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Thursday, August 27, 2015

दरअसल : ट्रेलर लांच के दुखद पहलू



-अजय ब्रह्मात्‍मज
    पहले केवल फिल्‍म आरंभ होने के पहले ट्रेलर दिखाए जाते थे। चल रही फिल्‍म के साथ आगामी फिल्‍म के इन ट्रेलर का बड़ा आकर्षण होता था। दर्शकों को फिल्‍मों की झलक मिल जाती थी। मुझे लगता है कि पहले दर्शक फिल्‍मों को लेकर जजमेंटल नहीं होते थे। वे सभी फिल्‍में देखते थे। प्रति फिल्‍म दर्शकों का प्रतिशत अधिक रहता होगा। इसके समर्थन में मेरे पास कोई सबूत नहीं है। अपने दोस्‍तों और रिश्‍तेदारों के बचपन की बातों से इस निष्‍कर्ष पर पहुंचा हूं। तब फिल्‍में अच्‍छी या बुरी होने के बजाय अच्‍छी और ज्‍यादा अच्‍छी होती थीं। तात्‍पर्य यह कि दर्शक सीधे फिल्‍में देखते थे। वे उसके प्रचार या मार्केटिंग से प्रभावित नहीं होते थे। तब ऐसा आक्रामक प्रचार भी तो नहीं होता था।
    ट्रेलर के बारे में कहा जाता है कि यह पहले फिल्‍में खत्‍म होने के बाद दिखाया जाता था। पीछे दिखए जाने की वजह से इसे ट्रेलर कहा जाता था। प्रदर्शकों और निर्माताओं ने पाया कि दर्शक ट्रेलर देखने के लिए नहीं रुकते। वे फिल्‍में खत्‍म होते ही सीटें छोड़ कर दरवाजे की तरफ निकल जाते हैं। लिहाजा इसे फिल्‍में आरंभ होने के पहले दिखाया जाने लगा। कुछ दशकों पहले तक फिल्‍म शुरू होने के पहले तो फिल्‍म डिवीजन की शॉर्ट फिल्‍में भी दिखाई जाती थीं। बहरहाल,अब ट्रेलर फिल्‍में आरंभ होने के पहले दिखाई जाती हैं। इंटरनेशनल मानकों के अनुसार इसकी अवधि ढाई मिनट ही होनी चाहिए। हालीवुड में संबंधित एसोशिएसन निर्माता और स्‍टूडियों को साल में एक ल्रबी अवधि का ट्रेलर दिखाने की छूट देता था। भारत में उसी का अनुकरण करते हुए ज्‍यादातर ढाई मिनट के ट्रेलर ही जारी किए जाते हैं।
    अब मैं असली बात बताऊं। इन दिनों ट्रेलर लांच फिल्‍म प्रमोशन के लिहाज से बड़ा इवेंट हो गया है। यह किसी मल्‍टीप्‍लेक्‍स में आयोजित होता है। माना जाता है कि ट्रेलर लांच से मचा शोर ही फिल्‍म के लिए दर्शक जुटाता है। यहीं से हवा चलती है। बाज दफा यह हवा मल्‍टीप्‍लेक्‍स से निकलते ही थम जाती है। आजकल ट्रेलर लांच के अगले दिन से विज्ञप्तियां आने लगती हैं कि 24 घंटे में कितने लोगों ने इसे यूट्यूब पर देख लिया। अगर एक दिन में 10 लाख व्‍यूइंग हो जाए तो मान लिया जाता है कि ट्रेलर हिट है। फिल्‍म भी हिट हो सकती है।
ट्रेलर लांच के इवेंट में पहले मीडिया के लोग बुलाए जाते थे। व्‍यवस्थित तरीके से सबसे पहले आमिर खान ने 2008 में गजनी की रिलीज के पहले चुनिंदा फिल्‍म पत्रकारों को बुला कर ट्रेलर दिखाया था और उनकी राय ली थी। यह रिवाज धीरेधीरे बेतरतीब और अनावश्‍यक रूप से बड़ा हो गया है। इस मौके पर प्रोडक्‍शन कंपनी के लोग,फिल्‍म यूनिट के सदस्‍य और स्‍टार,पीआर कंपनी के सदस्‍य,फैंस,कंटेस्‍ट विनर आदि को बुला लिया जाता है। ऑन लाइन के प्रचलन में आने के बाद ऑलजाइन जर्नलिस्‍ट की भीड़ भी रहती है। प्रकाशन समूहों से भी एक से ज्‍यादा पत्रकार आते हैं। इस हड़बोंग के बीच जब ट्रेलर दिखाया जाता है तो केवल सीटियां सुनाई पड़ती हैं। तालियां बजती हैं। शोर रहता है।
आखिर में स्‍टार,डायरेक्‍टर,प्रड्यूसर और कभी-कभी कुड और खास लोग भी मंच पर आते हैं। बताया तो यह जाता है कि सवाल-जवाब होगा,लेकिन मंचासीन सेलिब्रिटी पूदे गए सवालों का मखौल उड़ाते हैं। हर सवाल को जवाब टालने या मजाक उड़ाने के अंदाज में दिया जाता है। चूंकि सब कुछ ऐसे नियंत्रित और नियोजित माहौल में होता है कि पत्रकार मसखरे हो जाते हैं। पीआर के सदस्‍यों का पूरा दबाव रहता है कि फिल्‍मों या उस ट्रेलर से इतर कोई और बात नहीं पूछी जाए। इस खेल में कई बार पत्रकार भी असंगत सवाल पूछते हैं। ट्रेलर तीन मिनट से छोटा ही होता है,लेकिन ये इवेंट कम से कम एक घंटे देर से आरंभ होते हैं और कार्यक्रम आधे घंटे तक चलता है। कई बार तो दो-तीन घंटे का समय बर्बाद होता है। इसमें मैं मल्‍टीप्‍लेक्‍स पहुचने और वहां से घर या दफ्तर लौटने का समय नहीं काउंट कर रहा हूं।
    ढाई मिनट के ट्रेलर के लांच में ढाई घंटे की बर्बादी सचमुच दुखद है। निर्माताओं को कोई नया तरीका खोजना चाहिए। यों भी लांच के चंद मिनटों के अंदर यूट्यूब पर ट्रेलर आ ही जाता है। 

Friday, August 21, 2015

फिल्‍म समीक्षा : मांझी- द माउंटेन मैन

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
दशरथ मांझी को उनके जीवन काल में गहरोल गांव के बच्चे पहाड़तोड़ुवा कहते थे। दशरथ माझी को धुन लगी थी पहाड़ तोड़ने की। हुआ यों था कि उनकी पत्नी फगुनिया पहाड़ से गिर गई थीं और समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाने की वजह से प्रसव के दौरान मर गई थीं। तभी मांझी ने कसम खाई थी कि वे अट्टहास करते पहाड़ को तोड़ेंगे।

रास्ता बनाएंगे ताकि किसी और को शहर पहुंचने में उन जैसी तकलीफ से नहीं गुजरना पड़े। उन्होंने कसम खाई थी कि ‘जब तक तोड़ेंगे नहीं, तब तक छोड़ेंगे नहीं’। उन्होंने अपनी जिद पूरी की। इसमें 22 साल लग गए।
उन्होंने वजीरगंज को करीब ला दिया। पहाड़ तोड़ कर बनाए गए रास्ते को आजकल ‘दशरथ मांझी मार्ग’ कहते हैं। बिहार के गया जिले के इस अनोखे इंसान की कद्र मृत्यु के बाद हुई। अभी हाल में उनकी पुण्यतिथि के मौके पर जब फिल्म यूनिट के सदस्य बिहार गए तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी कार्यक्रम में हिस्सा लिया।
उनके नाम पर चल रही और आगामी योजनाओं की जानकारी दी। दलित नायक के प्रति जाहिर इस सम्मान में कहीं न कहीं आगामी चुनाव का राजनीतिक दबाव भी रहा होगा। बहरहाल, संभवत: ‘मांझी-द माउंटेन मैन’ हिंदी सिनेमा में दूसरी बॉयोपिक है, जो किसी दलित नायक पर बना है। पहली बॉयोपिक डॉ.अंबेडकर पर है।
दशरथ मांझी के इस बायोपिक में निर्देशक केतन मेहता ने गहरोल के समाज की पृष्ठभूमि ली है। जमींदार के अन्याय और अत्याचार के बीच चूहे खाकर जिंदगी चला रहे मांझी के परिवार पर तब मुसीबत आती है, जब दशरथ को उसका पिता रेहन पर देने की पेशकश करता है। दशरथ राजी नहीं होता और भाग खड़ा होता है। वह कोयला खदानों में सात सालों तक काम करने के बाद लौटता है। इस बीच गांव में कुछ नहीं बदला है। हां, सरकार ने छुआछूत खत्म करने की घोषणा कर दी है। दशरथ की खुशी तुरंत ही खत्म हो जाती है, जब जमींदार के लोग उसकी इसी वजह से धुनाई कर देते हैं। दशरथ मांझी किसी तरह गुजर-बसर कर रहा है। इसी बीच दुर्घटना में उसकी पत्नी का निधन हो जाता है। यह फिल्म दशरथ के प्रेम और संकल्प की कहानी है। दशरथ तमाम विपरीत स्थितियों में भी अपने संकल्प से नहीं डिगता। वह पहाड़ तोड़ने में सफल होता है।
दशरथ मांझी के प्रेम और जिद में एक सामुदायिकता है। वह अपने समुदाय और गांव के लिए रास्ता बनाने का फैसला लेता है। इस फैसले में उसकी बीवी फगुनिया उत्प्रेरक का काम करती है। लेखक-निर्देशक मनोरंजन की गरज से इस सामुदायिकता पर फोकस नहीं करते। वे दशरथ और उसकी बीवी फगुनिया के बीच के प्रेम और अंतरंग दृश्यों में रमते हैं। वे फगुनिया के शरीर का इस्तेमाल करते हें। इस कोशिश में फिल्म भटकती है। दोनों की प्रेमकथा रूहानी से अधिक जिस्मानी हो जाती है। हां,फगुनिया की मौत के बाद दशरथ की जिद और जोश के चित्रण में फिल्म उस सामुदायिकता की ओर लौटती है।
यह फिल्म पूरी तरह से नवाजुद्दीन सिद्दीकी के कंधों पर टिकी है। उन्होंने शीर्षक भूमिका के महत्व का खयाल रख है। उन्हें युवावस्था से बुढ़ापे तक के मांझी के चरित्र को निभाने में अनेक रूपों और भंगिमाओं को आजमाने का मौका मिला है। उन्होंने मांझी के व्यक्तित्व को समझने के बाद उसे प्रभावशाली तरीके से पर्दे पर उतारा है।
राधिका दी गई भूमिका के साथ न्याय करती हैं। उनके चरित्र को ढंग से विकसित नहीं किया गया है। फिल्म के बाकी किरदार गौण है। पंकज त्रिपाठी, तिंग्मांशु धूलिया और प्रशांत नारायण पिछली पहचानों की वजह से याद रहते हैं। केतन मेहता ने परिवेश और माहौल के लिए मांझी के गांव और उस पहाड़ को ही चुना है। उससे एक विश्वसनीयता बनती है। परिवेश का धूसर रंग कथा के भाव को गाढ़ा करता है।
’मांझी: द माउंटेन मैन’ में संवादों की भाषा किरदारों के अनुरूप नहीं है। खास कर उसकी अदायगी पर उचित ध्यान नहीं दिया गया है। अगर आप उस क्षेत्र से परिचित हैं, तो फिल्म की भाषा अखरती है।
अवधिः 124 मिनट 
*** 1/2 साढ़े तीन स्‍टार

