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Wednesday, July 18, 2018

सिनेमालोक : कहाँ गए सिनेमाघर?


सिनेमालोक
कहाँ गए सिनेमाघर?
-अजय ब्रह्मात्मज  

मधुबनी के जिस होटल में ठहरा हूं,उसके मैनेजर से मैंने पूछा कि क्या उन्होंने संजू देखी है? उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया,'जी देखी है।पिछले हफ्ते जमशेदपुर गया था तो वहां प्रकाश झा के नए मल्टीप्लेक्स में मैंने राजकुमार हिरानी की 'संजू' देखी।' इस सामान्य से जवाब से मैं थोड़ा हैरान हुआ। मेरा अगला सवाल था, 'क्यों,मधुबनी में देखने का मौका नहीं मिला या यहां यह फ़िल्म नहीं लगी है?' उनका जवाब था, 'फिल्म लगने के लिए सिनेमाघर चाहिए। मधुबनी का आखिरी सिनेमाघर शंकर टॉकीज अभी पिछले दिनों बंद हो गया। कभी इस शहर में तीन सिनेमाघर थे। सभी में भीड़ उमड़ती थी। अभी तीनों सिनेमाघर बंद पड़े हैं।सुना है जल्दी ही एक मल्टीप्लेक्स बनने वाला है।

मधुबनी शहर में चार मॉल आ गए हैं। इनमें पॉपुलर ब्रांड के कपड़े और दूसरे उपभोक्ता सामान मिलते हैं। मैंने शहर के कुछ युवकों से बात की कि आखिर वे फिल्में कैसे देखते हैं? उनसे पता चला कि शहर के सिनेमा प्रेमियों का सहारा स्मार्टफोन है। कोई भी फिल्म रिलीज हो। वह गैरकानूनी तरीके से बाजार में आ ही जाती है। चंद रुपयों में वह मोबाइल में लोड कर ली जाती है और फिर दोस्तों के बीच बंटती है। जिन शहरों और कस्बों में सिनेमाघर नहीं हैं,वहां यही तरीका अपनाया जा रहा है। थिएटर सम्पन्न शहरों के दर्शकों की तरह सिनेमाघरों से वंचित शहरों के दर्शकों भी पहले हफ्ते में ही फ़िल्म देखने का तरीका खोज चुके हैं। क्या वितरक और प्रदर्शक इस तरफ ध्यान दे रहे हैं? निर्माताओं की यह चिंता रहती है कि वे कैसे देश के अधिकांश दर्शकों तक पहुंचें? उन्हें मालूम तो है कि देश उनकी फिल्में देख रहा है,लेकिन पैसे उन तक नहीं पहुंच रहे हैं।

छोटे शहरों और कस्बों से आये 40 से अधिक उम्र के पाठक बता सकते हैं कि उनके बचपन को चलती-फिरती तस्वीरों से मुग्ध करने के ठिकानों पर अब कोई चहल-पहल नहीं है। ना तो समाजशास्त्रियों और ना फ़िल्म व्यवसाय से जुड़े व्यक्तियों ने कम और खत्म होते सिनेमाघरों के कारणों का अध्ययन किया और ना कहीं यह चिंता है कि देश के तमाम दर्शकों तक फिल्में कैसे पहुंचे? लगातार आंकड़े आ रहे हैं कि जिस तेजी से सिनेमाघर बैंड हो रहे हैं,उसी रफ्तार से मल्टीप्लेक्स नहीं खुल रहे हैं। पहले फिल्मों देखने के लिए आसपास के कस्बों और शहरों की यात्रा होती थी। कोई फ़िल्म लोकप्रिय हो जाती थी तो पूरा परिवार फिल्में देखने जय करता था।

 मधुबनी शहर में ही 'नदिया के पार' देखने के लिए आसपास के गांवों से परिवार बैलगाड़ियों में लद कर आये थे। आठवें दशक के आरंभ में फारबिसगंज के वार्षिक मेले ऐसे पारिवारिक जत्थों को मैंने टेंट सिनेमा में फिल्में देखते देखा है। अभी दर्शकों का प्रोफाइल और मिजाज बदल गया है। पहले वीडियो और फिर सीडी-डीवीडी ने दर्शकों को सुविधा दी कि वे बगैर सिनेमाघर गए फिल्मों का आनद टीवी या कंप्यूटर पर  उठा सकते हैं। उसके बाद स्मार्ट फोन और पेन ड्राइव व यूएसबी ने ऐसी सहूलियत दी कि रही-सही उम्मीद भी खत्म हो गयी। सिनेमाघरों के दर्शक कम होने और सिनेमाघर खत्म होने की प्रक्रिया लगभग साथ चली। 

