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Monday, July 6, 2015

दरअसल : मोहल्‍ला अस्‍सी पर मचा विवाद

-अजय ब्रह्मात्‍मज
                                                                                         पिछले कुछ समय से मोहल्‍ला अस्‍सी के अनधिकृत फुटेज को लेकर विवाद चल रहा है। किसी शरारती ने कुछ दिनों पहले फिल्‍म के कुछ दृश्‍यों को जोड़ कर यूट्यूब पर रिलीज कर दिया। उसे देख कर अनेक संगठन और अन्‍य हिमायती उठ खड़े हुए। सभी की आपत्ति है कि फिल्‍म के इस फुटेज में जिस तरह से गालियों का इस्‍तेमाल हुआ है,उससे धार्मिक भावनाओं को ठेस लगती है। बयान भी आए कि मनोरंजन के नाम पर धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ नहीं करने दिया जाएगा। मामले की त‍ह में गए बिना सभी बयान औ फैसले दे रहे हैं।
सबसे पहले बात कि यी फुटेल अनधिकृत है। यह डायरेक्‍टर की सहमति के बगैर रिलीज हुआ है। जांच एजेंसियों को पता करना चाहिए कि यह कहां से और क्‍यों अपलोड किया गया है ? अभी बगैर सांप देखे सभी लाठी पीट रहे हैं। कुछ लोगों को हल्‍ला मचाने और सुर्खियों में आने का मौका मिल गया है। कायदे से पूरे मामले की गहन जांच होनी चाहिए कि यह फुटेज किस ने अपलोड किया ? इस फुअे ज को ट्रेलर समझने की भूल कर रहे लोगों को भी देखना और समझना चाहिए कि किसभ्‍ भी ट्रेलर में निर्माता और निर्देशक का नाम अवश्‍य होता है। उनके नाम के बगैर यह फर्जी फुटेज है।
मोहल्‍ला अस्‍सी हिंदी के सुप्रसिद्ध लेखक काशीनाथ सिंह के उपन्‍यास के एक खंड पांडे कौन कुमति तोहे लागी पर आधारित है। मूल कृति के आधार पर डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने फिल्‍म की स्क्रिप्‍ट लिखी और उसक मोहल्‍ला र्अस्‍सी नाम दिया। इस फिल्‍म में संस्‍कृत और संस्‍कृति की चिंता है। बनारस के अस्‍सी घाट के धर्मनाथ पांडे के आत्‍मसंघर्ष की यह गाथा देश की राजनीति और अन्‍य हलचलों को भी फिल्‍म में पिरोती है। डॉ.. द्विवेदी ने बनारस के घाटों की उथल-पुथल को कुछ किरदारों के जरिए पेश किया है। धर्मनाथ पांडे और उनकी पत्‍नी के अलावा एक धूर्त्‍त गाइड,ण्‍क नाई और एक बहुरूपिया भी है। धर्मनाथ पांडे और बहुरूपिया की नोंक-झोंक चलती रहती है। धर्मनाथ पांडे बहुरूपिया को समझाते भी हैं कि वह भ्रगवान शिव के अलावा और कोई रूप धर ले। बहुरु‍पिया उनकी बात नहीं मानता। धर्मनाथ पांडे चाहते हैं कि बनारस में संस्‍कृत और संस्‍कृति बची रहे।
डॉ. द्विेदी ने बड़े संयम और समझदारी के साथ बनारस को पेश किया है। अचानक इस फंअेज के आने से खलबली सी मच गई है। फिल्‍म के उद्देश्‍य से फुटेज का कोई लेना-देना नहीं है। डॉ. द्विवेदी के मुताबिक यह फअेज फिल्‍म की गलत झलक देता है। किसी ने बदमाशी से फिल्‍म के वैसे दृश्‍यों को ही एकत्रित किया है,जिन्‍हें एक साथ देख का लोग उत्‍तेजित हो या भड़के। जिन्‍हें यह फुटेज अव्‍छा और विचारोत्‍तेजक लग रहा है,वे भी फिल्‍म कर गलत छवि बना रहे हैं। खुश और नाखुश समूहों को फिल्‍म के कंटेंअ में रुचि नहीं है। वे सिर्फ इस फुटेज के आधार पर मंतव्‍य और फतवे जारी कर रहे हैं।
यह सोच और चिंता का विषय है कि सोशल मीडिया के इस दौर में कोई भी कृतिकार कैसे अपनी कृति की रक्षा करे ? कृति की रक्षा में उसे तुरंत सरकारी और प्रशासनिक सहयोग नहीं मिले तो कृति की गलत छवि बनती है। साथ ही कृतिकार पर भी विवाद की आंच आती है। मोहल्‍ला अस्‍सी के संदर्भ में सच उतना ही नहीं है,जो दिख रहा है। सच इस विवाद से परे निर्माता और निर्देशक की अनबन में भी है। 2011 में पूरी हो चुकी यह फिल्‍म निहित स्‍वार्थों की वजह से अभी तक रिलीज नहीं हो सकी है। फिल्‍म एंग से रिलीज हो सच सामने आएगा। साथ ही हम सनी देओल को एक ऐसी भूमिका में देख पाएंगे,जो उनकी पॉपुलर इमेज से बिल्‍कुल अलग है। 

