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Wednesday, May 23, 2018

सिनेजीवन : पाकिस्तान की काबिल और कामयाब अभिनेत्री हैं माहिरा खान


 सिनेजीवन
पाकिस्तान की काबिल और कामयाब अभिनेत्री हैं माहिरा खान
-अजय ब्रह्मात्मज

पिछले हफ्ते पाकिस्तान की जर्नलिस्ट मेहर तरार के एक ट्वीट ने ध्यान खींचा। इस ट्वीट में उन्होंने पाकिस्तान की अभिनेत्री माहिरा खान की तारीफ की थी।  मेहर ने उस ट्वीट के साथ माहिरा खान का एक वीडियो लिंक भी डाला था। वह लिंक उनके किसी टीवी शो या फिल्म का टुकड़ा नहीं था। 2017 में माहिरा ने ग्लोबल एजुकेशन एंड स्किल्स फोरम को इंटरनेशनल डेलीगेट्स के साथ सम्बोधित किया था। मैंने माहिरा का सम्बोधन सुना और तारीफ के मुताबिक उन्हें काबिल पाया। भारत हो या पाकिस्तान..... फिल्म अभिनेत्रियों के बारे में हमारी स्वाभाविक धारणा है कि वे सिर्फ नाच-गाना और मुस्कुराना जानती हैं। यह सही है कि फिल्मों के कलाकार (अभिनेत्री व् अभिनेता दोनों) राजनितिक रूप से अधिक समझदार नहीं होते,फिर भी देखा गया है कि मौका मिलने पर प्रबुद्ध श्रोताओं को वे निराश नहीं करते।  भारत की अभिनेत्रियों में आसानी से प्रियंका चोपड़ा का नाम लिया जा सकता है। मैंने खुद विदेशों में उन्हें पूरी तल्लीनता से ऐसे विमर्शों में भागीदारी करते देखा और सुना है।
माहिरा के उस वीडियो को देखने के बाद मेरी रूचि जगी तो मैंने कुछ और वीडियो देखे। इसी क्रम में मैंने बीबीसी के हार्ड टॉक के प्रेजेंटर स्टीफेन सुकेर के साथ उनकी बातचीत भी देखी-सुनी। यह बातचीत उनकी फिल्मवर्नाके पाकिस्तान में प्रतिबंधित और फिर रिलीज होने के साथ ही पाकिस्तान की सांस्कृतिक संकीर्णता के इर्द-गिर्द थी।  माहिरा पाकिस्तान की कमियों कौर कमजोरियों को स्वीकार करते हुए बार-बार यह दोहरा रही थीं कि इन तथ्यों के बावजूद मैं पाकिस्तान की प्रतिनिधि के तौर पर आप के सामने बैठी बात कर रही हूँ। इस बातचीत में माहिरा खान का आत्म गौरव और अपने देश के प्रति सम्मान साफ़ दिख रहा था। भारत और पाकिस्तान की प्रतिभाओं से बातें करते समय पश्चिमी प्रेजेंटर उच्च भाव रखते हैं और यह एहसास दिलाते रहते हैं कि तुम सभी अभी पिछड़े हो। तुम भले ही आगे बढ़ गयी हो,लेकिन तुम्हारा देश अभी तक सदियों पहले के समाज में साँसे ले रहा है। इस बातचीत में माहिरा कहीं भी हिचकती या दबती नहीं हैं। वह साफ़ शब्दों में जवाब देती हैं।
इसी बातचीत में उनके तलाक़शुदा और अकेली माँ होने की भी बात आयी। माहिरा ने बगैर झेंपे शांत भाव से अपना पक्ष रखा। भारत के दर्शकों ने सबसे पहले उन्हें सरमद खूसट के टीवी शोहमसफ़रमें ज़िन्दगी चैनल पर देखा था। बाद में वह शाह रुख खान के साथरईसमें दिखीं। यह फिल्म भारत-पाकिस्तान के विवादों में ऐसी फँस गयी थी कि माहिरा प्रचार के लिए भारत नहीं आ सकीं। और पाकिस्तानी सेंसर कोरईसपसंद नहीं आयी,इसलिए उन्होंने पाकिस्तान में प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी। माहिरा की ख्वाहिश थी कि वह अपने दोस्तों के साथ बचपन के पसंदीदा फिल्म सत्र के साथ खुद की फिल्म देखें और इतराएं। वह समय बुरा था,इसलिए ऐसा नहीं हो सका।  भारत और पाकिस्तान में इस फिल्म से अधिक रणबीर कपूर के साथ कीहैंग आउटतस्वीरों और वीडियो के लिए वह अधिक चर्चित हुईं। पाकिस्तान में तो भयंकर आपत्तियां दर्ज हुईं। भारत में लोगों ने मज़े लिए।  सोशल मीडिया के इस दौर में पता नहीं किस सेलिब्रिटी के प्राइवेट मोमेंट्स को कौन मोबाइल के कैमरे से उतारे और पूरी दुनिया के लिए परोस दे। मुझे लगता है किरईसको नार्मल रिलीज मिली होती और भारत में माहिरा की आमद बनी रहती तो वह सलमा आगा और ज़ेबा बख्तियार से अधिक पॉपुलर हो जातीं।

