Saturday, July 19, 2008

फ़िल्म समीक्षा:किस्मत कनेक्शन

लव स्टोरी में सोशल कंसर्न
-अजय ब्रह्मात्मज
हम आप खुश हो सकते हैं कि जाने तू या जाने ना जैसी मनोरंजक फिल्म की रिलीज के एक पखवारे के भीतर ही एक और मनोरंजक फिल्म किस्मत कनेक्शन आई है। हालांकि यह भी लव स्टोरी है, लेकिन इसमें अजीज मिर्जा का टच है। किस्मत कनेक्शन टोरंटो के बैकड्राप में बनी भारतीय इमोशन की प्रेम कहानी है, जिसमें कुछ घटनाएं और स्थितियां नई हैं।
अजीज मिर्जा की खासियत है कि उनकी फिल्में हकीकत के करीब लगती हैं। उनकी फिल्मों में यथार्थ का पुट रहता है। समानता, बराबरी, मानव अधिकार और वंचितों के अधिकार की बातें रहती हैं। लेकिन, यह सब कहानी का मुख्य कंसर्न नहीं होता। इसी फिल्म को लें। प्रतिभाशाली छात्र राज मल्होत्रा पढ़ाई पूरी करने के बाद बेरोजगार है। भविष्य बताने वाली हसीना बानो जान उसे समझाती है कि वह अपना लकी चार्म खोजे और उसे अपने साथ रखे तो उसके सारे काम हो जाएंगे।
राज मल्होत्रा की प्रिया से मीठी भिड़ंत होती रहती है। चंद भिड़ंतों के बाद राज को एहसास होता है कि प्रिया उसकी लकी चार्म है। दोनों में दोस्ती होती है और फिर दोस्ती प्यार में बदल जाती है..। जरा ठहरें, इतना सिंपल अंत नहीं है। इस बीच मनमुटाव, नोकझोंक और छोटे-मोटे हादसे भी होते हैं।
राज और प्रिया की प्रेमकहानी काल्पनिक नहीं है। वे इसी धरती पर रहते हैं। चूंकि इस फिल्म में वे टोरंटो में रहते हैं, इसलिए वहां की सामाजिक मुश्किलों से दो-चार होते हैं। अजीज मिर्जा ने राजू बन गया जेंटलमैन की मूल कहानी में कुछ घटनाएं जोड़-घटा कर किस्मत कनेक्शन बनाई है। कामयाब होने की राज की जिद और कम्युनिटी सेंटर को बचाने की प्रिया की कोशिश में हम रियल किस्म के किरदारों को देख पाते हैं।
फिल्म के सहज दृश्य और संवाद याद रह जाते हैं। शाहिद कपूर और विद्या बालन की जोड़ी बेमेल नहीं लगती। प्रिया थोड़ी मैच्योर और समझदार लड़की है, इसलिए विद्या उस रोल के लिए उपयुक्त हैं। शाहिद इस फिल्म में एक कदम आगे आए हैं। वे समर्थ अभिनेता के तौर पर उभर रहे हैं। फिल्म का गीत-संगीत विषय के अनुकूल है। उन्हें आयटम सौंग की तरह फिल्म की कहानी में चिप्पियों की तरह नहीं जोड़ा गया है।