खुद पर हमेशा रखना चट्टान सा भरोसा -करीना कपूर खान


-अजय ब्रह्मात्‍मज 
-क्या कुछ है ‘बजरंगी भाईजान’ और जाहिर तौर पर क्या निभा रही हैं आप?
फिल्म के साथ सबसे रोचक बात तो यह है कि सलमान के संग फिर से काम कर रही हूं। ‘बॉडीगार्ड’ सफल रही थी। आम जनता भी काफी उत्साहित है कि हम दोनों साथ आ रहे हैं। फिल्म की यूएसपी कबीर खान भी हैं। मैंने पहले कभी उनके संग काम नहीं किया। वह बड़ा रोचक अनुभव रहा। मेरा किरदार बड़ा मजेदार है। वह चांदनी चौक के एक स्कूल में टीचर है। वह कैसे सलमान के किरदार से मिलती है? कैसे एक बच्ची उनकी जिंदगी में आती है? दोनों फिर कैसे उसे उसके घर पहुंचाते हैं, वह सब कुछ फिल्म में है।
- बाकी फिल्म में गाने-वाने तो होंगे ही?
हां, पर वे सब जरा हटकर हैं। ऐसे नहीं कि लंदन में प्रेमी-प्रेमिका नाच-गाना कर रहे हैं।
-और वह टीचर कैसी है? साड़ी वाली या..?
नहीं, यंग और मॉडर्न। टिपिकल चांदनी चौक वाली। वह लुक और फील तो आएगा।
- .. लेकिन दिल्ली वाली लड़कियों का रोल तो आपने पहले भी किया है?
यह वाली बड़ी मैच्योर है। पहले थोड़े बबली, चर्पी किस्म की लड़की का किरदार निभाया था। ‘जब वी मेट’ वाला तो बिल्कुल अलग ही मामला था। हां, उसे लोग मेरा सिग्नेचर रोल कहते हैं, मगर इसमें मेरा अवतार एक बेहद मैच्योर लड़की का है।
-अच्छा और फिल्म में सुनने को मिल रहा है कि पाकिस्तान की लड़की है। वहां से आ जाती है..? अगर इस पर थोड़ी  रौशनी डाल सकें तो, क्योंकि कइयों का मानना है कि जैसे ‘हिना’ में नायक हिंदुस्तान से पाकिस्तान चला जाता है, फिर वह कैसे हिंदुस्तान आता है? यहां उलटे क्रम में वह हो रहा है?
नहीं, जैसा ट्रेलर में दिखाया गया है कि सलमान का किरदार कैसे उस बच्ची को पाकिस्तान छोड़ कर आता है? उस सफर में क्या कुछ होता है, वह है इस फिल्म में। यह ‘हिना’ जैसी नहीं है। वह तो लव स्टोरी थी। यह तो ड्रामा है।
-कबीर खान के संग क्या खास बात लगी?
मेरे ख्याल से वे हमेशा बड़ी पिक्चरें बनाते हैं, लेकिन उनमें अच्छी कहानी होती है। यह नहीं कि उनमें महज गाने चल रहे हैं। वे बड़ी रस्टिक फिल्में बनाते हैं। स्क्रीन पर उनकी फिल्म काफी विश्वसनीय लगती है, इसलिए जिस सलमान को हम उनकी बाकी की फिल्मों में देखते हैं, कबीर की फिल्मों में वह बेहद अलग होता है।
-करीना को हमने ग्रो और मैच्योर होते देखा है। आप अपनी जर्नी को किस तरह देखती हैं?
लोग अक्सर कहते हैं कि एक एक्ट्रेस की शेल्फ लाइफ दस साल की होती है।
- आप के मामले में ऐसा नहीं है?
जी हां, जिस दिन ‘उड़ता पंजाब’ रिलीज होगी, उस दिन इंडस्ट्री में मैं 16 साल पूरे कर लूंगी। एक्टिंग में इतनी ताकत और दिलचस्पी आज भी है कि क्या कहूं? मुझे वह करना पसंद है। अच्छे व निरंतर परफॉरमेंसेज करना भाता है। वह मेरी रगों में दौड़ रहा है। कुछ कमर्शियल फिल्में कई लीक से जुदा फिल्में, सब कुछ करने को मिला है।
-ऑफबीट फिल्में तो आप ने तब ही कर दी थीं, जब उनकी चर्चा नहीं होती थी?
हां, पर लोग अब कह रहे हैं। मैंने विमेन सेंट्रिक फिल्में तो काफी पहले ही कर दी थी।
- पर अब जिस गति से वैसी फिल्में आ रही हैं तो कैसा लगता है?
बड़ी खुशी होती है। आज अभिनेत्रियां अपनी मर्जी व मिजाज की फिल्में कर रही हैं, वह बहुत बड़ी बात है।
- आप वे फिल्में देख पाती हैं ?
हां, कुछ तो देखी हैं, पर सब नहीं देख पाती। हां, उनके बारे में समाचारों में जो कुछ आता है, उनके बारे काफी कुछ पढ़ जरूर पाती हूं। यह भी बड़ी अच्छी बात है कि हर दशक की टॉप अभिनेत्रियां टॉप अभिनेताओं के संग काम रही हैं। वह चाहे शर्मिला जी हों, जिन्होंने राजेश खन्ना के संग काम किया। हेमा जी धर्मेंद्र के साथ। श्रीदेवी अनिल कपूर के संग। रेखा जी अमिताभ जी के साथ। वह तो हमेशा से होता आया है, लेकिन लोग पता नहीं क्यों कहते हैं कि खान के साथ बार-बार काम नहीं करना चाहिए। उन्हें विमेन सेंट्रिक फिल्में करनी चाहिए, पर कमर्शियल फिल्मों का मजबूत वजूद तो है ही। मसाला फिल्में तो बननी ही चाहिए। आम जनता को पसंद पड़ती हैं वे और कंटेंट ड्रिवेन फिल्में भी यकीनन करनी चाहिए। एक संतुलन रहे।
-लेकिन आप खुद को किस मूड में पा रही हैं? आप ‘मूडी’ भी कही जाती हैं। आप से शिकायत रही है कि आपने इंडस्ट्री को हंड्रेड पर्सेंट नहीं दिया है?
बिल्कुल, लेकिन वह समर्पण शायद अगले पांच सालों में आप लोगों को दिखे। अभी मैं वैसा कर रही हूं। मैंने बाल्की के संग पहले कभी काम नहीं किया, उनके संग कर रही हूं। अभिषेक चौबे के साथ कर रही हूं। कबीर के संग भी पहले कभी काम नहीं किया था। उनके साथ कर रही हूं। उक्त सभी की खासियत है कि उनकी फिल्में कमर्शियल जोन में रहते हुए भी काफी रियल रहती हैं।
- यानी यह माना जाए कि सिनेमा को लेकर आप की सोच व अप्रोच में फर्क आया है। अपने सफर में आपने हर किस्म के अनुभव हासिल भी कर लिए हैं?
वाकई। 15-16 साल के सफर के बाद भी काम कर रही हूं। हर किस्म के डायरेक्टर के साथ काम कर रही हूं। उन पर मेरा व मेरा उन पर पूरा भरोसा भी है।
- मुझे तो आप का वह फेज भी याद है, जब आप के बारे में एक टाइटिल दिया गया था ‘फ्लॉप फिल्मों की हिट हीरोइन’। तो उस दौर में भी खुद को भटकने व किसी और पर नाराज न होने देने से खुद को कैसे रोका?
 मेरे ख्याल से अपनी प्रतिभा पर भरोसा होना बहुत जरूरी है। मैं ऐसी ही हूं। जब कभी लोगों ने कहना शुरू किया कि करीना नहीं कर पा रही है तो बाद मैं फिनिक्स की तरह बाहर निकली हूं। मंै बचपन से ही ऐसी हूं। वह चट्टानी इरादा मुझे मेरी मां से मिला। मेरी मॉम काफी स्ट्रौंग शख्सियत रही हैं तो इन मामलों में मैं उन जैसी ही हूं।
- अच्छा खुद को आप कितनी सिंधी और कितनी पंजाबी?
सिंधी खाना बहुत पसंद है, पर दिल से, दिमाग से पूरी पंजाबी हूं। पूरी कपूर ही हूं मैं। दिल बड़ा है और खाने का शौक है।
-सैफ के संग जुड़ने के बाद तो नवाबी रंग भी चढ़ गया?
जी हां, पर हम सब बड़े मेहनती हैं। काम के लिए जो हमारी ख्वाहिश है, जो आग है, वह आज भी अंदर जलती रहती है। मुझे पूरी उम्मीद है कि पच्चीस साल बाद भी हम जब बात कर रहे हों तो कहें कि ढाई दशक गुजर भी गए और पता भी नहीं चला।
- वैसा आप की वर्किंग से  झलक रहा है। आजकल तो 40 पार अभिनेत्रियों के लिए भी रोल लिखे जा रहे हैं?
एज को ग्रेसफुली ही लेना चाहिए। उसके खिलाफ नहीं होना चाहिए?