फिलहाल ज्यादातर सिंगल स्क्रीन बंद हो चुके हैं या बंद होने की कगार पर हैं। उनकी जगह भरने के लिए मल्टीप्लेक्स का विकल्प लागत,प्रचलन और मुनाफे के लिहाज से कस्बों के लिए मुनासिब नहीं है। एक रास्ता छोटे सिंगल स्क्रीन का है। उस तरफ उद्यमियों का ध्यान नहीं है। बीच में सुगबुगाहट हुई थी। कुछ नए वेंचर उभर रहे थे कि वर्तमान सरकार के आर्थिक फैसलों और अधिकतम कर बटोरने की मंशा ने योजनाओं का बंटाधार कर दिया। फ़िल्म इंडस्ट्री इस साल लाभ दिखा रही है। उसी अनुपात में सरकार भी फायदे में रहेगी,लेकिन मनोरंजन कर के रूप में वसूली गयी रकम भी सिनेमा के वितरण और प्रदर्शन को दर्शकों के अनुरूप करने का प्रयास नहीं दिखता। नतीजतन सिनेमाघर निरंतर गायब होते जा रहे हैं।


Friday, July 13, 2018

फिल्म समीक्षा : सूरमा


फिल्म समीक्षा
सूरमा
प्रेरक ज़िन्दगी और फिल्म
-अजय ब्रह्मात्मज

सूरमाअर्जुन अवार्ड से सम्मानित हॉकी खिलाडी संदीप सिंह के जीवन पर आधारित शाद अली निर्देशित फिल्म है. इसमें दिलजीत सिंह ने संदीप सिंह की भावपूर्ण और ओजपूर्ण भूमिका निभाई है. संदीप सिंह हॉकी के नामी खिलाड़ी रहे हैं.यह फिल्म उनकी जिंदगी और खेत न्याय उतार चढ़ाव को पूरी संजीदगी के साथ दिखाती हैं खिलाड़ियों पर बन रहे बायोपिक का भी धीरे-धीरे एक फार्मूला बनता जा रहा है. यह फिल्म भी उस फार्मूले से अंशतः प्रभावित है.

हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के शाहाबाद गांव के गुरुचरण सिंह औरदलजीत कौर के छोटे बेटे संदीप सिंह स्थानीय कोच से आतंकित होकर हॉकी खेलना छोड़ देता है. उसका भाई बिक्रमजीत हॉकी का अभ्यास जारी रखता है और राष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी बनता है.इस बीच संदीप सिंह अपने ताऊ के खेतों में चिड़िया भगाने के लिए हॉकी स्टिक और गेंद का इस्तेमाल करता है अनजाने में वह बहुत साधा हुआ फ्लिकर बन जाता है.  पड़ोस की हरप्रीत उसे बहुत पसंद है. वह भी हॉकी खेलती है. संदीप उसके खेल से प्रभावित होकर और उसे लुभाने के लिए हॉकी खेलना शुरू करता है.

शुरू में हॉकी की तरफ आकर्षित होने के संदीप सिंह के पास दो कार है एक तो वह प्रीत की नजरों में आना चाहता है और दूसरे इंडिया टीम में भाई के ना चुने जाने पर वह  हॉकी टीम में शामिल होने की कोशिश करता है.कठिन अभ्यास से वह अपनी टीम का अच्छा डिफेंडर और ड्रैग फ्लिकर बन जाता है. राष्ट्रीय टीम में उसका चुनाव होता है. अपनी टीम के साथ जर्मनी से आने के लिए वह ट्रेन से दिल्ली जा रहा होता है कि अचानक एक गोली चलती है हंसता खेलता संदीप सिंह जख्मी हो जाता है.अस्पताल पहुंचने पर मालूम होता है कि वह कमर के नीचे लाचार हो चुका है वह अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सकता हॉकी खेलना तो दूर की बात है.

