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Tuesday, March 5, 2019

सिनेमालोक : खुश्बू हैं निदा फाजली

सिनेमालोक
खुश्बू हैं निदा फाजली
-अजय ब्रह्मात्मज
अपनी फिल्म पत्रकारिता में कुछ अफ़सोस रह ही जायेंगे.उनका निदान या समाधान नहीं हो सकता.उसे सुधारा ही नहीं जा सकता. एक समय था कि लगभग हर हफ्ते निदा साहब से मुलाक़ात होती थी.मुंबई के खार डांडा की अम्रर बिल्डिंग के पहले माले के उनके फ्लैट का दरवाज़ा सभी पत्रकारों और साहित्यकारों के लिए खुला रहता था. मुझे अफ़सोस है कि उनके जीते जी मैंने कभी उनसे उनके फ़िल्मी करियर के बारे में विस्तृत बातचीत क्यों नहीं की? या कभी उन पर लिखने का ख्याल क्यों नहीं आया? शायद करीबी और पहुँच में रहने वली हतियों के प्रति यह नाइंसाफी इस सनक में हो जाती है कि उनसे तो कभी भी बात कर लेंगे. फ्रीलांसिंग के दिनों में किसी संपादक या प्रभारी ने उन पर कुछ लिखने के लिए भी नहीं कहा.
बहरहाल,पिछले दिनों उनकी पत्नी मालती जोशी और मित्र हरीश पाठक के निमंत्रण पर निदा फाजली पर कुछ पढने और बोलने का मौका मिला.मुझे केवल उनके फ़िल्मी पक्ष पर बोलना था...बतौर गीतकार.पता चला कि उन्होंने फिल्मों के लिए 348 गीत लिखे. निदा साहब ग्वालियर के मोल निवासी थे,जहाँ उनका परिवार कश्मीर से आकर बसा था. कह्श्मिर के अपने गाँव फाज़िला से उन्होंने अपना सरनेम फाजली चुना था.उनका असली नाम मुक्तदा हसन थे.बचपन से उन्हें साहित्य का शौक़ रहा.कहते हैं कि सातवें दशक में जब उनका परिवार पाकिस्तान शिफ्ट कर रहा था तो उन्होंने भारत में ही रहने का फैसला किया. वे अपनी जड़ों से नहीं कटना चाहते थे. भारतीय संस्कृति और गंगा जमुनी तहजीब में उनका अटूट भरोस था. वे उससे कभी नहीं डिगे. हिंदू धर्म,दर्शन और मिथकों से वे खूब परिचित थे.अपनी शायरी और लेखन में उन्होंने इनका इस्तेमाल भी किया.कठमुल्ला मौलवियों और इस्लामिक कट्टरता से उन्हें नफरत थी. उन्होंने बेहिचक चोट की और फतवे भी बर्दाश्त किये.
फिल्मों की तरफ उनका रुझान था,लेकिन मुंबई आने के बाद पत्र-पत्रिकाओं के आरंभिक लेखन और मुशायरों के दिनों में उन्होंने साहिर लुधियानवी.कैफ़ी आज़मी और सरदार जाफरी को बेबाक टिप्पणियों से नाराज़ कर दिया था.जवान और आक्रामक निदा को लगता था कि क्रातिकारी शायरों की शायरी और ज़िन्दगी में फर्क और ढोंग है. वे बातें तो गरीबों की करते हैं,लेकिन खुद सुविधा संपन्न इमारतों और अपार्टमेंट में रहते हैं. साहिर साहेब को निदा इतने खटके कि उन्होंने उन मुशायरों में जाने से मन कर दिया,जहाँ निदा को भी बुलाया जाता था.मजबूरन निदा का बहिष्कार हुआ. इस हालत में उनके एक ही हमदर्द थे जां निसार अख्तर...उनसे ग्वालियर का परिचय था. फिर ऐसा संयोग भी बना कि कमल अम्तोही की फिल्म ‘रज़िया सुल्तान’ में वे उनके उत्तराधिकारी बने.फिल्म के निर्माण के दौरान उनकी मौत हुई. दो गीत लिखे जाने बाकी थे. कमल अमरोही चाहते थे कि कोई ‘मुक़म्मल’ शायर ही गीत लिखे. निदा को मौका मिला और उन्होंने लिखा ‘तेरा हिज्र मेरा नसीब है’.फिल्म रिलीज होने के पहले ही निदा को फ़िल्में मिलने लगीं. जिनको कमल अमरोही ने चुना हो.उनमें खास बात तो होगी.
निदा फाजली 1964-65 में मुंबई आ गए थे. फिल्मों में पहला मौका १९७९ में मिला.शायद पहले उनका इरादा न रहा हो कि फिल्मों के लिए गीत लिखे जायें.निदा हिंदी फिल्मों के ऐसे आखिरी गीतकार हैं,जो उर्दू अदब में भी बड़ा मुकाम रखते हैं.उनके बाद कोई ऐसा गीतकार नहीं दीखता,जो मकबूल शायर भी हो.तो 1979 में प्रख्यात स्तंभकार जयप्रकाश चोव्क्से ने ‘शायद’ की कहानी लिखी. मदन बावरिया निर्देशित इस फिल्म के तीनों गीतकार मध्यप्रदेश के थे.विट्ठल भाई पटेल.दुष्यंत कुमत त्यागी और निदा फाजली. इस फिल्के लिए निदा फाजली ने दो गीत लिखे...’खुश्बू हूँ मैं फूल नहीं हू जो मुरझाऊंगा’ और ‘दिन भर धुप का पर्वत कटा,शाम को पीने निकले हम,जिन गलियों में मौत बिछी थी,उनमें पीने निकले हम’... दूसरा गीत फिल्म की थीम को धयन में रख कर लिखा गया था. उन्होंने आरके की फिल्म ‘बीवी ऑ बीवी’ के गीत लिखे थे. राज कपूर से उनकी मुलाक़ात का किस्सा फिर कभी. अभि तो इतना ही कि निदा साहेब के गीत सुनिए और पढ़िए.उनकी खुश्बू से सुंगधित होइए,


Tuesday, February 26, 2019

सिनेमालोक : अपनी कथाभूमि से बेदखल होते फिल्मकार

सिनेमालोक 
अपनी कथाभूमि से बेदखल होते फिल्मकार 
- अजय ब्रह्मात्मज
पिछले हफ्ते एक युवा फिल्मकार का फ़ोन आया. उनकी आवाज़ में बदहवासी थी.थोड़े घबर्सये हुए लग रहे थे. फोन पर उनकी तेज़ चलती सांस की सायं-सायं भी सुनाई पड़ रही थी.मैंने पूछा,जी बताएं, क्या हाल हैं? मन ही मन मना रहा  था कि कोई बुरी खबर न सुनाएं. उन्होंने जो बताया,वह बुरी खबर तो नहीं थी,लेकिन एक बड़ी चिंता ज़रूर थी.यह पहले भी होता रहा है.हर पीढ़ी में सामने चुनौती आती ही. उन्हें अभी एहसास हुआ. उनके जैसे और भी फिल्मकार होंगे,जो खुद को विवश और असहाय महसूस कर रहे होंगे. उन्होंने बताया कि सुविधा सम्पन्न फिल्मकार उनकी कहानियों और किरदारों को हथिया रहे हैं. उन पर काबिज हो रहे हैं. युवा फिल्मकार 'गली बॉय' देख कर लौटे थे. उनकी प्रतिक्रिया और चिंता थी कि सफल और सम्पन्न फिल्मकार उनका हक छीन रहे हैं. उन्हें उनकी ज़मीन से बेदखल कर रहे हैं.

