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Thursday, July 28, 2016

तड़का है मेरे निगेटिव किरदार में-अक्षय खन्‍ना




-अजय ब्रह्मात्‍मज
एक अंतराल के बाद अक्षय खन्‍ना आ रहे हैं। वे रोहित धवन की फिल्‍म ढिशुम में जॉन अब्राहम और वरुण धवन के साथ दिखेंगे। व्‍यक्तिगत कारणों से अक्षय खन्‍ना ने बीच के सालों में कोई फिल्‍म नहीं की। फिर जब तैयार हुए तो सही स्क्रिप्‍ट चुनने में वक्‍त लगा। वे कहते हैं,कुछ ज्‍यादा ही वक्‍त लग गया। अब मैं बहुत खुश हूं कि मैंने ढिशुम जैसी फिल्‍म की। इसी साल मेरी एक और फिल्‍म आएगी। दोनों फिल्‍मों को लेकर मैं खुश और संतुष्‍ट हूं। एक इंतजार के बाद मुझे दो ऐसी स्क्रिप्‍ट मिलीं,जिन्‍होंने काम के लिए प्रेरित किया। फिर से काम पर लग गया हूं। वे खुद ही बात बढ़ाते हैं, काम पर कौन नहीं जाना चाहता? सही काम नहीं मिलने पर ‍निराशा होती है। कलाकार डिप्रेशन में भी जा सकता है। अभी मुझे अच्‍छा काम मिला है। मेरी दूसरी फिल्‍म नवंबर-दिसंबर तक आ जाएगी। मैं उसमें श्रीदेवी और नवाजुद्दीन सिद्दीकी के साथ हूं। बहुत ही इंटरेस्टिंग स्क्रिप्‍ट है।
अक्षय खन्‍ना स्‍वीकार करते हैं कि सभी कलाकारों के करिअर में ऐसा गैप आता है। उनके साथ दूसरी बार ऐसा हुआ है। दिल चााहता है के पहले भी उन्‍हें बैठना पड़ा था। उस समय भी उन्‍हें मनमाफिक काम नहीं मिला। इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ।अक्षय खन्‍ना सहज भाव से बताते हैं, मैं तो दूसरी बार ऐसे गैप से निकल रहा हूं। दूसरों के साथ भी ऐसा होता होगा। हिंदी फिल्‍मों के बड़े स्‍टारों की साल में दो-तीन फिल्‍में तो आ ही जाती थीं। अभी के पॉपुलर स्‍टार बड़ी मुश्किल से साल में एक फिल्‍म करते हैं। वर्किंग स्‍टायल में फर्क आ गया है। सभी ने फिल्‍में कम कर दी हैं। मैं नहीं चाहूंगा कि भविष्‍य में कभी बैठना पड़े। लोग सोचते होंगे कि मैं खुद फिल्‍में नहीं करना चाहता। यह इंप्रेशन है। मैं बताना चाहूंगा कि कई बार अच्‍छी फिल्‍में नहीं मिल पातीं। त‍ब नहीं चाहने पर भी बैठना पड़ता है।‘’ढिशुम मिलने के बारे में अक्षय बताते हैं,रोहित के एक दोस्‍त मुझे जानते हैं। उनके जरिए मुलाकात हुई। उनकी स्क्‍्रिप्‍ट अच्‍छी लगी। मैाने पहले भी कुछ फिल्‍मों में निगेटिव रोल किए हैं। हमराज और रेस दर्शकों को याद होगी। ढिशुम में तीसरी बार निगेटिव किरदार निभा रहा हूं। यह इंटरेस्टिंग किरदार है। इसमें खास तड़का लगा है। मुझे उम्‍मीद है कि मेरा यह किरदार लागों को याद रह जाएगा। उन्‍हें मजा आएगा। इस बार अक्षय खन्‍ना संभल कर चल रहे हैं। वे इसकी वजह बताते हैं, मैा बड़े रोल अभी नहीं करना चाहता। आहिस्‍ता-आहिस्‍ता एक्टिव हो जाऊंगा। मैंने अपनी पसंद ही अलग कर ली है। अभी देखता हूं कि लागों को मेरा काम कैसा लगता है? रोहित के साथ मैंने इस किरदार पर काफी काम किया है। रोहित के साथ काम करने का अनुभव बहुत अच्‍दा रहा। अक्षय उन्‍हें व्‍यक्तिगत तौर पर पसंद करते हैं। उनकी मेहनत और सोच के कायल हैं। उनकी खासियत बताते हैं अक्षय, रोहित सेट पर सभी को खुश रख्‍ते हैं,लेकिन कोई समझौता नहीं करते। उन्‍हें अपना काम निकालना आता है। यह उनकी परवरिश का असर है। मैं तो उनके साथ बार-बार काम करना चाहूंगा।


दरअसल : मिलते हैं जब फिल्‍म स्‍टार



-अजय ब्रह्मात्‍मज
जागरण फिल्‍म फेस्टिवल जारी है। हिंदी प्रदेशों के शहरों में जाने के अवसर मिल रहे हैं। इन शहरों में फिलमें दिखाने के साथ ही जागरण फिल्‍म फेस्टिवल मुंबई से कुछ फिल्‍म स्‍टारों को भी आमंत्रित करता है। इन फिल्‍म स्‍टारों से दोटूक बातचीत होती है। कुछ श्रोताओं को भी सवाल पूछने के मौके मिलते हैं। हर फेस्टिवल की तरह यहां भी फिल्‍मप्रेमी,रंगकर्मी,साहित्‍यप्रेमी और युवा दर्शक होते हैं। उनकी भागीदारी अचंभित करती है। वे पूरे जोश के साथ फेस्टिवल में शामिल होते हैं। अपनी जिज्ञासाएं रखते हैं। अपनी धारणाएं भी जाहिर करते हैं।
मैंने गौर किया है कि फिल्‍म स्‍टारों के साथ इन मुलाकातों में दर्शकों में सबसे ज्‍यादा रुचि सेल्‍फी निकालने में होती है। वे दाएं-बाएं हाथें में मोबाइल लिए और बांहें फैलाए सेलिब्रिटी के रास्‍ते में खड़ हो जाते हैं। हर व्‍यक्ति चााहता है कि सेलिब्रिटी उनके कैमरे की तरफ देखे और मुस्‍कराए। चूंकि सेल्‍फी मोड में अपनी छवि दिख रही होती है,इसलिए नजरें नहीं फेरी जा सकती हैं। मजबूरन हर सेलिब्रिटी को मुस्‍कराना पड़ता है। आ खुद ही जोड़ लें कि एक सेल्‍फी में कितना समय ल्रता है। पहले सिर्फ ऑटोग्राफ से काम चल जाता था। अग बहुत कम ऑटोग्राफ मांगे जाते हैं।हां,पहले की तरह आज भी कुछ लोग मोबाइल नंबर और मेल आईडी चाहते हैं। वे संपर्क करना चाहते हैं। कुछ होटल में मिलने चले आते हैं।
लखनऊ में एक पत्रकारनुमा उत्‍साही व महात्‍वाकांक्षी फिल्‍मकार दिख्‍खई गई फिल्‍म के निर्देशक से मिलने होटल पहुंच गए। उन्‍होंने बगैर पूछे ही खाने-पीने की चीजों की फरमाइशें कीं। उनके पास न तो कायदे के सवाल थे और न वे स्‍वयं स्‍पष्‍ट थे कि वे क्‍या पूछने आए हैं। उक्‍त निर्देशक ने बताया कि उनके पास बातचीत लिखने या रिकार्ड करने के साधन भी नहीं थे। उन्‍होंने होटल के कमरे से पैड और पेंसिल उठाई और थोड़ा-बहुत लिख लिया। लिखने का आशय यह है कि उन्‍होंने एक बड़ा मौका गंवा दिया। यह भी हो सकता है कि उनके पास कोई गंभीर जिज्ञासा ही नहीं हो,लेकिन उन्‍होंने उक्‍त निर्देशक को सावधान कर दिया कि वह भविष्‍य में किसी और को ऐसा अवसर न दे। हम औचक मोके मिलने पर भौंचक रह जाते हैं। होना यह चाहिए कि हम पूरी तैयारी के साथ बातचीत में शामिल हों। अपने सवाल पूछें और सेलिब्रिटी को चकित कर दें। एक और ट्रेंड देखने को मिलता है कि सभी जानी हुई बातों को ही सेलिब्रिटी के मुंह से वापिस सुनना चाहते हैं। सवाल मौलिक नहीं होते। दरअसल,मौलिकता की यह समस्‍या फिल्‍म्‍ पत्रकारों के साथ भी है। यही वजह है कि सारे इंटरव्‍यू एक जैसे सुनाई-दिखाई पड़ते हैं।
लखनऊ में यह भी दिखा कि कुछ लोग फिल्‍म एक्‍टर बनने और फिल्‍मों में घुसने के तरीके के बारे में पूछ रहे थे। सूचना प्रसार और इंटरनेट के इस युग में ऐसे बेसिक सवालों का कोई औचित्‍य नहीं रह जाता। गूगल पर एक सर्च मारते हैं अनेक लिंक मिल जाते हैं। हां,यह बात पूछी जा सकती है कि उनमें से कौन से संस्‍थान उपयागी और भरोसेमंद हें। फिल्‍में आ‍कर्षित करती हैं। हम जुड़ना भी चाहते हैं। सही निर्देशन के अभाव में ज्‍यादातर युवक भटकते रहते हैं। वे बेसिक ट्रेनिंग भी नहीं कर पाते। रोजाना सैकड़ों महात्‍वाकांक्षी मुंबई पहुंचते हैं और सपनों के जंगल में खो जाते हैं। स्‍वार्थी उनका लाभ उठाते हैं। नपछले दिनों नसीरूद्दीन शाह ने बिल्‍कुल सही कहा था कि अभी तो एक्टिंग की वीकएंड ट्रेनिंग दी जा रही है। यह बताने के पीछे उनका सवाल था कि क्‍या ऐसा संभव है?
फिल्‍म स्‍टारों से मिलने और बातचीत करते समय आम दर्शकों को पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ी औार चैनलों पर सुनी-देखी बातों को ही पूछने से बचना चाहिए। उनकी सहज जिज्ञासा ज्‍यादा प्रभावी होती है और वह कहीं ना कहीं सेलिब्रिटी को भी सोचने पर मजबूर करती है।