चलो यहां से नाटकीय मोड़ लेती है सूखे संदीप सिंह की कहानी सबको मालूम है और सभी जानते हैं कि वह अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति से ना केवल पैरों पर खड़े हुए,बल्कि फिर से नेशनल टीम में चुने गए उन्होंने टीम का नेतृत्व किया वर्ल्ड कप जीत कर भारत लौटे.सूरमाइसी जीवट के  खिलाड़ी संदीप सिंह के जोश और इरादे का खूबसूरत चित्रण करती है. फिल्म में अति भावुकता कहीं-कहीं खटकती है,लेकिन भारतीय दर्शकों को प्रेम और परिवार की ऐसी भावुकता पसंद आती है. फिल्म बहुत अच्छे तरीके से दिखाती है कि किसी एक के ऊपर मुसीबत आने पर कैसे पूरा परिवार उसकी मदद में खड़ा होता है.सूरमा' टिपिकल इंडियन फैमिली फिल्म भी है.

संदीप सिंह का किरदार दिलजीत दोसांझ ने निभाया है. उनकी प्रेरणा और प्रेमिका हरप्रीत की भूमिका में तापसी पन्नू है. पंजाबी परिवेश के दोनों कलाकार पंजाबी चरित्रों में आसानी से घुल गए हैं. दिलजीत की मासूमियत संदीप के किरदार को मजबूत करती है. इस फिल्म के लिए उन्होंने हॉकी का भी अभ्यास किया है इसलिए कभी किरदार से बाहर जाते नहीं दिखाई पड़ते हैं. फिल्म के नाटकीय और घटनापूर्ण दृश्यों में और एकाग्रता देखते ही बनती है. दिलजीत दोसांझ को अभी तक फिल्मी भूमिकाओं के लिए न तो पगड़ी खोलनी पड़ी है और ना बाल-दाढ़ी छोटे करने पड़े हैं.
तापसी पन्नू सरदार है इस परिवेश के लड़कियों को वह विश्वसनीय तरीके से निभाती हैं. हरप्रीत के किरदार में उन्होंने आज साज-संवार का  मोहनी किया है. हॉकी खेलने के दृश्यों में वह जंची हैं.बड़े भाई विक्रमजीत की भूमिका में अंगद बेदी दिल जीत लेते हैं. उन्होंने पूरी संजीदगी से इसे निभाया है. लेखक-निर्देशक की तरफ से उन्हें कुछ अच्छे दृश्य भी मिले हैं. छोटी भूमिका में सतीश कौशिक एक साथ भावुक और दृढ दिखे हैं.तारों में आए कलाकार भी फिल्में जरूरत के मुताबिक उसने को जोड़ते हैं.सूरमा' में दो कोच हैं.दोनों का किरदार प्रहसनकारी.है.उनके संवाद व्यवहार फिल्में छिटपुट हंसी बिखेरते हैं.

सूरमाप्रेरक फिल्म है यह देखी जानी चाहिए.एक नई तरह की कहानी कहने में शाद अली सफल रहे हैं.
अवधि - 131 मिनट
.**** चार स्टार


Tuesday, July 10, 2018

सिनेमालोक : बेहतरीन प्रयास है ‘सेक्रेड गेम्स’


सिनेमालोक

बेहतरीन प्रयास हैसेक्रेड गेम्स

-अजय ब्रह्मात्मज
अश्वत्थामा,हलाहल,अतापी वतापी,ब्रह्मास्त्र सरम,प्रेतकल्प,रूद्र और ययाति… यह नेटफ्लिक्स पर आरंभ हुए सेक्रेड गेम्स के 8 अध्याय हैं. इन्हें हम 8 एपिसोड के रूप मे देखेंगे.सेक्रेड गेम्स’  विक्रम चंद्रा का उपन्यास है. यह 2006 में प्रकाशित हुआ था. 900 से अधिक पृष्ठों के इस उपन्यास को वरुण ग्रोवर,वसंत नाथ और स्मिता सिंह ने वेब सीरीज के रूप में ढाला है. रूपांतरण की प्रक्रिया लंबी और श्रमसाध्य रही. तीनों लेखकों ने वेब सीरीज के लिए उचित प्रसंगों,किरदारों और विवरणों में काट-छांट की है. कुछ घटाया है तो कुछ जोड़ा भी है. दरअसल, अभिव्यक्ति के दो भिन्न माध्यम होने की वजह से यह रूपांतरण जरूरी हो जाता है. उपन्यास पढ़ते वक्त हम लेखक के विवरणों के आधार पर दृश्य और किरदारों की कल्पना करते हैं. लेखक शब्दों के माध्यम से स्थान,माहौल और चरित्रों का चित्रण करता है. वह पाठक की कल्पना को उड़ान देता है. लेखक और पाठक के बीच कोई तीसरा नहीं होता. इससे भिन्न दृश्य माध्यम में उस उपन्यास को एक लेखक स्क्रिप्ट में बदलता है और फिर निर्देशक अपनी तकनीकी टीम की मदद से स्थिति एवं मनःस्थिति को दृश्य और संवाद में बदलता है. दृश्य माध्यम दर्शकों की कल्पना कतर देता है. दर्शक पर्दे पर सब कुछ देख रहा होता है और संवादों से चरित्रों का व्यवहार समझ रहा होता है.

