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Thursday, October 30, 2014

दरअसल : फिल्म फेस्टिवल की प्रासंगिकता

-अजय ब्रह्मात्‍मज
    देश में फिल्म फेस्टिवल की संख्या बढ़ गई है। लगभग हर बड़े शहर में फिल्म फेस्टिवल आयोजित हो रहे हैं। दैनिक जागरण का जागरण फिल्म फेस्टिवल इस लिहाज से अनोखा और उल्लेखनीय है कि यह देश का अकेला घुमंतू फेस्टिवल है। दिल्ली से आरंभ होने के बाद यह दैनिक जागरण के प्रसार क्षेत्र के 15 शहरों का भ्रमण करने के बाद अंत में मुंबई पहुंचता है। हाल ही में 5 वां जागरण फिल्म समारोह मुंबई में संपन्न हुआ। फेस्टिवल में देश-विदेश की अनेक भाषाओं की फिल्में एक साथ देखने को मिल जाती हैं। आकार और स्वरूप में मझोले किस्म के इस फेस्टिवल की अपनी पहचान बन चुकी है। मुंबई के दर्शक दो सालों की आदत के बाद अभी से तीसरी बार इसके मुंबई आने का इंतजार कर रहे हैं।
    मुंबई के दर्शकों को मुंबई फिल्म फेस्टिवल(मामी) का भी इंतजार रहता है। 16 वें साल में प्रवेश करते समय फेस्टिवल के मुख्य स्पांसर ने अपने हाथ खींच लिए तो एकबारगी लगा कि अब मुंबई फिल्म फेस्टिवल नहीं होगा। तभी फिल्म बिरादरी के कुछ सदस्य आगे आए। उन्होंने आर्थिक सहयोग देने के साथ फिल्म फेस्टिवल की गतिविधियों में अपनी उपस्थिति दर्ज करने का आश्वासन दिया। 16 वें मुंबई फिल्म फेस्टिवल में हिंदी सिनेमा के पॉपुलर एक्टर उद्घाटन और समापन समारोह में दिखाई पड़े। फेस्टिवल के दौरान परिचर्चा, विमर्श और मास्टर क्लास में भी डायरेक्टर आते-जाते रहे। निश्चित ही पॉपुलर सितारों की वजह से मुंबई फिल्म फेस्टिवल की गरिमा बढ़ी। कवरेज और प्रचार का असर पड़ा। फिल्म बिरादरी ने कहा भी कि यह उनका फेस्टिवल है।
    गौर करें तो पॉपुलर सितारों की मौजूदगी कॉस्मेटिक ही रही। उन्होंने उद्घाटन और समापन समारोह में शिरकत कर मीडिया को बात करने और दिखने लायक कुछ इमेजेज दे दीं। अगर ये पॉपुलर सितारे फेस्टिवल की दैनंदिन गतिविधियों का हिस्सा बनते तो उनका सहयोग ज्यादा असरकारी होता। इस बार उन्होंने आश्वासन तो दिया है कि वे अब लगातार फिल्म फेस्टिवल के लिए समय निकालेंगे, लेकिन स्टारों की बात का क्या भरोसा?
    देश में सरकारी स्तर पर आयोजित इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल पांच दशकों का सफर तय कर चुका है। अब इसे गोवा में स्थापित कर दिया गया है। दिक्कतों और देखरेख के अभाव में यह फेस्टिवल कोई मुकाम नहीं हासिल कर सका। इधर छोटे-बड़े स्तर पर अन्य शहरों में फिल्म फेस्टिवल के आयोजन से भी इसके दर्शक कम हुए हैं। पहले देश भर से फिल्मप्रेमी,पत्रकार और समीक्षक इसमें हिस्सा लेने आते थे। उधर इंटरनेट की सुविधा बढऩे से विदेशी फिल्मों को देखने के लिए फेस्टिवल की निर्भरता भी कम हो गई है। अब तो घर बैठे दुनिया भर की फिल्में देखी जा सकती हैं। फिल्म फेस्टिवल आयोजकों की बड़ी चुनौती है कि बदले हुए दौर में वे फेस्टिवल की प्रासंगिकता कैसे बनाए रखें? एक दुविधा और नजर आती है कि सहयोग और स्पांसर के दवाब में वे बड़े शहरों तक ही सीमित रहते हैं। इस संदर्भ में जागरण फिल्म फेस्टिवल की उपयोगिता बढ़ जाती है,क्योंकि यह देश के सुदूर कोने में जाता है।
    इन दिनों छोटे स्तर पर विभिन्न समूहों और व्यक्तियों के प्रयास से भी फिल्म फेस्टिवल आयोजित हो रहे हैं। मुझे लगता है कि उत्तर भारत में व्यवस्थित और व्यापक फिल्म फेस्टिवल के आयोजन की जरूरत है। उत्तर भारत के छोटे शहरों की प्रतिभाएं एक्सपोजर के लिए कुलबुला रही हैं। अगर उन्हें फेस्टिवल के जरिए सही मार्गदर्शन मिले तो अगले पांच सालों में अनुराग कश्यप और विशाल भारद्वाज जैसे निर्देशकों का नया समूह आ सकता है। वे हिदी फिल्म इंडस्ट्री में बड़ा योगदान करेंगे।

Wednesday, October 29, 2014

जेड प्‍लस का ट्रेलर


पोस्‍टर - जेड प्‍लस

इस पोस्‍टर को गौर से देखें। 
याद करें कि हाल-फिलहाल में ऐसा कोई और पोस्‍टर देखा है क्‍या ? आप ने सही गौर किया कि एक व्‍यक्ति एक हाथ से लोटा उठाए और दूसरे हाथ से लुंगी थामे शौच के लिए जा रहा हैत्र स्‍पष्‍ट है कि इस व्‍यक्ति के घर में शौचालय नहीं है। देश के अधिकांश पुरुष गांवों से लेकर महानगरों तक में ऐसे ही खुलेआम शौच के लिए जाते हैं। 
            इस व्‍यक्ति का नाम असलम है। यह पंचर बनाने का काम करता है। आप को बता दें कि असलम को गफलत में जेड प्‍लस सेक्‍युरिटी मिल गई है। अब ये सुरक्षा गार्ड उसे तनहा नहीं छोड़ सकते। शौच में भी साथ जाते हैं। पोस्‍टर में सुरक्षा गार्डो के अलावा तीन और व्‍यक्ति दिख रहे हैं। वे मुकेश तिवारी,कुलभूषण खरबंदा और संजय मिश्रा हैं। मुकेश तिवारी असलम के पड़ोसी हैं। कुल जी प्रधानमंत्री की भूमिका में हैं। संजय मिश्रा आतंकवादी बने हैं।असलम की भूमिका में आदिल हुसैन  असली से दिख रहे हैं। एक प्रधानमंत्री के अलावा सभी देश-समाज के आम नागरिक हैं। इन्‍हें अपने आसपास आप ने देखा होगा। याद करें कि ऐसे आम किरदारों को कब आखिरी बार पोस्‍टर और सिनेमा में देखा था। दाएं कोने में एक साइनबोर्ड भी दिख रहा है-असलम पंचर शॉप। 
             हिंदी सिनेमा के पोस्‍टर इन दिनों चमकीले,ग्‍लाॅसी और  हीरो-हीरोइन के आलिंगन से भरे होते हैं। पोस्‍टर में रिवॉल्‍वर या अत्‍याधुनिक हथियार रहते हैं। हिंदी फिल्‍मों के पोस्‍टर सेक्‍स,हिंसा और आक्रामकता जाहिर करते हैं। पोस्‍टर की इस समकालीन परंपरा के विरोध में दिखता है जेड प्‍लस का पोस्‍टर। रंग भी फीके और धूसर हैं। सितारों के चेहरे आम आदमी का प्रतिनिधित्‍व करते हैं। कहीं भी कृत्रिमता और बनावटीपन नहीं है। पोस्‍टर की सादगी का निजी आकर्षण है।
             लंबे समय के बाद हिंदी फिल्‍मों की बनावटी चमक से बाहर कीरियल दुनिया दिख रही है। इसके लिए फिल्‍म के लेखक रामकुमार सिंह और निर्देशक डॉ. चंद्रप्रकाश द्विेवेदी बधाई के पात्र हैं।
            बस एक ही बात खटक रही हैं कि हिंदी फिल्‍म के इस पोस्‍टर में हिंदी में कुछ नहीं लिखा है। बाजार के अबाव में डॉ. द्विवेदी भी आ गए। और हां,कोई महिला किरदार भी नहीं दिख रही। अभी अन्‍य पोस्‍टर और ट्रेलर का इंतजार है।

