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Tuesday, February 9, 2016

निदा फाजली : तंज और तड़प है उनके लेखन में




-अजय ब्रह्मात्‍मज
    खार दांडा में स्थित उनका फ्लैट मुंबई आए और बसे युवा पत्रकारों और साहित्‍यकारों का अड्डा था। न कोई निमंत्रण और ना ही कोई रोक। उनके घर का दरवाजा बस एक कॉल बेल के इंतजार में खुलने के लिए तैयार रहता था। आप किसी के साथ आएं या खुद पहुंच जाएं। उनकी बैठकी में सभी के लिए जगह होती थी। पहली मुलाकात में ही बेतकल्‍लुफ हो जाना और अपनी जिंदादिली से कायल बना लेना उनका बेसिक मिजाज था। बातचीत और बहस में तरक्‍कीपसंद खयालों से वे लबालब कर देते थे। विरोधी विचारों को उन्‍हें सुनने में दिक्‍कत नहीं होती थी, लेकिन वे इरादतन बहस को उस मुकाम तक ले जाते थे, जहां उनसे राजी हो जाना आम बात थी। हिंदी समाज और हिंदी-उर्दू साहित्‍य की प्रगतिशील धाराओं से परिचित निदा फाजली के व्‍यक्तित्‍व, शायरी और लेखन में आक्रामक बिंदासपन रहा। वे मखौल उड़ाते समय भी लफ्जों की शालीनता में यकीन रखते थे। शायरी की शालीनता और लियाकत उनकी बातचीत और व्‍यवहार में भी नजर आती थी। आप अपनी व्‍यक्तिगत मुश्किलें साझा करें तो बड़े भाई की तरह उनके पास हल रहते थे। और कभी पेशे से संबंधित खयालों की उलझन हो तो वे अपने अनुभव और जानकारी से सुलझा कर उसका सिरा थमा देते थे। मुंबई में पत्रकारों और सात्यिकारों की कई पीढि़यां उनकी बैठकी से समझदार और सफल हुईं। हम सभी उनकी जिंदगी में शामिल थे और हमारी जिंदगी में उनकी जरूरी हिस्‍सेदारी है।
     
1992 के मुंबई के दंगों ने उनकी मुस्‍कारहट छीन ली थी। उन्‍हें अपना फ्लैट छोड़ कर एक दोस्‍त के यहां कुछ रातें बितानी पड़ी थीं। और फिर उन्‍होंने अपनी जिंदगी का एक बड़ा दर्दनाक फैसला लिया था कि वे मुस्लिम बहुल बस्‍ती में रहेंगे। उन दंगों ने मुंबई के बाशिंदों को धर्म के आधार पर बांटा था। अनेक हिंदू और मुस्लिम परिवारों ने अपने ठिकाने बदल लिए लिए थे। मजबूरी में उन्‍हें अपनी धार्मिक पहचान ओढ़नी पड़ी थी। निदा फाजली ताजिंदगी नई रिहाइश और पहचान में बेचैन रहे। उन्‍होंने मस्जिद,अल्‍लाह,मुसलमान सभी पर तंज कसे। भारत पाकिस्‍तान बंटवारे के बाद अपने दोस्‍तों को खो देने के डर से पाकिस्‍तान नहीं गए निदा फाजली अपने चुने हुए शहर के नए बंटवारे के शिकार हुए। उन सभी के प्रति उनके दिल में रंज था, जो इस बंटवारे के जिम्‍मेदार थे। उन्‍होंने उन्‍हें कभी माफ नहीं किया। उनकी तड़प और नाराजगी गजलों,नज्‍मों,दोहों और संस्‍मरणों में व्‍यक्‍त होती रही। मुशायरों में वे अपनी बातें करते रहे। अपने मशहूर कॉलम अंदाज-ए-बयां और में उन्‍होंने साहित्‍यकारों को याद करने के साथ ही उस परंपरा को भी रेखांकित किया,जिसकी आखिरी कड़ी के रूप में हम उन्‍हें देख सकते हैं। हिंदी फिल्‍मों के गीतकारों की साहित्यिक जमात के वे मशहूर नाम हैं। साहित्‍य में उनकी दखल बराबर बनी रही।
    
 खोया हुआ सा कुछ के लिए साहित्‍य अकादेमी पुरस्‍कार से सम्‍मनित निदा फाजली की गद्य और पद्य में समान गति रही। उनकी आत्‍मकथात्‍मक कूतियों दीवारों के बीच और दीवारों के बाहर में हिंदी-उर्दू मिश्रित भाषा की रवानी और अमीरी दिखती है। निदा साहब हमारे समय के कबीर हैं। उन्‍होंने दोनों ही धर्मो के कट्टरपथियों को आड़े हाथों लिया। बच्‍चो,मेहनतकशों,फूलों और पक्षियों के पक्ष में लिखा औा सुनाया। हिंदी फिल्‍मों में कमाल अमरोही की रजिया सुल्‍तान से उनका आगमन हुआ। उन्‍होंने अपनी शर्तों पर ही गीत लिखे। उन गीतों में साहित्‍य की सादगी और गंभीरता बरती।