माहिरा के पिता हनीफ खान विभाजन के समय दिल्ली से कराची गए थे। माहिरा ने पाकिस्तान के अलावा अमेरिका में भी शिक्षा प्राप्त की।  उन्होंने एम्टीवी  के वीजे के रूप में करियर की शुरुआत की।  फिर अपने नाम से ही एक वीकेंड शो किया। बाद में वह वाया टीवी फिल्मों में आ गयीं। आज वह पाकिस्तान की मशहूर और खास अदाकारा हैं।  मैंने उनकीबोलऔरबिन रोयेफ़िल्में देखी है। वह भारत की समकालीन अभिनेत्रियों को टक्कर देने की योग्यता रखती हैं।
पडोसी देश की यह अभिनेत्री काबिल और कामयाब है।

Tuesday, May 22, 2018

सिनेमालोक : मंटो और इस्मत साथ पहुंचे कान

सिनेमालोक

मंटो और इस्मत साथ पहुंचे कान

-अजय ब्रह्मात्मज

कैसा संयोग है? इस्मत चुगताई और सआदत हसन मंटो एक-दूसरे से इस कदर जुड़ें हैं कि दशकों बाद वे एक साथ कान फिल्म फेस्टिवल में नमूदार हुए। इस बार दोनों सशरीर वहां नहीं थे ,लेकिन उनकी रचनाएं फिल्मों की शक्ल में कान पहुंची थीं। मंटो के मुश्किल दिनों को लेकर नंदिता दास ने उनके ही नाम से फिल्म बनाई हैमंटो’. इस फिल्म में नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी शीर्षक भूमिका निभा रहे हैं। यह फिल्म कान फिल्म फेस्टिवलउन सर्टेन रिगार्डश्रेणी में प्रदर्शित हुई। वहीँ इस्मत चुगताई की विवादस्पद कहानीलिहाफपर बानी फिल्म का फर्स्ट लुक जारी किया गया। इसका निर्देशन रहत काज़मी ने किया है और तनिष्ठा चटर्जी व् सोना चौहान ने इसमें मुख्य भूमिकाएं निभाई हैं। दोनों अपनी रचनाओं पर बानी फिल्मों के बहाने एक साथ याद किये गए।  
इस्मत और मंटो को पढ़ रहे पाठकों को मालूम होगा कि दोनों ही अपने समय के बोल्ड और और रियलिस्ट कथाकार थे। दोनों के अफसानों में आज़ादी के पहले और दरमियान का समाज खुले रूप में आता है। उन्होंने अपने समय की नंगी सच्चाई का वस्तुनिष्ठ चित्रण किया। पवित्रतावादी तबके ने उनकी आलोचना की और उनके खिलाफ मुक़दमे किए। यह भी एक संयोग ही है कि मंटो की कहानीबूऔर इस्मत की कहानीलिहाफके खिलाफ दायर मुक़दमे की सुनवाई एक ही दिन लाहौर कोर्ट में हुई। उस दिन दोनों ने ही लाहौर में सुनवाई के बाद खूब मौज-मस्ती की। दोनों की तरफ से हरिलाल सिबल ने जिरह की थी। हरिलाल सिबल आज के चर्चित वकील और नेता कपिल सिबल के पिता थे। वे इस मुक़दमे की यादों को दर्ज करना चाहते थे। अगर उन्होंने कुछ लिखा हो तो कपिल सिबल को उसे प्रकाशित करना चाहिए।