संग-संग : दीया मिर्जा-साहिल संघा


दीया मिर्जा और साहिल संघा ने अपने प्रेम,विाह और स्‍त्री-पुरुष संबंधों पर खुल कर बातें कीं। यह सीरिज प्रेम के परतें खोलती है।21 वीं सदी में रिश्‍ते के बदलते मायनों के बीच भी प्रेम  स्‍पंदित होता है।
-अजय ब्रह्मात्मज
साहिल- सच की यह समस्या है कि एक बार बोल दो तो बताने के लिए कुछ नहीं रह जाता है। मैं दिया को एक कहानी सुनाने आया था। उस वक्त उन्हें वह कहानी पसंद आई थी। गलती से मैं भी पसंद आ गया था। तभी दीया ने अपनी कहानी सुनाई थी। उस कहानी पर भी मैं काम कर रहा था। स्क्रिप्ट लिखने के समय स्वाभाविक तौर पर हमारा समय साथ में बीत रहा था और हमारे कुछ समझने के पहले ही जैसा कि कहा जाता है कि होना था प्यार, हो गया
दीया:- वह एक लव स्टोरी थी। बहुत ही संवेदनशील किरदार थे उस कहानी के। इनके लिखने में जिस प्रकार की सोच प्रकट हो रही थी, वह सुनते और पढ़ते हुए मेरा दिल इन पर आ गया। फिल्म इंडस्ट्री में इतना समय बिताने के बाद हम यह जानते हैं कि लोग कैसे सोचते हैं और क्या बोलते हैं? किस मकसद से कहानियां लिखी जाती हैं? ऐसे में कोई एक अनोखा इंसान ऐसी कहानी और खूबसूरत सोच लेकर आ जाता है। इनकी कहानी में इमोशनल इंटेलिजेंस थी। उस इंटेलिजेंस ने मुझे खींचा। मैं इनके दिमाग के प्रति आकर्षित हुई। साहिल आकर्षक तो हैं हीं।

साहिल:- यह तो मैं कहने वाला था कि मेरे दिमाग ने ही इन्हें प्रभावित किया होगा। बाकी तो मेरे पास कुछ है नहीं।

दीया- एक तहजीब थी इनमें। आजकल इतनी तहजीब के लड़के कम ही मिलते हैं। मेरे लिए वह बहुत रिफ्रेशिंग बात थी। हो सकता है ऐसे लोगों से मेरा संपर्क नहीं रहा हो या फिर हमारी इंडस्ट्री में ज्यादातर लोग कैजुअल होते हैं। सभी अपने डर और असुरक्षा में घिरे रहते हैं। कुछ लोग अपने आत्मविश्वास की कमी भी छिपाने के लिए करते हैं। उसमें कोई बुराई नहीं है। इसके पहले मेरे साथ ऐसा कभी नहीं हुआ था। एक इंसान से मैं मिली और उसे ज्यादा से ज्यादा जानने के लिए उत्सुक हो गई। मैं इनकी सोच समझना चाहती थी। इनके साथ वक्त बिताना अच्छा लगने लगा। हम लोग मानसिक तौर पर जुड़ गए थे। उन दिनों मैं चार फिल्मों की शूटिंग कर रही थी। मेरा ज्यादातर समय सफर में गुजर रहा था। अरशद वारसी के साथ हम तुम और घोस्टकी शूटिंग न्यू कासल में चल रही थी, ‘एसिड फैक्ट्रीपर काम चल रहा था। शुजित सरकार की फिल्म की शू बाइटकी शूटिंग चल रही थी। काम के फ्रंट पर सब कुछ गतिमान था, लेकिन निजी और मानसिक स्तर पर साहिल सब कुछ लेकर आए। हमारे बीच प्यार से पहले अटूट सम्मान पैदा हुआ।
साहिल- मिलने से पहले मैं किसी के बारे में कोई राय नहीं रखता। मिलने के बाद ही तय होता है कि किसी खास आदमी से आप की क्या ट्यूनिंग है? उससे आप की जिंदगी में महत्व तय होता है। यह बहुत जरूरी है। दीया से मिलते समय मैं घबराया हुआ था। घबराहट इस बात की थी कि दीया कैसे रिएक्ट करेंगी? दीया से मिलना अच्छा लगा था। इनमें एक नजाकत और तहजीब है। वह अच्छे तरीके से पेश आती हैं। ध्यान से बातें करती हैं। फोन पर ही मैंने महसूस कर लिया था कि दीया जमीनी हस्ती हैं। फोन पर हुई बातचीत में मिलना तय हो गया। कोई रद्दोबदल नहीं हुआ। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में लोगों का मिलना ही एक बड़ी मुसीबत होती है और मुझे पता था कि कैसे दो-तीन रद्दोबदल के बाद मिलना ही रद्द हो जाता है। दीया से तय दिन को ही मुलाकात हुई। उन्होंने मीटिंग सिर्फ पैंतालिस मिनट आगे बढ़ाने की मोहलत मांगी थी। पहला इंप्रेशन अच्छा हुआ था। मुलाकात के दिन का क्या कहूं दीया तो हैं हीं खूबसूरत। यह कोई नई बात नहीं है। मेरी सारी चिंता यह थी कि मिले हुए दो घंटे में मैं अपनी कहानी सुनाते हुए इन्हें प्रभावित कर लूं। मैं पन्नों में डूबा रहा। कहानी सुनाना बहुत ही ऊबाऊ प्रक्रिया है। इमोशन के साथ 120 पेज सुनाना आसान काम नहीं। कहानी के आखिरी हिस्से तक आते-आते दीया की आंखों से आंसू टपकने लगे। मैं घबरा गया कि क्या इतनी बेकार कहानी है कि ये रो रही हैं? कहानी लिखते समय लेखक भावनाओं में उतना नहीं डूबता। लिखते-लिखते वह भावहीन हो जाता है। दीया को सुनाने के बाद मुझे लगा कि सचमुच मैंने कुछ अनोखा लिख दिया है। कहानी सुनने के बाद दीया ने थोड़ा समय मांगा। उन्होंने आंसू पोंछे। वह फ्रेश होकर आईं और फिर उन्होंने कहानी की विशेषाओं की चर्चा की। उससे यह भी समझ में आया दीया खुद कितनी संवेदनशील हैं? उस कहानी का टायटिल था कुछ इस तरह। वह एक शादीशुदा दंपति की कहानी थी।
दीया- उन पति-पत्नी के पास सब कुछ था, लेकिन उनका दांपत्य सही नहीं जा रहा था। उनके पास रिश्ते, नौकरी, सुरक्षा सब था, लेकिन कुछ मिस कर रहा था। दूसरी तरफ एक और जोड़ी थी, जिनके पास कुछ नहीं था और वे शादीशुदा भी नहीं थे, लेकिन वे अपने संबंधों में सुखी व सफल थे।
साहिल- वह रिश्तों की कहानी थी। गुड लुक, केमिस्ट्री आदि कहने की बातें हैं। समय बीतने के साथ ये चीजें बदल जाती हैं। असल चीज है ट्यूनिंग। मतलब कि आप के फंडे मिलते हैं। एक-दूसरे की सोच को समझते और सराहते हैं। दीया और अपनी बात कहूं तो हमारे फंडे काफी मिलते-जुलते हैं, लेकिन उनके अमल में हमारी भिन्नताएं जाहिर होती हैं। हम कभी सहमत होते हैं और ज्यादातर असहमत होते हैं। एक-दूसरे से बातें करते हुए हमने खुद को समझा। शुक्र है कि दीया उन दिनों न्यू कैसल(इंग्लैंड) में शूट कर रही थीं। अगर कहीं अमेरिका में शूटिंग होती तो मेरी हर रात बातों में ही निकल जातीं। मैं जागता रहता।
दीया- उस स्क्रिप्ट पर तो फिल्म नहीं बन सकी, लेकिन हम साथ रहने लगे और फिर शादी भी हो गई। मुझे लगता है वह फिल्म बननी चाहिए।
साहिल- फिल्म तो बन ही जाती, लेकिन तभी मंदी चालू हो गई थी। उस समय के हिसाब से मेरी फिल्म थोड़ी महंगी थी। मुझे लगता है कि अब उस कहानी का सही वक्त आया है। मैं ज्यादा अनुभवी हो गया हूं। दीया का भी अनुभव बढ़ा है। अब हमारी एक कंपनी है। हम उस फिल्म को ज्यादा बेहतर तरीके से बना पाएंगे। मेरी फिल्म बायलिंगुअल थी। तब तो सोचा गया था कि अंग्रेजी संवाद हिंदी में लिखे जाएंगे, लेकिन अब मुझे लगता है कि वह फिल्म वैसे ही बन सकती है।
दीया- उस कहानी में बहुत खूबसूरत विरोधाभास है। हम सभी पूंजीवादी आर्थिक व्यवस्था में जी रहे हैं। उपभोक्ता समाज में रहते हैं। हमें हर मोड़ पर और..और.. और बताया जाता है। हम जानते भी नहीं और हम लालच करते हैं। उस कहानी में बताया गया है कि कामयाबी हासिल करने के चक्कर में रिश्ते भुन जाते हैं। सच्चाई यह है कि इंसान को खुशी देने वाली छोटी-छोटी बातों के लिए पैसे नहीं खर्च करने पड़ते। यह बहुत महत्वपूर्ण सोच है।
दीया- उस कहानी में बहुत खूबसूरत विरोधाभास है। हम सभी पूंजीवादी आर्थिक व्यवस्था में जी रहे हैं। उपभोक्ता समाज में रहते हैं। हमें हर मोड़ पर और..और.. और बताया जाता है। हम जानते भी नहीं और हम लालच करते हैं। उस कहानी में बताया गया है कि कामयाबी हासिल करने के चक्कर में रिश्ते भुन जाते हैं। सच्चाई यह है कि इंसान को खुशी देने वाली छोटी-छोटी बातों के लिए पैसे नहीं खर्च करने पड़ते। यह बहुत महत्वपूर्ण सोच है। मेरे करियर के आरंभ से डायरेक्टर, टेक्नीशियन और दूसरे संबंधित लोग हमेशा मुझे नोट भेजते थे कि तुम बहुत खूबसूरत हो। तुम सफल हो। तुम्हें किसी बहुत अमीर आदमी से शादी करनी चाहिए। बिजनेसमैन हो, उद्योगपति हो जो भी हो, उसके पास पैसे हो। मुझसे कहा जाता था कि तुमने छोटी उम्र से काम शुरू  किया। सेल्फ मेड हो, लेकिन अब किसी ऐसे आदमी से शादी करो कि रानी की तरह जिंदगी बिता सको। मैं उनसे यही कहती थी कि आप सभी मेरी शादी किसी इंसान से नहीं, बल्कि पैसों से कराना चाहते हैं। आप की नोट में कभी यह नहीं लिखा होता कि किसी सच्चे इंसान से शादी करो। ऐसा सच्चा इंसान, जिसकी सोच अच्छी हो। फैमिली अच्छी हो। वह खुद अच्छा हो। हमारी इंडस्ट्री में एक्ट्रेस के बारे में ऐसे ही सोचा जाता है। हमारे ऊपर दवाब रहता है कि हमारी शादी इसलिए किसी अमीर से होनी चाहिए कि बाद की जिंदगी में कोई तकलीफ न हो। मेरा यही सवाल रहता था कि अगर मेरे मां-बाप ने मुझे पूरी आजादी दी है। मुझे यह सिखाया है कि अपने दम पर कामयाबी हासिल करो तो शादी के बाद इस सोच में क्यों बदलाव आए? मैं क्यों अपनी आजादी और उद्यमशीलता खो दूं। मैं पैसे कमाना क्यों छोड़ दूं? मेरी पहचान मेरे पार्टनर की आमदनी से क्यों जुड़े? शुरू से मैं थोड़ी विद्रोही रही हूं। मैं जानती हूं कि आज की लड़कियों पर बंदिशें लगा दी जाती हैं कि आप ऐसे आदमी से शादी करिए, जिसकी आमदनी अच्छी हो।
साहिल- ऐसी सोच में बदलाव लाना जरूरी है। अपने देश में अवसरों की कमी नहीं है। युवकों-युवतियों को उन अवसरों के बारे में सोचना चाहिए। पार्टनर के साथ अपनी ट्यूनिंग देखनी चाहिए। एक कनेक्ट बन जाए तो अपनी जिंदगी में आप जो भी हासिल करोगे, उसका आनंद उठा पाओगे। दीया मूल्यों पर ज्यादा जोर दे रही हैं।
दीया- बिल्कुल। मैं संबंधों में भौतिकवादी रवैया पसंद नहीं करती।
साहिल- असल चीज है नीयत।
दीया- हां..। नीयत सही होनी चाहिए। बाकी चीजें तो आती-जाती रहेंगी। नीयत सही हो। दोनों क्या कर रहे हैं? क्या कमाते हैं? इन चीजों से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। हम जिस पीढ़ी के हैं। उसके पास पूर्वजों की अचल संपत्ति नहीं है। गहने-जेवर नहीं हैं। हमारी पीढ़ी के लड़के-लड़कियों ने खुद को बनाया है। अपने बलबूते पर सुख जुटाया है। अपनी पसंद से सारे काम कर रहे हैं। शादियां कर रहे हैं। फिर नीयत की ईमानदारी जरूरी चीज हो जाती है। वह रहे तो सब कुछ हासिल हो जाता है। मूल्यों से संबंध बने तो ठीक रहता है। नहीं तो उसमें कीड़े पड़ जाते हैं। गंध आने लगती है। सब कुछ खोखला हो जाता है।
साहिल- दीया की बातों से लग सकता है कि  यह सब शहरी बातें हैं। मेरा अनुभव यही कहता है कि छोटे-बड़े सभी शहरों में यूथ ऐसा ही सोच रहा है। सभी अपने बलबूते पर आगे बढ़ रहे हैं। अखबारों में किस्से आते हैं कि कैसे गरीब तबके के बच्चे बड़ी कामयाबी हासिल कर रहे हैं। वे आईआईटी में जा रहे हैं।
दीया- मेरे बावर्ची के बेटे आईआईएम जा रहे हैं। मुझे तो बहुत अच्छा लगता है। जिस दिन मैंने सुना उस दिन मैं खुशी से झूम उठी थी।
साहिल- दीया बेहतर इंसान हैं। भले ही उनका नाम दीया मिर्जा रहा हो या अभी दीया मिर्जा संघा हो गया हो, वह दीया कपूर या दीया खान होती तो भी दीया ही होती। तब हमारी मुलाकात शायद किसी और तरीके से होती। वह जिस अदब और रुआब के साथ पेश आती हैं, वह उनकी खासियत है। वह किसी और प्रोफेशन में होती तो भी ऐसी ही रहती। मेरे मन में यह ख्याल कभी नहीं आया कि मैं दीया मिर्जा अभिनेत्री से मिल रहा हूं।
दीया- मैं आप की जिंदगी की बेहतरीन लड़की रही हूं।
साहिल- आप आज भी बेहतरीन हो।
दीया- लेकिन आप मेरी जिंदगी के बेहतरीन लड़के हैं।
साहिल-दीया से मेरी मुलाकात 27 साल की उम्र में हुई थी। मैं बहुत यंग था। तब तक मैंने नहीं सोचा था कि 30 के पहले शादी करूंगा। और फिर दीया के डैड ने उन्हें समझाया था कि किसी भी लड़के के साथ तीन साल रहने के बाद ही शादी का फैसला करना। तीन सालों में उसके सारे तेवर पता चल जाएंगे। ऐसी सलाह देने वाले कितने डैड होंगे।
दीया- किसी भी पिता के द्वारा दिया गया यह बोल्डेस्ट एडवाइसहै। उन्होंने छोटी उम्र में ही यह नेक सलाह दी थी कि कोर्टशिप का समय रखना। सांस्कृतिक रूप से पहले सभी देशों में इसका पालन होता था। पहले मंगनी होती थी, फिर शादी होती थी। दोनों के बीच लंबा गैप होता था। अभी यह दोनों रस्मी हो गया है। पहले लड़के-लड़की को अपने मंगेतर के साथ समय बिताने का मौका दिया जाता था। इस दरम्यान बातचीत से एक-दूसरे को भली-भांति समझ जाते थे। अगर कोई एक संबंध तोड़ता था तो दूसरा बुरा नहीं मानता था। उन फैसलों का आदर किया जाता था। होता भी यही है कि शुरूआत में सभी अपना सुंदर और शिष्ट व्यवहार पेश करते हैं। तब इंप्रेशन जमाने की कोशिश होती है और यह दोनों तरफ से होता है। जब दोनों तरफ से नेचरल साइड दिखने लगता है तब भी क्या दोनों एक-दूसरे को स्वीकार कर पाते हैं? क्या आप के झगड़ों में आदर था? हर संबंध में झगड़े होते हैं और वह जरूरी भी है लेकिन आदर नहीं खत्म होना चाहिए। मर्यादा का पालन होना चाहिए। झगड़े के बाद कितनी जल्दी एक-दूसरे की बात मान लेते हैं या मना लेते हैं। क्या ईगो कहीं आता है? मेरे ख्याल में यह हर संबंध में जहर होता है। डैड ने कहा था कि तीन सालों में सारी हकीकत सामने आ जाएगी, क्योंकि कोई भी इंसान तीन सालों तक नाटक नहीं कर सकता या कर सकती है।
‘’

