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Thursday, December 18, 2014

दरअसल : एनएफडीसी का फिल्म बाजार


-अजय ब्रह्मात्मज
    सन् 1975 में एनएफडीसी की स्थापना हुई थी। उद्देश्य था कि सार्थक सिनेमा को बढ़ावा दिया जाए। हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं में बन रही कमर्शियल फिल्मों के बीच से राह निकाली जाए। युवा निर्देशकों की सोच को समर्थन मिले और उनके लिए आवश्यक धन की व्यवस्था की जाए। एनएफडीसी के समर्थन से सत्यजित राय से लेकर रितेश बत्रा तक ने उम्दा फिल्में निर्देशित कीं। उन्होंने भारतीय सिनेमा में वास्तविकता के रंग भरे। सिनेमा को कलात्मक गहराई देने के साथ भारतीय समाज के विविध रूपों को उन्होंने अपनी फिल्मों का विषय बनाया। देश में पैरलल सिनेमा की लहर चली। इस अभियान से अनेक प्रतिभाएं सामने आईं। उन्होंने अपने क्षेत्र विशेष की कहानियों से सिनेमा में भारी योगदान किया। कमी एक ही रही कि ये फिल्में सही वितरण और प्रदर्शन के अभाव में दर्शकों तक नहीं पहुंच सकीं। ये फिल्में मुख्य रूप से फेस्टिवल और दूरदर्शन पर ही देखी गईं। समय के साथ तालमेल नहीं बिठा पाने के कारण पैरेलल सिनेमा काल कवलित हो गया।
    धीरे-धीरे एनएफडीसी के बारे में यह धारणा विकसित हो गई थी कि उसके समर्थन से बनी फिल्में कभी रिलीज नहीं होतीं। निर्देशक और निर्माता एनएफडीसी से सहयोग के तौर पर मिले कर्ज को लौटाने में कोई रुचि नहीं रखते। नतीजा यह हुआ कि युवा फिलमकार भी अपनी फिल्मों के लिए नए निर्माताओं की खोज करने लगे। आंकड़े पलट कर देखें तो बीच में एक लंबा दौर शिथिलता का रहा। छिटपुट रूप से फिल्में बनती रहीं,लेकिन एनएफडीसी  भारतीय फिल्मों के विकास में परिवर्तनकारी भूमिका से दूर चली गई। यहां से आई फिल्में थकी और बासी होन लगीं। इन फिल्मों में पहले जैसी कलात्मक उर्जा नहीं दिखाई पड़ी। एक तो पैरेलल सिनेमा के अवसान का असर रहा और दूसरे एनएफडीसी से उभरे फिल्मकार बाद में सक्रिय नहीं रहे। उनमें से कुछ ने सोच और दिशा बदल दी। वे इस भ्रम में रहे कि वे आर्ट और कमर्शियल सिनेमा के बीच का अंतर मिटा रहे हैं,जबकि इस प्रक्रिया में उन्होंने सबसे पहले विचार को तिलांजलि दी। कह सकते हैं कि उन्होंने बाजार के आगे घुटने टेक दिए। अपने सरवाइवल के लिए उन्होंने कमर्शियल सिनेमा के लटके-झटकों को अपना लिया। फिर भी यह कहा जा सकता है कि एनएफडीसी ने भारतीय सिनेमा के विकास में एक समय जरूरी भूमिका निभाई।
    अप्रासंगिक हो रहे एनएफडीसी को 2007 में नई त्वरा मिली। निदेशक नीना लाठ गुप्ता ने फिल्म बाजार आरंभ किया। इसके अंतर्गम नई फिलमों और फिल्मकारों को ऐसा मंच प्रदान किया गया,जहां वे अपनी फिल्मों को पेश कर सकें। इसके तहत सहयोगी निर्माताओं की खोज से लेकर स्क्रिप्ट के लिए सुझाव और मार्गदर्शन के लिए उपयुक्त व्यक्यिों और संस्थाओं को जोड़ा गया। लाभ हुआ और नए रास्ते निकले। कुछ फिल्में इंटरनेशनल फेस्टिवल और मार्केट में गईं। फिल्म बाजार से निकली लंचबॉक्स ने तो मिसाल कायम कर दिया। यह फिल्म विदेशों में किसी भी भारतीय फिल्म से ज्यादा देखी और सराही गई। एनएफडीसी के सौजन्य से हर साल गोवा में आयोजित इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के समय फिल्म बाजार का आयोजन होता है। इस साल बाजार में अनेक देशों के प्रतिनिध आए। उन्होंने भारतीय फिल्मों में रुचि दिखाई। इस दौरान लैब,वर्कशाप और मेल-मुलाकात के जरिए नए और युवा निर्देशकों को अपनी फिल्मों के बाजार और बाजार की अपेक्षा की जानकारी मिली। एनएफडीसी का फिल्म बाजार अभी उसी रूप में सक्रिय और महत्वपूर्ण हो गया है,जैसे पैरेलल सिनेमा के उत्कर्ष के समय था।
    फिल्म बाजार के प्रयासों की सराहना करनी चाहिए। बस,एक कमी नजर आई कि फिल्म बाजार में स्क्रिप्ट और फिल्मों के प्रस्ताव केवल अंग्रेजी भाषा में लिए जाते हैं। इस एक शर्त से फिल्म बाजार देश के सुदूर इलाकों की उन प्रतिभाओं के लिए अपने द्वार बंद कर देता है,जो अंग्रेजी का इस्तेमाल नहीं करते। अनेक लेखक और युवा निर्देशक भारतीय भाषाओं में दक्ष हैं,लेकिन अंग्रेजी नहीं आने की वजह से वे फिल्म बाजार की सुविधाओं से वंचित रहते हैं। संबंधित अधिकारियों को इस दिशा में विचार करना चाहिए। उन्हें भारतीय भाषाओं में स्क्रिप्ट और फिल्में स्वीकार करनी चाहिए। अभी फिल्म किसी भी भाषा की हो उसका प्रस्ताव अंग्रेजी में भेजना अनिवार्य है?
   