Friday, February 5, 2016

फिल्‍म समीक्षा : घायल वन्‍स अगेन




प्रचलित छवि में वापसी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
      हिंदी फिल्‍मों के अन्‍य पॉपुलर स्‍टार की तरह सनी देओल ने धायल वन्‍स अगेन में वही किया है,जो वे करते रहे हैं। अपने गुस्‍से और मुक्‍के के लिए मशहूर सनी देओल लौटे हैं। इस बार उन्‍होंने अपनी 25 साल पुरानी फिल्‍म घायल के साथ वापसी की है। नई फिल्‍म में पुरानी फिल्‍म के दृश्‍य और किरदारों को शामिल कर उन्‍होंने पुराने और नए दर्शकों को मूल और सीक्‍वल को जोड़ने की सफल कोशिश की है। नई फिल्‍म देखते समय पुरानी फिल्‍म याद आ जाती है। और उसी के साथ इस फिल्‍म से बनी सनी देओल की प्रचलित छवि आज के सनी देओल में उतर आती है। नयी फिल्‍म में सनी देओल ने बार-बार गुस्‍से और चीख के साथ ढाई किलो के मुक्‍के का असरदार इस्‍तेमाल किया है।
    घायल वन्‍स अगेन में खलनायक बदल गया है। बलवंत राय की जगह बंसल आ चुका है। उसके काम करने का तौर-तरीका बदल गया है। वह टेक्‍नो सैवी है। उसने कारपोरेट जगत में साम्राज्‍य स्‍थापित किया है। अजय मेहरा अब पत्रकार की भूमिका में है। सच सामने लाने की मुहिम में अजय ने सत्‍यकाम संस्‍था खोल ली है। वह सत्‍य उजागर करने और न्‍याय दिलाने में हर तरह के जोखिम के लिए तैयार रहता है। शहर के बाशिंदों का उस पर भरोसा है। वहीं भ्रष्‍ट और अपराधी उससे डरते हैं। हम पाते हैं कि सिस्‍टम और मशीनरी आज भी ताकतवरों के हाथों में है। वे अपने स्‍वार्थ और गलतियों के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। उन्‍हें दूसरों के जान-माल की फिक्र नहीं रहती। एक नई बात है कि खलनायक का एक परिवार भी है,‍िजसके कुछ सदस्‍य नैतिकता की दुहाई देते हैं।
    संयोग कुछ ऐसा बनता है कि शहर के चार युवक-युवतियों को अजय मेहरा में नयी उम्‍मीद नजर आती है। वे दिन-दहाड़े हुई हत्‍या का सच सामने लाना चाहते हैं। उन्‍हें अपने परिवारों से जूझना और वंसल के कारकुनों का मुकाबला करना पड़ता है। अजय मेहरा से उनकी मुलाकात होने के पहले भारी चेज और एक्‍शन चलता है। फिल्‍म एकबारगी दो दशक पीछे चली जाती है। यहां आज के नए दर्शकों को दिक्‍कत हो सकती है। इस दौर में लंबे चेज और दो व्‍यक्तियों की भागदौड़ हास्‍यास्‍पद लगने लगती है। इंटरवल के बाद सनी देओल और बंसल देओल के कारकुन के बीच की धड़-पकड़ कुछ ज्‍यादा लंबी हो गई है। इसी प्रकार ट्रेन के एक्‍शन सीक्‍वेंस में भी समस्‍याएं हैं। एक्‍शन रियल रखा गया है,लेकिन क्रियाएं एक-दूसरे से जुड़ी नहीं रह पातीं। कई बार फिल्‍म के बहाव में दर्शक ऐसी भूलों को नजरअंदाज कर जाते हैं। सनी देओल की गतिविधियां बांधे रहती हैं।
    घायल वन्‍स अगेन में सनी देओल अपनी उम्र के साथ अजय मेहरा के रूप में हैं। वे पिछली फिल्‍म की एनर्जी और एंगर वे लाने की कोशिश करते हैं,लेकिन उम्र आड़े आ जाती है। फिर भी यह सनी देओल का ही कमाल है कि इस उम्र में भी वे प्रभावशाली एक्‍शन करते दिखते हैं। नरेन्‍द्र झा राज बंसल की भूमिका में हैं। नए किस्‍म के खलनायक से हम परिचित होते हैं। वह अपराध में स्‍वयं संलग्‍न नहीं है,लेकिन अपने बिजनेस अंपायर की रक्षा और बेटे को बचाने की कोशिश में वह सिस्‍टम का उपयोग करता है। यहां उसकी क्रूरता नजर आती है। नरेन्‍द्र झा ने इस किरदार को अपेक्षित ठहराव के साथ निभाया है। इस फिल्‍म के पुराने कलाकारों में ओम पुरी और रमेश देव पुराने किरदारों के विस्‍तार के साथ मौजूद हैं। सनी देओल की तरह वे भी नई और पुरानी फिल्‍म के बीच कड़ी बनते हैं। घायल वन्‍स अगेन में चार नए एक्‍टर हैं। आज की युवा शक्ति के तौर पर उन्‍हें पेश किया गया है। शिवम पाटिल,ऋषभ अरोड़ा,आंचल मुंजाल और डायना खान ने दृश्‍यों के मुताबिक अपनी योग्‍यता जाहिर की है। शिवम पाटिल और आंचल मुंजाल मिले दृश्‍यों में उभरते हें। एक्‍शन दृश्‍यों में उनकी भागीदारी और ऊर्जा सराहनीय है।
    फिल्‍म के अंतिम दृश्‍यों के एक्‍शन दृश्‍यों में आज की मुंबई नजर आती है। अपराध और अपराधियों के बदले स्‍वरूप और तेवर से भी हम परिचित होते हैं। एक्‍शन में काफी कुछ नया है। उन्‍हें विश्‍वसनीयता और बारीकी से पेश किया गया है। फिल्‍म के इमोशनल दृश्‍यों में सनी देओल अजय मेहरा के कोमल और भावपूर्ण पक्ष को दिखाते हैं।
    घायल वन्‍स अगेन सनी देओल ने अपने दर्शकों और प्रशंसकों को ध्‍यान में रख कर ही लिखी और निर्देशित की है। यह उसकी खूबी है,जो कुछ हिस्‍सों में सीमा भी बन जाती है।
अवधि-127 मिनट
स्‍टार- तीन स्‍टार  