साहिल- उसके लिए जरूरी यह है कि दोनों साथ में समय बिताएं। अब आप का मंगेतर अगर पायलट हो गया तो वह ज्यादातर हवा में ही रहेगा। बात ही नहीं हो पाएगी। लड़की के साथ भी ऐसी बात हो सकती है। दीया से पहले मुलाकात के बाद ही हम दोनों बहुत ज्यादा एक-दूसरे के साथ रहे। हम लोग साथ में पिक्चर बना रहे थे तो हर लेवल पर एक-दूसरे का एक्सपोजर हो रहा था। सहमति-असहमति से स्वभाव पता चल रहा था। हम दोनों को माता-पिता का आर्शीवाद मिला हुआ था। हमारे परिवार के लोग साथ में थे। एक-दूसरे के प्रति हमारे मन में आदर था। ऊपर से मैं रस्मी और दिखावटी नहीं हूं। हमें शादी की कोई हड़बड़ी नहीं थी। शादी हमारे लिए संबंधों पर लगी मुहर नहीं थी। दीया की मां ने बहुत अच्छी बात कही थी उनसे जब तारीखों की बात चल रही थी तो उन्होंने दो टूक कहा था कोई भी तारीख रख लो, क्या फर्क पड़ता है? मेरे लिए तुम दोनों शादीशुदा हो।
दीया- बिल्कुल। हम दोनों एक रिश्ते में थे। अटूट रिश्ते में थे। सात सालों तक साथ रहे। उन सात सालों में हमने कंपनी खोली। दो फिल्में बनाईं। हम दुनिया की नजरों में एक थे और परिवार के लिए एक कपल। दोनों परिवारों में हमारा आना-जाना था। हमारे बीच एक होने का बहुत खूबसूरत एहसास था। फिर शादी करने की क्या जरूरत थी? कोई पूछ सकता है। मुझे लगता है कि लड़कों के लिए कोई खास बात नहीं होगी, लेकिन लड़कियों के लिए शादी का माहौल और जश्न यादगार होता है। सभी जमा होते हैं और हमारे साथ होने का गवाह बनते हैं। सभी के सामने पार्टनरशिप शुरू होती है। यह एहसास बहुत ही अध्यात्मिक है। हम जिन चीजों में यकीन करते हैं, शादी उन्हें ठोस बना देती है। शादी की घटना से साहिल के प्रति मेरे प्यार में कमी या इजाफा नहीं हुआ है। जो पहले था, वह आज भी है और सच कहूं तो रोज थोड़ा बढ़ता है।
साहिल- शादी वास्तव में स्प्रीचुअल रिमांइडर है।
दीया- हमने आर्य समाजी तरीके से शादी की थी। वेदों की ऋचाएं सुनते समय सुकून और सुंदर लग रहा था। हम उन ऋचाओं को दोहरा रहे थे। सभी उस माहौल और एनर्जी का हिस्सा बने हुए थे। हर तरफ खुशी बरस रही थी। सभी को साथ लाने और उनके सामने एक-दूसरे के होने की कसमें खाने को ही शादी का समारोह कहते हैं। शादी का असली मतलब उस समारोह से आगे होता है। सच कहूं तो शादी तो हमारी बहुत पहले ही हो गई थी। न मैं किसी और के बारे में सोचती थी और न साहिल। हमने ऑप्शन ओपन ही नहीं रखा था। आजकल यह बहुत सुनाई पड़ता है। मुझे हैरत होती है। मेरी समझ में नहीं आता कि किसी से प्यार होने के बाद आप किसी और की तरफ देख भी कैसे सकते हैं? यह एहसास मन में आ भी कैसे सकता है? फिर खुद को ही समझा लेती हूं कि उपभोक्ता समाज में यह मुमकिन है। शादी किसी भी लड़के के लिए उसके संबंध की वैधता पर लगी मुहर है।
साहिल- यह बन गया है। मैं तो प्यार और संबंध में किसी ऐसे मुहर पर यकीन नहीं करता। मेरे लिए शादी एक-दूसरे के साथ किए गए वायदे को पूरा करना है। मुझे तो चर्च की शादी का सिंपल तरीका बहुत अच्छा लगता है। उसमें दिखावा नहीं रहता है। पादरी एक-दूसरे से पूछता है और शादी करवा देता है।
दीया- मेरी वेडिंग प्लानर ने कहा कि बहुत समय के बाद मैं किसी ऐसी शादी का हिस्सा बनी हूं, जिसका हर पल स्प्रीचुअल था। इस शादी में कुछ भी दिखावे के लिए नहीं हो रहा था। हम किसी से कुछ भी अच्छा नहीं करना चाहते थे। ना हमारी कोई जिद थे कि फलां-फलां को शादी में बुलाएंगे या ले आएंगे। दुर्भाग्य से इन दिनों शादियां दिखावा हो गई हैं। शादियों में नेता और अभिनेता बुलाए जाते हैं। दोस्तों और मातहतों पर दवाब डाला जाता है कि वे किसी पॉपुलर पर्सनैलिटी को शादी में ले आएं। ऐसा नहीं होना चाहिए।
            दीया-  प्रेम मेरे लिए मर्यादा है। मर्यादा और सम्मान न हो तो प्रेम नहीं हो सकता। खूबसूरत रिश्ते में कोई अहम नहीं होना चाहिए। सिर्फ आदर होना चाहिए। क्या किसी बच्चे को गोद में उठाते समय मैं का एहसास रहता है? प्रेम में भी मैं नहीं आना चाहिए।
साहिल- सम्मान और आदर के साथ एक-दूसरे के साथ रहने और आगे बढ़ने की इच्छा होनी चाहिए। आगे बढ़ने का मतलब एक ही राह पर बढ़ना नहीं है। आगे बढ़ते हुए एक-दूसरे को थामे रखना काफी है। शेयरिंग से प्यार बढ़ता और मजबूत होता है। प्यार एक जर्नी है।
दीया- प्यार का मतलब यह नहीं है कि मन में तितलियां उड़ रही हैं। प्यार बिजली या रसायन भी नहीं है। प्यार अनुमान और उतावलापन भी नहीं है। जब मैं निकल जाए और हम बच जाए तो समझिए प्यार हो गया है।
            दीया- मेरी समझ में आज तक नहीं आया कि लोग ऐसा क्यों कहते हैं कि हमेशा आप का पार्टनर किसी और प्रोफेशन का होना चाहिए? एक ही प्रोफेशन के हों तो बहुत जोश रहता है। हम दोनों एक तरह की फिल्में बनाना चाहते हैं। अच्छी कहानियां सिनेमा में ले आएं। इस कोशिश में हम एक-दूसरे के बारे में भी नई बातें जानते हैं। कुछ नया डिसकवर करते हैं। खूबसूरत जुगलबंदी हो जाती है। मेरा तो एक ही मंत्र है कि ईगो संभाल लो, बाकी सब संभल जाएगा।
साहिल- आप एक ही प्रोफेशन के हों या अलग-अलग के, संबंध और रिश्ता सहकर्मियों से बनेगा ही। उनसे एक दोस्ती होनी चाहिए।
दीया- हम दोनों बहुत अच्छे दोस्त हैं। हम बहस करते हैं। एक-दूसरे को नाराज करते हैं। फिर मना लेते हैं या मान जाते हैं। साथ में मिलकर ख्याली पुलाव पकाते हैं। सपने बुनते हैं। अगर हमें कोई सोच अच्छी लग जाए तो हम उस पर घंटों बातें कर सकते हैं। साहिल अगर लेखक नहीं होते तो भी हमारे बीच इसी तरह की बातें होती, क्योंकि हमारे अंदर के तार एक तरह से बने हुए हैं। मैं ऐसे दंपतियों को जानती हूं, जो घर लौटकर काम के बारे में बिल्कुल बातें नहीं करते। मेरा सवाल है कि भई ऐसा क्यों? अगर काम में इतनी खूबसूरती है तो घर पर काम की बातें क्यों नहीं? काम की खुशी को दफ्तर में क्यों छोड़ दें? दुख-दर्द शेयर करने में भी तो आगे बढ़ते हैं। साहिल सिर्फ फिल्मों से जुड़े हुए हैं। मेरे साथ सुविधा है कि मैं कुछ और भी करती हूं। मैं बहुत इंटरेस्टिंग लोगों से मिलती हूं? उनकी कहानियों के साथ मैं घर वापस आती हूं। साहिल कहानियां लिखते हैं और मैं साहिल को दुनिया की कहानियां बताती हूं। साहिल की पढने में दिलचस्पी है। हमारी जिंदगी एक कहानी की नींव पर टिकी है। बचपन से मुझे साहिल की तरह ही कहानियों से लगाव है।
साहिल- साथ में काम करने के अपने मजे हैं। मैं दीया की बातें ही दोहराऊंगा। हम अपनी उम्र के साथ ही चलें तो बेहतर। मैं 18 साल के लड़कों की तरह नहीं सोच सकता और न ही यह चाहूंगा कि वे मेरी तरह सोचें।
दीया- मुझे कहने में कोई हिचक नहीं है कि साहिल से मिलने के समय मैंने महसूस किया कि मैं स्कूल गर्ल हूं¸। खुद कर टीनएजर महसूस किया। इन्होंने मुझे ऐसा एहसास कराया।

