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Saturday, August 30, 2014

निर्माण में आ सकते हैं नवाज


-अजय ब्रह्मात्मज
   
    लंबे अभ्यास और प्रयास के बाद कामयाबी मिलने पर इतराने के खतरे कम हो जाते हैं। नवाजुद्दीन सिद्दिकी के साथ ऐसा ही हुआ है। ‘सरफरोश’ से ‘किक’ तक के सफर में बारहां मान-अपमान से गुजर चुके नवाज को आखिरकार अब पहचान मिली है। इसकी शुरुआत ‘न्यूयार्क’ और कहानी से हो चुकी थी। ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ से उनकी योग्यता पर मुहर लगी और प्रतिष्ठा मिली। अभी स्थिति यह है कि उनके पास मेनस्ट्रीम फिल्मों के भी ऑफर आ रहे हैं। पिछली कामयाबी ‘किक’ के बाद भी नवाज ने तय कर रखा है कि वे साल में एक-दो ऐसी फिल्में करने के साथ अपने मिजाज की फिल्में करते रहेंगे। वे स्पष्ट कहते हैं कि इस पहचान से मेरी छोटी फिल्मों को फायदा होगा। पिछले दिनों मेरी ‘मिस लवली’ रिलीज हुई थी। उसके बारे में दर्शकों का पता ही नहीं चला। उस फिल्म में मैंने काफी मेहनत की थी।
    आमिर खान और सलमान खान के साथ काम कर चुके नवाज दोनों की शैली की भिन्नता के बारे में बताते हैं,‘आमिर खान के बारे में सभी जानते हैं कि वे परफेक्शनिस्ट हैं। उनके साथ रिहर्सल और सीन पर चर्चा होती है। सलमान खान के साथ अलग अनुभव रहा। ज्यादातर स्पॉनटेनियस काम होता रहा। दोनों की निजी खूबियों का असर सीन और फिल्म में दिखता है। मेरे लिए अच्छी बात रही कि लिखने के समय ही साजिद नाडियाडवाला ने इस किरदार के लिए मुझे चुन लिया था। उन्हें मालूम था कि मुझ से क्या चाहिए?’ नवाज आमिर और सलमान की फिल्मों की पहुंच से वाकिफ हैं। उनकी ख्वाहिश है कि भविष्य में उनकी फिल्मों को इस कमर्शियल पहचान का लाभ हो। अभी उनकी कुछ फिल्में तैयार हैं। वे बताते हैं,‘केतन मेहता के साथ मैंने दशरथ मांझी की जिंदगी पर बनी ‘माउंटेन मैन’ की है। बुद्धदेव भट्टाचार्य के साथ ‘अनवर का किस्सा’ कर चुका हूं। एक फिल्म ‘लायर्स डाइस’ है। फैंटम के साथ ‘घूमकेतु’ पूरी हो चुकी है। अभी श्रीराम राघवन के साथ ‘बदलापुर’ की शूटिंग कर रहा हूं।’
    एक कलकार के तौर पर नवाज चाहते हैं कि उन्हें केंद्रीय भूमिकाओं की फिल्में मिलती रहें। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के पुराने तौर-तरीके और व्यावसायिक दृष्टिकोण से फिलहाल ऐसा संभव नहीं हो पा रहा है। नवाज किसी भ्रम में नहीं हैं। वह कहते हैं,‘मुझे अपनी सीमा और पहुंच मालूम है। मैं किसी गलतफहमी में नहीं हूं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में लंबे अनुभव ने बहुत कुछ सिखा दिया है। मैं संतुलन के साथ आगे बढऩे की कोशिश में रहूंगा। मैं तो रोमांटिक लव स्टोरी करना चाहता हूं। उसमें रोमांस का मेरा अपना तरीका होगा।’ नवाज भविष्य में अपनी खूबियों के साथ ऐसी फिल्में करना चाहते हैं,जो पहुंच और बजट में भले ही छोटी हों,लेकिन उनका इंपैक्ट बड़ा हो।
     नवाज बड़े गर्व से कहते हैं कि छोटी फिल्मों ने मुझे निराशा से बचा लिया। मैंने कभी छोटी-बड़ी के खांचे में फिल्मों या रोल को नहीं रखा। काम करता रहा और बेहतर का प्रयास करता रहा। अनुराग कश्यप और कुछ अन्य निर्देशकों ने मुझ पर विश्वास किया। उन अवसरों की वजह से यहां आ सका। नवाज स्पष्ट हैं कि किसी भी सूरत में वह निर्देशन या लेखन की कोशिश नहीं करेंगे। भविष्य में हो सकरी है कि प्रोडक्शन कंपनी आरंभ करें।
   