Tuesday, October 28, 2014

खुद के प्रति सहज हो गई हूं-दीपिका पादुकोण



-अजय ब्रह्मात्मज
    शाह रुख खान के साथ दीपिका पादुकोण की तीसरी फिल्म है ‘हैप्पी न्यू ईयर’। सभी जानते हैं कि उनकी पहली फिल्म ‘ओम शांति ओम’ शाह रुख खान के साथ ही थी। दूसरी फिल्म ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ के समय तक दीपिका पादुकोध की स्वतं। पहचान बन चुकी थी। ‘हैप्पी न्यू ईयर’ में उनकी लोकप्रियता और बढ़ गई है। अगर शाह रुख के समकक्ष मानने में आपत्ति हो तो भी इतना तो कहा ही जा सकता है कि वह कम भी नहीं हैं।
    बहरहाल,तीनों फिल्मों की बात चली तो दीपिका ने कहा,‘पिछली दो फिल्मों में ज्यादा गैप नहीं है,इसलिए कमोबेश समान अनुभव रहा। ‘ओम शांति ओम’ के समय मैं एकदम नई थी। उस फिल्म को मैंने उतना एंज्वॉय नहीं किया था,जितना मैं आज करती हूं। पहली फिल्म के समय घबराहट थी। पहली बार शाह रुख और फराह के साथ काम कर रही थी। उसके पहले कभी फिल्म सेट पर नहीं गई थी। हर चीज मेरे लिए नई थी। ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ और ‘हैप्पी न्यू ईयर’ के बाद मैं शाह रुख के साथ ज्यादा कंफर्टेबल हूं। अब मैं उन्हें को-स्टार नहीं मानती। वे मेरे अच्छे दोस्त हैं। मैं जानती हूं कि कभी उनकी जरूरत पड़ी तो वे मेरे साथ रहेंगे। ऐसी दोस्ती हो तो फिल्में आसान हो जाती हैं। केमिस्ट्री और कंफर्ट बढ़ जाता है। इस बार फराह भी थीं। मुझे ‘ओम शांति ओम’ की याद आ रही थी। उस समय फराह ने मुझे खूब डांटा और सिखाया। इस बार उन्होंने कहा कि मैं अच्छी एक्ट्रेस हो गई हूं। सब कुछ अपने आप कर लेती है। फराह मानती हैं कि मैंने सीखा है।’
    दीपिका के अभिनय और प्रेजेंस में निखार की बात करें तो उसकी शुरुआत ‘दम मारो दम’ से होती है। इस फिल्म के आयटम गीत ‘ऊंचे से ऊंचा बंदा’ में दीपिका पहली बार प्रज्वलित हुईं। अभिनय की उनकी लौ को सभी ने महसूस किया। इस फिल्म के बाद उनका करिअर रोशन हुआ। अब वह चमक रहा है। दीपिका ने सहमति जाहिर की,‘ मैं आप की राय से सहमत हूं। उस गीत में जो झलक थी, ‘कॉकटेल’ में वह निखर गया। वैरोनिका के कैरेक्टर को सही ढंग और संदर्भ में निभा सकी। कई सारे फैक्टर एक साथ काम किए। मुझे भी लगता है कि वहां से मेरे अंदर कंफीडेंस आया। उसके पहले परफारमेंस करते हुए कई बातें दिमाग में चलती रहती थीं। अपने बारे में शंकाएं कम हो जाएं और अपनी अपीयरेंस को लेकर आप कंफीडेंट हों तो वह पर्दे पर दिखता है।’ दीपिका अपने कद को लेकर बहुत परेशान रहती थीं। अब उनकी झिझक खत्म हो गई है। वह कद ही विशेषता बन कर अभिनेत्री के रूप में उनका कद बढ़ा रहा है। दीपिका ने आगे जोड़ा,‘बिल्कुल सही आब्जर्वेशन है आप का। मैं तो कहूंगी कि जो फिल्में नहीं चलीं,उनसे मुझे सीखने का मौका मिला। अपनी कमियां नजर आईं। अपनी असफलता से मुझे लाभ ही हुआ। करिअर के बारे में सही फैसले लेने की समझ आई। मैं फिल्मी परिवार से नहीं हूं। फिल्में करते-करते ही मैं खुद के प्रति सहज हो गई हूं। अभी दुविधा नहीं रहती। हो या ना कह देती हूं। रिस्क लेने के लिए भी तैयार हूं।’
    हिंदी फिल्मों की अभिनेत्रियों की इमेज और रोल में काफी बदलाव आए हैं। दीपिका ने अपने अनुभवों से बताया,‘पहले की अभिनेत्रियों को एस्पीरेशनल रोल मिलते थे। दर्शकों में महिलाएं उनकी तरह होना चाहती थीं। अभी की अभिनेत्रियों की भूमिकाओं में दृष्टिकोण बदल गया है। कुछ फिल्मों में उनका शरीर ही दिखाया जाता है। बाकी  सामान्य तौर पर हमारे किरदारों में दर्शक खुद को देख सकते हैं। ‘कॉकटेल’ और ‘ये जवानी है दीवानी’ उदाहरण हैं। ‘ ़ ़ ऱामलीला’ और ‘हैप्पी न्यू ईयर’ के किरदार लार्जर दैन लाइफ होते हैं।’ दीपिका इस धारणा से सहमत नहीं होती कि हिंदी फिल्मों में हीरोइनों को सेक्स सिंबल के तौर पर ही पेश किया जाता है। उन्होंने स्पष्ट कहा,‘यह डायरेक्टर पर डिपेंड करता है। मेनस्ट्रीम फिल्मों में भी अब रियल किरदार दिखने लगे हैं।’ ‘हैप्पी न्यू ईयर’ में बार डांसर मोहिनी का किरदार निभा रही हैं दीपिका पादुकोण। अपने किरदार के बारे में उन्होंने बताया,‘मोहिनी अपने डांस को कला मानती है। फिल्म में अभिषेक मेरा परिचय बाकी किरदारों से करवाते हैं। मैं उन्हें डांस सिखाती हूं। वल्र्ड चैंपियनशिप के लिए तैयार करती हूं।’ इस किरदार के लिए दीपिका ने मराठी लहजे पर मेहनत की। पिछली चार-पांच फिल्मों से उनके संवादों में लहजे की भिन्नता दिख रही है। दीपिका को अपनी फिल्मों के सारे किरदारों के नाम तक याद हैं। उन्होंने इसका राज खोला,‘ये सभी किरदार अलग-अलग हैं,इसीलिए याद हैं। अगर एक जैसे रोल करने लगूंगी तो शायद नाम और किरदार याद न रहें।’