दीया- प्यार बताने या जाहिर करने की जरूरत नहीं पडी। एक अनकही समझदारी बन गई थी? हम जिंदगी की बातें करते थे। अपने अनुभवों की बातें करते थे। अपनी इच्छाओं और चाहतों की बातें करते थे। हमारी प्रेमकहानी में आरंभ से ही एक प्रगति थी। मुझे याद नहीं कि मैंने कभी आई लव यूकहा होगा। दो बार की मुलाकात के बाद मैंने इन्हें कहानी की एक किताब गिफ्ट की थी इन टू द वाइल्ड। उस पर मैंने एक संदेश लिखा था-हैप्पीनेस कैन वनली एक्जिस्ट इफ यू हैव समवन टू शेयर इट विथ। मे यू फाइंड दैट समवन टू शेयर योर हैप्पीनेस विथ।तब तो मुझे मालूम भी नहीं था कि ये किसी रिलेशनशिप में हैं या अकेले हैं। इनकी जिंदगी में क्या चल रहा है? बस,इतना पता था कि ये बहुत खूबसूरत दिमाग और दिल के आदमी हैं।
साहिल- हम दोनों में विचारों की शेयरिंग चल रही थीं। दीया कुछ फिल्में बताती थीं। मैं कुछ फिल्में सुझाता था। फोन पर चल रही लंबी बातों से लगने लगा था। दीया लौटीं तो मिलने के बाद प्यार का एहसास बढा। हम दोनों की मुलाकातें बढ गईं। मैं आज तक दीया को कह ही रहा हूं। अभी तक ठीक से नहीं कह पाया। इतना कह सकता हूं कि मेरे प्रेम में निरंतरता है।
दीया- साहिल एकबारगी कुछ भी नहीं कहते या करते। धीरे-धीरे सब कुछ जाहिर करते हैं। धमाके से कुछ कह दो तो उसे जिंदगी भर निभाना मुश्किल होता है।
साहिल-मैं तो हमेशा कहता हूं कि अपने पार्टनर के बारे में पॉजीटिव रहें। किसी एक बात से अपसेट हैं तो बाकी सात बातें याद कर लें,जिनसे खुश हैं। किसी एक पर अटकने का मतलब है कि आप जिद कर रहे हैं। प्रेम तो हमेशा वर्क इन प्रोग्रेस की तरह होता है।
साहिल-शादी के बाद हमारे बीच एक-दूसरे को स्पेस देने की बात पर कभी हंगामा नहीं हुआ। एक बार कपबोर्ड में स्पेस को लेकर कुछ बातें हुई थीं। स्पेस तो मिल जाता है।
दीया- यह पर्सनैलिटी से जुड़ा है। खलील जिब्रान ने लिखा था- ड्रिंक टुगेदर,बट डोंट ड्रिंक फ्राम द वन कप। शदी का मतलब 1 बटा दो नहीं होता। सब कुछ शेयर करना है,लेकिन अपनी इंडिविजुअलिटी बचाए रखना है। दोनों शादी में कुछ जोडें¸। साहिल की अपनी पर्सनैलिटी है? वह मैं उनसे नहीं छीन सकती। साहिल भी मुझ से नहीं ले सकते। ढेर सारे लोग अपने पार्टनर को अपने जैसा बनाने की कोशिश में उसे खो देते हैं। या फिर यह सोचते हैं कि हर चीज शेयर करनी चाहिए। मैं घंटों अकेले रहती हूं। वह समय मेरे लिए बहुत खास है। अकेले बैठे किताबें पढ़ना भी जरूरी है। हमेशा हाथ पकड़े बैठे रहने का क्या मतलब है। रोजगार तो करना पड़ेगा। सब कुछ साथ करेंगे तो एक-दूसरे को क्या बताएंगे? एक -दूसरे की ग्रोथ को कैसे समझेंगे? टू मच एग्रीमेंट किल्स ए चैट।
दीया-लड़कियों को केवल यह देखना चाहिए कि उसका प्रेमी आदर देता है या नहीं? आरंभ का आकर्षण खत्म हो जाता है। दोनों एक-दूसरे को आदर देने के साथ परिवारों को भी आदर दें। बाकी सब ठीक हो जाता है? इंटेग्रिटी,ओनेस्टी और रेसपेक्ट ¸ ¸ ¸ये तीन गुण मैंने देखे थे। ये तीनों गुण हों तो लड़का हस्बैंड मैटेरियल होता है। कैफी आमी ने लिखा थ न- उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तूझे। आदमी और औरत दोनों समान हैं। दोनों एक-दूसरे को समान आदर दें तो हर मुश्किल जीत जाएंगे।
साहिल- किसी भी देश में मर्द को सारी बातें देरी से समझ में आती हैं। मैं तो चाहूंगा कि लड़की पहले ले खुद से प्रेम करती हो। वह ऐसी हो कि लड़का झख मार कर आए। सभी को दीया जैसी लड़की नहीं मिल सकती। यह सच है। दीया के व्यक्तित्व में उनके माता-पिता की दी गई नसीहत है। उन्हें अच्छी परवरिश दी। तभी तो मैं आकर्षित हुआ। दीया की अपनी पहचान है। लड़की ऐसी हो, जो खुद से प्यार करती हो। खुद पर ध्यान देती हो। व्यक्तित्व ऐसा हो, जो कोई उससे इंकार न कर सके।
दीया- साहिल आप ऐसे देश में हैं, जहां सभी मर्दों की अपेक्षा रहती है कि औरतों में सारे गुण हों। फिर लड़कियों में क्या गुण देखे जाएं कि उनसे शादी की जाए। मर्द खुद को श्रेष्ठ और अधिकारी मानते हैं। आप की परवरिश ऐसी रही कि आप में ये बातें नहीं हैं।
साहिल- मर्दों पर उनकी परवरिश का ही असर होता है। मैं तो यही कहूंगा कि हर माता-पिता अपनी लड़कियों को ऐसे पाले कि वे खुद अपने लायक लड़कों को चुन सके। लड़की जागरुक और स्वतंत्र होगी तो लड़कों को झुकना पड़ेगा। मैं तो देखता हूं कि हमारे समाज में लड़के भी ढंग से बड़े नहीं हो पाते। अपनी मेहनत से सब कुछ हासिल करने के बाद शादी के बाद आते ही माता-पिता की रुचि का ख्याल रखने लगते हैं। दरअसल वे बेवकूफ और कमजोर होते हैं। वे अपनी जिंदगी का बड़ा फैसला खुद नहीं ले पाते।
दीया- किसी भी सोसायटी की नींव बदलनी हो तो सबसे पहले औरतों केा बदलना होगा। उसकी सोच व नजरिए में बदलाव आ जाए तो सब कुछ बदल जाएगा। देखें तो हर लड़के की मां एक औरत ही होती है। लड़के मां से ही सीखते हैं। मैंने देखा है कि माएं अपने बेटे-बेटियों को अलग-अलग नजरिए से पालती हैं। मां की तरफ से दी गई ढील लड़कों को ऐसा मर्द बना देती है, जो अपनी बीवी व बेटी को समान नहीं समझते। उनके लिए लड़कियां उपभोग की चीजें होती हैं। शारीरिक संतुष्टि और प्रजनन मात्र के लिए लड़कियों की जरूरत रह जाती है। लड़कियां सिर्फ वंश बढ़ाने के लिए नहीं होती हैं। मर्दानगी इसमें नहीं है कि आप औरतों के साथ क्या व्यवहार करते हैं? मर्दानगी इसमें देखनी चाहिए कि आप खुद क्या हैं?
साहिल- मैं तो यही कहूंगा कि लड़कियां सशक्त और स्वतंत्र हों तो लड़कों की कथित मर्दानगी खुद ही खत्म हो जाएगी। वे लड़कियों की इज्जत करने लगेंगे।
दीया- एक सवाल और है कि संविधान से जो अधिकार लड़कियों को मिले हैं, उनका वे गलत इस्तेमाल भी कर रही हैं। यह असंतुलन का नतीजा है। झूठे इल्जाम में पति या प्रेमी को फंसाना उतना ही गलत है, जितना लड़कियों को ओछी नजर से देखना। हम सभी सौहार्द से रहें। एक दूसरे को सम्मान और अधिकार दें। तभी लड़के-लड़कियों में समानता की बात मुमकिन होगी। जरूरत है कि हम किसी के साथ बुरा व्यवहार न करें।
साहिल-संक्षेप में हमें नियंत्रण के लोभ से बचना चाहिए। संबंधों में ज्यादातर दिक्कतें यहीं से पैदा होती हैं।

Thursday, August 20, 2015

मायानगरी के दिल में धड़क रही दिल्‍ली - मिहिर पांड्या

मिहिर ने यह लेख मेरे आग्रह पर फटाफट लिखा है। मिहिर ने शहर और सिनेमा पर शोधपूर्ण कार्य और लेखन किया है। फिल्‍मों के प्रति गहन संवेदना और समझ के साथ मिहिर लिख रहे हैं और अच्‍छा लिख रहे हैं। 

-मिहिर पांड्या 

दिल्ली पर बीते सालों में बने सिनेमा को देखें तो दिबाकर बनर्जी का सिनेमा एक नया प्रस्थान बिन्दु नज़र अाता है। लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा में दिल्ली के एकाधिकार के मज़बूत होने का भी यही प्रस्थान बिन्दु है, जिसके बाद दिल्ली को केन्द्र में रखकर बनने वाली फ़िल्मों की बाढ़ अा गई। इसके पहले तक दिल्ली शहर की हिन्दी सिनेमा में मौजूदगी तो सदा रही, लेकिन उसका इस्तेमाल राष्ट्र-राज्य की राजधानी अौर शासन सत्ता के प्रतीक के रूप में होता रहा। राजकपूर द्वारा निर्मित पचास के दशक की फ़िल्म 'अब दिल्ली दूर नहीं' में वो अन्याय के खिलाफ़ अाशा की किरण बन गई तो सत्तर के दशक में यश चोपड़ा की 'त्रिशूल' में वो नाजायज़ बेटे के पिता से बदले का हथियार। इस बीच 'तेरे घर के सामने' अौर 'चश्मेबद्दूर' जैसे अपवाद भी अाते रहे जिनके भीतर युवा अाकांक्षाअों को स्वर मिलता रहा।

लेकिन दिबाकर बनर्जी की 2006 में अाई 'खोसला का घोंसला' लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा में दिल्ली को देखने की नई नज़र लेकर अाई। दिबाकर ने दिल्ली के साथ जुड़ी इतिहास अौर सत्ता की पुरानी जड़ पहचान से अपने सिनेमा को बाहर निकालने के लिए एक मज़ेदार काम किया। उन्होंने दिल्ली के तमाम जाने-पहचाने विज़ुअल प्रतीकों को अपनी फ़िल्म से बाहर कर दिया। उनकी दिल्ली में ना इंडिया गेट दिखाई देता है ना राष्ट्रपति भवन। ना कुतुब मीनार दिखाई देता है ना लाल किला। ऐसा कर दिबाकर दिल्ली शहर का अाम जनमानस अौर उसके भीतर मौजूद रोज़मर्रा की गैर बराबरियाँ दर्शकों के सामने ला पाए। 'खोसला का घोंसला' एक सामान्य से दिखते शहरी मध्यमवर्गीय परिवार की कथा है जिसकी एकमात्र ख्वाहिश रिटायरमेंट के बाद 'साउथ दिल्ली' में अपना तिमंज़िला मकान है।  उनकी दूसरी फ़िल्म दिल्ली की अवैध कॉलोनियों में बसे निम्न मध्यमवर्गीय शहर का अब तक अनदेखा चित्र है। 'अोये लक्की लक्की अोये' अाधुनिक शहरी संरचना के केन्द्रीय तत्व 'नागरिक समाज' की अालोचना है अौर इस सभ्य दिखते ढांचे के भीतर मौजूद अमानवीयता को एक चोर की कथा के माध्यम से उजागर करती है। दिबाकर के साथ अाई निर्देशकों की नई पीढ़ी में ज़्यादातर दिल्ली में पढ़े थे अौर उनकी अपने सिनेमा में दिल्ली की अोर परागमन की यह भी एक वजह रही।