साहित्य और सिनेमा के जटिल रिश्ते पर बहुत कुछ लिखा गया है. प्रायः सुनाई पड़ता है कि लेखक निर्देशक के काम से असंतुष्ट रहे. कहा जाता है कि दृश्य माध्यम में साहित्य की आत्मा को खो जाती है.सेक्रेड गेम्सउपन्यास पढ़ चुके पाठकों को वेब सीरीज देखते हुए ऐसी दिक्कत हो सकती है. इसके लेखकों और निर्देशकों ने उपयोगिता और सुविधा के अनुसार फेरबदल किए हैं. इस फेरबदल में विक्रम चंद्रा की सहमति रही है, लेकिन पाठक असहमत हो सकते हैं. किसी भी रूपांतरण में माध्यमों की भिन्नता की वजह से स्वभाविक रुप स कुछ चीजें खो या जुड़ जाती हैं. पाठक और दर्शकों के लिए बेहतर तो यही होता है कि हर माध्यम का अलग आनंद लें, क्योंकि रसास्वादन की प्रक्रिया माध्यमों के हिसाब से बदल जाती है. ;सेक्रेड गेम्स; उपन्यास औरसेक्रेड गेम्सवेब सीरीज दो भिन्न सृजनात्मक कृतियां हैं. उपन्यास विक्रम चंद्रा ने लिखा है, जबकि वेब सीरीज के सृजन में लेखकों और निर्देशकों के साथ पूरी तकनीकी टीम रही है. वेब सीरीज उन सभी का सम्मिलित प्रयास है.

विक्रमादित्य मोटवानी और अनुराग कश्यप अलग शैली और सोच के निर्देशक हैं. दोनों के युगल प्रयास और सामंजस्य का खूबसूरत उदाहरण हैसेक्रेड गेम्स. इसके दो मुख्य किरदार हैं - गणेश गायतोंडे और सरताज सिंह. सूचना के मुताबिक गणेश गायतोंडे के ट्रैक का निर्देशन अनुराग कश्यप ने किया है. वह ऐसी कहानियों को पर्दे पर लाने में माहिर हैं. हिंसा,अपराध और अंडरवर्ल्ड की काली दुनिया रचने में उनका मन रमता है. समाज के वंचित और वर्जित किरदार उन्हें प्रिय रहे हैं. इस सीरीज में उन्होंने जी गैंग के सरगना गणेश गायतोंडे की मानसिकता,चिंता और महत्वकांक्षा पर रोशनी डाली है. वह खतरनाक अपराधी है. दूसरी तरफ ईमानदार पुलिस अधिकारी सरताज सिंह है. गणेश गाय गायतोंडे ने पहले ही एपिसोड में सरताज सिंह को सूचना देने के साथ चुनौती भी दे दी है. पहले तो वह अपने लौटने की सूचना देता है, सरताज सिंह जब तक उसके पास पहुंचे गणेश गायतोंडे खुद को ही गोली मार देता है. मरने से पहले वह सरताज सिंह को बता चुका है कि 25 दिनों में बचा सकते हो तो मुंबई को बचा लो. उसकी यह चेतावनीसेक्रेड गेम्सका रोचक और रोमांचक ड्रामा रचती ह

नेटफ्लिक्स पर ओरिजिनल इंडियन कंटेंट के तौर पर सेक्रेड गेम्स का प्रसारण एक नई शुरुआत है. पहली बार किसी भारतीय शो को एक साथ 100 से अधिक देशों के दर्शक मिले हैं. यह एक बड़ी उपलब्धि है. अभी तक हम दुनिया के शो देखते-सराहते रहे हैं. अब दुनिया भी भारतीय कंटेंट देखेगी. दृश्य माध्यम में काम कर रहे हैं लेखकों, निर्देशकों और कलाकारों को बड़ा अवसर मिला है.फिलहालसेक्रेड गेम्सदेखें और फिर उसकी खूबियों और खामियों पर चर्चा करें.