Wednesday, December 10, 2014

दोनों हाथों में लड्डू : सुशांत सिंह राजपूत


-अजय ब्रह्मात्मज
सुशांत सिंह राजपूत की ‘पीके’ इस महीने रिलीज होगी। ‘पीके’ में उनकी छोटी भूमिका है। दिबाकर बनर्जी की ‘ब्योमकेश बख्शी’ में हम उन्हें शीर्षक भूमिका में देखेंगे। झंकार के लिए हुई इस बातचीत में सुशांत सिंह राजपूत ने अपने अनुभवों, धारणाओं और परिवर्तनों की बातें की हैं।
    फिल्मों में अक्सर किरदारों के चित्रण में कार्य-कारण संबंध दिखाया जाता है। लेखक और निर्देशक यह बताने की कोशिश करते हैं कि ऐसा हुआ, इसलिए वैसा हुआ। मुझे लगता है जिंदगी उससे अलग होती है। यहां सीधी वजह खोज पाना मुश्किल है। अभी मैं जैसी जिंदगी जी रहा हूं और जिन द्वंद्वों से गुजर रहा हूं, उनका मेरे बचपन की परवरिश से सीधा संबंध नहीं है। रियल इमोशन अलग होते हैं। पर्दे पर हम उन्हें बहुत ही नाटकीय बना देते हैं। पिछली दो फिल्मों के निर्देशकों की संगत से मेरी सोच में गुणात्मक बदलाव आ गया है। पहले राजकुमार हिरानी और फिर दिबाकर बनर्जी के निर्देशन में समझ में आया कि पिछले आठ सालों से जो मैं कर रहा था, वह एक्टिंग नहीं कुछ और थी। मैं आप को प्वॉइंट देकर नहीं बता सकता कि मैंने क्या सीखा, लेकिन बतौर अभिनेता मेरा विकास हुआ। अगली फिल्मों में अपने किरदारों को निभाते समय रिसर्च के अलावा और बहुत सारी चीजें ध्यान में रखूंगा। किसी भी दृश्य में एक इमोशन के चार-पांच डायमेंशन आते हैं। हम उनमें से एक चुनते हैं। कई बार तो कर देने के बाद उसकी वजह खोजते हैं और खुद को सही ठहराते हैं।
    दिबाकर के साथ काम करते समय हमलोग रियल इमोशन पर खेल रहे थे। एक दृश्य बताता हूं, मैं अपनी तहकीकात कर रहा हूं। एक व्यक्ति से कुछ सवाल पूछ रहा हूं। वह व्यक्ति जवाब देते-देते मेरे सामने मर जाता है। मेरे अपने रिसर्च से उस दृश्य में मुझे गुस्सा, निराशा और कोफ्त जाहिर करनी थी। दो टेक में वह सीन हो गया। अभी मेरे पास बीस मिनट बाकी थे। दिबाकर ने आकर बताया कि इस दृश्य में एक अलग इमोशन ले आओ। तुमने अभी तक किसी को अपने सामने मरते हुए नहीं देखा है। पहली बार कोई बात करते-करते मर गया। तुम्हारी रिएक्शन में उसकी मौत के प्रति  विस्मय और आकर्षण भी होना चाहिए। इस इमोशन के साथ सीन को शूट करने पर सीन का इम्पैक्ट ही बदल जाएगा। ‘ब्योमकेश बख्शी’ से ऐसे अनेक उदाहरण दे सकता हूं।
    ‘ब्योमकेश बख्शी’ शूट करते समय मैंने एक बार भी मॉनिटर नहीं देखा। पोस्ट प्रोडक्शन और डबिंग के दौरान मैंने अपना परफॉरमेंस देखा। मैंने पाया कि मैं बिल्कुल अलग एक्टर के तौर पर सभी के सामने आया हूं। लोग तारीफ करेंगे तो थैंक्यू कहूंगा। नापसंद करेंगे तो माफी मांग लूंगा। सच यही है कि कुछ अलग काम हो गया है। दिबाकर बनर्जी की फिल्मों में प्रचलित हिंदी फिल्मों के प्रचलित ग्रामर का अनुकरण नहीं होता। ग्रामर का पालन न करने से एक ही डर लग रहा है कि कहीं कुछ ज्यादा रियल तो नहीं हो गया। बाकी फिल्म की गति इतनी तेज है। दो घंटे दस मिनट में पूरा ड्रामा खुलता है। आप यकीन करें फिल्म देखते समय पलकें भी नहीं झपकेंगी।
    हिंदी फिल्मों में पांचवें दशक के कोलकाता को दिखाना एक बहुत बड़ी चुनौती थी। तीन महीनों की तैयारी में किरदार मेरी आदत बन चुका था। यह तो तय था कि कुछ गलत नहीं होगा। मुझे और दिबाकर को यह देखना था कि हम कितने सही हैं। दिबाकर की सबसे अच्छी बात है कि वे किसी भी टेक को एनजी यानी नॉट गुड नहीं कहते। हर शॉट को अच्छा कहने के बाद वे एक और शॉट जरूर लेते हैं। इस फिल्म के दौरान हम दोनों ‘ब्योमकेश बख्शी’ के किरदार को एक्सप्लोर करते रहे। इस फिल्म के पहले मैंने ऐसी ईमानदारी के साथ एक्टिंग नहीं की। शूटिंग के दूसरे दिन ही चालीस सेकेंड के एक लंबे सीक्वेंस में दिबाकर ने मुझे 1936 का एक वीडियो दिखाया और समझाया कि रियल लाइफ और रील लाइफ में क्या फर्क हो जाता है? मुझे उस सीक्वेंस में एक केस सुलझाने के लिए पैदल, रिक्शा, बस, ट्राम से जाना था। अपने परफॉरमेंस में मैं दिखा रहा था कि आज मैं बहुत परेशान हूं। मुझे जल्दी से जल्दी केस सुलझाना है। दिबाकर के उस वीडियो को देखने के बाद मेरी समझ में आया कि रियल लाइफ में ऐसी परेशानी चेहरे और बॉडी लैंग्वेज में नहीं होती। हम ऐक्टर छोटे दृश्य में भी परफॉर्म करने से बाज नहीं आते। मेरे लिए यह बहुत बड़ी सीख थी। पर्दे पर हम ज्यादातर फेक होते हैं। या एक्टिंग के अपने टूल से दर्शकों को अपनी फीलिंग्स का एहसास दिलाते हैं। दिबाकर कहते थे, फिलहाल अपने टूल्स रख दो। मैंने इस  दृश्य को तीस मिनट दिया है। 29 मिनट तक अगर मेरे हिसाब से नहीं हुआ तो 30 वें मिनट में अपने टूल्स का इस्तेमाल कर लेना। शुरू में तो मैं डर गया कि बगैर टूल्स के मैं एक्टिंग कैसे करूंगा, लेकिन धीरे-धीरे मजा आने लगा?
    ‘पीके’ बहुप्रतीक्षित फिल्म है। आमिर खान और राजकुमार हिरानी जैसे दिग्गज के संग काम करना बड़े गर्व की बात है। उसमें मेरा कैमियो रोल है, मगर वह बड़ा प्रभावी है। उसमें मेरा चयन फिल्म के कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा के जरिए हुआ। हिरानी सर को दरअसल उस भूमिका के लिए फ्रेश चेहरा चाहिए था। उस वक्त तक मेरी ‘काय पो छे’ नहीं आई थी। मेरा ऑडिशन हुआ। वह सब को बेहद पसंद पड़ा। बाद में ‘पीके’ की शूट में देर होती गई, तब तलक ‘काय पो छे’ और ‘शुद्ध देसी रोमांस’ आ गई। मैं थोड़ा-बहुत पॉपुलर भी हो गया। हिरानी सर ने एक दिन मुझे बुला मजाक में कहा, यार हमारी तो दोनों हाथों में लड्डू आ गए। एक तो तुम्हारा चेहरा फ्रेश है। ज्यादा लोग तुम्हें जानते-पहचानते नहीं थे। अब मगर तुम स्टार भी हो गए।