दिबाकर के बाद हबीब फैज़ल हैं। 'दो दूनी चार' तथा 'बैंड बाजा बरात' में उन्होंने दिल्ली के मध्यवर्गीय जीवन अौर उनकी अाकांक्षाअों को अपने सिनेमा की कथाअों में पिरोया। 'दो दूनी चार' एक प्राइवेट स्कूल में गणित पढ़ाने वाले मास्टर की कथा है जो समाज में सम्मान हासिल करने के लिए एक अदद कार खरीदना चाहता है। 'बैंड बाजा बरात' के युवा शादी करवाने के बिज़नस के चैम्पियन बन 'जनकपुरी' से 'सैनिक फॉर्म' का उर्ध्वगामी सफ़र तय करना चाहते हैं। इसके साथ इंडी सिनेमा के सबसे बड़े नाम अनुराग कश्यप हैं जिनकी 'देव डी' में पहाड़गंज की अंधेरी गलियाँ पतनशील कलकत्ता का अाधुनिक प्रतीक बन जाती हैं। इम्तियाज़ अली की 'लव अाजकल' अौर 'रॉकस्टार' जैसी फ़िल्मों में दिल्ली प्रेम के पनपने, परवान चढ़ने अौर दिल के टूट जाने का शहर है। जैसे ये फ़िल्में उनके द्वारा अपने पुराने शहर को लिखे प्रेमपत्र हों। राकेश अोमप्रकाश मेहरा की 'दिल्ली 6' भी शहर में अाधुनिकता अौर परंपरा के संगम अौर सामुदायिकता के भाव की गहराई को दिखाती है। राजकुमार गुप्ता 'नो वन किल्ड जेसिका' में दिल्ली शहर के भीतर मौजूद सत्तातंत्र का बदसूरत चेहरा परदे पर लेकर अाते हैं तो साथ ही साथ उसके ख़िलाफ़ अाम अादमी का दुस्साहसी प्रतिरोध भी उनकी फ़िल्म का केन्द्रीय तत्व है।

बीते दस सालों में दिल्ली शहर के हिन्दी सिनेमा में केन्द्रीय भूमिका में उभरने के पीछे दिल्ली में काम की तलाश अौर पढ़ाई के सिलसिले में अाई बड़ी प्रवासी अाबादी का भी योगदान है। 2011 की जनगणना के अांकड़ों के अनुसार दिल्ली की अाबादी में बीते दो दशकों में 70 लाख से ज़्यादा का इज़ाफ़ा हुअा है। इसमें गुड़गाँव, नोयडा अौर गाज़ियाबाद जैसी एनसीअार इलाकों की अाबादी को भी जोड़ लें तो अांकड़ा अौर बड़ा हो जाता है। इसमें बड़ी संख्या प्रवासी अाबादी की है। इस अाबादी ने दिल्ली के एक पंजाबी कल्चर वाला शहर भर होने के मिथ को तोड़ा है अौर थोड़ा सा यूपी, बिहार, हरियाणा, राजस्थान दिल्ली के परिदृश्य अौर यहाँ के साँस्कृतिक माहौल में घोल दिया है। सिर्फ़ उत्तर भारत ही क्यों, अाज दिल्ली उत्तर पूर्वी राज्यों से पढ़ने अाने वाले छात्रों की भी पहली पसन्द है। एक बड़ी तिब्बती शरणार्थी अाबादी भी दिल्ली में निवास करती है। अाज का दिल्ली शहर न सिर्फ़ देश की राजधानी है, यह हिन्दी पट्टी के तमाम राज्यों अौर उनकी संस्कृतियों का प्रतिनिधि शहर भी है।

लोकप्रिय सिनेमा भी शहर की इस विविधरंगी पहचान का भरपूर उपयोग करता है। लेखक हिमांशु जोशी अौर निर्देशक अानंद एल राय की फ़िल्में इसकी बेहतर मिसाल हैं। हाल में अाई सुपरहिट 'तनु वेड्स मनु रिटर्न' में झज्जर से दिल्ली के रामजस कॉलेज में पढ़ने अाई कुसुम सांगवान के किरदार के माध्यम से उन्होंने हरियाणा की बोली-बानी को दिल्ली में जीवित कर दिया। इससे पहले भी 'रांझना' में लेखक निर्देशक की यह जोड़ी बनारस अौर पंजाब के भिन्न परिवेश से अाए किरदारों का प्रेम जेएनयू जैसे अाधुनिक विश्वविद्यालय में परवान चढ़ता दिखा चुकी है। राजकुमार हीरानी निर्देशित अौर अामिर ख़ान द्वारा अभिनीत 'थ्री इडियट्स' अौर उन्हीं द्वारा निर्मित 'डेल्ही बेली' में तिब्बती मूल के पात्रों को केन्द्रीय भूमिका में उपयोग किया गया है अौर इसके लिए भी दिल्ली ही मुख्य घटनास्थल चुना गया। जूही चतुर्वेदी लिखित तथा शुजित सरकार निर्देशित 'विक्की डोनर अौर 'पीकू' जैसी फ़िल्में भी शहर में होते इसी साँस्कृतिक अादान-प्रदान से उपजी हैं। दिल्ली के भीतर ही 'सी अार पार्क' में बंगाल अौर 'लाजपत नगर' में पंजाब की भिन्न संस्कृतियाँ अपना घर बनाए हैं अौर जूही की लिखी फ़िल्मों में वो पब्लिक ट्रांसपोर्ट से लेकर बैंक तक किसी भी सार्वजनिक स्थान पर अापस में टकरा जाती हैं। अौर शुरू हो जाता है अागे जाकर प्यार में बदल जानेवाला वो अात्मीय संवाद, जिसके सिरे दो किरदारों को ही नहीं दो भिन्न जीवनशैलियों को भी अापस में जोड़ देते हैं।

देश का टेलिविज़न मीडिया भी दिल्ली केन्द्रित है अौर यह भी सिनेमा में दिल्ली का प्रतिनिधि बन जाता है। 'रँग दे बसंती', 'रण', 'पा', 'पीपली लाइव', 'नो वन किल्ड जेसिका' अौर हालिया 'पीके' जैसी फ़िल्में इसका उदाहरण हैं। चौबीसों घंटे के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने दिल्ली के विज़ुअल रिप्रेज़ेंटेशन को भारतभर के दर्शकों की नज़र में ज़्यादा सहज बना दिया है। टेलिविज़न की यह महाकाय उपस्थिति कई बार अति की हद तक भी पहुँच जाती है अौर लगता है कि दिल्ली से बाहर की हर महत्वपूर्ण खबर जैसे हाशिए पर पटक दी गई है। लेकिन यह भी एक कारण है कि दिल्ली में अपनी फ़िल्म की कथा को बेस करना अब निर्देशक को अखिल भारतीय पहचान हासिल करने के लिए सबसे उपयुक्त लगता है। दिल्ली शहर की सम्पूर्ण भारत के लिए, या कम से कम उत्तर भारत के लिए प्रतिनिधि किरदार के तौर पर अखिल भारतीय स्वीकृति परेशानी पैदा करनेवाली तो है, लेकिन इस तथ्य को जाने अौर समझे बिना दिल्ली की हालिया सिनेमा में उपस्थिति के पेंच खोलना मुश्किल होगा। बीते सालों में दिल्ली शहर जैसे उत्तर भारत के अन्य नगरों के लिए एक पिट-स्टॉप बन गया है।



Friday, August 14, 2015

फिल्‍म समीक्षा : ब्रदर्स

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
         अशोक लोखंडे, किरण कुमार और आशुतोष राणा ‘ब्रदर्स’ के अहम कलाकार हैं। छोटी और सहयोगी भूमिकाओं में आए ये कलाकार फिल्म के मुख्यि कलाकारों अक्षय कुमार, सिद्घार्थ मल्होत्रा और जैकी श्रॉफ के निखरने में मददगार रहे। जैकलीन फर्नांडिस के बदले कोई और अभिनेत्री रहती तो फिल्मी का इमोश्नेल प्रभाव और बढ़ता। खुशी में उछलने और दुख में माथा पीटने की एक्टिंग उन्होंने की है। मुमकिन है निर्देशक ने उनकी क्षमता को देख कर यही करने को कहा हो। ‘ब्रद्रर्स’ हालीवुड फिल्म ‘वॉरियर’(2011) की रीमेक है। निर्देशक करण मल्होत्रा ने 2012 में अमिताभ बच्चन की 1990 की फिल्म ‘अग्निपथ’ की रीमेक बनाई थी, जिसमें रितिक रोशन थे। रीमेक फिल्मों में निर्देशक की मौलिकता इतनी ही रहती है कि वह मूल के करीब रहे और उसकी लोकप्रियता को भुना सके। पिछली बार ‘अग्निपथ’ में करण मल्होेत्रा सफल रहे। इस बार ‘ब्रद्रर्स’ के लिए वही बात नहीं कही जा सकती। 
             ‘ब्रदर्स’ नाम के अनुरूप दो भाइयों मोंटी और डेविड की कहानी है। दोनों सौतेले भाई हैं। दरअसल, उनके पिता गैरी की दूसरी शादी उनके परिवार में विघ्न डालती है। गैरी नशेबाज और आक्रामक हो जाता है। एक बार वह अपनी बीवी मारिया पर हाथ उठाता है तो वह ऐसे गिरती है कि उसकी मौत हो जाती है। डेविड अपने पिता का माफ नहीं कर पाता। उसे सौतेले छोटे भाई पर भी गुस्साा आता है कि उसकी वजह से यह टंटा हुआ और उसकी मां का देहांत हो गया। गैरी जेल चला जाता है और दोनों भाई अलग हो जाते हैं। फिल्म गैरी के जेल से छूटने के समय आरंभ होती है। कहानी बार-बार फ्लैशबैक में जाती है और पुराने दृश्यो किसी हॉरर फिल्म के भूतों की तरह अचानक प्रकट होते हैं। वर्तमान और फ्लैशबैक का यह मिश्रण झटका ही देता है।          
                इंटरवल के पहले फिल्म ऊबाऊ तरीके से परिवार की कहानी कहती है। हम फिल्म के टेकिंग पॉइंट तक आने में ही ऊब जाते हैं। दोनों भाइयों के आमने-सामने आने और रिंग में मुकाबले के लिए उतरने के पहले फिल्म धीमी और प्रभावहीन है। इंटरवल के बाद दोनों भाइयों के मुकाबले के दृश्य रोचक और प्रभावपूर्ण हैं। इस फिल्म में मिक्स्ड मार्शल आर्ट का इस्तेमाल किया गया है। फाइट फिल्मों के शौकीन दर्शकों के लिए यह फिल्म इंटरेस्टिंग हो सकती है। पहली बार इस स्तर और कौशल का फाइट पर्दे पर दिखाई पड़ा है। इस संदर्भ में अक्षय कुमार और सिद्धार्थ मल्होत्रा की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने अपनी भूमिकाओं के लिए जरूरी मेहनत की है। रिंग में बॉक्सर के रूप में उन्हें देख कर उत्तेजना होती है। दिक्कत यह है कि दर्शकों को पता है कि हिंदी फिल्मों की रीति के मुताबिक बड़ा भाई और सीनियर एक्टर ही जीतेगा, इसलिए उत्सुकता दबी-दबी ही रहती है।
           पिता के रूप में जैकी श्रॉफ प्रभावशाली रहे हैं। यह किरदार की खासियत है, जिसे जैकी ने अपने अंदाज में जीवंत कर दिया है। निर्देशक ने एक ही तरह के सीन देकर उन्हें लिमिट किया है। निर्देशक की यह सीमा अन्य किरदारों के निर्वाह में भी नजर आती है। अक्षय कुमार एक्शन दृश्योंं में जमे हैं। यह उनकी विशेषता भी है। इस फिल्म में उन्हें फैमिली पर्सन के तौर पर भी दिखाया गया है। उन्होंने किरदार की पीड़ा को समझा और अपने अभिनय में उतारा है। सिद्धार्थ मल्होत्रा एक्शन दृश्यों में ठीक है। वे एक ही किस्म के एक्सप्रेशन के दायरे में क्यों रह गए? नए कलाकारों में यह कमी उभर कर आ रही है। वे पूरी फिल्म एक ही मुद्रा और भाव में निभाते हैं, जबकि दृश्यों में अन्य भावों की भी संभावना रहती है। 
        करण मल्होत्रा की ‘ब्रदर्स’ उनकी पिछली फिल्म ‘अग्निपथ’ के प्रभाव में है। 
 अवधिः 158 मिनट 
स्‍टार - **1/2
ढाई स्‍टार