Wednesday, July 4, 2018

मर्द की भाषा औरतें क्यों नहीं बोल सकती? -रिचा चड्ढा


फिल्म लांड्री

मर्द की भाषा औरतें क्यों नहीं बोल सकती? -रिचा चड्ढा 

-अजय ब्रह्मात्मज 

आतंकवादियों ने कश्मीर के पत्रकार शुजात बुखारी पर कातिलाना हमला किया और उनकी हत्या कर दी.मीडिया और राजनीतिक हलके कि लिए यह बड़ी खबर थी.सभी महत्वपूर्ण व्यक्तियों ने आतंकवादियों के इस कृत्य की निंदा की. ऐसे मौकों पर फिल्म बिरादरी खामोश रहती है.राजनीतिक समझ और पक्षधरता की कमी से उनकी प्रतिक्रियाएं नहीं आती हैं.रिचा चड्ढा अपवाद हैं.वह चुप नहीं रहतीं.उस दिन उन्होंने ट्वीट किया,’कायरों ने शुजात बुखारी की हत्या कर दी.आप अपनी ताकत नहीं दिखा रहे हो.आप बता रहे हो कि आप शांति नहीं चाहते.पत्रकारिता खतरनाक काम नहीं होना चाहिए.’यह ताज़ा प्रसंग है.रिचा ज्वलंत मुद्दों पर अपना पक्ष रखने से नहीं हिचकतीं.फिल्म इंडस्ट्री का मामला हो या व्यापक समाज का...हर ज्वलंत मुद्दे पर रिचा मुखर रहती हैं.पिछले दिनों उनसे मुलाक़ात हुई तो मेरी जिज्ञासा उनके १० साल के करियर को लेकर थी.इस साल नवम्बर में उन्हें फिल्मों में आये १० साल हो जायेंगे.उनकी पहली फिल्म ‘ओये लकी लकी ओये’ २८ नवम्बर २०१८ को रिलीज हुई थी.

रिचा नहीं मानती कि २०१८ में उन्हें १० साल हो जायेंगे.उनका तर्क है कि भले ही ‘ओये लकी लकी ओये’ २००८ में आई,लेकिन उसके बाद ३-४ सालों का लम्बा गैप रहा.वह कहती हैं,’मेरी असली शुरुआत तो ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’ से २०१२ हुई.पहली फिल्म कॉलेज से निकलते ही मिल गयी थी.मैंने उसे मस्ती की तरह लिया था.मन में था कि मनाली जाने को मिलेगा.वहां धर्मेन्द्र के भतीजे से मुलाक़ात होगी.वही हुआ भी.पहचान और सराहना के बावजूद मुझे कोई फिल्म नहीं मिली.मैं मुंबई आ गयी थी.कोई काम नहीं था. मैंने बीच के उन सालोँ में मुंबई के सारे वर्कशॉप किये। वॉइस और मूवमेंट की,बेहतर ऑडिशन देने की,सीन पर कैसे काम करना हैसब समझी.मैंने खूब अभ्यास किया. दो बार पॉन्डिचेरी में आदिशक्ति जाकर वॉइस ट्रेनिंग ली। कह सकते हैं कि मैंने एक्टिंग की तैयारी किसी एथिलीट की तरह की थी। उस तैयारी का तत्काल कोई लाभ नहीं था। हाँ.एक बात हुई कि मैं अनुराग कश्यप कि निगाह में आ गयी थी.उन्हें लगा कि रिचा को बुला कर देखा जा सकता है.बाद में ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’ का रोल मिल गया.वह इसलिए भी मिला कि २-३ अभिनेत्रियों ने मना कर दिया था.उस फिल्म में उम्रदराज और बूढी होना था.उसके लिए कोई तैयार नहीं था.’

