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Tuesday, January 24, 2017

फिल्‍म समीक्षा - काबिल



फिल्म रिव्‍यू
काबिल
इमोशन के साथ फुल एक्शन
-अजय ब्रह्मात्‍मज
    राकेश रोशन बदले की कहानियां फिल्मों में लाते रहे हैं। खून भरी मांग और करण-अर्जुन में उन्होंने इस फॉर्मूले को सफलता से अपनाया था। उनकी फिल्मों में विलेन और हीरो की टक्कर और अंत में हीरो की जीत सुनिश्वित होती है। हिंदी फिल्मों के दर्शकों का बड़ा समूह ऐसी फिल्में खूब पसंद करता है, जिसमें हीरो अपने साथ हुए अन्याय का बदला ले। चूंकि भारतीय समाज में पुलिस और प्रशासन की पंगुता स्पष्‍ट है, इसलिए असंभव होते हुए भी पर्दे पर हीरो की जीत अच्छी लगती है। राकेश रोशन की नयी फिल्म काबिल इसी परंपरा की फॉर्मूला फिल्म है, जिसका निर्देशन संजय गुप्ता ने किया है। फिल्म में रितिक रोशन हीरो की भूमिका में हैं।
    रितिक रोशन को हम ने हर किस्म की भूमिका में देखा और पसंद किया है। उनकी कुछ फिल्में असफल रहीं, लेकिन उन फिल्मों में भी रितिक रोशन के प्रयास और प्रयोग को सराहना मिली। 21वीं सदी के आरंभ में आए इस अभिनेता ने अपनी विविधता से दर्शकों और प्रशंसकों को खुश और संतुष्‍ट किया है। रितिक रोशन को काबिल लोकप्रियता के नए स्तर पर ले जाएगी। उनके दर्शकों का दायरा बढ़ाएगी। काबिल में रितिक रोशन ने हिंदी फिल्मों के पॉपुलर हीरो के गुणों और मैनेरिज्म को आत्‍मसात किया है और उन्हें अपने अंदाज में पेश किया है। वे रोमांटिक हीरो, डांसर और फाइटर के रूप में आकर्षक और एग्रेसिव तीनों हैं। संजय गुप्ता ने अकल्‍पनीय एक्शन सीन नहीं दिए हैं। सभी घटनाओं और एक्शन में विश्‍वसनीय कल्‍पना है।
    बदले की कहानियों में पहले परिवार(पिता, भाई-बहन आदि) की वजह से फिल्म का हीरो समाज और कानून की मदद न मिलने पर मजबूर होकर खुद ही बदले के लिए निकलता था। एंग्री यंग मैन की कहानियों का यही मुख्‍य आधार था। इधर हीरो अपनी बीवी या प्रेमिका के साथ हुए अन्याय या व्‍यभिचार के बाद बदले की भावना से प्रेरित होता है। अभी के विलेन को किसी न किसी प्रकार से पुलिस व प्रशासन का भी सहयोग मिल रहा होता है। पहले दो-चार ईमानदार सहयोगी किरदार मिल जाते थे। अभी ज्यादातर भ्रष्‍ट और विलेन से मिले होते हैं, इसलिए हीरो की लड़ाई ज्यादा व्‍यक्तिगत और निजी हो जाती है। कथ्‍य की इस सीमा को लेखक और निर्देशक लांघ पाते हैं। उनकी फिल्में ज्यादा दर्शक पसंद करते हैं। आम दर्शक पसंद करते हैं। हिंदी फिल्मों की लोकप्रियता का यह तत्‍व अभी तक सफल और कामयाब है। काबिल में भी यह तत्‍व है।
    रोहन डबिंग आर्टिस्ट है। वह अंधा है। हमदर्द मुखर्जी आंटी उसकी मुलाकात सुप्रिया से करवाती हैं। सुप्रिया भी अंधी है। पहली ही मुलाकात में रोहन अपनी बातों से सुप्रिया को रिझा लेता है। जल्द ही दोनों की शादी हो जाती है। एक दर्शक के तौर पर उनकी सुखी और प्रेमपूर्ण जीवन की संभावना से खुश होते हैं। फिल्म के इस हिस्से में लेखक-निर्देशक ने रोमांस और डांस के सुंदर पल जुटाए हैं। उनमें रितिक रोशन और यामी गौतम की जोड़ी प्रिय लगती है। रोहन की बस्ती में ही शेलार बंधु का परिवार रहता है। सत्ता के मद में चूर बदतमीज छोटे भाई की बेजा हरकत से मुश्किल पैदा होती है। उसे बड़े भाई की शह मिली हुई है। शुरू में रोहन को उम्मीद रहती है कि उसे पुलिस की मदद मिलेगी। वहां से निराश होने के बाद वह पुलिस अधिकारी को खुली चुनौती देता है कि अब वह खुद कुछ करेगा। वह पुलिस अधिकारी से कहता है, आप की आंखें खुली रहेंगी, लेकिन आप देख नहीं पाएंगे। आप के कान खुले रहेंगे, पर आप सुन नहीं पाएंगे। आप का मुंह खुला रहेगा, पर आप कुछ बोल नहीं पाएंगे। सबसे बड़ी बात सर, आप सब कुछ समझेंगे, पर किसी को समझा नहीं पाएंगे।
    इंटरवल के ठीक पहले आए रोहन की इस चुनौती के बाद जिज्ञासा बढ़ जाती है कि एक अकेला और अंधा रोहन कैसे सिस्टम के समर्थन से बचे गुनहगारों से निपटेगा। रितिक रोशन ने रोहन के आत्‍मविश्‍वास को स्‍वाभाविक रूप से पर्दे पर उतारा है। रितिक रोशन अभिनय और अभिव्‍यक्ति की नई ऊंचाई काबिल में छूते हैं। हां, उन्होंने आम दर्शकों को रिझाया है। उन्होंने रोहन के किरदार को सटीक रंग और ढंग्र दिया है। फिल्म की शुरूआत में उंगली और पांव की मुद्राओं से उन्होंने अपने अंधे चरित्र को स्थापित किया है। यहां तक कि डांस के सीक्वेंस में कोरियोग्राफर अहमद खान ने उन्हें ऐसे डांसिंग स्टेप दिए हैं कि रोहन दृष्टिबाधित चरित्र जाहिर हो। दर्शकों से तादातम्य बैठ जाने के बाद यह ख्‍याल ही नहीं आता कि कैसे अंधा रोहन सुगमता से एक्शन कर रहा है। एक्शन डायरेक्टर शाम कौशल का यह योगदान है।
    इस फिल्म की विशेषता संजय मासूम के संवाद हैं। उन्होंने छोटे वाक्य और आज के शब्दों में भाव को बहुत अच्छी तरह व्यक्‍त किया है। ऐसा नहीं लगता कि संवाद बोले जा रहे हैं। डायलॉगबाजी हो रही है। संवाद चुटीले, मारक, अर्थपूर्ण और प्रसंगानुकूल हैं।
    यह फिल्म रितिक रोशन की है। फिल्म के अधिकांश दृश्‍यों में वे अकेले हैं। सहयोगी कलाकारों में रोनित रॉय और रोहित रॉय सगे भाइयों की कास्टिंग जबरदस्त है। दोनों ने अपने किरदारों का ग्रे शेड अच्छी तरह पेश किया है। पुलिस अधिकारी चौबे की भूमिका में नरेंद्र झा याद रह जाते हैं। उन्हें अपने किरदार को अच्छी तरह अंडरप्ले किया है।
**** चार स्टार
अवधि 139 मिनट