हिंदी फिल्मों में यह सिलसिला सालों से चला आ रहा है. युवा और प्रयोगशील फिल्मकार कंटेंट और क्राफ्ट में नए-नए प्रयोग करते रहते हैं. उनकी सफलता-असफलता चलती रहती है. दशकों से हम यह देखते आ रहे हैं कि प्रयोगशील फिल्मकारों के प्रयोग और खोज को व्यवसायिक फिल्मों के फिल्मकार देर-सवेर अपना लेते हैं. पैरेलल सिनेमा के दौर में यह खूब देखने को मिला। उन दिनों ऐसे फिल्मकारों को आर्ट सिनेमा के फिल्मकार के तौर पर अलग कोष्ठक में रखा गया। मेनस्ट्रीम पॉपुलर मीडिया ने उन्हें खास बता कर हाशिए पर डाल दिया. ताया गया कि आर्ट सिनेमा आम दर्शकों के लिए नहीं होता है. आर्ट सिनेमा में दृश्य धीमी गति से आगे बढ़ते हैं, क्लोज अप देर तक टिका रहता है और संवाद कानाफूसी के अंदाज में बोले जाते हैं. उसकी खूबियों को कमियों के तौर पर प्रचारित किया गया. दरअसल, कथित आर्ट सिनेमा में दृश्यबंध की अलग प्रविधि अपनाई जाती हैं. वहां मनोरंजन के नाम पर दर्शकों को खुश करने की हड़बड़ी नहीं रहती. 

वास्तव में मनोरंजन और कमाई के दबाव ने हिंदी सिनेमा का बेड़ा गर्क किया है. अभी तो यह हालत हो गई है कि मनोरंजन के नाम पर हंसी का कूड़ा फैलाया जा रहा है. व्हाट्सएप लतीफों के इस हास्यास्पद दौर में तनावग्रस्त दर्शक इस कूड़े की बदबू नहीं महसूस कर पा रहे हैं. उन्हें पता भी नहीं चल रहा है कि मनोरंजन के नाम पर वे किस संक्रामक रोग के शिकार हो रहे हैं? फिल्मों का प्रचार तंत्र स्तरहीन मनोरंजन को श्रेष्ठ बता कर परोहैस रहा है. अफसोस की बात है कि इस कुचक्र में हिंदी फिल्मों की अनुभवी प्रतिभाएं संलग्न हैं.उन्हें मनोरंजन का काठ मार गया है.उम्र बढ़ने की साथ उनकी समझ और संवेदना कुंद हो गई है. हाल की एक सफल लेकिन फ़ूहड़ फिल्म के निर्देशक और कलाकार ५० की उम्र पार कर चुके हैं और उनकी सामूहिक कोशिश देख लें.

इस वास्तविकता से अलग भी एक स्थिति है. इसी स्थिति से चिंतित हैं हमारे युवा फिल्मकार. ऐसे फिल्मकार जिन्होंने हिंदी फिल्मों में नई भावभूमि और कथाभूमि प्रस्तुत की. नए किरदार लेकर लाए. सीमित बजट में उन्होंने रियलिस्टिक फिल्म बनाने की कोशिश की. इनमें से कुछ सफल रहे. उनकी फिल्मों की सफलता ने मेनस्ट्रीम फिल्मों के निर्देशकों को चौंकाया. मेनस्ट्रीम के फिल्मकारों ने ऐसे प्रतिरोधी युवा फिल्मकारों को अपनी पंगत में बिठाया. उनसे नए किरदारों और और कहानियों की बारीकियां सीखीं. कई बार देखने और समझने का नजरिया भी सीखा. और फिर धीरे से उन किरदारों और कहानियों को अपनी फिल्मों में ले आए. प्रेरणा कहीं से भी नहीं जा सकती है और प्रभाव भी ग्रहण किया जा सकता है. समस्या तब होती है, जब मेनस्ट्रीम के संपन्न फिल्मकार असीमित बजट में लोकप्रिय कलाकारों के साथ प्रयोगशील फिल्मकारों की कथा भूमि पर खेलने लगते हैं. इस खेल का व्यापक प्रचार और प्रसार होता है. कहा जाता है कि मेनस्ट्रीम के फिल्मकार ने निम्न तबके के किरदारों को समझा और पेश किया है. सच्चाई यह होती है कि यह उनके लिए एक मुनाफे का प्रयोग होता है. इसमें उन्हें नाम और दाम दोनों मिल जाता है.दूसरी तरफ प्रयोगशील फिल्मकार अपनी ही जमीन से बेदखल हो कर नई जमीन की तलाश में फिर से संघर्ष करता है.
इस व्यावसायिक और उपभोक्तावादी दौर में युवा फिल्मकार की चिंता बेवजह की शिकायत लग सकती है. कुछ लोग यह भी कह सकते हैं कि ऐसी रुदाली से कोई फर्क नहीं पड़ता. दर्शक तो सिनेमा देखना चाहता है और अगर उसे चमकदार आवरण में मनोरंजन मिल रहा है तो वह क्यों अनगढ़ और सस्ती फिल्मों की तरफ नजर करे. हिंदी फिल्मों में आ रहे युवा फिल्मकारों की नई पीढ़ियां फिर से खुद के लिए कहानी किरदार और कथाभूमि खोजती हैं. और फिर से स्थापित फिल्मकार उस कथाभूमि को हथिया लेते हैं. कथाबीज में ही फेरबदल कर वे अपनी फिल्म रोपते हैं और कामयाबी की फसल उगाते हैं। नाम और पुरस्कार बटोर लेते हैं. प्रयोगशील फिल्मकार उन्हें गुस्से में निहारते और कूढ़ते रहते हैं. चिंतित भटकते फिरते हैं।

Tuesday, February 19, 2019

सिनेमालोक : धारावी का ‘गली बॉय’