Friday, July 18, 2008

फ़िल्म समीक्षा:कांट्रेक्ट

फिर असफल रहे रामू
बारीक स्तर पर कांट्रैक्ट के दृश्यों के बीच उभरते भाव और निर्देशक की सोच को जोड़ने की कोशिश करें तो यह फिल्म कथित स्टेट टेरेरिज्म का चित्रण करती है। राम गोपाल वर्मा ने विषय तो रखा है अंडरव‌र्ल्ड और आतंकवाद के बीच गठबंधन का, लेकिन उनकी यह फिल्म एक स्तर पर राजसत्ता की जवाबी रणनीति का संकेत देती है। आतंकवादी संगठन जिस तरह किसी शोषित या पीडि़त को गुमराह कर आतंकी बना देते हैं, लगभग उसी तरह पुलिस और प्रशासन भी अपने गुर्गे तैयार करता है। कांट्रैक्ट देख कर तो ऐसा ही लगता है।
रामू अपनी फिल्मों में मुख्य रूप से चरित्रों से खेलते हैं। अगर रंगीला और सत्या की तरह चरित्र सटीक हो जाएं तो फिल्में सफल हो जाती हैं। चरित्रों के परिवेश, पृष्ठभूमि और परिप्रेक्ष्य में वे गहरे नहीं उतरते। देश की सामाजिक स्थितियों की समझदारी नहीं होने के कारण यह उनकी सीमा बन गई है। कांट्रैक्ट में यह सीमा साफ नजर आती है।
सेना के रिटायर अधिकारी अमन (अद्विक महाजन) को पुलिस अधिकारी अहमद हुसैन आतंकवादियों से निबटने के लिए अंडरव‌र्ल्ड में घुसने के लिए प्रेरित करता है। पहली मुलाकात में ऐसे मिशन में शामिल होने से साफ इंकार कर देने वाला अमन एक आतंकवादी हमले में बीवी और बेटी की मौत के बाद स्वयं ही मिशन में शामिल होता है। हमें लगता है कि उसके इस मिशन से अंडरव‌र्ल्ड और टेरेरिज्म का रिश्ता बेनकाब होगा लेकिन ऐसा कुछ नहीं होता। निर्देशक राम गोपाल वर्मा और उनके लेखक प्रशांत पांडे यहां विफल रहे। अमन के अमान बनने और सुलतान को खत्म करने की पटकथा में ड्रामा और एक्शन की कमी है।
कांट्रैक्ट में रामू की पिछली फिल्मों के दृश्यों, घटनाओं, स्थितियों, पात्रों और संवादों तक का दोहराव है। सरकार राज में एक संवाद था - फैसले गलत नहीं होते, नतीजे गलत होते हैं। वह इस फिल्म में भी सुनाई पड़ता है। हां, इस फिल्म में सुल्तान की भूमिका में जाकिर हुसैन किरदार को अच्छी तरह निभा गए हैं। नए अभिनेता अद्विक में भी आत्मविश्वास है। साक्षी गुलाटी कुछ दृश्यों में सिर्फ सुंदर दिखती हैं।

मुख्य कलाकार : अद्विक महाजन, साक्षी गुलाटी, जाकिर हुसैन, प्रशांत पुरंदरे आदि।
निर्देशक : राम गोपाल वर्मा
तकनीकी टीम : निर्माता : प्रवीण निश्चल, अजय बिजली, संजीव बिजली, संगीत : अमर मोहिले, बापी-टुटुल, साना, लेखक : प्रशांत पांडे, गीत : प्रशांत पांडे, महबूब