Tuesday, December 9, 2014

अब तीसरा शेड भी है सामने-राजपाल यादव


-अजय ब्रह्मात्मज

 ‘भोपाल : ए प्रेयर फॉर रेन’ की प्लानिंग 2010 में ही हो गई थी। मुंबई में 10-12 कलाकारों के पास इसकी स्क्रिप्ट गई। सभी मेरा किरदार मांग रहे थे। दिलीप की भूमिका चाहते थे। इसकी टीम में अनेक देशों के तकनीशियन शामिल थे। हैदराबाद में सेट लगा। यूनियन कार्बाइड का सेट लगाया गया था। मुझे लग तो गया था कि कोई बड़ी फिल्म बन रही है,लेकिन आश्वस्त नहीं था। इस फिल्म के दरम्यान मुझे हालीवुड की कुछ और फिल्में मिलीं। उनमें छोटे-मोटे किरदार थे। आखिरकार मैं इस फिल्म का इंतजार करता रहा।
    मैंने अभी तक 150 से अधिक फिल्में कर ली हैं। 20-21 अभी अंडर प्रोडक्शन हैं। लगातार काम कर रहा हूं। लखनऊ के बीएनए और दिल्ली के एनएसडी से प्रशिक्षित होकर मुंबई आया तो कहां अंदाजा था कि मेरा ऐसा सफर होगा। 27 साल पहले स्टेज पर तीन पंक्तियां बोलने का मौका मिला था। शाहजहांपुर में स्टेज पर पहली बार चढ़ा और दर्शकों की तालियों और तारीफ ने ऐसा प्रेरित किया कि कदम इस तरफ चल पड़े। मैंने करीब से संघर्ष का अनुभव किया है। ‘भोपाल : ए प्रेयर फॉर रेन’ में दीपक का संघर्ष है। भोपाल के हादसे के बारे में सभी कुछ न कुछ जानते हैं। यह फिल्म दिलीप के मार्फत कहानी कहती है। इस फिल्म पर मुझे गर्व है।
    दिलीप इस हादसे में फंसा आम आदमी है। उसकी जिजीविषा के साथ भोपाल हादसे का संदर्भ है। आप इसे भारतीय पृष्ठभूमि की ‘टायटेनिक’ कह सकते हैं। हमारी कहानी से फिल्म में जीवन बुना गया है। फिल्म में वास्तविक जानकारी के साथ काल्पनिक कहानी है। इस फिल्म के निर्माण में पांच साल लग गए। यह फिल्म हादसे की जानकारी देती है। तनिष्ठा चटर्जी मेरी पत्नी की भूमिका में हैं। वह जबरदस्त अभिनेत्री हैं। इस फिल्म का विशेष अनुभव रहा। मैंने पाया कि विदेशी क्रू अपनी एनर्जी का सदुपयोग करती है। हम अपनी एनर्जी यों ही बर्बाद कर देते हैं। वे अनुशासित होते हैं। प्री-प्रोडक्शन में बहुत समय लगाते हैं। उन्हें फिल्म में चिप्पी लगाने की जरूरत नहीं पड़ती। वे रिलीज की हड़बड़ी में नहीं रहते। फिल्म के डायरेक्टर रवि कुमार जबलपुर के हैं। उन्होंने पूरी रिसर्च के बाद यह फिल्म बनाई है। उन्होंने यह फिल्म श्रद्धांजलि के तौर पर बनाई है।
    मुझे मार्टिन शीन के साथ काम करने का मौका मिला। उन्होंने प्यार और आशीर्वाद दिया। हो सकता है कि उनके साथ एक और फिल्म करूं। काल पेन भी हैं इस फिल्म में।
    मैं मानता हूं कि रामगोपाल वर्मा ने मुझे सही समय पर बड़े मौके दिए। ‘जंगल’ और ‘मैं माधुरी दीक्षित बनना चाहती हू’ मेरे करिअर की खास फिल्में हैं। मैंने कभी भूमिकाओं की लंबाई पर गौर नहीं किया। फिर भी 20-25 फिल्में तो गर्व से दिखा सकता हूं। ‘मैं माधुरी दीक्षित बनना चाहती हूं’ और ‘मैं,मेरी पत्नी और वो’ के बाद ‘भोपाल : ए प्रेयर फॉर रेन’ से मेरी भी एक ट्रायलोजी बन जाती है। इन तीनों फिल्मों से मेरी रेंज की जानकारी मिल सकती है। आम आदमी की जिंदगी के तीन शेड देख सकते हैं। राजा,मिथिलेश शुक्ला और दिलीप हमारे समाज के तीन कॉमन किरदार हैं।
    अब मुझे रोटी के लिए सिनेमा करने की जरूरत नहीं है। अपनी लाइफ और करिअर में सिस्टम लाना चाहता हूं। मुझे इतना मिल गया है कि कहीं भी डुगडुगी बजा कर 200 व्यक्तियों के खाने का इंतजाम कर सकता हूं। 15 साल में इतना तो हासिल कर लिया है। बहुत कुछ सीखा है। अपने निर्देशन का मुझे कोई अफसोस नहीं है। ‘अता पता लापता’ के म्यूजिक रिलीज में अमिताभ बच्चन आए थे। उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया था। पांच मिनट का उनका सार्वजनिक साथ फिल्म की लागत से बड़ा रहा। निर्देशन की नाव में पहली बार चढ़ा था। थोड़ा डगमगा गया। धार में जाने के पहले सभी की नाव डगमगाती है।
    पहली बार में सब कुद क्यों अच्छा हो जाए। अगले पांच सालों में निर्माण और निर्देशन में कुछ नई कोशिशें करूंगा। अभी एक्टिंग पर ज्यादा जोर रहेगा। मेरी फिल्म ‘बांके की क्रेजी बारात’ जल्दी ही आएगी। कामेडी फिल्म है। 2015 से 2017 तक की प्लानिंग हो चुकी है। बीच में एक नाटक भी करूंगा परेश रावल के साथ। मैं अपनी फिल्मों और जिंदगी से संतुष्ट हूं।