कैसे गुजरे बीच के साल? सफल होने के बाद हर कलाकार संघर्ष या तैयारी के दिनों को स्मृतिदंश के साथ याद करता है.बीती घटनाओं में वर्तमान के हिसाब से कुछ जोड़-घटा देता है....रिचा के लिए मुंबई के आरंभिक दिनों के अनुभव झटकेदार रहे. शहर अलग था,जीवन शैली बदल गयी,सुविधाएँ दिल्ली में छूट गयीं और मुंबई अपने तरीके से आजमाती रही.रिचा बताती हैं,’ मुंबई आते समय क्या मालूम था कि यहां स्ट्रगल होगा? ऑटो लेना पड़ेगा, रूम शेयर करना पड़ेगा. शुरू में मेरे लिए तो झटका ही रहा. सबसे पहले दिक्कत तो यही लगी थी कि यहाँ घरों में बालकनी क्यों नहीं हैं? हर खिड़की पर ग्रिल? यहां कोई पौधा उगाता ही नहीं है. आसपास में स्कूल दिखता है, लेकिन उनके पास खेल के मैदान नहीं थे. पता चला कि एक बिल्डिंग में ही पूरा स्कूल चलता है. शुरू में मुंबई खतरनाक जगह लग रही थी.’ और फिर,’ 22 की उम्र में इतनी मैच्युरिटी नहीं होती कि तैयारी करें,कुछ सीखें। मुझे कोई खास उम्मीद नहीं थी। मैं नर्वस और घबराई रहती थी कि मैंने एनडीटीवी की मिली नौकरी छोड़ दी। अब यहाँ दो लड़कियों के साथ कमरा शेयर करते हुए रोज़ ऑडिशन देने जा रही हूँ। ऑडिशन में फेयरनेस क्रीम का ऐड मना कर रही हूँ. क्या मैं पागल हूँ? मेरे उसूल और मेरे आदर्श आड़े आ रहे थे। इतना सब कुछ पढ़ने और जानने के बाद कैसे उसे चुन लूं जो मेरे लिए ही हानिकारक है।कैसे मान लूं कि गोरा होना ही खूबसूरती है। फिर मुझे कुछ कास्टिंग डायरेक्टर मिलते थे।  वे कहते थे कि तुम ज़्यादा इंटेलेक्टुअल हो।  जरा घूमने जाओ। लोगों से मिला-जुला करो. मुझे खुद को पेश करना नहीं आता था. ऑडिशन में शार्ट ड्रेस पहन कर चली जाती थी।  मुझे नहीं पता था कि कपडे रात और दिन के हिसाब से अलग-अलग होते हैं। फिल्म इंडस्ट्री के बच्चों को यह सब अच्छी तरह पता होता है।

पिछले १० साल के अनुभवों से रिचा चड्ढा ने इतना तो समझ लिया है कि फिल्म इंडस्ट्री  भी सोसाइटी की तरह वर्गों में बंटी हुई है.क्लासेज हैं.फिल्म इंडस्ट्री की लड़कियों के लिए थोड़ी आसानी है तो बाहर की लड़कियों के लिए मुश्किलें ज्यादा है.फिर भी यह सच्चाई है कि प्रतिभा और धैर्य हो तो देर-सवेर फ़िल्में मिलती हैं.रिचा अपने अनुभवों के आधार पर उदाहरण देकर बताती हैं,’ फिल्म इंडस्ट्री के नहीं होने पर वक़्त लगता है. जिस काम में इंडस्ट्री की लड़कियों को साल लगते हैं, उस काम में हमें १० साल लग सकते हैं और यह सच है इसे कोई झुठला नहीं सकता. दूसरी बात याद रखने की है कि अगर टैलेंट है तो काम जरूर मिल जाएगा. सफलता भी मिलेगी. हां, थोड़ा वक्त लग सकता है. लगे रहना जरूरी है. आज राजकुमार राव को देख लें. पहले मनोज बाजपेयी थे. मैं अपना भी उदाहरण दे सकती हूं. स्वरा भास्कर हैं. सुपरस्टारडम अलग चीज है उसका कोई भरोसा नहीं है. मेहनत और धैर्य है तो आप जरूर ऊपर जाएंगे. समाज की तरह यहाँ भी क्लासेज हैं.कुछ लोगों को अधिक सुविधाएं मिलती हैं. इसे कैसे तोड़ेंगे या हम तोड़ नहीं पाएंगे? इसे तोड़ेंगे विनीत कुमार सिंह जैसे लोग. विनीत फिल्म इंडस्ट्री में लगातार रिजेक्शन-रिजेक्शन झेलता रहा. उसे हर तरह के सपने दिखाए गए. उनमें उसे धोखे मिले. फिर एक हद तक पहुंच कर उसे आखिरी मौका मिला. उसने मौके का पूरा इस्तेमाल किया. आज वह एक फिल्म का हीरो बन चुका है और उसके दूसरी फिल्में आ रही हैं. वह लंबा रास्ता है,लेकिन यही एक रास्ता है. मैं अपने बारे में बस क्या बताऊं? मेरी कहानी फिर कभी.’