Thursday, July 17, 2008

गुरुदत्त पर एक किताब


-अजय ब्रह्मात्मज
नौ जुलाई को गुरुदत्त का जन्मदिन था। उनकी आकस्मिक मौत हो गई थी 1964 में। हिंदी फिल्मों के इतिहास में गुरुदत्त का नाम बड़े आदर और सम्मान के साथ इसलिए भी लिया जाता है, क्योंकि उनकी फिल्में प्यासा और कागज के फूल की गणना क्लासिक फिल्मों में होती है। वैसे, उनकी अन्य फिल्मों का भी अपना महत्व है। युवा फिल्मकार श्रीराम राघवन उनकी थ्रिलर फिल्मों से बहुत प्रभावित हैं, तो संजय लीला भंसाली को गुरुदत्त का अवसाद पसंद है। माना जाता है कि गानों के पिक्चराइजेशन में गुरुदत्त सिद्धहस्त थे। इतनी सारी खूबियों के धनी गुरुदत्त निजी जिंदगी में एकाकी और दुखी रहे। दरअसल, पत्नी गीता दत्त से उनकी नहीं निभी। वहीदा रहमान के प्रति अपने प्यार को वे कोई परिणति नहीं दे सके। उनके जीवन के इन पहलुओं पर कम लिखा गया है। कायदे से उनकी फिल्मों की विशेषताओं पर भी पर्याप्त चर्चा हिंदी फिल्मों के दर्शकों के बीच नहीं मिलती है। हमने मान लिया है कि वे महान फिल्मकार थे। हमने उनकी मूर्ति बना दी है और लेखों, बयानों और टिप्पणियों में उनका नामोल्लेख कर ही इस फिल्मकार को दर्शकों से जोड़ने की कोशिश की इतिश्री समझ लेते हैं।
इस बार गुरुदत्त के जन्मदिन के अवसर पर पेंग्विन ने उनके ऊपर एक किताब प्रकाशित की है, जिसे लिखा तो सत्या सरन ने है, लेकिन यह मुख्य रूप से अबरार अल्वी के संस्मरणों की एक बानगी है। अबरार अल्वी दस सालों तक गुरुदत्त के सहायक, लेखक और सलाहकार रहे। किताब का नाम है टेन इयर्स विद गुरुदत्त : अबरार अल्वीज जर्नी। सत्या सरन ने अपनी भूमिका में बताया है कि एक इंटरव्यू में अबरार अल्वी ने चुनौती दी थी कि क्या कोई उनकी बातों को लिखने या छापने के लिए तैयार है, क्योंकि उनके पास गुरुदत्त के बारे में बताने के लिए बहुत कुछ है। सत्या सरन ने उनकी यह चुनौती स्वीकार की और फिर इस किताब ने आकार लिया। पूरी किताब पढ़ने के बाद चंद घटनाओं और प्रसंगों की अंदरूनी व्याख्या के अलावा, ऐसी कोई जानकारी नहीं मिलती, जो गुरुदत्त के सृजनात्मक व्यक्तित्व पर प्रकाश डाल सके। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि अपने संस्मरणों के जरिए अबरार अल्वी ने ज्यादातर खुद के बारे में ही बताया है। वे यह भी संकेत देते हैं कि आर पार से लेकर बहारें फिर भी आएंगी तक के लेखन में वे सहयोग देते रहे, लेकिन उन्हें समुचित क्रेडिट नहीं मिला। वे इस बात पर नाराज हैं कि उन्हें साहब बीबी और गुलाम का निर्देशक भी नहीं माना जाता। आम धारणा है कि गुरुदत्त ने इस फिल्म में अपना नाम नहीं दिया था। एक छोटा-सा सवाल उठता है कि अबरार अल्वी अगर इतने प्रतिभाशाली और समझदार लेखक हैं, तो गुरुदत्त के निधन के बाद उनकी प्रतिभा की सरिता कैसे सूख गई? वे अब तक कोई उल्लेखनीय फिल्म क्यों नहीं कर सके? स्थापित प्रतिभाओं और प्रतिमाओं के सम्मान को ग्रहण लगाने और क्षतिग्रस्त करने का काम उनके सहयोगी करते रहते हैं या फिर यह कोशिश रहती है कि उक्त सम्मान का कुछ अंश उन्हें भी मिल जाए! अबरार अल्वी इस कोशिश में असफल रहते हैं। वे अपने सहयोग और योगदान के जिन प्रसंगों का उल्लेख करते हैं, वे अमूमन हर फिल्म के कुछ दृश्य, संवाद या कुछ और प्रसंग हैं। यानी उनसे पूरी फिल्म नहीं बनती! गुरुदत्त के निधन केचौवालीस साल बाद क्रेडिट न मिलने का जिक्र कर मालूम नहीं अबरार क्या साबित करना चाहते हैं?
किताब को पढ़ते समय उम्मीद थी कि गुरुदत्त, गीता दत्त और वहीदा रहमान के रिश्तों के संदर्भ में कोई नई जानकारी मिलेगी, गुरुदत्त की मानसिक स्थिति और द्वंद्व को हम उनके सहयोगी के संस्मरणों के जरिए समझ सकेंगे, किंतु अफसोस की बात यह है कि अबरार अल्वी न तो गुरुदत्त के अवसाद और भावनात्मक संघर्ष को उजागर करते हैं और न घटनाओं या स्थितियों का विस्तृत ब्यौरा ही देते हैं! उनके संस्मरण सपाट हैं, जिनमें आत्मश्लाघा के अहंकारी अंश हैं। हो सकता है कि सत्या सरन संस्मरणों को संकलित और संगठित नहीं कर सकी हों, लेकिन उन्होंने किताब की एकरेखीय और क्रमिक रूपरेखा उनके संस्मरणों के आधार पर ही तय की होगी। किताब से गुरुदत्त के जीवन के दस महत्वपूर्ण सालों की ऐसी झलक नहीं मिलती है, जो फिल्मकार या व्यक्ति गुरुदत्त से जुड़े रहस्य को कम कर सके!

