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Saturday, June 25, 2016

दरअसल : बधाई आलिया भट्ट

-अजय ब्रह्मात्‍मज
पिछले शुक्रवार को विवादित फिल्‍म उड़ता पंजाब रिलीज हुई। अभिषेक चौबे की इस फिल्‍म के निर्माताओं में अनुराग कश्‍यप भी हैं। उन्‍होंने इस फिल्‍म की लड़ाई लड़ी। सीबीएफसी के खिलाफ उनकी इस जंग में मीडिया और फिल्‍म इंडस्‍ट्री का साथ रहा। कोर्ट के फैसले से एक कट के साथ उड़ता पंजाब सिनेमाघरों में पहुंच गई। हाल-फिलहाल में किसी और फिल्‍म को लेकर निर्माता और सीबीएफसी के बीच ऐसा घमासान नहीं हुआ था। इस घमासान में उड़ता पंजाब विजयी होकर निकली है। इस फिल्‍म में मुख्‍य कलाकारों के परफारमेंस की तारीफ हो रही है। शाहिद कपूर और आलिया भट्ट दोनों ने अपनी हदें तोड़ी हैं। उन्‍होंने निर्देशक अभिषेक चौबे की कल्‍पना को साकार किया है।
पिछले शुक्रवार रिलीज के दिन ही ग्‍यारह बजे रात में महेश भट्ट का फोन आया। गदगद भाव से वे बता रहे थे कि आलिया भट्ट की चौतरफा तारीफ हो रही है। उन्‍होंने मुझे मेरी ही बात याद दिलाई। मैं इम्तियाज अली की फिल्‍म हाईवे की काश्‍मीर की शूटिंग से लौटा था। मैंने उन्‍हें बताया था कि एक पहाड़ी पर मैंने आलिया का जमीन पर गहरी नींद में लेटे देखा। मेरे लिए वह सामान्‍य घटना नहीं थी। मुंबई में जुहू के इलाके में संपन्‍न फिल्‍मी परिवार में पली-बढ़ी लड़की का यह आचरण चौंकाने वाला था। वह दो शॉट्स के बीच में एक पेड़ के नीचे निश्चिंत लेटी नींद पूरी कर रही थी। तब उसे छेड़ना उचित नहीं लगा था। पावर नैप के बाद वह जगी तो कुछ झेंपती सी मुस्‍कराई। उस नैसि‍र्गक मुस्‍कराहट में लगन और प्रतिभा की झलक थी। मैंने भट्ट साहब से यही कहा था कि आप की लड़की बहुत आगे जाएगी। वह फिल्‍म के लिए कुछ भी कर सकती है। सारी तकलीफें सह सकती है। तप सकती है।
इम्तियाज अली की हाईवे में सभी ने आलिया भट्ट की तारीफ की थी। उस फिल्‍म में उसने अपनी इमेज के कंट्रास्‍ट रोल में सभी को प्रभावित किया था। किसी भी एक्‍टर की प्रतिभा भूमिकाओं की विविधता में जाहिर होती है। वही एक्‍टर की पहचान होती है। अगर कोई एक ही इमेज या एक ही किस्‍म के रोल में कामयाब है तो वह स्‍टार है। स्‍टार और एक्‍टर के बीच का यह मामली फर्क भी याद रखें तो हमें कलाकारों के वर्गीकरण का सहज समीकरण मिल सकता है। आलिया भट्ट के करिअर पर गौर करें तो उसने आरंभ से ही फिल्‍मों के चुनाव में विविधता रखी। मालूम नहीं फिल्‍मों के चुनाव में कौन उसकी मदद करता है। अगर वह खुद करती है तो यकीनन वह अपनी पीढ़ी की समझदार अभिनेत्री है। ऐसी अभिनेत्री की कामयाबी में पिता का खुश और आह्लादित होना लाजिमी है। उस रात भट्ट साहब की बातचीत में खुशी की यही तरलता थी।
उड़ता पंजाब में आलिया भट्ट ने बिहारिन मजदूर का किर दार निभाया है। वह हाकी की खिलाड़ी रह चुकी है। पंजाब आने के बाद एक दिन लालच में आकर वह गलत फैसला लेती है और फिर खुद ही फंस जाती है। कैद की लाचारी के बावजूद वह हिम्‍मत नहीं छोड़ती। वह बहादुर और जुझारू है। हालांकि फिल्‍म में प्रभाव और निर्वाह के लिए तर्क को किनारे कर दिया गया है। भाषा और भावमुद्रा में परफेक्‍शन नहीं है, लेकिन उस किरदार को निभाने में आलिया भट्ट की नीयत और ईमानदारी पर संदेह नहीं किया जा सकता। आलिया की कोशिश परफारमेंस की कमियों को ढक देती है। आलिया पनी पीढ़ी की प्रयोगशील और समर्थ अभिनेत्री के तौर पर उभर रही है। उसने अभी तक जितनी फिल्‍में की हैं,उन सभी फिल्‍मों में वह किरदारों के बेहद करीब पहुंची है। अब जरूरत है कि वह अपने अनुभवों का विस्‍तार करे। अपनी सुविधाओं और सुरक्षित जिंदगी से बाहर निकले। खूब पढ़े और देशाटन करे। फिल्‍म करते समय निश्चित अवधि में ही चरित्र पर काम करना होता है। कलाकारों को कुछ दिनों और घंटों की ही मोहलत मिलती है। उसमें लगन और मेहनत से किरदारों को समझा और आत्‍मसात किया जा सकता है,लेकिन वह अनुभवों से संचारित हो तो किरदार वास्‍तविक और विश्‍वसनीय हो जाते हैं।

Wednesday, June 22, 2016

मदारी का गीत डम डमा डमडमडम

आलोक धन्‍वा कहते हैं कि अगर हिंदी फिल्‍मों के गीतों को सुनने के साथ पढ़ा भी जाए तो उनके नए अर्थ निकलेंगे। मदारी का यह गीत पाठकों और दर्शकों से पढ़ने की मांग करता है। आप निजी भाष्‍य,व्‍याख्‍या और अभिप्रेत के लिए स्‍वतंत्र है। 

फिल्‍म - मदारी
गीतकार - इरशाद कामिल
निर्देशक - निशिकांत कामत
कलाकार - इरफान खान





डमा डमा डमडमडम डमडम
डमा डमा डमडमडम डमडम
डमा डमा डमडमडम डमडम डू

टी वी पे ये ख़बर भी आनी
करके जनहित में क़ुर्बानी
गये मंत्री जंगल पानी रे


डमा डमा डम डमडम डमडम
डमा डमा डम डमडम डमडम
डमा डमा डमडमडम डमडम डू...