बिल्कुल नहीं, मुझे तो वह सब पसंद नहीं है।
-तो आगे की क्या रूपरेखा है? सैफ के संग इल्युमिनाटी में सक्रिय होंगी?
जी नहीं। मुझे प्रॉडक्शन में बिल्कुल इंट्रेस्ट नहीं है। अभी इतने अच्छे किरदार गढ़े जा रहे हैं। नए निर्देशक काफी अच्छा कर रहे हैं,मैं उनके साथ अभिनय करूंगी। प्रोडक्शन की ओर जरा भी ध्यान नहीं है।
-...नहीं पर जैसे अभी अनुष्का ने किया। दीपिका कर रही हैं। प्रियंका ने भी किया ताकि फिल्मों की लागत कम हो जाए। ऐसा कभी ख्याल आया हो या कोई डायरेक्टर पसंद है, जिनके संग काम करना चाहें?
जी हां डायरेक्टर तो कई पसंद हैं, जहां तक लागत कम करने की बात है तो आजकल जैसे प्रॉफिट शेयरिंग हो रही है। पहले किया भी है। वह मैं कर सकती हूं, पर एक्टिव प्रोड्यूसर होना मुमकिन नहीं। मेरी उसमें दिलचस्पी भी नहीं है।
-एक्टिंग से फुर्सत मिलते ही कहां भागती हैं?
घूमने का शौक है। दुनिया देखने निकल पड़ती हूं। फैमिली के साथ, सैफ के संग, क्योंकि हम दोनों बिजी रहते हैं। घूमना तो अच्छा भी लगता है। हर तीन-चार महीने में कोशिश रहती है कि घूमने पर निकल जाएं।
-किस तरह की यात्राएं भाती हैं?
जाड़ों में तो राजस्थान या फिर लंदन।
-राजस्थान इसलिए तो नहीं कि वहां राजे-रजवाड़े रहे हैं?
नहीं-नहीं। वहां जिस किस्म के होटल हैं। मौसम है। वहां का खाना बहुत पसंद है मुझे। घूमने का टाइम आता है तो खाना तो अहम हो ही जाता है।
-‘चमेली’ जैसी फिल्म फिर से करने का इरादा है?
वैसा कुछ तो ‘तलाश’ में भी किया था, जो मुझे बहुत अच्छी लगी थी। आज की तारीख में तो वैसे रोल लिखे जा रहे हैं। खासकर नए निर्देशकों के द्वारा तो वैसी कहानी, भूमिका आती है तो मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है वह सब करने में।
-इन दिनों यह बात भी उठ रही है कि अभिनेत्रियों को भी अभिनेताओं के बराबर फीस मिलनी चाहिए, क्योंकि कंगना की फिल्म 100 करोड़ करती है तो ...?
बिल्कुल बराबरी होनी चाहिए। हम भी उतनी ही मेहनत करते हैं, जितनी अभिनेता। खूबसूरत लगना भी बहुत टफ है। वह एक ऐडेड रेसपॉन्सिबिलिटी है। हीरोइन के बना हीरो भी कम है। एक अधूरापन तो रह ही जाता है।
-वह अधूरापन तो खैर जिंदगी की बाकी चीजों में भी है। दोनों के परस्पर जुड़ने व अच्छे व्यवहार से ही जिंदगी सरल-सहज बनती है?
बिल्कुल सही। रिश्ता भी लंबा निभता है तब। हीरोइन के संग भी वैसी ही बात है। वह भी बिना हीरो के अधूरी ही है। नमक होना चाहिए फिल्म में।
-‘उड़ता पंजाब’ के बारे में बता सकती हैं थोड़ा बहुत? नाम बड़ा अजीब है?
बिल्कुल। यह ड्रग ड्रामा पर बेस्ड है। बड़ी एजी फिल्म है। अलग है उसकी कहानी। कास्ट भी बड़े प्यारे हैं। सब का रोल अलहदा है। मैं उसमें ड्रग रिहैब में एक डॉक्टर का रोल प्ले कर रही हूं। मैं बड़ी एक्साइटेड हूं। लोगों ने मुझे उस सेटिंग में नहीं देखा है।
-सेटिंग मतलब क्या, लो कॉस्ट या कुछ और?
नहीं लोगों ने अब तक मुझे ग्लैमरस अवतार में ही देखा है। इस बार पहली दफा वे मुझे रियल व डीग्लैम अवतार में देखेंगे।
-और दूसरी जो आर. बाल्की वाली फिल्म है, वह उनके मिजाज वाली ही है?
यकीनन। जैसी फिल्में बनाने में उनको महारथ हासिल है। मिसाल के तौर पर ‘चीनी कम’ जैसी। उसके बाद तो अन्य स्क्रिप्ट सुन ही रही हूं, क्योंकि अभी ‘उड़ता पंजाब’ की शूटिंग खत्म ही की है। फिर बाल्की की फिल्म की शूटिंग प्रारंभ होगी। तीन-चार महीने उसमें जाएंगे।
- सलमान के बारे में क्या कुछ कहना चाहेंगी?
वे सक्सेस व फेल्योर से बहुत आगे की चीज हैं। वे इंडिया के सबसे महान कलाकार हैं।
-कोई पर्सनल एक्सपीरिएंस अगर शेयर कर सकें?
पहली बार तो उनसे भप्पी सोनी की ‘निश्चय’ के सेट पर मिली थी। मैं दस साल की थी तब। आज मैं 34 की हूं। तो बचपन से लेकर शादी से पहले तक। अब शादी के बाद हमारा एक लंबा सफर रहा है। तब से लेकर आज तक उनके नेचर में कोई बदलाव नहीं आया है। तभी वे ग्रेट हैं। बस,तब उनके मसल्स बढ़े हुए थे।
- पर बतौर एक्टर उनकी खासियत क्या है?
मेरे ख्याल से उनकी स्माइल। वह सुपरस्टार वाली स्माइल है। पूरी दुनिया उस पर फिदा हो जाए।
- आप की भी एक आभा है। उनकी भी है। आप दोनों से सालों से हम मिल भी रहे हैं। आप लोग समझ पाते हैं कि सामने वाला आप की आभा से प्रभावित हो रहा है?
मुझे तो महसूस नहीं होता। मेरे ख्याल से जो कलाकार अपने आप को ज्यादा सीरियसली नहीं लेते, उनका सदा अच्छा होता है। स्टारडम को सीरियसली नहीं लेना चाहिए। अगर लोग मेरे आभामंडल से प्रभावित होते हैं तो मैं समझ जाती हूं, पर मैं रिएक्ट नहीं करती। वैसे भी एक सुपरस्टार की इफेक्ट होनी तो चाहिए।
-नहीं, क्योंकि सोसायटी में आप जितना कंट्रीब्यूट करते हो उस अनुपात में आप लोगों को मिल नहीं रहा। मिसाल के तौर पर आप एयरपोर्ट पर जाती हैं तो वहां के सभी लोग आप को देख अलग किस्म की खुशी महसूस करते हैं?
वही हमारी कमाई है। वह अच्छा भी लगता है। लोगों में रेस्पेक्ट की भावना है। आंखों की शरम उनमें है। मैं इस मामले में लकी हूं कि लंबे समय तक काम करने के अलावा मैं जिस परिवार से ताल्लुक रखती हूं, उसको लेकर भी पब्लिक प्लेस पर लोग मुझे बहुत सम्मान देते हैं।
-क्योंकि सलमान ने भी एक बात कही थी कि लोग जब उनकी  फिल्म देखने आते हैं तो उसी फिल्म भर में उन्हें नहीं देख रहे होते। उनकी पूरी पर्सनैलिटी के साथ उनका किरदार पर्दे पर देखा जाता है?
तभी तो लोगों में उनको लेकर क्रेज है, जो लोग समझ नहीं पाते। वही एक फैन का नशा है, जो सलमान को, करीना को, शाह रुख को उस अवतार में बार-बार देखना पसंद करते हंै।



Thursday, June 25, 2015

दरअसल : पहली छमाही की उपलब्धि रहीं कंगना


-अजय ब्रह्मात्‍मज

पहली छमाही खत्‍म होने पर आ गई है। इस छमाही में अन्‍य सालों की तुलना में कम फिल्‍में रिलीज हुई हैं। लगभग 60 फिल्‍मों की रिलीज तो हुई,लेकिन उनका बिजनेस प्रतिशत भी पिछले सालों की तुलना में कम रहा। इस साल अभी तक केवल तनु वेड्स मनु रिटर्न्‍स ही स्‍पष्‍ट तौर पर 100 करोड़ का आंकड़ा पार कर सकी है। छह महीनों में सिर्फ एक फिल्‍म की सौ करोड़ी कामयाबी शुभ संकेत नहीं है। पहले छह महीनों में पॉपुलर स्‍टारों की फिल्‍में भी आई हैं,लेकिन उनमें से किसी ने भी बाक्‍स आफिस पर धमाल नहीं मचाया। जिन फिल्‍मों से बेहतरीन प्रदर्शन और कमाई की उम्‍मीद थी,उन फिल्‍मों ने अधिक निराश किया। किसी भी फिल्‍म ने चौंकाया नहीं। तनु वेड्स मनु रिटर्न्‍स ने तो पहले प्रोमो से ही दर्शकों के दिल में जगह बना ली थी। हां,ट्रेड पंडित यह समझने में लगे हैं कि कैसे कंगना रनोट की फिल्‍म ने ऐसा चमत्‍कारिक कारोबार किया? हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री के घाघ तनु वेड्स मनु रिटर्न्‍स की सफलता को पचा नहीं पा रहे हैं। वे अस्‍वीकार की मुद्रा अपना चुके हैं। अब आंकड़ों को कौन झुठला सकता है?
हिंदी की सर्वाधिक कारोबार करने वाली फिल्‍मों की सूची में तनु वेड्स मनु रिटर्न्‍स’ 142 करोड़ के बिजनेस से अभी तेरहवें स्‍थान पर है। थिएटर से निकलने तक यह कुछ और ऊपर जा सकती है। किसी हीरोइन की फिल्‍म ने अभी तक ऐसा कारोबार नहीं किया है। निश्चित ही इस फिल्‍म की कामयाबी में कंगना की बड़ी भूमिका है। उनके प्रति दर्शकों का रवैया सकारात्‍मक है। पर क्‍या आनंद राय के योगदान को नकारा जा सकता है ? उन्‍होंने हिमांशु शर्मा के लेखन को अपने निर्देशन से पर्दे तक पहुंचाया और सभी दर्शकों की पसंद बना दिया। इस फिल्‍म के कंटेंट को लेकर बातें हो सकती हैं। आनंद राय तो स्‍वीकार करते हैं कि वे अपनी फिल्‍मों में क्रांति नहीं कर सकते। वे सामान्‍य किस्‍म की मनोरंजक फिल्‍में ही बना सकते हैं। इसे कोई आनंद राय का डिफेंस मान स‍कता है। सभी प्रकार की आश्‍ंकाओं और आरोपों के बावजूद तनु वेड्स मनु रिटर्न्‍स पहली छमाही की बड़ी हिट है। इसे ब्‍लॉकबस्‍टर या सुपरहिट कहते हैं। और कंगना रनोट इस छमाही की उपलब्धि हैं।
तनु वेड्स मनु रिटर्न्‍स के साथ बदलापुर’,’दम लगा के हइसा’,’एनएच 10’,’हंटर और पीकू पहली छमाही की हिट फिल्‍में हैं। इन फिल्‍मों के कलाकारों और कंटेंट पर गौर करें तो कुछ समान तथ्‍य निकलते हैं। इन सभी फिल्‍मों में कोई मेल सुपरस्‍टार नहीं है। छह में से तीन फिल्‍में नायिका प्रधान है। उन फिल्‍मों में अनुष्‍का शर्मा,दीपिका पादुकोण और कंगना रनोट ने साबित किया है कि लेखक और निर्देशक ढंग से उनका इस्‍तेमाल करें तो वे अपनी करतब से बजब ढा सकती है। उक अकेली बदलापुर ऐसी फिल्‍म है,जिसमें अपेक्षाकृत पॉपुलर स्‍टार था। वरुण धवन को अभी सुपरस्‍टार नहीं कहा जा सकता। उस फिल्‍म में सहयोगी कलाकारों की भूमिका उल्‍लेखनीय रही। इन सभी फिल्‍मों के निर्देशक नए और प्रयोगशील हैं। उन्‍होंने हिंदी फिल्‍मों के पारंपरिक ढांचे में ही रह कर कुछ नया किया है। अच्‍छी बात है कि इनमें रेगुलर प्रेमकहानी भी नहीं है। और न ही  हिंदी फिल्‍मों के बाकी प्रचलित मसालों का इस्‍तेमाल किया गया है।

