फिल्म ‘रब ने बना दी जोड़ी’ में पहले शॉट के समय ही शाह रुख खान ने मेरे नैचुरल डिलीवरी की तारीफ की थी। उससे मुझे काफी बल मिला। अगर उस समय उन्होंने मेरे अप्रोच को सही नहीं कहा होता तो शायद मेरा विकास किसी और रूप में हुआ होता।’
    ‘एनएच 10’ में रूरल और अर्बन का फर्क नजर आएगा। अनुष्का के शब्दों में ,‘पापा के साथ ट्रैवल करते समय मुझे इसका एहसास हो रखा था। हम एक ही देश में कई स्तरों पर जी रहे हैं। इस फिल्म में समाज का यह फर्क भी है।मैं इस मायने में भागयशाली हूं कि मैंने अपना देश देख रखा है। यहां के लोगों से हिली-मिली हूं। मेरे लिए फिल्मों का हर किरदार कोई न कोई परिचित व्यक्ति होता है। ऐसा अनुभव नहीं रहने पर सिनेमा के अनुभवों से काम चलाना पड़ता है। लेखक-निर्देशक की व्याख्या पर निर्भर होना होगा।’ इस साल अनुष्का की दो और फिल्में आएंगी। अनुराग कश्यप की ‘बांबे वेलवेट’ और जोया अख्तर की ‘दिल धडक़ने दो’ जैसी दो बड़ी फिल्मों के साथ उन्होंने ‘एनएच 10’ भी पूरी कर ली है। इसे साहस कहें या जोखिम? इतना तय है कि अनुष्का अपनी समकालीनों से अलग,सजग और आगे हैं। वह अपनी सोच में स्पष्ट और बातचीत में सरल हैं।
   


एक सितारा बनते देखा - सत्यजित भटकल


प्रस्तुति-अजय ब्रह्मात्मज
सत्यजित भटकल आमिर खान के जिगरी दोस्त हैं। अच्छे-बुरे दिनों में वे हमेशा आमिर के करीब रहे। नौवीं कक्षा में दोनों के बीच दोस्ती हुई। सत्यजित भटकल के लिए आमिर खान हिंदी फिल्मों के सुपर स्टार मा। नहीं हैं। वे उनके विकास और विस्तार को नजदीक से देखते रहे हैं। वे आमिर के हमकदम भी हैं। ‘लगान’ और ‘सत्यमेव जयते’ में दोनों साथ रहे। 14 मार्च को आमिर खान का जन्मदिन था। इस अवसर पर सत्यजित भटकल ने आमिर खान के बारे में कुछ बताया :-
    हर मनुष्य का एक स्थायी भाव होता है। उम्र बढऩे के साथ व्यक्त्त्वि में आए परिवत्र्तनों के बावजूद वह स्थायी भाव बना रहता है। आमिर का स्थायी भाव जिज्ञासा है। वह आजन्म छात्र रहे हैं और आगे भी रहेंगे। वे जिंदगी के सफर को सफर के तौर पर ही लेते हैं। अपनी जिज्ञासाओं की वजह से उन्होंने हमेशा खुद को नए सिरे से खोजा और सफल रहे हैं। जिंदगी की मामली चीजों के बारे में भी वे इतनी संजीदगी से बता सकते हैं कि आप चकित रह जाएं। ‘लगान’ की शूटिंग के समय हमलोगों ने सहजानंद टावर्स को होटल में बदल लिया था। बैरे के रूप में स्थानीय लडक़े काम कर रहे थे। उन्हें कोई ट्रेनिंग नहीं मिली हुई थी। वहां किसी ने पॉट टी मंगवाई। वे एक पॉट में बनी-बनाई चाय ले आए। रूम में बैठे दस लोगों में से कुछ हंसने लगे। आमिर ने उस बैरे को पास में बिठाया। उसे पॉट टी का मतलब समझाया और पेश करने का तरीका बताया। उस घबराए और सहमे बैरे की खुशी देखने लायक थी। उन्होंने खुद चाय बना कर अच्छी तरह समझाया। आमिर छात्र तो हैं ही,वे अच्छे धैर्यवान शिक्षक भी हैं। दोनों भूमिकाओं में उन्हें पूरा आनंद आता है। हम दोस्तों के लिए मुश्किल होती है,क्यों कि वे एक साथ छात्र और शिक्षक बने रहते हैं।
बढ़ती गई सीखने की चाहत