Thursday, August 13, 2015

दरअसल : हिंदी प्रदेशों में सिनेमा और सरकार





-अजय ब्रह्मात्‍मज
    आए दिन उत्‍तर प्रदेश के अखबारों में फिल्‍म कलाकारों के साथ वहां के मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव की तस्‍वीरें छप रही हैं। नीचे जानकारी रहती है कि फलां फिलम को टैक्‍स फ्री कर दिया गया। टैक्‍स फ्री करने से फिल्‍म निर्माताओं को राहत मिलती है। उन्‍हें थोड़ा लाभ भी होता है। उत्‍तर प्रदेश सरकार फिल्‍मों को बढ़ावा देने के साथ प्रदेश की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए अनुदान भी देती है। अगर किसी फिल्‍म की उत्‍तर प्रदेश में शूटिंग की गई हो तो प्रतिशत के हिसाब से अनुदान दिया जाता है। मसलन 75 प्रतिशत फिल्‍म उत्‍तर प्रदेश में शूट की गई हो तो दो करोड़ और 50 प्रतिशत पर एक करोड़ का अनुदान मिलता है। हिंदी फिल्‍में अभी जिस आर्थिक संकट से गुजर रही हैं,उस परिप्रेक्ष्‍य में ऐसे अनुदान का महत्‍व बढ़ जाता है। उत्‍तर प्रदेश में फिल्‍मों से जुड़ी सारी गतिविधियां फिल्‍म विकास परिषद के तहत हो रही हैं। इन्‍हें विशाल कपूर और यशराज सिंह देखते हैं। कहा जा सकता है कि मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव के नेतृत्‍व में यह अनुकरणीय काम हो रहा है। बाकी हिंदी प्रदेशों को भी सबक लेना चाहिए। सभी हिंदी प्रदेशें में फिल्‍म विकास परिषद का गठन होना चाहिए।
    इतना ही नहीं। विशाल कपूर बताते हैं,मुख्‍यमंत्री महोदय इसे अधिक फिल्‍में,अधिक रोजगार के तौर पर देखते हैं। वे चाहते हैं कि बनारस और लखनऊ ही नहीं,प्रदेश के दूसरे मनोरम स्थानों में भी शूटिंग की सुविधाएं दी जाएं। दो स्‍थानों उन्‍नाव और लखनऊ-आगरा एक्‍सप्रेस पर फिल्‍मसिटी स्‍थापित करने की योजना है। उत्‍तर प्रदेश में शूट की गई पहली फिल्‍म के लिए भी अनुदान की व्‍यवस्‍था है। फिल्‍म विकास परिषद बच्‍चों के लिए भी कुछ करना चाहता है। उत्‍तर प्रदेश की तरह अगर दूसरे हिंदी प्रदेश भी हिंदी फिल्‍मों के लिए अपने दरवाजे खोलें तो हिंदी सिनेमा के इतिहास में नए चैप्‍टर की शुरूआत हो सकती है। अभी बिहार में प्रस्‍तावित फिल्‍म नीति ठंडे बस्‍ते में चली गई है। कुछ सालों पहले फिल्‍म समारोह आरंभ हुए थे,लेकिन नई सरकारों की उदासीनता से वह क्रम टूट गया। चुनाव के बाद सरकार किसी की भी आए। नई सरकार को फिल्‍मों के प्रति गंभीरता बरतनी चाहिए।
    मध्‍य प्रदेश अन्‍य कारणों से विवाद में है,लेकिन फिल्‍मों के प्रति उनका समर्थन उल्‍लेखनीय है। प्रकाश झा की कुछ फिल्‍में मध्‍य प्रदेश में ही शूट हुई हैं। निश्चित ही वहां की सुविधा और सुकून की वजह से प्रकाश झा कहीं और नहीं जाते। दूसरे फिल्‍मकार भी बताते हैं कि उन्‍हें अपनी फिल्‍मों की शूटिंग में पुलिस और प्रशासन का भरपूर समर्थन और सहयोग मिलता है। मध्‍यप्रदेश के साथ एक सुविधाजनक बात यह भी है कि मुंबई से अपेक्षाकृत नजदीक होने के कारण कलाकारों का भोपाल या इंदौर जाना-आना आसान होता है। राजस्‍थान में हवेलियों और प्राकृतिक सुदरता की वजह से हिंदी फिल्‍मों की लगातार शूटिंग चलती है। चूंकि निर्माता और निर्देशक मनोहार लोकेशन के लिए खुद ही राजस्‍थान जाते हैं,इसलिए सरकार किसी प्रकार के अनुदान या प्रलोभन की जरूरत नहीं समझती। फिर भी राजस्‍थान सरकार को राजस्‍थानी सिनेमा या प्रदेश के हिंदी सिनेमा को बढ़ावा देने की पहल करनी चाहिए। अभी राजस्‍थानी में बनी फिल्‍मों का उसकी पूर्णता के बाद दस लाख की समर्थन राशि दी जाती है। इस समर्थन का केवल प्रतीकात्‍मक महत्‍व रह गया है।
    इन चार प्रदेशों के साथ हिमाचल प्रदेश,उत्‍तराखंड और झारखंड जैसे भी प्रदेश हैं। हम जानते हैं कि ये प्रदेश भी सिनेमा के लोकेशन के लिए मुफीद हैं। इन प्रदेशों के टैलेंट मुंबई में कार्यरत हैं। इन प्रदेशों की सरकारें अपने यहां की प्रतिभाओं का सुविधाएं और मौके देकर फिल्‍मों के विकास में योगदान कर सकती हैं। अभी फिल्‍मों के प्रसार की संभावनाएं बनी हुई हें। तकनीकी विकास और उपलब्‍धता ने फिल्‍म निर्माण के लिए मुंबई,चेन्‍नई या कोलकाता पर फिल्‍मकारों की निर्भरता कम कर दी है। अब यह मुमकिन ही कि सुदूर इलाकों और शहरों में बैठ कर भी फिल्‍मों की शूटिंग की जा सके।
जारी...

Wednesday, August 12, 2015

जोशीले इंसान की प्रेमकहानी है माझी - केतन मेहता


-अजय ब्रह्मात्‍मज
      दशरथ माझी के जीवन पर आधारित केतन मेहता की फिल्‍म ‘माझी-द माउंटेनमैन’ एक आम आदमी की बॉयोपिक है,जिसने अपने जिद और जोश से पहाड़ को काटा। अपने गांव-समुदाय के लिए उसने वह असंभव काम किया,जो आज भी चकित करता है। दशरथ माझी की मृत्‍यु के बाद उनकी कहानी देश भर में छपी तो अनेक फिल्‍मकारों ने उनमें रुचि दिखाई। उनके जीवन पर फिल्‍म बनाना पहाड़ काटने की तरह ही मुश्किल रहा। केतन केहता ने यह मुश्किल हल की। उन्‍होंने नवाजुद्दीन सिद्दीकी और राधिका आप्‍टे के साथ साहसी व्‍यक्ति की गाथा को प्रेमकहानी के रूप में निरूपित किया।


-माझी को किस रूप में प्रेजेंट करने जा रहे हैं ?
0 माझी हमारे देश के सुपरमैन हैं। वह एक फैंटेसी फिगर हैं। उन्‍हें आप रियल लाइफ सुपरहीरो कह सकते हें। ‘माझी’ आवेशपूर्ण प्रेमकहानी है। विजय की प्रेरक कहानी है। एक तरफ इश्‍क की दीवानगी है और दूसरी तरफ कुछ कर गुजरने का जुनून है। इनके बीच पहाड़ काट कर रास्‍ता बनाने  की जिद है। नामुमकिन को मुमकिन बनाने का जज्‍बा है। यह बहुत ही पावरुुल कहानी है।
- आप के जीवन में माझी कैसे आए ?
0 2007 में उनके देहांत के बाद अखबारों और पत्रिकाओं में उनके बारे में अनेक लेख छपा। हम हिंदुस्‍तानियों की पुरानी आदत है कि किसी के मरने के बाद ही हम उसका महत्‍व समझ पाते हें। उनसे संबंधित लेख पढ़ने के बाद उनका जीवन दिल को छू गया। मुझे लगा कि उनकी कहानी पर फिल्‍म बना कर लोगों से शेयर करना चाहिए। फिर रिसर्च आरंभ हुआ...
-उनकी किस बात ने प्रभावित किया ?
0मुझे उनके जोश ने प्रभावित किया था। हिम्‍मत से जूझने और हार न मानने के जोश ने मुझे प्रेरित किया। मैंने फिल्‍म में उसी जोश को रखा है। उनका जीवन गजब की प्रेमकहानी भी है। उन्‍होंने पहाड़ क्‍यों काटा। यह तो मोहब्‍बत की इंतहा है कि कोई 22 सालों तक पहाड़ काटता रहे। मनुष्‍य की इच्‍छाशक्ति के विजय की कहानी है यह।
-हिंदी फिल्‍मों में बिहार किसी हिंसक जगह और यहां की कहानियां मुख्‍य रूप से अपराधों से जुड़ी रही है। आप उसी भूमि से एक प्रेमकहानी ला रहे हैं...
0 सच कहें तो बिहार में कहानियों की खान है। वहां हर तरह की कहानियां हैं। माझी की कहानी पूरी दुनिया के लिए प्रेरक है। उनकी जिंदगी में दूसरा कोई काम ही नहीं था। अपने काम के एवज में उन्‍हें कुछ चाहिए भी नहीं था।
-आप ने वास्‍तविक लोकेशन पर ही शूटिंग की ?
0 और कहीं इसे किया भी नहीं जा सकता था। वहां पहुंचने पर पहाड़ देखने के बाद यकीन ही नहीं हुआ कि कोई इंसान ऐसा मुश्किल काम भी कर सकता है। जिंदगी में मुझे ऐसा ताज्‍जुब नहीं हुआ था। हम ने गया को बेस कैंप बनाया था। डेढ़ घंटे की चढ़ाई के बाद हम प‍हाड़ पर पहुंचते थे। जिस मुश्किल काम को उन्‍होंने 1960 से 1982 के 22 सालों में पूरा किया,वहां सड़क बनाने में सरकार को 30 साल लग गए। वे अपनी जिंदगी में ही बाबा बन चुके थे। वे बोरा पहनते थे, इसलिए उन्‍हें बोरी बाबा भी कहा जाता था। वह लिविंग लिजेंड बन गए थे।
-आप ने इतनी बॉयोपिक फिल्‍में की हैं। माझी की कहानी किस तरह से अलग है ?
0 मैंने धुन के पक्‍के व्‍यक्तियों के बॉयोपिक पर ही काम किया है। मैं स्‍वयं भी एक धुन में लगा हूं। आर्ट और कमर्शियल सिनेमा के बीच की दीवार तोड़ने में लगा हूं। किसी की जिंदगी को दो घंटों में बताने के लिए जरूरी है कि उसका केन्‍द्रीय विचार होना चाहिए। ‘सरदार’ में देश का जन्‍म था। ‘मंगल पांडे’ में देश की आजादी थी। ‘माझी’ में पैशन और ऑब्‍सेशन है। असंभव को संभव बनाने की प्रेमकहानी है।
-माझी की प्रेमकहानी में सामुदायिकता है। उन्‍होंने अपने समदाय के लिए कुछ किया। उनके प्रेमासिक्‍त काम में भी उद्देश्‍य था कि भविष्‍य में किसी के प्रिय की मृत्‍यु उनकी बीवी फगुनिया की तरह नहीं हो।
0 बिल्‍कुल...उन्‍होंने कुछ ऐसा किया कि अपने दुख से बाहर निकल कर पूरे गांव के बारे में सोचा। माझी के जीवन प्रसंगों को कहानी का रूप देने में वर्द्धराज स्‍वामी और स्‍थानीय लेखक शैवाल से मदद मिली। कुछ पत्रकारों ने भी मदद की। उनके जीवन के बारे में छिटपुट रूप से ढेर सारी सामग्रियां थें,लेकिन उन्‍हें कहानी का रूप देना जरूरी था।
-कलाकारों के चुनाव के बारे में क्‍या कहेंगे ?
0 नवाज अपने दौर के उम्‍दा अभिनेता हैं। उन्‍होंने बहुत अच्‍छा परफार्म किया है। भारतीय सिनेमा में ऐसा बेहतरीन अभिनय कम देखने को मिला है। फगुनिया के किरदार के लिए मैं अनेक अभिनेत्रियों से मिला। मुझे जमीनी और नाजुक मिजाज की लड़की चाहिए थी। राधिका से मिलते ही लगा कि फगुनिया हो सकती है।
- आप की फिल्‍मों में खुरदुरा यथार्थ रहता है। ‘माझी’ में आप की यह खूबी बरकरार रहेगी न ?
0 बिल्‍कुल रहेगी। मेरी ‘मिर्च मसाला’ की याद आ सकती है। हम सभी एक लंबे सफर के बाद यहां पहुंचे हैं। सभी की अपनी लड़ाई है। सिनेमा इतना पावरफुल मीडियम है कि कहीं कुछ और करने का मन ही नहीं करता। अभी सिनेमा अच्‍छा दौर चल रहा है। मैं काफी उम्‍मीद रखता हूं। अगले पांच सालों में हिंदी सिनेमा इंटरनेशनल स्‍तर तक पहुंच जाएगा। तकनीकी रूप से हम ने बहुत उन्‍नति की है। रायटर-डायरेक्‍टर नए आयडिया लेकर आ रहे हें। सबसे अच्‍छी बात है कि नया ऑडिएंस भी आ गया है।