2015 की दूसरी छमाही में पॉपुलर स्‍टारों की फिल्‍में आएंगी। इन फिल्‍मों की शुरूआत सलमान खान की फिल्‍म बजरंगी भाईजान से हो रही है।पहली छमाही में रह गई कसर दूसरी छमाही की फिल्‍मों की कमाई से शायद संतुलित हो जाए। दो-चार सौ करोड़ी फिल्‍में भी आ जाएं। देखना रोचक होगा कि कंगना की छलांग को कौन-कौन पार कर पाता है ?

Tuesday, June 23, 2015

सबसे काबिल शिक्षक है पिता - महेश भट्ट

पिता महेश भट्ट

प्रस्‍तुति-अजय ब्रह्मात्‍मज
पिता हजारों शिक्षक से अधिक प्रभावशाली होता है। स्‍कूल और जिंदगी के ज्‍यादातर शिक्षक किताबी होते हैं। वे सिखाते तो हैं,लेकिन उनका सीमित असर होता है। पिता अपने बच्‍चों के जहन पर गहरा छाप छोड़ता है। खास कर अपनी बेटियों पर ... जिसका पगभाव अकल्‍पनीय होता है। अगर मेरी बेटियां और बेटा आत्‍मनिर्भर हैं तो इसमें मेरा असर है। पूजा अभी जयपुर के पास रेगिस्‍तान में शूटिंग कर रही है। फिल्‍म इंडस्‍ट्री में आए आर्थिक संकट के दौर में उनलोगों के साथ फिल्‍म बना रही है,जो स्‍आर नहीं माने जाते हें। यह उसकी अपनी जीत और हिम्‍मत है। आलिया ने अपनी जिंदगी में 21 की उम्र में वह मुकाम हासिल कर लिया है,जो मुझे 50 की उम्र में भी नहीं मिला था।

अपना क्लोन न बनाएं 
यह पिता का विश्‍वास होता है कि हमारे बच्‍चे हमारे तो होते हैं,लेकिन वे हम से अलग होते हैं। यह तो मानव अधिकार की बात है कि हर किसी को अलग होने और रहने का अधिकार है। इस मुल्‍क में यह बात हम भूल जाते हैं कि बच्‍चों को अपना क्‍लोन न बनाएं। कुदरत के बेमिसाल क्रिएशन को उसकी पृथक पहचान पर अपनी मानसिकता थोपेंगे तो फिर उनकी खासियत को आप मिटा देंगे। पिता को अपने अनुभव से बेटे-बेटियों को उन हथियारों से लैस करें,जो इस जिंदगी में उनके काम आएं। उन्‍हें संस्‍कृति,सामाजिकता और नैतिकता का इल्‍म अवश्‍य दें,लेकिन उनकी पहचान को न मोड़ें या तोड़ें। उन्‍हें पसंद के फील्‍ड में जाने दें। मेरा बेटा राहुल फिटनेस फ्रीक है। उसे वही पसंद है। दूसरे बच्‍चे तो लगे रहते हैं बापों के पीछे कि मुझे लांच करो। राहुल ने हमेशा कहा कि मैं अपने मन का ही काम करुंगा। वह फिल्‍म इंडस्‍ट्री की चकाचौंध से प्रभावित नहीं है। शाहीन गजब लिखती है। वह अधीर नहीं है। उसे पेज 3 पर आने की हड़बड़ी नहीं है। परिवार में मुझे अगर कोई अंतदृष्टि देता है तो वह शाहीन ही है। बहुत ही जहीन बच्‍ची हैं।
आप के बच्‍चे तभी हीरे रह पाएंगे,जब आप अपनी धूल उन पर न लपेटें। हम होते कौन हैं बच्‍चों को आजादी देने वाले... वे आजाद पैदा होते हैं। क्‍या सूरज की रोशनी,धरती की हरियाली या आसमान की निरभ्रता आ ने दी है? इस देश में खास कर बेटियों को सदियों से नाइंसाफी झेलनी पड़ी है। हमें उनकी रक्षा तो करनी चाहिए,लेकिन उन्‍हें वह औजार भी देना चाहिए कि वे अत्‍मारक्षा कर सकें। प्‍यार के नाम पर जुल्‍म ढाना बंद करें। मर्यादा की लक्ष्‍मण रेखा न खींचें। खुले आसमान में उन्‍हें उड़ने दें। गिरने दें। गिरने की चोट और दर्द से वे सीखेंगे। दर्द तराशता है। उन्‍हें अपाहिज बना देंगे तो आप कब तक बैसाखी बने रहेंगे ? बुद्ध ने कहा था कि स्‍वयं प्रकाशित हो जाओ। फिल्‍म इंडस्‍ट्री में देख लें कितने बच्‍चे अपने पिताओं की सस्‍ती नकल बन कर रह गए। वे चाह कर भी अपने पिता की तरह नहीं हो पाते।
मेरे बच्चे समझते हैं मुझे  
मुझे याद है कि अपनी किताब ए टेस्‍ट ऑफ लाइफ का कुछ अंश मैंने शाहीन को पढ़ कर सुनाया था। उसने जिस अंदाज से सुना। सुनने के बाद उसने इतना ही कहा कि डैड अब आप की जिंदगी पूरी हो गई। लोग एहसास के जिस शिखर पर पहुंचना चाहते हैं,वहां आप पहुंच चुके हैं। मुझे लगा था कि मेरी बच्‍ची के अंदर कोई बूढ़ी औरत बैठी हुई है। आलिया बचपन से ही मुझे आत्‍मस्‍थ लगती थी। मुझे याद है कि मैं घर के पास जिस्‍म की शूटिंग कर रहा था। वह स्‍कूल जाने के लिए निकली तो सेट पर आ गई। उसने बिपाशा बसु  को यों देखा कि जैसे उसे वहां होना चाहिए था। मैंने पूछा भी कि क्‍या सोच रही हो ? तुम्‍हें होना चाहिए? उसने मुस्‍करा कर कहा ,हां। पूजा के अंदर अलग चाल चलने की अदा थी। मैंने जब उसे डैडी के लिए राजी किया था तो मुकेश भट्ट नाराज हो गया था। उसके तेवर तभी दिख गए थे। कम लोगों को मालूम है कि पूजा ने आशिकी करने से मना कर दिया था। राहुल के साथ मैंने ज्‍यादा बचपन नहीं गुजारा है। मैं घर से अलग हो गया था। उसके जहन में एक कड़वा चैप्‍टर था। जाहिर है अगर बाप उसकी मां को छोड़ कर किसी और औरत के साथ रहेगा तो उसे गुस्‍सा आएगा। पाप की शूटिंग के दौरान हम बाप-बेटे एक कमरे में डेढ़ महीने ठहरे तो रिश्‍ता कायम हुआ। मैंने बताया भी कि मुझे अपने पिता से जो शिकायत थी,वही मैंने तुम्‍हारे साथ कर दिया। मेरेपता वह फासला कम नहीं कर सके। मैं करना चाहूंगा। तुम्‍हारे पास च्‍वॉयस है कि किसी विक्टिम की तरह दर्द जीते रहो या सरवाइवर की तरह दर्द को सीढ़ी बना कर आगे निकल जाओ। मैंने अपने पिता के साथ के कड़वे अनुभवों को फिल्‍मों में लाकर करिअर का स्प्रिंगबोर्ड बना दिया। उस समय उसने थोड़ा समझा। बाद में डेविड हेडली के मुद्दे के समय मैंने पिता की तरह उसकी रक्षा की थी। उस वक्‍त राहुल को एहसास हुआ कि मेरा बाप मुझे छोड़ कर कहीं नहीं गया था।