फिल्‍म समीक्षा : सनम तेरी कसम


रोमांस और रिश्‍तों का घालमेल

-अजय ब्रह्मात्‍मज
    राधिका राव और विनय सप्रू की सनम तेरी कसम रोमांस के साथ संबंधों की भी कहानी है। फिल्‍म की लीड जोड़ी हर्षवर्द्धन राणे और मावरा होकेन की यह लांचिंग फिल्‍म है। पूरी कोशिश है कि दोनों को परफारमेंस और अपनी खूबियां दिखाने के मौके मिलें। लेखक-निर्देशक ने इस जरूरत के मद्देनजर फिल्‍म के अपने प्रवाह को बार-बार मोड़ा है। इसकी वजह से फिल्‍म का अंतिम प्रभाव दोनों नए कलाकारों को तरजीह तो देती है,लेकिन फिल्‍म असरदार नहीं रह जाती।
    फिल्‍म फ्लैशबैक से आरंभ होती है। नायक इंदर(हर्षवर्द्धन राणे) को अपने जीवन की घटनाएं याद आती हैं। फ्लैशबैक में इंदर के जीवन में प्रवेश करने के साथ ही हम अन्‍य किरदारों से भी मिलते हैं। जिस अपार्टमेंट में पार्थसारथी परिवार पहले से रहता है,वहीं इंदर रहने आ जाता है। इंदर की अलग जीवन शैली है। पार्थसारथी परिवार के मुखिया जयराम की पहली भिड़ंत ही सही नहीं रहती। वे उससे नफरत करते हैं। हिंदी फिल्‍मों की परिपाटी के मुताबिक यहीं तय हो जाता है कि इस नफरत में ही मोहब्‍बत पैदा होगी। कुछ यों होता है कि जयराम की बड़ी बेटी सरस्‍वती(मावरा होकेन) और इंदर की मुलाकातें होती हैं। इन मुलाकातों से गलतफहमियां पैदा होती हैं। उनके बीच लगाव भी पनपता है। इस क्रम में सरस्‍वती का कायाकल्‍प हो जाता है। दूसरी तरफ अपने परिवार से उसका नाता टूट जाता है। लेखक-निर्देशक ने इंदर और सरस्‍वती के साथ अन्‍य किरदारें को भी उनके साथ जोड़ा है। वे आते हैं। कुछ दृश्‍यों और प्रसंगों के बाद अनुपस्थित हो जाते हैं।
    सनम तेरी कसम प्रेम,भावना,पारिवारिक संबंध(‍बाप-बेटी,बाप-बेटा,बहनें) और समर्पण में दुविधाओं की भी कहानी है। यह दुविधा फिल्‍म के अंतिम दृश्‍यों में बढ़ जाती है। यों लगता है कि निर्देशक अंत सोच ही नहीं पा रहे हैं। थोड़ा यह और थोड़ा वह दिखाने के चक्‍कर में फिल्‍म का मर्म भी खत्‍म हो जाता है। सनम तेरी कसम में अनेक पुरानी फिल्‍मों की झलकियां भी हैं। किरदारों को बाहरी तौर पर ही आधुनिक बनाया गया है। पहनावे और दिखावे की यह आधुनिकता तब चकनाचूर होती है,जब समझदार और बौद्धिक सरस्‍वती अपने पति के सरनेम के साथ मरने की ख्‍वाहिश जाहिर करती है।
    फिल्‍म की खूगी दोनों नए कलाकारों की मौजूदगी है। दोनों में ताजगी है। उन्‍होंने दिए गए दृश्‍यों में बेहतर प्रदर्शन की कोशिश की है। मावरा के अभिनय में सादगी और स्‍वाभाविकता है। हर्षवद्धन संवाद अदायगी में कुछ कमजोर हैं। उन्‍होंने चलन के मुताबिक देह पर ज्‍यादा ध्‍यान दिया है। अन्‍य काकारों में मनीष चौधरी सख्‍त पिता के तौर पर प्रभावित करते हैं। उनके संवादों में मातृभाषा के थोड़े और संवाद होन चाहिए थे।
    हिमेश रेशमिया के संगीत में मधुरता है। कुछ गाने पहले से पॉपुलर है। खास कर तू खींच मेरी फोटो का फिल्‍मांकन बेहतर है।
अवधि- 155 मिनट
स्‍टार- दो स्‍टार     

Thursday, February 4, 2016

दरअसल : रोचक खोज सलमान खान की

 


-अजय ब्रह्मात्‍मज
खानत्रयी(आमिर,शाह रुख और सलमान खान) के तीनों खान के बारे में देश के दर्शक बहुत कुछ जानते हैं। फिल्‍म स्‍टारों का जीवन अपरिचित नहीं रह जाता। उनके इंटरव्‍यू,उनकी बातें,उनसे संबंधित समाचार और आखिरकार उनकी फिल्‍मों से हर प्रशंसक और दर्शक अपने प्रिय स्‍टार की जीवनी लिखता रहता है। हर नई सूचना जोड़ने के साथ वह उसे अपडेट भी करता रहता है। धारणाएं बना लेता है। फिल्‍मों और फिल्‍म कलाकारों के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ने वाले भी फिल्‍म स्‍टारों की पूरी खबर रखते हैं। जिन फिल्‍मों और फिल्‍म स्‍टारों के साथ वे बड़े होते हैं। उनके प्रति यह लगाव बना रहता है। खानत्रयी के तीनों खानों को हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में 25 साल से अधिक हो गए। इस दरम्‍यान उनके बारे में हजारों किस्‍से फैले और दर्शकों के मानस में बैठ गए।
सुना है कि शाह रुख खान अपनी आत्‍मकथा लिख रहे हैं। यह काम आमिर खान और सलमान खान को भी करना चाहिए। आधिकारिक जीवनी एकपक्षीय हो तो भी उनसे स्‍टार और उनके समय की जानकारी मिलती है। हिंदी फिल्‍मों का संसार और कारोबार इतना बड़ा हो चुका है,लेकिन गतिविधियों,सूचनाओं और घटनाओं के दस्‍तावेजीकरण पर किसी का ध्‍यान नहीं है। केवल अमिताभ बच्‍चन यह कर रहे हैं। सरकारी या गैरसरकारी तौर पर भी कोई कोशिश नहीं हो रही है। हमें लगता है कि सब कुछ तो उपलब्‍ध है। जब जरूरत होगी तो एकत्रित कर लेंगे। इस आलस्‍य में सब कुछ बिखर और खो रहा है। यह हमारे सामाजिक जीवन के साथ व्‍यक्तिगत जीवन में भी होता है।
इस परिप्रेक्ष्‍य में जसीम खान की कोशिश सराहनीय है। जसीम खान ने सलमान खान के जीवन की घटनाओं,उनसे संबंधित व्‍यक्तियों के संस्‍मरण और अन्‍य साक्ष्‍यों से सलमान खान को समझने की कोशिश की है। उनकी पुस्‍तक का नाम ही है-ऐसे क्‍यों हैं सलमान। जसीम खान ने उनके पिता सलीम खान और इंदौर के सगे-संबंधियों की बातों से सलमान खान के स्‍वभाव की धाराओं को समझा है। उन्‍होंने व्‍यक्तित्‍व विश्‍लेषण का प्रयास नहीं किया है। वे स्‍पष्‍ट निष्‍कर्ष से भी बचे हैं। यह पुस्‍तक सलमान खान के बारे में सकारात्‍मक सोच रखती है। सलमान खान की छवि घटनाओं और विवादों की वजह से चकमक कुहासे में है। उनके बारे में जमाने ने धारणाएं बना रखी हैं। सब कुछ जानने और समझने के बाद भी कई लोग यह कहते सुनाई पड़ते हैं कि वे बड़े बाप के बिगड़ैल बेठे हैं। उन्‍हें सजा मिलनी ही चाहिए।
जसीम खान ने सलमान खान के पूर्वजों की तलाश की है। इस तलाश में पता चलता है कि उनके पूर्वज अफगानिस्‍तान के स्‍वात इलाके से एक सूफी पीर आखुद साहिब के साथ आए थे। उन्‍होंने इंदौर को अपना ठिकाना बनाया और बाद में उनके वंशज यहीं पले-बढ़े। इंदौर के राज परिवार होलकर से उनके पूर्वजों के गहरे संबंध थे। उनकी फौज में वे जिम्‍मेदारियों के पद पर रहे। इंदौर में उनके पूर्वजों का रुतबा था। वे बड़े शौकीन मिजाज,मददगार और दरियादिल लोग थे। पूर्वजों की ये खूबियां सलमान खान में भी आई हैं। जसीम खान सलमान खान के प्रति क्रिटिकल नहीं होते। वे खबरों के आईने में उन्‍हें नहीं देखते। और न ही उनकी फिल्‍मों के जरिए उन्‍हें आंकने का यत्‍न करते हैं।
दरअसल,जसीम खान की पुस्‍तक ऐसे क्‍यों हैं सलमान सलमान खान के व्‍यक्तित्‍व की गहराइयों में उतरती है। इस पुस्‍तक में उनके पूर्वजों और इंदौर की की जानकारी तफसील से दी गई है। खुद सलमान खान के बचपन के तार इंदौर से जुड़े हुए हें। वहां की धमाचौकड़ी और मासूम हरकतों में सलमान की जिद और फरागदिली के संकेत मिलते हैं। पुस्‍तक में सलमान खान की प्रेमिकाओं का जरूरी जिक्र है। उनके बनते-बिगड़ते संबंधें की भी पड़ताल की गई है। प्रेमिकाओं के संबंध में उनकी सदाशयता और संबंध टूटने के बाद की खामोशी भी बहुत कुछ कह देती है।
फिल्‍म स्‍टारों की जीवनी लिखने का एक पैटर्न बन चुका है। उसमें उनकी फिल्‍मों के विवरण,रोल और उनके निर्देशकों का उल्‍लेख रहता है। मुख्‍य रूप से फिल्‍मों और फिल्‍मी जिंदगी की ही बातें रहती है। ऐसे क्‍यों हैं सलमान में क्‍यों पर जोर है और उस क्‍यों का जवाब है। 
ऐसे क्‍यों हैं सलमान
लेखक- जसीम खान
प्रकाशक- पेंगुइन बुक्‍स