सिनेमालोक
धारावी का ‘गली बॉय’
-अजय ब्रह्मात्मज
जोया अख्तर की फिल्म ‘गली बॉय’ की खूब चर्चा हो रही है.जावेद अख्तर और हनी ईरानी की बेटी और फरहान अख्तर की बहन जोया अख्तर अपनी फिल्मों से दर्शकों को लुभाती रही हैं.उनकी फ़िल्में मुख्य रूप से अमीर तबके की दास्तान सुनाती हैं.इस पसंद और प्राथमिकता के लिए उनकी आलोचना भी होती रही है.अभि ‘गली बॉय’ आई तो उनके समर्थकों ने कहना शुरू किया कि जोया ने इस बार आलोचकों का मुंह बंद कर दिया. जोया ने अपनी फिल्म से जवाब दिया कि वह निम्न तबके की कहानी भी कह सकती हैं.’गली बॉय’ देख चुके दर्शक जानते हैं कि यह फिल्म धारावी के मुराद के किरदार को लेकर चलती है.गली के सामान्य छोकरे से उसके रैप स्टार बनने की संगीतमय यात्रा है यह फिल्म.
इस फिल्म की खूबसूरती है कि जोया अख्तर मुंबई के स्लम धारावी की गलियों से बहार नहीं निकलतीं.मुंबई के मशहूर और परिचित लोकेशन से वह बसची हैं.इन दिनों मुंबई की पृष्ठभूमि की हर फिल्म(अमीर या गरीब किरदार) में सी लिंक दिखाई पड़ता है.इस फिल्म में सीएसटी रेलवे स्टेशन की एक झलक मात्र आती है.फिल्म के मुख्य किरदार मुराद और सफीना के मिलने की खास जगह गटर के ऊपर बना पुल है.इस गटर में कचरा जलकुंभी की तरह पसरा हुआ है.आप को याद होगा कि डैनी बॉयल ने 2008 में ‘स्लमडॉग मिलियेनर’ नमक फिल्म में में धारावी के किरदारों को दिखाया था.इंटरनेशनल ख्याति की इस फिल्म से धारावी की तरफ पर्यटकों का ध्यान गे.’गली बॉय’ में एक दृश्य है,जहाँ कुछ पर्यटक मुराद का घर देखने आते हैं तो उसकी दादी 500 रुपए की मांग करती है. इस फिल्म को बारीकी से देखें तो जोया भी पर्यटक निर्देशक के तौर पर ही कैमरे के साथ धारावी में घुसती हैं.धारावी की ज़िन्दगी और सपनों को कभी सुधीर मिश्र ने ‘धारावी’ नाम की फिल्म बहुत संजीदगी से चित्रित किया था.दूसरी हिंदी फिल्मों में भी धारावी की छटा झलकती रही है.ज्यादातर फिल्म निर्देशक यहाँ की गंदगी,गंदे आचरण और गंदे धंधे ही कैमरे में क़ैद करते रहे हैं.जोया ने यहाँ के पॉजीटिव किरदार लिए हैं.
जोया अख्तर की ‘गली बॉय’ सच्चाई और सपने को करीब लेन की कोशिश में जुटे मुराद की कहानी है.मुराद बुरी सांगत में होने बावजूद अच्छे ख्याल रखता है.वह अपनी नाराज़गी को गीतों में अभिव्यक्त करता है.उसकी मुलाक़ात एमसी शेर से होती और फिर उसके जीवन की दिशा बदल जाती है.वह रैप करने लगता है.तय होता है कि एक वीडियो बनाया जाये और उसे यौतुबे पर डाला जाये.वीडियो तैयार करने के बाद उसे एक्सपोर्ट करने के पहले रैपर का नाम रखने की बात आती है तो मुराद कहता है कि मेरा क्या नाम? मैं तो गली का छोकरा....यही गली बॉय नाम पड़ता है.वीडियो आते ही उसकी यात्रा आरम्भ हो जाती है.वह सपनों को जीने लगता है.वह अपने मामा की इस धारणा और सोच को झुठलाता है कि नौकर का बेटा नौकर ही हो सकता है.
जोया ने ‘गली बॉय’ की प्रेरणा ज़रूर रियल रैपर नेज़ी और डिवाइन से ली है,लेकिन उन्होंने उनकी ज़िन्दगी के कडवे और सच्चे प्रसंग कम लिए हैं.रीमा कागती के साथ उन्होंने गली के छोकरे के रैपर बनाने की कहने को हिंदी फिल्मों के घिसे-पिटे ढांचे में फिट किया है.’गली बॉय’ की यही सीमा उसे देश के दर्शकों से नहीं जोड़ पति.पहले दिन यह फिल्म संगीत और नेज़ी व डिवाइन के किस्सों की वजह से शहरी दर्शकों को खींचती है,लेकिन दर्शक जा फिल्म से कूनेक्तिओन फील नहीं करते तो वे छंट जाते हैं.दूसरे दिन ही घटे दर्शकों ने जाहिर कर दिया है कि जोया अख्तर की फिल्म उन्हें अधिक पसंद नहीं आई है.निर्देशक जोया अख्तर और मुख्य कलाकार रणवीर सिंह मुराद का करैक्टर ग्राफ नहीं रच पाते.फिल्म के पहले फ्रेम से ही रणवीर सिंह का रवैया और व्यवहार रैप स्टार का है,इसलिए किरदार की यात्रा छू नहीं पाती.
जोया अख्तर और करण जौहर कोशिश तो कर रहे हैं कि वे आम दर्शकों की ज़िन्दगी की कहानी कहें,लेकिन अनुभव,समझदारी और शोध की कमी से उनके प्रयास में छेद हो जाते हैं.


Tuesday, February 12, 2019

सिनेमालोक : कामकाजी प्रेमिकाएं


सिनेमालोक
कामकाजी प्रेमिकाएं
-अजय ब्रह्मात्मज
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने इश्क और काम के बारे में लिखा था :
वो लोग बड़े खुशकिस्मत थे
जो इश्क को काम समझते थे
या काम से आशिकी करते थे
हम जीते जी मशरूफ रहे
कुछ इश्क किया कुछ काम किया
काम इश्क के आड़े आता रहा
और इश्क से काम उलझता रहा
आखिर तंग आकर हम ने
दोनों को अधूरा छोड़ दिया.

आज की बात करें तो कोई भी लड़की इश्क और काम के मामले में फ़ैज़ के तजुर्बे अलग ख्याल रखती मिलेगी.वह काम कर रही है और काम के साथ इश्क भी कर रही है.उसने दोनों को अधूरा नहीं छोड़ा है.इश्क और काम दोनों को पूरा किया है और पूरी शिद्दत से दोनों जिम्मेदारियों को निभाया है.आज की प्रेमिकाएं कामकाजी हैं.वह बराबर की भूमिका निभाती है और सही मायने में हमकदम हो चुकी है.अब वह पिछली सदी की नायिकाओं की तरह पलट कर नायक को नहीं देखती है.उसे ज़रुरत ही नहीं पडती,क्योंकि वह प्रेमी की हमकदम है.
गौर करेंगे तो पाएंगे कि हिंदी फिल्मों की नायिकाओं के किरदार में भारी बदलाव आया है.अब वह परदे पर काम करती नज़र आती है.वह प्रोफेशनल हो चुकी है.गए वे दिन जब वह प्रेमी के ख्यालों में डूबी रहती थी.प्रेमी के आने की आहट से लरजती और प्रेमी के जाने से आहत होकर तडपती नहीं है.21 वीं सदी की पढ़ी-लिखी लड़कियां सिर्फ प्रेम नहीं करतीं,वे प्रेम के साथ और कई बार तो उसके पहले काम कर रही होती हैं.जिंदगी में लड़कियां लड़कों से दोस्ती रखती हैं,लेकिन उन्हें प्रेमी के तौर पर स्वीकार करने के पहले अपने करियर के बारे में सोचती हैं.उन्हें बहु बन कर घर में बैठना मंज़ूर नहीं है.परदे पर जिंदगी का विस्तार नहीं दिखाया जा सकता,लेकिन यह परिवर्तन दिखने लगा है कि वे अपने प्रेमियों की तरह बोर्ड रूम की मीटिंग से लेकर २६ जनवरी की परेड तक में पुरुषों/प्रेमियों के समक्ष नज़र आती हैं.
नए सितारों में लोकप्रिय आयुष्मान खुराना की फिल्मों पर नज़र डालें तो उनकी प्रेमिकाएं ज्यादातर स्वतंत्र सोच की आत्मनिर्भर लड़कियां हैं.आयुष्मान को हर फिल्म में निजी समस्याओं को सुलझाने के साथ उनके काम के प्रति भी संवेदनशील रहना पड़ता है.कभी ऐसा नहीं दिखा कि वे अपनी कामकाजी प्रेमिकाओं की व्यस्तता से खीझते दिखे हों.वास्तव में यह जिंदगी का सर है.शहरी प्रेमकहानियों में कामकाजी प्रेमिकाओं की तादाद बढती जा रही है.और यह अच्छी बात है.
इधर की फिल्मों के प्रेमी-प्रेमिकाओं(नायक-नायिकाओं) का चरित्र बदल गया है.गीतकार इरशाद कामिल कहते हैं कि अब जिंदगी में रहते हुए ही प्रेम किया जा रहा है.उन्हें वीराने,चांदनी रात,झील और खयाली दुनिया की ज़रुरत और फुर्सत नहीं रह गयी है.फिल्मों और जीवन में रोज़मर्रा की गतिविधियों के बीच ही प्रेम पनप रहा है.साथ रहने-होने की रूटीन जिम्मेदारियों के बीच ही उनका रोमांस बढ़ता और मज़बूत होता है.फ़िल्में इनसे अप्रभावित नहीं हैं.
परदे की नायिकाओं की निजी जिंदगी में झाँकने पर हम देखते हैं कि पहले की अभिनेत्रियों की तरह आज की अभिनेत्रियों को कुछ छिपाना या ढकना नहीं पड़ता है.बिंदास युवा अभिनेत्रियाँ अपने प्रेमियों की पूर्व प्रेमिकाओं से बेधड़क मिलती और दोस्ती करती हैं और अभिनेता भी प्रेमिकाओं के प्रेमियों से बेहिचक मिलते हैं.पूर्व प्रेमी-प्रेनिकाओं से अलग होने और संबंध टूटने के बाद भी उन्हें साथ काम करने और परदे पर रोमांस करने में हिचक नहीं होती.उनके वर्तमान प्रेमी-प्रेमिकाओं को यह डर नहीं रहता कि कहीं शूटिंग के एकांत में पुराना प्रेम न जाग जाए.सचमुच दुनिया बदल चुकी है.प्रेम के तौर-तरीके बदल गए हैं और प्रेमी-प्रेमिका तो बदल ही गए हैं.इस बदलाव में उत्प्रेरक की भूमिका लड़कियों की है.उन्हें अब अपने काम के साथ इश्क करना है या यूँ कहें कि इश्क के साथ काम करना है. अगर प्रेमी कुछ और चाहता है या इश्क का हवाला देकर काम छुड़वाना चाहता है तो लड़कियां कई मामलों में प्रेमियों को छोड़ देती हैं.