मिसफिट हूं मैं 
मेरा घर सामान्‍य घर नहीं था। आज भी नहीं है। मैंने अपने अंदाज से इनकी परवरिश की है। कभी सोनी राजदान के माता-पिता आते हैं और हमारी बेटियां उनसे झाुल-मिल रही होती हैं तो मैं दूर से उन्‍हें देख कर चकित होता रहता हूं। वैसा बचपन मुझे नहीं मिल पाया। मैं पारिवारिक जिंदगी में मिसफिट सा हूं। बच्‍चे अपने तरीके से मुझे प्‍यार करते है। आदर देते हैं। 

Friday, June 19, 2015

फिल्‍म समीक्षा : एबीसीडी 2

स्‍टार- **1/2 ढाई स्‍टार

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
रैमो डिसूजा की फिल्म ‘एबीसीडी 2’ में डांस है, जोश है, देशभक्ति और अभिमान भी है, वंदे मातरम है, थोड़ा रोमांस भी है...फिल्मों में इनसे ही अलग-अलग संतुष्ट होना पड़ेगा। दृश्ये और प्रसंग के हिसाब से इन भाव और भावनाओं से मनोरंजन होता है। कमी रह गई है तो बस एक उपयुक्त कहानी की। फिल्म सच्ची कहानी पर आधारित है तो कुछ सच्चाई वहां से ले लेनी थी। कहानी के अभाव में यह फिल्म किसी रियलिटी शो का आभास देती है। मुश्किल स्टेप के अच्छेे डांस सिक्वेंस हैं। डांस सिक्वेंस में वरुण धवन और श्रद्धा कपूर दोनों सुरु और विन्नी के किरदार में अपनी लगन से मुग्ध करते हैं। कहानी के अभाव में उनके व्यक्तिगत प्रयास का प्रभाव कम हो जाता है। पास बैठे युवा दर्शक की टिप्पणी थी कि इन दिनों यूट्यूब पर ऐसे डांस देखे जा सकते हैं। मुझे डांस के साथ कहानी भी दिखाओ।

 सुरु और विन्नी मुंबई के उपनगरीय इलाके के युवक हैं। डांस के दीवाने सुरु और विन्नी का एक ग्रुप है। वे स्थानीय स्तुर पर ‘हम किसी से कम नहीं’ कंपीटिशन में हिस्सा लेते हैं। नकल के आरोप में वहां उनकी छंटाई हो जाती है। उसकी वजह से जगहंसाई भी होती है। इस तौहीन के बावजूद उनका जोश ठंडा नहीं होता। वे मशहूर डांसर विष्णु को ट्रेनिंग के लिए राजी करते हैं (विष्णु सर को राजी करने के दृश्य में दोहराव से फिल्म खिंचती है। विष्णु सर अपने फ्लैट में आते समय एक खास जगह पर ही लड़खड़ाते हैं। हंसे नहीं, शायद कैमरे के एंगल से वह सही जगह हो)। बहरहाल, विषणु सर राजी तो होते हैं, लेकिन उनका कुछ और गेम प्लान है। फिल्म में आगे वह जाहिर होता है, फिर भी ड्रामा नहीं बन पाता। ‘एबीसीडी 2’ में ड्रामा की कमी है। इस कमी की वजह से ही सुरु और विन्नी का रोमांस भी नहीं उभर पाता। नतीजतन दोनों के बीच का रोमांटिक सॉन्ग अचानक और गैरजरूरी लगता है। 

प्रभु देवा फिल्मों के बेहतरीन डांसर हैं। बतौर निर्देशक उनकी कुछ फिल्में सफल भी रही हैं। मतलब वे एक्टरों से अभिनय वगैरह भी करवा लेते हैं, किंतु खुद अभिनय करते समय वे निराश करते हैं। उनके लिए कुछ नाटकीय दृश्य रचे भी गए है, लेकिन वे उसमें परफार्म नहीं कर सके हैं। डांस के गुरू के तौर उन्हें कुछ सीन मिल सकते थे। वरुण धवन और श्रद्धा कपूर ने मुश्किल स्टेप भी सहज तरीके से अपनाए हैं। ऐसा नहीं लगता कि वे मेहनत कर रहे हैं। एक्टर दृश्यों को एंजॉय करें तो इफेक्ट गहरा होता है। दोनों अभी दो-तीन फिल्मो ही पुराने हैं। दिख रहा है कि वे हर फिल्म के साथ आगे बढ़ रहे हैं। पर्दे पर लगातार दिखने से स्वीकृति बढ़ती है और परफार्मेंस पसंद आ जाए तो स्टारडम में इजाफा होता है। सुरु और विन्नी की टीम के अन्य सदस्य भी डांस के दृश्यों में उचित योगदान करते हैं। अपनी पहली फिल्म ‘वेलकम टू कराची’ में निराश कर चुकी लॉरेन गॉटलिब ‘एबीसीडी 2’ में जंचती हैं। उनका डांस सिक्वेंस नयनाभिरामी (आई कैचिंग) है।

 रैमो डिसूजा ने फिल्मा में भव्यता रखी है। डांस कंपीटिशन के सेट चकमदार होने के साथ ही आकर्षक हैं। डांस के स्टेप्स नए और प्रभावशाली हैं। यहां तक कि विदेशी टीमों के नृत्यों पर भी पूरा ध्यान दिया गया है। कमी रह गई है सिर्फ कहानी की, जिसका जिक्र पहले भी किया गया। 
 अवधि- 154 मिनट