Monday, July 25, 2016

भोजपुरी फिल्मों का होगा भाग्योदय - अमित कर्ण




अनुराग कश्‍यप की दस्तक से सिने तबके में उत्साह

अनुराग कश्य्प ने भोजपुरी फिल्म निर्माण में भी उतरने का ऐलान किया है। उनकी फिल्म का नाम ‘मुक्काबाज’ है। ऐसा पहली बार है, जब हिंदी की मुख्यधारा का नामी फिल्मकार भोजपुरी फिल्मों के निर्माण में कदम रखेगा। जाहिर तौर पर इससे भोजपुरी फिल्म जगत में उत्साह की लहर है। अनुराग कश्यप के आने से वे भोजपुरी फिल्मों के फलक में अप्रयाशित इजाफे की उम्मीद कर रहे हैं। खुद अनुराग कश्यप कहते हैं, ‘फिल्मों के राष्ट्री य पुरस्कार में भोजपुरी फिल्मों का नाम भी नहीं लिया जाता। सभी की शिकायत रही है कि भोजपुरी में स्तरीय फिल्म नहीं बन रही है। मैं अभी कोई दावा तो नहीं कर सकता, लेकिन मैं पूरे गर्व के साथ अपनी पहली भोजपुरी फिल्म बना रहा हूं।‘
 

अब बदलेगी छवि
भोजपुरी फिल्में आज तक अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करने में नाकाम रहा है, जबकि मराठी, पंजाबी व अन्य प्रांत की भाषाओं में फिल्में लगातार विस्तार हासिल कर रही हैं। भोजपुरी जगत पर सस्ती, बिकाऊ, उत्तेजक, द्विअर्थी कंटेंट वाली फिल्में बनाने के आरोप लगते रहे हैं। यह लांछन भी सामाजिक सरोकार की फिल्में बनाने वालों को बाहर का रास्ता दिखा जाता है। इसके लिए निर्माता खस्ताहाल सिने सुविधाओं व कम खरीद क्षमता वाले दर्शकों को कसूरवार ठहराते रहे हैं।
लेकिन अब अनुराग के आने की खबर से सिने जगत खुश है। भोजपुरी फिल्मों के सुपरस्टार रवि किशन कहते हैं, ‘ हम लोग इसी चीज की तलाश में थे। अनुराग कश्यप बहुत बड़ा नाम है। यकीनन हमारे विस्तार में चार चांद लग जाएंगे। ‘मु्क्काबाज’ भोजपुरी सिनेमा का सैराट साबित हो सकता है। इन दिनों जिस किस्म की फिल्में बन रही हैं, उनमें तब्दीली आएगी। इसकी रिलीज में समस्या नहीं आएगी, जिससे आमतौर पर। देश भर ही नहीं विदेशों में भोजपुरी बहुल इलाकों में भी फिल्मों की रिलीज के द्वार खुलेंगे। भोजपुरी फिल्म जगत को गंभीरता से लिया जाएगा। उसकी छवि सुदृढ़ होगी। कथ्यफपरक सिनेमा बनाने वालों की हौसलाअफजाई होगी। सरकार का ध्यान सिने इंफ्रासट्रक्चर मुहैया कराने की ओर जाएगा। ‘
 

उम्‍दा फिल्‍मों को बल
युवा फिल्मकार नितिन नीरा चंद्रा ने पांच साल पहले भोजपुरी में कथ्यरपरक फिल्म ‘देसवा’ बनाई थी। वह फेस्टिवल सर्किट में खासी मशहूर रही, मगर भोजपुरी सिने वितरकों ने इसे भाव नहीं दिया ।अब नितिन नीरा चंद्रा अनुराग के ऐलान से उत्साह से भर गए हैं। वे कहते हैं, ‘ उनकी वजह से उम्दा फिल्मों को बल मिलेगा। प्रबुद्ध एवं समर्थ खरीद क्षमता वाला दर्शक वर्ग भी भोजपुरी फिल्मों को देखने घरों से बाहर निकलेगा। स्वाभाविक तौर पर थिएटर की डिमांड बढेगी और उसके हालात बेहतर हो जाएंगे। वह टर्निंग पॉइंट साबित होगा। एकल निर्माता ही नहीं कॉरपोरेट भी इसके निर्माण में रुचि दिखाने लगेंगे।‘
 

सब आएं साथ
दरअसल अब तक भोजपुरी का शिकार दर्शक वर्ग ही उसकी टारगेट ऑडिएंस है, जिसकी खरीद क्षमता कम है। उसके चलते निवेशक यहां मोटा निवेश करने से कतराते रहे हैं। साथ ही इस जगत को चर्चित करने के लिए नामी चेहरे यानी ब्रैंड एंबेसेडर की कमी रही है। अनुराग कश्य प व उन जैसे बड़े नाम उस चीज की कमी पूरी कर सकते हैं। जाहिर तौर पर निवेशक बेफिक्र होकर निवेश कर सकते हैं।
हालांकि इसके लिए सतत प्रयास की दरकार रहेगी। जैसा महिंद्रा एंड महिंद्रा के साथ मिलकर आठ साल पहले ‘हम बाहुबली’ बना चुके अनिल अजिताभ कहते हैं, ‘अनुराग जैसे नामी नाम आने से वितरकों का गठजोड़ ध्वतस्त हो सकेगा। मसाला फिल्मों के साथ-साथ कथ्यपरक फिल्में भी बनने लगेंगी। पर इस जगत पर दोयम दर्जे की फिल्मों की मोटी धूल की परत चढी हुई है। उसे उतारने के लिए एक नहीं, बल्कि अनुराग कश्यंप जैसे चार-पांच और फिल्मकारों की दरकार होगी। एकला चलो रे की नीति से काम नहीं होगा। वरना प्रयास निर्रथक हो सकते हैं।
 