Tuesday, February 5, 2019

सिनेमालोक : क्यों मौन हैं महारथी?


सिनेमाहौल
क्यों मौन हैं महारथी?
-अजय ब्रह्मात्मज
सोशल मीडिया के प्रसार और प्रभाव के इस दौर में किसी भी फिल्म की रिलीज के मौके पर फ़िल्मी महारथियों की हास्यास्पद सक्रियता देखते ही बनती है?हर कोई आ रही फिल्म देखने के लिए मर रहा होता है.यह अंग्रेजी एक्सप्रेशन है...डाईंग तो वाच.हिंदी के पाठक पूछ सकते हैं कि मर ही जाओगे तो फिल्म कैसे देखोगे?बहरहाल,फिल्म के फर्स्ट लुक से लेकर उसके रिलीज होने तक फिल्म बिरादरी के महारथी अपने खेमे की फिल्मों की तारीफ और सराहना में कोई कसार नहीं छोड़ते हैं.प्रचार का यह अप्रत्यक्ष तरीका निश्चित ही आम दर्शकों को प्रभावित करता है.यह सीधा इंडोर्समेंट है,जो सामान्य रूप से गलत नहीं है.लेकिन जब फिल्म रिलीज होती है और दर्शक किसी महारथी की तारीफ के झांसे में आकर थिएटर जाता है और निराश होकर लौटता है तो उसे कोफ़्त  होती है.फिर भी वह अगली फिल्म के समय धोखा खाता है.
इसके विपरीत कुछ फिल्मों की रिलीज के समय गहरी ख़ामोशी छा जाती है.महारथी मौन धारण कर लेते हैं.वे नज़रअंदाज करते हैं.महसूस होने के बावजूद स्वीकार नहीं करते कि सामने वाले का भी कोई वजूद है.ऐसा बहार से आई प्रतिभाओं के साथ होता है.उन्हें अपनी फिल्मों के लिए दोगुनी मेहनत करनी पड़ती है.ताज़ा उदहारण ‘मणिकर्णिका’ का है.कंगना रनोट की इस फिल्म के प्रति भयंकर भयंकर उदासी अपनाई गयी है.रिलीज के बाद दर्शकों ने इस फिल्म को स्वीकार किया है.रिलीज के बाद के विवादों के बावजूद इस फिल्म का कारोबार औसत से बेहतर रहा है.लेकिन महारथी और ट्रेड पंडित भी ‘मणिकर्णिका’ की कामयाबी को लेकर सहज नहीं दिख रहे है.महारानी लक्ष्मीबाई के जीवन,निरूपण और चित्रण को लेकर असहमति हो सकती है.मुझे खुद लगा कि इस फिल्म में व्यर्थ ही हिन्दू राष्ट्रवाद को तरजीह देने के साथ प्रचारित किया गया है.अंतिम दृश्य में महारानी लक्ष्मीबाई का ॐ में तब्दील हो जाना सिनेमाई ज्यादती है.फिर भी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि कंगना रनोट ने इस फिल्म को अधिकांश दर्शकों की पसंद बना दिया है.उनका अभिनय प्रभावपूर्ण है.फिल्म के कारोबार को स्वीकार करने के साथ कंगना रनोट के योगदान की भी तारीफ होनी चाहिए थी.कंगना अपनी पीढ़ी की चंद अभिनेत्रियों में से एक हैं,जो नारी प्रधान फिल्म को प्रचलित फिल्मों के समकक्ष लेकर आई हैं.
कंगना रनोट की ‘मणिकर्णिका’ के बारे में अभी तक सोशल मीडिया पर फिल्म बिरादरी के महाराथियीं की हलचल नहीं दिख रही है.करण जौहर से लेकर अमिताभ बच्चन तक चुप हैं.अमिताभ बच्चन तो हर नए-पुराने कलाकार की तारीफ़ करते नहीं चूकते.हस्तलिखित प्रशंसापत्र और गुलदस्ता भेजते हैं.हो सकता है कि उन्होंने फिल्म नहीं देखी हो,लेकिन...करण ज़ोहर और कंगना रनोट का वैमनस्य हम सभी जानते है.उनके ही शो में कंगना ने उन्हें बेनकाब कर दिया था.उसके बाद से मुद्दे को लतीफा बना कर हल्का करने में करण जौहर सबसे आगे रहते हैं.उनके गिरोह ने एक अवार्ड शो में खुलेआम नेपोटिज्म का मजाक उड़ाया और बाद में माफ़ी मांगी.गौर करें तो यह नेपोटिज्म का दूसरा पक्ष और पहलू है,जब आप खुद के परिचितों और मित्रों के दायरे के बाहर की प्रतिभाओं की मौजूदगी और कामयाबी को इग्नोर करते हैं.अब तो कंगना ने नाम लेकर कहना शुरू कर दिया है.ताज्जुब यह है कि इसके बावजूद महारथियों के कान पर जूं नहीं रेंग रही है.
महारथियों का मौन भी दर्ज हो रहा है.हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में भाई-भतीजावाद,खेमेबाजी,लॉबिंग जैम कर चलती रही है.बार-बार एक परिवार होने का दावा करने वाली फिल्म इंडस्ट्री वास्तव में एक ही हवेली के अलग-अलग कमरों में बंद है.और वे चुन-चुन कर दूसरों के कमरों में जाते हैं या अपने कमरे में उन्हें बुलाते हैं.हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की बैठकी में सभी(खास कर बाहरी प्रतिभाओं) के लिए आसन नहीं होता.हाँ,अनुराग कश्यप जैसा कोई पालथी मार कर बैठ जाये तो उसे कुर्सी दे दी जाती है.