फटा फटाफट गुस्सा करके
मिला मिलावट मन में भरके
बना बनावट करके बैरी तू

औसत बन्दा भूखा मर गया
तेरा चमचा खेती चर गया
संसद बैठा खाये चैरी तू

जैसे पहले लगी पड़ी थी
वैसे अब भी लगी पड़ी है
ये राजा भी निरा लोमड़ी है

लाल क़िले का हाल वही है
कोई पैजामा पहन खड़ा या
कोई साड़ी पहन खड़ी है रे...

टी वी पे ये ख़बर भी आनी
करके जनहित में क़ुर्बानी
गये मंत्री जंगल पानी रे

जनता के संग वही झोल है
पिछवाड़े में वही पोल है
बहुमत साला Ass Hole है रे

अनपढ़ बैठा शिक्षा बाँटे
धरम दिलों में बोये कांटे
रोटी माँगो मिलते चाँटे रे

आनी, बानी, दानी, रानी
इन सबने है मिलकर ठानी
बेचके भारत माँ खा जानी रे

बैठ - बैठ संतों की गोदी
बिना तेल के जनता धो दी
दिल्ली बैठा बड़ा विरोधी रे
 

ले लिया है चैलेंज : शाहिद कपूर

-स्मिता श्रीवास्‍तव
शाहिद कपूर लगातार वरायटी रोल कर रहे हैं। खासकर वैसे युवाओं का, जो किन्हीं कारणों से ‘भटका’ हुआ या बागी है। मिसाल के तौर पर हैदरमें बागी युवक। अब उड़ता पंजाबमें वह भटके हुए रॉक स्टार की भूमिका में हैं। ‘हैदर’ में किरदार को रियल टच देने के लिए उन्होंने सिर मुंडवाया था। यहां उनके लंबे बाल हैं। शरीर पर टैटूओं की पेंटिंग है। साथ में ज्वैलरी है।
        शाहिद कहते हैं, ‘‘ लोग मुझे ऐसी फिल्में करने से मना करते हैं। उनकी दलील रहती है कि पता नहीं वैसी फिल्मों की कितनी आडियंस होगी। मेरा मानना है अगर कहानी उम्दा हो, उसमें इमोशन और एंटरटेनमेंट हो तो उम्मीद से अधिक आडियंस उसे देखती है। साथ ही कहानी अच्छी से कही गई हो तो। आडियंस अब उम्दा कहानियां ही देखना चाहती है।‘
एक वक्त ऐसा भी था जब ‘उड़ता पंजाब’ खटाई में पड़ गई थी। दरअसल, मैंने स्वीकृति दे दी थी। बाकी तीन किरदारों को लेकर कलाकार संशय में थे। वे फैसला नहीं कर पा रहे थे कि करे या न करें। यह फैसला आसान भी नहीं था। यह जोखिम भरा कदम था। मुझे लगा यह सुअवसर है। दर्शकों ने मुझे इस अवतार में न देखा है न कभी उम्मीद की है। यही नहीं भारतीय सिनेमा में ऐसा किरदार पर्दे पर दिखा नहीं है। लिहाजा मेरे लिए यह काफी एक्साइटिंग था।
मेरे किरदार का नाम टॉमी सिंह है। मेरे लिए बेहद एंटरटेनिंग किरदार है। स्क्रिप्ट सुनाने के दौरान निर्देशक अभिषेक चौबे ने मुझसे कहा था कि आडियंस उससे नफरत करेगी। हालांकि थोड़े समय बाद उसे पसंद करने लगेगी। यही तुम्हें ट्रांसफॉर्म करना है। टॉमी सिंह बदतमीज, लाउड और बदमिजाज है। उसे लगता है कि वह सबसे अच्छा है। हालांकि उसकी हरकतें देखकर लगेगा कि उसे कमरे से निकाल दो। यह सब चीजें आम तौर पर हीरो के किरदार में नहीं होती। यह एंटी हीरो टाइप है। मुझे यकीन है कि लोगों को पसंद आएगा। टॉमी बाहरी तौर पर भले ही बुरा हो मगर अंदरुनी तौर पर भला इंसान है। उस किरदार को निभाने मेरे लिए बड़ा चैलेंज था।
        मैंने जब पहली बार किरदार सुना था तो तभी अपने मन में उसकी एक छवि बना ली थी। मसलन उसके शरीर पर टैटू होने चाहिए। बाल जटा की तरह लंबे। पहले सोचा था कि इसके बाल कलर कर देंगे। सडक़ पर इसे चलते देखकर लगेगा कि कौन पागल जा रहा है। मैंने अभिषेक से आइडिया शेयर किया तो वह डर गए। फिर मैंने बालों का लुक बनाकर फोटो भेजी। उसे देखकर वे और डर गए। उस समय वे करीना कपूर और दिलजीत दोसांझ के साथ पहले हिस्से की शूटिंग कर रहे थे। दोनों के किरदार काफी रियलिस्टिक हैं। उन्हें लगा कि शाहिद मेरी फिल्म खराब कर देगा। शूटिंग से फुर्सत पाकर अभिषेक मुझसे मिले। फिर हमने बात की। उन्हें भी वह लुक पसंद आने लगा। टॉमी बाकी सभी किरदारों से बेहद अलग है। वह कोकीन का आदी है। वह बहुत बड़ा रॉकस्टार है। वह अपने तौर-तरीके की जिंदगी जी रहा है। यह सब भावनात्मक ही नहीं शारीरिक तौर पर भी दिखना चाहिए था। लोगों ने टॉमी के लुक को पसंद किया, यह काफी उत्साहवद्र्धक था। मेरा अनुमान था कुछ लोगों की ही प्रतिक्रिया मिलेगी। मगर बड़ी संख्या में लोगों ने प्रतिक्रिया दी। शायद इसके विषय को देखते हुए।