बड़े निवेशक भी आएंगे
दिनेश लााल यादव निरहुआ भी अनुराग के फैसले से खुश हैं। ‘ वे बेहतरीन फिल्मकार हैं। ऊपर से हैं भी यूपी से। वे भोजपुरी फिल्मों को ब्रैंड बना सकते हैं। जो चीजें अब तक नहीं हुई हैं, वे हो सकती हैं। बड़े निवेशक भी आएंगे। महिंद्रा एंड महिंद्रा व उन जैसे निवेशक ‘हम बाहुबली’ के बाद इसलिए कंटीन्यू नहीं रहे, क्योंकि उनका फोकस महज बिजनेस पर था। इमोशन से उनका कोई वास्ता नहीं था। प्रियंका चोपड़ा के बैनर की फिल्म में मैं हीरो था। उसे खासी सराहना मिली है। वे आगे और भी फिल्में प्रोड्यूस कर रही हैं। अब अनुराग के आने से हमारी ताकत और बढ़ेगी।
निर्देशक राजकुमार पांडे भोजपुरी की 35 हिट फिल्में बना चुके हैं। वे बताते हैं, ‘ हम अनुराग का स्वा्गत करते हैं। हालांकि उनसे पहले दिलीप कुमार व जीपी सिप्पी साहब ने भी भोजपुरी फिल्में प्रोड्यूस की थी। कुछ कॉरपोरेट घराने भी उतरे थे, मगर आज कोई नहीं हैं। वैसे रवैये के चलते हमारा मार्केट भी खराब हुआ था। मेरी गुजारिश बस इतनी है कि भोजपुरी फिल्म जगत दुधारू गाय के तौर पर इस्तेामाल न हो। बाकी अनुराग कश्यप आएं। लगातार अच्छी फिल्में बनाएं। उन जैसों का आना इस बात का सूचक है कि भोजपुरी फिल्में अप्रत्याशित विस्ता‍र की राह पर हैं।

Sunday, July 24, 2016

प्रगतिशील थे पूर्वज : रितिक रोशन


 ‘बैंग बैंग’ की रिलीज के करीब दो साल बाद रितिक रोशन की फिल्‍म मोहेंजो दारो अगले महीने रिलीज होगी। यह प्रागैतिहासिक काल की प्रेम कहानी है। इसके निर्देशक आशुतोष गोवारीकार ने कहानी में अपनी कल्‍पना के रंग भरे हैं। सिंधु घाटी सभ्‍यता के प्राचीन शहर मोहेंजो दारो के इतिहास को उसमें नहीं दर्शाया गया है। मोहेंजो दारो की शूटिंग के चलते रितिक रोशन ने कोई अन्‍य फिल्‍म नहीं की। उन्‍होंने उसे तसल्‍ली से पूरा किया। उसमें वह सरमन की भूमिका में हैं।

मुश्किलों का डटकर किया सामना
रितिक बताते हैं, ‘अगर मेरा बस चलता तो फिल्‍म की शूटिंग जल्‍दी पूरी हो जाती। मैं भली-भांति अवगत था कि इस फिल्म की शूटिंग कठिन है। मैं आशुतोष की कार्यशैली से बखूबी परिचित हूं। मुझे पता है कि बेहद बारीकी से वे अपने काम को अंजाम देते हैं। उनकी फिल्‍म निर्माण की प्रक्रिया काफी विस्‍तृत होती है। लिहाजा वक्त काफी लगेगा। स्क्रिप्‍ट पढ़ने के दौरान फिल्‍म से पहले मैंने खुद से कई सवाल किए थे। उनका गहराई से मंथन किया था। मैंने खुद से पूछा कि क्या मैं इस फिल्म के लिए तैयार हूं। क्या इस फिल्म ने मेरे दिलोदिमाग पर गहरी छाप छोड़ी है? क्‍या गुजरात में भीषण गर्मी में मैं शूटिंग करने में सक्षम रहूंगा? सारे सवालों के जवाब सकारात्मक थे। लिहाजा मैं शारीरिक और मानसिक तौर पर तैयार था। मुझे अहसास था कि इस फिल्म में कुछ अड़चने आएगी। मैं उनके लिए पहले से तैयार था। अच्‍छी बात यही रही कि मुझे कोई घबराहट नहीं हुई। हां, वक्त लगा। हम लोग भुज गए थे। वहां पर हमें साठ दिन की शूटिंग करनी थी। हमें अस्सी दिन लग गए। वहां पर भीषण गर्मी थी। वहां पर नहाने के पानी से लेकर सेट पर एक्शन करना। ऊपर से तपती रेत में लड़ना-गिरना। यह सब करते हुए रेत शरीर में जहां-तहां चिपक जाती थी। इन  मुश्किलों के बावजूद मैंने यह याद रखा कि स्क्रिप्ट में निहित विजन मेरी इन सारी तकलीफों के आगे कुछ भी नहीं है। मैं मुश्किलों को भूलकर अपने काम में तल्‍लीन रहा। यह सब करते-सहते हमने फिल्म की जर्नी पूरी की।

आशुतोष ने की थी गहन रिसर्च
 मोहेंजो दारो की जानकारी इतिहास में नहीं मिलती। इतिहासकारों ने अवशेषों के आधार पर मोहेंजो दारो की कल्‍पना की है। आशुतोष ने उसमें से एक रास्ता चुनकर अपना विजन क्रिएट किया है। जब मैं सेट पर पहुंचा, मुझे किसी किस्‍म की रिसर्च की आवश्‍यकता नहीं थी। आशुतोष ने सेट पर वाकई में मोहेंजो दारो शहर बसाया था। यह सब देखकर मुझे बहुत संतुष्टि हुई। दरअसल, मोहेंजो दारो को लेकर मुझे किसी कल्‍पना की जरूरत नहीं पड़ी। आशुतोष ने सब कुछ क्रिएट कर दिया था। मुझे रेफरेंस के लिए किसी किताब या इतिहास से जानकारी लेने की जरुरत नहीं पड़ी। सभी कलाकारों ने शूटिंग के दौरान  मोहेंजो दारो के दौर को जीया है। 

रोहित जैसा लगा सरमन
सरमन का किरदार के पीछे आशुतोष की सोच-अप्रोच की मुझे जानकारी नहीं है। मेरे लिए यह जर्नी बहुत ही दिलचस्प रही है। मैंने अर्से बाद ऐसा किरदार निभाया है जो मुझे कहो न प्‍यार है के रोहित की याद दिलाता है। रोहित में सादगी थी। मैंने उस सादगी का अनुभव सिल्‍वर स्‍क्रीन पर कई साल बाद किया है। जहां से मैंने शुरुआत की थी,घूमफिर कर दोबारा वहीं पहुंच गया हूं। इस फिल्म में सरमन साधारण इंसान है। वह ईमानदारी में यकीन रखता है। अन्‍याय बर्दाश्‍त नहीं कर पाता है। जब वह मोहेंजो दारो में पहुंचता है तो दुनिया की कड़वी सच्‍चाई से वाकिफ होता है। सरमन उसके खिलाफ लड़ता है।  उसने एक ऐसी दुनिया का सपना संजोया है जहां सीधे-साधे लोग हों। वे मेलजोल और प्‍यार से रहते हों। वह अपने सपने को साकार करने के लिए लड़ता है। उसी के बल पर वह मोहेंजो दारो को बदल पाता है। सरमन का मतलब आशुतोष ने खुशी बताया है। स्क्रिप्‍ट पढ1ने पर मेरे जेहन में आया कि इसका अर्थ सर (माइंड) और मन (हार्ट) है। यह हार्ट और माइंड की जर्नी है। सरमन दिलवाला है,लेकिन दुनिया से लड़ने के लिए उसे दिमाग का इस्‍तेमाल करने की जरुरत है।