Wednesday, January 30, 2019

सिनेमालोक : बहुभाषी सिनेमा बेंगलुरु में


सिनेमालोक
बहुभाषी सिनेमा बेंगलुरु में
-अजय ब्रह्मात्मज
हाल ही में बेंगलुरु से लौटा हूँ.पिछले शुक्रवार को बेंगलुरु में था.आदतन शुक्रवार को वहां के मल्टीप्लेक्स में ताज़ा रिलीज़ ‘मणिकर्णिका’ देखने गया.आशंका थी कि कन्नड़भाषी प्रान्त कर्णाटक की राजधानी बेंगलुरु में न जाने ‘मणिकर्णिका’ को प्रयाप्त शो मिले हों कि नहीं मिले हों.मुंबई और उत्तर भारत में यह बात फैला दी गयी है कि कन्नड़ फिल्म इंडस्ट्री ने राज्य सरकार पर दवाब डाल कर ऐसा माहौल बना दिया है कि हिंदी फिल्मों को सीमित शो मिलें.कन्नड़ फिल्म इंडस्ट्री को बचने और चलाये रखने के लिए यह कदम उठाया गया था.यह स्वाभाविक और ज़रूरी है. महाराष्ट्र में महाराष्ट्र सरकार ने मल्टीप्लेक्स में प्राइम टाइम पर मराठी फिल्मों के शो की अनिवार्यता से स्थानीय फिल्म इंडस्ट्री को संजीवनी दी है.यह कभी सोचा और लागू किया गया होगा.पिछले हफ्ते का मेरा अनुभव भिन्न और आदर्श रहा.अगर सारे मेट्रो शहरों के मल्टीप्लेक्स में ऐसी स्थिति आ जाये तो भारतीय फिल्मों के लिए वह अतिप्रिय आदर्शवादी बात होगी.
मैं पास के मल्टीप्लेक्स में सुबह 10 बजे के शो के लिए गया था.उस मुल्त्प्लेक्स में ‘मणिकर्णिका’ के सात शो थे.टिकट के लिए क़त़ार में लगा था.उत्सुकता थी कि किस फिल्म के लिए यह क़त़ार लगी है.मेरे आगे के पांच-सात दर्शकों में से केवल एक ने ‘मणिकर्णिका’ का टिकट लिया.एक ने ‘ठाकरे’(मराठी} का टिकट लिया.बाकि ने तमिल और तेलुगू के टिकट लिए.उस मल्टीप्लेक्स के छः स्क्रीन में अलग-अलग भाषाओँ की फ़िल्में कगी थीं और सभी के दर्शक उस कतार में थे.हमारे मेट्रो शहर कॉस्मोपॉलिटन हो चुके हैं,लेकिन सिनेमा के दर्शकों के लिहाज से यह मेरा पहला अनुभव था.वहां कुछ फिल्मों के पोस्टर दिखे.बाद में सर्च कर मैने देखा कि उस मल्टीप्लेक्स में चार भाषाओँ की फ़िल्में चल रही थीं,जबकि बेंगलुरु शहर में सात भाषों की फ़िल्में चल रही थीं.हिंदी और अंग्रेजी के साथ कन्नड़,तेलुगू,मलयालम,तमिल.मराठी और कोरियाई की फ़िल्में शहर के सिनेमाघरों में चल रही थीं.हिंदी की ‘मणिकर्णिका’ और ‘ठाकरे’.कन्नड़ की ‘सीतराम कल्याण’ और ‘केजीएफ़’,मलयालम की ‘इरुपतियोनाम तुनांडू’,तेलुगू की ‘मिस्टर मजनू’ और तमिल की ‘विस्वासम’...सच कहूं तो यह देख और जान कर बहुत ख़ुशी हुई.मुंबई में हिंदी,अंग्रेजी,मराठी और तमिल फ़िल्में साथ चलती हैं.दिल्ली में मुमकिन है पंजाबी और भोजपुरी की फ़िल्में चलती हों.अगर सभी बड़े शहरों में देश की भाषाओँ के दर्शक मिलें तो उनको भाषाओँ की फ़िल्में भी लगेंगी और दोस्तों-पैचितों के साथ दर्शक दूसरी भाषाओँ की फ़िल्में देख कर आनंदित होंगे.
कुछ हफ्ते पहले एक शोध के दरम्यान मैंने जाना कि बेंगलुरु हिंदी फिल्मों का तीसरा बड़ा मार्किट हो चुका है.मुंबई और दिल्ली के बाद उसी का स्थान है.पहले हैदराबाद तीसरे नंबर पर था.गौर करें तो पिछले पांच सालों में आईटी उद्योग में आई तेज़ी से बेंगलुरु में उत्तर भारत से युवकों की आमद बढ़ी है.वे नौकरियों के लिए सुरक्षित शहर बेंगलुरु को चुन रहे हैं.उत्तर भारत की कामकाजी लड़कियां भी बेंगलुरु को प्राथमिकता दे रही हैं.हो ये रहा है कि उत्तर भारत के नौकरीपेशा अभिभावक रिटायर होने के बाद अपनी संतानों के साथ रहने के लिए बेंगलुरु शिफ्ट हो रहे हैं.ये युवक और उनके परिवार हिंदी फिल्मों के मुख्या दर्शक हैं.उनके साथ दूसरी भाषाओँ के दोस्त-परिचित भी हिंदी फिल्मों के दर्शक हो जाते हैं.इस तरह होंदी फिल्मों के दर्शकों की संख्या तेज़ी से बढ़ी है.
आने वाले समय में बेंगलुरु में हिंदी फिल्मों के दर्शकों की संख्या में गुणात्मक इजाफा होगा.वहां के इस ट्रेंड को राजस्थान के हिंदी अख़बार ‘राजस्थान पत्रिका’ ने बहुत पहले समझ लिया था.हिन्दीभाषी पाठकों के लिए यहाँ अख़बार एक दशक पहले से ही वहां से प्रकाशित हो रहा है.मुझे पूरी उम्मीद है के दुसरे मीडिया हाउस भी इस दिशा में सोच रहे होंगे.हिंदी फिल्मों के सन्दर्भ में मुझे लगता है की निर्माताओं और प्रोडक्शन घरानों को हिंदी फिल्मों की मार्केटिंग में बेंगलुरु को ध्यान में रख कर प्लानिंग करनी चाहिए.अभी सारा फोकस मुंबई,दिल्ली और उत्तर भारत के कुछ शहरों में होता है.सच्चाई यह है कि उत्तर भारत में सिनेमाघर नहीं हैं.ज़रूरी है कि जहाँ सिनेमाघर और दर्शक हैं,वह प्रचार हो. बहुभाषी दर्शकों के बीच हिंदी दर्शकों को समय से जानकारी मिले.