Thursday, June 18, 2015

मोहल्‍ला अस्‍सी के निर्देशक ने कथित ट्रेलर को बताया फर्जी

सोशल मीडिया पर वायरल हुए ‘मोहल्ला अस्सी’ के अनधिकृत वीडियो फुटेज पर चल रही टिप्पणियों और छींटाकशी के बीच अपनी फिल्म की असामयिक और असंगत चर्चा से फिल्म के निर्देशक डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी व्यथित हैं। उन्हें लगातार हेट मेल, एसएमएस और सवाल मिल रहे हैं, जिनमें सभी की जिज्ञासा है कि असली माजरा क्या है? ज्यादातर लोग इसे अधिकृत ट्रेलर समझ कर उत्तेहजित हो रहे हैं। डॉ. द्विवेदी ने इस फिल्म की शूटिंग 2011 में पूरी कर ली थी। पोस्ट प्रोडक्शेन और डबिंग की प्रक्रिया अभी तक पूरी नहीं हो पाई है। वीडियो फुटेज को लेकर चल रहे शोरगुल के बीच अजय ब्रह्मात्मज ने फिल्म के निर्देशक डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी की प्रतिक्रिया ली। 
 सोशल मीडिया पर चल रहे ‘मोहल्ला अस्सी’ के वीडियो फुटेज से उत्तेजना फैली हुई है। आप को इसकी जानकारी कब मिली और आप क्या कहना चाहेंगे? 
सबसे पहले तो यह ‘मोहल्ला अस्सी’ का ट्रेलर नहीं है। यह उस फिल्म का अनधिकृत फुटेज है, जिसे किसी शातिर और विकृत व्यक्ति ने कहीं से प्राप्त किया है। उसने उत्तेजना और विरोध का वातावरण बनाने के लिए इसे अपलोड कर दिया है। मैं जानना चाहूंगा कि यह कहां से और कब अपलोड हुआ है और इसके पीछे कौन लोग हैं? मैं रात में दस बजे काम कर रहा था, तभी किसी का फोन आया कि ऐसा एक वीडियो नागपुर से लोड हुआ है। मैंने अगले दिन एफडब्लूआईसीई में शिकायत की। ‘मोहल्ला अस्सी’ का पूरा मामला उनके पास है। मैंने उनसे आग्रह किया कि इस गलत वीडियो को तुरंत रोका जाना चाहिए।
 ऐसी खबर है कि पहली बार रोक लगने के बाद यह फिर से अपलोड हुआ है? 
 दूसरी बार अपलोड होने से स्पष्ट है कि इसके पीछे कुछ लोग व्यवस्थित रूप से लगे हुए हैं। उन लोगों को सामने लाने की जरूरत है। 
 फुटेज से ऐसा लगता है कि फिल्म में केवल गालियां ही हैं। क्या फिल्म के बारे में कुछ बताएंगे? 
 इस अनधिकृत वीडियो फुटेज में कहीं भी फिल्म की कथा नहीं आती। क्यों ऐसा हुआ? ‘मोहल्ला अस्सी’ काशीनाथ सिंह के प्रसिद्ध उपन्यास ‘काशी का अस्सी’ के ‘पांडे कौन कुमति तोहे लागी’ चैप्टर पर आधारित है। हिंदी जगत में इस उपन्यात की चर्चा रही है। इस पर नाटक भी हो चुका है। फिल्म की कहानी वेदांत और संस्कृत के शिक्षक धर्मनाथ पांडे की कहानी है। यह बनारस और देश के बदलते परिवेश की कहानी है। संस्कृत और संस्कृति की चुनौतियों की कहानी है। इन चुनौतियों के बीच पांडे का आत्मसंघर्ष है। इस कहानी की पृष्ठभूमि में राम जन्मभूमि का आंदोलन है। फुटेज में इसकी कोई झलक नहीं है। यह सांस्कृतिक प्रदूषण और गंगा को लेकर सचेत पांडे के प्रयत्नों और संकट की कहानी है। उनके साथ घाट के दूसरे चरित्र भी आते हैं, जिनमें टूरिस्ट गाइड, नाई और बहुरुपिया भी हैं। धर्म और संस्कृति पर चलने के कारण पिछड़ रहे और ठगी से सफल हो रहे लोगों की भी कहानी है यह। मैंने फिल्म बनाई ही इसलिए थी कि वेदांत और संस्कृत दोनों का नाश हो रहा है। काशी तो इसमें रूपक है। 
वीडियो फुटेज को उतारने की कोशिश आप के या निर्माता की तरफ से नहीं हुई? 
मैंने इसकी शिकायत अपने संगठन में की थी। यह संगठन ‘मोहल्ला अस्सी’ का पूरा मसला देख रहा है। 2012 के बाद मैं इस फिल्म को पूरा करने के लिए निरंतर जूझ रहा हूं। निर्माता की तरफ से निष्क्रियता रही है। मुझे संबंधित व्यक्तियों की ओर से आवश्यक गंभीरता और सक्रियता नहीं दिख रही है। मैं जानना चाहता हूं कि यह फुटेज कहां से लीक हुई है?
 फिल्म की रिलीज की क्या संभावनाएं हैं? 
 फिल्म अभी पूरी ही नहीं हुई है। फिल्म मे सनी देओल की आधी डबिंग बाकी है। फिल्म रिलीज तो तब होगी, जब पूरी होगी। 
 विवाद क्या है? उत्तेजना क्यों है फिर?  
फुटेज में सुनाई पड़ रही गालियां और शिव के एक रूप से उत्तेजना है। फिल्म शिव जी के एक रूप की अभिव्यिक्ति है। मैं स्पेष्ट कर दूं कि वे महादेव नहीं हैं। फिल्म में एक बहुरूपिया शिव का वेष धारण कर पर्यटकों का मनोरंजन कर अपनी रोजी-रोटी चलाता है। धर्मनाथ पांडे उसका विरोध भी करते हैं। वे समझाते भी हैं कि कोई और रूप बना लो। शिव का रूप धारण करना छोड़ दो। फुटेज देख रहे लोगों की नाराजगी सही है। वे शिव को देख रहे हैं। सच यह है कि वह बहुरूपिया है। 
 इस वीडियो फुटेज से आप की छवि भी धूमिल हुई है? 
  मुझे अपनी छवि की ज्यादा चिंता नहीं है। जिस व्यक्ति ने भी यह किया है, मैं उसकी घोर निंदा करता हूं। मैं यही कहूंगा कि आप धैर्य रखें। इस प्रकार के दुष्प्रचार के प्रभाव में नहीं आएं। मैंने कभी सस्ती लोकप्रियता हासिल करने की कोशिश नहीं की है। इस फिल्म से जुड़े काशीनाथ सिंह और सनी देओल भी सस्ती लोकप्रियता में यकीन नहीं रखते। ‘मोहल्ला अस्सी’ वास्तव में देश से शिव और शिवत्व को विस्थापित करने के प्रयास पर प्रहार करती है। वह बनारस और देश कैसा होगा, जब शिव और शिवत्व नहीं होंगे? यह फिल्म संस्कृत और संस्कृति बचाए रखने के ऊपर है।

यह पहली बार जागरण्‍ा में प्रकाशित हुआ।

Wednesday, June 17, 2015

तोहफों की ये शुरूआत -प्रीतम


-अजय ब्रह्मात्‍मज
प्रीतम लौट आए हैं। कबीर खान की बजरंगी भाईजान के लिए तैयार किया उनका गीत सेल्‍फी ले ले पॉपुलर हो रहा है। इस गीत से अपनी वापसी दर्ज करने के साथ ही प्रीतम ने जाहिर कर दिया है कि वे फिर से सक्रिय हो चुके हैं। उनकी वापसी बजरंगी भाईजान से हो रही है। अपनी अनुपस्थिति के बारे में प्रीतम बताते हैं,’ लगातार काम करते-करते मैं थक चुका था। पिछले सालधूम पूरा करने के बाद ही मैंने मन बना लिया था कि अब ब्रेक लेना है। मई 2014 तक मैंने हाथ में लिया काम समेट लिया था। सबसे पहले बच्‍चों को लेकर लंदन गया। वहां डेढ़-दो महीने रहा। इरादा यही था कि कुछ भी कंपोज नहीं करना है। छह महीनों तक मैंने कोई काम नहीं किया। उसकी वजह यही है कि मैं बोर हो गया था। अपने काम में ही एनर्जी नहीं मिल रही था। इस बीच में कुछ म्‍यूजिकल शो जरूर किए मैंने। उसमें तो कुछ भी कंपोज नहीं करना पड़ता। पुराना गा दो और सुना दो।
वापसी की वजह बने कबीर खान और अनुराग बसु... दोनों की फिल्‍मों की शूट चल रही थी। प्रीतम को लगातार फोन जा रहे थे। आखिरकार वे लौटे। खुद कहते हैं प्रीतम,’ मैं कबीर खान की फैंटम कर रहा हूं। वे बजरंगी भाईजान में भी मेरा म्‍यूजिक चाहते थे। और अनुराग बसु भी जग्‍गा जासूस की शूटिंग की तैयारी कर चुके थे। दोनों की जिद के आगे मुझे झुकना पड़ा। अपनी छुट्टी के दरम्‍यान मैंने कई फिल्‍में छोड़ीं। कह सकते हैं कि एक साल तक कोई फिल्‍म साइन नहीं की। प्रीतम इसे किसी प्रकार की हिम्‍मत आदि से नहीं जोड़ते। वे सहज भाव से कहते हैं,’ जब काम में मन नहीं लगता तो आप क्रिएट भी नहीं कर सकते। सभी जानते हैं कि वर्कोहलिक हूं। ऐसे में अगर मेरा मन नहीं लग रहा है तो जरूर कोई प्राब्‍लम है। सच्‍ची बात बताऊं। छुट्टी लेने पर कुछ महीने तो मस्‍ती में बीते। बाद में ऐसा लगने लगा कि छुट्टी में भी बोरडम है। डिप्रेशन होने लगा। तभी कबीर का फोन आ गया। कबीर से मैंने बजरंगी भाईजान की कहानी सुनी तो दंग रह गया। व‍ह स्क्रिप्‍ट बहुत अच्‍छी लगी। गाने के स्‍कोप निकले। यही कहूंगा कि मैंने किरदार के हिसाब से गाने बनाए हैं।
प्रीतम अपनी हर फिल्‍म की स्क्रिप्‍ट सुनना या पढ़ना चाहते हैं। वे कहानी और किरदारों की पृष्‍ठभूमि के हिसाब से ही संगीत तैयार करते हैं। वे इसकी जरूरत रेखांकित करते हैं,’स्क्रिप्‍ट पढ़ने के बाद ही गानों का सिचुएशन और बैकग्राएंड समझ में आता है। डायरेक्‍टर से बातचीत होने पर पता चलता है कि वे क्‍या और कैसा संगीत चाहते हैं ? मेरे पास सिचुएशन का स्‍टाक संगीत नहीं रहता। मैंने कभी ऐसा नहीं किया। हमेशा फ्रेश संगीत ही तैयार करता हूं। अब बजरंगी भाईजान की ही बात करें तो इस फिल्‍म का मुख्‍य किरदार शुद्ध हिंदी बोलता है। हमें उसके अनुरूप ही गीत लेने पड़े।
प्रीतम अभी जग्‍गा जासूस का म्‍यूजिक भी तैयार कर रहे हैं। सभी जानते हैं कि जग्‍गा जासूस म्‍यूजिकल फिल्‍म है। इसमें जग्‍गा लय में बोलता है। हालांकि गानों की संख्‍या पहले से कम हो गई है,लेकिन थीम म्‍यूजिकल ही है। प्रीतम बताते हैं,’ अनुराग बसु अजीब डायरेक्‍टर है। वह तो आखिरी समय में भी कोई नई मांग कर देता है। मैं भी शूट होने के पहले तक म्‍यूजिक बदलता रहता हूं। फिल्‍म बनने या छपने के पहले कुछ भी लॉक नहीं किया जा सकता। अनुराग के लिए मैंने लाइफ-इन ए मैट्रो किया था। उससे हम दोनों का इमोशनल रिश्‍ता है। उस फिल्‍म में पहली बार रॉक म्‍यूजिक का भरपूर इस्‍तेमाल हुआ था। रॉक ऑन तो उसके बाद आया था।