    हमारी मुलाकात 14-15 साल की उम्र में हुई थी। हम दोनों नौवीं कक्षा में थे। आरंभ में वे खामोश और अकेले रहते थे। दूसरों से घुलते-मिलते नहीं थे। दूसरे स्कूल से आए थे तो उनका कोई दोस्त नहीं बना था। हम दोनों बांबे स्काटिश में थे। पढ़ाई में वे अव्वल नहीं थे। आत्मविश्वास की कमी थी या शायद गंभीरता थी कि वे बेवजह मुंह नहीं खोलते थे।  लंच में हम दोनों की बातें शुरू हुई और हम ने पाया कि हम दोनों में कई बातें समान हैं। हम दोनों उस उम्र में ईश्वर के अस्तित्व पर बातें करते थे। हम शतरंज भी खेलते थे। शास्त्रीय संगीत और सीरियस फिल्मों में भी हमारी समान रुचि थी। मौज-मस्ती नहीं करते थे वे। जिज्ञासा का यह भाव उनमें पहले इतना तीव्र नहीं था। आम तौर मशहूर होने के साथ लोग सीखना बंद कर देते हैं। आमिर के साथ उल्टा हुआ है। स्थापित और मशहूर होने के साथ सीखने की उनकी चाहत बढ़ गई है। इन दिनों वे सिखाने भी लगे हैं। ‘सत्यमेव जयते’ के दौरान उन्होंने ढेर साी नई चीलें देखी,सीखी और जानी। मैं देयता हूं कि वे लोगो को उनके बारे में विस्तार से बताते रहते हैं। श्ूट के दौरान मैँ डरा रहता था कि कोई कुछ पूछ न ले। आमिर कम से कम 20 मिनट उसे समझाते थे। समझाने के समय वे ज्ञान नहीं बघारते। दरअसल,अपने सीखने के आनंद को सिखाते समय दोहराते हैं।
तैयार था प्‍लान बी 
    आमिर पढ़ाई में कमजोर थे। नए स्कूल और सिलेबस की वजह से उन्हें दिक्कत हो रही थी। दसवीं की परीक्षा के समय उन्होंने सोच लिया था कि वे ड्रॉप लेंगे और अगले साल अपीयर होंगे। मैंने उन्हें समझाया कि अगर आप इस साल तैयार नहीं हैं तो क्या जरूरी है कि अगले साल तैयार हो जाएंगे। आप परीक्षा से इसलिए भाग रहे हैं कि आप की पढ़ाई में रुचि नहीं पैदा हो पा रही है। मैंने उनसे प्रॉमिस किया कि मैं केमिस्ट्रिी में उनकी मदद करूंगा। बाद में उन्हें लगा कि पढ़ाई में उनकी रुचि नहीं है। वे एमनएम कॉलेज जाने लगे। वहां वे महेन्द्र जोशी के संपर्क में आए। उन दिनों मेरा संपर्क कम हो गया था। उन्हीं दिनों वे अपने चाचा के एडी बन गए थे। जब मैंने यह सब सुना तो मुझे अच्छा नहीं लगा। मैंने पूछा भी फिल्म लाईन में कुछ नहीं हुआ तो तू क्या करेगा? आमिर का जवाब था कि कुछ नहीं हुआ तो मैं एयरलाइन में पर्सर की नौकरी कर लूंगा। यह उनका प्लान बी था।
मैं खुशी से रो पड़ा 
    मुझे यह पता चला कि वे एक्टर बनना चहते हैं तो हंसी भी आई। उन्होंने रोशन तनेजा से ट्रेनिंग भी ली। मैंने उनकी इस कोशिश को सीरियसली नहीं लिया। उन दिनों वे स्टंट भी सीख रहे थे। जुहू चौपाटी पर अभ्यास के दौरान उनकी पीठ में चोट भी आई। बाद में नासिा साहब ने उन्हें समझाया कि तुम्हें एक्टर बनना है कि स्टंट मैन। लीड एक्टर का रिस्क लेना ठीक नहीं है। फिल्म बनी और पोस्टर-होर्डिंग लगाने का समय आ गया। शहर में तीन लोकेशन चुने गए। हमलोग उन्हें देखने गए। एक सेंचुरी बाजार में लगा था- मीट द ब्वॉय नेक्स्ट डोर। तब एहसास हुआ कि वे एक्टर बन गए। रिलीज के दिन वे बहुत नर्वस थे। मेरे घर आ गए थे। हमलोग रात भर जगे रहे। नॉवेल्टी में कास्ट एंड क्रू का शो हुआ था। हमलोग गए थे। फिल्म खत्म होने के बाद भीड़ निकली तो उसने आमिर को चहचान लिया। भीड़ ने आमिर को घेर लिया। वे हम सभी से अलग हो गए और - द स्टार वाज बॉर्न। मैं खुशी से रोने लगा था। तीन फितों के बाद आमिर का फोन आया था। उन्होंने बताया था कि दर्शक पागल हो रहे हैं। पता चला कि आमिर खान का प्रयास सफल रहा।
 अब है सर्वश्रेष्‍ठ दौर 