Monday, October 27, 2014

दरअसल : बेहद जरूरी हैं किताबें





-अजय ब्रह्मात्मज
    पिछले दिनों दिल्ली में एक कॉलेज के मीडिया छात्रों से बतियाने का मौका मिला। इन दिनों महाविद्यालयों में भी मीडिया भी एक विषय है। इसके अंतर्गत मीडिया के विभिन्न माध्यमों में से एक सिनेमा का भी पाठ्यक्रम शामिल कर लिया गया है। इस पाठ्यक्रम के तहत सिनेमा की मूलभूत जानकारियां दी जाती है। पाठ्यक्रम निर्धारण से लेकर उसके अध्यापन तक में शास्त्रीय और पारंपरिक अप्रोच अपनाने की वजह से छात्र सिनेमा की समझ बढ़ाने के बजाय दिग्भ्रमित हो रहे हैं। जिन कॉलेज के अध्यापक मीडिया के वर्तमान से परिचित हैं, वे पाठ्यक्रम की सीमाओं का अतिक्रमण कर छात्रों को व्यावहारिक जानकारी देते हैं। वर्ना ज्यादातर कॉलेज में अध्यापक अचेत रहते हैं।
    गौर करें तो सिनेमा तेजी से फैल रहा है। यह हमारे जीवन का हिस्सा बन चुका है। मैं इसे धर्म की संज्ञा देता हूं। मनोरंजन के इस धर्म ने तेजी से प्रभावित किया है। भारतीय समाज में मनोरंजन के अन्य साधनों के अभाव में सिनेमा की उपयोगिता बढ़ जाती है। बचपन से हम जाने-अनजाने सिनेमा से परिचित होते हैं। बगैर निर्देश और पाठ के अपनी समझ विकसित करते हैं। वास्तव में यह समझ लोकप्रिय फिल्मों के प्रचार-प्रसार से इस कदर प्रभावित होता है कि बड़े होने पर भी हम सिनेमा की समझ विकसित नहीं कर पाते। यहां तक कि फिल्म पत्रकारिता और इसके व्यापार, प्रचार और प्रसार से जुड़े व्यक्ति भी सिनेमा की समग्र एवं सम्यक समझ नहीं रखते।
    सिनेमा निश्चित ही मनोरंजन का माध्यम है। मनोरंजन के व्यापक अर्थ को हम सभी ने स्टार, नाच-गाना और एक्शन जैस्ी स्थूल चीजों में बदल दिया है। वास्वत में मनोरंजन की कल्पना भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में ही कर ली गई थी। तब इसके लिए रस शब्द प्रयोग होता है। काव्यशास्त्र में नौ रसों की चर्चा की जाती है। सिनेमा का प्रभाव इन नौ रसों में समाहित है। फिल्म देखने से हमारे मानस में जो रस निष्पत्ति होती है, उसे ही इन दिनों मनोरंजन कहा जाता है-एंटरटेनमेंट। विद्या बालन ने ‘द डर्टी पिक्चर’ में ‘एंटरटेनमेंट एंटरटेनमेंट एंटरटेनमेंट’ इस अंदाज में कहा कि सिनेमा का एंटरटेनमेंट कहीं न कहीं डर्टी पिक्चर का आभास देने लगा है।
    छात्रों से बातचीत के क्रम में मैंने महसूस किया कि सिनेमा के पाठ और अध्ययन की समुचित व्यवस्था नहीं होने से अधिकांश युवा दर्शक सिनेमा के मामले में अशिक्षित रह जाते हैं। कभी परिवार के अग्रज अपने अनुजों को सिनेमा की बारीकियों की जानकारी नहीं देते, स्वंय उन्हें भी उसकी जानकारी नहीं रहती। नतीजा यह होता है कि पत्र-पत्रिकाओं में फिल्मों में सब कुछ स्टार केंद्रित होता है। फिल्मों की सारी चर्चा स्टारों की गतिविधियों और प्रतिक्रियाओं तक सीमित रहती हैं। अभी तक पत्र-पत्रिकाओं में फिल्म निर्माण के सभी पक्षों पर बातें नहीं होती। दर्शकों को जागरुक करने पर जोर नहीं दिया जाता। सारी कोशिश मसालेदार मनोरंजन की सामग्रियां जुटाने पर रहती हैं।
    इन छात्रों को फिल्म के लिए प्रयुक्त होने वाले शब्दों और पारिभाषिक तर्क की सही जानकारी नहीं रहती। लेखों और समीक्षाओं में अगर कभी कोई टर्म आता है तो उसके अर्थ को समझे बगैर ही वे उसे अपना लेते हैं। अधिकांश पत्रकारों के लेखन में भी जानकारी की यह कमी दिखाई देती है। इस दिशा में संपादक और अध्यापक बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। हमें ऐसे लेखकों और प्रकासकों की भी जरुरत है, जो सिनेमा की बुनियादी जानकारियों पर लेख और पुस्तकें लिखें। सिर्फ सितारों की जानकारी और जीवनी सिनेमा की समझ नहीं बढ़ा सकती। किताबें जरूरी हैं।


Sunday, October 26, 2014

शोक का शौक


दरअसल : नया क्लब है 200 करोड़ का


-अजय ब्रह्मात्‍मज
    100 करोड़ क्लब का लक्ष्य पुराना हो गया। कामयाब फिल्मों का नया क्लब 200 करोड़ का है। खानत्रयी के अलावा अजय देवगन,अक्षय कुमार,रितिक रोशन,अभिषेक बच्चन पहले ही 100 करोड़ के  क्लब में दाखिल हो चुके हैं। इस साल अर्जुन कपूर और सिद्धार्थ आनंद भी इसमें प्रवेश कर गए। वरुण धवन और कुछ नए स्टार भी करीब पहुंच चुके हैं। दस्तक दे रहे हैं। लोकप्रिय स्टारों को 100 करोड़ की चिंता नहीं रहती। पिछले दिनों शाह रुख खान ने कहा ही कि 100 करोड़ का कलेक्शन तो आम बात हो गई है। बढ़ती प्रिंट संख्या,मल्टीप्लेक्स,टिकट के बढ़े मूल्यों से पहले ही हफ्ते में चार-पांच दिनों के अंदर 100 करोड़ का आंकड़ा छूना आसान हो गया है। बशर्ते फिल्म में कोई पॉपुलर स्टार हो। एक-दो गाने हिट हो गए हों। आयटम नंबर हो। मनोरंजन के इन तत्वों से 100 करोड़ के क्लब की सदस्यता मिल जाती है। वैसे अभी तक तीन शुक्रवार से रविवार के तीन दिनों के वीकएंड में 100 करोड़ का जादुई आंकड़ा किसी फिल्म ने नहीं छुआ है। ‘सिंघम रिटन्र्स’ से उम्मीद बंधी थी,लेकिन फिल्म अगले ही दिन फिसल गई थी।
    2 अक्टूबर को रिलीज हुई ‘बैंग बैंग’ से उम्मीद थी कि वह जल्दी से 100 करोड़ का पड़ाव छूने के बाद तेजी से 200 करोड़ की तरफ बढ़ जाएगी। ऐसा हो नहीं सका। पहले दिन ही फिल्म का कलेक्शन 30 करोड़ से कम रहा और फिर अगले दिन से फिसलन जारी हो गई। चूंकि ‘बैंग बैंग’ अपेक्षाकृत महंगी फिल्म है,इसलिए जरूरी है कि यह 200 करोड़ से अधिक का व्यापार करे। पिछले हफ्ते के सोमवार से इस फिल्म का कलेक्शन कच्छप गति से चल रहा है। ट्रेड पंडित और जानकार भी मानते हैं कि पहले दिन और पहले वीकएंड का कलेक्शन तो स्टार पावर से ऊंचा हो जाता है,लेकिन सोमवार से फिल्म का कंटेंट ही उसे संभालता है। देखा जा चुका है कि कंटेंट के सपोर्ट से ही फिल्में 200 करोड़ तक पहुंच पा रही हैं। इस साल अभी तक केवल सलमान खान की ‘किक’ ही 200 करोड़ के क्लब में पहुंच सकी है। ‘बैंग बैंग’ के लिए इस प्राइम क्लब की सदस्यता मुश्किल दिख रही है। पलट कर देखें तो पिछले साल शाह रुख खान और आमिर खान ने ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ और ‘धूम 3’ से 200 करोड़ क्लब की मजबूत शुरुआत की। उनके बाद सलमान खान भी पहुंच गए। इस साल अजय देवगन और रितिक रोशन इस क्लब में आते-आते रह गए।
    अब सारी उम्मीदें दीवाली पर रिलीज हो रही फराह खान की ‘हैप्पी न्यू ईयर’ और राजकुमार हीरानी की ‘पीके’ पर टिकी है। शाह रुख खान देश-विदेश में अपने धुआंधार प्रचार ये यह तो जता चुके हैं कि वे ‘हैप्पी न्यू ईयर’ के लिए अधिकाधिक दर्शक जुटा लेंगे। उनके साथ दीपिका पादुकोण,अभिषेक बच्चन,बोमन ईरानी,सोनू सूद,विवानऔर फराह खान की जबरदस्त टीम सक्रिय है। पूरी टीम अनथक कोशिश कर रही है। पहली बार किसी फिल्म के प्रचार के लिए टीवी रियलिटी शो तक की कल्पना की गई है। दूसरी तरफ ‘पीके’ ने प्रचार के कार्ड नहीं खोले हैं। अभी तो केवल पोस्टर के पत्ते फेंक कर ही वे उन्माद कर चुके हैं। आमिर खान के शामिल होने के बाद ‘पीके’ के प्रचार की तीव्रता,आक्रामकता और आत्मीयता समझ में आएगी। पता चलेगा कि प्रचार किस ऊंचाई या निचाई तक गया।
    प्रचार और स्टार पावर के बावजूद कंटेंट ही दर्शकों को किसी फिल्म से बांधे ही रखता है। फिलमों के दर्शकों के समह अलग-अलग होते हैं। अभी तक भारत में किसी भी फिल्म को हिट करने में फैमिली दर्शकों का ही योगदान रहता है। फैमिली दर्शक स्वस्थ मनोरंजन की निश्चित उम्मीद के बाद ही आते हैं। सभी फिल्मों के आरंभिक दर्शक यूथ और शहरी जन होते हैं। धीरे-धीरे फिल्म के दर्शक बढ़ते हैं। ज्यादातर बेहतरीन फिल्मों के दर्शक पहले हफ्ते के बाद ही सिनेमाघरों का रुख करते हैं। दूसरे हफ्ते में पर्याप्त दर्शक तभी मिलते हैं,जब फिल्म का विषय नया और अनोखा हो। अन्यथा दर्शक अपनी बेरुखी जताने से नहीं हिचकते। अतीत में उन्होंने लोकप्रिय सितारों को भी रिजेक्ट किया है। हां,फिल्म अच्छी लगी तो इस साल के अंत तक ‘हैप्पी न्यू ईयर’ और ‘पीके 200’ करोड़ क्लब में शामिल हो जाएंगी। ऐसे लक्षण दिख तो रहे हैं।