Saturday, January 21, 2017

तोड़ी हैं अपनी सीमाएं -शाह रूख खान





रईसने कंफर्ट से बाहर निकाला : शाह रुख खान
नए साल में शाह रुख खान अलग सज और धज के आ रहे हैं। वे दर्शकों को रईस’, ‘द रिंगऔर आनंद एल राय की फिल्म की सौगात देंगे, जो उनके टिपिकल अवतार से अलग है। वे ऐसा क्यों और किस तरह कर पाए, पढें खुद उनकी जुबानी
    -अजय ब्रह्मात्‍मज
वे बताते हैं, ’मैंने अमूमन ऐसे किया है। हालांकि लोगों को सामयिक घटनाक्रम ही नजर आता है। रईसभी उसी की बानगी है। दरअसल चेन्नई एक्सप्रेस’, ‘हैप्पी न्यू ईयरऔर दिलवालेसाथ आ गईं थीं। हालांकि नहीं आनी चाहिए थीं। वह इसलिए कि मैंने हैप्पी न्यू ईयरके बाद रईसकी थी। इसकी शूटिंग खत्म हो रही थी और हम हैदराबाद से दिलवालेशुरू करने वाले थे। तब हम उसकी सिर्फ बल्गारिया वाले हिस्से की शूटिंग करने को थे, कि तभी फैनआ गई। वह 40 दिनों की शूटिंग थी। इस बीच रईसआगे खिसक गई। मेरा घुटना चोटिल हो गया। रईसका 14-15 दिनों का काम बाकी रह गया। फैनवीएफएक्स के चलते 11 महीने टल गई। तो कायदे से रईसहैप्पी न्यू ईयरके बाद ही आती, पर अब आई है। लिहाजा लोगों को लग रहा है कि मेरी पसंद में तब्दीली हुई है, जबकि मैं ऑफबीट और जश्‍न वाली फिल्में मिलाकर करता रहा हूं। मसलन, ‘ओम शांति ओमके बाद चक दे इंडियामाय नेम इज खानके साथ दूल्हा मिल गया
असल में फैनया रईसजैसे मिजाज की फिल्में अधिकतम 60-65 दिनों में शूट हो जाती है, लेकिन वह हो नहीं पाया। चोट के चलते बना-बनाया सेट हटा। बाद में फिर से लगाया गया, क्योंकि मेरे साथ आउटडोर शूट करना मुश्किल है। तो यह अब आ रही है। बहरहाल, बीच में गौरी शिंदे के साथ डियर जिंदगीमैंने की। वह अलग दुनिया है, जो मैं नहीं समझता। कई बार मगर बतौर एक्टर आप वैसी जगह जाएं तो कुछ नया जानने-समझने को मिलता है। वही चीज यहां भी हुई। राहुल ढोलकिया परजानियांजैसे जोन से आते हैं। यहां वे पॉपुलर सिनेमा के साथ रियलिज्‍म मिक्स करना चाहते थे, इसलिए वे फरहान-रितेश के पास आए। उनसे कहा कि वे शाह रुख को ले आएं तो मकसद पूरा हो जाएगा। तो वह मेरी दुनिया में आए, मैं उनके जहां में गया। नवाज, जीशान, अतुल कुलकर्णी सब उनकी कायनात से है, पर एक्शन मास्टर मेरी दुनिया का। फिर भी हमने यह नहीं होने दिया है कि हीरो का घूंसा पड़ा और गुंडे हवा में उड़ गए। जालिमागाना राहुल की दुनिया का नहीं है, पर वह फिल्म में फिट हो गया है। इसी तरह लैला मैं लैला महज आइटम नंबर नहीं है। 1985 में उसी तरह के गाने गाए जाते थे। तो रईसएक उम्दा मिश्रण साबित हो गया।
देखा जाए तो रईससे जुड़े हर कलाकार ने अपनी बाउंड्री पुश की है। मिसाल के तौर पर नवाजुद्दीन सिद्दीकी फिल्म में इंस्पेक्टर हैं। मैं माफिया रईस खान। हमारे बीच बहुत बातें हुईं कि हम नया क्या कर सकते हैं। काफी माथापच्ची के बाद तय हुआ कि दोनों के किरदार आपस में बेइंतहा नफरत करें। दोनों चाहते हैं कि दूसरा खत्म हो जाए, पर दोनों का काम ऐसा है कि एक के बिना दूसरे की नौकरी ही नहीं रहेगी। इंस्पेक्टर कहता भी है, ‘साथ रहने नहीं देता, दूर जाने नहीं जाता रईस। नवाज भाई के लिए इज्जत इसलिए बढ़ी कि उन्होंने नफरत को टिपिकल नहीं बनने दिया। फिल्म में उनके किरदार की एंट्री माइकल जैक्सन के डांस से हुई है। वह चीज मैं करूं तो समझ आता है, पर उन्होंने भी अपना कंफर्ट तोड़ा। उन्होंने ही नहीं, बाकी सारे कलाकारों ने अपनी-अपनी खूबियां एक-दूसरे से साझा कीं।
राहुल ढोलकिया को ही देखें तो मुलाकात से पहले उनको लेकर एक अलग धारणा थी। वह यह कि बड़े सीरियस किस्म का फिल्मकार होंगे। बंदे ने परजानियाजैसी फिल्म बनाई है। सच कहूं तो पॉपुलर सिनेमा में बहुत रिसर्च की जरूरत नहीं होती है। सारा काम हीरो के जिम्मे हो जाता है। उसमें कोई बुराई नहीं है। हैलीकॉप्टर से छलांग मारी और लैंड कर गया। वह भी फ्लाइट ऑफ फैंटेसी है। राहुल उस स्‍कूल से आते हैं, जहां कहानी में बहुत रिसर्च की दरकार होती है। यहां उन्होंने मुझ से मिलकर उस कहानी को सब तक पहुंचाने की कोशिश की है। मैं जब स्थापित नहीं भी था तो सबसे कहा करता था कि यार जब अच्छी कहानी है तो उसे हर किसी तक पहुंचाओ न। क्यों आर्टी फिल्म बनाकर सीमित दर्शक तक पहुंचते हो। यहां वह दीवार टूटी है। राहुल और हमने मिलकर आम सहमति से रियल और कमर्शियल के मेल वाली फिल्म बनाई है। हालांकि यह आसान नहीं था। मुझे सेट पर आने में देर होती ही थी, पर सबके जहन में यह बात थी कि यार यह अपनी फिल्म बना रहे हैं।
    हीरोइन के रोल के लिए फरहान, रितेश और मेरे पास सारी च्‍वॉइसें थीं, पर राहुल यहां रियलिज्‍म ही चाहते थे। वह इसलिए कि रईस और उसकी प्रेमिका की कहानी उम्र के सात साल से लेकर 45 तक चलती है। ऐसे में, हमें परफॉर्म करने वाली अभिनेत्री ही चाहिए थी। उनके नाम पर आखिरी क्षणों में मोहर लगी। वे भी सीरियस किस्म की एक्टिंग करती हैं, पर मैं मानता हूं कि उन्हें भी उड़ी उड़ीगाना करने में मजा आया होगा। काफी कुछ सीखने को मिला होगा।