Monday, December 8, 2014

बदला जमाने के साथ : अदनान सामी


-अजय ब्रह्मात्मज
लंबे समय के बाद अदनान सामी की आवाज ‘किल दिल’ के गाने में सुनाई पड़ी। ‘साथिया’ के बाद शाद अली, गुलजार और अदनान की तिकड़ी का जादू जगा। अदनान इन दिनों गायकी के फ्रंट पर कम एक्टिव हैं। जिंदगी की मुश्किलों और रिश्तों में आए बदलाव से वे बेअसर नहीं रहे। हालांकि इस दरम्यान उन्होंने कोर्ट से निकल कर स्टूडियो में रिकॉर्डिंग भी की। एक तरफ मुकदमे की सुनवाई चलती रही और दूसरी तरफ उनकी गायकी, जो अब सुनाई पड़ी। अदनान का नाम जेहन में आते ही जो छवि कौंधती है, उससे वे काफी अलग हो गए हैं। उनका वजन कम हो गया है। अब वे अधिक स्फूर्ति महसूस करते हैं। उन्होंने घर को नए तरीके से सजाया है और फिर से एक नई दुनिया रच रहे हैं, जिसमें गीत-संगीत और म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट हैं। साथ नए जमाने के 
नए जमाने के साथ कदम मिलाकर चल रहे अदनान सामी को नए गैजेट और तरीकों से कोई दिक्कत नहीं होती, अगर कोई संगीतकार उन्हें ह्वाट्स ऐप पर धुन भेजता है तो वे उसे सुनकर अपनी गायकी का रियाज कर लेते हैं। कई बार मोबाइल या फेसबुक के मैसेज के जरिए गीतों के बोल आ जाते हैं। अदनान मानते हैं कि इन तकनीकी सुविधाओं से हमारी जिंदगी आसान हो रही है। बस एक ही खतरा है कि हम कहीं इन मशीनों के आश्रित न हो जाएं। तकनीकी सुविधाओं से एकरूपता पैदा होती है और किसी भी प्रकार की एकरूपता कला माध्यमों की सृजनात्मकता कम करती है। यों अदनान सामी खुद को टेकसेवी मानते हैं। वे कहते हैं कि मैं इन तकनीकों का इस्तेमाल दशकों से कर रहा हूं।
 तकनीक से छुपती कमियां
इन दिनों प्रचलित ऑटो ट्यून से अदनान को कोई दिक्कत नहीं होती। वे स्वीकार करते हैं कि ट्रैडिशनल म्यूजिशियन अभी के दौर में एडजस्ट नहीं कर पा रहे हैं। उन्हें लगता है कि इससे कला खत्म हो रही है। सच कहूं तो यह खुद को बदलने और नई तकनीक के इस्तेमाल करने की सहूलियत पर निर्भर करता है। एक जमाने में सभी गाडिय़ां गियर वाली होती थीं। जब बिना गियर या ऑटो गियर की गाडिय़ां आईं तो ढेर सारे लोगों को गाड़ी चलाने में दिक्कत हुई। दोनों के अलग मजे हैं। किसी जमाने में पूरा ऑर्केस्ट्रा साथ बैठता था और एक शॉट में रिकॉर्डिंग होती थी। सब कुछ लाइव होता था। वैसी रिकॉर्डिंग की अपनी चुनौतियां थीं। एक हल्की सी भी गलती रह गई तो पूरी रिकॉर्डिंग फिर से करनी पड़ती थी। कहना नहीं चाहिए, लेकिन बहुत से पुराने गानों में संगीतकारों ने ऐसी छोटी-मोटी चूकों को जाने दिया है। अगर वे गाने आज रिकॉर्ड किए जाएं तो हम उन्हें बेहतर बना सकते हैं। कुछ समय के मल्टीट्रैक रिकॉर्डिंग में यह सुविधा आ गई थी कि आप किसी एक ट्रैक को फिर से ठीक कर लें। मैं उन लोगों के साथ कतई नहीं हूं, जो हमेशा बीते दिनों और गुजरे जमाने की आहें भरते हैं। मेरी नजर में अभी ज्यादा परफेक्ट काम हो रहा है। यह कहते हुए मैं इस बात का भी ध्यान रख रहा हूं कि इधर कुछ जबरदस्त गड़बडिय़ां शामिल हो गई हैं। शौकिया फनकारों ने तकनीकी सहूलियत से खुद को उस्ताद मानने का भ्रम पाल लिया है। अब तो वह जमाना आ गया है कि गायकी के लिए रूह के तड़पने की जरूरत नहीं रह गई है। कुछ भी तड़प रहा हो तो आप गायक बन जाइए। कहने का मकसद यह है कि तकनीकी सुविधाओं ने संगीत की गुणवत्ता बढ़ा दी। कई बार ऐसा होता है कि गाते समय एक्सप्रेशन एकदम सही आता है, लेकिन सुर में कहीं लचक आ जाती है। कुछ पौना-बीस हो जाता है। तकनीक से आप इसे सुधार सकते हैं। रूहानी एक्सप्रेशन को दोहराया नहीं जा सकता। आज भी बड़े सिंगर गाते समय खुद को दोहरा नहीं पाते। आम श्रोताओं को यह फर्क समझ लेना चाहिए कि तकनीक से सिर्फ टेक्निकल चीजें ही सुधर सकती हैं। असल गायकी तो लंबे अभ्यास और प्रयास से आती है। तकनीक से एक्सप्रेशन नहीं आ सकता। की-बोर्ड और कंप्यूटर से बज रहे गिटार और सामने बैठकर किसी के बजते गिटार का असर अलग होता है। तकनीक का इस्तेमाल कमियां छिपाने और खूबियां बढ़ाने का काम आ सकता है।
हो गई थी कोफ्त 
    अपने वजन को लेकर चिंतित रहे अदनान बताते हैं कि जब वजन घटाने का काम शुरू किया तो अलग-अलग कमेंट सुनाई पड़े। कुछ ने कहा किसी नई माशूका को खुश करने के लिए अदनान ऐसा कर रहा है। किसी के जेहन में बात आई कि मुझे कोई फिल्म मिल गई होगी। सच्चाई यह थी कि मैं अपने वजन से ही घबरा गया था। बिस्तर से उठने या कहीं भी आने जाने में मुझे दो लोगों की जरूरत पड़ती थी। खुद पर कोफ्त होती थी। वजन कम हुआ तो मेरे साथ मेरे दोस्त, शुभचिंतक और प्रशंसक सभी खुश हुए। केवल एक बेला सहगल नाराज हुईं। मेरे मोटे शरीर को लेकर उन्होंने एक किरदार की कल्पना की थी। उस फिल्म की तैयारी चल रही थी। वजन कम होने से मैं उनके किरदार से बाहर आ गया। उन्होंने मुझे खूब सुनाया। मैंने सलाह दी कि प्रोस्थेटिक मेकअप से करते हैं। बेला और उनके निर्माता उस महंगे खर्च के लिए तैयार नहीं हुए।
जवाब नहीं गुलजार का 
    गुलजार के प्रशंसक अदनान सामी उनके गीतों से विस्मित हैं। वे कहते हैं कि ‘किल दिल’ में गाए मेरे गीत में आए रूहआफजा शब्द को ही ले लें आप। क्या कोई कल्पना कर सकता था कि महबूबा की तारीफ में इस शब्द का ऐसा इस्तेमाल हो सकता है। ठंडक, तरावट और मिठास एक साथ पाने का एहसास रूहआफजा में है। हंसी-मजाक में ही वे खूबसूरत मिसाल दे जाते हैं। हो सकता है कि डिफरेंट वरायटी के सॉफ्ट ड्रिंक के इस दौर में किसी को रूहआफजा का मर्म नहीं समझ में आए। इसे वह अच्छी तरह समझ सकता है, जो भारतीय तहजीब में पला-बढ़ा है, जिसने एक बार भी गलती या पसंद से रूहआफजा चख लिया है।

सेंसर के यू/ए सर्टिफिकेट का औचित्य

अजय ब्रह्मात्मज
अगर आप केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड की हिंदी वेबसाइट पर जाएंगे तो वहां पहले पृष्ठ पर ही बताया गया है कि किन-किन श्रेणियों में प्रमाण पत्र दिए जाते हैं। चार श्रेणियां हैं- अंग्रेजी में उन्हें यू, यू/ए, ए और एस कहते हैं। हिंदी में उन्हें अ, व /अ और अ लिखा गया है। हिंदी में चौथी श्रेणी एस का विवरण नहीं है। इसके साथ सेंसर प्रमाणन बोर्ड के हिंदी पृष्ठ पर वर्तनी की अनेक गलतियां हैं। सबसे पहले तो सूचना और प्रसारण मंत्रालय में सूचना को ही ‘सुचना’ लिखा गया है। नीचे उद्धृत पंक्तियों में दर्षक, प्रर्दषण, और मार्गदर्षन भी गलत लिखे गए हैं।
चलचित्र अधिनियम, 1952, चलचित्र (प्रमाणन) नियम,1983 तथा 5 (ख) के तहत केन्द्र सरकार द्वारा जारी किए गए मार्गदर्शिका का अनुसरण करते हुए प्रमाणन की कार्यवाही की जाती है।
फिल्मों को चार वर्गों के अन्तर्गत प्रमाणित करते हैं।
अ’- अनिर्बन्धित सार्वजनिक प्रदर्षन
’व’- वयस्क दर्षकों के लिए निर्बन्धित
’अव’- अनिर्बन्धित सार्वजनिक प्रर्दषन के लिए किन्तु 12 वर्ष से
कम आयु के बालक/बालिका को माता-पिता के मार्गदर्षन के साथ फिल्म देखने की चेतावनी के साथ
(उम्मीद है वर्तनी की गलतियां यथाशीघ्र सुधार ली जाएंगी)
सवाल वर्तनी से अधिक नियमों के व्यावहार का है। नियमों का पालन क्यों और कैसे किया जा रहा है? किस आधार पर ‘एक्शन जैक्सन’ जैसी फिल्म को यू/ए सर्टिफिकेट दिया गया,जबकि इस फिल्म में भयंकर हिंसक और फूहड़ सेक्सी दृश्य हैं। फिल्म के नायक एजे और विशी दृश्यों में आते ही या तो मारपीट या मारकाट पर उतारू हो जाते हैं या फिर फिल्म की महिला चरित्रों के साथ फूहड़ एडल्ट हंसी-मजाक और यौनेच्छा के भावों में लीन रहते हैं। एक नायिका खुशी तो ऐसा लगती है कि नायक को नंगे देखने से ही उसकी किस्म्त पलटी है। अब वह इसी फिराक में रहती है कि फिर से नायक को नंगा देखे। इसी आधार पर वह नायक से शादी का मन बना लेती है। प्रेम में सहवास और संभोग अनिवार्य चरण है,लेकिन ‘एक्शन जैक्सन’ में प्रेम का आधार अश्लील और फूहड़ है। दूसरी अभिनेत्री खलनायिका है। वह एजे के शरीर सौष्ठव और बहादुरी से इतनी प्रभावित होती है कि किसी भी तरह उसे हासिल करना चाहती है। निर्देशक ने चरित्र की कामुकता दर्शाने के लिए जम कर अभिनेत्री का अंग प्रदर्शन करवाया है। एक महिला चरित्र को मर्सिडीज कार कहते हुए उसकी टेस्ट ड्राइव करने जैसे संवाद भी बोले गए हैं। ऐसी फिल्म को यू/ए देने का आधार समझ में नहीं आता।
फिल्म के एक्शन दृश्यों के फिल्मांकन में बहादुरी से अधिक ग्राफिक क्रूरता नजर आती है। विशी और एजे दोनों ही मुक्के से लेकर ऑटोमेटिक हथियारों से खुद ही बुरे गुंडों पर आक्रमण करते हैं। वे स्वयं भी आदर्शवादी चरित्र नहीं हैं। ऊपर से बुरी और अंदर से भली जैसी फिल्मी नैतिकता उनके अंदर है, जो सामाजिक नैतिकता सी दिखती है। फिल्म में डांस और गानों की तरह बार-बार खून-खराबा होता है। नंगी तलवार नाचती है। खून के फव्वारों और छींटो से स्क्रीन लगातार लाल होती है। फिर भी इसे यू/ए सर्टिफिकेट दिया गया है। क्यों? कहीं कुछ गड़बड़ है।
दरअसल,लाभ के लिए निर्माता अपनी ए कैटेगिरी की फिल्मों के लिए यू/ए सर्टिफिकेट का इंतजाम करते हैं। इससे उनकी फिल्मों के सैटेलाइट प्रसारण का मार्ग सुगम हो जाता है। देश में टीवी पर एडल्ट फिल्मों के प्रसारण की अनेक दिक्कते हैं। उन्हें पर्याप्त पैसे और स्पॉन्सर नहीं मिलते। टीवी चैनल भी उनके सैटेलाइट राइट लेने में हिचकते हैं। इस वजह से निर्माताओं की कोशिश रहती है कि उनकी एडल्ट कंटेंट की फिल्मों के लिए भी किसी तरह यू/ए सर्टिफिकेट मिल जाए। 
केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड में कदाचार की खबरें आती रही हैं। ‘एक्शन जैक्सन’ जैसी हिंसक और सेक्स के फूहड़ संवादों और दृश्यों जैसी फिल्मों को अगर यू/ए सर्टिफिकेट मिले तो कदाचार की आशंका बरकरार रहती है।
abrahmatmaj@mbi.jagran.com