आज की पीढ़ी के पाठकों को इंटरनेट से खोज करबूऔरलिहाफपढ़नी चाहिए। पिछले कुछ सालों में नसीरुद्दीन साह और दूसरे रंगकर्मी इस्मत और मंटो की कहानियों और ज़िन्दगियों को मंच पर उतरने की सफल कोशिशें कर रहे हैं। पिछले दस सालों में इस्मत और मंटो अपनी पीढ़ी के सर्वाधिक पठनीय लेखक हो गए हैं। जिसने उन्हें नहीं पढ़ा है,वह भी बातों-विवादों में उनकी वकालत करता नज़र आता है। भारतीय समाज की श्रुति परमपरा पुरानी है। बगैर खुद पढ़े भी लोगबाग ज्ञाता हो जाते हैं। दोनों की फिल्मों की रिलीज के मौके पर उनके प्रकाशकों को उनकी चुनिंदा कहानियों का संकलन लाना चाहिए। वक़्त बदल चूका है,लेकिन हालात में ज़्यादा तबदीली नहीं आयी है। अभी के लेखक उनकी तरह मुखर और साहसी नहीं हैं। ज़रुरत है की इस्मत और मंटो की प्रासंगकिता रेखांकित करने के साथ इस पर भी विचार हो कि हालात बद से बदतर क्यों होते जा रहे हैं?
नादिता दास और रहत काज़मी की फ़िल्में आगे-पीछे रिलीज होंगीं। नवाज़ और नादिता की वजह सेमंटोके प्रति दर्शकों की जिज्ञाशा  अधिक है। यह फिल्म लेखक मंटो की ज़िन्दगी में भी झांकती है,जबकि राहत काज़मी कीलिहाफइस्मत चुगताई की कहानी के दायरे में रहती है। इस्मत कीलिहाफमें बेगम जान और रब्बो के लेस्बियन रिश्ते की झलक है,जिसे उनकी किशोर उम्र की बहतिजी देख लेती है। उसी की जुबानी कहानी लिखी गयी है। अच्छी बात है की दोनों ने मुक़दमे के दौरान अपना पक्ष रखा और झुकने का नाम नहीं लिया।  तब साहित्यिक खेमों का एक तबका इनके समर्थन में खड़ा हुआ तो दूसरा तबका नसीहतें देने से बाज नहीं आया। तब मंटो ने कहा था,’मैं सनसनी नहीं फैलाना चाहता। मैं समाज,सभ्यता और संस्कृति के कपडे क्यों उतारूंगा? ये सब तो पहले से नंगे हैं। हाँ, मैं उन्हें कपडे नहीं पहनाता,क्योंकि वह मेरा काम नहीं है। वह दरजी का काम है।कहते हैं जब जज ने उनसे कहा की उनकीबूकहानी से बदबू फैल गयी है तो अपने विनोदी अंदाज में मंटो ने कहा था,’जज साहबफिनायललिख कर बदबू मिटा दूंगा।
बतौर दर्शक हम इस्मत और मंटो की फिल्मों के इंतज़ार में हैं।
Lokmat Samachar  

Monday, May 21, 2018

अब मेरे पास लोगों के सवालों के जवाब हैंः अभिनेता विनीत कुमार सिंह

-अजय ब्रह्मात्मज

विनीत कुमार सिंह को एक उभरता हुआ अभिनेता कहना ठीक नहीं होगा। वे पिछले करीब 18 वर्षों से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में सक्रिय हैं। कई फिल्मों में छोटे-छोटे किरदार निभाने के बाद अब जाकर इंडस्ट्री में उनकी खास पहचान बनी है। 