Friday, January 29, 2016

फिल्‍म समीक्षा : साला खड़ूस

खेल और ख्‍वाब का मैलोड्रामा
-अजय ब्रह्मात्‍मज
    हर विधा में कुछ फिल्‍में प्रस्‍थान बिंदु होती हैं। खेल की फिल्‍मों के संदर्भ में हर नई फिल्‍म के समय हमें प्रकाश झा की हिप हिप हुर्रे और शिमित अमीन की चक दे इंडिया की याद आती है। हम तुलना करने लगते हैं। सुधा कोंगरे की फिल्‍म साला खड़ूस के साथ भी ऐसा होना स्‍वाभाविक है। गौर करें तो यह खेल की अलग दुनिया है। सुधा ने बाक्सिंग की पृष्‍ठभूमि में कोच मदी(आर माधवन) और बॉक्‍सर(रितिका सिंह) की कहानी ली है। कहानी के मोड़ और उतार-चढ़ाव में दूसरी फिल्‍मों से समानताएं दिख सकती हैं,लेकिन भावनाओं की जमीन और परफारमेंस की तीव्रता भिन्‍न और सराहनीय है।
    आदि के साथ देव(जाकिर हुसैन) ने धोखा किया है। चैंपियन बॉक्‍सर होने के बावजूद आदि को सही मौके नहीं मिले। कोच बनने के बाद भी देव उसे सताने और तंग करने से बाज नहीं आता। देव की खुन्‍नस और आदि की ईमानदारी ने ही उसे खड़ूस बना दिया है। अभी कर्तव्‍यनिष्‍ठ और ईमानदार व्‍यक्ति ही घर,समाज और दफ्तर में खड़ूस माना जाता है। देव बदले की भावना से आदि का ट्रांसफर चेन्‍नई करवा देता है। चेन्‍नई में आदि की भिड़ंत मदी से होती है। मछवारन मदी में उसे उसकी बड़ी बहन और बॉक्‍सर लक्‍स(मुमताज सरकार) से अधिक एनर्जी और युक्ति दिखती है। मदी में आदि को खुद जैसी आग का अहसास होता है। वह उसे बॉक्सिंग के गुर सिखाता है और कंपीटिशन के लिए तैयार करता है। साला खड़ूस में दोनों के रिश्‍तों(शिष्‍य-गुरू) के साथ खेल की दुनिया की राजनीति और अंदरूनी कलह पर भी ध्‍यान दिया गया है। दोनों एकदूसरे से प्रभावित भी होते हैं।
    देश में बाक्सिंग का स्‍तर सुधारने के लिए खड़ूस आदि किसी भी स्‍तर तक जा सकता है। वह मदी के लिए सब कुछ करता है। कहीं न कहीं वह उसके जरिए अपने अधूरे ख्‍वाब पूरे करना चाहता है। आदि की यह निजी ख्‍वाहिश स्‍वार्थ से प्रेरित लग सकती है,लेकिन आखिरकार इसमें बॉक्सिंग का हित जुड़ा है। मदी की अप्रयुक्‍त और कच्‍ची ऊर्जा को सही दिशा देकर आदि उसे सफल बॉक्‍सर तो बना देता है,लेकिन देव की अड़चनें नहीं रुकतीं। स्थिति ऐसी आती है कि फायनल मैच के पहले आदि को सारे पदों से त्‍यागपत्र देने के साथ ही अनुपस्थित रहने का निर्णय लेना पड़ता है। फायनल मैच और उसके पहले के कई दृश्‍यों में भी फिल्‍म मैलोड्रैमैटिक होती है। भावनाओं का ज्‍वार हिलोरें मारता है। इन दृश्‍यों की भावुकता दर्शकों को भी द्रवित करती है,लेकिन इस बहाव से अलग होकर सोचें तो साला खड़ूस की तीव्रता इन दृश्‍यों में शिथिल होती है।
    आदि की भूमिका में हम एक अलग आर माधवन से परिचित होते हैं। उन्‍हें हम रोमांटिक और सॉफ्ट भूमिकाओं में देखते रहे हैं। इस फिल्‍म में वे अपनी प्रचलित छवि से बाहर आए हैं और इस भूमिका में जंचे हैं। केवल चिल्‍लाने और ऊंची आवाज में बोलने के दृश्‍यों में उनके संवाद थोड़े अनियंत्रित और अस्‍पष्‍ट हो जाते हैं। भावार्थ तो समझ में आ जाता है। शब्‍द स्‍पष्‍ट सुनाई नहीं पड़ते। परफारमेंस के लिहाज से उनके अभिनय का नया आयाम दिखाई पड़ता है। नयी अभिनेत्री रितिका सिंह का स्‍वच्‍छंद अभिनय साला खड़ूस में जान भर देता है। अपनी खुशी,गुस्‍से और बाक्सिंग के दृश्‍यों में वह बेधड़क दिखती हैं। रियल लाइफ बॉक्‍सर होने की वजह से उनके आक्रमण और बचाव में विश्‍वसनीयता झलकती है। कास्टिंग डायरेक्‍टर मुकेश छाबड़ा की भी तारीफ करनी होगी कि उन्‍होंने किरदारों के लिए उपयुक्‍त कलाकारों का चुनाव किया है। छोटी भूमिकाओं में आए ये कलाकार फिल्‍म के अंति प्रभाव को बढ़ा देते हैं। जूनियर कोच के रुप में आए नासिर और मदी की मां की भूमिका निभा रही अभिनेत्री बलविंदर कौर के उदाहरण दिए जा सकते हैं।
    फिल्‍म में मदी के अंदर आया रोमांटिक भाव पूरी फिल्‍म के संदर्भ में गैरजरूरी लग सकता है,लेकिन उसकी पृष्‍ठभूमि और कंडीशनिंग के मद्देनजर यह प्रतिक्रिया स्‍वाभाविक है। निर्देशक ने संयम से कायम लिया है। उन्‍होंने दोनों के ऊपर कोई रोमांटिक गीत नहीं फिल्‍माया है। स्‍वानंद किरकिरे और संतोष नारायण ने फिल्‍म की थीम के मुताबिक गीत-संगीत रचा है।
अवधि- 109 मिनट
स्‍टार- साढ़े तीन स्‍टार