Saturday, December 6, 2014

‘3 इडियट’ के तीनों इडियट ही ला रहे हैं ‘पीके’

आमिर खान ने आगामी फिल्म ‘पीके’ के प्रचार के लिए इस बार नया तरीका अनपाया है। वे इस फिल्म की टीम के साथ सात शहरों की यात्रा पर निकले हैं। आज पटना से इसकी शुरुआत हो रही है। इस अभियान में वे ‘3 इडियट’ का प्रदर्शन करेंगे और फिर आमंत्रित दर्शकों से बातचीत करेंगे। पटना के बाद वे बनारस, दिल्ली, अहमदाबाद, हैदराबाद, जयपुर और रायपुर भी जाएंगे। पटना के लिए उड़ान भरने से पहले उन्होंने अजय ब्रह्मात्माज से खास बातचीत की।

प्रचार के इस नए तरीके के आयडिया के बारे में बताएं ?

हमलोग ‘3 इडियट’ दिखा रहे हैं। मकसद यह बताने का है कि ‘3 इडियट’ की टीम एक बार फिर आ रही है। इस बार वही टीम ‘पीके’ ला रही है। ‘3 इडियट' के तीनो इडियट राजू,विनोद और मैं अब ‘पीके’ लेकर आ रहे हें। हमलोग तयशुदा सात शहरों में ‘3 इडियट’ की स्क्रीनिंग करेंगे। इस स्क्रीनिंग में आए लोगों के साथ फिल्म खत्म होने के बाद हमलोग बातचीत करेंगे। कोशिश है कि हमलोग ग्रास रूट के दर्शकों से मिलें।
पटना से शुरूआत करने की कोई खास वजह...?
पटना से शुरूआत करने की यही वजह है कि ‘पीके’ में मेरा किरदार भोजपुरी बोलता है। वास्तव में हमलोग भोजपुर जाना चाहते थे। वहां की पुलिस ने मना कर दिया कि आप न आएं। हम कंट्रोल नहीं कर पाएंगे। मेरा तो यही मन था कि भोजपुर से शुरू करें। उनके मना करने के बाद अब पटना से शुरू कर रहे हैं।

हां,डर तो रहता है कि कहीं कुछ हो गया तो ?

कुछ भी नहीं होता है। सभी मुझे प्यार करते हैं। उन्होंने यही कहा कि भीड़ के नियंत्रण में दिक्कत होगी। प्रशासन असुविधा महसूस कर रहा था। चूंकि भोजपुरी भाषा है तो बिहार से आरंभ करना लाजिमी था। अब पटना से शुरूआत होगी।

भोजपुरी का आयडिया कैसे आया? मैंने सुना कि आप ने ही भोजपुरी पर जोर दिया था।
मेरे लिए इसे अभी बताना मुश्किल है। फिल्म देखने पर आप समझ जाएंगे कि पीके क्यों भोजपुरी बोल रहा है। स्क्रिप्ट में तो वह खड़ी बोली हिंदी ही बोल रहा था। स्क्रिप्ट सुनने पर मैंने राजू से कहा कि उसे भोजपुरी में बोलने दो। उस भाषा से किरदार में एक कलर आएगा। वह निखर जाएगा।

मेरी धारणा है कि कहीं न कहीं आप में और दिलीप कुमार की कार्यशैली में कई समानताएं हैं। हालांकि आप स्पष्ट प्रभाव या प्रेरणा से मना करते हैं। अब ‘पीके’ की भोजपुरी लें। मुझे दिलीप साहब की ‘गंगा जमुना’ याद आ रही है।
दिलीप साहब तो गजब की भोजपुरी बोलते थे। भाषा पर उनकी पूरी कमांड थी। मैंने भी कोशिश की है। हमारे साथ एक विशेषज्ञ और प्रशिक्षक शांतिभूषण थे। शूटिंग के चार महीने पहले से मैंने अभ्यास आरंभ कर दिया था। वे संवाद बोलते थे और मैं उसे फोनटिकली लिख लेता था और फिर याद करता था। मैं शब्दों और वाक्यों को ध्वनि और लहजे के साथ याद रखता था। एक चीज स्पष्टर कर दूं कि मैंने भोजपुरी भाषा नहीं सीखी है। किसी भी भाषा को अपनाने में वक्ती लगता है।

भोजपुरी की कितनी गालियां सीखी आप ने...?
पीके गाली नहीं देता। इस फिल्मे में गालियां नहीं हैं। मैंने कहा न कि भोजपुरी भाषा नहीं सीखी है। मैं अपने संवादों तक सीमित रहा। उन्हें ही सही उच्चाकरण के साथ बोलता रहा। बोलते-बोलते एक टच आ ही जाता है। उन दिनों मेरी हिंदी में भोजपुरी का असर सुनाई पड़ता था।
पीके विचित्र प्राणी लग रहा है। क्या कुछ बता पाएंगे?