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Tuesday, August 11, 2015

यादगार रहा है 15 सालों का सफर : अभिषेक बच्चन

-अजय ब्रह्मात्मज
अभिनेता अभिषेक बच्चन ने हाल ही में फिल्म इंडस्ट्री में 15 साल पूरे किए हैं। 30 जून 2000 को उनकी पहली फिल्म जेपी दत्ता निर्देशित ‘रिफ्यूजी’ रिलीज हुई थी। उनकी उमेश शुक्ला निर्देशित ‘ऑल इज वेल’ 21 अगस्त को रिलीज होगी।    

    15 सालों के सफर यादगार और रोलरकोस्टर राइड रहा। उस राइड की खासियत यह होती है कि सफर के दरम्यान ढेर सारे उतार-चढ़ाव, उठा-पटक आते हैं, पर आखिर में जब आप उन मुश्किलों को पार कर उतरते हैं तो आप के चेहरे पर लंबी मुस्कान होती है। मेरा भी ऐसा ही मामला रहा है। मुझे बतौर अभिनेता व इंसान परिपक्व बनाने में ढेर सारे लोगों का योगदान रहा है। आज मैं जो कुछ भी हूं, उसमें बहुत लोगों की भूमिका है।
    शुरुआत रिफ्यूजी और जे.पी.दत्ता साहब से करना चाहूंगा। पिछले 15 सालों के सफर में सबसे यादगार लम्हे रिफ्यूजी की स्क्रीनिंग के पल के थे। मुझे याद है मैं जून के आखिरी दिनों में मनाली में ‘शरारत’ की शूटिंग कर रहा था। मुझे ‘रिफ्यूजी’ की स्क्रीनिंग के लिए आना था, पर ‘शरारत’ में भी बड़ी स्टारकास्ट थी। हमारे डायरेक्टर गुरुदेव भल्ला ने मुझसे कहा कि यार तुम्हारे बिना तो हम कोई सीन शूट नहीं कर सकेंगे। उस पर मैंने उनसे कहा कि साहब ‘रिफ्यूजी’ मेरी पहली फिल्म है, जाना तो पड़ेगा। उन्होंने नहीं  रोका। जिस दिन मैं स्क्रीनिंग के लिए निकला, उस दिन घना कोहरा था और मनाली से कुल्लू एक ही फ्लाइट जग्सन एयर इत्तफाकन उस दिन रद्द हो गई थी। मैं टैक्सी लेकर मनाली रिजॉर्ट से चंडीगढ़ आया। फिर दिल्ली और अंतत: मुंबई। जेपी साहब ने मेरी व बेबो (करीना कपूर खान) यूनिट के लिए एक स्क्रीनिंग रात के साढ़े नौ बजे रखी थी। स्क्रीनिंग माहिम के नए खुले मल्टीप्लेक्स मूवी स्टार में थी। उसके ठीक अगले दिन फिल्म की प्रीमियर हुआ था।
    प्रीमियर का किस्सा भी बड़ा रोचक रहा। मैं जलसा में तैयार बैठा था अपने चाचा और छोटे भाई समान सिकंदर के साथ। पहले मैं गया प्रतीक्षा। वह इसलिए कि प्रीमियर के पहले मैं बड़ों का आर्शीवाद ले लूं। तो मैं प्रतीक्षा गया। दादा-दादी के पांव छूए। दादी से कहा, ‘मैं जा रहा हूं अपने प्रीमियर के लिए।’ उन्होंने कहा कि मुझे भी फिल्म दिखाना। मैंने कहा कि मैं उनके लिए वीएसएस ले आऊंगा।
    बहरहाल मैं वहां से निकला लिबर्टी सिनेमा के लिए। मीठीबाई से एसवी रोड की राह ली। पवनहंस के सामने बस डिपो है। उससे पहले एक छोटा सा हनुमान मंदिर पड़ता है। बचपन में मैं जब दादी मां के साथ शाम को ड्राइव पर जाता था तो वहां दादी मां शीश नवाती थी। वे हनुमान जी की बड़ी भक्त थीं। रोज सुबह घर में वे हनुमान चालीसा प्ले करती थीं, जिसे अनूप जलोटा ने गाया था। एक और आरती थी जय जय जय बजरंगबली। वह आज भी घर में बजता है। बहरहाल प्रीमियर पर जाने के दौरान मैं वहां रूक कर प्रणाम करना चाहता था। काफी गाड़ियां थीं साथ में, फिर भी उतर कर मैंने मंदिर में जाकर प्रणाम किया। हम जब लिबर्टी सिनेमा पहुंचे तो पता चला कि जेपी साहब नहीं आ रहे हैं। रिलीज को लेकर कुछ प्रॉब्लम हो गया था। उनका मैसेज आया कि अभिषेक तुम सब संभालो। उन दिनों रेड कार्पेट की कोई अवधारणा थी नहीं, पर गाडी से उतर कर थिएटर जानें के रास्ते में दोनों साइड मीडिया थी। वहां से जो खुशी मिली तो समझ में आ गया कि बॉस अब मामला गंभीर बन चुका है।
    फिल्म को मुंबई में अजय देवगन डिस्ट्रीब्यूट कर रहे थे। उन्होंने मुझे इंटरवल में लिबर्टी के हॉल में कहा, ‘तुम्हारी फिल्म को जोरदार ओपनिंग मिली है। मैं यह बात बतौर वितरक बता रहा हूं। मुझे तुम्हारे लिए बड़ी खुशी है। गुडलक टू यू।’ प्रीमियर खत्म होते ही हम गए ओबरॉय हॉटेल, जो अब ट्राइडेंट है। वहां के रीगल रूम में तब तक जेपी साहब आ चुके थे। फिर केक कटा और सब फैल गए आराम से। वहां से सुबह छह बजे मैं और सिंकदर वहां से निकले। मैंने सिकंदर से कहा, ‘यार यह मेरे लिए इतना बड़ा दिन है। कुछ ही घंटों में मैं मनाली निकल जाऊंगा ‘शरारत’ की शूटिंग के लिए। मैं यहां की कुछ यादें अपने संग ले जाना चाहता हूं। चलो यार लिबर्टी चलते हैं। वहां से पोस्टर लाकर अपने ऑफिस में लगाऊंगा। वह यादगार तोहफा होगा मेरे लिए कि यही वह पोस्टर था, जो प्रीमियर पर लगा था। लिबर्टी गए तो बारिश हो रही थी। पोस्टर कहीं दिखा ही नहीं। एक अपना कटआउट मिला। उसे गाड़ी की बोनट पर रखा। सिंकदर को खिड़की पर बिठाया और कटआउट ऑफिस ले आया। वह आज भी लगा हुआ है।’
    तब से लेकर आज तक का कुल 15 सालों का सफर कैसे गुजर गया, पता ही नहीं चला। खास सफर रहा है। ढेर सारे लोगों से मिला। वह काम करने को मिला, जिसके ख्वाब देखता था। यह खुशकिस्मती है मेरी और यह किसी की बदौलत नहीं है। यह ऊपरवाले की देन है। आप चाहे किसी के भी बेटे या बेटी हों। यह दुनिया बहुत निर्दयी है। कुछ भी मुफ्त का नहीं मिलता। मैं आज जहां भी हूं, चाहे सफल या असफल, वह कम बड़ी उपलब्धि नहीं है। कितने लोग हैं दुनिया में जो सुबह उठें और अपने ख्वाब को जी पाएं? मैं अपना सपना जी रहा हूं। मैं बचपन से एक्टर ही बनना चाहता था। पापा के साथ स्टूडियो जाता था तो रोंगटे खड़े हो जाते थे। आज भी होते हैं।
    मुझे बहुत पहले लग चुका था कि मैं इसी के लिए पैदा हुआ हूं। खुशी इस बात की है कि मैं 15 सालों बाद भी इसे कर रहा हूं। मुझे मालूम है कि लोग पूछेंगे ही कि बहुत दिनों बाद आप की कोई सोलो फिल्म आ रही है। मैं इन सब चीजों में पड़ता नहीं हूं। मुझे खुशी तो इस बात की है कि मैं आज भी फिल्मों में पूरी तरह सक्रिय हूं। आज कई ऐसे एक्टर हैं, जो सक्रिय नहीं हैं। मैं काम कर रहा हूं। फिर फर्क नहीं पड़ता कि मल्टीस्टारर फिल्म का हिस्सा हूं या सोलो फिल्म का। कई सफल फिल्में दी हैं मैंने। अब उसका क्रेडिट आप किसी को दें,वह आप की ओपिनियन है।
    पिछले 15 साल बहुत उम्दा रहे हैं। मंै खुश हूं। कम से कम शिकायती तो नहीं हूं। मैं खुद को और बेहतर करने में लगा हुआ हूं। मेरे दर्शक मुझे आज भी स्वीकार करते हैं और कम से कम दो और साल तक तो मेरे पास तीन और फिल्में हैं। उन सालों को यादगार व खुशहाल बनाने में सबसे पहले तो मेरे माता-पिता हैं, जिनकी वजह से मैं यहां बैठा हुआ हूं। फिर दादा-दादी, नाना-नानी। बचपन से लेकर आज तक उनसे काफी कुछ सीखा हूं। मेरे नाना भी बहुत अच्छे लेखक रहे हैं।
    उनके अलावा मेरी दीदी, ऐश्वर्या, यार-दोस्त सबने मुझे शेप अप करने में बड़ी भूमिका निभाई। श्वेतदी(श्वेता बच्चन नंदा को प्यार से कहते हैं) मेरी बैकबोन रही हैं। मैं गलत-सही, सफल-असफल जो भी रहा, हर चीज में वे मेरे संग रहीं हैं। मेरे लिए श्वेता दीदी कहना लंबा था तो मैंने उन्हें श्वेतदी कहना शुरू कर दिया। अब घर में हर कोई उन्हें श्वेतदी ही पुकारते हैं। ऐश्वर्या मेरी सब कुछ हैं। वे मेरी दोस्त, पत्नी, मेरे बच्चे की मां हैं। इस तरह उनके संग बड़ा गहरा व निजी बौंड है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि मैं उनके संग कोई भी बात बिना किसी डर के कर
    पेशे की बात करें तो जेपी साहब ने मुझमें उस वक्त यकीन किया, जब मुझे खुद पर यकीन नहीं था। मुझे मलाल है कि मैं शायद उन्हें उतना नहीं दे सका। मैं और बढ़िया कर सकता था। मैं आज जितना जानता हूं,उतना उस वक्त जानता तो रिफ्यूजी और बेहतर हो सकती थी। फिर अनुपम खेर साहब का भी मैं शुक्रिया अदा करना चाहूंगा। बहुत से लोगों को लगता है कि मैं ‘युवा’ से ज्यादा निखरा, जबकि असलियत में वह काम ‘ओम जय जगदीश’ से हो गया था। बेबो को मैं बहन मानता हूं। वैसा ही मानता रहूंगा। अन्ना, जैकी दादा। उन सबसे मैं रोजाना नहीं मिलता, पर उनके प्रति प्यार कम नहीं होता।
    ये सब पिलर हैं मेरे लिए फिल्म इंडस्ट्री में। उक्त सभी मेरे लिए एक्स्टेंडेड परिवार की तरह हैं। मैं काफी देर तक औपचारिक नहीं रह सकता। मैं तो खुद से जलने वालों को भी पास जाकर जादू की झप्पी दे देता हूं।
सकता हूं। अक्सरहां हम अदाकारों को डर इस बात का रहता है कि हम कहीं जज न कर लिए जाएं। ऐसे में हम डर से बड़े औपचारिक से हो जाते हैं। वह बात ऐश्वर्या के संग नहीं होता। वे मुझे सब कुछ एक्सप्रेस करने का मौका देती हैं। वे मुझे बाहर जा फिल्में बनाने का मौका प्रदान करती हैं। घर की चिंता से मुक्त रखती हैं।