फिल्‍म समीक्षा : मस्‍तीजादे



बड़े पर्दे पर लतीफेबाजी
-अजय ब्रह्मात्‍मज

 मिलाप झावेरी की मस्‍तीजादे एडल्‍ट कामेडी है। हिंदी फिल्‍मों में एडल्‍ट कामेडी का सीधा मतलब सेक्‍स और असंगत यौनाचार है। कभी सी ग्रेड समझी और मानी जाने वाली ये फिल्‍में इस सदी में मुख्‍यधारा की एक धारा बन चुकी हैं। इन फिल्‍मों को लेकर नैतिकतावादी अप्रोच यह हो सकता है कि हम इन्‍हें सिरे से खारिज कर दें और विमर्श न करें,लेकिन यह सच्‍चाई है कि सेक्‍स के भूखे देश में फिल्‍म निर्माता दशकों से प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष तरीके से इसका इस्‍तेमाल करते रहे हैं। इसके दर्शक बन रहे हैं। पहले कहा जाता था कि फ्रंट स्‍टाल के चवन्‍नी छाप दर्शक ही ऐसी फिल्‍में पसंद करते हैं। अब ऐसी फिल्‍में मल्‍टीप्‍लेक्‍श में दिख रही हैं। उनके अच्‍छे-खासे दर्शक हैं। और इस बार सनी लियोन के एक विवादित टीवी इंटरव्‍यू को जिस तरीके से परिप्रेक्ष्‍य बदल कर पेश किया गया,उससे छवि,संदर्भ और प्रासंगिकता का घालमेल हो गया।
       बहरहाल,मस्‍तीजादे ह्वाट्स ऐप के घिसे-पिटे लतीफों को सीन बना कर पेश करती है। इसमें सेक्‍स एडिक्‍ट और समलैंगिक किरदार हंसी और कामेडी करने के लिए रखे गए हैं। एडल्‍ट कामेडी में कामेडी का स्‍तर निरंतर गिरता जा रहा है। मस्‍तीजादे में भी इसका बेरोक पतन हुआ है। सेक्‍स के इशारे,किरदारों की शारीरिक मुद्राएं,महिला किरदारों के अंगों का प्रदर्शन और द्विअर्थी संवादों में गरिमा की उम्‍मीद नहीं की जा सकती। मस्‍तीजादे में यह और भी फूहड़ और भद्दा है।
        फिल्‍म के हर दृश्‍य में सनी लियोन का इस्‍तेमाल हुआ है। उनके प्रशंसकों के लिए लेखक-निर्देशक ने उन्‍हें डबल रोल में पेश किया है। उनके साथ असरानी,सुरेश मेनन और शाद रंधावा हैं। मुख्‍य कलाकारों में ऐसी फिल्‍मों के लिए मशहूर तुषार कपूर के साथ वीर दास हैं। दोनों ही अभिनेताओं ने अपने तई फूहड़ हरकतें करने में निर्देशक की सोच का साथ दिया है। निर्देशक ने सनी लियोन से डबल रोल में डबल नग्‍नता परोसी है। फिल्‍म की कोई ठोस कहानी नहीं है। उसके अभाव में लेखकों ने केवल सीन और लतीफे जोड़े हैं।
     ऐसी फिल्‍मों के शौकीन भी मस्‍तीजादे से निराश होंगे। फिल्‍म आखिर फिल्‍म तो होनी चाहिए। एडल्‍ट लतीफे और सीन तो अभी थोड़े खर्चे में मोबाइल पर भी उपलब्‍ध हैं।
अवधि-107 मिनट
स्‍टार- एक स्‍टार
     