Friday, August 29, 2014

फिल्‍म समीक्षा : राजा नटवरलाल

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
 ठगों के बादशाह नटवरलाल उर्फ मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव के नाम-काम को समर्पित 'राजा नटवरलाल' कुणाल देशमुख और इमरान हाशमी की जोड़ी की ताजा फिल्म है। दोनों ने इसके पहले 'जन्नत' और 'जन्नत 2' में दर्शकों को लूभाया था। इस बीच इमरान हाशमी अपनी प्रचलित इमेज से निकल कर कुछ नया करने की कोशिश में अधिक सफल नहीं रहे। कहा जा रहा है कि अपने प्रशंसकों के लिए इमरान हाशमी पुराने अंदाज में आ रहे हैं। इस बीच बहुत कुछ बदल चुका है। ठग ज्यादा होशियार हो गए हैं और ठगी के दांव बड़े हो गए हैं। राजा बड़ा हाथ मारने के चक्कर में योगी को अपना गुरु बनाता है। एक और मकसद है। उसे अपने बड़े भाई के समान दोस्त राघव के हत्यारे को सबक भी सिखाना है। उसे बर्बाद कर देना है।
कहानी मुंबई से शुरू होती है और फिर धर्मशाला होते हुए दक्षिण अफ्रीका के शहर केप टाउन पहुंचती है। इमरान हाशमी भी योगी की मदद से राजा से बढ़ कर राजा नटवरलाल बनता है। वह अपना नाम भी मिथिलेश बताता है। फिल्म में ठगी के दृश्य या तो बचकाने हैं या फिर अविश्वसनीय। फिल्म की पटकथा सधी और कसी हुई नहीं है। साफ दिखता है कि डांस और गाने के लिए हीरोइन को बार डांसर बना दिया गया है। पाकिस्तान से आई हुमैमा मलिक को इस फिल्म में करने से अधिक दिखाने का काम मिला है। फुर्सत मिलते ही वह चुंबन और आलिंगन में मशगूल हो जाती हैं। वह समर्थ अभिनेत्री हैं, लेकिन स्क्रिप्ट की मांग ही न हो तो प्रतिभा का क्या करें? इस तरह की फिल्म की जरूरत के मुताबिक वह ढलने की कोशिश करती हैं, लेकिन झिझक उभर कर आ जाती है। हां, इमरान हाशमी अपने पुराने अंदाज में हैं। ऐसे किरदारों को उन्होंने साध लिया है। उन्होंने गाने, तेवर और प्रेजेंस में रौनक बिखेरी है।
'राजा नटवरलाल' में सभी किरदारों को कुछ चुटीले संवाद मिले है। संजय मासूम ने इन संवादों में देसी अनुभवों को शब्दों से सजा दिया है। ये संवाद फिल्म के कथ्य और दृश्यों के अनुरूप हैं और भाव को मारक बना देते हैं। हिंदी फिल्मों में बोलचाल की भाषा के बढ़ते असर में डायलॉग और डायलॉगबाजी की मनोरंजक परंपरा को यह फिल्म वापस ले आती है। कलाकारों में परेश रावल ऐसे किरदारों के लिए पुराने और अनुभवी अभिनेता हैं। लंबे समय के बाद दीपक तिजोरी छोटी सी भूमिका में भी अपनी मौजूदगी दर्ज करते हैं। के के मेनन निराश करते हैं। दरअसल, उनके चरित्र को ढंग से गढ़ा ही नहीं गया है। उनकी एक्टिंग मूंछ और विग संभालने में ही निकल गई है।
अगर आप फिल्म देखें तो अवश्य बताएं कि केके मेनन के किरदार का क्या नाम हैं? मुझे कभी वरदा, कभी वरधा, कभी वर्धा तो कभी वर्दा सुनाई पड़ा। हिंदी फिल्मों में उच्चारण की दुर्गति बढ़ती जा रही है?
अवधि: 141 मिनट
**1/2 ढाई स्‍टार-

Thursday, August 28, 2014

दरअसल : कागज के फूल की पटकथा


-अजय ब्रह्मात्मज
    दिनेश रहेजा और जितेन्द्र कोठारी बड़े मनोयोग से फिल्मों पर लिखते हैं। उनके लेखन में शोध से मिली जानकारी का पुट रहता है। सच्ची बातें गॉसिप से अधिक रोचक और रोमांचक होती हैं। इधर फिल्म पत्रकारिता प्रचलित फिल्मों की तरह ही रंगीन और चमकदार हो गई है। इसमें फिल्म के अलावा सभी विषयों और पहलुओं पर बातें होती हैं? अफसोस यह है कि स्टार,पीआर और पत्रकार का त्रिकोण इसमें रमा हुआ है। बहरहाल,दिनेश रहेजा और जितेन्द्र कोठारी अपने अध्श्वसाय में लगे हुए हैं। इधर उन्होंने पटकथा संरक्षण का कार्य आरंभ किया है। इसके तहत वे गुरु दत्त की फिल्मों की पटकथा प्रकाशित कर रहे हैं। इस कार्य में उन्हें विधु विनोद चोपड़ा और ओम बुक्स की पूरी मद मिल रही है। इस बार उन्होंने गुरु दत्त की क्लासिक फिल्म ‘कागज के फूल’ की पटकथा संरक्षित की है।
    इस सीरिज में दिनेश रहेजा और जितेन्द्र कोठारी गुरु दत्त की फिल्मों की पटकथा को अंग्रेजी,हिंदी और रोमन हिंदी में एक साथ प्रस्तुत करते हैं। हिंदी की मूल पटकथा को उसके भावार्थ के साथ अंग्रेजी में अनुवाद करना कठिन प्रक्रिया है। संवादों के साथ ही लेखकद्वय फिल्म के गीतों का भी भावानुवाद करते हैं। अपनी रोचक शैली में वे अंग्रेजी में भी तुक मिलाने की सफल कोशिश करते हैं। संवादों के भावानुवाद में कभी-कभी कुछ महत्वपूर्ण शब्द छूट जाते हैं। उन्हें थोड़ा सचेत रहना चाहिए। इसके अलावा पटकथा में निर्देश और एक्शन सिर्फ अंग्रेजी में ही दिए जाते हैं। उन्हें हिंदी में भी लिखा जाना चाहिए। हिंदी पाठक इसकी कमी महसूस करते हैं। ‘कागज के फूल’ के बारे में कहा जाता है कि श्ह गुरु दत्त की आत्मकथात्मक फिल्म है।
    पुस्तक के आरंभ में गुरु दत्त की शैली और संघर्ष पर लिखा लेख उनके द्वंद्वों को जाहिर करता है। प्रसिद्धि और सफलता के साथ गुरु दत्त का सही तालमेल नहीं बैठ पाया। उनकी फिल्में अवसाद और उदासी से भरी हैं। दुनियावी सफलता सभी के लिए आवश्यक होती है। खास कर अगर आप फिल्म जैसे जन उपभोग के माध्यम में सक्रिय हैं तो दर्शकों के बीच पहचान बनाने के साथ ही सराहना की भी उम्मीद रहती है। इस फिल्म के मुख्य किरदार सुरेश सिन्हा के जरिए गुरु दत्त ने एक फिल्ममेकर के एकाकीपन को सही संदर्भ में पेश किया है। सफलता की चढ़ाई मुश्किल होती है। सफलता हासिल होने के बाद की फिसलन तो दर्दनाक होती है। बहुत कम लोग ही इस पीड़ा को संभाल पाते हैं। असंयत हो जाना स्वाभाविक है। दर्प और अभिमान आड़े आता है। नए माहौल और स्थिति से एडजस्ट नहीं कर पाने के दुष्परिणाम भी सामने आते हैं। ‘कागज के फूल’ हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के बैकड्राप पर बनी फिल्म है,जिसमें सफलता के अप्रिय सच को गुरु दत्त ने पेश किया है।
    ऐसी पुस्तकों में अगर संबंधित कलाकारों और तकनीशियनों के अनुभव रहते हैं तो फिल्म समझने में बाहरी मदद मिलती है। आम तौर पर फिल्म या उसकी पटकथा से फिल्म का मर्म समझ में आता है। समकालीनों के अनुभव से उस मर्म की सच्चाई भी पता चलती है। इस पुस्तक में उनके बेटे अरुण दत्त,भाई देवी दत्त,दोस्त देव आनंद,कैमरामैन वी के मूत्र्ति और सहायक श्याम कपूर के साक्षात्कारों के जरिए दिनेश और जितेन्द्र ने ‘कागज के फूल’ से संबंधित अंतर्कथाएं भी दे दी हैं।
कागज के फूल
संरक्षण,अनुवाद,लेख और साक्षात्कार-दिनेश रहेजा और जितेन्द्र कोठारी
ओम बुक्स इंटरनेशनल
विनोद चोपड़ा फिल्म्स की पहल
मूल्य- 595 रुपए