Monday, June 15, 2015

दिमाग का एक्‍शन है ‘दृश्‍यम’ -अजय देवगन

दिमाग का एक्‍शन है दृश्‍यम में-अजय देवगन
-अजय ब्रह्मात्‍मज
अजय देवगन ने हालिया इमेज से अलग जाकर दृश्‍यम की है। इस फिल्‍म में वे सामान्‍य नागरिक विजय सालस्‍कर हैं। विजय अपने परिवार को बचाने के लिए सारी हदें पार करता है। पिछले दिनों मुंबई के महबूब स्‍टूडियो में उनसे मुलाकात हुई। वहां वे एक बनियान कंपनी के लिए फोटो शूट कर रहे थे।

-आप भी विज्ञापनों और एंडोर्समेंट में दिखने लगे हैं ?
0 मैं ज्‍यादा विज्ञापन नहीं करता। इस कंपनी के प्रोडक्‍ट पर भरोसा हुआ तो हां कह दिया। यह मेरी पर्सनैलिटी के अनुकूल है।

- ‘दृश्‍यम के लिए हां करने की वजह क्‍या रही ? ‘सिंघम से आप की एक्‍शन हीरो की इमेज मजबूत हो गई है। क्‍या यह उस इमेज से निकलने की कोशिश है ?
0 हम हमेशा एक जैसी फिल्‍में नहीं कर सकते। दर्शकों के पहले क्रिटिक उंगली उठाने लगते हैं। यह फिल्‍म मुझे अच्‍छी लगी। मैं ओरिजिनल फिल्‍म को क्रेडिट देना चाहूंगा। कमल हासन भी इसकी तमिल रीमेक बना रहे हैं। मैंने उनसे बात की थी। पूछा था कि उन्‍होंने क्‍या तब्‍दीली की है ? उन्‍होंने किसी भी चेंज से मना किया। उनका कहना था कि हाथ न लगाओ। ओरिजिनल जैसा ही बनाओ। हमारे निर्देशक निशिकांत कामथ का भी कहना है कि अगर ओरिजिनल का 80 प्रतिशत भी मैंने हासिल कर लिया तो काफी होगा।

-क्‍या खास है फिल्‍म में कि सभी भाषाओं में इसकी रीमेक बन रही है ?
0 कनेक्टिविटी...यह फिल्‍म दर्शकों को जोड़ लेती है। कोई हाई फंडा नहीं है। चौथी फेल केबल ऑपरेटर है विजय। अपनी फैमिली को प्रोटेक्‍ट करने के लिए वह किस हद तक जा सकता है ? हमारे परिवार पर भी आफत आएगी तो हम सब ऐसा ही कुछ करेंगे। इस बार फिल्‍म का नायक अपने हाथों से नही लड़ेगा। वह अपने दिमाग से लड़ेगा। व‍ह पूरे सिटम को अपनी चालाकी से बेवकूफ बना देता है।

-नाम बदलने का खयाल नहीं आया ?
0 हर रीमेक का यही नाम रखा गया है। हमें भी लगा कि दृश्‍यम तो संस्‍कृत का शब्‍द है। इसके साथ हम ने टैग लाइन लगा दी है विजुअल्‍स कैन बी डिसेप्टिव। हीरो जो दिखा और बता रहा है,वह किसी की समझ में नहीं आता। हम ने सिंघम का भी नाम नहीं बदला था।

-कई बार आप की पसंद और हां भी गलत हो जाती है। एक्‍शन जैक्‍सन के हश्र के बारे में क्‍या कहेंगे ?
0 हमलोग इमोशन से काम करते हैं। उम्र और अनुभव के बावजूद कई बार ऐसा हो जाता है। उसके लिए किसी को दोष नहीं दिया जा सकता। आप कह सकते हें कि मुझ से गलती हो गई।

-अजय देवगन अभी किस तरह से फिल्‍में चुनते हैं? क्‍या काम करते रहने के लिए कोई न कोई फिल्‍म करनी है या चुनाव के पीछे कोई रणनीति है ?
0 दुकान नहीं चलानी है। वह करना होता तो साल में चार फिल्‍में कर रहा होता। अभी अधिकतम दो फिल्‍में करता हूं। अभी दर्शकों को एंटरटेनमेंट तो चाहिए ही। मैं हमेशा कहता हूं कि क्‍लास फिल्‍मों का बिजनेस एक हद तक जाकर रुक जाता है। अगर मास फिल्‍म है तो आप बिजनेस का अनुमान नहीं लगा सकते। अभी तनु वेड्स मनु रिटर्न्‍स का बिजनेस देख लें। एंटरटेनमेंट के दायरे में रहते हुए आप एक क्‍लास फिल्‍म लेकर कैसे आ सकते हैं ? यह बड़ी चुनौती है। मेरी कोशिश है कि मास के साथ क्‍लास को भी टच करूं,लेकिन एंटरटेनमेंट नहीं छोड़ूंगा।दृश्‍यम में गाने नहीं हैं। हमलोग ने उसे रियल तरीके से पेश किया है। अभी मैं असुरक्षित नहीं हूं। अच्‍छी फिल्‍मों की तलाश में हूं।

- इस तलाश में ही दृश्‍यम आई है क्‍या ?
0 दर्शक बताएंगे। मैंने हर तरह की फिल्‍में की हैं। अभी पॉपुलर जोनर की फिल्‍में आईं तो कुछ लोगों ने पूछना शुरू किया कि आप वैसी(आर्ट) फिल्‍में क्‍यों नहीं करते? दर्शकों ने मुझे दोनों रुपों में देखा है। मैंने इस बार वैसी फिल्‍म की है। दर्शकों को भी तैयार होना होगा कि वे अलग अजय देवगन को देखने जा रहे हैं। उनका समर्थन मिलेगा तभी हम ऐसी फिल्‍मों की कोशिश जारी रख सकते हैं। इसके बाद शिवाय कर रहा हूं। वह मेरे डायरेक्‍शन में है। उसमें कोई आयटम सौंग नहीं रहेगा। इमोशन रहेगा और एक ट्रैक एक्‍शन का भी रहेगा।

- ‘शिवाय की अग्रिम जानकारी दें।
0 अभी जल्‍दी होगी। उस फिल्‍म की अधिकांश शूटिंग विदेश में होगी। मुझे ठंडे इलाके में शूटिंग करनी है। वह डिफिकल्‍ट फिल्‍म है। मुझे माइनस 30 डिग्री में शूटिंग करनी है। वह मायथेलॉजिकल फिल्‍म नहीं है। शिवाय आज के एक कैरेक्‍टर का नाम है। मुझे लगता है कि भगवानों में केवल शिव आम आदमी की तरह हैं। वे हमारी तरह खुश और नाराज होते हैं। किसी ने कह दिया कि गलती की है तो पछताएंगे भी। उन्‍हें भोला भी कहते हैं। कोई भी बेवकूफ बना देता है। उनमें नार्मल ह्यूमन कैरेक्‍अर की सारी खूबियां और कमियां हैं। उनकी सारी विशेषताओं को लेकर मैंने यह चरित्र गढ़ा है। फिल्‍म में इमोशन,कहानी और कनेक्‍ट है। मैं कोई मास्‍टरपीस नहीं बना रहा हूं। अभी यही कहूंगा कि इस स्‍केल की फिल्‍म अब तक नहीं बनी है। जबरदस्‍त एक्‍शन रहेगा। अभी सन ऑफ सरदार की घोषणा की है।

-‍हिंदी सिनेमा में कथ्‍य का विस्‍तार हो रहा है। आज का सिनेमा बदल गया है।
0 लोग जिसे आज का सिनेमा कह रहे हैं,वह वास्‍तव में कल का ही सिनेमा है। इन  वह हमेशा से था। फिल्‍मों को हृषि दा से जोड़ा जा रहा है। हां,इधर दर्शकों का झुकाव बढ़ गया है। बिल्‍कुल बदलाव आया है। मुझे तो लगता है कि जख्‍म और रेनकोट आज रिलीज होतीं तो दस गुना ज्‍यादा बिजनेस करतीं। राजू चाचा भी चलती। 

-इस साल के आखिर में आप 25 साल पूरे करेंगे। कितने संतुष्‍ट हैं ?