Thursday, January 28, 2016

दरअसल : मोबाइल पर मूवी



-अजय ब्रह्मात्‍मज


    स्‍मार्ट फोन के आने और प्रचलन से हिंदी सिनेमा का भारी नुकसान हुआ है। अभी लोग फोन में डाटा कार्ड लगाते हैं। उस डाटा कार्ड में पसंद की फिल्‍में लोड कर ली जाती हैं। लाेग आराम से फिल्‍में देखते हैं। पिछले दिनों दीपिका पादुकोण ने अपनी उड़ान में किसी सहयात्री को मोबाइल पर बाजीराव मस्‍तानी देखते हुए देखा। उन्‍होंने आपत्‍त‍ि भी की। यह आम बात है। मुंबई के लोकल ट्रेनों और बसों में आए दिन यात्री फिल्‍म रिलीज के दिन ही अपने मोबाइल पर फिल्‍में देखते नजर आते हैं।

मोबाइल फोन के स्‍क्रीन दो इंच से लेकर आठ इंच तक के होते हें। साधारण स्‍मार्ट फोन भी अब ऑडियो-वीडियो के लिए उपयुक्‍त हो गए हैं। मैंने तो देखा है कि सामान्‍य मोबाइलधारी अपने छोटे मोबाइल के छोटे स्‍क्रीन पर भी फिल्‍में देखते रहते हैं। उन्‍हें कोई परेशानी नहीं होती। फिल्‍म पत्रकारिता से जुड़े मेरे साथी नई फिल्‍मों के ट्रेलर और लुक पहली बार अपने स्‍मार्ट फोन पर ही देखते हैं। बेसिक जानकारी मिल जाने पर घर या दफ्तर पहुंच कर वे तसल्‍ली से पुन: देखते हैं। तात्‍पर्य यह है कि मोबाइल का स्‍क्रीन अब इस योग्‍य हो चुका है कि वह कंटेंट की जानकारी दे दे। और फिर मैंने यह भी देखा है कि कुछ लोग अपनी पसंद की फिल्‍में बार-बार देखते हैं।

मेरी बिल्डिंग में मेरी उम्र के एक सिक्‍युरिटी गार्ड हैं। प्राय: देर रात में फिल्‍मी पार्टियों और शो से लौटने पर मैं उन्‍हें मोबाइल पर फिल्‍में देखते पाता हूं। वे रजिस्‍टर पर मोबाइल फोन को औंधे टिका देते हैं और फिल्‍में देखने के साथ आने-जाने वालों पर भी नजर रखते हें। उनकी प्रिय फिल्‍म है शोले। एक बार मैंने उनसे पूछा कि इस दो इंच के स्‍क्रीन पर वे फिल्‍म का मजा कैसे लेते हैं ? उन्‍होंने अपनी तर्जनी उंगली से ललाट के किनारे दो-तीन बार ठोका और कहा फिल्‍म यहां चलती रहती है। मोबाइल तो सिर्फ याद दिलाता है कि कोन सा सीन है। वास्‍तव में यह रोचक अध्‍ययन का विषय है कि देखी हुई फिल्‍में बार-बार देखते समय एक आम दर्शक के रसास्‍वादन की क्‍या प्रक्रिया होती होगी? क्‍या मोबाइल पर फिल्‍में देख रहे सारे लोगों की रुचि और रसास्‍वादन में कोई फर्क भी है? तकनीकी रूप से दक्ष लोग बता सकते हैं कि मोबाइल से देखी गई फिल्‍मों की मानसिक ग्राह्यता किस स्‍तर की होती है।

मोबाइल पर फिल्‍में देखने के अनेक कारण हैं। महानगरों में समय और पैसों की कमी एक बड़ा कारण है। घर-दफ्तर के आवागमन में फिल्‍में देखने से अतिरिक्‍त समय नहीं खर्च करना पड़ता। बीस से तीस रुपए में नई फिल्‍में फोन पर डाउनलोड या अपलोड हो जाती हैं। सुना है कि मूवी की शेयरिंग भी होती है। मोबाइल पर मूवी देख रहे दर्शकों को इस बात का अहसास भी नहीं रहता कि वे कोई गैरकानूनी काम कर रहे हैं। वे किसी अपराध में शामिल हैं। सभी के पास अपने तर्क और कारण हैं। गौर करें तो वे एक स्‍तर पर वाजिब भी लगने लगते हैं।

हाल ही में आरा निवासी एक दर्शक मिले। संस्‍कारी और भोले किस्‍म के उस दर्शक ने मुझे बताया कि वह बड़े आराम और अधिकार से मोबाइल की दुकान से अपनी पसंद की फिल्‍में ले लेता है। उसने तर्क दिया... आप नर्द फिल्‍मों के बारे में अपने अखबार में बताते हैं। उनके स्‍टार और निर्माता-निर्देशक के इंटरव्‍यू छापते हैं। आप के अखबार से हमें सारी जानकारियां मिल जाती हैं। रिलीज के दिन वह फिल्‍म मेरे शहर में नहीं लगती। अब मैं फिल्‍म देखने के लिए तो पटना नहीं जाऊंगा न? आप निर्माताओं से पूछिए और मुझे बताइए कि वे मेरे शहर में अपनी फिल्‍म का प्रदर्शन क्‍यों नहीं सुनिश्चित करते? क्‍या मुझे पहले दिन या जल्‍दी से जल्‍दी फिल्‍में देखने का हक नहीं है। मेरे जैसे आम दर्शकों को निर्माता और वितरक क्‍यों वंचित रखते हैं? भाई,हम ने तो फिल्‍में देखने का रास्‍ता निकाल लिया है। अब यह गलत है या सही,यह आप सभी सोचते रहें।