Tuesday, August 26, 2014

करें टिप्‍पणी या लिखें कहानी : रणवीर सिंह और अजय ब्रह्मात्‍मज

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रणवीर सिंह पिछले दिनों एक चायनीज नूडल्‍स और अन्‍य खाद्य पदार्थ के उत्‍पादों के ऐड की शूटिंग कर रहे थे। मैं वहां पहुंच गया। उस मुलाकात के इन दृश्‍यों पर आप की टिप्‍पणी और कहानी की अपेक्षा है। सर्वाधिक रोचक और टिप्‍पण्‍ी के लिए एक-एक पुरस्‍कार सुनिश्चित है।


इंस्पायरिंग कहानी है मैरी कॉम की-प्रियंका चोपड़ा


-अजय ब्रह्मात्मज   
प्रियंका चोपड़ा निर्माता संजय लीला भंसाली की ओमंग कुमार निर्देशित ‘मैरी कॉम’ में शीर्षक भूमिका निभा रही हैं। इस भूमिका के लिए उन्हें शारीरिक और मानसिक मेहनत करनी पड़ी है। ‘मैरी कॉम’ तक के सफर में प्रियंका चोपड़ा का उत्साह कभी कम नहीं हुआ। फिल्मों के प्रभाव और सफलता-असफलता के अनुसार उन्हें सराहना और आलोचना दोनों मिली। सीखते-समझते हुए आगे बढऩे के साथ प्रियंका चोपड़ा ने नई विधाओं में भी प्रतिभा का इस्तेमाल किया। ‘मैरी कॉम’ के प्रति वह अतिरिक्त जोश में हैं। इस फिल्म को वह अपने अभिनय करिअर की उपलब्धि मानती हैं।
- इतने साल हो गए,लेकिन आप के उत्साह में कभी कोई कमी नजर नहीं आती। आखिर वह कौन सी प्रेरणा है,जो आप को सक्रिय और सकारात्मक रखती है?
0 मेरे लिए मेरा काम बहुत जरूरी है। जिस दिन काम की भूख खत्म हो जाएगी या असफलता का डर नहीं रहेगा,उस दिन शायद मैं काम करना बंद कर दूंगी। मैं अपने काम को आधात्मिक स्तर पर लेती हूं। फिल्मों में आई तो बच्ची थी। विभिन्न निर्देशकों के साथ काम करते हुए मैंने समझा कि एक्टिंग हुनर है। यह एक क्राफ्ट है। अभ्यास करने से ही हम बेहतर होंगे। अभी तो वैरायटी की फिल्में बन रही हैं। मेरे लिए किरदार लिखे जा रहे हैं। ‘फैशन’,‘सात खून माफ’,‘बर्फी’ और अभी ‘मैरी कॉम’ में मुझे अलग-अलग किरदार मिले। एक आसान रास्ता है कि मैं घिसी-पिटी फिल्में कर खुद को दोहराती रहूं। मुझे कमर्शियल मसाला फिल्मों से गुरेज नहीं है। मैं वैसी फिल्में भी करती रहूंगी ताकि ऐसी फिल्में कर सकूं। मेरे लिए यह संतुलन जरूरी है।
-दस साल पहले ऐसे पोस्टर की कल्पना नहीं की जा सकती थी,जिसके पोस्टर पर सिर्फ अभिनेत्री हो और वह भी अपने किरदार के पोज में। यह हिंदी फिल्मों का सहज विकास है या आप अभिनेत्रियों की उपलब्धि है?
0 यह तो और मुश्किल होता है ‘इन एंड ऐज’। पोस्टर दिखा कर मुग्ध होती हैं प्रियंका। इसमें दोनों का रोल है। अभी ऐसी अभिनेत्रियां आई हैं,जो हर जोखिम के लिए तैयार हैं। आप ने सुना होगा कि हीरोइनें पूछती हैं कि हीरो कौन है? वह भी जरूरी है। कुछ फिल्मों की कहानी पावरफुल होती है। दर्शक भी अच्छी कहानियां सुनने और देखने के लिए तैयार हैं। अभी ज्यादा एक्सपोजर हो चुका है। रायटर और फिल्ममेकर भी नए विषयों पर फिल्में बना रहे हैं। यह दौर हम अभिनेत्रियों और फिल्मों के लिए बहुत अच्छा है।
-‘मैरी कॉम’ को किस तरह की फिल्म कहें? क्या यह एक अचीवर की कहानी है या एक औरत की बॉयोपिक है या किसी औा श्रेणी की फिल्म है ?
0 यह एक ऐसे इंसान की कहानी है,जिसने सीमा में रहने से इंकार कर दिया। वह डिब्बाबंद नहीं रहना चाहती थी। चावल उगाने वाले किसान की बेटी होने के बावजूद बॉक्सर होने के ख्वाब देख सकती हूं। जिस साल भारत में महिलाओं की बॉक्सिंग आरंभ हुई,वह मैरी कॉम का भी पहला साल था। बंदिशों को तोड़ कर अपने बड़ेे सपनों के लिए कुछ भी करूंगी।  इस फिल्म से हर दर्शक जुड़ाव महसूस करेगा,क्योंकि हम सभी पर बंदिशें लगी रहती है।
-मैरी कॉम से हुई बातों-मुलाकातों में उनकी कौन सी बात आप को सबसे अच्छी लगी?
0 वह खुशमिजाज हैं। किसी की सहानुभूति नहीं चाहतीं। किसी भी लडक़ी के आत्मविश्वास के लिए गर्व सबसे जरूरी है। आत्मसम्मान की धनी है। मुझ में और उनमें कई समानताएं हैं।
-कुछ आलोचकों को लगता है कि यह फिल्म मशहूर हो चुकी मैरी कॉम का इस्तेमाल है? क्या कहेंगी?
0 अगर कोई इंसान परिचित और मशहूर है तो उसकी कहानी नहीं कही जानी चाहिए। मुझे लगता है कि लोग जजमेंटल हो गए है? फट से फैसले सुना देते हैं। मैरी कॉम अर्जुन पुरस्कार से सम्मनित सबसे कम उम्र की एथलीट हैं। वह किन परिस्थितियों से यहां तक आईं? मुझे नहीं मालूम कितने लोग उनके बारे में जानते हैं। यह एक मौका है उन्हें देखने और जाने का। मुझे मैरी कॉम की स्टोरी इसलिए अच्छी लगी कि उसने अपने घर-परिवार और समाज के साथ सब हासिल किया है। मैं उनके साथ रह चुकी हूं। उनकी कहानी इंस्पायरिंग है। लिजेंड होने के लिए लाइफटाइम बिताना जरूरी नहीं है। फिल्में एक बिजनेस भी हैं। हम ऐसी फिल्में चुनते और बनाते हैं,जो दर्शकों को पसंद आएं।
- लिविंग लिजेंड के बॉयोपिक में चेहरे की समानता आवश्यक होती है। क्या आप को लगता है कि दर्शक संतुष्ट होंगे?
0 हम दोनों एक जैसे नहीं लगते। पहले नार्थ ईस्ट के कलाकारों का ऑडिशन किया गया। यह फिल्म बड़े स्केल की हो गई तो उसके लिए ऐसे एक्टर की जरूरत पड़ी,जो बिजनेस के लिहाज से सही हो। छोटे स्तर पर बनती तो शायद रिस्क लिया जा सकता था। ओमंग और संजय सर ने सहायक भूमिकाओं मं नार्थ ईस्ट के कलाकारों को ही लिया गया है। मुझे उम्मीद है कि मैं दर्शकों को निराश नहीं करूंगी। इस फिल्म के जरिए नार्थ ईस्ट पहली बार हिंदी सिनेमा के मेनस्ट्रीम में आएगा। देश के आम दर्शक अपने ही देश के एक हिस्से को करीब से जानेंगे।