इसका विषय ओरिजनल है। इस स्पेस में फिल्म नहीं बनी है। एक वक्त था, जब ऐसी फिल्मों को दर्शक नजरअंदाज करते थे। आज वक्त बदल चुका है। अब अगर आप कुछ अलग करते हैं तो आडियंस उसे नोटिस करती है। यही उड़ता पंजाब के साथ हुआ है। यह फ्रेश प्रोडक्ट लग रहा है। फिल्म में चार बड़े सितारे हैं लेकिन कोई स्टार सरीखा नहीं रहा। सबने अपने किरदारों को जीवंत किया है। सिर्फ इतना कहूंगा कि यह ओरिजनल फिल्म है। इसे सपोर्ट करना चाहिए। इसमें ड्रग्‍स की बात की गई है। इसकी अहमियत हमें वर्तमान में भले महसूस न हो लेकिन पांच साल बाद यह आने वाली पीढ़ी के लिए बड़ा मुद्दा बनने वाला है। इस विषय पर बात होनी चाहिए। कुछ फिल्में आप बतौर स्टार या एक्टर करते हैं। मैंने इसे अपने एक्टर की संतुष्टि के लिए किया है। साथ ही खुद को चैलेंज करने के लिए। मैं खुश हूं कि लोगों को पसंद आ रही।
        रॉकस्टार को चिरपरिचित छवि रही है। कई रॉकस्टार ने मादक पदार्थों के सेवन की बात भी स्वीकारी है। कुछ ने हताशा में आत्महत्या भी है। आप के मन-मस्तिष्क में रॉकस्टार को लेकर कैसी छवि रही है? यह पूछने पर शाहिद कपूर कहते हैं, आप टॉमी सिंह को रॉकस्टार या पॉप स्टार कह सकते हैं। वह म्यूजिशियन है। बहुत बड़ा स्टार है। इस प्रकार के कई पॉप स्टार रह चुके हैं। वह बहुत पापुलर थे। हालांकि कुछ तुनकमिजाज थे। कुछ की अल्पायु में मृत्यु हो गई। उनके बारे में थोड़ा बहुत रिसर्च किया। हालांकि मैंने ओरिजनल कैरेक्टर गढ़ा। उसे जीवित इंसान में परिणत करने की कोशिश नहीं की। यह कोई डाक्यूमेंट्री नहीं है। न ही पॉप स्टार की जिंदगी पर आधारित है। यह फिक्शन कहानी है। इसमें टॉमी सिंह को खोजना था। उसके अंदर इंसान है या नहीं यह समझना था। वह ऐसा क्यों है? यह समझना था। वही कोशिश रही कि ऐसा किरदार लाए जिसे पहले सिल्वर स्क्रीन पर देखा न गया हो। पर हां यह जरूर कहूंगा कि हमने कई स्टार के उदय की कहानी देखी है। यह एक सटार के ढलान की है। यह उसके खुद के खोजने की जर्नी है।
किरदार को जीवंत बनाने की हर कलाकार की कोशिश होती है। उसके लिए तमाम तैयारी होती है। उस जैसे लोगों से मिलने की कोशिश होती है। हालांकि शाहिद कपूर नशे के आदी व्यक्ति से मिलने से इन्कार करते हैं। वह कहते हैं, हमने कई डाक्यूमेंट्री देखी। मेरी उम्र 35 साल है। मैंने बहुत दुनिया देखी है। कई जगहों पर लोगों को अल्कोहल या नशे का सेवन करते देखा है। उस हालत में उनका व्यवहार अजीबोगरीब होता है। उन्हें आप आव्‍जर्व करते हैं। हालांकि कोकीन का नशा करने वालों की आदतें थोड़ा अलग होती है। दरअसल, मादक पदर्ा्थ और दुष्प्रभाव अलग-अलग होते हैं। मैंने और अभिषेक ने उस पर काफी रिसर्च की।
        फिल्म में पंजाब में फैली ड्रग समस्या उजागर की गई है। हालांकि शाहिद इसे पंजाब तक सीमित नहीं मानते। वह कहते हैं, मादक पदार्थों का सेवन सिर्फ पंजाब नहीं पूरे विश्व की समस्या है। इसमें पंजाब बैकड्राप है। जैसे कश्मीर पर हमने हैदर बनाई थी। हालांकि उसमें हो रही बातें सभी के हितार्थ थीं। सभी की जिंदगी में समस्याएं आती है। व्यक्तिगत संघर्ष सभी को करना पड़ता है। लत किसी भी चीज की लग सकती है। चारों किरदार ड्रग से ही संबंधित है। ड्रग्‍स  की समस्या किसी घर या राज्य तक सीमित नहीं है। पहले नशे को हेयदृष्टि से देखा जाता था। अब पार्टी वगैरह में इनका सेवन आम बात हो गई है। कम उम्र में ही लोगों को इनकी जानकारी हो रही है। इसमें वास्तविक विषय पर बात की गई है। यह किसी राज्य या देश की नहीं देशव्यापी समस्या है।हाई सोसाइटी में अल्कोहल का सेवन होना आम बात है। स्टार बनने के बावजूद शाहिद ने खुद को इन चीजों से दूर रखा है। इस बाबत वह कहते हैं, मेरा कभी मन ही नहीं किया। मुझे इसमें कभी दिलचस्पी ही नहीं रही।