Saturday, August 1, 2015

दरअसल : कास्टिंग के बदलते तरीके



Jul 10




-अजय ब्रह्मात्मज
पिछले दिनों आमिर खान ने अपने होम प्रोडक्शन की आगामी फ़िल्म के लिए सोशल मीडिया पर जानकारी दी कि उन्हें 12 से 17 साल की उम्र के बीच की एक लड़की चाहिए,जो गा भी सकती हो। उन्हें रोज़ाना हज़ारों की तादाद में वीडियो मिल रहे हैं। उन्होंने सभी से वीडियो ही मंगवायें हैं। कहना मुश्किल है कि इस तरीके से उनकी फ़िल्म की कास्टिंग का काम आसान होगा या काम बढ़ जायेगा? विकल्प ज्यादा हों तो चुनाव कठिन हो जाता है। इन दिनों आये दिन फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया साइट पर फिल्मों के लिए उपयुक्त कलाकारों की खोज जारी है। कुछ कलाकारों को काम भी मिल रहा है। मुख्य भूमिकाओं के लिए अवश्य निर्देशक के दिमाग में पॉपुलर स्टार या परिचित एक्टर रहते हैं। बाकी  सहयोगी भूमिकाओं के लिए अब पहले की तरह चाँद कलाकारों में से चुनाव नहीं करना पड़ता।
दस साल पहले की फिल्मों को देखें तो स्पष्ट पता चलता है और फ़र्क़ दीखता है।पहले की फिल्मों में किरदारों के लिए कलाकार सुनिःचित से हो गए थे।मसलन पुलिस इंस्पेक्टर के रूप में इफ्तखार का आना। माँ हैं तो निरुपा राय ही दिखेंगी। ऐसे ही दोस्त,मां,चाचा और बाकी किरदारों के लिए भी कलाकार तय रहते थे। इस परंपरा के अपने लॉजिक थे। पुराने निर्देशक बताते हैं कि कलाकारों से किरदारों को तुरंत पहचान मिल जाती थी। उन किरदारों को स्थापित करने के लिए दृश्यों की ज़रुरत नहीं पड़ती थी। उनकी बात में सच्चाई दिखती है। हम प्राण या नासिर हुसैन को देखते ही अनुमान लगा लेते थे कि कैसा पिता होगा। यह बात पहले के स्टारों के साथ भी जुडी थी। सभी की अलग इमेज होती थी और वे सभी अपनी इमेज से निकलने की कोई कोशिश नहीं करते थे। अभी के स्टार प्रयोगशील हो गए हैं। इसकी एक  बड़ी वजह यही है कि अब उनकी काटिंग की जाती है। उनका ऑडिशन लिया जाता है यानि जांच जाता है क़ि वे रोल में सही लगेंगे या नहीं? फिल्मों के कास्टिंग डायरेक्टर इस काम में डायरेक्टर की मदद करते हैं।
आजकल फिल्मों के पोस्टर में कास्टिंग डायरेक्टर के नाम आने लगे हैं। वे फ़िल्म निर्माण का ज़रोइरि हिस्सा हो गए हैं। पहले भी कलकारों के चुनाव में सावधानी बरती जाती थी,लेकिन निर्देशकों के पास अधिक विकल्प नहीं रहते थे। ज्यादातर परिचित और प्रचलित कलाकारों से ही काम चलाना पड़ता था। कास्टिंग डायरेक्टर द्वारा कलाकारों के चुनाव को प्रक्रिया को समझना रोचक होगा। 'चिल्लर पार्टी' के लिए बाल कलाकारों को चुनने में मुकेश छाबड़ा 9000 बच्चों से मिले। 'दंगल' में आमिर खान की बेटियों की भूमिकाओं के लिए कलाकार फाइनल करने में मुकेश छाबड़ा को 21000 लड़कियों से मिलना पड़ा। मुकेश छाबड़ा ने कास्टिंग के काम को इज़्ज़त दिलवाई और उसे नए मुकाम पर ले आए। उनकी पहल और पहचान से कलाकारों के साथ ही फ़िल्म यूनिट का काम सुगम हुआ है। दर्शकों को फ़िल्म देखते हुए अधिक मज़ा आता है क्योंकि पता नहीं रहता कि कलाकार का क्या व्यवहार रहेगा। उनके अप्रत्याशित व्यवहार चौंकाते हैं। सबसे बड़ी बात कि नए कलाकारों को मौके मिल रहे हैं।पिछले 10 सालों में प्रति फ़िल्म नए कलाकारों की संख्या बढ़ी है।
नए कलाकारों को यह शिकायत हो सकती है कि फिल्मों में उनकी सेल्फ लाइफ कम हो गयी है। पहले पहचान मिलने पर कैरियर सुरक्षित हो जाता था। अभी ऐसा नहीं है। इस परिवर्तन की वजह से अब किरदारों की पहचान कलाकारों पर हावी रहती है। पहले कलाकारों से हम किरदारों को समझ लेते थे। अब ऐसा नहीं हो पता। निर्देशक भी नए किरदार पेश कर रहे हैं। एक तरह से ज़िन्दगी की विविधता फिल्मों में झलक रही है। किरदार एक-दूसरे से अलग हो रहे हैं।
विदेशों में कास्टिंग की लंबी परंपरा रही है। भारत में पहली बार शेख कपूर की फ़िल्म 'बैंडिट क्वीन" के समय कास्टिंग और ऑडिशन जैसे शब्द सुनाई पड़े थे।। उसकी कास्टिंग तिग्मांशु धुलिया ने की थी। तब से एक लम्बे सफ़र के बाद फ़िल्म निर्माण के इस पक्ष पर सभी का ध्यान गया है।

दरअसल : करीना और अभिषेक के 15 साल


-अजय ब्रह्मात्मज
    30 जून 2000 को जेपी दत्ता की फिल्म ‘रिफ्यूजी’ रिलीज हुई थी। 2000 की अनेक बड़ी फिल्मी घटनाओं में यह भी एक महत्वपूर्ण घटना थी। अमिताभ बच्चन-जया भादुड़ी के बेटे अभिषेक बच्चन और रणधीर कपूर-बबीता की बेटी करीना कपूर की जोड़ी एक साथ पर्दे पर आ रही थी। कुछ पाठकों को यह याद होगा कि तब बच्चन परिवार और कपूर परिवार में खास नजदीकी व गर्माहट थी। अभिषेक बच्चन और करिश्मा कपूर के बीच रोमांस चल रहा था। इस रोमांस की पृष्ठभूमि में ‘रिफ्यूजी’ की रिलीज रोचक और रोमांचक हो गई थी। फिल्म स्टारों के बेटे-बेटियों की लांचिंग फिल्मों से इतर जेपी दत्ता ने भिन्न फिल्म बनाने की कोशिश की थी,जिसे उनके शोकेस के तौर पर नहीं पेश किश गया था।
    ‘रिफ्यूजी’ अभिषेक बच्चन और करीना कपूर की यादगार फिल्म है। यादगार सिर्फ इसलिए नहीं है कि यह उन दोनों की पहली फिल्म है। फिल्म में जेपी दत्ता की निर्देशन शैली की अनेक खूबियां हैं। हालंाकि 15 सालों के बाद वे अब पुरानी व गैरजस्री लगती हैं, लेकिन वर्तमान के चलन में हमें अतीत की विशेषताओं को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। सीमित तकनीकी साधनों में ही जेपी दत्ता अपनी फिल्मों में एपिक विजुअल क्रिएट करते थे। उनकी फिल्में हमेशा ‘लार्जर दैन लाइफ’ इफेक्ट देती हैं। पृष्ठभूमि का विस्तार अपनी गहराई के साथ दिखता है। ‘रिफ्यूजी’ में सीमाओं की व्यर्थता का संदेश था। इस फिल्म के लिए लिखा जावेद अख्तर का गीत ‘पंछी नदियां पवन के झोंके ’ सरहद के सिद्धांत का विरोध करती है।
    ‘रिफ्यूजी’ की रिलीज के समय अभिषेक बच्चन पर भारी दवाब था। उनकी तुलना अमिताभ बच्चन से की गई और बाद की फिल्मों में भी उनमें अमिताभ बच्चन की झलक देखी जाती रही। अभिषेक बच्चन में कमियां हो सकती हैं, लेकिन पिता की तरह दिखना या भाव-भंगिमाओं में पिता की झलक देना अत्यंत स्वाभाविक है। नौंवे दशक के बाद आए सभी अभिनेताओं में अमिताभ बच्चन के मैनरिज्म की झलक मिलती है। अभिषेक बच्चन तो उनके बेटे हैं, जो उन्हें पर्दे के साथ घर पर भी देखते हुए बड़े हुए हैं। दरअसल, हम स्टारपुत्रों और पुत्रियों की परख की कसौटी सख्त कर देते हैं। थोड़ी देर के लिए अभिषेक बच्चन को उनके संबंधों से अलग कर देखें तो वे औसत से बेहतर अभिनेता दिखेंगे। 15 सालों के बाद भी उनकी सक्रियता से जाहिर है कि उनमें दम-खम है। बीच-बीच में उन्होंने अपनी प्रतिभा से चौंकाया भी है।
    अभिषेक बच्चन जैसा दवाब करीना कपूर पर नहीं था। उन्हें अपनी बहन करिश्मा कपूर की तरह संघर्ष नहीं करना पड़ा और न ही किसी से उनकी तुलना की गई। करीना कपूर में सहज आत्मविश्वास और नैसर्गिक प्रतिभा है। उन्होंने अपनी दमक और चमक दोनों से प्रभावित किया है। ‘चमेली’, ‘ओमकारा’ और ‘जब वी मेट’ जैसी फिल्मों में उन्होंने साबित किया है कि वह थोड़ा भी ध्यान दें तो उनके काम का गहरा असर होता है। करीना कपूर अपने करियर को लेकर कभी गंभीर नहीं रही हैं। उन्होंने खुद के लिए दिशा और मंजिल नहीं तय की, जब जैसी फिल्में मिलीं, उन्होंने कर लीं। वजहें अलग-अलग रहीं।
    मुझे लगता है कि अभिषेक बच्चन और करीना कपूर दोनों ही अपने करियर के प्रति बेपरवाह रहे। उन्होंने अभिनय को तो गंभीरता से लिया, लेकिन फिल्मों के चुनाव के प्रति गंभीर नहीं रहे। उनकी यह बेपरवाही कई बार पर्दे पर भी नजर आई। अगर दोनों को ढंग के निर्देशक मिले और वे अपने किरदारों को चुनौती के तौर पर लें तो वे ‘गुस्’ और ‘चमेली’ जैसी अनेक फिल्में दे सकते हैं। दोनों करियर और उम्र के खास मोड़ पर हैं।