Saturday, January 23, 2016

गीत-संगीत में पिरोए हैं कश्‍मीरी अहसास - स्‍वानंद किरकिरे



   
-अजय ब्रह्मात्‍मज
    पशमीना घागों से कोई ख्‍वाब बुने तो उसके अहसास की नजुकी का अंदाजा लगाया जा सकता है। कच्‍चे और अनगढ़ मोहब्‍बत के खयालों की शब्‍दों में कसीदाकारी में माहिर स्‍वानंद किरकिरे फितूर के गीतों से यह विश्‍वास जाहिर होता है कि सुदर और कामेल भवनाओं की खूबसूरत बयानी के लिए घिसे-पिटे लब्‍जों की जरूरत नहीं होती। स्‍वानंद किरकिरे ने अमित त्रिवेदी के साथ मिल कर फितूर का गीत-संगीत रख है। उनकी साला खड़ूस भी आ रही है। शब्‍दों के शिल्‍पकार स्‍वानंद किरकिरे से हुई बातचीत के अंश...
       स्‍वानंद किरकिरे बताते हैं, अभिषेक कपूर और अमित त्रिवेदी के साथ मैाने काय पो छे की थी। उस फिल्‍म के गीत-संगीत को सभी ने पसंद किया था। फितूर में एक बार फिर हम तीनों साथ आए हैं। फितूर का मिजाज बड़ा रोमानी है। ऊपर से काश्‍मीर की पृष्‍ठभूमि की प्रेमकह कहानी है। उसका रंग दिखाई देगा। उसमें एक रुहानी और सूफियाना आलम है। फितूर इंटेंस लव स्‍टोरी है,इसलिए बोलों में गहराई रखी गई है। गानों के रंग में भी फिल्‍म की थीम का असर दिखेगा। मैंने शब्‍दों को बुनते समय कश्‍मीरी अहसास के लिए वहां के लब्‍ज डाले हैं।
    शब्‍दों की यह शिल्‍पकारी तो अधिक मेहनत और जानकारी चाहती होगी। स्‍वानंद हंसने लगते हैं। फिर कहते हैं,शब्‍दकार की मेहनत दिमागी होती है। वह कहां दिखाई पड़ती है। जानकाी तो रहती ही है,लेकिन अनुभव काम आता है। शब्‍दों के चुनाव के लिए खयालों की उड़ान लगानी होती है। फिल्‍मी और घिसे-पिटे शब्‍दों से बचने के साथ यह भी देखना पड़ता है कि प्रयोग किए गए शब्‍दों से भाव न उलझे। इस फिल्‍म के सिलसिले में मैं काश्‍मीर भी गया था। वहां का संगीत सुना। पशमीना घागों में टेंडर लव की बात है। टेंडर लव कितना मुलायम और गर्म होता है। पशमीना में वह भाव आ जाता है। एक गीत में अगर फिरदौस बर्रूए-जमीनस्तो, हमीनस्त, हमीनस्त, हमीनस्तो।' का मैंने इस्‍तेमाल किया है। काश्‍मीर की खूबसूरती की इससे बेहतर अभिव्‍यक्ति नहीं हो सकती। मैंने एक गीत में पहले इस मशहूर पंक्ति के भाव और अर्थ को लेकर कुछ शब्‍दों को जोड़ा था। अभिषेक को लगा कि उसमें वह प्रभाव पैदा नहीं हो रहा है। वह अनुवाद लग रहा है।फिर यह तय हुआ कि मूल पंक्ति ही रखते हैं।
    स्‍वानंद मानते हैं कि अभिषेक कपूर,इम्तियाज अली और राजकुमार हिरानी जैसे फिल्‍मकारों के साथ काम करने का मजा है कि आप पर बाजार के हिसाब से ही लिखने का दबाव नहीं रहता। वे कहते हैं, उनके साथ कुछ अलग काम करने के मौके मिलते हैं। इस फिल्‍म में तो अमित त्रिवेदी का साथ मिला। अमित बहुत सुलझे और मौलिक संगीत निर्देशक हैं। वे कहानी के अंदर से धुनें निकालते हैं। साथ ही वे प्रयोगधर्मी हैं। आप उनकी कोई भी फिल्‍म देख लें। हमीनस्‍त गीत मैंने पहले लिख लिया था। अमित ने बाद में उसे संगीत से सजाया। यह आजकल कम होता है। इस गीत में काश्‍मीर की विडंबना भी सुनाई पड़ेगी। होने दो बतिया मेरे दिल के करीब है।
    स्‍वानंद किरकिरे अपनी अगली फिल्‍म साला खड़ूस का भी जिक्र करते हैं। वे कहते हैं, इस फिल्‍म के गाने भी अव्च्‍छे हैं। नए संगीतकार हैं संतोष नारायण। उनके साथ मजा आया। मैंने राजकुमार हिरानी से कहा था कि मुझे कुछ ओरिजिनल लिखने का मौका देना। मैं तमिल गीतों के आधार पर नहीं लिखूंगा। उन्‍होंने मेंरी बात मानी। आप सभी फिल्‍म देख कर बताएं कि कैसे हैं गीत?