Saturday, June 18, 2016

दरअसल : हो सकता है एक और विवाद

-अजय ब्रह्मात्‍मज

अभिषेक चौबे की उड़ता पंजाब पर हाई कोर्ट की सुनवाई से आई खबरों को सही मानें तो केवल एक कट के साथ फिल्‍म रिलीज करने का आदेश मिल जाएगा। पिछले दिनों यह फिल्‍म भयंकर विवाद में रही। फिल्‍म के निर्माताओं में से एक अनुराग कश्‍यप ने सीबीएफसी की आरंभिक आपत्ति के बाद से ही मोर्चा खोल लिया था। सीबीएफसी के पुराने अनुभवों और गुत्थियों की जानकारी होने की वजह से उनके पार्टनर ने अनुराग कश्‍यप को सामने कर दिया था। उन्‍होंने सलीके से अपना विरोध जाहिर किया। और सीबीएफसी के खिलाफ फिल्‍म इंडस्‍ट्री को लामबंद किया। फिल्‍म इंडस्‍ट्री के कुछ संगठन साने आए। सभी फिल्‍मों को अनुराग कश्‍यप जैसा जुझारू और जानकार निर्माता नहीं मिलता। ज्‍यादातर लोग सिस्‍टम से टकराने या उसके आगे खड़े होने के बजाए झुक जाना पसंद करते हैं। उड़ता पंजाब ने निर्माताओं का राह दिखाई है कि अगर उन्‍हें अपनी क्रिएटिविटी और फिल्‍म पर यकीन है तो तो वे इसी सिस्‍टम में अपनी लड़ाई लड़ कर विजय भी हा‍सिल कर सकते हैं।
दरअसल,ज्‍यादातर निर्माता पर्याप्‍त तैयारी और समय के साथ फिल्‍म प्रमाणन बोर्ड नहीं आते। फिल्‍म की रिलीज तारीख तय करने के बाद वे पंद्रह से बीस दिनों के अंदर फिल्‍में जमा कर प्रमाण पत्र पा लेना चाहते हैं। फिल्‍म सामान्‍य और यू कैटेगरी की हुई तो दिक्‍कत नहीं होती। कई बार प्रभावशाली निर्माता या स्‍टार हों तो भी काम जल्‍दी हो जाता है। अगर परीक्षण समिति पे प्रमाण पत्र देने से इंकार कर दिया तो प्रक्रिया लंबी हो जाती है। फिर पुनरीक्षण समिति,ट्रिब्‍यूनल और अंत में कोट्र का सहारा लेना पड़ता है। आरक्षण के समय प्रकाश झा ने सुप्रीम कोर्ट का सहारा लिया था। फिर भी उत्‍त्‍र प्रदेश की सरकार ने उत्‍तर प्रदेश में फिल्‍म के प्रदर्शन पर पाबंदी लगा दी थी। ऐसा उड़ता पंजाब के साथ भी हो सकता है। मुमकिन है कि पंजाब की सरकार प्रदेश में कानून व व्‍यवस्‍था के बहाने फिल्‍म के प्रदर्शन पर पाबंदी लगा दे।
उड़ता पंजाब का विवाद नेशनल न्‍यूज बना। बाकी फिल्‍में सुर्खियों में नहीं आ पातीं। बताया जा रहा है कि पहलाज निहलानी के अध्‍यक्ष बनने के बाद सबसे ज्‍यादा फिल्‍में पुनरीक्षण समिति और ट्रिब्‍यूनल में जा रही हैं। पहलाज निहलानी के नेतृत्‍व में सीबीएफसी ने नैतिकता की अतिरिक्‍त जिम्‍मेदारी ले ली है। परीक्षण समिति कट और पाबंदी को ध्‍यान में रख कर फिल्‍म देखती है,जबकि उसका मुक्ष्‍य काम फिल्‍म देखने के बाद प्रमाणन की श्रेणी बताना है। हां,अगर कोई निर्माता ए श्रेणी की फिल्‍म के लिए यूए या यू श्रेणी चाहता है तो फिर उसे आपत्जिनक दृश्‍य और संवाद बताए जाते हैं। उनके कट पर राजी होने के बाद श्रेणी बदली जा सकती है। सीबीएफसी का काम सेंसर करना नहीं है। अब तो मंत्री से लेकर बाकी सारे लोग भी यही दोहरा रहे हैं।
पिछले हफ्ते सीबीएफसी की पुनरीक्षण समिति ने मोहल्‍ला अस्‍सी देखी। सदस्‍यों में सहमति न होने की वजह से अब निर्णय अध्‍यक्ष यानी पहलाज निहलानी के विचाराधीन है। अप्रैल में परीक्षण समिति ने मोहल्‍ला अस्‍सी को प्रमाण पत्र देने से मना कर दिया था। कारण बताए गए थे कि इसमें गालियां हैं। एक स्‍थानीय इलाके यानी अस्‍सी की भावनाओं को आहत करने वाले संवाद,उत्‍तेजक भाषण,राजनीतिक लिंक अप आदि वजह बता कर सीबीएफसी ने प्रमाण पत्र नहीं दिया। इस फिल्‍म के निर्माता विनय तिवारी हैं। फिल्‍म के निर्देशक डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी हैं। मोहल्‍ला अस्‍सी बनारस के मशहूर साहित्‍यकार काशीनाथ सिंह के रचना काशी का अस्‍सी पर आधारित फिल्‍म है। इस फिल्‍म की शूटिंग सालों पहले हो चुकी है,लेकिन निर्माता के आलस्‍य की वजह से फिल्‍म अभी तक रिलीज नहीं हो सकी है। निर्माता और निर्देशक के बीच का विवाद भी एक कारण बताया जाता है। बता दें कि डॉ. च्रद्रप्रकाश द्विवेदी वर्तमान सीबीएफसी के सदस्‍य हैं। वे स्‍वयं किसी भी प्रकार की सेसरशिप के खिलाफ हैं। वर्तमान अध्‍यक्ष के विचारों और फैसलों से उनकी असहमतियां रही हैं।
उड़ता पंजाब की मिसाल लें तो मोहल्‍ला अस्‍सी को भी प्रमाण पत्र की दिक्‍कत नहीं होनी चाहिए। 