रिचा ट्विटर,इन्सटाग्राम या किसी और प्लेटफार्म पर जब अपनी बात रखती हैं तो उन्हें बेहिसाब ट्रोल किया जाता है.लोगों को उनकी बातें नहीं पचतीं.उन्हें फेमिनिस्ट और बडबोला कहा जाता है.रिचा पहले ऐसी प्रतिक्रियाओं से विचलित हो जाती थीं.अब उन्होंने इनसे डील करना सीख लिया है.वह अपना तरीका बताती हैं,’ मेरी फिल्मों से ज्यादा मेरे पहनावे,मेरे रंग-ढंग और मेरे पोस्ट पर बातें होती हैं. मेरे बाहरी आवरण पर ज्यादा चर्चा होती है. लोग अच्छा भी लिखते हैं, बुरा भी लिखते हैं, उन्हें मैं अपने हिसाब से छांटती रहती हूं. मुझे तो लगता है कि एक हद तक ही लोगों के लिखे-बोले पर ध्यान देना चाहिए. उसके बाद देखना चाहिए कि कौन किस एजेंडे से काम कर रहा है?’ वह आगे कहती हैं,’आजकल तो फोटोग्राफर और पत्रकार पीछा करते हैं. उन्हें हमारी गाड़ी का नंबर याद रहता है. कहां गई? किससे मिली? कब लौटी? उन्हें सब जानकारी रहती है और फिर टिप्पणी भी करते रहते हैं कि काश उसने यह नहीं पहना होता... या काश उसने ऐसा पहना होता? मेरा कहना है कि अगर इतनी चिंता है तो क्यों नहीं सफेद जूते लाकर मेरे घर में रख देते है? क्या हम इसलिए एक्टर बने हैं कि हम तुम्हारी बात सुनकर कपड़े पहनें? फैशन एक्सपर्ट  सलाह तो देते हैं,लेकिन मैंने पाया है कि वे क्लोनिंग करने लगते हैं. हमारे यहां अभिनेत्रियों के व्यक्तिगत स्टाइलिस्ट नहीं हैं. स्टाइलिस्ट सलाह देते हैं कि दीपिका ने ऐसा पहना था, प्रियंका ने ऐसा पहना था, तुम भी ऐसा पहनो. मेरा कहना है कि भाई मुझ पर जो फबता है, वैसी चीजें मुझे बताओ. अगर कोई मेरी पर्सनालिटी के हिसाब से सलाह दे तो मैं जरूर मानूंगी. फैशन के अंदर भी क्लासेस बने हुए हैं. कई बार ऐसा होता है कि लोग ताने मारते हैं. एक बार मैं कुछ कपड़े एडजस्ट कर रही थी तो किसी ने तस्वीर खींचकर छाप दी. अब तो आंखों की शर्म भी नहीं रह गई है. सच कहती हूं अब मैं उन पर ध्यान भी नहीं देती. हां,मेरी फिल्मों या मेरे पोस्ट पर कोई टिप्पणी करें तो ठीक है. मैं उसका जवाब दूंगी. मैं इधर देख रही हूं कि लोग लिखने में निंदा जरूर करते हैं...चुगली करते हैं.’