Monday, August 25, 2014

टीवी सीरिज ‘होमलैंड 4’ में निम्रत कौर


-अजय ब्रह्मात्मज
    2013 में आई फिल्म ‘लंचबाक्स’ में इला की भूमिका निभा कर मशहूर हुई निम्रत कौर हाल ही में अमेरिकी टीवी सीरिज ‘होमलैंड 4’ की आरंभिक शूटिंग कर लौटी हैं। इस टीवी सीरिज की शूटिंग दक्षिण अफ्रीका के शहर केप टाउन में चल रही है। वहां इस्लामबाद का सेट लगाया गया है। निम्रत कौर इस टीवी सीरिज में पाकिस्तानी आईएसआई अधिकारी तसनीम कुरेशी की भूमिका निभा रही हैं। पहले योजना थी कि इजरायल में ही शूटिंग की जाए।  बाद में इसे केपटाउन में शिफ्ट कर दिया गया। ‘होमलैंड’ इजरायली टीवी सीरिज का अमेरिकी संस्करण है। निम्रत कौर के मुताबिक केपटाउन में ही इस्लामबाद का सेट लगाया गया है। मेरा सारा काम यहीं होना है। ‘होमलैंड 4’ की कहानी पाकिस्तान और अफगानिस्तान में घूमती है।
      ‘होमलैंड’ इजरायली टीवी सीरिज का अमेरिकी संस्करण है। ‘होमलैंड’ एक अमेरिकी फौजी की कहानी है। अफगानिस्तान से उसे बचा कर लाया तो जाता है,लेकिन शक है कि वह आतंकवादियों का एजेंट बन गया है। युद्धवीर की सीधी तहकीकात नहीं की जा सकती,इसलिए अप्रत्यक्ष घेराबंदी की जाती है। ‘होमलैंड’ के तीन सीजन आ चुके हैं। तीनों सीजन अमेरिका के शोटाइम चैनल पर बहुत पॉपुलर रहे हैं। चौथे सीजन का प्रसारण 5 अक्टूबर से आरंभ होगा। चौथे सीजन के चौथे एपीसोड में निम्रत कौर नजर आएंगी और उसके बाद बारहवें एपीसोड तक रहेंगी। ‘होमलैंड’ का हर सीजन 12 एपीसोड का होता है।
    मजेदार घटना है कि हाल ही में निम्रत कौर पहली बार लंदन गई थीं। वहां उन्हें अपने एजेंट से ‘होमलैंड 4’ के ऑडिशन की जानकारी मिली। लंदन में पहले दिन ही उन्होंने ऑडिशन दे दिया। तब तक उन्होंने ‘होमलैंड’ के पिछले सीजन नहीं देखें थे। निम्रत कहती हैं,‘जब कुछ खास होना होता है तो यों ही हो जाता है। अमेरकी टीवी सीरिज में काम करने की कोई योजना नहीं थी,लेकिन अभी मैं उसकी शूटिंग कर रही हूं। मुंबई में ‘लंचबाक्स’ की रिलीज के बाद दर्जनों डायरेक्टर से मिल चुकी हूं और 30-32 स्क्रिप्ट पढ़ डाली। कहीं बात नहीं बनी। इंतजार में हूं कि अगली फिल्म शुरु हो। ‘लंचबाक्स’ पिछले साल 20 सितंबर को रिलीज हुई थी। लगभग एक साल हो गए। यह तो अच्छा हुआ कि ‘होमलैंड 4’ का ऑफर मिल गया।’
    निम्रत कौर समझ नहीं पातीं कि उन्हें उचित किस्म की हिंदी फिल्में क्यों नहीं मिल पा रही हैं? वह स्वीकार करती है कि शायद ‘लंचबाक्स’ को मिली सराहना से एक धारणा बन गई होगी। सभी को लगता होगा कि मैं घरेलू महिला की भूमिका के लिए ही उपयुक्त हूं। वह बताती हैं,‘फिल्मों से पहले जब मैं ऐड कर रही थी,तब दोस्त यही कहते थे कि तुम्हारा रेगुलर लुक नहीं है। तुम्हें हिंदी फिल्में कैसे मिलेंगी? मतलब मैं शहरी लगती हूं। अभी ‘लंचबाक्स’ कर ली तो यह धारणा सी बन गई है कि मैं इला जैसी ही भूमिकाएं कर सकती हूं। यह तो ज्यादती है। मैं अच्छी स्क्रिप्ट के इंतजार में हूं। मुझे बड़ी या छोटी फिल्म से फर्क नहीं पड़ता। मुझे अपना किरदार पसंद आना चाहिए। अभी कुछ निर्देशकों से बातें चल रही हैं। उनमें से एक निखिल आडवाणी हैं। उनके साथ एक फिल्म करूंगी। अपनी उम्र और लुक का सही एहसास है मुझे। मैं छरहरी हीरोइन नहीं हो सकती हूं। अभी इतनी तरह की फिल्में बन रही हैं। यकीनन कोई मेरी पर्सनैलिटी के हिसाब से स्क्रिप्ट लिख रहा होगा। बस,उसी स्क्रिप्ट की प्रतीक्षा है।’
    ‘होमलैंड 4’ से विदेशी फिल्मों और टीवी सीरिज के द्वार खुल सकते हैं ना? निम्रत कौर फिलहाल ऐसी हड़बड़ी में नहीं हैं। वह ‘होमलैंड 4’ के प्रसारण और उस पर मिली प्रतिक्रिया के बाद ही कोई बड़ा फैसला लेंगी। फिलहाल वह इस सीरिज में काम करने का आनंद उठा रही हैं। वह कहती हैं,‘उनके काम करने का तरीका बहुत अनुशासित है। सारी तैयारियां पहले हो चुकी होती हैं। इस सीरिज के निर्माता-निर्देशक चौकस रहते हैं। मुझे मालूम नहीं कि मेरा किरदार आगे क्या रूप लेगा। भारत की तरह वहीं भी टीवी सीरिज के किरदारों का भविष्य उनकी लोकप्रियता के अनुसार प्रभावित होता है।’ वह आगे जोड़ती हैं,‘स्वयं ‘लंचबाक्स’ अमेरिका और अन्य देशों में इतना पॉपुलर रहा और देखा-सराहा गया है कि हमें आरंभिक पहचान मिल गई है। अगर विदेशों में काम मिलता है तो क्यों नहीं करूंगी? अभी के दौर में कलाकारों के लिए अनेक अवसर हैं। पहला ब्रेक मिलने के बाद चीजें आसान हो जाती हैं। ’