Friday, January 22, 2016

फिल्‍म समीक्षा : जुगनी


प्रेमसंगीत
-अजय ब्रह्मात्‍मज
शेफाली भूषण की फिल्‍म जुगनी में बीबी सरूप को देखते हुए लखनऊ की जरीना बेगम की याद आ गई। कुछ महीनों पहले हुई मुलाकात में उनकी म्‍यूजिकल तरक्‍की और खस्‍ताहाल से एक साथ वाकिफ हुआ था। फिल्‍म में विभावरी के लौटते समय वह जिस कातर भाव से पैसे मांगती है,वह द्रवित और उद्वेलित करता है। पारंपरिक संगीत के धनी साधकों के प्रति समाज के तौर पर हमारा रवैया बहुत ही निराशाजनक है। मां के हाल से वाकिफ मस्‍ताना ने जुगनी के साथ किडनी का तुक मिलाना सीख लिया है। आजीविका के लिए बदलते मिजाज के श्रोताओं से तालमेल बिठाना जरूरी है। फिर भी मस्‍ताना का मन ठेठ लोकगीतों में लगता है। मौका मिलते ही वह अपनी गायकी और धुनों से विभावरी को मोहित करता है। मस्‍ताना की निश्‍छलता और जीवन जीने की उत्‍कट लालसा से भी विभावरी सम्‍मोहित होती है।
जुगनी के एक कहानी तो यह है कि विभावरी मुंबई में फिल्‍म संगीतकार बनना चाहती है। उसे एक फिल्‍म मिली है,जिसके लिए मूल और देसी संगीत की तलाश में वह पंजाब के गांव जाती है। वहीं बीबी सरूप से मिलने की कोशिश में उसकी मुलाकात पहले उनके बेटे मस्‍ताना से हो जाती है। यह ऊपरी कहानी है।  गहरे उतरें तो सतह के नीचे अनेक कहानियां तैरती दिखती हैं। विभावरी के लिविंग रिलेशन और काम के द्वंद्व,बीबी सरूप की बेचारगी,मस्‍ताना और प्रीतो का प्रेम,मस्‍ताना के दादा जी की खामोश मौजूदगी,मस्‍ताना के दोस्‍त की इवेंट एक्टिविटी,मस्‍ताना और विभावरी की संग बीती रात,विभावरी का पंजाब जाना और मस्‍ताना का मुंबई आना...हर कहानी को अलग फिल्‍म का विस्‍तार दिया जा सकता है। मस्‍ताना भी विभावरी के प्रति आकर्षित है। उसका आकर्षण देह और प्रेम से अधिक भविष्‍य की संभावनाओं को लेकर है। रात साथ बिताने के बाद विभावरी और मस्‍ताना की भिन्‍न प्रतिक्रियाएं दो मूल्‍यों और वर्जनाओं को आमने-सामने ला देती हैं। दोनों उस रात को अपने साथ लिए चलते हैं,लेकिन अलग अहसास के साथ।
शेफाली भूषण ने शहरी लड़की और गंवई लड़के की इस सांगीतिक प्रेमकहानी में देसी खुश्‍बू और शहरी आरजू का अद्भुत मेल किया है। दोनों शुद्ध हैं,लेकिन उनके अर्थ और आयाम अलग हैं। फिल्‍म किसी एक के पक्ष में नहीं जाती। देखें तो विभावरी और मस्‍ताना दोनों कलाकार अपन स्थितियों में मिसफिट और बेचैन हैं। संगत में दोनों को रुहानी सुकून मिलता है। उसे प्रेम,यौनाकर्षण या दोस्‍ती जैसे परिभाषित संबंधों और भावों में नहीं समेटा जा सकता है।
फिल्‍म की खोज क्लिंटन सेरेजो और सिद्धांत बहल हैं। एक के सहज संगीत और दूसरे के स्‍वाभाविक अभिनय का प्रभाव देर तक रहता है। क्लिंटन सेरेजो का संगीत इस फिल्‍म की थीम के मेल में है। उन्‍होंने परंपरा का पूरा खयाल रखा है। फिल्‍म की खासियत इसकी गायकी भी है,जिसे विशाल भारद्वाज,ए आर रहमान और स्‍वयं क्लिंटन की आवाजें मिली हैं। सिंद्धांत बहल के अभिनय में सादगी है। सुगंधा गर्ग और अनुरीता झा अपनी भूमिकाओं में सशक्‍त हैं। सुगंधा ने विभावरी के इमोशन की अभिव्‍यक्ति में कोताही नहीं की है। अनुरीता झा ने प्रीतो की अकुलाहट और समर्पण को सुदर तरीके से पेश किया है। बीबी सरूप की संक्षिप्‍त लेकिन दमदार भूमिका में साधना सिंह की मौजूदगी महसूस होती है।
अवधि- 105 मिनट
स्‍टार- साढ़े तीन स्‍टार
  

फिल्‍म समीक्षा : क्‍या कूल हैं हम 3

फूहड़ता की अति
-अजय ब्रह्मात्‍मज
कुछ फिल्‍में मस्‍ती और एडल्‍ट कामेडी के नाम पर जब संवेदनाएं कुंद करती हैं तो दर्शक के मुह से निकलता है- -क्‍या फूल हैं हम? फूल यहां अंग्रेजी का शब्‍द है,जिसका अर्थ मूर्ख ही होता है। उमेश घडगे निर्देशित क्‍या कूल हैं हम एडल्‍ट कामेडी के संदर्भ में भी निराश करती है। हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री के परिचित नाम मुश्‍ताक शेख और मिलाप झवेरी इसके लेखन से जुड़े हैं। अभी अगले हफ्ते फिर से मिलाप झावेरी एक और एडल्‍ट कामेडी लेकर आएंगे,जिसका लेखन के साथ निर्देशन भी उन्‍होंने किया है। क्‍या कूल हैं हम की तीसरी कड़ी के रूप में आई इस फिल्‍म में इस बार रितेश देशमुख की जगह आफताब शिवदासानी आ गए हैं। फिल्‍म की फूहड़ता बढ़ाने में उनका पूरा सहयोग रहा है।
कन्‍हैया और रॉकी लूजर किस्‍म के युवक हैं। जिंदगी में असफल रहे दोनों दोस्‍तों को उनके तीसरे दोस्‍त मिकी से थाईलैंड आने का ऑफर मिलता है। मिकी वहां पॉपुलर हिंदी फिल्‍मों के सीन लेकर सेक्‍स स्‍पूफ तैयार करते हैं। पोर्न फिल्‍मों के दर्शक एक वीडियो से वाकिफ होंगे। मिकी का तर्क है कि वह ऐसी फिल्‍मों से हुई कमाई का उपयोग सोमालिया के भूखे बच्‍चों के लिए भोजन जुटाने में करता है। गनीमत है उसने भारत में चैरिटी नहीं की। मिकी,रॉकी और कन्‍हैया के साथ और भी किरदार हैं। वे सब किसी न किसी रूप सेक्‍स के मारे हैं। यह फिल्‍म ऐसी ही फूहड़ कामेडी के सहारे चलती है।
इस बार फिल्‍म के दृश्‍यों और किरदारों के व्‍यवहार में अधिक फूहड़ता दिखी। संवादों और प्रसंगों में संभवत: सेंसर के वर्त्‍मान रवैए की वजह से एक आवरण रहा है। अश्‍लीलता पेश करने के नए गुर सीख रहे हैं हमारे लेखक-निर्देशक। देखें तो पिछले कुछ सालों में हिंदी फिल्‍मों की मुख्‍यधारा में एडल्‍ट कामेडी शामिल करने की कोशिशें चल रही हैं। पहले भी इस जोनर की फिल्‍में बनती थीं,लेकिन उनमें कहानी के साथ ठोस किरदार भी रहते थे। अब शक्ति कपूर और तुषार कपूर के लतीफों पर लेखक स्‍वयं भले ही हंस लें। दर्शकों को हंसी नहीं आती। फिल्‍म का पहला जोक ही दशकों पुराना है।
अवधि- 131 मिनट
स्‍टार एक स्‍टार