0 मेरी जर्नी माइंड ब्‍लोइंग रही है। मैंने हमेशा अपने टर्म और कंडीशन पर काम किया। किसी के सामने नहीं झुका। कभी कोई ऐसा काम नहीं किया,जिसके लिए शर्मिंदा होने पड़े। अपने बच्‍चों और साथ के लोगों को भी यही कहता हूं कि जो भी करो अपने टर्म पर करो। इंडस्‍ट्री या बाहर का कोई आदमी आकर यह नहीं कह सकता किम मैंने किसी के साथ चिंटिंग या फ्रॉड किया है। बाकी रहीं फिल्‍में तो उन्‍हें दर्शकों और क्रिटिक का पूरा समर्थन मिला है।

Sunday, June 14, 2015

मामूली लोग होते हैं मेरे किरदार -सुभाष कपूर


-अजय ब्रह्मात्‍मज
मैंने फंस गए रे ओबामा खत्‍म करने के समय ही गुड्डू रंगीला की स्क्रिप्‍ट लिखनी शुरू कर दी थी। बात ढंग से आगे नहीं बढ़ रही थी तो मैंने उसे छोड़ दिया और जॉली एलएलबी पर काम शुरू कर दिया था। उस फिल्‍म को पूरी करने के दौरान ही मुझे गुड्डू रंगीला का वैचारिक धरातल मिल गया। उसके बाद तो उसे पूरा करने में देर नहीं लगी। मैं स्क्रिप्‍ट जल्‍दी लिखता हूं। पत्रकारिता की मेरी अच्‍छी ट्रेनिंग रही है। समय पर स्‍टोरी हो जाती है। ग़ुड्डू रंगीला के निर्माण में अमित साध के एक्‍सीडेंट की वजह से थोड़ी अड़चन आई,लेकिन फिल्‍म अब पूरी हो गई है। मुझे खुशी है कि मैं अपने काम से संतुष्‍ट हूं।
जरूरी है वैचारिक धरातल
मेरे लिए फिल्‍म का वैचारिक धरातल होना जरूरी है। आप मेरी फिल्‍मों में देखेंगे कि कोई न कोई विचार जरूर रहता है। मैं किसी घटना या समाचार से प्रेरित होता हूं। उसके बाद ही मेरे किरदार आते हैं। गुड्डू रंगीला की शुरूआत के समय मेरे विचार स्‍पष्‍ट नहीं थे। यह तो तय था कि हरियाणा की पृष्‍ठभूमि रहेगी और उसमें खाप पंचायत की भी उल्‍लेख रहेगा। अटकने के बाद मैंने आधी-अधूरी स्क्रिप्‍ट छोड़ दी थी। जॉली एलएलबी पूरी होने के बाद मैंने स्क्रिप्‍ट फिर से पढ़ी। मुझे ऐसा लगा कि नई घटना को इसके साथ जोड़ दें तो स्क्रिप्‍ट रोचक हो जाएगी। आप को याद होगा कि हरियाणा में मनोज-बबली का मामला बहुत मशहूर हुआ था। दोनों एक ही गोत्र के थे और शादी करना वाहते थे। खाप पंचायत ने उन पर रोक लगाने के साथ आदेश नहीं मानने पर बुरे परिणाम की चेतावनी दी थी। तब मामला सरकार और संसद तक पहुंचा था। सरकारी तंत्र से उनकी सुरक्षा की घोषणा भी की गई थी,लेकिन वे बच नहीं सके थे। उस घटना ने मुझे झकझोर दिया। मैंने वहीं से प्रेरणा ली। मेरी फिल्‍म में वह घटना नहीं है,लेकिन खाप पंचायत और उनके आदेशों का जिक्र है। संक्षेप में मेरी फिल्‍म में खाप भी है और आप(दर्शक) भी हैं।

आसपास मिलती हैं कहानिय़ां
मैंने हमेशा अपनी जिंदगी के अनुभवों से ही कहानियां ली हैं। मैं प्रोजेक्‍ट नहीं बना सकता,जिसमें स्‍टार हों और सारे मसाले हों। मैंने जो देख,सुना और जिया है,उन्‍हें ही पेश करता हूं। मुझे अपने आसपास की विसंगतियों और विरोधाभासों में कहानियां मिलती हैं। मेरे किरदार मामूली लोग होते हैं। वे निजी स्‍तर पर माहौल से जूझ रहे होते हें। वे हंसाने या रुलाने के नहीं गढ़े जाते। उनकी स्थितियां ऐसी होती हैं कि दर्शक हंसते और भावुक होते हैं। गुड्डू और रंगीला ऐसे ही दो किरदार हैं। वे एक बैंड चलाते हैं और स्‍थानीय मौकों पर गाने-वाने गाते हैं। रंगीता नाम का ही रंगीला है। वह गंभीर स्‍वभाव का है। गुड्डू मस्‍तीखोर और आशिकमिजाज है। वह सभी का खुश करना और अपना काम निकालना जानता है। संयोग से दोनों ऐसी स्थितियों में फंसते हैं कि उनकी मुसीबत बढ़ जाती है।

कलाकारी दिखेगी फिल्म में
मेरी सभी फिल्‍मों में कलाकारों के अभिनय की तारीफ होती है। इस बार भी दर्शक संतुष्‍ट होंगे। अरशद वारसी उम्‍दा कलाकार हैं। वे विरोधाभासी किरदारों को बहुत अच्‍छी तरह निभाते हैं। अमित साध ने जबरदस्‍त काम किया है। उन्‍हें देख कर आप दंग रह जाएंगे। रोनित राय का किरदार और अभिनय दोनों ही प्रभावशाली है। उन्‍हें दर्शक याद रखेंगे। मेरी फिल्‍मों में महिला करदारों के लिए अधिक स्‍पेस नहीं रहता था। इस बार ऐसी शिकायत नहीं होगी। अदिति राय हैदरी गुड्डू रंगीला की प्रमुख किरदार होने के साथ सूत्रधार भी हैं।

फेसबुक पर माता का बुलावा
कल रात माता का मुझे ईमेल आया है,माता ने मुझ को फेसबुक पर बुलाया है गीत की प्रेरणा मुझे अपने बचपन से मिली। मेरी मां माता की भक्‍त हैं। घर में तब कैसेट बजा करते थे। नरेन्‍द्र चंचल जी के गाए माता के गीत सुबह से बजने लगते थे। तभी एक गीत सुना था,जिसमें माता जी का टेलीफोन आता है। मुझे लगा कि अगर तब माता के टेलीफोन की कल्‍पना की जा सकती है तो अभी फेसबुक और ईमेल के सहारे उनकी बात की जानी चाहिए। मेरे किरदार गुड्डू और रंगीला जिस तबके के हैं,वे ऐसे ही गीत गा सकते हैं। प्रोमो में इस गीत की पंक्तियों का लोगों ने काफी पसंद किया है। 

रहा हूं जल्दबाजी में
भविष्‍य की फिल्‍मों के बारे में अभी ठोस ढंग से कुछ नहीं कह सकता। दोतीन स्क्रिप्‍ट तैयार हैं। जॉली एलएलबी के सीक्‍वल की बात है। पहले ऐसा कोई इरादा नहीं था। गुड्डू रंगीला की शूटिंग के दरम्‍यान अरशद वारसी से मिलने आए प्रशंसकों में से अधिकांश ने कहा कि सीक्‍वल आना चाहिए। उसके बाद ही मैंने विचार किया और सीक्‍वल की प्‍लानिंग हो गई। कुछ लोगों को लगता है कि मैं लोकप्रिय सितारों के बगैर ही फिल्‍में बनाने में यकीन रखता हूं। अभी तक मैं जल्‍दबाजी में रहा हूं। ऐसी स्थिमि में सितारों के लिए इंतजार नहीं किया जा सकता। अभी सोच रहा हूं कि उन्‍हें स्क्रिप्‍ट सुना कर फायनल कर लूं। जब उनकी तारीख मिलेगी,तब मैं तैयार रहूंगा। अभी कुछ और फिल्‍में कर लूंगा। मैं जिन सितारों के साथ अभी तक काम करता रहा हूं,उनसे पूरा समर्थन मिलता है। वे मेरी स्क्रिप्‍ट के प्रति समर्पित रहते हैं। और मैं अपनी बात भी कह लेता हूं।

मैं यह जोर देकर कहना चाहता हूं कि मैं कमर्शियल ढांचे में सुकून महसूस करता हूं। मेरी प्रिय फिल्‍मों में शोले और दो बीधा जमीन जैसी फिल्‍में हैं। मैं कमर्शियल मसाले या फार्मूले में यकीन नहीं रखता,लेकिन मानता हूं कि हिंदी कमर्शियल सिनेमा की कुछ विशेषताएं हैं। उन्‍होंने दशकों से देश के दर्शकों का मनोरंजन किया है। ग्‍लोबल होने के चक्‍कर में हम उन्‍हें खारिज न करें।