दरअसल : चित्रगुप्‍त की जन्‍म शताब्‍दी



दरअसल....
चित्रगुप्‍त की जन्‍म शताब्‍दी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
2017 हुनरमंद संगीतकार चित्रगुप्‍त का जन्‍म शताब्‍दी वर्ष है। इंटरनेट पर उपलब्‍ध सूचनाओं के मुताबिक उन्‍होंने 140 से अधिक फिल्‍मों में संगीत दिया। बिहार के गोपालगंज जिले के कमरैनी गांव के निवासी चित्रगुप्‍त का परिवार अध्‍ययन और ज्ञान के क्षेत्र में अधिक रुचि रखता था। चित्रगुप्‍त के बड़े भाई जगमोहन आजाद चाहते थी। उनका परिवार स्‍वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़ा था। कहते हैं चित्रगुप्‍त पटना के गांधी मैदान की सभाओं में हारमोनियम पर देशभक्ति के गीत गाया करते थे। बड़े भाई के निर्देश और देखरेख में चित्रगुप्‍त ने उच्‍च शिक्षा हासिल की। उन्‍होंने डबल एमए किया और कुछ समय तक पटना में अध्‍यापन किया। फिर भी उनका मन संगीत और खास कर फिल्‍मों के संगीत से जुड़ रहा। आखिरकार वे अपने दोस्‍त मदन सिन्‍हा के साथ मुंबई आ गए। उनके बेटों आनंद-मिलिंद के अनुसार चित्रगुप्‍त ने कुछ समय तक एसएन त्रिपाठी के सहायक के रूप में काम किया। उन्‍होंने पूरी उदारता से चित्रगुप्‍त को निखरने के मौके के साथ नाम भी दिया। आनंद-मिलिंद के अनुसार बतौर संगीतकार चित्रगुप्‍त की पहली फिल्‍म तूफान क्‍वीन थी। इंटरनेट पर फाइटिंग हीरो का उल्‍लेख मिलता है। यों दोनों ही फिल्‍मेंब 1946 में आई थीं।
एसएन त्रिपाटी के संरक्षण से निकलते पर चित्रगुप्‍त ने आरंभ में स्‍टंड और एक्‍शन फिल्‍मों में संगीत दिया। संगीतकार एसडी बर्मन ने उनका परिचय दक्षिण के एवीएम से करवा दिया। इस प्रोडक्‍शन के लिए उन्‍होंने अनेक धार्मिक और सामाजिक फिल्‍मों में संगीत दिया। दिग्‍गज संगीतकारों के बीच मुख्‍यधारा की फिल्‍मों में जगह बनाने में उन्‍हें देर लगी। हाशिए पर मिले कुछ मौकों में ही उन्‍होंने अपना हुनर जाहिर किया। उनके गीत पॉपुलर हुए। समीक्षकों और संगीतप्रेमियों ने उनकी तारीफ भी की। हालांकि 1946 से चित्रगुप्‍त को स्‍वतंत्र फिल्‍में मिलने लगी थीं,ले‍किन उन्‍हें सिंदबाद द सेलर से ख्‍याति मिली। इस फिल्‍म में उन्‍होंने अंजुम ज्‍यपुरी और श्‍याम हिंदी के लिखे गीतों को शमशाद बेगम,मोहम्‍मद रफी और किशोर कुमार से गवाया था। इसी फिल्‍म के एक गीत धरती आजाद है में चित्रगुप्‍त ने मोहम्‍म्‍द रफी के साथ आवाज भी दी थी।
16 नवंबर 1917 को बिहार में जन्‍मे चित्रगुप्‍त का निधन मुंबई में 14 जनवरी 1991 को उनके बेटों की फिल्‍म कयामत से कयामत तक आ चुकी थी। उन्‍होंने अपने पापा के नाम और परंपरा को थाम लिया था। चित्रगुप्‍त के करिअर में 1962 में आई भोजपुरी की पहली फिल्‍म गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो का खास महत्‍व है। इस फिल्‍म के बाद उन्‍होंने अनेक भोजपुरी फिल्‍मों में संगीत दिया। इस उल्‍लेखनीय शिफ्ट से उनके संगीत में भी बदलाव आया। 1962 के बाद की उन्‍की हिंदी फिल्‍मों के संगीत में भी भोजपुरी या यूं कहें कि पुरबिया धुनों और वाद्यों की गूंज सुनाई पड़ती है। चित्रगुप्‍त के संगीत में हिंदुस्‍तान की धरती की भरपूर सुगंध है। हिंदीभाषी इलाके से आने की वजह से उनके निर्देशन में लोकप्रिय गायकों की आवाज में शब्‍दों की शुद्धता के साथ लहजे और उच्‍चारण पर भी जोर दिखता है। वे गीतकारों की भी मदद करते थे। अंतरों में शब्‍दों को ठीक करने से लेकर भावों के अनुकूल शब्‍दों के चयन तक में उनका योगदान रहता था। आज का दौर रहता तो उन्‍हें कई गीतों में गीतकार का भी क्रेडिट मिल जाता।
उम्‍मीद है कि उनकी जन्‍म शताब्‍दी के वर्ष में उनके महत्‍व और योगदान को रेखांकित किया जाएगा। कम से कम बिहार सरकार और वहां की सरकारी व गैरसरकारी फिल्‍म और सांस्‍कृतिक संस्‍थाएं ध्‍यान देंगी। 
बाक्‍स आफिस
दर्शक बढ़े हरामखोर के

समीति बजट से कम लागत में बनी श्‍लोक शर्मा की हरामखोर ने पहले वीकएंड में 1 करोड़ से अधिक का कलेक्‍शन किया। फिल्‍म कारोबार में ऐसी छोटी फिल्‍मों के मुनाफे पर ध्‍यान नहीं जाता। इस लिहाज से हरामखोर कामयाब फिल्‍म है। शुक्रवार को इसका कलेक्‍शन 23.70 लाख था,जो रविवार को बढ़ कर 41.90 लाख हो गया। वहीं शाद अली की फिल्‍म ओक जानू की यह बढ़त मामूली रही। शुक्रवार को ओक जानू का कलेक्‍शन 4.08 करोड़ था,जो शनिवार को 4.90 और रविवार को 4.82 करोड़ हुआ। ओके जानू का वीकएंड कलेक्‍शन 13.80 करोड़ रहा। हां,इस बीच दंगल ने 370 करोड़ का भी आंकड़ा पार कर लिया।
 