Friday, June 17, 2016

फिल्‍म समीक्षा : धनक

-अजय ब्रह्मात्‍मज

नागेश कुकुनूर की धनक छोटू और परी भाई-बहन की कहानी है। वे अपने चाचा-चाची के साथ रहते हैं। चाचा बीमार और निकम्‍मे हें। चाची उन्‍हें बिल्‍कुल पसंद नहीं करती। उनके जीवन में अनेक दिक्‍कतें हैं। भाई-बहन को फिल्‍मों का शौक है। उनके अपने पसंदीदा कलाकार भी है। बहन शाह रुख खान की दीवानी है तो भाई सलमान खान को पसंद करता है। अपने हिसाब से वे पसंदीदा स्‍टारों की तारीफें करते हें। और उनसे उम्‍मीदें भी पालते हैं। भाई की आंखें चली गई हैं। बहन की कोशिश है कि भाई की आंखों में रोशनी लौटे। पिता के साथ एक फिल्‍म देखने के दौरान बहन को तमाम फिल्‍मी पोस्‍टरों के बीच एक पोस्‍टर दिखता है। उस पोस्‍टर में शाह रुख खान ने नेत्रदान की अपील की है। यह पोस्‍टर ही परी का भरोसा बन जाता है।
घर की झंझटों के बीच परी और छोटू का उत्‍साह कभी कम नहीं होता। उनका आधा समय तो सलमान और शाह रुख में कौन अच्‍छा के झगड़े में ही निकल जाता है। छोटू जिंदादिल और प्रखर लड़का है। उसे किसी प्रकार की झेंप नहीं होती। हमेशा दिल की बात कह देता है। सच बता देता है।
परी और छोटू को पता चलता है कि जैसलमेर में शाह रुख खान शूटिंग के लिए आए हैं। वे अपने चाचा से शाह रुख के पास चलने के लिए कहते हैं। दब्‍बू चाचा बहाना बनाते हैं। एक दिन बगैर सोचे-समझे दोनों शाह रुख से मिलने के लिए निकल पड़ते हैं। उनके सफर में डर,एडवेंचर और रोमांच है। लेखक-निर्देशक नागेश कुकनूर ने उनके सफर के अच्‍छे-बुरे अनुभवों का ताना-बाना अच्‍छा बुना है। उनके साथ संभावित खतरें की जानकारी दर्शकों को जरूर मिलती है,लेकिन परी और छोटू अपने सफर में बेफिक्र आगे बढ़ते जाते हैं। उन्‍हें नेक व्‍यक्ति भी मिलते हैं।
फिल्‍म में आखिकर बहन परी की तमन्‍ना पूरी होती है। छोटू की आंखों की रोशनी लौट आती है। बच्‍चों को मुख्‍य किरदारों में लेकर बनी यह धनक अपने स्‍वरूप और प्रभाव में ‍चिल्‍ड्रेन फिल्‍म नहीं रह जाती। उम्‍मीद और भरोसे की भावना को मजबूत करती यह फिल्‍म दर्शकों पर जादुई असर करती है। फिल्‍म की संवेदना झकझोरती है। संवेदनशील बनाती है।
यह फिल्‍म जनमानस में बैठे फिल्‍म स्टारों के प्रभाव को पॉजीटिव तरीके से पेश करती है। हालांकि फिल्‍म में कभी भी शाह रुख या सलमान की झलक नहीं मिलती,लेकिन उनकी चर्चा उनकी मौजूदगी का अहसास कराती रहती है। दोनों की चमकदार छवि उभरती है।
धनक में दोनों बाल कलाकारों हेतल गड्डा और कृष छााबडि़या ने बेहतरीन काम किया है। उनकी बाल सुलभ प्रतिक्रियाएं फिल्‍म का प्रभाव बढ़ाती है। विपिन शर्मा लाचार चाचा के रूप में अपनी भावमुद्राओं से आकर्षित करते हैं।राजस्‍थान की पृष्‍ठभूमि का सुंर उपयोग हुआ है।
अवधि-117 मिनट
स्‍टार- साढ़े तीन स्‍टार  