अलहदा है एक्‍शन
फिल्म में किया गया एक्शन अलहदा है। मैंने ऐसा एक्‍शन न कभी किया है न दर्शकों ने कभी देखा होगा। यह कहने का मतलब यह नहीं है कि हमने हॉलीवुड की मैट्रिक्‍स की तरह कुछ किया है। हमने मोहेंजो दारो के दौर को ध्‍यान में रखते हुए एक्‍शन किया है। मेरा फोकस पूरी तरह इमोशन पर था। मैंने उसी पर ध्यान दिया है। मैंने एक्शन को भी इमोशन से जीया है। लिहाजा एक्शन में मेरा सहयोग रहा है। उसमें शुरुआत से अंत तक मैं शामिल रहा। इमोशन कई तरह के होते हैं। कोई इमोशन रूला देता है कोई शांति देता है। सरमन को प्यार और रोमांस, धोखे और कड़वी सच्‍चाइयों से रूबरू होना पड़ता है। लिहाजा उसमें सभी प्रकार के इमोशन हैं।
  
इन बातों ने चौंकाया
-रिसर्च के दौरान कई चौंकाने वाले तथ्‍यों से मैं परिचित हुआ। मोहेंजो दारो में जलनिकासी के बारे में मैंने स्कूल में पढ़ा था। सेट पर जब यही बनावट मैंने देखी तो चकित रह गया। हमें ऐसा लगता है कि प्रागैतिहासिक हैं, लिहाजा उस दौर के लोगों के चलने-फिरने, बोलने-चालने का तौर-तरीका भिन्‍न होगा। हालांकि ऐसा नहीं है। वे लोग हम सब से ज्यादा बुद्धिमान थे। इतिहास के बारे में जरा सोचिए। उस समय तकनीकी और संसाधन कितने मौजूद थे। कैसे उन्‍होंने पिरामिड बनाया। तब क्रेन तो होती नहीं थी। पत्‍थर कितना वजनी होता था। उसके बावजूद शानदार इमारतें खड़ी की। यह महज बानगी है। दरअसल वे हमसे कहीं ज्‍यादा आगे थे। मेरे कहने का अर्थ यह नहीं है कि मोहेंजो दारो में ऐसा था। आम धारणा है कि मोहेंजो दारो में लोग ऐसे समझदारी से कैसे बोल सकते हैं। आपको कैसे पता? अगर वह होशियार न होते तो अपने समय में इतने विकसित काम कैसे करते। लिहाजा आम भ्रांतियां इस फिल्‍म से टूट सकती है। मुझे एक और चीज ने चकित किया कि तब के लोगों का व्‍यापार का तरीका अलग था। वहां भिन्‍न-भिन्‍न जगहों से लोग आते थे। उनकी वेशभूषा और खरीद-फरोख्‍त का आधार अलग होता था। 

खुद से करता हूं सवाल
 मैं अपनी भावनाओं को व्‍यक्‍त कर पाता हूं। शायद इसलिए क्‍योंकि मैं खुद से सवाल पूछने से कभी पीछे नहीं हटता हूं। इन सवालों के जवाब से मुझे शांति और सुकून मिलता है। जब भी जिदंगी में कुछ अच्छा या बुरा होता है, तो हमेशा कुछ तय सवाल खुद से करता हूं। मसलन अब मुझे क्या करना है, जिससे मेरी कहानी ग्रेट बन जाएं। ये सवाल सिर्फ मेरे लिए है। दुनिया के लिए नहीं। जवाब मिलता है अगर अपनी कहानी को महान बनाना है तो यह समस्‍याएं उसके समक्ष कुछ भी नहीं हैं। आपको इनसे उबरना होगा तभी आपकी कहानी महान बन सकेगी। मैं खुद से पूछता हूं कि जिंदगी में मेरे साथ फलां चीज खराब हो रही है। मैं इस बुराई से क्‍या अच्‍छी चीज सीख सकता हूं। मेरे साथ कैसी सी चीजें जुड़ रही हैं जिससे मेरी ग्रोथ हो रही है। जब मुझे इन सवालों के जवाब मिल जाते हैं तो मैं दूसरों के सवालों का बेहतर तरीके से जवाब दे पाता हूं।

बहुत विनम्र हैं आशुतोष 
जोधा अकबर में हम दोस्त बन रहे थे। इस फिल्म में हम दोस्त बन चुके थे। जब यह फिल्म शुरू हुई तो, ऐसे माहौल में दोस्ती हो तो बातचीत में बाधा नहीं आती है। हम एक दूसरे से किसी भी मुद्दें पर खुल कर बात करते थे। मेरी उनसे हमेशा से एक शिकायत रही है कि वह बहुत ही विनम्र हैं। सेट पर किसी को कुछ भी तकलीफ हो वह सबसे पहले पहुंच जाते थे। उन्हें सीन की जरा भी चिंता नहीं होती थी। सूरज बड़जात्‍या साथ भी मैंने काम किया है। वे भी बेहद विनम्र हैं।
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झंकार टीम