Tuesday, January 17, 2017

बड़ी कुर्बानियां दी हैं मैंने : प्रियंका चोपड़ा




-मयंक शेखर

प्रियंका चोपड़ा हाल ही में अमेरिका से अपने वतन लौटी थीं। वहां से, जहां डोनाल्‍ड ट्रंप नए राष्‍ट्रपति बने हैं। वहां से, जहां के ग्लैमर जगत में प्रियंका भारत का नाम रौशन कर रही हैं। हमारे सहयोगी टैबलॉयड मिड डे के एंटरटेनमेंट एडीटर मयंक शेखर उनकी सोच के हमराज बने। पेश है उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश :-


-बीते दो-तीन बरसों में आप के करियर ने अलग मोड़ लिया है। क्वांटिको के अगुवा केली ली से हुई मुलाकात को आप के करियर में आते रहे मोड़ का विस्तार कहें। साथ ही उस मुलाकात में और उसके बाद क्या कुछ हुआ।
0 मुझे नहीं लगता कि मैं एक खोज हूं। उसकी बजाय मैं एक अनुभव हूं। आओ चलो, उसे लौंच करते हैं। ऐसा मेरे संग कभी नहीं हुआ। लोगों को मेरे करियर के आगाज से लेकर अब तलक मेरी प्रतिभा को महसूस करना पड़ा है। तभी प्रारंभ से ही हर दो-तीन साल के अंतराल पर मेरे करियर में अहम मोड़ आते रहे हैं। क्वांटिकोमें भी मैं इसलिए कास्ट की गई, क्योंकि वह किसी भारतीय कलाकार का अमरीकियों के लिए सबसे आसान परिचय था। जैसा निर्माताओं ने मुझे बताया। एफबीआई एजेंट के किरदार में खुद को तब्दील कर वह काम मेरे लिए आसान रहा। इस किस्म का काम अब तलक किसी भारतीय कलाकार ने नहीं किया है।
-आप ने अपना सिंगल वहां लौंच किया था। पिट बुल के साथ भी गाना तैयार किया। उनके चलते वे आप को जान सके।
0 नहीं। केली ली से मेरी मुलाकात एक पार्टी में हुई थी।
-         यानी, वह आप का टर्निंग पॉइंट था।
0 लेकिन , मैं किसी की खोज नहीं थी। पार्टी में केली मुझसे कहने लगीं कि मैं टिपिकल हिंदुस्तानी कलाकारों की तरह नहीं लगती। सिनेमा, अदाकारी को लेकर मेरे विचारों से वे प्रभावित थीं। उस मुलाकात में केली ने यह नहीं कहा कि मैं बड़ी हसीन हूं। या मैं आप को तो कास्ट करूंगी ही। मुझे लगता है कि आज की तारीख में कहीं की भी प्रतिभा ग्लोबल फिल्म परिवार का हिस्सा बन सकती हैं। वही हुआ। मेरा चयन रिकॉर्डिंग आर्टिस्ट के लिए भी हुआ। इसलिए नहीं कि मैं गाना गा सकती हूं। वह तो हर कोई कर सकता है। मुझे बताया कि मैं उस काम के लिए मुफीद थी। मुझे नहीं मालूम कि उनकी मुफीद की क्या परिभाषा है। मुझे नहीं पता कि मेरे फेवर में किन चीजों ने फेवर किया। बस इतना जानती हूं कि मैं मिलते रहे कामों को ढंग से करती रही। आज आप के समक्ष हूं।
-अपने 30वें जन्मदिन पर आप वहां के ह्वाइट हाउस में आयोजित रात्रिभोज की मेहमान बनीं। अमरीका की जानी-मानी हस्तियों से मिलीं। उन पलों को सोच आप को नहीं लगता कि वाह, कितना कुछ हासिल कर लिया मैंने।
0 मैं महज 17 की उम्र में मिस वल्र्ड बनी। उसके बाद हिंदी सिनेमा का हिस्सा बनी। मैं 20 की भी नहीं थी, जब कई नामी ग्लोबल लीडर से मेरी मुलाकात हो चुकी थी। लिहाजा बड़े-बड़े लोगों से मिलने पर हतप्रभ वाले एहसास तो बहुत पहले जा चुके हैं। अब काम की खातिर भारत, अमेरिका या ब्रिटेन में मैं लोगों से बतौर सहकर्मी मिला करती हूं। मैं किसी की आभा में नहीं आती। सिवाय गायकों को छोड़। उन्हें देख, सुन या मिल तो पता नहीं मुझे क्या हो जाता है।
-         आप इस प्रवास से पहले भी अमेरिका में रह चुकी हैं। 12 से 16वें साल तक ही। आप के क्लास में नस्लभेदी छात्र भी थे, इसलिए आप वहां से लौट आईं। अब डोनाल्ड ट्रंप की जीत से आप क्या मतलब निकालती हैं।
-         0 तब नस्लभेदी टिप्पणी करने वाली लड़की से ज्यादा स्‍कूल के माहौल को मैं कसूरवार मानती हूं। वह लड़की मुझसे प्रतिस्‍पर्धा रखती थी। दौड़ में आगे रहने की खातिर भी वह मन में मेरे प्रति कड़वाहट रखती थी। रहा सवाल वहां के हालिया चुनाव का तो मैं कौन होती हूं, ट्रंप की जीत के मायने मालूम करने वाली। मैं तो बस वहां काम करती हूं। लेकिन हां, मैंने अपने दोस्तों व सहकर्मियों में उनकी जीत से हुई निराशा महसूस की है। मैंने लोगों में खासा कन्फ्यूजन देखा। इस बात को लेकर कि अरे यह क्या हो गया। कैसे हो गया। दरअसल हर मुल्क के अपने मसले हैं। हमारे अपने हैं। उनके अपने। आप को अपना स्टैंड पता होना होना चाहिए। जोर इस बात पर हो कि आप के कर्मों से देश के टुकड़े न हों।
-नफरत के निशां अब भी नहीं मिटे हैं। हाल में आप ट्वीटर पर ट्रॉल की गई थीं। आप को अरबी आतंकी तक कहा गया। क्या यह ट्रंप का अमेरिका जाहिर करता है।
0 ऐसा मानना नाजायज होगा। पूरी दुनिया में अव्‍यावहारिक नेता चुने जाते रहे हैं। यह हमारी जिम्मेदारी बनती है कि इस सिलसिले पर कैसे लगाम लगाई जाए। हम साथ मिलकर काम करना भी भूल जाते हैं। हमारा अधिकांश वक्त तो अपनी सरकार को कोसने में चला जाता है। यह कहते हुए कि उसने हमारे लिए क्या किया। मेरा कहना है कि भई, हमने  अपने देश के लिए क्या किया। इंसानियत जिंदा रहे, उसके लिए कुछ भी किया। नहीं। मैं मिस वल्र्ड जैसा साउंड नहीं करना चाहती, मगर यह हकीकत है। रौ में आ नेताओं को कोसना बदस्तूर जारी रहा, तो हमारी दशा जस की तस बनी रहने वाली है।
-         आप इतना काम कर रही हैं। जीवन के साथ काम का संतुलन है भी कि नहीं।
0 है तो। पर हां, डेडलाइन के साथ। दरअसल हमें कुछ भी यूं ही नहीं मिलता। मैंने बहुत कुर्बानियां दी हैं। तब जाकर यह स्टेटस हासिल हुआ है। मैं उन चुनिंदा लोगों में से हूं, जो अपार मौके व कहीं की भी स्‍वीकार्यता हासिल कर लेते हैं। लिहाजा अपने लिए दो महीने भी छुट्टियां लेने का ख्‍याल दिल में नहीं आता।
-अपने लिए तो छोड़ ही दें। डेटिंग के लिए भी वक्त निकाल पाती हैं।
0 मुझे डेटिंगका कौन्सेप्ट पल्ले नहीं पड़ता। भारत में तो वैसे भी डेटिंग कहां होती है। आप दोस्तों से मिलते हो। आप के तार जुड़ते हैं
-आप पुरातन काल या टिंडर जैसे डेटिंग साइट आने से पहले की बातें कर रही हैं।
0 हो सकता है। मैं अब तक उस साइट का हिस्सा नहीं बनी हूं। न कभी किसी को डेट किया है। बाकी जो जब तक शादीशुदा नहीं है,  वह तब तलक सिंगल ही कहलाता है।