बॉक्स ऑफिस:२५.०७.२००८

बाक्स आफिस पर थोड़ी हलचल दिखी
पिछले हफ्ते रिलीज हुई महबूबा और खेला को दर्शक नहीं मिले। महबूबा आठ साल बासी फिल्म थी। इस फिल्म के हीरो संजय दत्त और अजय देवगन का लुक भी बदल चुका है। मनीषा कोइराला तो अब पेरिस में घर बसाने का सोच रही हैं। पुराने लुक के स्टार आज के दर्शकों को बिल्कुल पसंद नहीं आए। अफजल खान की महबूबा दर्शकों को नहीं रिझा सकी।
रितुपर्णो घोष की बांग्ला फिल्म खेला हिंदी में डब की गई थी। स्त्री-पुरुष संबंध की ऐसी संवदेनशील फिल्मों के सीमित दर्शक होते हैं। खेला से उम्मीद भी नहीं थी कि उसके लिए दर्शकों की भीड़ उमड़ेगी।
पहले की फिल्मों में लव स्टोरी 2050 के दर्शक नहीं बढ़े। फिल्म के प्रति समीक्षकों और आम दर्शकों की प्रतिक्रिया लगभग एक सी होने के कारण इस फिल्म का आरंभिक उफान पहले ही हफ्ते में उतर गया। हैरी बावेजा इस महत्वाकांक्षी फिल्म में असफल रहे। दूसरी तरफ जाने तू या जाने ना तेजी से बड़ी हिट होने की तरफ बढ़ रही है। माना जा रहा है कि वह इस साल की अभी तक सबसे बड़ी हिट हो जाएगी। महानगरों, प्रादेशिक राजधनियों, शहरों और छोटे शहरों तक में इस फिल्म को दर्शक मिल रहे हैं। लंबे समय बाद बाक्स आफिस पर थोड़ी हलचल दिखाई पड़ रही है और कुछ सिनेमाघरों से टिकटों के ब्लैक में बिकने की खबरें आ रही है। आमिर खान इस फिल्म में एक नया गाना जोड़ने की सोच रहे हैं। उन्होंने इस संबंध में दर्शकों की राय मांगी है।

Wednesday, July 16, 2008

५२ प्रतिशत ने 'कहानी हमारे महाभारत की' को बहुत बुरा माना

अभी पिछले दिनों एकता कपूर के महाभारत का प्रसारण आरम्भ हुआ है.फिलहाल इस पर कोई टिप्पणी नहीं करते हुए चवन्नी उस सर्वेक्षण के नतीजे यहाँ दे रहा है,जो इसी पृष्ठ पर देखे जा सकते हैं। चवन्नी ने पाँच विकल्प दिए थे। बहुत अच्छा है,अच्छा है ,बुरा है ,बहुत बुरा है और ठीक है। आश्चर्य है की किसी ने भी इसे अच्छ है नही माना। बहुत अच्छा मानने वाले २६ पतिशत रहे तो बहुत बुरा मानने वालों का प्रतशत उनसे दोगुना ५२ प्रतिशत रहा। ठीक है और बुरा है मानने वालों का प्रतिशत बराबर रहा.दोनों ही विकल्पों में १०-१० प्रतिशत मत पड़े।
अब आप की बारी है.आप बताएं कि यह धारावाहिक आप को कैसा लगा?