Friday, October 24, 2014

फिल्‍म समीक्षा : हैप्‍पी न्‍यू ईयर

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
 फराह खान और शाह रुख खान की जोड़ी की तीसरी फिल्म 'हैप्पी न्यू इयर' आकर्षक पैकेजिंग का सफल नमूना है। पिता के साथ हुए अन्याय के बदले की कहानी में राष्ट्रप्रेम का तडका है। नाच-गाने हैं। शाहरुख की जानी-पहचानी अदाएं हैं। साथ में दीपिका पादुकोण, अभिषेक बच्‍चन, सोनू सूद, बोमन ईरानी और विवान शाह भी हैं। सभी मिलकर थोड़ी पूंजी से मनोरंजन की बड़ी दुकान सजाते हैं। इस दुकान में सामान से ज्‍यादा सजावट है। घिसे-पिटे फार्मूले के आईने इस तरह फिट किए गए हैं कि प्रतिबिंबों से सामानों की तादाद ज्‍यादा लगती है। इसी गफलत में फिल्म कुछ ज्‍यादा ही लंबी हो गई है। 'हैप्पी न्यू इयर' तीन घंटे से एक ही मिनट कम है। एक समय के बाद दर्शकों के धैर्य की परीक्षा होने लगती है।
चार्ली(शाहरुख खान) लूजर है। उसके पिता मनोहर के साथ ग्रोवर ने धोखा किया है। जेल जा चुके मनोहर अपने ऊपर लगे लांछन को बर्दाश्त नहीं कर पाते। चार्ली अपने पिता के साथ काम कर चुके टैमी और जैक को बदला लेने की भावना से एकत्रित करता है। बाद में नंदू और मोहिनी भी इस टीम से जुड़ते हैं। हैंकिंग के उस्ताद रोहन को शामिल करने के बाद उनकी टीम तैयार हो जाती है। संयोग है कि ये सभी लूजर है। वे जीतने का एक मौका हासिल करना चाहते हैं। कई अतार्किक संयोगों से रची गई पटकथा में हीरों की लूट और वर्ल्‍ड डांस कंपीटिशन की घटनाएं एक साथ जोड़ी गई है। फराह खान ने अपने लेखकों और क्रिएटिव टीम के अन्य सदस्यों के सहयोग से एक भव्य, आकर्षक, लार्जर दैन लाइफ फिल्म बनाई है, जिसमें हिंदी फिल्मों के सभी प्रचलित फॉर्मूले बेशर्मी के साथ डाले गए हैं।
कहा जाता है कि ऐसी फिल्मों के भी दर्शक हैं। शायद उन्हें यह फिल्म भी अच्‍छी लगे। कला में यथास्थिति बनाए रखने के हिमायती दरअसल फिल्म को एक व्यवसाय के रूप में ही देखते हैं। 'हैप्पी न्यू इयर' का वितान व्यावसायिक उद्देश्य से ही रचा गया है। अफसोस है कि इस बार फराह खान इमोशन और ड्रामा के मामले में भी कमजोर रही है। उन्होंने फिल्म की पटकथा में इसी संभावनाओं को नजरअंदाज कर दिया है। किरदारों की बात करें तो उन्हें भी पूरे ध्यान से नहीं रचा गया है। चार्ली के बदले की यह कहानी आठवें-नौवें दशक की फिल्मों का दोहराव मात्र है, जो तकनीक और वीएफएक्स से अधिक रंगीन, चमकदार और आकर्षक हो गया है।
कलाकारों में शाह रुख खान ऐसी अदाकारी अनेक फिल्मों में कर चुके हैं। वास्तव में यह फिल्म उनकी क्षमताओं का दुरुपयोग है। फराह खान ने अन्य कलाकारों की प्रतिभाओं की भी फिजूलखर्ची की है। दीपिका पादुकोण ने मोहिनी के किरदार में चार-छह मराठी शब्दों से लहजा बदलने की व्यर्थ कोशिश की है। बाद में डायरेक्टर और एक्टर दोनों लहजा भूल जाते हैं। अभिषेक बच्‍चन डबल रोल में हैं। उन्होंने फिल्म में पूरी मस्ती की है। स्पष्ट दिखता है कि उन्होंने सिर्फ निर्देशक की बात मानी है। अपनी तरफ से कुछ नहीं जोड़ा है। यही स्थिति बाकी कलाकारों की भी है। सोनू सूद धीरे-धीरे बलिष्ठ देह दिखाने के आयटम बनते जा रहे हैं। बोमन अपने लहजे से पारसी किरदार में जंचते हैं। विवान शाह साधारण हैं।
'हैप्पी न्यू इयर' निश्चित ही आकर्षक, भव्य और रंगीन है। फिल्म अपनी संरचना से बांधे रखती है। फिल्म का गीत-संगीत प्रभावशाली नहीं है। फराह खान खुद कोरियोग्राफर रही हैं। फिर भी 'हैप्पी न्यू इयर' के डांस सीक्वेंस प्रभावित नहीं करते। दीपिका पादुकोण की नृत्य प्रतिभा की झलक भर मिल पाती है। फराह खान और शाह रुख खान की पिछली दोनों फिल्में 'मैं हूं ना' और 'ओम शांति ओम' से कमजोर फिल्म है 'हैप्पी न्यू ईयर'।
अवधि- 179 मिनट 
** 1/2 ढाई स्‍टार