Saturday, January 14, 2017

फिल्‍म समीक्षा : ओके जानू

फिल्‍म रिव्‍यू
ओके जानू
-अजय ब्रह्मात्‍मज
शाद अली तमिल के मशहूर निर्देशक मणि रत्‍नम के सहायक और शागिर्द हैं। इन दिनों उस्‍ताद और शाग्रिर्द की ऐसी जोड़ी कमू दिखाई देती है। शाइ अली अपने उस्‍ताद की फिल्‍मों और शैली से अभिभूत रहते हैं। उन्‍होंने निर्देशन की शुरूआत मणि रत्‍नम की ही तमिल फिल्‍म के रीमेक साथिया से की थी। साथिया में गुलजार का भी यागदान था। इस बार फिर से शाद अली ने अपने उस्‍ताद की फिल्‍म ओके कनमणि को हिंदी में ओके जानू शीर्षक से पेश किया है। इस बार भी गुलजार साथ हैं।
मूल फिल्‍म देख चुके समीक्षकों की राय में शाद अली ने कुछ भी अपनी तरफ से नहीं जोड़ा है। उन्‍होंने मणि रत्‍नम की दृश्‍य संरचना का अनुपालन किया है। हिंदी रीमेक में कलाकार अलग हैं,लोकेशन में थोड़ी भिन्‍नता है,लेकिन सिचुएशन और इमोशन वही हैं। यों समझें कि एक ही नाटक का मंचन अलग स्‍टेज और सुविधाओं के साथ अलग कलाकारों ने किया है। कलाकरों की अपनी क्षमता से दृश्‍य कमजोर और प्रभावशाली हुए हैं। कई बार सधे निर्देशक साधारण कलाकारों से भी बेहतर अभिनय निकाल लेते हैं। उनकी स्क्रिप्‍ट कलाकारों को गा्रे करने का मौका देती है। ओके जानू में ऐसा ही हुआ है। समान एक्‍सप्रेशन से ग्रस्‍त आदित्‍य राय कपूर पहली बार कुछ खुलते और निखरते नजर आए हैं। हां,श्रद्धा कपूर में उल्‍लेखनीय ग्रोथ है। वह तारा की गुत्थियों और दुविधाओं को अच्‍छी तरह व्‍यक्‍त करती है। चेहरा फोकस में हो तो उतरते,बदलते और चढ़ते हर भाव को कैमरा कैद करता है। कलाकार की तीव्रता और प्रवीणता पकड़ में आ जाती है। श्रद्धा कपूर ऐसे क्‍लोज अप दृश्‍यों में संवाद और भावों को अच्‍दी तरह व्‍यक्‍त करती हैं। युवा कलाकारों को संवाद अदायगी पर काम करने की जरूरत है। इसी फिल्‍म में गोपी का किरदार निभा रहे नसीरूद्दीन शाह मामूली और रुटीन दृश्‍यों में भी बगैर मेलोड्रामा के दर्द पैदा करने में सफल रहे हैं। यह उनकी आवाज और संवाद अदायगी का असर है। यहां तक कि लीला सैमसन अपने किरदार को भी ऐसे ही गुणों से प्रभावशाली बनाती हैं।
फिलम की कहानी आज के युवा किरदारों के आग्रह और भ्रम पर केंद्रित है। तारा और आदि आज के युवा ब्रिगेड के प्रतिनिधि हैं। दोनों महात्‍वाकांक्षी हैं और जीवन में समृद्धि चाहते हैं। तारा आर्किटेक्‍अ की आगे की पढ़ाई के लिए पेरिस जाना चाहती है। आदि का ध्‍येय वीडियो गेम रचने में लगता है। वह अमेरिका को आजमाना चाहता है। आदि उसी क्रम में मुंबई आता है। वह ट्रेन से आया है। दोनों उत्‍तर भारतीय हैं। तारा समृद्ध परिवार की लड़की है। आदि मिडिल क्‍लस का है। फिल्‍म में यह गौरतलब है कि आदि को वहडयो गेम का सपना आता है तो निर्देश और सड़कों के दोनों किनारों की दुकानों के साइन बोर्ड हिंदी में लिखे हैं,लेकिन जब वह वीडियो गेम बनाता है तो सब कुछ अंग्रेजी में हो जाता है। शाद अली ने बारीकी से उत्‍तर भारतीय के भाषायी अवरोध और प्रगति को दिखाया है। बहरहाल, इस फिल्‍म में भी दूसरी हिंदी फिल्‍मों की तरह पहली नजर में ही लड़की लड़के को आकर्षित करती है और फिर प्रेम हो जाता है।
ओके जानू प्रेम और करिअर के दोराहे पर खड़ी युवा पीढ़ी के असमंजस बयान करती है। साहचर्य और प्‍यार के बावजूद शादी करने के बजाय लिव इन रिलेशन में रहने के फैसले में कहीं न कहीं कमिटमेंट और शादी की झंझटों की दिक्‍कत के साथ ही कानूनी दांवपेंच से बचने की कामना रहती है। हम लिव इन रिलेशन में रहने और अलग हो गए विख्यात प्रेमियों को देख रहे हैं। उनकी जिंदगी में तलाक की तकलीफ और देनदारी नहीं है। खास कर लड़के ऐसे दबाव से मुक्‍त रहते हैं। आदि और तारा दोनों ही स्‍पष्‍ट हैं कि वे अपने ध्‍येय में संबंध को आड़े नहीं आने देंगे। ऐसा हो नहीं पाता। साथ रहते-रहते उन्‍हें एहसास ही नहीं रहता कि वे कब एक-दूसरे के प्रति कमिटेड हो जाते हैं। उनके सामने गोपी और चारू का साक्ष्‍य भी है। उन दोनों की परस्‍पर निर्भरता और प्रेम आदि और तारा के लिए प्रेरक का काम करते हैं।
अपनी प्रगतिशीलता के बावजूद हम अपनी रूढि़यों से बच नहीं पाते। इसी फिल्‍म में गोपी तारा से पूछते हैं कि वह करिअर और प्‍यार में किसे चुनेगी? यही सवाल आदि से भी तो पूछा जा सकता है। दरअसल, हम लड्कियों के लिए प्‍यार और करिअर की दुविधा खड़ी करते हैं। ओके जानू ऐसे कई प्रसंगों की वजह से सोच और अप्रोच में आधुनिक होने के बावजूद रूढि़यों का पालन करती है।
अवधि- 135 मिनट
तीन स्‍टार 