फिल्‍म समीक्षा : मदारी


किस की जवाबदेही

-अजय ब्रह्मात्‍मज

देश में आए दिन हादसे होते रहते हैं। उन हादसों के शिकार देश के आम नागरिकों का ऐसा अनुकूलन कर दिया गया है कि वे इसे नसीब,किस्‍मत और भग्‍य समझ कर चुप बैठ जाते हैं। जिंदगी जीने का दबाव इतना भारी है कि हम हादसों की तह तक नहीं जाते। किसे फुर्सत है? कौन सवाल करें और जवाब मांगे। आखिर किस की जवाबदेही है? निशिकांत कामत की मदारी कुछ ऐसे ही साधारण और सहज सवालों को पूछने की जिद्द करती है। फिल्‍म का नायक एक आम नागरिक है। वह जानना चाहता है कि आखिर क्‍यों उसका बेटा उस दिन हादसे का शिकार हुआ और उसकी जवाबदेही किस पर है? दिन-रात अखबारों और चैनलों की सुर्खियां बन रहे हादसे भुला दिए जाते हैं। मदारी में ऐसे ही कुछ सवालों से सिस्‍टम को कुरेदा गया है। जो सच सामने आया है,वह बहुत ही भयावह है। और उसके लिए कहीं ना कहीं हम सभी जिम्‍मेदार हैं। हम जो वोटर हैं।चुपचाप दबा रहके अपनी दुनिया में खोए रहनेनेवाला... हम जो नेताओं और पार्टियों को चुनते हैं और उन्‍हें सरकार बनाने के अवसर देते हैं। मदारी में यही वोटर अपनी दुनिया से निकल कर सिस्‍टम के नुमांइदों की दुनिया में घुस जाता है तो पूरा सिस्‍टम बौखला जाता है। हड़कंप मच जाता है।
हिंदी में सिस्‍टम पर सवाल करने वाली फिल्‍में बनती रही हैं। कई बार अपने निदान और समाधान में वे अराजक हो जाती हैं। मदारी इस मायने में अलग है कि वह सिस्‍टम के भविष्‍य और उत्‍तराधिकारी को आगाह करती है। उसे साथ लेकर चलती है। एक उम्‍मीद जगाती है। अभी नहीं तो पांच,दस या पंद्रह सालों में स्थितियां बदलेंगी। मदारी राजनीतिक सोच की फिल्‍म है। य‍ह फिल्‍म किसी एक राजनीतिक पार्टी या विचार के विरोध या पक्ष में नहीं है। यह पूरे सिस्‍टम पर कटाक्ष करती है,जिसमें सरकार डेवलपर और ऑपोजिशन ठेकेदार की भूमिका में आ गए हैं। निशिकांत कामत ने फिल्‍म में किसी युक्ति से काम नहीं लिया है। रितेश शाह की स्क्रिप्‍ट उन्‍हें इजाजत भी नहीं देती। फिल्‍म सरत तरीके से धीमी चाल में अपने अंत तक पहुंचती है। लेखक-निर्देशक ने सिनेमाई छूट भी ली है। कुछ दृश्‍यों में कोर्य-कारण संबंध नहीं दिखाई देते। इस सिनेमाई समर में निशिकांत कामत के पास सबसे कारगर अस्‍त्र इरफान हैं। इरफान की अदाकरी इस परतदार फिल्‍म को ऊंचाइयों पर ले जाती है,प्रभावित करती है और अपने उद्देश्‍य में सफल रहती है। मदारी सोशल और पॉलिटिकल थ्रिलर है।
बाज चूजे पर झपटा...उठा ले गया-कहानी सच्‍ची लगती है लेकिन अच्‍छी नहीं लगती। बाज पे पलटवार हुआ कहानी सच्‍ची नहीं लगती लेकिन खुदा कसम बहुत अच्‍छी लगती है।... फिल्‍म के आरंभ में व्‍यक्‍त निर्मल का यह कथन ही फिल्‍म का सार है। यह चूजे का पलटवार है। सच्‍ची नहीं लगने पर भी रोचक और रोमांचक है। मध्‍यवर्गीय निर्मल कुमार जिंदगी की लड़ाई में जीने के रास्‍ते और बहाने खोज कर अपने बेटे के साथ खुश और संतुष्‍ट है। एक हादसे में बेटे को खाने क बाद वह कुछ सवाल करता है। उन सवालों की जवाबदारी के लिए वह सिस्‍टम के तुमाइंदों को अपने कमरे में आने के लिए मजबूर करता है और फिर उनके जवाबों से पूरे देश को वाकिफ कराता है। गृह मंत्री एक बार बोल ही जाते हैं,सच,सच डरावना है-दिल दहल जाएगा-सरकार भ्रष्‍ट है,सच नहीं है-भ्रष्‍टाचार के लिए ही सरकार,यह सच है। एक दूसरा नेता जवाबदेही के सवाल पर सिस्‍टम के रवैए को स्‍पष्‍ट करता है। जवाबदेही का मतलब उधर पार्लियामेंट में-चुनाव के मैदान में-गली-गली जाकर एक-एक आदमी को जवाब देना नहीं है।निर्मल कुमार 120 करोड़ लोगों के प्रति जवाबदेही की बात करता है तो जवाब मिलता है...एक सौ बीस करोड़- मैथ्‍स ही गड़बड़ है तुम्‍हारा-हां,बंटे हुए हो तुम सब-जाति,धर्म,प्रांत...एक सौ बीस करोड़ नहीं,टुकड़े,टुकड़े,टुकड़े में बंटे हुए हो....तभी तो हम रौंद रहे हैं तुम को जूतियों के नीचे....नहीं डरते 120 करोड़ से हम। फिल्‍म में ऐसे संवादों से हमरे समय का सच और सिस्‍टम का डरावना चेहरा फाश होता है। मदारी अपने सवालों से झकझोरती है। इरफान की रुलाई आम नागरिक की विवशता जाहिर करती है। बतौर दर्शक हम द्रवित होते हैं और निर्मल की मांग से जुड़ जाते हैं। निर्मल अपने अप्रोच में हिंसक नहीं है। निदान और समाधान से अधिक उसकी रुचि जवाब में है। वह जवाब चाहता है।
फिल्‍म के एक गीत दम दमा दम में इरशाद कामिल ने हमारे समय के यथार्थ को संक्षिप्‍त और सटीक अभिव्‍यक्ति दी है।
अवधि- 133 मिनट
स्‍टार- साढ़े तीन स्‍टार
  

 


Friday, July 22, 2016

कल्‍पना से गढ़ी है कायनात - राकेश ओमप्रकाश मेहरा




- अजय ब्रह्मात्मज
राकेश ओमप्रकाश मेहरा की अगली फिल्म ‘मिर्जिया’ है। इसमें उन्होंने दो नए चेहरों को लौंच किया है। हर्षवर्द्धन कपूर और सायमी खेर के रूप में। फिल्म की कहानी व गीत गुलजार ने लिखे हैं।
राकेश ओमप्रकाश मेहरा इससे पहले भी नए लोगों के संग काम करते रहे हैं। ‘रंग दे बसंती’ में मौका मिला था। शरमन थे, सिद्धार्थ थे, कुणाल था। सोहा थीं, एलिस थीं। जब ‘दिल्ली-6’ बनाई तो उस वक्त सोनम कपूर भी नई थीं। उनकी ‘सांवरिया’ रिलीज भी नहीं हुई थी, जब हमने काम शुरू कर दिया था। वे भी नवोदित थीं। ‘मिर्जिया’ इस मायने में अलग है कि यहां दोनों चेहरे नए हैं। हर्षवर्द्धन की खासियत उनकी खामोशी में हैं। अच्छी बात यह रही कि हम दोनों को एक-दूसरे को जानने के लिए 18 महीने का वक्त मिला। वह भी सेट पर जाने से पहले। हमने ढेर सारी वर्कशॉप और ट्रेनिंग की। उन्होंने घुड़सवारी भी सीखी। तीरंदाजी भी सीखी उन्होंने, क्योंकि मिर्जा के अवतार में वे दो-दो किरदार प्‍ले कर रहे हैं। लोककथाओं में मिर्जा का किरदार काल्‍पनिक दुनिया में है। मैंने एक प्लग वहां लगा दिया। दूसरी दुनिया आज के दौर की है। वह राजस्‍थान में है। वहां के जिप्सियों के बीच मिर्जा-साहिबा की कहानी मशहूर रही है। वह कहानी आज के परिप्रेक्ष्‍य में कैसी होगी, वह भी इस फिल्म में है। हम इसे पुरानी कथा नहीं कहेंगे। इसकी जगह मैं इसे टाइमलेस या इटरनल कहना चाहूंगा। वह इसलिए कि ऐसे किरदार आप की कल्पनाओं में होते हैं। उसका पास्ट है न प्रजेंट। जब मैंने पहली बार मिर्जा-साहिबा या हीर-रांझा व लैला-मजनू की कहानी सुनी थी तो उनका कोई रेफरेंस पॉइंट नहीं था। हम अपनी कल्पना के आधार पर उनकी कायनात गढ़ सकते हैं। हीरा-रांझा व लैला-मजनू की कहानी संगीत से आगे बढ़ी थी। ‘मिर्जिया’ के लिए जब मैं गुलजार भाई से मिला तो बातों ही बातों में बात निकली कि क्यों न इसे म्यूजिकल बनाया जाए। उनकी आंखों में एक चमक दिखी। उन्होंने कहा कि करते हैं। मजा आएगा। मेरे लिए सबसे बड़ी बात है कि उनके साथ काम करने का मौका मिला। ‘मिर्जिया’ मेरी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट साबित होगा। गुलजार भाई से जुड़ने के बाद इसके मायने मेरे लिए बढ़ गए हैं।  
    ‘मिर्जिया’ का टीजर ट्रेलर मैड्रिड में लौंच करने की वजहें थीं। एक तो संयोग ऐसे बने कि इसका ट्रेलर उन्हीं दिनों बन कर तैयार हो रहा था, जब आईफा चल रहा था। वरना हमारी योजना इसे ‘सु्ल्तान’ के साथ लाने की थी, पर आईफा भी बउ़ा मंच था। इंडस्‍ट्री के सभी कद्दावरों को अपना काम दिखाने का मौका मिला। इससे भी बड़ी बात यह थी कि वहां पूरी दुनिया से मीडिया एकत्र हुई थी। ऊपर से स्‍पेन अपने आर्ट और कल्चर के लिए जाना जाता है। वहां के लोग उन्हें सहेज कर रखते हैं। लौंच पर सभी नए कलाकारों को शुभकामनाएं मिलीं। इससे बेहतर हम और क्या पेश कर पाते।        
पंजाब के प्रसिद्ध प्रेमी-युगल मिर्जा और साहिबा की प्रेम कहानी पर केंद्रित है। लिहाजा फिल्म की कथाभूमि पंजाब में है । राकेश कहते हैं, ‘ मेरी फिल्मों में पंजाब घूम कर आ ही जाता है। अब पता नहीं इसे इत्तफाक क्या कहूं या कुछ और। ‘रंग दे बसंती’ में भगत सिंह तो ‘भाग मिल्खा भाग’ में मिल्खा सिंह। यहां अब मिर्जा साहिब आ गए। लगता है कि पिछले जन्म में मैं शायद पंजाब की ही पैदाइश रहा हूं। रहा सवाल मेरा पंजाब, ‘उड़ता पंजाब’ और दूसरे लोगों के पंजाब की तो ‘मिर्जिया’ का पंजाब बिल्कुल अलग है। यहां का पंजाब टिपिकल पंजाब नहीं है। यहां उत्तर-पश्चिम भारत के पंजाब की बाते हैं। इसमें आवाजें भी देखेंगे तो दलेर मेंहदी, पाकिस्तानी लोक गायक साईं जहूर हैं। वे सब ऐसी आवाजें हैं, जो सूफी से भी ऊपर रूहानी सी फील रखते हैं। एक वैसा निचोड़ है। (हंसते हुए) हर्षवर्द्धन कपूर को फिल्म में इसलिए लिया, क्योंकि उनके पिता अनिल कपूर के साथ काम नहीं कर पाता हूं। उनको मेरा काम अच्छा लग जाए तो कर लूं। जबकि हर्ष के साथ काम कर रहा हूं। सोनम कपूर के साथ काम कर रहा हूं। उम्मीद है अब खुद अनिल कपूर साहब मुझे मौका देंगे।