Thursday, October 23, 2014

हमने भी ‘हैदर’ देखी है - मृत्युंजय प्रभाकर


-मृत्युंजय प्रभाकर 



बचपन से मुझे एक स्वप्न परेशान करता रहा है. मैं कहीं जा रहा हूँ और अचानक से मेरे पीछे कोई भूत पड़ जाता है. मैं जान बचाने के लिए बदहवास होकर भागता हूँ. जाने कितने पहाड़-नदियाँ-जंगल लांघता दौड़ता-भागता एक दलदल में गिर जाता हूँ. उससे निकलने के लिए बेतरह हाथ-पाँव मारता हूँ. उससे निकलने की जितनी कोशिश करता हूँ उतना ही उस दलदल में धंसता जाता हूँ. भूत मेरे पीछे दौड़ता हुआ आ रहा है. मैं बचने की आखिर कोशिश करता हूँ पर वह मुझ पर झपट्टा मारता है और तभी मेरी आँखें खुल जाती हैं.  
आँखें खुलने पर एक बंद कमरा है. घुटती हुई सांसें हैं. पसीने से भीगा बदन है. अपनी बेकसी है. भाग न पाने की पीड़ा है. पकड़ लिए जाने का डर है. उससे निकल जाने की तड़प है. एक अजब सी बेचारगी है. फिर भी बच निकलने का संतोष है. जिंदा बच जाने का सुखद एहसास है जबकि जानता हूँ यह मात्र एक स्वप्न है. ‘हैदर’ फिल्म में वह बच्चा जब लाशों से भरे ट्रक में आँखें खोलता है और ट्रक से कूदकर अपने जिंदा होने का जश्न मनाता है तब मैं अपने बचपन के उस डरावने सपने को एक बार फिर जीता हूँ. उसके जिंदा निकल आने पर वैसे ही राहत की सांस लेता हूँ जैसे उस भयावह सपने के टूटने के बाद अपने जिंदा बच जाने पर लेता था. मौत के चंगुल से जिंदा बच जाने की यह ख़ुशी चाहे फिल्म की हो या सपने की, वह निश्चय ही सुकून देने वाली होती है. ‘हैदर’ एक फिल्म होते हुए भी मेरे सपने की ही तरह ‘कश्मीर’ की वह वास्तविकता है जो मुझे भीतर तक परेशान करती है और डराती है. फिल्म के उस मोड़ पर आकर डॉक्टर हिलाल मीर (जिसे नरेन्द्र झा ने कमाल की संजीदगी से निभाया है) का वह संवाद मुझे भीतर तक वेध देता है जब उसकी पत्नी उससे पूछती है, ‘किस तरफ हैं आप?’ और जवाब में डॉक्टर कहता है, ‘ज़िन्दगी के.’ डॉक्टर हिलाल मीर द्वारा एक दहशतगर्द की ज़िन्दगी बचाने की तड़प से शुरू हुई यह फिल्म उसके शायर बेटे हैदर द्वारा एक सरकारी दहशतगर्द की ज़िन्दगी बक्श देने तक कश्मीर का ऐसा रूपक रचती है जो आपको भीतर तक डराती ही नहीं बल्कि खाली कर जाती है.    
  हैदर के बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है. इतना कि अगर उन सारी समीक्षायों को इकठ्ठा कर छपवा दिया जाए तो एक बेहद ही मोटी पुस्तक का रूप ले ले. इस पर लिखना कोई कार्यकारी या व्यावसायिक मजबूरी भी नहीं है क्यूंकि फिल्म समीक्षा लिखने का पेशा छोड़े भी दो साल हो चुके हैं जब हर हफ्ते दो-तीन फिल्मों पर ३००-३५० शब्दों में पूरे फिल्म को उतार देने की अखबारी जरूरत को पूरा करता था. और अपने इस काम से इतना ऊब चुका था कि उसके बाद आज तक किसी फिल्म पर लिखने की इतनी तीव्र इच्छा नहीं हुई. लेकिन यह फिल्म पहली बार देखे जाने के बाद से ही मुझे लगातार परेशान करती रही. खींचती रही. भीतर तक मथती रही. मेरे उस स्वप्न की ही तरह जिसे मैं कब का भूल चुका था. अमूमन कोई फिल्म अच्छी लग जाए तो उसे दुबारा-तिवारा देखता ही देखता हूँ. क्यूंकि बचपन से ही फिल्म देखना मेरे लिए शौक नहीं बल्कि पेशे की तरह रहा है. हैदर ने भी मुझे अपनी तरफ बार-बार लौटने को विवश किया है.
फिल्म और सपनों के रिश्ते पर पता नहीं कोई बात हुई है या नहीं यह मैं नहीं जानता. संभव हो हुई हो पर मेरी जानकारी में नहीं है. मेरे लिए सपने फिल्म की आदिम अनुभूति की तरह हैं. हम सपने में ज्यादातर अपनी फिल्म ही देख रहे होते हैं. यही कारण है कि फ़िल्में भी हमें हमारे सपनों की तरफ ले जाती हैं. दरअसल ज्यादातर दर्शक फिल्म को भी सपने की ही तरह देख रहे होते हैं. जिसमें नायक की छवि में खुद को देखने की अनुभूति भी शामिल है. पर फिल्म को सपनों में बदल मनुष्य के सबसे सान्द्र अनुभव में तब्दील कर देने की क्षमता बहुत ही कम निर्देशकों में होती है. उस पर भी ऐसी फ़िल्में बहुत कम होती हैं जो उस सपने को हकीक़त से भी ज्यादा करीब ले आती हैं. ‘हैदर’ फिल्म उस सपने की तरह है जो अपनी हकीक़त से भी ज्यादा मानीखेज है. 
यह फिल्म कश्मीर की उस स्याह हकीक़त को सामने लाती है जो आम भारतीय जन-मानस के लोकप्रिय बिम्ब में कहीं से भी शामिल नहीं है. आम भारतीय जन-मानस में आज भी कश्मीर की छवि डल लेक की खूबसूरती और बर्फ से ढंके पहाड़ी चोटियों वाली छवि है जहाँ वह पर्यटन और हनीमून के लिए जाना चाहता है या कि भक्त जनता के लिए हाल के सालों में गढ़ी गई बैष्णो देवी के धार्मिक पर्यटन वाली छवि है. सिनेमा घरों से निकलते ज्यादातर दर्शकों के मन में बसी कश्मीर की उस छवि पर यह फिल्म कुठाराघात करती है इसलिए वह सिनेमा घर से निकलते हुए नकार की मुद्रा में निकलता है क्यूंकि यह फिल्म उसके स्थापित छवि को तोड़ती और उसके बंधे-बंधाए ज्ञान पर हमले बोलती है. यहीं ‘हैदर’ अपने को उन ‘पोपकोर्न’ टाइप फिल्मों से खुद को अलग करती है जो दर्शकों के सपने को ‘खेल’ में बदलकर उनसे भारी मुनाफा तो कमाती हैं लेकिन बदले में उन्हें खाली झुनझुना थमा देती हैं जबकि ‘हैदर’ उन्हें उस हकीक़त से रूबरू कराने की कोशिश करती है जो उन्हें मंजूर नहीं है. ‘कश्मीर’ के इस रूप को स्वीकार करना उनके बने-बनाए छवि का तो नकार है ही, उनके ‘पोपकोर्न’ रूपी ‘राष्ट्रभक्ति’ की भी इतिश्री है जिसे वह ‘लगान’ ‘चक दे इंडिया’ या ‘मैरी कॉम’ जैसी फिल्मों देखते हुए महसूस करता है और उसे ‘पेप्सी’ या ‘कोक’ के साथ ख़ुशी-ख़ुशी डकार लेता है. ‘हैदर’ के खिलाफ आम दर्शकों और चलताऊ समीक्षकों की इतनी तीव्र प्रतिक्रिया के पीछे की वजहों में उनकी खोखली ‘राष्ट्रभक्ति’ है जिसे यह फिल्म खेल कर लौटते हुए बच्चे की तरह रास्ते पर ‘खाली’ पड़े ‘कोक’ के बोतल को एक जोरदार लात लगा देती है.            