Friday, January 13, 2017

फिल्‍म समीक्षा : हरामखोर



फिल्‍म रिव्‍यू
हरामखोर
-अजय ब्रह्मात्‍मज

ऐसी नहीं होती हैं हिंदी फिल्‍में। श्‍लोक शर्मा की हरामखोर को किसी प्रचलित श्रेणी में डाल पाना मुश्किल है। हिंदी फिल्‍मों में हो रहे साहसी प्रयोगों का एक नमूना है हरामखोर। यही वजह है कि यह फिल्‍म फेस्टिवलों में सराहना पाने के बावजूद केंद्रीय फिल्‍म प्रमाणन बोर्ड(सीबीएफसी) में लंबे समय तक अटकी रही। हम 2014 के बाद फिल्‍मों के कंटेंट के मामले में अधिक सकुंचित और संकीर्ण हुए हैं। क्‍यों और कैसे? यह अलग चर्चा का विषय है। हरामखोर सीबीएफसी की वजह से देर से रिलीज हो सकी। इस बीच फिल्‍म के सभी कलकारों की उम्र बढ़ी और उनकी दूसरी फिल्‍में आ गईं। नवाजुद्दीन सिद्दीकी और श्‍वेता त्रिपाठी दोनों ही हरामखोर के समय अपेक्षाकृत नए कलाकार थे। यह फिल्‍म देखते हुए कुछ दर्शकों को उनके अभिनय का कच्‍चापन अजीब लग सकता है। हालांकि इस फिल्‍म कि हसाब से वही उनकी खूबसूरती और प्रभाव है,लेकिन नियमित दर्शकों को दिक्‍कत और परेशानी होगी। 20-25 सालों के बाद फिल्‍म अधेताओं को याद भी नहीं रहेगा कि यह मसान और बजरंगी भाईजानरमन राघव2.0 के पहले बन चुकी थी।
बहरहाल,हरामखोर एक कस्‍बे में पिता के साथ पल रही एकाकी किशोरी संध्‍या की कहानी है। इस फिल्‍म को उसकी नजर से देखें तो शाम के करीब आती संध्‍या स्‍वाभाविक लगेगी। टीचर शाम से मिल रही तवज्‍जो से उसे सुकून मिलता है। वह पिटने और दुत्‍कारे जाने के बावजूद टीचर शाम के प्रति आकर्षित रहती है। टीचर शाम की पृष्‍ठभूमि के मद्देनजर उसके व्‍यक्त्त्वि का श्‍याम पक्ष अस्‍वाभाविक नहीं लगता। देखें तो इस फिल्‍म के सभी किरदार किसी न किसी कमी और वंचना के शिकार हैं। वे सभी हरामखोर हैं। संध्‍या के साथ टयूशन पढ़ रहे कमल और मिंटू का संध्‍या के प्रति आकर्षण और प्रेम किशोर उम्र की उच्‍छृंखलता है। श्‍लोक शर्मा बगैर किसी आग्रह के उनके बीच पहुंच जाते हैं और उनकी गतिविधियों को कहानी में पिरोते हैं। उन्‍होंने अपने किरदारों को तराशा और छांटा नहीं है।
श्‍वेता त्रिपाठी और नावाजुद्दी सिद्दीकी के अभिनय का कच्‍चापन और अनगढ़पन ही इस फिल्‍म की विशेषता है।  कमल और मिंटू की भूमिका में मास्‍टर इरफान खान और मोहम्‍मद समद की सहजता अच्‍छी लगती है। श्‍लोक शर्मा और उनकी तकनीकी टीम ने फिल्‍म को सजाने की कोशिश भी नहीं की है। फिल्‍म का लोकेशन कहानी को विश्‍वसनीय बनाता है। सीमित बजट और संसाधनों में उन्‍होंने हरामखोर को मुमकिन किया है। निश्चित ही हमें श्‍लोक शर्मा के साहस और युक्ति की तारीफ करनी होगी। उनके निर्माताओं और निर्माण सहयोगियों को बधाई देनी होगी कि उन्‍होंने फिल्‍म में ईमानदारी बरती और उसके प्रदर्शन में विश्‍वास रखा।
अवधि- 94 मिनट
ढाई स्‍टार
   

दरअसल : इंतजार है ईमानदार जीवनियों का



दरअसल...
इंतजार है ईमानदार जीवनियों का
-अजय ब्रह्मात्‍मज
इस महीने ऋषि कपूर और करण जौहर की जीवनियां प्रकाशित होंगी। यों दोनों फिल्‍मी हस्तियों की जीवनियां आत्‍मकथा के रूप में लाई जा रही हैं। उन्‍होंने पत्रकारों की मदद से अपने जीवन की घटनाओं और प्रसंगों का इतिवृत पुस्‍तक में समेटा है। मालूम नहीं आलोचक इन्‍हें जीवनी या आत्‍मकथा मानेंगे? साहित्यिक विधाओं के मुताबिक अगर किसी के जीवन के बारे में कोई और लिखे तो उसे जीवनी कहते हैं। हां,अगर व्‍यक्ति स्‍वयं लिखता है तो उसे आत्‍मकथा कहेंगे। देव आनंद(रोमासिंग विद लाइफ) और नसीरूद्दीन शाह(एंड देन वन डे: अ मेम्‍वॉयर) ने आत्‍मकथाएं लिखी हैं। दिलीप कुमार की द सब्‍सटांस ऐंड द शैडो : ऐन ऑटोबॉयोग्राफी आत्‍मकथा के रूप में घोषित और प्रचारित होने के बावजूद आत्‍मकथा नहीं कही जा सकती। यह जीवनी ही है,जिसे उदय तारा नायर ने लिखा है। इसी लिहाज से ऋषि कपूर और करण जौहर की पुस्‍तकें मुझे जीवनी का आभास दे रही है।
हिंदी फिल्‍मों के स्‍टार और फिल्‍मकार अपने जीवन प्रसंगों के बारे में खुल कर बातें नहीं करते। नियमित इंटरव्‍यू में उनके जवाब रिलीज हो रही फिल्‍म तक सीमित रहते हैं। इन दिनों तो फिल्‍म स्‍टारों के इंटरव्‍यू में उनके पीआर और मैनेजर पहले ही हिदायत दे देते हैं कि सवाल फिल्‍म या इवेंट से ही संबंधित हो। अब तो वे खुद इंटरव्‍यू के दौरान बैठे रहते हैं। अगर कभी स्‍टार जवाब देने में बह जाए तो वे आंखें तरेरने लगते हैं। उनका दबाव और हस्‍तक्षेप इतना बढ़ गया है कि वे कई बार पत्रकार और स्‍टार तक को सवाल व जवाब से रोक देते हैं। ऐसी स्थिति में हर बातचीत यांत्रिक और लगभग एक जैसी होती है। इसमें एक और रोचक समस्‍या सन्निहित है। हम पत्रकार जब किसी नई फिल्‍म के बारे में बातचीत करने जाते हैं तो एकत्रित सूचनाओं के आधार पर सवाल करते हैं। कोशिश रहती है कि फिल्‍म और फिल्‍म बनाने की प्रक्रिया पर जानकारियां मिलें। स्‍टार और डायरेक्‍टर की पूरी कोशिश यह र‍हती है कि वे फिल्‍म के बारे में कुछ भी नहीं पता चलने दें। सवाल-जवाब की इस लुकाछिपी की वजह से इन दिनों जीवन शैली,परिधान और उनकी यात्राओं से संबंधित बातें ही हो पाती हैं। अपने यहा फिल्‍म स्‍टार कुछ भी बोलने में हिचकने के साथ डरते भी हैं। हम ने देखा कि असहिष्‍णुता के मामले में अपना पक्ष रखने के नतीजे आमिर खान और शाह रूख खान ने भुगते। हम कल्‍पना नहीं कर सकते कि हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री की कोई हस्‍ती मेरिल स्ट्रिप की तरह देश के सर्वोच्‍च पद पर बैठी हस्‍ती पर सवाल करे।
तात्‍पर्य यह कि अभिव्‍यक्ति के इस संकोच की वजह से जीवनी और आत्‍मकथाएं रोचक नहीं हो पातीं। उन्‍हें पढ़ते हुए कोई नई जानकारी नहीं मिलती। कई बार तो यह भी लगता है कि फिल्‍मी हस्‍तियों की तरफ से तथ्‍यों की लीपापोती की जा रही है। जैसे वे पर्दे पर आने के पहले मेकअप कर लेते हैं,वैसे ही पन्‍नों पर आने के पहले बातों को डिजाइन और मेकअप से पोत देते हैं। करण जौहर की फिल्‍मों और जीवनशैली में जिंदगी की सच्‍चाइयों की झलक भी डिजाइन की जाती है। उनके शो और इवेंट स्क्रिप्‍टेड होते हैं। मुझे उनकी जीवनी में उनकी जिंदगी की सच्‍चाई की कम उम्‍मीद है। वे सेक्‍सुअलिटी के मामले को दबे-ढके तरीके से ही उजागर करेंगे। हां,ऋषि कपूर की जीवनी रोचक हो सकती है। उन्‍होंने ट्वीट किया है कि यह दिल से लिखी मेरी जिंदगी और घड़ी है...जैसा मैंने जिया। अगर वे वादे और पुस्‍तक के शीर्षक के मुताबिक खुल्‍लमखुल्‍ला कुछ कह पाते हैं तो बढि़या।