Thursday, July 21, 2016

दरअसल : निजी जिंदगी,फिल्‍म और प्रचार

-अजय ब्रह्मात्‍मज
सार्वजनिक मंचों पर फिल्‍म स्‍टारों के ऊपर अनेक दबाव रहते होंगे। उन्‍हें पहले से अंदाजा नहीं रहता कि क्‍या सवाल पूछ लिए जाएंगे और झट से दिए जवाब की क्‍या-क्‍या व्‍याख्‍याएं होंगी? क्‍या सचमुच घर से निकलते समय वे सभी अपने जीवन की नई-पुरानी घटनाओं का आकलन कर उन्‍हें रिफ्रेश कर लेते होंगे? क्‍या उनके पास संभावित सवालों के जवाब तैयार रहते होंगे? यह मुश्किल राजनीतिज्ञों और खिलाडि़यों के साथ भी आती होगी। फिर भी फिल्‍म स्‍टारों की निजी जिंदगी पाइकों और दर्शकों के लिए अधिक रोचक होती है। हम पत्र-पत्रिकाओं और टीवी चैनलों पर खबरों के नाम पर उनकी निजी जिंदगी में झांक रहे होती हैं। उनकी प्रायवेसी का हनन कर रहे होते हैं। इस दौर में पत्रकारों के ऊपर भी दबाव है। उनसे अपेक्षा रहती है कि वे कोई ऐसी अंदरूनी और ब्रेकिंग खबर ले आएं,जिनसे टभ्‍आपी और हिट बढ़े। डिजिटल युग में खबरों का प्रभाव मिनटों में होता है। उसे आंका भी जा सकता है। टीवी पर टीआरपी और ऑन लाइन साइट पर हिट से पता चलता है कि उपभोक्‍ता(दर्शक व पाठक) की रुचि किधर है? जाहिर सी बात है कि अगले अपडेट,पोस्‍ट और न्‍यूज में वैसी ही खबरों को तरजीह दी जाती है। रिपोर्टर पर दबाव रहता है। और रिपोर्टर लिहाज की दहलीज तोड़ कर निजी जिंदगी में झपट्टा मारता है।
पिछले हफ्ते आशुतोष गोवारीकर अपनी नई फिल्‍म मोहेंजो दारो के खास इवेंट में रितिक रोशन और पूजा हेगड़े समेत सभी कलाकारों और तकनीश्यिनों के साथ मौजूद थे। प्रागैतिहासिक काल की इस फिल्‍म के निर्माण,शोध और विषय पर बातें हो रही थीं। आशुतोष गोवारीकर पूरे गर्व के साथ सब कुछ बता और शेयर कर रहे थे। रितिक रोशन ने अपनी नायिका पूजा हेगड़े को इंट्रोड्यूस किया। उन्‍होंने अपने रोल और मेहनत की जानकारी दी। बीच में कुछ सवालों में विषयांतर की कोशिशें हुईं,लेकिन इवेंट फिल्‍म के इर्द-गिर्द ही रहा। लगभग समाप्ति के समय एक पत्रकार ने रितिक रोशन ने कंगना रनोट के मामले में इंडस्‍ट्री के साथ न होने का सवाल पूछा। रितिक ने सादगी से जवाब दिया कि वे सच के साथ हैं,इसलिए उन्‍हें किसी के साथ न होने की परवाह नहीं। यह एक सामान्‍य जिज्ञासा का सरल जवाब था।इस जवाब के साथ ही गहमागहमी बढ़ गई। पत्रकारों के मोबाइल एक्टिव हो गए। पता चला कि सभी इसे ही पोस्‍ट कर रहे हैं। थोड़ी देर के बाद चैनल और अगले दिन अखबारों में फिल्‍म से संबंधित सारी बातें खबर में एक कोने में थीं और सुर्खी बनी कि रितिक रोशन को फिल्‍म इंडस्‍ट्री के साथ होने या न होने की परवाह नहीं।
रितिक रोशन की निजी जिंदगी के मामूली प्रसंग ने एक महत्‍वपूर्ण निर्देशक की गैरमामूली फिल्‍म मोहेंजो दारो को ग्रस लिया। फिल्‍म पीछे रह गई। निजी जिंदगी खबरों में तैरने-उतराने लगी। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। आगे भी इसे दोहराया जाएगा। सवाल यह है कि कवरेज और पत्रकारिता के नाम पर हम किस दिशा में जा रहे हैं? पहले भी फिल्‍म स्‍टारों की निजी जिंदगी में सभी की रुचि रहती थी,लेकिन उसका एक दायरा था। अभी सारे दायरे टूट गए हैं।
इन दिनों प्रचार का भी दबाव बढ़ गया है। फिल्‍मों के निर्माता-निर्देशक और संबंधित स्‍टार फिल्‍म के प्रचार के लिए किसी हद तक जाने के लिए तैयार हैं। वे प्रचार के नए तौर-तरीके खाजते हैं। कोशि रहती है कि किसी भी प्रकार फिल्‍म सुर्खियों में आ जाए। दर्शकों का ध्‍यान खींचे। वे पहले तीन दिनों में सिनेमाघरों में पहुंचे और फिल्‍म की अच्‍छी कमाई हो जाए। अगर कोई विवाद हो जाए तो भी ठीक है। उड़ता पंजाब का उदाहरण भी दिया जाने लगा है। सीबीएफसी के रवैए से विवाद में आई यह फिल्‍म खूग चर्चित हुई। उसकी वजह से इसके दर्शक बढ़े। नतीजे में फिल्‍म का कलेक्‍शन अच्‍छा रहा। तैयार किए जा रहे हैं। प्रचार और निजी जिंदगी के घालमेल से फिल्‍म का आकर्षण बढ़ाया जा रहा है। दर्शक जुटाए जा रहे हैं।