Friday, August 22, 2014

फिल्‍म समीक्षा : मर्दानी

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
यशराज फिल्म्स की प्रदीप सरकार निर्देशित 'मर्दानी' में रानी मुखर्जी मुंबई पुलिस के क्राइम ब्रांच की दिलेर पुलिस इंस्पेक्टर शिवानी शिवाजी राव की भूमिका निभा रही हैं। इस फिल्म का नाम शिवानी भी रहता तो ऐसी ही फिल्म बनती और दर्शकों पर भी ऐसा ही असर रहता। फिल्म का टाइटल 'मर्दानी' में अतिरिक्त आकर्षण है। यशराज फिल्म्स और प्रदीप सरकार ने महज इसी आकर्षण के लिए सुभद्रा कुमारी चौहान की मशहूर कविता 'खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी' 'मर्दानी' शब्द ले लिया है। हिंदी फिल्मों के हाल-फिलहाल की फिल्मों से रेफरेंस लें तो यह 'दबंग' और 'सिंघम' की श्रेणी और जोनर की फिल्म है। फिल्मों की नायिका मर्दानी हो तो उसकी जिंदगी से रोमांस गायब हो जाता है। यहां रानी मुखर्जी पुलिस इंस्पेक्टर के साथ जिम्मेदार गृहिणी की भी भूमिका निभाती हैं। बतौर एक्टर स्क्रिप्ट की मांग के मुताबिक वह दोनों भूमिकाओं में सक्षम दिखने की कोशिश करती हैं। उन्हें बाल संवारने भी आता है। गोली चलाना तो उनकी ड्यूटी का हिस्सा है। उल्लेखनीय है कि किसी पुरुष पुलिस इंस्पेक्टर को फिल्मों में घरेलू काम करते हुए नहीं दिखाया जाता है, लेकिन वह महिला हो तो उसके क्रिया-कलाप में घरेलू काम दिखाए ही जाते हैं।
शिवानी शिवाजी राव या राय दबंग पलिस इंस्पेक्टर हैं। क्राइम ब्रांच की जरूरतों के मुताबिक वह खतरनाक अपराधियों को गिरफ्तार करने से लेकर उन्हें सबक सिखाने तक का काम कर्मठता से करती हैं। अपनी भाषा और लतीफों में वह किसी आम पुलिस अधिकारी की तरह ही गाली-गलौज इस्तेमाल करने से नहीं हिचकती। फिल्म का आरंभ बहुत ही सहज और नया है, लेकिन पहली भिडंत के साथ ही 'मर्दानी' आम पुलिसिया फिल्मों की तरह लकीर की फकीर हो जाती है। सिर्फ एक ही फर्क रहता है कि यहां पुलिस इंस्पेक्टर महिला है। बाकी उसके बात-व्यवहार और काम करने के तरीके में कोई फर्क नहीं होता। हालांकि फिल्म का खलनायक कहता है कि औरतें सभी बातों को पर्सनल ले लेती हैं। उसे कहना चाहिए था कि मुख्य किरदार किसी घटना को पर्सनली लेने पर ही एक्टिव होते हैं। शिवानी की दत्तक पुत्री प्यारी का अपहरण नहीं हुआ रहता तो शायद उसे चाइल्ड ट्रैफिकिंग के बारे में पता भी नहीं चलता। प्यारी को हासिल करने के चक्कर में वह चाइल्ड ट्रैफिकिं ग और ड्रग्स के अवैध कारोबार के का पर्दाफाश करने की मुहिम में शामिल हो जाती है।
इस फिल्म का मकसद रानी मुखर्जी की प्रतिभा के आयाम और विस्तार कि चित्रध के लिए ही किया गया है। लेखक-निर्देशक की कोशिश किरदार को निखारने से अधिक कलाकार को मौके देने की रही है। इस प्रयास में किरदार और कलाकार की संगत टूटती है। इसका एक फायदा हुआ है कि फिल्म के खलनायक को पहचान मिल गई है। वाल्ट के किरदार में ताहिर राज भसीन अपनी अदायगी से ध्यान खींचते हैं। निश्चित ही उन्होंने इस किरदार को खास बना दिया है। वाल्ट की क्रूरता उसकी सहजता में ज्यादा उभरी है। फिल्म में वकील की भूमिका निभा रहे कलाकार ने भी ऐसे चालू किरदार को अलग अंदाज दिया है। रानी मुखर्जी जांबाज पुलिस इंस्पेक्टर की भूमिका के लिए आवश्यक स्फूर्ति का प्रदर्शन करती हैं। उन्हें एक्शन और खलनायक से अकेले भिडऩे का भी मौका मिला है, लेकिन वह नियोजित और साधारण दिखता है। रानी की खूबी संवाद अदायगी और शिवानी के किरदार की पेशगी में है। रानी ने शिवानी के किरदार को मर्दानी बनाने में जी-तोड़ मेहनत की है। महिला होने के वजह से उन्हें गर्दा उड़ाऊ और धरतीछोड़ एक्शन नहीं दिए गए हैं।