बाक्‍स आफिस
कलेक्‍शन के अखाड़े में दंगल विजेता
हिंदी फिल्‍मों में 100 करोड़ क्‍लब कलेक्‍शन और कमाई का पहला क्‍वालिफाइंग कदम बन चुका है। इसके बाद ही किसी फिल्‍म को सफल माना जाता है। ज्‍यादा सफल फिल्‍में 200-300 करोड़ तक पहुंचती हैं। कुछ फिल्‍मों ने ही 300 करोड़ से अधिक का कलेक्‍शन किया है। दंगल हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री की पहली फिल्‍म है,जिसने 350 करोड़ से अधिक का कलेक्‍शन कर एक नया मानदंड स्‍थापित कर दिया है। इसने सिर्फ 19 दिनों में 353ण्‍68 करोड़ का कलेक्‍शन किया है। अब देखना है कि यह 375 से 400 करोड़ तक पहुंच पाती है कि नहीं?


Tuesday, January 10, 2017

हिंदी टाकीज 2(11) : आज नदी पार वाले गांव में पर्दा वाला सिनेमा लगेगा - जनार्दन पांडेय

परिचय
जनार्दन पांडेय एक आम सिनेमा दर्शक है। उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में पला-बढ़ा। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में स्नातक करने के बाद हिन्दुस्तान हिन्दी दैनिक से जुड़ा। उसके बाद अमर उजाला डॉट कॉम से जुड़ा। वहां तीन साल काम करने के बाद अब अपनी वेबसाइट www.khabarbattu.com में कार्यरत।
 

सिनेमा में नशा है, जो मुझे चढ़ता है। जी होता है, एक के बाद एक तब देखता रहूं, जब तक दिमाग और आंखें जवाब न दे जाएं। लेकिन नशा तो आखिर में नशा है, बुरा ही माना जाएगा। चाहे किसी बात का हो। मम्मी ने पीट-पीट कर समझाया पर मैं समझा नहीं।

मेरा घर उत्तर प्रदेश के उस जिले में हैं जो यूपी को मध्य प्रदेश-झारखंड से जोड़ता है। मेरा गांव एक संपूर्ण गांव है। किसी एक के घर में कोई घटना-दुघर्टना होती है पूरे गांव के ‌लिए अगले 10 दिनों तक वही मुद्दा होता है।

राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की मौत की खबर 6 दिन बाद पहुंचती है। पठानकोट में हमला हुआ तो छनते-छनते यह खबर दो-चार दिन बाद पहुंचती है। और इसके मायने यही निकाले जाते हैं कि पूछो 'राहुल के पापा ठीक हैं न वो भी बॉर्डर पर हैं'।

मुंबई में 26/11 हमले के छह साल बाद कोई मुंबई जाने के बारे में बात करे तो मां रुआसी हो जाएंगी। क्योंकि छह साल पहले वहीं हमला हुआ था। फिर से कोई बम गिरा दिया तो। हमले वहीं होते हैं।

खैर, गांव वाले बताते हैं कि गांव में पहली टीवी डैडी को दहेज में मिली थी। तब महाभारत देखने के लिए 200-300 लोग हमारे दलान में बैठते थे। लेकिन परिवार था, संयुक्त। डैडी-मम्मी की टीवी पर अधिकार बड़े पापा का।

'बुश' कंपनी की भारी-भरकम टीवी भी मेरे बड़े होने तक थमी नहीं। जिन दिनों मैं बड़ा हुआ मेरी टीवी मम्मी की एक पुरानी साड़ी में बांधकर कोठे पर रख दी गई थी।

इसलिए फिल्म देखने के लिए किसी चाचा-ताऊ, भइया के घर जाना पड़ता था। वे लोग मुझे बिल्कुल पसंद नहीं करते थे। वह कई तरह के इशारों में मुझे वहां चले जाने के लिए कहते थे। बाकी लड़कों की तरह मुझे भगा नहीं सकते थे क्योंकि पहले उन्होंने मेरी टीवी का खूब दोहन किया है।

दूसरा तरीका होता था वीडियो कास्टेड रिकॉर्डर (वीसीआर, तब तक सीडी नहीं आई थी मेरे गांव में), जो कि किसी की शादी-व्याह में ही आता। पर हमारा (गांव के 10-12 बच्चे) शादी-व्याह से कोई मतलब न होता बस मिठाई खाने के अलावा। हमारा सारा ध्यान करीब रात के 12 से शुरू हो जाने वाले वीसीआर पर टिका होता।