'पीके' के बारे में नहीं बता पाऊंगा। हां, फिल्म का अनुभव बहुत कमाल रहा। पहली दफा ऐसा हुआ कि शॉट की तैयारी का टेक में इस्तेंमाल नहीं हुआ। टेक देते समय मैं किसी और बहाव में आकर कुछ अलग कर जाता था। वह राजू को अच्छा लगता था। मेरी समझ में नहीं आया कि ऐसा कैसे हुआ? किसी एक शॉट की बात नहीं कह रहा हूं। कई बार ऐसा हुआ। लगातार हुआ। कमाल की कहानी है ‘पीके’। मैंने कल फाइनल फिल्म देखी और मैं काफी खुश हूं। हमें लगता है कि हम जो बनाने चले थे, उसमें कामयाब हुए हैं। अब दर्शकों की प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।

राजकुमार हिरानी के क्रिएटिव धैर्य की तरीफ करनी होगी कि वे आज के इस दौर में भी किसी हड़बड़ी में नहीं हैं। उनकी फिल्म पांच सालों के अंतराल के बाद आ रही है।
मेरे हिसाब से अभी वे हिंदी सिनेमा के नंबर वन डायरेक्टर हैं।

‘सत्यमेव जयते’ तो जारी रहेगा ?
हां,जारी रहेगा। 2015 में हम नहीं करेंगे। हमलोग रिसर्च और बाकी इंतजाम में इमोशनली थक गए हैं। अब ब्रेक लेने के बाद आरंभ करेंगे। 2015 में न तो ‘सत्यमेव जयते’ आएगा और न ही मेरी कोई फिल्म आएगी। मैंने कोई फिल्म साइन नहीं की है। अभी स्क्रिप्ट सुन रहा हूं। कोई स्क्रिप्ट पसंद भी आ गई तो वह 2016 में ही आ पाएगी।

Friday, December 5, 2014

दरअसल : पर्दे पर आम आदमी

-अजय ब्रह्मात्मज
फिल्में आमतौर पर भ्रम और फंतासी रचती हैं। इस रचना में समाज के वास्तविक किरदार भी पर्दे पर थोड़े नकली और नाटकीय हो जाते हैं। थिएटर में भी यह परंपरा रही है। भाषा, लहजा, कॉस्ट्यूम और भाव एवं संवादों की अदायगी में किरदारों को लार्जर दैन लाइफ कर दिया जाता है। माना जाता है कि इस लाउडनेस और अतिरंजना से कैरेक्टर और ड्रामा दर्शकों के करीब आ जाते हैं। हिंदी सिनेमा में लंबे समय तक इस लाउडनेस पर जोर रहा है। भारत में पहले इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के आयोजन के बाद इतालवी यर्थाथवाद से प्रभावित होकर भारतीय फिल्मकारों ने सिनेमा में यर्थाथवादी स्थितियों और चरित्रों का चित्रण आरंभ किया। उस प्रभाव से सत्यजीत राय से लेकर श्याम बेनेगल तक जैसे निर्देशकों का आगमन हुआ। इन सभी ने सिनेमा में यथार्थ और वास्तविकता पर जोर दिया।
सत्यजीत राय यर्थाथवादी सिनेमा के पुरोधा रहे और श्याम बेनेगल के सान्निध्य में आए फिल्मकारों ने पैरेलल सिनेमा को मजबूत किया। पैरेलल सिनेमा की व्याप्ति के दौर में कुछ बेहद मार्मिक, वास्तविक और प्रमाणिक फिल्में आईं। इस दौर की बड़ी दुविधा यह रही कि ज्यादातर फिल्मकारों की पृष्ठभूमि शहरी थी। वे अंग्रेजी में पढक़र आए थे और अपनी दूसरी भाषा हिंदी में फिल्में बना रहे थे। उनके समर्थन और योगदान से इंकार नहीं किया जा सकता, लेकिन उस कमी को भी नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा, जिसकी वजह से पैरेलल सिनेमा की परंपरा मजबूत और दीर्घायु नहीं हो सकी। कहीं न कहीं इन फिल्मों का रियलिज्म सिंथेटिक और बनावटी हो गया। नतीजतन, दर्शकों से रिश्ता नहीं रहा। प्रदर्शन की असुविधा भी पैरेलल सिनेमा के खात्मे का एक कारण रही। धीरे-धीरे पैरेलल सिनेमा के फिल्मकार या तो चूक गए या उन्होंने अपनी राह बदल दी। श्याम बेनेगल सरीखे फिल्मकार आज भी अपने प्रयासों से प्रासंगिक बने हुए हैं।
मेनस्ट्रीम सिनेमा अपने कमर्शियल ढांचे और मुनाफे की रणनीति से लगातार मजबूत और विकसित होता गया। इस सिनेमा ने पर्दे पर भ्रम को गहरा किया और फंतासी में सितारों की चमक जोड़ दी। अपनी जमीन, परिवेश और नागरिकों (दर्शकों) से कटा यह सिनेमा देखा जा रहा है। सौ सालों में इसने अपना एक दर्शक समूह और समाज भी तैयार कर लिया है। ऐसे सिनेमा में शरीक फिल्मकार और कलाकार बेशर्मी से यह कहते नजर आते हैं कि हम दर्शकों की पसंद का सिनेमा बनाते हैं। दरअसल हिंदी सिनेमा की मुख्यधारा ने दर्शकों को कथित मनोरंजक फिल्मों का आदी बना दिया है। मध्यवर्ग और निम्नवर्ग के अधिसंख्य दर्शकों को उच्च मध्य वर्ग और उच्च वर्ग के किरदार अच्छे लगते हैं। इन किरदारों की प्रमुख समस्या प्रेम है। यह महज संयोग नहीं है कि हिंदी फिल्मों के अधिकांश नायक कोई काम नहीं करते। हम उन्हें मायावी दुनिया में विचरते देखते हैं। अफसोस की बात है कि हम आह्लादित भी होते हैं। इधर, मेनस्ट्रीम सिनेमा में मसालेदार परिवर्तन हुआ है। सभी पॉपुलर स्टार इन्हीं मसालों की फिल्में परोस रहे हैं। अच्छी कमाई हो रही है। तीन दिनों में फायदा दिख जाता है। लाभ होता है। बस केवल दर्शक नुकसान में रहते हैं।
मुख्यधारा में आकर जुड़ती कुछ गतिमान पहाड़ी नदियों जैसी गतिमान फिल्में हमेशा कुछ जोड़ती रहती हैं। ‘आंखों देखी’, ‘कहानी’, ‘पान सिंह तोमर’, ‘तेरे बिन लादेन’, ‘फंस गए रे ओबामा’, ‘विकी डोनर’ जैसी फिल्में दर्शकों और बाजार को अपनी सफलता और स्वीकृति से विस्मित कर देती हैं। गौर करें तो इन सभी फिल्मों का केंद्रीय चरित्र देश का वह आम आदमी है, जिसे हिंदी फिल्मों ने दरकिनार कर दिया है। याद करें पिछली बार कब आप ने साधारण वेशभूषा में अपने पास-पड़ोस के किरदारों को पर्दे पर देखा था। इन दिनों मुख्यधारा की फिल्मों में गरीब किरदार भी डिजाइनर ड्रेस पहनकर आते हैं। पिछले हफ्ते रिलीज हुई डॉक्टर चंद्रप्रकाश द्विवेदी की फिल्म ‘जेड प्लस’ ने फिर से हाशिए के किरदार को फिल्म में केंद्रीय जगह दी है। फिल्म का नायक असलम पंचर वाला मुसलमान और राजस्थान के कस्बे का आम नागरिक है। वह लुंगी और बनियान पहनता है। पड़ोसी से झगड़ता है। पान की दुकान पर जाता है। खटारा स्कूटर पर चलता है। ‘जेड प्लस’ की सुरक्षा उसकी जिंदगी में विडंबना रचती है और हम पॉलिटिक्स की मिथ्या से परिचित होते हैं। उम्मीद है कि आगे भी कुछ फिल्मकार ऐसे प्रयास करते रहेंगे।
अफसोस कि डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी की फिल्म ‘जेड प्लस’ वितरण और प्रदर्शन की अराजकता और संकीर्णता की शिकार हुई।