हालांकि फिल्म में चाइल्ड ट्रैफिकिंग के आंकड़े और रेफरेंस देकर फिल्म को मुद्दापरक बताने की कोशिश है, लेकिन पूरी फिल्म मसाला एंटरटेनमेंट की चालू परंपरा का महिला संस्करण है। नायिका प्रधान होने के बावजूद यह महिला प्रधान फिल्म नहीं है। फिल्म के अंत में औरतों के एहसास और आत्मानूभूति से प्रेरित एक स्त्री गान भी है, जो फिल्म के मनोरंजक प्रभाव को जबरदस्ती फेमिनिस्ट रंग देने की असफल कोशिश करता है। प्रदीप सरकार 'परिणीता' के बाद के दो असफल प्रयासों के पश्चात 'मर्दानी' में रानी मुखर्जी की मदद से थोड़े रंग मे दिखते हैं।
अवधि-114 मिनट
*** तीन स्‍टार 

फिल्‍म समीक्षा : मैड अबाउट डांस

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
 पांच रुपैया बारह आना प्रोडक्शन की 'मैड अबाउट डांस' साहिल प्रेम की पहली फिल्म है। पहली फिल्म में अभिनय के साथ लेखन और निर्देशन की भी जिम्मेदारी उन्होंने संभाली है। डांस जोनर की यह फिल्म किशोर और युवा दर्शकों की रुचि का खयाल रखती है। साहिल प्रेम ने ऐसी फिल्मों की परंपरा में ही कुछ नया करने की कोशिश की है। डांस जोनर की फिल्मों में नायक या नायिका शिद्दत से डांस के जरिए अपने पैशन को पूरा करना चाहते हैं। प्राइज मनी और शोहरत से ज्यादा उनका इंटरेस्ट श्रेष्ठ होने की तरफ रहता है। साहिल प्रेम की फिल्म में आरव आनंद की ख्वाहिश है कि वह दुनिया के सर्वश्रेष्ठ डांसर सीजर के ग्रुप में शामिल हो।
भारतीय माता-पिता अभी तक गैरपारंपरिक पढ़ाई और पैशन को नजरअंदाज कर अपने बज्चों को परिचित पेशों में जाने के उद्देश्य से पड़ाई करने की व्यावहारिक सलाह देते हैं। हिंदी फिल्मों और समाज में अब यह दिखने लगा है कि बच्चे अपनी जिद्द किसी बहाने या सीधे तरीके से पूरी करना चाहते हैं। आरव भी किसी और पढ़ाई के बहाने विदेश में सीजर के शहर पहुंचता है। उसका एक ही मकसद है कि वह सीजर से मिल ले और उसके ग्रुप में शामिल हो जाए। परिस्थितियां कुछ ऐसी बनती हैं कि वह सीजर के मुकाबले में आ जाता है। डांस कंपीटिशन में उसे सीजर के ग्रुप को हराना है। इस मुश्किल काम में इमोशन भी जोड़ दिए गए हैं।
साहिल प्रेम की 'मैड अबाउट डांस' में डांस के प्रति आरव की दीवानगी को अच्छी तरह चित्रित किया गया है। आरव के सामने अनेक चुनौतियां हैं। अपने मित्रों की मदद से वह उन चुनौतियों के बीच ही अपना ग्रुप तैयार करता है। यह फिल्म आरव के संघर्ष के साथ ही भारतीय और एशियाई मूल के लोगों के प्रति श्वेतरंगी समुदाय की श्रेष्ठ ग्रंथि को भी दर्शाती है। एक दूश्य में आरव को 'ब्राउनी' संबोधित करते हुए एक श्वेत किरदार कहता भी है कि तुम लोग टैक्सी चलाने, रसोई बनाने और बैरे के काम करने के उपयुक्त हो। डांस करना तुम्हारा काम नहीं है। यह प्रतिक्रिया कहीं न कहीं हमारे समाज की कमियों की तरफ भी इशारा करती है,जहां अभी तक परफॉर्मेंस की विधाओं को पेशेवर नहीं माना जाता। बहरहाल,आरव अपने ग्रुप के साथ साबित करता है कि पैशन और प्रैक्टिस से 'ब्राउनी' भी डांस में विजय हासिल कर सकते हैं।
साहिल प्रेम लेखन और निर्देशन के पहले प्रयास में उम्मीद जगाते हैं। आरव की भूमिका निभा रहे साहिल प्रेम में अपने किरदार की चपलता और एनर्जी है। उन्होंने सहयोगी कलाकारों के चुनाव में उनके नृत्य कौशल का ध्यान रखा है। यही वजह है कि डांस के सभी सिक्वेंस में गति और ऊर्जा नजर आती है। साहिल प्रेम नाटकीय और संवाद के दृश्यों में थोड़े अनगढ़ हैं, जिसकी भरपाई वह अपने डांस से कर देते हैं। नायिका के तौर पर अमृत मघेरा ने उनका बराबर साथ दिया है। आरव के अमीर और जिंदादिल दोस्त के रूप राशुल आनंद अपने किरदार और अदायगी की वजह से याद रह जाते हैं।
अवधि:125 मिनट
**r1/2 ढाई स्‍टार 