Tuesday, July 15, 2008

कुछ तस्वीरें बहामास से


कुछ तस्वीरें बहामास से ...
पिछले दिनों संजय दत्त और अक्षय कुमार वहां एंथानी डिसूजा की फिल्म ब्लू की शूटिंग कर रहे थे.बहामास क्यूबा और अमेरिका के बीच द्वीपों का देश है.कहते हैं यहां सात हजार द्वीप हैं.ब्लू की शूटिंग बहामास के लिए बड़ी घटना रही.वहां के फिल्म कमिश्नर भी हमारी हिंदी फिल्मों के स्टारों से मिलने आए.आप स्वयं वहां की खूबसूरती देखें.

Saturday, July 12, 2008

फ़िल्म समीक्षा:खेला

तनाव का पाजिटिव अंत
-अजय ब्रह्मात्मज
रितुपर्णो घोष की खेला संवेदना और विषय के आधार पर हिंदी साहित्य में नई कहानी के दौर की याद दिलाती है। स्त्री-पुरुष संबंधों में निहित द्वंद्व और पार्थक्य को देश के साहित्यकारों और फिल्मकारों ने अलग-अलग नजरिए से चित्रित किया है। रितुपर्णो घोष स्त्री-पुरुष संबंध के तनाव को इस फिल्म में नया अंत देते हैं।
खेला राजा और शीला की कहानी है। राजा फिल्ममेकर है। वह अपनी फिल्म के लिए किसी प्रकार का समझौता नहीं करना चाहता। राजा फिल्म बनाने के सपने में इस कदर लिप्त और व्यस्त रहता है कि वह शीला के लिए पर्याप्त समय नहीं निकाल पाता। शीला की सोच गृहिणी की है। वह राजा को गृहस्थी की चिंताओं में भी देखना चाहती है। स्थिति यह आती है कि दोनों अलग हो जाते हैं। राजा अपनी फिल्म में डूब जाता है। उधर शीला अपने एकाकीपन से त्रस्त होकर राजा के पास अलगाव के कागजात भिजवा देती है। रितुपर्णो घोष ने ऐसे विषयों पर 15-20 साल पहले बन रही फिल्मों की तरह कथित नारीवाद का नारा नहीं लगाया है और न पुरुष को उसके सपनों के लिए दुत्कारा है। फिल्म के अंत में राजा और शीला एक साथ रहने का फैसला करते हैं और इस तरह उनके बीच मौजूद तनाव का पाजिटिव अंत होता है।
फिल्म में प्रोसेनजीत और मनीषा कोईराला मुख्य किरदारों को निभाते हैं। प्रोसेनजीत ने युवा फिल्मकार की मुश्किलों और दुविधाओं को अच्छी तरह पर्दे पर उतारा है। मनीषा कोईराला का सधा अभिनय चरित्र के अनुकूल है। राइमा सेन भी अपने किरदार के साथ न्याय करती हैं। खेला का आकर्षण छोटा बच्चा है। उसकी मासूमियत आकर्षित करती है।
रितुपर्णो घोष की ऐसी फिल्में कहानी की तरह होती हैं। उनमें न तो औपन्यासिक विस्तार होता है और न बहुआयामी चरित्र होते हैं। ऐसी फिल्मों को देखने का एक अलग आनंद होता है। बांग्ला में बनी यह फिल्म हिंदी में डब की गई है। अगर डबिंग पर थोड़ा ध्यान दिया गया होता तो फिल्म का प्रभाव और बेहतर होता।