Tuesday, January 22, 2019

सिनेमालोक : एनएम्आईसी सरकार का सराहनीय कदम


सिनेमालोक : एनएम्आईसी सरकार का सराहनीय कदम 
पिछले शनिवार को प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने नेशनल म्यूजियम ऑफ़ इंडियन सिनेमा का उद्घाटन किया.यह मुबई के पेडर रोड स्थित फिल्म्स डिवीज़न के परिसर में दो इमारतों में आरम्भ हुआ है.पिछले दो दशकों के टालमटोल और कच्छप गति से चल रही प्रगति के बाद आख़िरकार इसका शुभारम्भ हो गया.प्रधान मंत्री ने समय निकाला.वे उद्घाटन के लिए आये.ऐसा नहीं है कि उद्घाटन की औपचारिकता निभा कर वह निकल गए.उन्होंने पहले संग्रहालय का भ्रमण किया.खुद देखा.सराहना की और फिर 50 मिनट लम्बा भाषण दिया.इस भाषण में उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री की उपलब्धियों की तारीफ की.उसे उभरते सॉफ्ट पॉवर के रूप में स्वीकार किया. उन्होंने फिल्म व्यवसाय के अनेक आयामों को छूते हुए कुछ घोषनाएँ भी कीं.वे इस अवसर पर प्रफ्फुल्लित नज़र आ रहे थे.उन्होंने भाषण में अपने निजी अनुभवों को शेयर किया और बार-बार कहा कि आप सभी का योगदान प्रसंसनीय है.उन्होंने मंच से कुछ फिल्मकारों और हस्तियों के नाम लिए और उनके व्यापक योगदान को रेखांकित किया.
नेशनल म्यूजियम ऑफ़ इंडियन सिनेमा(एनएमआईसी) के लिए कोई हिंदी पर्याय नहीं सोचा गया है.फिल्म डिवीज़न के साईट पर एनएम्आईसी ही लिखा हुआ है.वहां क्लिक करने पर फ़िलहाल उपलब्ध जानकारियां अंग्रेजी में ही लिखी राखी हैं.यह विडंबना और सच्चाई है कि भारतीय सिनेमा की बातें अंग्रेजी में होती हैं और दावा किया जाता है कि फिल्मों के इतिहास से देश की आम जनता(दर्शक) को वाकिफ कराना है.अगर आप सिर्फ भारतीय भाषाएँ जानते हैं तो नावाकिफ ही रहें.है न सोचनीय बात? इसे राष्ट्रीय सिनेमा संग्रहालय कहा जा सकता है.इससे संबंधित जानकारियां देश की सभी भाषाओँ में उपलब्ध होनी चाहिए.कोई भी दर्शक अपनी भाषा में इसका ऑडियो सुन सके.उम्मीद है एनएम्आईसी के संबंधित अधिकारी इस दिशा में ध्यान देंगे.
बताया गया है कि एनएम्आईसी में सिनेमा के विकास के साथ देश के सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास की झलक प्रदर्शित होगी.आरंभिक काल से इसकी प्रवृतियों और प्रभाव का आकलन होगा.यह एक शोध केंद्र के रूप में विकसित किया जायेगा,जहाँ समाज पर सिनेमा के प्रभाव से संबंधित विषयों पर शोध होंगे.फिल्मप्रेमियों और अध्येताओं के लिए यहाँ प्रसिद्द निर्देशकों,निर्माताओं,संस्थानों आदि की गतिविधियों और कार्यों की प्रदर्शनी लगायी जाएगी.फिल्मकारों और फिल्म छात्रों के लिए सेमिनार और वर्कशॉप आयोजित किये जायेंगे.इसके साथ ही फिल्म आन्दोलन के प्रति भविष्य की पीढ़ियों की रूचि जगाने की गतिविधियाँ भी होंगी.ये सभी कार्य बेहद महत्वपूर्ण और सिने संस्कार के लिए ज़रूरी हैं.हम सभी जानते हैं कि भारतीय सिनेमा के चौतरफा विकास और पहुँच ने विदेशी सिनेमा को अभी तक भारतीय बाज़ार में मजबूत नहीं होने दिया है.हिंदी के साथ ही अन्य भारतीय भाषाओँ की फ़िल्में दर्शक देखते हैं.कोशिश यह चल रही है कि कैसे उन्हें इंटरनेट युग में भी संतुष्ट रखा जाये और सिनेमाघरों में जाकर फिल्म देखने की उनकी आदत बनी रहे.
पुणे में फिल्म आर्काइव है.वहां फिल्म संरक्षण का काम होता है.कुछ दिक्कतों और कमियों के बावजूद नेशनल आर्काइव का कार्य प्रशंसनीय है.वहां सुविधाएँ बढाने की ज़रुरत है. एनएम्आईसी सिनेमा के प्रदर्शन का कार्य करेगा.आर्काइव और म्यूजियम की भूमिकाएं अलग होती हैं.दर्शकों की रूचि जगाने और उन्हें जानकारी देने का फौरी काम म्यूजियम करता है.कहते हैं कि एशिया में कहीं और ऐसा म्यूजियम नहीं है.हो भी नहीं सकता,क्योंकि किसी और देश में सिनेमा भारत की तरह विकसित और स्वीकृत नहीं है. एनएम्आईसी की साल भर के कार्यक्रमों और गतिविधियों से पता चलेगा कि यह किस हद तक आम दर्शकों के काम आ रहा है?अपने देश की दिक्कत है कि संस्थान बन जाते हैं.उनके उद्देश्य तय हो जाते हैं.और फिर कोई अयोग्य अधिकारी उस संस्थान के मूल उद्देश्यों को ही पूरा नहीं कर पता. एनएम्आईसी को देश के दूसरे शहरों में घूमंतू कार्यक्रमों की परिकल्पना करनी होगी. शोधार्थियों और छात्रों के लिए अध्ययन और शोध की सुविधाएँ देनी होंगी.शोध के कार्य को बढ़ावा देने के लिए फेलोशिप और अनुदान की व्यवस्था करनी होगी.सिनेमा के शिक्षा केन्द्रों और विश्वविद्यालयों से भी एनएम्आईसी को जोड़ना होगा.
फ़िलहाल शुरूआत है.तमाम आशंकाओं और सवालों के बीच हमें सरकार के इस सराहनीय कदम की तारीफ करनी चाहिए.

Tuesday, January 15, 2019

सिनेमालोक : मृणाल सेन की ‘नील आकाशेर नीचे’


सिनेमालोक
मृणाल सेन की ‘नील आकाशेर नीचे’
-अजय ब्रह्मात्मज
हाल ही में मृणाल सेन का निधन हुआ है.पत्र-पत्रिकाओं में उन्हें याद करते हुए उनकी ‘भुवन शोम’ को बार-बार याद किया गया.इसी फिल्म से भारत में पैरेलल सिनेमा की शुरुआत मानी जाती है.हिंदी अख़बारों में इसकी अधिक चर्चा इसलिए भी होती है कि इसका वायसओवर अमिताभ बच्चन ने किया था.मृणाल सेन की ‘नील आकाशेर नीचे’ फिल्म को याद करते हुए तृषा गुप्ता ने प्यारा सा लेख लिखा है. उन्होंने उल्लेख किया था कि यह फिल्म महादेवी वर्मा के रेखाचित्र पर आधारित था.मेरी जिज्ञासा बढ़ी.मैंने पहले फिल्म देखी और फिर खोज कर मूल रचना पढ़ी.महादेवी वर्मा के संस्मरण का शीर्षक है ‘वह चीनी भाई’.
सिनेमा और साहित्य के संबंधों पर संगोष्ठियाँ होती रहती हैं.पर्चे लिखे जाते हैं.मैंने खुद कई बार ऐसी संगोष्ठियों को संबोधित किया है.मैं इस कहानी और इस पर बनी फिल्म से परिचित नहीं था.धन्यवाद् तृषा गुप्ता कि एक सुंदर और ज़रूरी फिल्म से परिचय हो गया.1959 में बनी इस फिल्म में एक चीनी और एक भारतीय के समबन्ध को मानवीय स्टार पर चित्रित किया गया है.महादेवी वर्मा के संस्मरण में वह खुद भी हैं.उन्होंने इलाहाबद में मिले चीनी के बारे में लिखा है.फिल्म में कथा का विस्तार किया गया है.संस्मरण की बेक स्टोरी में बर्मा है,लेकिन मृणाल सेन ने फिल्म बनाते समय इसमें चीन का उल्लेख किया है.फिल्म दो-तीन फ्लैशबैक में चीन की कहानी चलती है.फिल्म का नायक चीन के शानतुंग प्रान्त का वांग लू है.
मृणाल सेन ने ‘नील आकाशेर नीचे’ में महादेवी वर्मा के रेखाचित्र ‘वह चीनी भाई’ को चलचित्र में बदलते समय अनेक परिवर्तन किये हैं.इलाहबाद की कहानी कोलकाता चली जाती है.चीनी भाई का नामकरण वांग लू हो जाता है.महादेवी वर्मा कांग्रेसी कार्यकर्ता में बदल जाती हैं.उनके पति,सास और नौकर भी किरदार के तौर पर जुड़ जाते हैं.फिल्म की कहानी चीन के शानतुंग भी जाती है.वहां के जमींदार और बहन के जरिये हम वांग लू की पीड़ा से परिचित होते हैं.फिल्म में खूबसूरती के साथ चीन के तत्कालीन हालत को पिरोया गया है.तब जापान ने चीन के नानचिंग शहर पर भयानक हमला किया था.इस हमले का रविंद्रनाथ टैगोर ने विरोध किया था.उन्होंने जापान के नागुची को पत्र लिखा था.मृणाल सेन ने चीन के संघर्ष और भारत की आज़ादी के संघर्ष को वांग लू और बसंती के साथ जोड़ा एक ज़मीं पर लाकर जोड़ा है.
रेखाचित्र के अनुसार फिल्म में भी चीनी भाई बताता है कि वह फारेनर नहीं है,वह तो चीनी है.उसकी चमड़ी गोरी नहीं है.उसकी आँखें नीली नहीं हैं.पिछली सदी के चौथे दशक में भारत और चीन लगभग एक जैसी स्थिति में थे और अपनी आज़ादी के सपने बन रहे थे.’नील आकाशेर नीचे’ में बगैर किसी भाईचारे के नारे के ही एक रिश्ता बनता दिखाई देता है.यह फिल्म देखि जनि चाहिए.खासकर सिनेमा और साहित्य तथा भारतीय फिल्मों में चीनी किरदारों के चित्रण के सन्दर्भ में यह ज़रूरी फिल्म है.कुछ सालों पहले होंकोंग से एक पत्रकार भारत आये थे.वे भारतीय फिल्मों में चीनी किरदारों की नेगेटिव छवि की वजह जानना चाहते थे.तब इस फिल्म की जानकारी रहती तो मैंने ख़ुशी और गर्व से उन्हें बताया होता.1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच आई खटास ने सदियों के सांस्कृतिक संबंध को खट्टा कर दिया.’नील आकाशेर नीचे’ पर भी प्रतिबन्ध लगा दिया गया था.इधर चीन भारतीय फिल्मों के बाज़ार के तौर पर उभरा है.फ़िल्मकार ध्यान दें तो चीन हिंदी और अन्य भाषाई फिल्मों के लिए उर्वर कथाभूमि हो सकती है.वहां अनेक कहानिया बिखरी पड़ी हैं,जिनके सिरे भारत से जुड़े हैं.
इस फिल्म की रिलीज के बाद निर्माता हेमेंद्र मुखर्जी(गायक हेमंत कुमार) ने प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरु और राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को यह फिल्म दिल्ली में दिखाई थी.मृणाल सेन की यह दूसरी फिल्म थी.