Monday, July 18, 2016

फिल्‍म समीक्षा : ग्रेट ग्रैंड मस्‍ती



फिल्‍म रिव्‍यू

न डर,न हंसी और न मस्‍ती
ग्रेट ग्रैंड मस्‍ती
-अजय ब्रह्मात्‍मज
इंद्र कुमार की मस्‍ती 2004 में आई थी। सेक्‍स कामेडी के तौर पर आई इस फिल्‍म की अधिक सराहना नहीं हुई थी। अब 2016 में मस्‍ती के क्रम में तीसरी फिल्‍म ग्रेट ग्रैंड मस्‍ती देखने के बाद ऐसा लग सकता है कि मस्‍ती तो फिर भी ठीक फिल्‍म थी। अच्‍छा है कि यह ग्रेट है। अब इसके आगे मस्‍ती की संभावना खत्‍म हो जानी चाहिए। ग्रेट ग्रैंड मस्‍ती में सेक्‍स,कॉमेडी और हॉरर को मिलाने की नाकाम कोशिश है। यह फिल्‍म नाम के अनुसार न तो मस्‍ती देती है और न ही हंसाती या डराती है। फिल्‍म में वियाग्रा,सेक्‍स प्रसंग,स्‍त्री-पुरुष संबंध, कामातुर लालसाओं के रूपक हैं,लेकिन इन सबके बावजूद फिल्‍म वितृष्‍णा से भर देती है।
कहते हैं मृत्‍यु के बाद मुक्ति नहीं मिलती तो आत्‍माएं भटकती हैं। भूत बन जाती हैं। अपनी अतृप्‍त इच्‍छाएं पूरी करती हैं। ग्रेट ग्रैंड मस्‍ती में भी एक भूत है। इस भूत के रुप में हम रागिनी को देखते हैं। 20 साल की उम्र में उसका देहांत हो गया था,लेकिन देह की इच्‍छाएं अधूरी रह गई थीं। पिछले पचास सालों से उसका भूत पुरानी हवेली में देह की भूख मिटाने के इंतजार में है। उस हवेली में संयोग से मीत,अमर और प्रेम आ जाते हैं। तीनों शादीशुदा हैं,लेकिन उनके दांपत्‍य किसी न किसी कारण से सेक्‍स न‍हीं है। तीनों एडवेंचर के लिए निकलते हैं और हवेली में फंस जाते हैं। हां,इसमें एक अंताक्षरी बाबा,एक सास,एक साली और एक साला भी हैं।
हिंदी फिल्‍मों में सेक्‍स कामेडी के नाम पर इस साल हम क्‍या कूल हैं हम 3 और मस्‍तीजादे देख चुके हैं। ग्रेट ग्रैंड मस्‍ती उसकी कड़ी की तीसरी फूहड़ फिल्‍म है। मस्‍ती के लोभ में गए दर्शक कुछ भी नहीं मिला कहते हुए सिनेमाघरों से निकल सकते हैं। इंद्र कुमार के दृश्‍य,संवाद और कलाकारों की कामोत्‍तेजक मुद्राएं मस्‍ती और मनोरंजन में विफल रही हैं। लगभग एक जैसे भाव और प्रतिक्रियाओं से ऊब ही होती है। फिल्‍म के गानों में भी रोमांच नहीं है।
ग्रेट ग्रैंड मस्‍ती में आफताब शिवदासानी की चौंक और चीख खीझ पैदा करती है। रितेश देशमुख ऐसी फिल्‍मों में उस्‍ताद हो गए हैं,लेकिन इस फिल्‍म में उनकी प्रतिभा और संभावना भी चूकमी नजर आती है। विवेक ओबेराय ऐसी फिल्‍मों के किरदारों में अपना निकृष्‍ट सामने ला रहे हैं। फिल्‍म के महिला चरित्रों के लिए उपयुक्‍त चयन अभिनेत्रियों के चयन में ही गड़बड़ी दिखती है। वे फिल्‍म की थीम की जरूरतें पूरी नहीं करतीं। उर्वशी रौतेला में कमियां हैं। संजय मिश्रा सीमित दृश्‍यों में ही अपने किरदार को निभा ले जाते हैं।

अवधि- 133 मिनट
स्‍टार- एक स्‍टार


फिल्‍म रिव्‍यू

Thursday, July 14, 2016

दरअसल : 2016 की पहली छमाही



-अजय ब्रह्मात्‍मज
2016 की पहली छमाही के कलेक्‍शन में पिछले साल 2015 की तुलना में 2 करोड़ का इजाफा हुआ है। इस साल पहली छमाही में 1 फिल्‍म ज्‍यादा रिलीज भी हुई है। 2016 में जनवरी से जून के बीच कुल 111 फिल्‍में रिलीज हुई हैं। गौर करें तो 2014 के बाद से पहली छमाही में 100 से ज्‍यादा फिल्‍में रिलीज हो रही हैं। पिछले साल रिलीज फिल्‍मों की संख्‍या 110 और उसके पहले 2014 में केवल 102 रही थी। अगर और पीछे जाएं तो 2009 में पहली छमाही में केवल 33 फिल्‍में ही रिलीज हुई थीं। फिल्‍मों के बाजार और बिजनेस के लिहाज से उत्‍तरोत्‍तर प्रगति हो रही है।
बाजार और बिजनेस की बात करें तो पहली छमाही का कुल कलेक्‍शन 1025 करोड़ रहा है। यह राशि बहुत अधिक नहीं है,लेकिन निराशाजनक स्थिति भी नहीं है। पहली छमाही में एयरलिफ्ट और हाउसफुल 3 ने 100 करोड़ से अधिक का करोबार किया। संयोग से दोनों ही फिल्‍में अक्षय कुमार की हैं। अक्षय कुमार बाक्‍स आफिस के भरोसेमंद स्‍टार हैं। उनकी फिल्‍में ज्‍यादा हल्‍ला-गुल्‍ला नहीं करतीं। निर्माताओं को लाभ होता है। दूसरी छमाही में भी उनकी फिल्‍में आ रही हैं। अक्षय कुमार की दोनों फिल्‍मों के साथ राम माधवानी की नीरजा,शकुन बत्रा की कपूर एंड संसत्र,आर बाल्‍की की की एंड का,साबिर खान की बागी और अभिषेक चौबे की उड़ता पंजाब ने भी अच्‍छा कलेक्‍शन किया और फायदे में रहीं। कुछ फिल्‍में नहीं चलीं। उनमें ज्‍यादातर बुरी फिल्‍में थीं। हां,अच्‍छी फिल्‍में उल्‍लेखनीय कारोबार नहीं करतीं तो थोड़ी निराशा होती है,लेकिन दर्शकों की पसंद सिर-आंखों पर...कलेक्‍शन और कारोबार कर रही फिल्‍मों के महत्‍व को स्‍वीकार करना ही होगा । आखिरकार फिल्‍म एक बिजनेस है। हम इसे हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री कहते हैं।
पहली छमाही में हालीवुड की जंगल बुक ने सबसे ज्‍यादा कारोबार किया है। इसके अंग्रेजी और हिंदी संस्‍करणों के कलेक्‍शन को मिला दें तो कुल कलेक्‍शन 250 करोड़ से अधिक रहा। हिंदी की कोई भी फिल्‍म इसके करीब नहीं पहुंच सकी। कैप्‍टन अमेरिका ने भी 100 करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया था। डेडपुल,कुंग फू पांडा 3,एक्‍स मैन : एपोक्ल्प्सि जैसी हालीवुड की फिल्‍मों के कलेक्‍शन ने भी हिंदी फिल्‍मों को नुकसान पहुंचाया। हालीवुड की फिल्‍में हिंदी फिल्‍मों के लिए खतरा बन रही हैं। ऐसा लग रहा है कि जल्‍दी ही भारतीय निर्माता चीन की तरह भारत में भी हालीवुड की फिल्‍मों के आयात की संख्‍या तय करने की मांब करेंगे। हालीवुड की फिल्‍मों पर तो अधिनियम से पाबंदी लगा देंगे। देश की भाषा का क्‍या करेंगे? हाल ही में मराठी फिल्‍म सैराट के कलेक्‍शन ने सभी को चौंका दिया। दर्शकों को जिस भाषा की फिल्‍म अच्‍छी लगेगी,वे उन्‍हें देखेंगे। ग्‍लोबल दौर में दर्शक किसी एक भाषा तक सीमित नहीं रह गए हैं। वे अब सबटायटल के साथ भी फिल्‍में देख रहे हैं। दर्शक सिनेमा में शिक्षित हो रहे हैं।
हिंदी फिल्‍मों के कलेक्‍शन और करोबार में उल्‍लेखनीय छलांग नहीं दिख रही है। यह चिंता का विषय है। हम इस तथ्‍य सं संतुष्‍ट नहीं हो सकते कि कोई गिरावट नहीं आई है। किसी भी बिजनेस में तभी तरक्‍की दर्ज की जाती है,जब पिछले साल की तुलना में इस साल हर आंकड़े में बढ़ोत्‍तरी हुई हो। हम खुद को समझा सकते हैं कि हर साल दूसरी छमाही का कलेक्‍शन पहली छमाही से बेहतर होता है और इस साल तो लगभग सभी पॉपुलर सितारों की फिलमें जुलाई से दिसंबर के बीच आ रही हैं। इसकी शुरूआत अली अब्‍बास जफर की सलमान खान और अनुष्‍का शर्मा अभिनीत सुल्‍तान से हो चुकी है। अभी मदारी,मोहोंजो दारो,मिरजिया,रुस्‍तम,अकीरा,ऐ दिल है मुश्किल,शिवाय,रॉक ऑन2 और दंगल जैसी फिल्‍में आनी हैं।
पिछले साल 2015 में कुल कलेक्‍शन 2775 करोड़ रहा था। उम्‍मीद है कि इस साल हम 3000 करोड़ का आंकड़ा आसानी से पार कर जाएंगे।