हमारा दर्शक जो ५० के दशक के फिल्मों के बिना जातिसूचक नामों वाले नायकों को देखकर बड़ा हुआ और पनपा है वह फिल्मों से उसी मुगालते की मांग करता है जहाँ नायक का पहले से तय कोई जातिसूचक उपनाम न हो. ताकि वह फिल्म देखते हुए अपने उपनाम को उस नायक के नाम में वैसे ही जोड़ दे जैसे वह खुद की छवि को नायक की छवि के ऊपर आरोपित कर देता है और फिल्म रुपी सपने में कभी ‘कैटरीना’ तो कभी ‘दीपिका’ तो कभी ‘सनी लेओनी’ की बाँहों में झूमता है. ‘हैदर’ उस बॉलीवुडीअन सिनेमा का नकार है जो जीवन को लेकर एक तरह का नकली रोमांटिसिज्म दर्शकों के सामने परोसता है. वह सिनेमा जो उनके जीवन, उनके समाज, उनके परिवेश की बात नहीं करता बल्कि एक नकली जीवन, नकली समाज और नकली परिवेश रचता है. सलमान खान उसी बॉलीवुडीअन सिनेमा के प्रतिनिधि स्टार हैं जिसका मजाक इस फिल्म में बनाया गया है. फिल्म में ‘सलमान खान’ एक व्यक्ति या स्टार की तरह नहीं बल्कि एक रूपक की तरह आते हैं जो उसी समुदाय से आया हुआ नायक होकर भी अपने ही समुदाय और देश के लोगों के जीवन की हकीक़त से न सिर्फ मीलों दूर है बल्कि उन्हें एक नकली समाज और परिवेश का स्वप्न भी बेचता है जिसमें वह अपने नकली दबंगई में बार-बार पूछता है ‘दूँ क्या? दूँ क्या?’ जबकि वास्तव में वह उस समाज को कुछ भी देने की स्थिति में नहीं है सिवा ‘चंद’ नकली सपनों के, जो उनके किसी काम के नहीं हैं. इसलिए विशाल भारद्वाज जब हैदर के हाथों सलमानों की हत्या का रूपक रचते हैं तब उनका आशय सलमान या उनके जैसे स्टार नहीं बल्कि उस बॉलीवुड सिनेमा से है जो अपने आवरण और विषयवस्तु में पूरी तरह समय, समाज और अपने परिवेश से कटा हुआ है. जो दर्शकों को नकली सपने दिखाकर गंजों को कंघी बेचने का काम करती है. 
‘हैदर’ फिल्म बॉलीवुड फिल्मों के नकार का रूपक ही नहीं रचती बल्कि उसका सही-सही विकल्प भी देती है. यहाँ फिल्म का परिवेश नायक-नायिकायों के नृत्य के पीछे बदलते बैकड्राप तक ही सीमित नहीं है बल्कि उनके जीवन का हिस्सा है और उन्हें सिर्फ प्रभावित ही नहीं करती बल्कि उनके जीवन की दिशा भी तय करती है. परिवेश ही वह शय है जो हमारा जीवन तय करती है. हम उससे लाख भागने की कोशिश करें या भगा दिए जाएँ लेकिन वह अपनी त्रासदी में हमें खींच ही लेता है जैसे वह हैदर को ‘अलीगढ’ और उसकी प्रेमिका के भाई को ‘बंगलौर’ से खींच लाता है. संभव है हमारे स्टार सलमान खान सोमालिया के परिवेश में पैदा हुए होते तो ‘बन्दूक’ उठाकर कब के शहीद हो गए होते या ‘कालाहांडी’ में आदिवासी बनकर पैदा होते तो ‘भूख’ से लड़ते हुए हड्डियों का ढांचा लिए जीते या अब तक दफन हो गए होते.  कश्मीर का परिदृश्य आज के दौर में सिर्फ ‘हैदर’, ‘लियाकत’, ‘परवेज’ ‘खुर्रम’, ‘जहूर’, ‘रूह्दार’ ‘अर्शिया’ और ‘गजाला’ जैसे लोग पैदा कर सकते हैं क्यूंकि वहां ‘हुसैन मीर’ जैसे लोग रहे नहीं और ‘हिलाल मीर’ को कंसंट्रेशन कैम्पों में डालकर खत्म कर दिया गया है. अब जो बच गया है वो जानता है कि उसे उस आग में कूदना ही है जिसे उसके इर्द-गिर्द घेरे की तरह बना दिया गया है यह जानते हुए की ज़िन्दगी उसके लिए ‘फानी’ है और ‘लाफ़ानी’ होने का एक ही रास्ता है ‘कुर्बानी’. रूह्दार (इरफ़ान ने जिस किरदार को बड़ी शिद्दत से जिया है) फिल्म में सिर्फ डॉक्टर हिलाल मीर की रूह बनकर नहीं आता बल्कि कश्मीर के परिवेश की रूह बनकर आता है जो लोगों को अपने सांचे में ढालता है. उन्हें जाने-अनजाने अपनी ओर खींचता है और हिंसा की उस आग में धकेल देता है जो उसके चारों ओर पसरी हुई है.          
‘रूह्दार’ अगर कश्मीर की रूह है तो ‘गज़ाला’ ‘कश्मीर’ का रूपक पेश करती है. दो व्यक्तियों के बीच चुनाव के मानसिक जाल में औरत के रूप में ‘गज़ाला’ वैसे ही पिसती है जैसे दो हाथियों (हिंदुस्तान और पाकिस्तान) के बीच युद्ध में घास की तरह ‘कश्मीर’ पिस रहा है. और ‘गज़ाला’ के इस दोहरी मानसिकता में ‘हैदर’ ठीक वैसे ही पिसता है जैसे ‘कश्मीर’ में उसके ही बच्चे पिस रहे हैं. ‘गज़ाला’ यहाँ एक औरत और एक सरज़मीन की पीड़ा को एक साथ प्रतिबिंबित करती है. वैसे भी तमाम भारतीय रूपकों में औरत को ज़मीन के तौर पर ही देखा गया है जिसे सींचना पुरुष (आसमान) की ज़िम्मेदारी होती है और वह कभी प्रेम की अनावृष्टि (हिलाल) तो कभी अतिवृष्टि (खुर्रम) की शिकार होती है.       एक स्त्री के रूप में अपने आप को पूरा करने के लिए उठाया गया उसका कोई भी कदम सीधे-सीधे उसके समाज और परिवेश को उप्लावित कर जाता है जिसका शिकार उसकी फसल (उसके बच्चे) होते हैं. यहाँ ‘गजाला’ की आज़ादी ‘कश्मीर’ की आज़ादी के सवाल से एक बार फिर जुड़ जाता है जहाँ दोनों को ‘खुदमुख्तारी’ की दरकार है जिसमें वह अपने को पूर्ण करने का निर्णय खुद ले सके और उसके निजी निर्णय से समाज और परिवेश उप्लावित न हो, न ही उसके बच्चे ‘हैदर’ को इसकी कीमत चुकानी पड़े. ‘गज़ाला’ यहाँ एक साथ एक स्त्री और एक सरज़मीन ‘कश्मीर’ की मह्त्व्कांक्षायों स्वर देती है. वह स्वर जो उस समाज और परिवेश को भी पसंद नहीं है न ही उसके बच्चे को जो उसे किसी भी सूरत में बांटने को तैयार नहीं है. यहाँ पर आकर विशाल थोड़ा चूकते हैं जब वो ‘गज़ाला’ को एक स्त्री से अधिक एक ‘सरज़मीन’ के बिम्ब में गुम्फित कर देते हैं जिससे स्त्री के चुनाव का प्रश्न गौण हो जाता है. फिल्म के अंत में ‘गज़ाला’ द्वारा मानव बम बनकर खुद को उड़ा लेना भी जलते हुए ‘कश्मीर’ का ही रूपक गढ़ता है जहाँ पसरी बर्फ की ख़ामोशी के पीछे जलते हुए लोथड़े हैं, स्टेनगन थामे कटे हुए हाथ हैं, बिना पैरों के चलते ‘खुर्रम’ हैं और हजारों लोगों का खून पसरा है जिसके बीच से होकर ‘हैदर’ को अपना रास्ता तय करना है. अपना समाज बनाना है और अपने परिवेश को रहने लायक, सांस लेने लायक बनाना है ताकि वहां एक बार फिर ‘ज़िन्दगी’ शब्द अपना मायने पा सके.