Sunday, January 13, 2019

संडे नवजीवन : इस साल थोडा ही बदलेगा रुपहले परदे का परिदृश्य


इस साल थोडा ही बदलेगा रुपहले परदे का परिदृश्य 
-अजय ब्रह्मात्मज
 हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का पुराना टोटका है. जनवरी के पहले हफ्ते में फिल्में रिलीज नहीं होतीँ. माना जाता है कि पहले हफ्ते में रिलीज हुई फिल्में ज्यादातर फ्लॉप होती हैं. हालाँकि बाद के हफ्तों में भी फिल्म के हिट होने की कोई गारंटी नहीं रहती, फिर भी टोटका टोटका होता है. 2019 में जनवरी के दूसरे हफ्ते मेंउरी : द सर्जिकल स्ट्राइकऔरद एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टरजैसी फिल्मों की रिलीज से शुरुआत हो रही है. 2019 के दिसंबर तक के शुक्रवार को रिलीज हो रही फिल्मों की तारीखें आ चुकी हैं. सारे त्यौहार और राष्ट्रीय पर्व के हफ्ते रिजर्व हो गए हैं. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में फिल्मों की घोषणा के साथ उसके रिलीज की तारीख तय कर देने के सिस्टम कोरिवर्स प्लानिंगका नाम दिया जाता है. इसकी सफल शुरुआत रोहित शेट्टी ने की थी.

उरी : द सर्जिकल स्ट्राइक एक हद तक पॉलीटिकल फिल्म है. पहली 2016 में भारतीय सेना के सर्जिकल स्ट्राइक की घटना पर आधारित है, जिसमें एक सैन्य अधिकारी स्पष्ट शब्दों में कहता है, ‘हिंदुस्तान अब चुप नहीं बैठेगा. यह नया हिंदुस्तान है. यह घर में घुसेगा भी और मारेगा भी.गौर करें तो यह वर्तमान केंद्र सरकार के राष्ट्रवाद की चासनी में लिपटा संवाद है, जिसमें न्यू इंडिया की आक्रामक भाषा है, इस संवाद पर सिनेमाघरों में तालियां जरूर बजेगी, जनवरी में ही कंगना रनोट कीमणिकर्णिका  द क्वीन आफ झांसीरिलीज होगी. महारानी लक्ष्मी बाई के शौर्य पर आधारित इस फिल्म का लेखन ‘बाहुबली’ के लेखक विजयेन्द्र प्रसाद ने किया है.मूल निर्देशक कृष के छोड़ने के बाद कंगना रनोट ने निर्देशन की कमान संभाली तो सोनू सूद ने फिल्म छो दी.कुछ और भी तब्दीलियाँ हुईं.

2019 में रिलीज हो रही फिल्मों में खानत्रयी (आमिर, शाह रुख और सलमान) में से केवल सलमान खान की फिल्मभारत’ 5 जून को रिलीज होगी. बाकी दोनों खान आमिर और शाह रुख की कोई फिल्म 2019 में नहीं आएगी. आमिर ने फिल्मों से अस्थाई सन्यास लिया है और शाह रुख अभी राकेश शर्मा के जीवन पर आधारित फिल्म की शूटिंग शुरू करेंगे. पिछले साल सलमान खान कीरेस 3’ आमिर खान कीठग्स ऑफ हिंदोस्तानऔर शाह रुख खान कीजीरोअपेक्षा के मुताबिक कारोबार नहीं कर सकी. तीनों फिल्मों के साधारण कारोबार ने कुछ फिल्मी पंडितों को खान की श्रद्धांजलि लिखने का मौका दे दिया. हड़बड़ी में भविष्यवाणियां कर दी गईं कि खान का दौर खत्म हुआ. हिंदी फिल्मों में स्टारडम के प्रभाव और फिल्मों के कारोबार के जानकार ताकीद कर सकते हैं कि इन निष्कर्षों में कितनी सच्चाई है? जिन उदीयमान सितारों पर भरोसा जताया जा रहा है, उन्हें अपनी आगामी फिल्मों से साबित करना है. ऐसा नहीं कहा जा सकता कि उन पर बॉक्स ऑफिस और दर्शकों का अभी से भरोसा हो गया है. हिंदी फिल्म स्टार प्रेरित और प्रभावित होती है. किसी भी एक्टर के स्टारडम से फिल्मों की ओपनिंग निश्चित होती है. तात्पर्य कि रिलीज के पहले से दर्शकों की जिज्ञासा बनी रहती है. फिल्मों के एडवांस बुकिंग होती है.  फिल्म पहले दिन अच्छा प्रदर्शन करति है.दूसरे दिन से फिल्म का कारोबार क्वालिटी और दर्शकों की स्वीकृति से तय होता है. उदाहरण के लिएठग्स ऑफ हिंदोस्तानकी ओपनिंग इसी स्टारडम के दम पर 50 करोड़ से अधिक की थी, लेकिन फिल्म अच्छी नहीं होने की वजह से अगले ही दिन यह कलेक्शन आधा हो गया था.

2018 में आयुष्मान खुराना, विकी कौशल और राजकुमार राव की फिल्मों के 100 करोड़ी कारोबार से यह उम्मीद बंधी है कि तीनों 2019 के स्टार हैं. उनके साथ पंकज त्रिपाठी को भी नहीं भूलना चाहिए. मुख्य भूमिकाओं में तो नहीं लेकिन जोरदार सहयोगी भूमिकाओं में फिल्म की सफलता के लिए वे जरूरी बनते जा रहे हैं. उनकी मौलिकता ही उनकी प्रतिभा है. भाषा के नियंत्रण और खेल से अपने शब्दों में जादुई असर ले आते हैं. विकी को तो हम जनवरी में हीउरी…’ में देख लेंगे. बाद के महीनों में आयुष्मान खुराना और राजकुमार राव की फिल्में आएंगी. इन कलाकारों के साथ रणवीर सिंह,रणबीर कपूर, शाहिद कपूर, वरुण धवन, अर्जुन कपूर और सिद्धार्थ मल्होत्रा पर भी नजर रहेगी. इनमें से पहले तीन कोई भी चमत्कार कर सकते हैं. पत्र-पत्रिकाओं ,ऑनलाइन चैनल और टीवी की रणवीर और रणबीर की टक्कर और आगे-पीछे होने की होड़ में खास रूचि रहेगी. दोनों के पास दमदार फिल्में हैं. उनके निर्देशकों ने पिछली फिल्मों में खुद को साबित कर रखा है.
इस साल रणवीर सिंह और रणबीर कपूर की होड़ आमने-सामने की होगी.2018 में रणबीर कपूर की ‘संजू’ 300 करोड़ से अधिल का कारोबार कर उन्हें बढ़त दी है,लेकिन रणवी सिंह भी पीछे नहीं हैं.साल के शुरू में उनकी ‘पद्मावत’ ने अच्छा कारोबार किया उअर अभि उमकी ‘सिंबा’ का कलेक्शन बढ़ता ही जा रहा है.उदीयमान सितारों के अलावा रणबीर कपूर और रणवीर सिंह की भिडंत रोचक रहेगी.इनके साथ वरुण धवन और कार्तिक आर्यन पर भी नज़र रहेगी.2019 में रिलीज हो रही फिल्मों से उनका भविष्य तय होगा.इन चरों के पास पर्याप्त फ़िल्में हैं.