विनीत कुमार सिंह ने करीब 18 साल पहले एक टैलेंट हंट के जरिये मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा था। उन्होंने बहुत सारे छोटे-छोटे किरदार निभाये, फिल्म ‘चेन कुली की मेन कुली की’ (2007) का सहायक निर्देशन भी किया, लेकिन उनकी अलग पहचान बनी फिल्म ‘बॉम्बे टॉकीज’ (2013) और ‘गैंग्स ऑफ वासीपुर’ (2012) से। उसके बाद जब अनुराग कश्यप की ‘अग्ली’ (2013) का कान फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शन हुआ तो लोगों ने उनके अभिनय की काफी सराहना की। लेकिन अब भी वे बतौर अभिनेता कमर्शियल सफलता से दूर थे। लेकिन ये साल उनके लिए बहुत खुशकिस्मत रहा। ‘मुक्काबाज’ में उनके अभिनय और पटकथा को ना सिर्फ सराहा गया बल्कि फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर भी अच्छा प्रदर्शन किया। उसके बाद आई सुधीर मिश्र की ‘दास देव’, जिसका प्रदर्शन तो औसत रहा, लेकिन विनीत ने अपने सशक्त अभिनय से फिल्म में एक छोटी सी भूमिका में भी लोगों का दिल जीत लिया। एक लंबे संघर्ष के बाद आयुर्वेद में स्नातक और बास्केट बॉल खिलाड़ी रहे विनीत को बतौर अभिनेता सफलता हासिल हुयी है। पेश हैं उनसे बातचीत के प्रमुख अंश
क्या ‘मुक्काबाज’ से जुड़ी आपकी उमीदें पूरी हुईं? उसके बाद का जीवन कैसा चल रहा है?
मैंने जितना सोचा था, उस से ज्यादा ही हो रहा है। ‘मुक्काबाज’ को रिलीज हुए चार महीने हो गए। इन चार महीनों में जितनी स्क्रिप्ट आयी हैं,उतनी 18 साल में नहीं आयी थीं। इसके पहले ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के बाद भी चीजें बदली थीं। इस बार बदलाव ने रफ्तार पकड़ ली है।
हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का चलन है कि जिस फिल्म और किरदार से आप मशहूर होते हैं, बाद में वैसी ही फिल्मों के ऑफर आते हैं.....
वैसी तो नहीं, लेकिन उत्तर भारत की फिल्मों की तादाद ज्यादा है। मेरी पिछली फिल्में लोगों के जहन में हैं। मुझे वैसी विविधता की फिल्में आ रही हैं। मैं किसी इमेज में नहीं फंसा हूं। लोगों का बढ़ा विश्वास दिख रहा है। मेरी क्षमताओं में यकीन बढ़ा है।
क्या ऐसा कह सकते हैं कि ‘मुक्काबाज़’ ने आप की पुरानी फिल्मों को भी जिंदा कर दिया है?