 आमिर ने सफल होने के बाद बहुत बुरी फिल्में भी चुनीं। मुझे अच्छा नहीं लगता था। मैं कह देता था। उन दिनों तैं उनकी कोई फिल्म नहीं देखी। बहुत सालों के बाद उनकी ‘दिल’ देखी। वह देख कर मैं इतना व्यथित हुआ कि मैंने उनसे मिलना जरूरी समझा। मैंने उनकी क्लास ली और पूछा कि कौन सी मजबूरी है कि वे ऐसी फिल्में कर रहे हैं? क्यों  इतना घिनौना काम कर रहे हैं? लानत है। मुझे यकीन नहीं हो रहा है कि आप ऐसी फिल्में कर रहे हैं। उन्होंने मेरी बातें ध्यान से सुनीं। कोई तर्क नहीं दिया और न मुझे समझाया। उन्होंने यह कहा कि मुझे ऐसी ही फिल्में मिल रही हैं। हिंदी में ऐसी ही फिल्में बन रही हैं। मैं इन फिल्मों के जरिए वह पोजीशन हासिल करना चाहता हूं कि अपने मन का काम कर सकूं। उनकी बातों पर मुझे तब यकीन नहीं हुआ था। मेरा जवाब था कि तू सुविधाजनक बातें कर रहा है। उन्होंने मुझ से का कि अब मेरी फिल्में तब तक मत देखना,जब तक मैं न कहूं। मुझे लगता है कि ‘रंगीला’ और ‘सरफरोश’ के बाद उनकी फिल्मों के चुनाव में फर्क आया। उसके बाद ही उनकी फिल्मों का चयन ठीक हुआ।
    हमें यह देखना होगा कि जब आमिर खान फिल्मों में आए तब किस तरह की फिल्में बन रही थीं। वह मेरा दोस्त है,इसलिए मैं उसे फटकार सकता था। सच तो यही है कि कोई भी बेहतर काम नहीं कर रहा था। बुरी फिल्में बन रही थीं। आमिर खान को उस कीचड़ से निकलने में समय लगा। अब समझा जा सकता है। उनका विकास हो रहा था। बतौर एक्टर अभी उनका श्रेष्ठ दौर चल रहा है। उन्हें अभी पर्दे पर देखते हुए मजा आता है। अभी उन्हें डायरेक्ट करने वाले सभी निर्देशक बहुत खुश रहते होंगे। ‘रंग दे बसंती’,‘3 इडियट’ और ‘पीके’ देख लें। आमिर जो एफर्ट डालते हैं,वह काबिल-ए-तारीफ है। मुझे लगता है कि वह हर नया टेक पहले से बेहतर करते होंगे। उनकी श्रेष्ठ फिल्में अभी आ रही हैं। ‘सत्यमेव जयते’ एक बड़ा पड़ाव है। उन्होंने इसे चार साल दिए। उन दिनों उन्होंने कितनी फिल्मों में विलंब किया। मशहूर और प्रभावशाली व्यक्तियों से अनेक बैठकें रद्द कीं। ऐड छोड़ीं। उन्होंने दनादन फिल्में नहीं कीं। ‘सत्यमेव जयते’ करने के बाद वे समाज के प्रति अधिक संवेदनशील हो गए हैं। देश के दर्द से परिचित हुए हैं। मैंने पहले ही कहा कि वे बहुत अच्छे छात्र हैं। वे जो सीखते हैं,उसे आत्मसात कर लेते हैं।

   



Thursday, March 12, 2015

फिल्‍म समीक्षा : एनएच 10

'अजय ब्रह्मात्‍मज 
स्टार: 4
नवदीप सिंह और अनुष्का शर्मा की 'एनएच 10' पर सेंसर की कैंची चली है। कई गालियां, अपशब्द कट गए हैं और कुछ प्रभावपूर्ण दृश्यों को छोटा कर दिया गया है। इस कटाव से अवश्य ही 'एनएच 10' के प्रभाव में कमी आई होगी। 'एनएच 10' हिंदी फिल्मों की मनोरंजन परंपरा की फिल्म नहीं है। यह सीधी चोट करती है। दर्शक सिहर और सहम जाते हैं। फिल्म में हिंसा है, लेकिन वह फिल्म की थीम के मुताबिक अनगढ़, जरूरी और हिंसक है। चूंकि इस घात-प्रतिघात में खल चरित्रों के साथ नायिका भी शामिल हो जाती है तो अनेक दर्शकों को वह अनावश्यक और अजीब लग सकता है। नायिका के नियंत्रण और आक्रमण को आम दर्शक स्वीकार नहीं कर पाता है। दरअसल, प्रतिशोध और प्रतिघात के दृश्यों के केंद्र में नायक(पुरुष) हो तो पुरुष दर्शक अनजाने ही खुश और संतुष्ट होते हैं।