फिल्‍म समीक्षा : भोपाल-ए प्रेयर फॉर रेन

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
अपने कथ्य और संदर्भ के कारण महत्वपूर्ण 'भोपाल : ए प्रेयर फॉर रेन' संगत और वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण के साथ भोपाल गैस ट्रैजेडी का चित्रण करती तो प्रासंगिक और जरूरी फिल्म हो जाती। सन् 1984 में हुई भोपाल की गैस ट्रैजेडी पर बनी यह फिल्म 20वीं सदी के जानलेवा हादसे की वजहों और प्रभाव को समेट नहीं पाती। रवि कुमार इसे उस भयानक हादसे की साधारण कहानी बना देते हैं।
'भोपाल : ए प्रेयर फॉर रेन' की कहानी पत्रकार मोटवानी( फिल्म में उनका रोल पत्रकार राजकुमार केसवानी से प्रेशर है) के नजरिए से भी रखी जाती तो पता चलता कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां तीसरी दुनिया के देशों में किस तरह लाभ के कारोबार में जान-माल की चिंता नहीं करतीं। अफसोस की बात है कि उन्हें स्थानीय प्रशासन और सत्तारूढ़ पार्टियों की भी मदद मिलती है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हिंसक और हत्यारे पहलू को यह फिल्म ढंग से उजागर नहीं करती। निर्देशक ने तत्कालीन स्थितियों की गहराई में जाकर सार्वजनिक हो चुके तथ्यों को भी फिल्म में समाहित नहीं किया है। फिल्म में लगता है कि यूनियन कार्बाइड के आला अधिकारी चिंतित और परेशान हैं, जबकि सच्चाई उसके विपरीत थी। न केवल खतरों के बारे में मालूम होने के बाद भी प्रोडक्शन चालू रखा, बल्कि सुरक्षा उपायों की भी अनदेखी की गई। इस फैक्ट्री को चलाने की मंजूरी और सहमति देने में सुरक्षा और चेतावनी के पहलुओं पर स्थानीय प्रशासन ने गौर नहीं किया। फिल्म में संकेत तो मिलता है कि नेताओं की मिलीभगत से यूनियन कार्बाइड की नकेल नहीं कसी गई, लेकिन उसके विस्तार में जाने के बजाय फिल्म दिलीप नामक मजदूर की लाचार जिंदगी का रूपक रचती है।
ऐसी फिल्मों का उद्देश्य मनोरंजन से अधिक भयावह स्थितियों का रेखांकन होता है ताकि भविष्य की पीढिय़ां इतिहास की चूकों से सबक ले सकें। विश्व सिनेमा में मानवीय हादसों पर ऐसी अनेक फिल्में बनी हैं, जो अतीत की घटनाओं पर फैले जाले को साफ करती है। समय बीतने के साथ भुक्तभोगी और अपराधी भी घटनाओं को निस्संग नजरिए से देख पाते हैं।
रवि कुमार की फिल्म 'भोपाल: ए प्रेयर फॉर रेन' हादसे की सतह पर रह जाती है। वह गहरे नहीं उतरती। यही कारण है कि वह भोपाल गैस ट्रैजेडी की व्यथा कथा प्रभावशाली तरीके से नहीं रख पाती। ऐसी फिल्मों में कलाकारों का चयन खास महत्व रखता है। रवि कुमार ने कलाकार तो जुटा लिए हैं, लेकिन उनके किरदारों पर अधिक मेहनत नहीं की है।
ढाई स्‍टार ** 1/2

फिल्‍म समीक्षा : एक्‍शन जैक्‍सन

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
सही कहते हैं। अगर बुरी प्रवृत्ति या आदत पर आरंभ में ही रोक न लगाई जाए तो वह आगे चल कर नासूर बन जाती है। प्रभु देवा ने फिल्म 'वांटेड' से हिंदी फिल्मों में कदम रखा। तभी टोक देना चाहिए था। वे रीमेक बना रहे हों या कथित ऑरिजिनल कहानी चुन रहे हों। उनकी फिल्में एक निश्चित फॉर्मूले पर ही चलती हैं। उनकी फिल्मों में एक्शन, वायलेंस, डांस, रोमांस... इन चार तत्वों का अनुपात और क्रम बदलता रहता है। कथानक पटकथा और संवाद जैसी चीजें तो भूल ही जाएं। प्रभु देवा शब्दों से ज्यादा दृश्यों में यकीन करते हैं। उनकी फिल्मों में स्क्रिप्ट राइटर से बड़ा योगदान कैमरामैन, साउंड रिकॉर्डिस्ट, कोरियोग्राफर, एक्शन डायरेक्टर और हीरो का होता है। 'एक्शन जैक्सन' में तो उन्होंने दो-दो अजय देवगन रखे हैं। दो हीरोइनें भी हैं - सोनाक्षी सिन्हा और मनस्वी ममगई। दोनों का काम या तो हीरो पर रीझना है या फिर खीझना है।

'एक्शन जैक्सन' जैसी फिल्में देखते समय अजय देवगन सरीखे कद्दावर और लोकप्रिय अभिनेता की बेचारगी का एहसास होता है। 'जख्म', 'तक्षक', 'अपहरण' और 'भगत सिंह' जैसी फिल्मों को थोड़ी देर के लिए भूल भी जाएं तो इस अभिनेता ने कमर्शियल फिल्मों के रेगुलर हीरो के रूप में अपनी आंखों से किरदारों का दर्द बयान किया है। मनोरंजक फिल्में दी हैं। उम्र बढऩे के साथ लोकप्रियता और कामयाबी बरकरार रखने के लिए अजय देवगन ने अपनी सोच-समझ को ताक पर रख दिया है। कह सकते हैं कि वे कुछ भी कर रहे हैं। 'कुछ भी' करने के प्रयास में उन्होंने अपनी गरिमा और प्रतिभा को ही ग्रहण लगा दिया है। 'एक्शन जैक्सन' उनके प्रशंसकों के लिए भी मनभंजक फिल्म है।
'एक्शन जैक्सन' में वे डबल रोल में हैं। विशी और एजे पर्दे पर दो किरदारों के रूप में दिखते हैं। लेकिन निर्देशक के ट्रीटमेंट पर गौर करें तो वे एक-दूसरे का ही विस्तार लगते हैं। दोनों के एक्शन में आते ही कांच टूटने लगते हैं। मुक्का, गोली, चाकू, तलवार जैसे अस्त्र-शस्त्र का इस्तेमाल होता है। खून के छीटें उड़ते हैं। मुक्का लगने पर लोग हवा में गुलाटियां भरते हैं। हीरो का गुस्सा गुरुत्वाकर्षण के खिलाफ उन्हें ऊपर उछालता है। डांस और डायलॉग के बीच में हर तरह के हथियारों की आवाजें आती हैं। गिरने-पड़ने, टूटने-फूटने, धूम-धड़ाम, बूम-बड़ाम, छप-छपाक जैसी ध्वनियों से एक्शन का इंपैक्ट बढ़ाया जाता है। पार्श्व में शोर चलता रहता है।
प्रेम और आकर्षण तो हर हिंदी फिल्म में होता है। उसकी वजहें भी होती हैं। इस फिल्म की नायिका संयोग से नायक को एक नहीं दो बार नंगे देख लेती है और दोनों बार वह लकी रहती है। नतीजा यह होता है कि अब वह हीरो से शादी कर लेना चाहती है ताकि...। इंटरवल के पहले एक अजय देवगन की प्रेम लीला इंटरवल के बाद दूसरे अजय देवगन के साथ द्वेष लीला के रूप में आगे बढ़ती है। विलेन की बहन एजे की वीरता और शारीरिक सौष्ठव से इतनी मुग्ध होती है कि उसे हासिल करने के लिए बैंकॉक से भारत तक वितंडा रचती है। खून की धारा बहती है और गाजर-मूली की तरह इंसान काटे जाते हैं।
प्रभु देवा और अजय देवगन की 'एक्शन जैक्सन' उनके प्रशंसकों को भी निराश करेगी। मनोरंजन का कोई तुक और आधार तो होना चाहिए। और फिर ऐसी क्रूर एवं हिंसक फिल्म को यू/ए सर्टिफिकेट देने का क्या तर्क हो सकता है।
अवधिः 144 मिनट
* एक स्‍टार 