बिलकुल सही कहा आप ने। मेरी पुरानी फिल्में याद आ गयी हैं। लोग नाम लेकर बताते हैं। न चली फिल्में भी लोग याद करते और कराते हैं। रिलीज के समय उन फिल्मों की कभी इतनी चर्चा नहीं हुई थी।
यह स्वाभाविक है। मशहूर होते ही आप के बारे में सारी जानकारियां तैरने लगती हैं….
जी हां, आप सही कह रहे हैं। लोगों का भरोसा इसलिए भी मिल रहा है कि ‘मुक्काबाज’ के समय ढेर सारे लोगों से मिला था। उन्हें मुझ में अब भरोसा हो रहा है। अनुराग ने मेरी स्क्रिप्ट में विश्वास किया था…। अभी बाकी लोग भी कर रहे हैं। फिल्म देखने के बाद 70 प्रतिशत लोगों ने फोन किया।
आप ने अनुराग का जिक्र किया। आज के विनीत में उनका क्या योगदान है?
अगर वे न होते तो मेरे हिस्से में यह सब नहीं आता। यह बात साफ है। मैंने हमेशा मेहनत की। सभी भूमिकाओं में की, लेकिन ऐसी पहचान नहीं मिली। अनुराग ने मेरे करियर को बनाया। मुझे एक एक्टर बनाया। आज लोगों को लगता है कि मैं एनएसडी या एफटीआईआई से हूं।
आम जिंदगी में गुरू और उस्ताद अपने चेलों और शागिर्दों को जताते रहते हैं कि मैंने क्या-क्या किया? क्या कभी अनुराग को भी ऐसे रूप में देखा है?
मैंने कभी ऐसा अनुभव नहीं किया। उन्होंने कभी नहीं जताया। हां, उनका कंसर्न रहता है। मैं संयुक्त परिवार में पला भावुक लड़का हूं। थोड़ा इमोशनल हो जाता हूं। अनुराग इस बात को जानते हैं। अनुराग ऐसे स्वाभाव के नहीं हैं। अपने योगदान का कभी भार नहीं डालते।
आप जैसे अभिनेता सफल होने तक एक उम्र गुजार चुके होते हैं। यही कामयाबी दस साल पहले आ गयी होती तो कुछ और बात होती?
कुछ चीजें हमारे वश में नहीं होतीं। पहले कुछ सालों में सफलता मिल गयी होती तो ज्यादा काम कर पाया होता। भूख थोड़ी शांत हो गयी होती। कुछ फिल्में गिनाने के लिए होतीं। फिर भी अफसोस नहीं है। इस दरम्यान सीखता रहा। अब समझ में आ रहा है कि वक्त बेकार नहीं जाता। खुद पर काम कर रहा हूं।
हम कौन सी फिल्म में आप को देखेंगे?
अक्षय कुमार के साथ ‘गोल्ड’ आएगी। उनसे बहुत कुछ सीखा। खुश रहना कोई उनसे सीखे। वे कभी स्ट्रेस में नहीं रहते। एक फिल्म और मिली है, जिसके निर्माता अनुराग कश्यप हैं।
’मुक्काबाज’ की कामयाबी से जिंदगी में क्या बदलाव आया है?
मेरी बेचैनी कम हो गयी है। मैं शांत हो गया हूं। पहले लगता था कि मैं मुंबई में गुम हो गया हूं। मैं लोगों के सवालों के जवाब नहीं दे पा रहा था। अब मेरे पास मुकम्मल जवाब है।
navjivan