फिल्‍म समीक्षा : उड़ता पंजाब

-अजय ब्रह्मात्‍मज
(हिंदी फिल्‍म के रूप में प्रमाणित हुई उड़ता पंजाब की मुख्‍य भाषा पंजाबी है। एक किरदार की भाषा भोजपुरी है। बाकी संवादों और संभाषणों में पंजाबी का असर है।)
विवादित फिल्‍मों के साथ एक समस्‍या जुड़ जाती है। आम दर्शक भी इसे देखते समय उन विवादित पहलुओं पर गौर करता है। फिल्‍म में उनके आने का इंतजार करता है। ऐसे में फिल्‍म का मर्म छूट जाता है। उड़ता पंजाब और सीबीएफसी के बीच चले विवाद में पंजाब,गालियां,ड्रग्‍स और अश्‍लीलता का इतना उल्‍लेख हुआ है कि पर्दे पर उन दृश्‍यों को देखते और सुनते समय दर्शक भी जज बन जाता है और विवादों पर अपनी राय कायम करता है। फिल्‍म के रसास्‍वादन में इससे फर्क पड़ता है। उड़ता पंजाब के साथ यह समस्‍या बनी रहेगी।
उड़ता पंजाब मुद्दों से सीधे टकराती और उन्‍हें सामयिक परिप्रेक्ष्‍य में रखती है। फिल्‍म की शुरूआत में ही पाकिस्‍तानी सीमा से किसी खिलाड़ी के हाथों से फेंका गया डिस्‍कनुमा पैकेट जब भारत में जमीन पर गिरने से पहले पर्दे पर रुकता है और उस पर फिल्‍म का टायटल उभरता है तो हम एकबारगी पंजाब पहुंच जाते हैं। फिल्‍म के टायटल में ऐसी कल्‍पनाशीलता और प्रभाव दुर्लभ है। यह फिल्‍म अभिषेक चौबे और सुदीप शर्मा के गहरे कंसर्न और लंबे रिसर्च का परिणाम है। कहना आसान है कि फिल्‍म डाक्‍यूमेंट्री का फील देती है। जब आप हिंदी फिल्‍मों की प्रचलित प्रेम कहानी से अलग जाकर सच्‍ची घटनाओं और समसामयिक तथ्‍यों को संवादों और वास्‍तविक चरित्रों को किरदारों में बदलते हैं तो इस प्रक्रिया में कई नुकीले कोने छूट जाते हें। वे चुभते हैं। और यही ऐसी फिल्‍मों की खूबसूरती होती है। हो सकता है कि पंजाब के दर्शकों का फिल्‍म देखते हुए कोई हैरानी नहीं हो,लेकिन बाकी दर्शकों के लिए यह हैरत की बात है। कैसे देश का एक इलाका नशे की गर्त में डूबता जा रहा है और हम उसे नजरअंदाज करना चाहते हैं। बेखबर रहना चाहते हैं। अगर एक फिल्‍मकार साहस करता है तो सरकारी संस्‍थाएं अड़ंगे लगाती है।
उड़ता पंजाब टॉमी सिंह(शाहिद कपूर),बिहारिन मजदूर(आलिया भट्ट,सरताज(दिलजीत दोसांझ),प्रीत सरीन(करीना कपूर खान) और अन्‍य किरदारों से गुंथी पंजाबी सरजमीन की कहानी है। उड़ता पंजाब में सरसों के लहलहाते खेत और भांगड़ा पर उछलते-कूदते और बल्‍ले-बल्‍ले करते मुंडे और कुडि़यां नहीं हैं। इस फिल्‍म में हिंदी फिल्‍मों और पॉपुलर कल्‍चर से ओझल पंजाब है। ड्रग्‍स के नशे में डूबा और जागरुक होता पंजाब है। उड़ता पंजाब पंजाब की सच्‍ची झलक पेश करती है। वह निगेटिव या पॉजीटिव से ज्‍यादा जरूरी है। फिल्‍मों का काम सिर्फ गुदगुदाना ही तो नहीं है। झिंझोरना और अहसास करना भी तो है। उड़ता पंजाब में अभिषेक चौबे कुछ सीमाओं के साथ सफल रहते हैं। निश्चित ही इसमें उन्‍हें सहयोगी लेखक सुदीप शर्मा,संगीतकार अमित त्रिवेदी,गीतकार शेली,शिवकुमार बटालवी और वरूण ग्रोवर व अन्‍य तकनीकी टीम से पूरी मदद मिली है।
शाहिद कपूर ने टॉमी सिंह की उलझनों को अच्‍छी तरह पर्दे पर उतारा है। शाहिद लगातार किरदारों का आत्‍मसात करने और उन्‍हें निभाने में अपनी हदें तोड़ रहे हैं। इस फिल्‍म में उनका किरदार परिस्थितियों में फंसा और जूझता गायक है,जो लोकप्रियता की खामखयाली में उतराने के बाद धप्‍प से खुरदुरी जमीन पर गिरता है तो उसे अपनी गलतियों का अहसास होता है। वह संभलता और अहं व अहंकार से बाहर निकल कर किसी और के लिए पसीजता है। शाहिद कपूर की मेहनत सफल रही है। किरदार की अपनी दुविधाएं हैं,जो लेखक और निर्देशक की भी हैं। बिहारिन मजदूर के रूप में आलिया भट्ट की भाषा और बॉडी लैंग्‍वेज की कमियां ईमानदार कोशिश से ढक जाती है। भोजपुरी बोलने में लहजा परफेक्‍ट नहीं है और बॉडी लैंग्‍वेज में हल्‍का सा शहरीपन है। फिर भी आलिया की इस कोशिश की तारीफ करनी होगी कि वह किरदार में ढलती हैं। दिलजीत दोसांझ पुलिस अधिकारी की भूमिका में सहज और स्‍वाभाविक हैं। उनके बॉस के रूप में आए कलाकार मानव भी ध्‍यान खींचते हैं। लंबे समय के बाद सतीश कौशिक का सदुपयोग हुआ है। इस फिल्‍म में प्रीत सरीन के किरदार पर दूसरे किरदारों की तरह ध्‍यान नहीं दिया गया है। प्रीत और सरताज की बढ़ती अनुभूतियों और नजदीकियों में भी लेखक-निर्देशक नहीं रमे हैं। यही कारण है कि जब-जब कहानी शाहिद-आलिया के ट्रैक से जब दिलजीत-करीना के ट्रैक पर शिफ्ट करती है तो थोड़ी सी फिसल जाती है।
अच्‍छी बात है कि उड़ता पंजाब में ड्रग्‍स और नशे को बढ़ावा देने वाले दृश्‍य नहीं है। डर था कि फिल्‍म में उसे रोमांटिसाइज न कर दिया गया हो। फिल्‍म के हर किरदार की व्‍यथा ड्रग्‍स के कुप्रभाव के प्रति सचेत करती है। महामारी की तरह फैल चुके नशे के कारोबार में राजनीतिज्ञों,सरकारी महकमों,पुलिस और समाज के आला नागरिकों की मिलीभगत और नासमझी को फिल्‍म बखूबी रेखांकित और उजागर करती है।
गीत-संगीत उड़ता पंजाब का खास चमकदार और उल्‍लेखनीय पहलू है। अमित त्रिवेदी ने फिल्‍म की कथाभूमि के अनुरूप संगीत संजोया है।
(फिल्‍म की मुख्‍य भाषा इसकी लोकप्रियता में अड़चन हो सकती है। मुंबई में पंजाबी के अंग्रेजी सबटायटल थे। क्‍या हिंदी प्रदेशों में हिंदी सबटायटल रहेंगे?)
अवधि- 148 मिनट
स्‍टार- चार स्‍टार

Wednesday, June 15, 2016

सवाल पूछना मेरे सिस्‍टम में है - निशिकांत कामत




-अजय ब्रह्मात्‍मज
यकीन करते हैं इरफान
इरफान और मैंने १९९४ में एक साथ काम किया था। तब मैं नया-नया डायरेक्टर बना था। इरफान भी नए-नए एक्टर थे। वह तब टीवी में काम करते थे। उसके चौदह साल बाद  हम ने मुंबई मेरी जान में काम किया। अभी तकरीबन सात साल बाद मदारी में फिर से साथ हुए। हमारी दोस्ती हमेशा से रही है। एक दूसरे के प्रति परस्पर आदर का भाव रहा है। इत्तफाक की बात है कि मदारी की स्क्रिप्ट मेरी नहीं थी। इरफान ने यह स्क्रिप्ट रितेश शाह के साथ तैयार की थी। एक दिन इरफान ने मुझे फोन किया कि एक स्क्रिप्ट पर बात करनी है। वह स्क्रिप्ट मदारी की थी। इरफान साहब को लगा कि मदारी मुझे डायरेक्ट करनी चाहिए। इस तरह मदारी की प्रक्रिया शुरू हुई। इस बातचीत के छह महीने बाद फिल्म की शूटिंग शुरू हो गई। मेरे लिए यह अब तक की सबसे जटिल स्क्रिप्ट यह मल्टीलेयर फिल्‍म है। मैं कई बार स्क्रिप्ट पढ़ चुका था। मैं स्क्रिप्ट हर सिरे और लेयर को पकड़ने की कोशिश कर रहा था। डर था कि कहीं कुछ मिस तो नहीं हो रहा है।