‘हैदर’ का किरदार अपने होने या न होने, कुछ करने और न करने, पक्ष लेने या न लेने के विभ्रम के बीच जूझते हुए एक व्यक्ति का रूपक है जो सही और गलत के बीच त्रिशंकु सा अटक गया है. वह पिता की हत्या का बदला लेने और न लेने के द्वन्द से कहीं अधिक इस द्वन्द से गुजरता है कि दरअसल उसके और उसके परिवार के साथ हुआ क्या है. कौन से तत्व हैं जो इसके लिए जिम्मेदार हैं. एक अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति वाले इलाके में फंसे एक दिशाहीन युवा का प्रतिनिधि पात्र है ‘हैदर’ जिस पर एक साथ कई तरह के सत्तायों की निगरानी है और वे उसे अपने तरीके से संचालित करना चाहते हैं. मतलब की उसे अपनी ज़िन्दगी किसी और के बनाए खेल में उलझाकर जीना है जहाँ उसकी हैसियत एक खिलोने या कठपुतली भर की हो जाती है जिसकी डोर किसी और के हाथ में होती है. वह अपनी डोर किसी और के हाथ में दे या न दे यह भी उसके द्वंदों में शामिल है और अंत में वह अपनी मां को ‘खुर्रम’ से बचाने और बाप की हत्या का बदला लेने की लड़ाई लड़ता हुआ मां को खो देने के बाद खून से लथ-पथ बर्फीले परिवेश को पीछे छोड़ (जिसमें उसकी मौजी गज़ाला और प्रेमिका अर्शिया की लाश पड़ी है) ‘ज़िन्दगी’ की तलाश में आगे की ओर देखता है (वह भी तब जब कुछ देर पहले ही अर्शिया की लाश को वह कब्र से निकाल अपनी बांहों में समेटे बैठा रहता है) निकल लेता है. यह अतीत से निवृति नहीं बल्कि उससे हासिल सबक से ली हुई सीख है जो उसे उसकी मां ‘गज़ाला’ उसके दादा ‘हुसैन मीर’ के शब्दों में उसे समझाती है कि ‘इंतकाम से सिर्फ इंतकाम पैदा होती है’. हैदर यहाँ ‘कश्मीर’ के बच्चों के लिए या ऐसे किसी भी परिवेश के बच्चे के लिए यह सबक छोड़ जाती है कि हिंसा से उसका कुल हासिल अपनों के जान-माल का नुकसान ही है. 
फिल्म में कश्मीर के हालात की भयावहता कई-कई दृश्यों में सामने आती है, वह चाहे फिल्म के अंत में कब्र खोदने और अपनी ही कब्र खोदकर खुद ही लेटने का झकझोर देने वाला दृश्य हो या एक व्यक्ति के बिना तलाशी खुद के घर में न घुसने की हिम्मत वाला दृश्य हो या सिर्फ इस्लामाबाद कहने मात्र से सेना द्वारा ‘हैदर’ को रोक लेने वाला दृश्य हो, या कदम कदम पर लाइन लगाकर उनकी तलाशी और पहचान पत्र की मांग वाला दृश्य हो, या आधी विधवा हुई लोगों की त्रासदी सामने लाने वाला दृश्य हो, या गायब हुए लोगों की तलाश में लगे परिजन वाला दृश्य हो, या हैदर द्वारा लाल चौक पर ‘हम हैं कि हम नहीं’ सवाल उठाने वाला दृश्य हो. ऐसा लगता है ‘कश्मीर’ कोई स्वतंत्र इलाका न होकर कोई कंसंट्रेशन कैंप में बदल दिया गया है. ‘हैदर’ का संवाद कि ‘पूरा कश्मीर ही एक कंसंट्रेशन कैंप है’ इसे और भी मजबूती देता है. 
‘हैदर’ यूँ तो ‘शेक्सपियर’ के नाटक प्रसिद्ध त्रासदी नाटक ‘हैमलेट’ पर आधारित है. लेकिन इसका रूपान्तरण कमाल का है. इस नाटक को विशाल भारद्वाज और बशारत पीर की जोड़ी ने इस कदर कश्मीर की पृष्ठभूमि में ढाला है कि कहीं से भी यह अनुवाद या रूपांतरण प्रतीत नहीं होता है. ‘शेक्सपियर’ का नाटक ‘हैमलेट’ जहाँ एक शाही परिवार की त्रासदी और बदले की कहानी होकर रह जाती है वहीँ ’हैदर’ एक मध्यवर्गीय परिवार की कहानी की पृष्ठभूमि में ‘कश्मीर’ की भयावहता का राजनीतिक आख्यान बन जाता है. फिल्म का सर्वाधिक राजनीतिक और चमत्कृत कर देने वाला दृश्य वह है जिसमे फ़िल्मकार अफ्प्सा को चुत्स्पा में तब्दील कर उसके निहितार्थ को एक ही झटके में खोलकर रख देता है. हमारे समय में बड़े से बड़े राजनीतिक कलाकार भी इतनी हिम्मत कहाँ कर पाते हैं!                
फिल्म में अभिनेताओं के काम पर अलग से बात करने की जरूरत के बाजवूद उनपर विस्तार में नहीं जायूँगा. फिल्म में सिर्फ शाहिद और श्रद्धा कपूर जैसी व्यावसायिक मजबूरियों को छोड़ दें तो ज्यादातर कलाकार अपने पात्र में पूरी तरह डूबे हुए नजर आते हैं और सबने उत्कृष्ट अभिनय का मुजाहिरा किआ है. तब्बू, इरफ़ान, नरेन्द्र झा, के.के. मेनन, ललित परिमू, अश्वत भट्ट और कुलभूषण खरबंदा जैसे अभिनेताओं ने अपने काम से अभिनय का वह वितान रचा है जो फिल्म को और उसके किरदारों को हमारे भीतर गहरे तक उतरने में मददगार बनते हैं और मेरे ख्याल से एक अच्छे अभिनेता का काम भी यही है. अभिनेता का काम अपने अभिनय से चमत्कृत करना नहीं है जैसा कि आम तौर पर माना जाता है बल्कि उसका काम अपने किरदार को स्क्रिप्ट की रौशनी में पेश करना है और अच्छे अभिनेता वही होते हैं जो ऐसा कर गुजरते हैं. इस फिल्म में अच्छे अभिनेताओं की खान है. हर कोई अपनी भूमिका में फिट और चाक-चौबंद. यही इस फिल्म की ताकत भी है.
फिल्म का असली नायक इसकी कसी हुई स्क्रिप्ट, गीत-संगीत और उससे भी कसे हुए संवाद हैं. पूरी फिल्म में एक या दो जगहों को छोड़कर कहीं भी चलताऊ संवादों का इस्तेमाल नहीं किया गया है. फिल्म में संवाद के रूप में इस्तेमाल किआ गया एक-एक शब्द बोलता हुआ और अपनी पूरी तासीर के साथ उपस्थित होता है. २० वीं शताब्दी के अज़ीम शायर फैज़ अहमद फैज़ की शायरी का बेहद ही सधा हुआ इस्तेमाल इसमें किया गया है. गानों में गुलजार के बोल और विशाल भारद्वाज का संगीत बोलता हुआ प्रतीति होता है और प्रसंगानुकूल है.
एक फिल्म के तौर पर तो यह फिल्म वहां जाकर खड़ी होती है जहाँ इसके इर्द-गिर्द कोई दूसरी फिल्म नहीं ठहरती. फिल्म के तमाम तकनीकी और गैर-तकनीकी पक्षों का ऐसा जादुई कोलाज देखने का मौका बॉलीवुड की फिल्मों में देखने की उम्मीद शायद ही कोई रखता है. सिनेमेटोग्राफी, कला निर्देशन, गीत-संगीत, अभिनय, कहानी और परिदृश्य आदि कई चीज़ों को गुम्फित करती यह फिल्म किसी महाकाव्य की तरह है जिसके दृश्यों का जादू सिनेमा हाल के पर्दों से पसरकर हमें हमेशा के लिए घेर लेते हैं. यह हमें उन सच्चाइयों से जादुई रूप में सपनों की तरह रूबरू करवाते हैं जिनका सामना हम दिन की रौशनी में करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते. यह फिल्म पर्दे से उतरकर हमारे भीतर तक पसरती है और हमारे भीतर भी बहुत कुछ पिघला देती है. इसे महसूस करने के लिए हमें कश्मीरी होने की आवश्यकता नहीं है बल्कि महज एक इंसान होना ही काफी है. एक फिल्म या किसी भी कलाकृति की सबसे बड़ी ताकत भी यही होती है कि वह अपना एक परिवेश रचते हुए भी दुनिया के सभी लोगों के लिए होती है. ‘हैदर’ उसकी जीती-जागती मिसाल है.       