सलमान का शिष्‍य था मैं - अनंत विढाट




-अजय ब्रह्मात्‍मज
अली अब्‍बास जफर की फिल्‍म सुल्‍तान में गोविंद के किरदार में अनंत विढाट को सभी ने नोटिस किया। ऐसा कम होता है कि किसी पॉपुलर स्‍टार की फिल्‍म में कोई कलाकार सहयोगी किरदार में होने पर भी याद रह जाए। अनंत विढाट का आत्‍मविश्‍वास उनके एंट्री सीन से ही दिखता है।
दिल्‍ली के अनंत विढाट किरोड़ीमल कॉलेज से पढ़े हैं। कॉलेज की ही प्‍लेयर्स सोसायटी में सक्रियता रही। वहीं केवल अरोड़ा के सान्निध्‍य में थिएटर की आरंभिक ट्रेनिंग मिली। उसके पहले एनएसडी से संबंधित थिएटर इन एडुकेशन में भागीदारी की। 13-14 साल की उम्र से अमित का रुझान थिएटर में बढ़ा। कह सकते हैं कि छोटी उम्र से ही मंच पर कुछ करने का शौक रहा। मां-पिता ने हमेशा सपोर्ट किया। पिता ने ही एनएसडी के वर्कशाप की जानकारी दी थी और भेजा था। थिएटर का लगाव ही अनंत को पोलैंड के ग्रोटोवस्‍की इंस्‍टीट्यूट ले गया। वहां उन्‍होंने थिएटर की एक्टिंग सीखी।
लौट कर आए तो कुछ समय तक रंगमंच पर सक्रिय रहने के बाद 2012 में उन्‍हें अली अब्‍बास जफर की ही गुंडे मिली। गुडे के बाद उन्‍हें यशराज फिल्‍म्‍स की मर्दानी मिल गई। और फिर सुल्‍तान...संयोग ऐसा रहा कि अनंत की तीनों फिल्‍में यशराज फिल्‍म्‍स की हैं। अनंत इसे महज इत्‍तेफाक मानते हैं। गुंडे में हिमांशु और मर्दानी में सनी कटियाल की भूमिकाओं के बाद सुल्‍तान में गोविंद के रूप वे सभी की पहचान में आ गए हैं। अनंत स्‍वीकार करते हैं,सचमुच,सुल्‍तान का इंपैक्‍ट हुआ है। अली साहब ने पहले ही कहा था कि वह ऐसा दोस्‍त नहीं होगा जो सिर्फ दिखता है और उसका कोई योगदान नहीं होता। मेरी कोशिश यही रही कि डायरेक्‍टर के पर्सपेक्टिव से किरदार निभा लूं।
गोविंद की एंट्री पर अनंत को ढंग से संवाद दिए गए हैं और कैमरा उनके ऊपर ठहरता है। बस स्‍टैंड पर उनकी एंट्री होती है। अनंत बताते हैं, यह अली सहब की सूझ-बूझ थी कि पहले ही किरदार स्‍थापित हो जाए। बाद में पूरी कहानी सुल्‍तान और आरफा के इर्द-गिर्द हो जाए तो भी गोविंद नाम लेते ही किरदार याद आ जाए। अगर मेरा किरदार लोगों को अच्‍छा लगा और याद रहा तो इसका श्रेय डायरेक्‍टर अली साहब को जाता है।
मर्दानी के बाद अनंत के करिअर में एक गैप आया था। फिल्‍में ढंग की नहीं मिल रही थीं। कोई भी आलतू-फालतू फिल्‍म करने के बजाए अनंत ने धैर्य से काम लिया और सुल्‍तान जैसी फिल्‍म का इंतजार किया। नतीजा सभी के समान है। अनंत का अगला इंतजार आरंभ हो गया है। इस बार उन्‍हें उम्‍मीद है कि जल्‍दी ही बेहतर फिल्‍में मिलेंगी। अनतं मानते हैं,थिएटर से आए हम जैसे एक्‍टर के लिए यह बहुत ही अच्‍छा समय है। मनोज,इरफान और नवाज जैसे एक्‍टर ने एक ऑप्‍शन दिखाया है। हमें पहचान मिल रही है। प्रमुख भूमिकाएं मिल रही हैं। अगर हम किसी से कहें कि की-रोल करना चाहते हैं तो पहले की तरह कोई हंसता नहीं है। हमारी भावनाओं और इच्‍छाओं की कद्र हो रही है। अभी सपोटिंग रोल में आए कैरेक्‍टर और एक्‍टर पर भी सभी का ध्‍यान रहता है। इन दिनों एक सीन के लिए भी विश्‍वसनीय एक्‍टर लिए जा रहे हैं। मैं आशावादी हूं। आगे कुछ अच्‍छा ही देख रहा हूं।
सलमान खान जैसे अति लोकप्रिय स्‍टार के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा? अनंत झट से जवाब देते हैं, मुझे उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला। अपने अनुभवों के बावजूद मैं मानता हूं कि उनके साथ काम करने का विशेष अनुभव रहा। पहले या दूसरे दिन ही उन्‍होंने कहा था कि तुम अच्‍छा दिखोगे तो मैं अच्‍छा दिखूंगा और मैं अच्‍छा दिखूंगा तो तुम अच्‍छे दिखोगे। सुल्‍तान और गोविंद का रिश्‍ता दोस्‍ती का है। सलमान खान और अनंत के रिश्‍ते में तो मैं सीख ही रहा था। शिष्‍य था मैं।