Thursday, December 4, 2014

दरअसल : पिता सुखदेव की खोज में बेटी शबनम


-अजय ब्रह्मात्मज

हिंदी में डॉक्युमेंट्री फिल्में कम बनती हैं। जो कुछ बनती हैं,उनमें सामाजिक मुद्दों, सांस्कृतिक समस्याओं और एनजीओ टाइप बहसों पर केंद्रित विषय होते हैं। बायोपिक फिल्मों की तरह डॉक्युमेंट्री भी व्यक्तियों के जीवन पर हो सकती हैं। पिछले 50-60 सालों में कुछ डॉक्युमेंट्री फिल्ममेकर ने मशहूर व्यक्तियों पर आधारित डॉक्युमेंट्री बनाने की कोशिश की। ये कोशिशें ज्यादातर सरल किस्म की जीवनियां बनकर रह गई हैं। उनमें व्यक्तियों के अंतर्विरोध और द्वंद्व पर कम ध्यान दिया गया है। वैसे भी भारतीय समाज में यह मजबूत धारणा है कि मरने के बाद किसी व्यक्ति की आलोचना नहीं करनी चाहिए। उसकी कमियों को उजागर तो नहीं ही करना चाहिए।
    इस पृष्ठभूमि में शबनम सुखदेव की डॉक्युमेंट्री द लास्ट अदियू(आखिरी सलाम) उल्लेखनीय प्रयास है। इस डॉक्युमेंट्री में बेटी शबनम अपने पिता सुखदेव की तलाश करती है। सुखदेव की मृत्यु के समय उनकी बेटी सिर्फ 14 साल की थीं। दोनों के बीच दुराव रहा। पिता ने अपनी क्रिएटिव व्यस्तताओं के बीच बेटी पर ध्यान नहीं दिया। मां भी नहीं चाहती थीं कि बेटी पिता के करीब जाए। सुखदेव का अपनी पत्नी के साथ भी तनावपूर्ण रिश्ता था। इसका असर बाप बेटी के रिश्तों पर पड़ा। पिता की मृत्यु की खबर सुनने पर बेटी शबनम ने 14 साल की उम्र में भी उनके अंतिम दर्शन नहीं करने का फैसला किया और  फिल्म देखने चली गई। इस डॉक्युमेंट्री में शबनम खुद को भी नहीं बख्शती। वह पिता के साथ अपने इस अस्वाभाविक संबंध की पड़ताल करती हैं। डॉक्युमेंट्री में स्पष्ट तौर पर यह कहा गया है कि मां ने उन्हें पिता से दूर रखा था। यहां तक कि सुखदेव की मृत्यु के बाद भी मां-बेटी के बीच उनके बारे में कोई चर्चा नहीं होती थी। इस डॉक्युमेंट्री के दौरान पहली बार मां और बेटी सुखदेव की तस्वीरों और चिट्ठियों को पलटते, देखते और रोते हैं। उनके व्यक्त्वि को समझने की कोशिश करते हैं। शबनम ने पिता के दोस्तों से भी बातें की हैं।
    सुखदेव सातवें दशक के मशहूर डॉक्युमेंट्री फिल्ममेकर थे। उनकी शैली में ताजगी के साथ रियलिज्म भी था। उन्होंने बीस सालों में लगभग 60 डॉक्युमेंट्री बनाई। उनमें से कुछ चर्चित होने के साथ थिएटर में भी रिलीज हुई। उनकी प्रसिद्धि और काबिलियत का अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि वे इंदिरा गांधी के प्रिय बन गए थे। हालांकि इस निकटता के कारण वे इमरजेंसी के समर्थक होने के साथ अपने दोस्तों की आलोचना के शिकार हुए। सभी को लगा कि एक प्रगतिशील और वामपंथी फिल्ममेकर ने राह बदल ली। दरअसल यह सुखदेव की अपनी खोज और दुविधा का प्रभाव था, जिसकी वजह से उनमें यह आंशिक भटकाव नजर आता है।
    सुखदेव की डॉक्युमेंट्री इंडिया 67 में पहली बार सभी को चौंकाया था। इस डॉक्युमेंट्री में सुखदेव ने आजादी के बीस सालों के बाद के भारत के मोहभंग को पहली बार डॉक्युमेंट किया था। इसके लिए उन्होंने पूरे भारत की यात्रा की थी और समाज के विभिन्न तबके के लोगों से मिले थे। उसके बाद उन्होंने खिलौनेवाला, वॉयलेंस, नाइन मंथ्स टू फ्रीडम, मां की पुकार, वॉयस ऑफ द पीपल, आफ्टर दी साइलेंस जैसी डॉक्युमेंट्री बनाई। नाइन मंथ्स टू फ्रीडम बांग्लादेश के निर्माण और संघर्ष की  लाइव दास्तान है। इस डॉक्युमेंट्री के लिए उन्होंने बांग्लादेश से सम्मान मिला था। भारत सरकार ने भी उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया था। उनकी मृत्यु पर किसी दोस्त ने कहा था,  सुख जो दुख के साथ था, वह भी नहीं रहा।
    सुखदेव अपनी विशेष शैली के साथ मुख्य धारा की फिल्मों में भी आए थे। उन्होंने शशि कपूर और शर्मिला टैगोर के साथ माय लव फिल्म बनाई थी। उनकी एक और फिल्म की चर्चा लगभग नहीं होती। वह फिल्म थी रेशमा और शेरा। सभी यही जानते हैं कि इस फिल्म के निर्देशक सुनील दत्त थे। सुनील दत्त ने इस फिल्म के निर्देशन की जिम्मेदारी पहले सुखदेव को दी थी। सुखदेव ने फिल्म पूरी भी कर ली थी, लेकिन उनकी यर्थाथवादी शैली सुनील दत्त को पसंद नहीं आई थी। उन्होंने फिल्म पूरी होने के बाद सुखदेव को हटा दिया था और फिर अपनी तरह से फिल्म को अंतिम रूप दिया था। अपने प्रति हुए इस व्यवहार से सुखदेव सदमे में आ गए थे। उनके साथ मद्यपान करने वाले दोस्तों की तादाद बढ़ती गई और वे मानसिक और शारीरिक दोनों तौर पर दुबले होते गए। उन्होंने मेनस्ट्रीम फिल्म में दोबारा आने की कोशिश नहीं की।
    शबनम सुखदेव इस डॉक्युमेंट्री के निर्माण के साथ अपने पिता को खोज लेती हैं। रिश्तों की सूखी नदी में भावों का जल प्रवाहित होता है। यह फिल्म पिछली सदी के एक महत्वपूर्ण डॉक्युमेंट्री फिल्ममेकर के जीवन में झांकने के साथ उनकी शैलियों और कृतियों की भी चर्चा होती है।