Thursday, August 21, 2014

दरअसल : बदल रहे हैं प्रचार के तरीके


-अजय ब्रह्मात्मज
    कुछ सालों पहले तक प्रचार के सामान्य तरीके थे। फिल्म आने के पहले टीवी पर प्रोमो आने लगते थे। सिनेमाघरों में ट्रेलर चलते थे। रिलीज के एक हफ्ते पहले से शहरों की दीवारों पर फिल्म के पोस्टर नजर आने लगते थे। मीडिया के साथ फिल्म यूनिट के सदस्यों की बातचीत रहती थी,जिसमें फिल्म के बारे में कुछ नहीं बताया जाता था। आज भी नहीं बताया जाता। फिल्म सिनेमाघरों में लगती थी। कंटेंट और क्वालिटी के दम पर फिल्म कभी गोल्डन जुबली तो कभी सिल्वर जुबली मना लेती थी। कुछ फिल्में डायमंड जुबली तक भी पहुंचती थीं। तब कोई नहीं पूछता और जानता था कि फिल्म का कलेक्शन कैसा रहा? सभी यही देखते थे कि फिल्म कितने दिन और हफ्ते चली। फिर एक समय आया कि 100 दिनों के सफल प्रदर्शन के पोस्टर लगने लगे। समय बदला तो प्रचार के तरीके भी बदले।
    बीच के संक्रमण दौर को छलांग कर अभी की बात करें तो यह आक्रामक और महंगा हो गया है। फिल्म आने के चार-पांच महीने पहले से माहौल तैयार किया जाता है। अभी सारा जोर जानकारी से अधिक जिज्ञासा पर रहता है। माना जाता है कि दर्शकों की क्यूरोसिटी बढ़ेगी तो वे सिनेमाघरों में आएंगे। क्यूरोसिटी बढ़ाने के लिए कतई जरूरी नहीं है कि फिल्म की बात की जाए। यह काम किसी भी प्रकार की एक्टिविटी से किया जा सकता है। धार्मिक स्थानों में मत्था टेकने से लेकर नाचने-गाने तक के आयोजन किए जा सकते हैं। हमेशा कोशिश यही रहती है कि चर्चा हो। अखबारों और चैनलों में बगैर पैसे खर्च किए फिल्म,फिल्म के कलाकारों और उनसे संबंधित बातें होती रहें। इन दिनों टीवी प्रचार का सशक्त और असरदायक माध्यम हो गया है। टीवी में भी चल रहे गेम शोज,टॉक शोज,कामेडी शोज और नियमित धारावाहिकों में फिल्म के कलाकारों को शामिल किया जाता है। इन दिनों छोटे-बड़े हर स्टार कामेडी नाइट्स विद कपिल में जरूर शामिल होते हैं। कई आर आप महसूस कर सकते हैं कि वहां अपनी मौजूदगी पर वे झेंप रहे हों।
    फिल्मों का प्रचार निरंतर महंगा होता जा रहा है। पहले फिल्म के बजट का एक छोटा हिस्सा ही प्रचार में खर्च किया जाता था। कुल लागत का का 5-10 प्रतिशत ही पर्याप्त माना जाता था। अभी यह खर्च बढ़ कर फिल्म के बजट से ज्यादा हो जाता है। छोटी फिल्मों को भी इस मद में 4-5 करोड़ खर्च करना ही पड़ता है,जबकि कई बार उनकी लागत इस रकम से कम होती है।  खानत्रयी और अन्य पॉपुलर स्टारों की कथित बड़ी फिल्मों के खर्च का अनुमान लगाना मुश्किल हो जाता है,क्योंकि इसमें उन स्टारों के महंगे दिन भी शामिल रहते हैं। इन दिनों अधिकांश बड़े स्टार अपनी फिल्मों के सहनिर्माता या लाभांशी होते हैं,इसलिए वे बगैर हीज-हुज्जत के प्रचार के लिए समय देते हैं। प्रचार की कमान मुख्य रूप से हीरो के हाथों में रहती है। उसी का स्टारडम दांव पर लगा रहता है। ओम शांति ओम के समय से शाह रुख खान ने आक्रामक प्रचार की शुरुआत की। अभी श्ह इस स्थिति में पहुंच गया है कि सभी स्टारों को लोहे के चने चबाने पड़ रहे हैं। सभी एक-दूसरे पर तोहमत लगाते हैं,लेकिन कोई भी पीछे नहीं हटता।
    सलमान खान की किक आकर सफल हो चुकी है। वे अगली फिल्म तक आराम कर सकते हैं। अभी शाह रुख और आमिर की बारी है। आमिर की फिल्म पीके के पोस्टर पर बेहिसाब बवाल हो चुका है। कुछ आलोचकों को लगता है कि पीके की टीम ने अश्लीलता का सहारा लिया है। उसके पक्ष-विपक्ष में तर्क दिए जा रहे हैं,इस बहसबाजी से पीके चर्चा के केंद्र में आ गई है। शाह रुख क्यों पीछे रहते। उन्होंने अपनी फिल्म का ट्रेलर भव्य स्तर पर लांच किया। यह अभी तक की सबसे विशाल और भव्य लांचिंग रही। शाह रुख मानते हैं कि उनकी फिल्मों से जुड़ा हर कार्यक्रम एक इवेंट हो। वे फिल्म को भी मनोरंजक इवेंट की संज्ञा देते हैं।