2019 में अनेक ऐतिहासिक और बायोपिक फिल्में आएंगी. करण जौहर कीतख़्त', अजय देवगन कीतानाजी’,चन्द्रप्रकाश द्विवेदी कीपृथ्वीराजरितिक रोशन कीसुपर 30’ के अलावा दीपिका पादुकोण,सोनम कपूर,जान्हवी कपूर और अनुष्का शर्मा की कुछ बायोपिक फिल्में भी होंगी. कंगना रनोट कीमणिकर्णिका…’ से ऐतिहासिक फिल्मों की शुरुआत हो रही है. वास्तव मेंबाहुबलीऔरपद्मावतीकी कामयाबी ने निर्माताओं को हिस्टोरिकल फिल्मों का नया विश्वास दिया है. दूसरे इन फिल्मों के जरिए राष्ट्रवाद के आड़ में भारतीय गर्व और गौरव को दिखाने और रेखांकित करने के साथ सत्तारूढ राजनीतिक पार्टी को खुश करने का बहाना भी निर्माताओं को मिल रहा है. उम्मीद की जानी चाहिए कि हिंदी फिल्मों में घुस आई राष्ट्रवाद की अतिजना सत्ता के संभावित बदलाव के साथ कम होगी.

हर साल की तरह इस साल भी फिल्म इंडस्ट्री के बेटे-बेटियों की लॉन्चिंग होगी. नेपोटिज्म के तमाम होहल्ले के बीच स्टार किड फिल्मों में आते रहेंगे. इस साल अनन्या पांडे, अहान शेट्टी, यशवर्धन, प्रनूतन और भाग्यश्री के बेटे का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है, सनी देओल के बेटे करण की फिल्म लगभग बन चुकी है. अभी ऐसा कोई संकेत नहीं है, लेकिन शाह रुख खान के बेटे आर्यन के फिल्म की घोषणा किसी सरप्राइज़ की तरह दर्शकों को हैरत में डाल सकती है.

2019 में वेब सीरीज दर्शकों का बड़ा आकर्षण होगा.सैक्रेड गेम्सकी अगली कड़ियों की शूटिंग चल रही है.मिर्जापुरऔररंगबाजकी नकल में अनेक वेब सीरीज की तैयारियां हो रही हैं. इन दिनों मुंबई में हर कलाकार और तकनीशियन किसी न किसी वेब सीरीज के साथ या तो जुड़ा है या उसकी तैयारी कर रहा है. यहां तक कि फिल्मों के लोकप्रिय स्टार भी वेब सीरीज करने के लिए आतुर दिख रहे हैं.
इस बीच एक बड़ी खबर आई है की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जीवन पर एक बायोपिक फिल्म बनेगी. इस फिल्म में विवेक ओबेरॉय अपने प्रिय नेता मोदी की भूमिका निभाएंगे.फिल्म गलियारे में कहा जा रहा है कि उनके नाम पर स्वयं नरेन्द्र मोदी ने मुहर लगायी है.ओमंग कुमार निर्देशित इस फिल्म को अं चुनाव के मौके पर रिलीज किया जायेगा कि फिल्मों के जरिये नरेन्द्र मोदी की झांकी पेश की जा सके.तीन महीने में बायोपिक बनाने और रिलीज करने की इस हड़बड़ी में हम अभि से अनुमान लगा सकते हैं कि फिल्म कितनी रोचक और विश्वसनीय होगी?


Tuesday, January 8, 2019

सिनेमालोक : चाहिए कंटेंट के साथ कामयाबी

सिनेमालोक
चाहिए कंटेंट के साथ कामयाबी
-अजय ब्रह्मात्मज
2018 में रिलीज हुई फिल्मों के आधार पर ट्रेन और निष्कर्ष उनकी बात करते हुए लगभग सभी समीक्षकों और विश्लेषको ने स्त्री अंधाधुंध और बधाई हो का उल्लेख करते हुए कहा कि दर्शक अब कंटेंट पसंद करने लगे हैं. संयोग ऐसा हुआ कि खानत्रयी(आमिर,शाह रुख और सलमान) की फिल्में अपेक्षा के मुताबिक शानदार कारोबार नहीं कर सकीं.बस,क्या था? खान से बेवजह परेशान विश्लेषकों ने बयान जारी करने के साथ फैसला सुना दिया कि खानों के दिन लद गए.27 सालों के सफल अडिग कैरियर में चंद फिल्मों की असफलता से उनके स्टारडम की चूलें नहीं हिलेंगी.हां, उन्हें अपनी उम्र के अनुसार भूमिकाएं चुनते समय दर्शकों की बदलती अभिरुचि का खयाल रखना होगा.उदीयमान सितारों राजकुमार राव,आयुष्मान खुराना और विकी कौशल को 2019 में रिलीज हो रही फिल्मों से साबित करना होगा कि वे ताज़ा स्टारडम के काबिल हैं.
इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि कंटेंट प्रधान छोटी फिल्मों का ज़िक्र करते समय हम उन फिल्मों के ही नाम गिनाते हैं,जिन्होंने 100 करोड़ या उसके आसपास का कारोबार किया.इसी लिहाज से 'स्त्री' और ' बधाई हो' उल्लेखनीय फिल्में हो गयी हैं.बेहतरीन होने के बावजूद हम 'अंधाधुन' का नाम उन दोनों के बाद ही ले रहे हैं.खुले दिल से हम भले ही स्वीकार न करें,लेकिन सच्चाई यही है कि कारोबार और कमाई ही हम सभी के लिए लोकप्रियता और श्रेष्ठता का प्रमाण है.अन्यथा 2018 की श्रेष्ठ फिल्मों की सूची में 'गली गुइयां' और 'तुम्बाड' शामिल रहती। दरअसल, कामयाबी के लिहे भी चेहरे चाहिए और 100 करोड़ का आंकड़ा.

दर्शकों की पसंद-नापसंद का कोई सामान्य नियम नही है.और न कोई ऐसा फार्मूला है कि ट्रेंड और कामयाबी मापी जा सके. पिछले साल की 13 सौ करोड़ी फिल्मों पर ही नज़र डालें तो हिस्टोरिकल,सोशल,कॉमेडी,एक्शन और हॉरर फिल्में दर्शकों को पसंद आईं। दर्शकों को तो साल के आझिरी हफ्ते में रिलीज 'सिंबा' भी पसंद आई,जिसमें कुछ भी मौलिक नहीं था.जिस कंटेंट और दर्शकों की बदलती पसंद की दुहाई दी जा रही है,वह 'सिंबा' में कहां थी? दर्शकों को नई और मौलिक कहानियां पसंद आती हैं,लेकिन उन्हें समयसिद्ध फार्मूला फिल्में भी पसंद आती हैं.कंटेंट नया हो या घिसा-पिटा... अगर मनोरंजन मिल रहा है दर्शक टूट पड़ते हैं.दर्शकों को अगर भनक भी लग जाये कि निर्माता-निर्देशक उन्हें बेवकूफ बना रहे हैं तो वे लोकप्रिय स्टारों की फिल्में भी ठुकरा देते हैं.हर साल कुछ स्थापित और लोकप्रिय स्टारों और निर्देशकों को दर्शकों की तरफ से अस्वीकृति का तमाचा लगता है.कई बार दर्शक अनजाने में बेहतरीन फिल्मों तक नहीं पहुंच पाते.पर्यापत प्रचार नहीं होने से दर्शक उनसे अनजान राह जाते हैं.
वास्तव में दर्शकों को कामयाब कंटेंट चाहिए.फिल्मों का कारोबार अच्छा होता है तो वे ललकते हैं.कुछ फिल्में कलेक्शन और कारोबार की वजह दर्शकों की पसंद बन जाती हैं. सच कहें तो दर्शक और समीक्षक बेहतरीन फिल्मों के विवेक से वंचित हैं.फिलहाल बाजार हावी है.वह बहुत कुछ निर्धारित कर रहा है।