Friday, May 18, 2018

दरअसल : नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी की ‘मंटो’

दरअसल

नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी कीमंटो

-अजय ब्रह्मात्मज

भारत से कुछ फ़िल्मकार, पत्रकार और समीक्षक मित्र कान फिल्म फेस्टिवल गए हैं। उनकी राय,टिपण्णी और समीक्षा पर यकीन करें तो नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी कीमंटोइस साल की बहुप्रतीक्षित फिल्म होगी। यह फिल्म कान फिल्म फेस्टिवल केउन सर्टेन रिगार्डखंड के लिए चुनी गयी है। इस फिल्म की निर्देशक नंदिता दास हैं। कान फिल्म फेस्टिवल की क्रिएटिव पवित्रता और वस्तुनिष्ठता बची हुई है। दुनिया भर के बेहतरीन फ़िल्में यहाँ देखने को मिल जाती हैं। यह पता चल जाता है कि इस साल का इंटरनेशनल सिनेमा सीन कैसा रहेगा? वहां दिखाई जा चुकी फ़िल्में कुछ महीनों के बाद घूमती हुई देश के विभिन्न शहरों में आयोजित फिल्म फेस्टिवल में पहुंचेंगी।

मैंमंटोको नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी की फिल्म कह रहा हूँ। उन्होंने ही फिल्म में शीर्षक भूमिका निभाई है। कह सकते हैं कि किरदारों पर भी कलाकारों के नाम लिखे होते हैं। 2005 से सआदत हसन मंटो के जीवन पर फिल्म बनाने की कोशिशें जारी हैं। अनेक निर्देशकों ने सोचा। कुछ कलाकारों ने तैयारी की। बात आयी-गयी और फ़िल्में नहीं बन सकीं। इस बार नंदिता दास अपने प्रयास में सफल रहीं। कुछ सालों पहले उन्होंने जबमंटोके बारे में सोचा और तैयारियां शुरू कीं तो  उनके दिमाग में मुख्य भूमिका के लिए कोई और था। फंड के अभाव में फिल्म खिंचती गयी और नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी आ गए। एक तरह से यह अच्छा ही हुआ ,क्योंकि मंटो के तेवर को नवाज़ पकड़ सकते थे। कहना नहीं चाहिए,लेकिन नवाज़ ने भी तिरस्कार और नाराज़गी के साल मुंबई में गुजारे हैं। लोगों ने उन्‍हें गलत समझा है। लंबे समय तक लोग समझ नहीं पा रहे थे और गरीब भूमिकाओं में नवाज़ को रेज़गारी की तरह खर्च कर रहे थे।

मंटोनंदिता दास की भी फिल्म है।  यह उनकी प्रिय ज़मीन है। उन्होंने 2002 में हुए गुजरात के दंगो परफ़िराक़’(2009 ) बनायी थी। नौ सालों के बाद वह लौटी हैं।  इस बार देश विभाजन का समय है। हालात 2002 से भी बदतर हैं। इस बार उनके पास इन हालात से जूझता ग़मज़दा नायक मंटो है। पिछले कुछ सालों में मंटो देश के सबसे अधिक चर्चित और पठित लेखक रहे हैं। उन्हें परफॉर्मेंस की अनेक विधाओं में अभिव्यक्ति मिली। उनकी कहानियों का पाठन,मंचन और फिल्मांकन भी हुआ। हम उनकी रचनाओं से वाकिफ होते रहे। फिर भी इस क्रम में मंटो अपरिचित ही रहे। हम उस लेखक के मानस और माहौल के बारे में ज़्यादा नहीं जान सके। उन्होंने अपनी कब्र पर लिखने के लिए इबादत लिखी थी,’यहां सआदत हसन मंटो लेटा हुआ है और उसके साथ कहानी लेखन की कला और रहस्य भी दफन हो रहे हैं। टनो मिट्टी के नीचे दबा वह सोच रहा है कि क्या वह खुदा से बड़ा कहानी लेखक नहीं है।
नंदिता दास ने अपनी फिल्‍म में मंटो के मिजाज को उकेरने की कोशिश की है। उन्होंने अपनी फिल्म में उनकी कहानियों का सहारा लिया है। नंदिता के लिए शिल्प की बड़ी चुनौती रही होगी। उन्हें बायोपिक के पॉपुलर फॉर्मेट में मंटो की कहानी नहीं कहनी थी। मंटो का साथ देने के लिए उन्होंने केवल उनकी बीवी साफिया (रसिका दुग्गल) और दोस्त श्याम चड्ढा (ताहिर राज भसीन ) को रखा है। इन तीनों के साथ वह उस दौर में उतरती हैं,जब मंटो भारत से पाकिस्तान जाते हैं। वहां पहुँचने के बाद मंटो ने लिखा था,मेरे लिए ये तय करना नामुमकिन हो गया है, कि दोनों मुल्कों में अब मेरा मुल्क कौन-सा है। बड़ी बेरहमी के साथ हर रोज जो खून बहाया जा रहा है, उसके लिए कौन जिम्मेदार है? अब आजाद हो गए हैं लेकिन क्या गुलामी का वजूद खत्म हो गया है? जब हम गुलाम थे तो आजादी के सपने देख सकते थे, लेकिन अब हम आजाद हो गए हैं तब हमारे सपने किसके लिए होंगे?यह सवाल आज भी कायम है। दोनों मुल्कों के लेखकों के सपने छीन गए हैं। हम सभी मंटो की दुविधा जीने को अभिशप्त हैं।
कान फिल्म फेस्टिवल मेंमंटोकी मुनासिब तारीफ हुई है। देखें यह फिल्म कब तक आम भारतीय दर्शकों तक पहुँचती है? नंदिता दास और नवजुद्दीन सिद्दीक़ी की इस पेशकश का इंतज़ार है।