मदारी की कहानी
एक स्‍तर पर यह बाप और बेटे की कहानी है। उनका मजबूत रिश्ता होता है। जब नया बच्चा अपने माता-पिता की जिंदगी में आता है,वही उनकी दुनिया बन जाता है। फिर वे बच्‍चे की परवरिश करते हैं। इरफान ने बहुत ज्यादा इनपुट दिए। इरफान के दो बेटे हैं। अगर बच्चा पांच मिनट देरी से भी घर आए तो माता –पिता की हालत खराब हो जाती है। सारे बुरे खयाल आते हैं। फिर आठ साल के बच्चे का नजरिया क्या होता है ? आप उसे कैसे मैनेज करते हैं। मदारी में एक हादसा होता है। उस हादसे का एक आदमी पर क्या असर होता है? कैसे उसकी जिंदगी बदलती है? हर हादसे को इंसान दो या तीन तरीके से देख सकता है। पहला,वह मान सकता है कि जो हुआ उसमे भगवान की मर्जी थी। दूसरा,वह खुद गिल्ट में चला जाता है। मेरी वजह से हुआ। तीसरा,कोई होता है जो सवाल उठाता है। ऐसा क्यों हुआ? और मेरे साथ ही क्यों हुआ?
समकालीन फिल्‍म है मदारी
यह फिल्म एक कॉमन आदमी की कहानी है। वह सिस्टम पर सवाल उठाता है। यह मेरी गलती है। यह भगवान की मर्जी है। यह किसी और की गलती है। आखिर यह है क्या? कोई तो मुझे जवाब दें। मैं उदाहरण के तौर पर हमेशा कहता हूं कि मैं जिस रास्ते से घर से दफ्तर आता हूं। वहीं पर हमेशा गड्ढे कैसे होते हैं। उन गड़्ढों को कैसे बंद किया जाता है। वह फिर से गड्ढा कैसे बन जाता है। लेकिन मैं सवाल पूछ सकता हूं। वहां पर मेरी ताकत खत्म हो जाती है। मुझे पता है कि मेरे ही दिए हुए टैक्स से गड्ढों को भरने का काम किया जा रहा है। यह हर साल हो रहा है। एक ही बार क्यों नहीं हो जाता। यह मेरा एक सवाल है। मैं इसे अगले स्तर पर नहीं ले जा सकता । पर एक आदमी तह तक जाने का तय कर लें। तो वह आवाज बन  जाता है। इसी के आस पास की कहानी मदारी है।
यह समकालीन फिल्म है। मैंने डोंबिवली फास्ट बनाई थी। उसकी कहानी एक आदमी की थी। वह आदमी सवाल पूछता है और सिस्टम उसे निगल जाता है। यह फिल्म मैंने २००४ में बनाई थी। आज चल रहा है २०१६। बारह साल के बाद भी मैं यह मानता हूं कि यह दोनों कहानी प्रासंगिक है। शायद फिर जहन में सवाल उठता है कि जीवन भर ऐसा ही रहेगा।या आगे चलकर कुछ बदलेगा।
रोजमर्रा की आसपास की कहानियां
मैं रोजमर्रा जिंदगी से कहानियां उठाता हूं। शायद यह मेरे व्यक्तित्व की प्रवृत्ति है। मैं मिडिल क्लास आदमी हूं। बचपन से ऐसे ही माहौल में रहा हूं। मेरा माता-पिता शिक्षक थे। उनकी शिक्षा ईमानदारी और अनुशासन की थी। मेरे पास सिनेमा का मीडियम है,उसके जरिए मैं अपनी बातें व्यक्त कर सकता हूं। हालांकि अभी मैं समाज में कोई बदलाव नहीं ला सकता। मैं कुछ साबित नहीं करना चाहता हूं। मुझे निजी तौर पर जो लगता है,मैं वहीं कहता हूं। मुझे लगता है कि सवाल पूछना चाहिए। मां और पिता के शिक्षक होने की वजह से सवाल पूछना मेरे सिस्टम में आ गया है।
मेरी मुंबई मेरी जान में  मुंबई की कहानी थी। डोंबिवली फास्ट भी मुंबई की कहानी थी। फोर्स मुंबई में थी। मराठी फिल्‍म लय भारी में महाराष्ट्र के गांव की कहानी थी। दृश्यम गोवा में सेट थी। रॉकी हैडसम गोवा में थी। मदारी आठ शहरों में सेट है। इस फिल्म में हम अलग-अलग शहर घूम कर आए हैं। शुक्र है कि इस बार मुझे नार्थ की ही कहानी मिली है। मैंने कोशिश की है। मैं खांटी नार्थ की कहानी पर फिल्‍में नहीं बना सकता। मैं वहां की मिट्टी का नहीं हूं। मेरी दिल-ओ- जान से तमन्ना है कि मैं यूपी और बनारस पर कोई फिल्म बनाऊं। लेकिन उसके लिए मुझे छह महीने वहां जाकर रहना होगा। स्क्रिप्ट और डायलॉग के अलावा फिल्‍म में फील रहता है। मैंने डोंबिवली फास्ट की रीमेक तमिल में बनाई। तमिल भाषा और समाज को जानने के लिए मैं पांच महीने चैन्नई में रहा।
हुनरमंद हैं इरफान साहब
इरफान में कुछ खास बातें हैं। बिना बोले भी उनके सीन परफेक्ट लग सकते हैं। वे अपनी बात बगैर संवादों के कह सकते हैं। इरफान इसमें माहिर हैं। वे पूरे किरदार पर विचार करते हैं। उसे समझते हें। किरदार क्या पहनेगा? कैसे चलेगा ? उसका बैकग्राउंड क्या है? इन सारी चीजों पर उनका बहुत अभ्‍यास है। हम दोनों की आपसी समझ भी मजबूत है। कई बार एक - दो वाक्य में ही हम एक दूसरे की बात समझ जाते थे। झट से सीन हो जाता था। इरफान साहब मेरी क्राफ्ट पर विश्वास करते है। स्क्रिप्ट तो रहती ही है,पर उन्हें मेरे सिनेमैटिक सोच पर पूरा यकीन है। इरफान हमेशा डायरेक्‍टर की सोच को विस्‍तार देते हैं। इरफान हमेशा भूखे , अनिश्चित और फोकस रहते हैं। उनमें और मुझ मे एक समानता है। हम शॉट लेने तक खोजते रहते हैं। स्क्रिप्ट में सब लिखा हुआ है। सेट भी तैयार है। पर हम कुछ ना कुछ तलाश करते रहते हैं। कुछ मैजिक है,जो दिख नहीं रहा है। उसे खोजते रहते हैं। इरफान देश के ही नहीं विश्व के बेहतरीन एक्टरों में से हैं। सिनेमा और मानवीय भावनाओं को समझने में उनकी सोच बहुत साफ है।
 मुंबई का अंडरवर्ल्‍ड
रामगोपाल वर्मा ने बेहतरीन तरीके से मुंबई के अंडरवर्ल्ड  को पर्दे पर दिखाया है। सत्या मुझे याद है। तब तक मेरी पहली फिल्म नहीं आई थी। सत्या देखने के बाद मैंने महसूस किया कि रामू ने जिस तरह मुंबई देखी है, मैंने उस तरह नहीं देखी है। इसलिए मैं आज ऑन रिकॉर्ड कहता हूं कि जब तक मुझे सत्या से बेहतर स्क्रिप्ट नहीं मिलेगी। मैँ मुंबई के गैंगस्टर पर फिल्म नहीं बनाऊंगा।  