'एनएच 10' में इंटरवल से ठीक पहले अपने पति की रक्षा-सुरक्षा के लिए बेतहाशा भागती मीरा के बाल सरपट भागते घोड़़ों के अयाल की हल में उछलते है। वह अपने तन-बदन से बेसुध और मदद की उम्मीद में दौड़ी जा रही है। नवदीप सिंह ने क्लाइमेक्स तक पहुंचते दृश्यों की संरचना से मीरा के व्यक्तित्व में आए परिवर्तन को प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत किया है। मीरा हिंदी फिल्मों की पिछलग्गू प्रेमिका और बीबी नहीं है। अपने पेशे में सफल मीरा मुश्किल स्थितियों में फंसती है तो कैसे खुद को संभालती हुई अप्रत्याशित फैसले लेती है। मीरा के प्रतिघात और प्रतिहिंसा पर बहसें हो सकती है, लेकिन विकट स्थितियों में फंसी मीरा की लाचारगी भी जाहिर है। दो-तीन दृश्यों में चिल्लाहट में उसकी असह्य विवशता दिखाई देती है।
इस बहस में दम नहीं है कि मीरा और उसके पति ने खुद को क्यों झोंक दिया? वे आसान रास्ता चुन सकते थे। मुंह फेर कर अपने सफर में निकल सकते थे। चूंकि वे शहर से हैं, इसलिए कस्बे के नागरिकों, पुलिस अधिकारियों और अन्यों की तरह घट रही घटनाओं से उदासीन नहीं थे। उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि छोटे हस्तक्षेप से वे इस कदर मौत के मुहाने पर आ जाएंगे। 'एनएच 10' की खूबी है कि देश में किसी भी स्थान पर ऐसी दुर्घटना किसी के भी साथ हो सकती है। 'एनएच 10' में मीरा और अर्जुन के साथ ऐसा होता है।
नवदीप सिंह और उनकी टीम ने फिल्म को धूसर रंग दिया है। इलाके की कठोर और नंगी सच्चाई को उभारने और जताने के लिए इस फिल्म के शिल्प में चमक नहीं रखी गई है। दिल्ली की रंगीनी और चमक गुड़गांव पार करने के साथ खत्म हो जाती है। पूरी फिल्म में हम असहज होने के बावजूद बंधे रहते हैं। हमें मीरा के पति के व्यवहार बेवकूफाना और गैरजरूरी लगता है, क्योंकि हम कहानियों और फिल्मों में भी मुश्किलों के लिए तैयार नहीं हैं।
'एनएच 10' इंडिया और भारत की सच्चाई को कभी आमने-सामने तो कभी समानांतर खड़ी कर देती है। हो सकता है कि शहरी दर्शक ऐसी सच्चाईयों से अकुलाहट महसूस करें। आरंभ के कुछ दृश्यों के बाद ही हम मीरा के साथ हो जाते हैं। उसकी बेबसी, चीत्कार और लड़ाई में खुद को शामिल पाते हैं। नवदीप सिंह ने मीरा को 21वीं सदी की संयत, समझदार औऱ स्नेहिल औरत के तौर पर पेश किया है, जो बदली स्थितियों में धीरे-धीरे कठोर और नृशंस हो जाती है। आत्मरक्षा से प्रतिघात तक का यह परिवर्तन फिल्म के ढांचे में तार्किक और स्वाभाविक लगता है। वह निकल रही थी, निकल भी जाती, लेकिन खल किरदारों के हिंसक व्यवहार से वह भी प्रतिहिंसा पर उतारू होती है। फिल्म में वह निहायत लाचार और अकेली हो जाती है। आम जिन्दगी में अकेली और शायद मीरा जैसी हिम्मत और समझदारी न दिखा सके।
दर्शन कुमार ने अपने चरित्र को पूरी क्रूरता के साथ निभाया है। उन्हें संवाद कम मिले है, फिर भी अपनी मौजूदगी और अदायगी से वे प्रभावित करते हैं। मीरा के पति के रूप में भूपलम की भूमिका सीमित है। मामा और मां के किरदार में रवि झांकल और दीप्ति नवल उपयुक्त है। बिहारी दंपत्ति की छोटी सी भूमिका में आए दोनों अपरिचित कलाकार नैचुरल और रियल हैं। 'एनएच 10' मुख्य रूप से अनुष्का शर्मा की फिल्म है। उन्होंने लेखक-निर्देशक से मिले मौके का भरपूर इस्तेमाल किया है। उन्होंने मीरा की मजबूरी और बहादुरी तक के आयामों को संजीदगी से निभाया है। बतौर निर्माता ऐसी फिल्म के लिए तैयार होने की उनकी पहल की भी तारीफ करनी चाहिए। उनके समर्थन में खड़ी कृषिका लु्ल्ला का योगदान भी सराहनीय है।
अवधि: 115 मिनट