Tuesday, August 19, 2014

दरअसल : आत्मकथा दिलीप कुमार की


-अजय ब्रह्मात्मज
    पिछले दिनों दिलीप कुमार की आत्मकथा आई। इसे उनकी विश्वस्त फिल्म पत्रकार उदयतारा नायर ने लिखा है। दिलीप कुमार ने उन्हें अपनी जिंदगी के किस्से सुनाए हैं। ऐसी आत्मकथाओं में लेखक की संलग्नता अंदरुनी नहीं रहती। खुद के बारे में लिखते हुए जब लेखक रौ में आता है तो कई बार उन प्रसंगो और घटनाओं के बारे में अनायास लिख जाता है,जिन्हें उसका सचेत मन लिखने से रोकता है। इन बहके उद्गारों में ही लेखक का जीवन निर्झर और अविरल बहता है। बताते और लिखवाते समय अक्सरहां लेखक खुद ही अपने जीवन को एडिट करता जाता है। वह नहीं चाहता कि कोई आहत हो या स्वयं उसकी अर्जित छवि में कोई दाग नजर आए। उदयतारा नायर को बताई गई इस आत्मकथा में यह दिक्कत बार-बार आती है। जीवन में ही किंवदंती बन चुके दिलीप कुमार के बारे में हम इतना जानते हैं कि इस आत्मकथा में चुनिंदा तरीके से कुछ प्रसंगों का जिक्र तक न होना खलता है।
    445 पृष्ठों की इस किताब में उदयतारा नायर ने स्वयं दिलीप कुमार के हवाले से उनके जीवन के अनसुने पहलुओं का उजागर किया है। परिवार के प्रति उनका समर्पण देखते ही बनता है। अपनी लोकप्रियता और व्यस्तता के बावजूद उन्होंने पारिवारिक जिम्मेदारियों से कभी मुंह नहीं मोड़ा। हाल ही में उनके भाइयों ने उन पर एक मुकदमा किया कि अपने वायदे से वे मुकर रहे हैं,जबकि जिंदगी भर वे दिलीप कुमार के आसरे ही रहे। दिलीप कुमार में गजब की सलाहियत है। वे पुरानी पीढ़ी के सही प्रतिनिधि हैं। हां,कुछ प्रसंगों का इस आत्मकथा में न होना नागवार गुजरता है। उन्हें मधुबाला के प्रसंग में अवश्य विस्तार से बताना चाहिए था। समय बीतने के साथ ये तथ्य भी ऐतिहासिक दस्तावेज बन जाते हैं। उन्होंने अपनी दूसरी पत्नी आसिमा का भी जिक्र नहीं किया है। इसके साथ ही वे कामिनी कौशल के साथ अपने संबंधों के खुलासे में नहीं गए हैं।
    आत्मकथा ‘दिलीप कुमार- द सब्सटांस एंड शैडो’ के मुताबिक दिलीप कुमार ने कुल 62 फिल्मों में काम किया। उनकी पहली फिल्म ‘ज्वार भाटा’ 1944 में आई थी। बांबे टाकीज की इस फिल्म को अमिय चक्रवर्ती ने डायरेक्ट किया था। इसमें उनकी नायिका मृदुला थीं। उनकी आखिरी फिल्म रेखा के साथ 1998 में आई ‘किला’ थी,जिसका निर्देशन उमेश मेहरा ने किया था। दिलीप साहब की कोई फिल्म 1998 के बाद नहीं आई है। उन्होंने अपनी पत्नी सायरा बानो के साथ 1970 में पहली फिल्म ‘गोपी’ की थी। उन्होंने वैजयंती माला के साथ सबसे अधिक 7 फिल्में कीं। ऐसी 13 फिल्में हैं,जिनकी घोषणा और शूटिंग तो हुई,लेकिन वे कभी पूरी नहीं हो सकीं। आज के अभिनेताओं को आश्चर्य होता है कि कैसे सिर्फ 62 फिल्में कर भी कोई दर्शकों की यादों में बना रह सकता है। दिलीप कुमार को अभिनय की पाठशाला कहा जाता है। अमिताभ बच्चन ने तो उनके प्रभाव को स्वीकार किया है। ऐसे अनेक कलाकार भी हैं,जिन्होंने जिंदगी भर उनकी नकल की। अपना नाम रोशन किया और जगह बनाई। दिलीप कुमार हिंदी फिल्मों के उन अभिनेताओं में से हैं,जिनकी शैली शुद्ध भारतीय रही। उन्होंने कभी किसी की नकल नहीं की। वे हिंदी फिल्मों के मौलिक कलाकार हैं।
    इस किताब का रोचक हिस्सा हिंदी फिल्मों के सितारों और दिलीप कुमार के अन्य परिचितों का उनके बारे में लिखना है। सभी ने अपने अनुभव और धारणाओं को साझा किया है। दिलीप कुमार की आत्मकथा सायरो बानो की क्षेपक कथा भी हो गई है। सायरा बानो और उदयतारा नायर के दृष्टिकोण से लिखी इस आत्मकथा में कुछ और जरूरी बातें होनी चाहिए थीं। फिल्मों पर छिटपुट रूप से उन्होंने भिन्न प्रसंगों में कुछ-कुछ कहा है। अच्छा होता कि एक अध्याय उनके अभिनय और उनके समय के अन्य कलाकारों पर रहता।

दिलीप कुमार-द सब्सटांस एंड द शैडो
ऐज टोल्ट टू उदयतारा नायर
प्रकाशक-हे हाउस इंडिया
मूल्य-699 रुपए