लगे हाथ मैं पूछता हूँ कि ‘वीरे दी वेडिंग’ पर चल रही बहस पर रिचा कि क्या राइ है? वह झट से जवाब देती हैं,’ अभी आखिरी कुछ साल बचे हैं जब आप फेमिनिस्ट, फेमिनिस्ट सुन रहे हैं. बाद में यह नॉर्मल फिल्म हो जाएगी. दर्शक भी उन्हें सामान्य फिल्मों की तरह ट्रीट करने लगेंगे. ‘वीरे दी वेडिंग’ और ‘राजी’ आम फिल्में हैं. हम.ने तो कई साल पहले ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ की थी. जो लोग कह रहे हैं कि इन फिल्मों में मर्द की जुबान औरतें बोल रही हैं,उन्हें यह समझना चाहिए कि जब औरतें वे सारे काम कर रही हैं जो मर्द करते हैं तो फिर गालियां देने में भी क्या दिक्कत है? मर्द की भाषा औरतें क्यों नहीं बोल सकतीं? दरअसल, ऐसे सवाल जो लोग पूछते हैं उनके सवालों से ही उनकी मानसिकता की झलक मिल जाती है, ऐसे लोग औरतों में ही मर्यादा खोजते हैं, बाकी वह खुद कुछ भी करते रहें. उनके लिए समाज में सेक्स होता नहीं है. इस देश में खजुराहो और कामसूत्र नहीं है. उनके लिए औरत मां, बहन, बेटी ही होती है. मैं तो कहूंगी कि उनकी चड्ढी का रंग देख लीजिए.कहीं खाकी चड्ढी तो नहीं पहन रखी?’

हालाँकि रिचा मानती हैं कि २०२२ में उनके करियर के १० साल होंगे और तब वह अपनी फिल्मों और उपलब्धियों का आकलन करेंगी,फिर भी आदतन अभी तक के करियर के बारे में पूछने पर वह जवाब से नहीं मुकरती हैं.कम शब्दों में वह अपनी यात्रा के बारे में बताती हैं.’ ‘ओए लकी लकी ओये’ में तो मैं मजे कर रही थी. उस फिल्म में बस इंस्टिंक्ट पर खेला है. उसके बाद जो दो साल की तैयारी की थी, उससे मुझे बहुत मदद मिली और वह ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में दिखा. अगर वैसी ट्रेनिंग नहीं की होती तो शायद में देसी औरत का रोल नहीं कर पाती. मोढ़े पर बैठने का, राख से बर्तन धोने का.... मेरे अपने एक्सपीरियंस और इमोशनल रेफरेंस में ऐसी कोई बात नहीं थी. उस उम्र में मातृ भाव भी नहीं था मेरे अंदर. उसके लिए मेहनत करनी पड़ी. ‘मसान’ में मैंने बहुत मेहनत की. ‘मसान’ का रोल बहुत मुश्किल था. लोगों को लगता है कि उस फिल्म में एक्टिंग नहीं की है. चुप रहना और आंखों से एक्टिंग करना आसान नहीं है. लड़के के पिता के घर जाकर डांट खाने वाला सीन बहुत पसंद आया था लोगों को. उस सीन को नीरज ने कई तरीके से शूट किया था. फिल्म में जो रखा है, वह भी बहुत अच्छा है. ‘मसान’ में अंदरूनी शक्ति से मुझे खुद को संभाल कर रखना था. ‘इनसाइड एज’ में भी मैंने बहुत मेहनत की थी. वह कुछ लोगों को अच्छा लगा, कुछ लोग को नहीं लगा. मेरे मेरे लिए नया मीडियम था वेब सेरिज का. मुझे मजा आया. मैं खुद बहुत बड़ी स्टार नहीं हूं, इसलिए उस एक्सपीरियंस को जीना मेरे लिए एक्टिंग ही थी. उसे करते समय मुझे ख्याल था कि क्या कभी शाह रुख खान जैसे स्टार को भी असुरक्षा हो सकती है. अभी मेरी एक और फिल्म आने वाली है ‘लव सोनिया’. उसके लिए मैंने एक अलग लैंग्वेज और एक अलग पर्सनालिटी तैयार की है. उसका ग्राफ परिपूर्ण है. हाल ही में अनुभव सिन्हा की फिल्म ‘अभी तो पार्टी शुरू हुई है’ पूरी की है. उसमें मजेदार किरदार है. कॉमेडी करने को नहीं मिलती है ना! उसमें बहुत खुली निर्बंध कॉमेडी है. अच्छे दिल की बेवकूफ से लड़की बनी हूं.’

रिचा इन दिंनों सामाजिक और चैरिटी कामों पर भी ध्यान डे रही हैं.फिल्मों को लेकर वह अभूत चूजी हो गयी हैं.वह खुल को एक्टर कहलाना ही पसंद करती हैं.अपनी बातचीत में वह बार-बार कहती हैं,’मैं स्टारडम कि होड़ में नहीं हूँ.’