Wednesday, October 22, 2014

नकाब है मगर हम हैं कि हम नहीं: कश्मीर और सिनेमा -प्रशांत पांडे

Prashant Pandey
 प्रशांत पांडे
 विशाल भारद्वाज की हैदर के शुरुआती दृश्यों में एक डॉक्टर को दिखाया गया है जो अपने पेशे को धर्म मानकर उस आतंकवादी का भी इलाज करता है जिसे कश्मीर की सेना खोज रही है। फिर एक सीन है जिसमे लोग अपने हाथों में अपनी पहचान लिए घरों से निकले हैं और इस पहचान पंगत में डॉक्टर भी शुमार है। सेना कोई तस्दीक अभियान चलाती दिखती है और फौज की गाड़ी में एक शख्स बैठा है जो उस भीड़ में से पहचान कर रहा है।
गौरतलब है कि पहचान करने वाले व्यक्ति की पहचान एक मास्क से छुपाई गयी है। वो कई लोगों को नफ़रत के साथ चिन्हित करता है, उनमे डॉक्टर की पहचान भी होती है। इस प्रतीकात्मक सीन में ही विशाल ये बात कायम कर देते हैं कि वो फिल्म को किसी तरह का जजमेंटल जामा नहीं पहनायेंगे, बल्कि साहस से सब कुछ कहेंगे। बाद में हालांकि, हिम्मत की जगह इमोशन ले लेते हैं और ये व्यक्तिगत बदले की कहानी, मां बेटे के रिश्ते की कहानी भी बनती है।
कश्मीर की आत्मा को किसी ने इस तरह इससे पहले झकझोरा हो ये मुझे याद नहीं। हालांकि, कश्मीर को लेकर सिनेमा ही सबसे ज्यादा बहस छेड़ता रहा और एक्सप्लोर करने के सिवाय कुछ फिल्मों ने अलग अलग तरीके से कश्मीर की कशमकश को बयां किया।
मुझे लोकेशन दिखाने वाली फिल्मों से ज्यादा याद है रोज़ा, रोज़ा और हैदर एक दृष्टि से समान दिखते हैं मगर सिर्फ एक नज़रिए से क्योंकि रोज़ा में एक पत्नि आतंकियों की कैद में फंसे अपने पति को वापस लाने की लड़ाई लड़ रही है जबकि यहां हैदर अपने पिता को खोज रहा है जो डिसअपियर्ड हैं। हैदर में एक संवाद है कि डिसअपियर्ड लोगों की बीवीयां आधी बेवा (विधवा) कहलाती हैं। रोज़ा के अलावा कश्मीर को करीब से देखने की कोशिश विधु विनोद चोपड़ा ने भी कि गोया कि वो खुद कश्मीर से ताल्लुक रखते हैं उनके FTII पुणे के दिनों के साथी फुनशुक लद्दाखी से मेरी मुलाकात लद्दाख में हुई थी, गौरतलब है कि विधु विनोद चोपड़ा के निर्माण में बनी फिल्म थ्री इडियट्स के केंद्रीय पात्र का नाम फुनशुक वांगड़ु था, विधु के अवचेतन में शायद अपने साथी का नाम रह गया हो क्योंकि फिल्म का क्लाइमैक्स लद्दाख में ही शूट हुआ था।
खैर मिशन कश्मीरउस युवा की कहानी है जिसे कश्मीर की आज़ादी के नाम पर आंकत की राह पर धकेला गया है। ये भी व्यक्तिगत बदले की कहानी है, क्योंकि आतंकी के परिवार को नकाब में छुपे ऑफिसर संजय दत्त की गोलियों का शिकार होना पड़ा था, कसूर उस परिवार का बस इतना था कि उन्होने आतंकवादियों को अपने घर में खौफ की वजह से खाना खिलाया था। याद कीजिए हैदर यहां डॉक्टर कश्मीर का मर्ज़ बन चुके आतंक का इलाज करता है तो उसे मौत मिलती है। एक नकाब मिशन कश्मीर में भी था और एक नकाब हैदर में। क्या माने कि कश्मीर की कशमकश इन नकाबपोशों के कारण है। दरअसल हैदर में एक संवाद में कहा जाता है कि हमारे लिए तो उपर खुदा तो नीचे फौज जायें तो जायें कहां।
कुछ लोग कह रहे हैं कि फौज को ग़लत दिखाया गया है। मैं कहता हूं कि ज़रा सोच के देखिए कि क्योंकि आपको अच्छा लगेगा कि आप दिन रात फौज तो छोड़िए पुलिस से घिरे हों। कर्फ्यू लगता है तो आप बेचैन हो जाते हैं। कश्मीर में तो अघोषित कर्फ्यू जैसा आलम हमेशा रहता है। मैं कश्मीर को करीब से नहीं जानता लेकिन खबरों के बीच रहने की आदत में कश्मीर से जो भी खबर आती है वो सकारात्मक बहुत कम मौकों पर रही। या तो आतंकियों से मुठभेड़ की खबर या तो पाकिस्तान की तरफ से सीज़फायर का उल्लंघन।
एक हालिया फिल्म का ज़िक्र लाज़मी हो जाता है जिसका नाम है हारुद। हारुद के एक दृश्य में लोगों को बसों से उतरने को कहा जाता है, कश्मीर के डाउन टाउन इलाके से आने जाने वाले लोगों को रोज़ाना एक थका देने वाली चेकिंग प्रक्रिया से गुजरने वाले दृश्य को हारुद में हैदर से बेहतर फिल्माया गया है। हारुद को निर्देशित करने वाले आमिर बशीर हैदर में श्रद्धा कपूर के भाई के किरदार में है। गौरतलब है कि हैदर में भी एक ऐसा ही दृश्य बड़ी जल्दी में फिल्माया गया जबकि हैदर हौले हौले चलने वाली फिल्म है।
देखिए मसला वही है कि कश्मीर में तनाव है और रहेगा भी, कश्मीर को पेचीदगी में जीने की आदत, सरकारों, सेपरेटिस्ट ताकतों और यहां तक की समाचारों की भी दी हुई है। इसलिए अगर परदे पर हमारे फिल्मकार उस तनाव को ही दिखाते हों तो इसमे आपत्ति नहीं होनी चाहिए। फैज़ की नज़्म उम्मीद जगाती है तो हैदर के पिता तनाव वाले दिनो में गुनगुनाते हैं….हम देखेंगे, हम देखेंगे लाज़िम है कि हम भी देखेंगे, वो दिन कि जिसका वादा है