जिस दिन वीसीआर आने की उम्मीद होती, शाम पांच बजे से ही खबर तैर जाती। कौन-कौन सी फिल्में आनी हैं, इस पर जिक्र होने लगता- 'मिथुनवा क कउनो आई के नाही', अरे धरमेंदर की उ वाली आवती ह, जउने में अमरेश पूरिया क बीचवय में बरवा रहला ('लोहा' की बात हो रही है)। अजे देवगनवा क जिगर?
बढ़िया होंडा (छोटा जनरेटर, वहां लाइट कुछ-कुछ घंटों के लिए आती है इसलिए), बड़े-बड़े वीसीआर के कैसेट एक भारी सी टीवी और उसमें दिखने वाली फिल्में- बैरी कंगना, घर द्वार, आज का अर्जुन, दिल जले, विजय पथ और सुल्तान-चांडाल-जस्टिस चौधरी आदि में से कोई न कोई एक मिथुन चक्रवर्ती की फिल्म।

एकदम मजा आ जाता था। कितनी ही बार ऐसा हुआ कि मैं शाम को छह बजे ही अपने घर से भाग लिया। दरअसल, घर से भागना पड़ता था, जो मेरी मम्मी को नागवार था।

घर का बड़ा लड़का होने के नाते और जिस वक्त फिल्म का नशा पकड़ना शुरू हुआ, उसी वक्त घर में अलगौजी (बंटवारा) होने के चलते छोटे भाई-बहनों को संभालने घर के छोटे काम भी मेरे जिम्मे ही आ गए।

शाम को मम्मी को घर-बासन (खाना बनाना, बर्तन धुलना, रसोई घर की पोताई करना) करना होता था। छुटकवे इसमें परेशानी डालते थे। बच्चों को खिलाने में मेरी डैडी की कोई दिलचस्पी थी नहीं। इसलिए मम्मी किसी-किसी दिन, रातभर रोमांचक वीसीआर देखने के बाद सुबह-सुबह रोमांचक डंडे से स्वागत भी करती थी।

वीसीआर के अलावा दूसरा साधन डीडी 1 पर शुक्रवार रात 9:30 आने वाली फिल्म। कितनी शिद्दत से हम भगवान से मनाते थे कि लाइट न कटे भगवान। फिर क्या छोटे चच्चा के यहां मस्त 50 लोगों की भीड़ में बैठकर 10 मिनट फिल्म 15 प्रचार तब देखा जाता था जब हीरो बढ़िया से हरामी (खलनायक) का कचूमर न निकाल दे। इनमें- जिद्दी, अर्जुन पंडित, इलाका, जंग, बुलंदी, अनाड़ी, राजा हिन्दुस्तानी आदि थीं।

मुझे ऐसी फिल्में बिल्कुल नहीं पसंद थी जो ज्यादातर रविवार शाम चार बजे शुरू होती थीं। उनमें बहुत उलझी हुई फिल्में आती थीं। समझ नहीं आता था हीरो-हीरोइन चाहते क्या हैं। हरामी (खलनायक) भी दूसरे किस्म के होते थे। और हीरो कुछ नहीं कर पाता था। आखिर में मर ऊपर से जाता था, बगैर मतलब।
नहीं कि किसी को मार के मरे। खुद ही खुद को मार ले रहा है। ऐसे में हम लोग क्रिकेट खेलने चले जाते थे। वो फिल्में थीं- रोजा, दिल से, रेनकोट, एक दूजे के लिए आदि।।।

कुछ सालों बाद सीडी (प्लेयर और सतरंगी गोले कैसेट, बेहद पेचीदा रिमोर्ट- जिस बच्चे को चलाने आ जाए, पूछ‌िए मत उसकी कितनी खातिरदारी होगी) आई। तब छोटी जातियों की शादी में सिनेमा दिखने लगा। और मेरे सारे दास्तों से अलगाव हो गया। क्योंकि बभनाने (बड़ी ‌‌बिरादरी) घरों के बच्चे छोटी जाति के दरवाजे पर जाकर नीचे बैठकर फिल्म कैसे देखेगा।

लेकिन मुझे मंजूर था। इसमें मेरी खूब छीछालेदर हुई। कितने ही बार डैडी आकर मुझे खाना पहुंचा जाते थे। उन्हें डर था कि कहीं लड़कवा वहां खाना न खा ले।
‌और जिस किसी दिन यह चर्चा हो जाए कि आज फलाने जगह पर्दा वाला सिनेमा लगेगा (गांव में आकर दो बांस गाड़ के उनमें पर्दा लगाकर बड़ी स्क्रिन तैयार के सिनेमा दिखाया जाता था) तो मैं आस-पड़ोस के 6-8 किलो मीटर जाने के लिए तैयार रहता।

इसके चक्कर में कई बार नदी डाकना पड़ा। रात को 10-10 बजे। गांव कहते उसमें भूत हैं। लेकिन फिल्म के भूत के आगे मुझे कोई और भूत नजर नहीं आता। एक दो बार तो जमकर भींगते हुए मैं छह किलो मीटर दूर पर्दा वाला सिनेमा देखने पहुंच गया।

रात भर कांपते हुए फिल्म देखा सुबह 104 डिग्री फारेनहाइट बुखार चढ़ाकर आ गया। फिर मम्मी गईं बनवारी (गांव के इकलौते डॉक्टर- छोलाछाप आप कह सकते हैं, हम नहीं) को बुलाकर लाईं। सिनेमा के चक्कर में बनवारी तीन सुई ठोंक दी। दोनों हाथों और एक कमर में।

दवाई भी बनवारी एक टाइम में कम से कम 8 गोली। क्या मजाल थी बुखार के बाद आपके मुंह पर फफोले न पड़ें। बावजूद इन सब के मैंने एक ऐसा पर्दा वाला सिनेमा नहीं छोड़ा, जो मेरे गांव के 6-8 किलोमीटर की परिधि में हो हुआ।

हमारी सबसे नजदीकी बाजार करीब 10 किलोमीटर दूर है। वहां तब दो सिनेमाघर थे- राज पैलेस और पुराना टाकीज। नौंवी से पहले तक मेरी वहां तक पहुंच ही नहीं थी।

बाजार ले जाने वाला कोई था ही नहीं। विजय दशमी को रावण जलते देखने जाते भी थे तो फिल्म कौन दिखाए, छोला-समोसा, पान खिलाकर लौटा लाते थे। जब नौवीं में रॉबर्ट्सगंज नाम लिखवाया, तब शहर में यहां-वहां लगे फिल्मों के पोस्‍टर बहुत बुलाते थे।

गांव में भागकर फिल्में देखने तक तो ठीक था। अगर बाजार में किसी ने सिनेमा हॉल में फिल्म देखते देख लिया तो घर से तो मुझे निकाल ही दिया जाता। फिर किसी एक साथ 10 रुपये पॉकेट मनी भी नहीं मिलती थी कि जाकर फिल्म देखे आओ।

यही करते-करते जब मैं 10वीं में 1 नंबर से (फेल 11 नंबर से हुआ था पर 10 नंबर ग्रेस मिला करता था, इसलिए मैं मानता हूं कि 1 नंबर से फेल हुआ) फेल हो गया तो रिजल्ट देखने के बाद सीधे सिनेमाघर में गया।

जाकर एक के बाद एक 3 फिल्में देखीं। पता नहीं क्यों?