खास सीन
इस फिल्म में एक सीन है। अस्पताल के कॉरिडोर में इरफ़ान साहब बैठे हैं।  रात के दो बज रहे हैं। मैंने इरफान साहब को सीन बताया। इरफान साहब ने कहा कि मैं नहीं कर पाऊंगा। उन्होंने इस तरह से नहीं कहा कि मैं नहीं कर पाऊंगा।उनका मतलब था कि मैं यह सीन करूंगा तो निचुड़ जाऊंगा। मैंने कहा कि सर करना तो पड़ेगा। आपको जितना समय चाहिए आप ले लें। पूरे सेट पर आधे घंटे तक पिन ड्राप साइलेंस रहा। इरफान साहब से किसी ने बात तक नहीं की। फिर उन्होंने साढ़े तीन मिनट का सीन किया। मैंने कट कहा। उसके बाद भी पूरी यूनिट सन्न बैठी रही। इरफान साहब सीन करके कमरे में चले गए। एक घंटे के बाद बाहर निकले। यह फिल्म का सबसे कठिन सीन है। माहौल ऐसा हो गया था कि एक आदमी भी आवाज नहीं कर रहा था। लाइटमैन भी एकदम शांत रहे। इरफान ने अपनी अदायगी से सबको शांत कर दिया।

Saturday, June 11, 2016

सबसे अलग है सोनम -उमाशंकर सिंह


 -उमाशंकर सिंह
सोनम के व्यक्तित्व के अनछुए पहलुओं पर रोशनी डाल रहे हैं युवा फिल्म लेखक उमाशंकर सिंह। पत्रकारिता के रास्ते फिल्मों में आए उमाशंकर सिंह की लिखी पहली फिल्म ‘डॉली की डोली’ में सोनम कपूर ने मुख्य भूमिका निभाई थी।
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सोनम कपूर को मैंने ज्यादातर हिंदुस्तानियों की तरह तब ही जान ही लिया था जब वह फिल्मों में भी नहीं आई थी। पर्सनली तब जाना जब मैं फिल्मों में आया ही आया था। अरबाज भाई ‘दबंग-2 के बाद हमारी स्क्रिप्ट को हां कर चुके थे। पर वह हीरोइन ओरियेंटेड फिल्म थी। वैसी फिल्मों के अपने जाखिम होते हैं। वे हीरोइनें जो इंडस्ट्री में फेमनिज्म का झंडा बुलंद करती रहती हैं। वे भी ऐसी जोखिम उठाने से बचती हैं और बड़ा स्टार, तीन सीन, चार गाने वाली सेफ फिल्म चुनती हैं। एक तो हीरोइन ओरियंटेड ट्रिकी स्क्रिप्ट, उस पर से फर्स्ट टाइमर रायटर और फर्स्ट टाइमर डायरेक्टर। एक तो करेला दूजा नीम चढ़ा। उन दिनों हम अपनी कास्टिंग को लेकर परेशान थे। कई नाम उछले, पर सब में हमें कुछ ना कुछ इफ एंड बट दिखता। इन्हीं बहसों के बीच एक दिन अचानक सोनम का नाम उछला। अगले दस मिनट में हम इस बात पर कन्विंस थे कि सोनम ही हमारी सुटेबल डॉली है। उसके खूबसूरत चेहरे में वो मासूमयित और आंखों में वो इनोसेंस है जो हमें डॉली में चाहिए थे। आनन-फानन में सोनम से एक मीटिंग अरेंज की गई। हम डरे हुए थे। पर स्टार वाले लटके-झटके के बिना सोनम टाइम पर ऑफिस आईं। उन्‍होंने नैरेशन लिया। अपने कुछ डाउट रखे। कुछ अच्छे सजेशन दिये। अपने डाउटों पर हमारे प्वाइंट सुने। कुछ खुद करेक्ट हुई, कुछ हमें किया और फिल्म को उन्‍होंने डन कर दिया। उस दो-तीन घंटे में ही सोनम कपूर हमारे लिए सोनम हो गई थी। निकलते-निकलते सोनम ने हमें एक और झटका दे दिया। उन्‍होंने स्क्रिप्ट मांगी और कहा हिंदी (नागरी लिपी) में दो। यहां हिंदी फिल्में भी हिंदी में लिखी नहीं जाती। अगर कोई हिंदी में फिल्म लिखता भी है तो वो रोमन हिंदी होती है, ना कि नागरी हिंदी।  सोनम चली गईं। मैं इस सोच में गुम हो गया कि मुंबई में एक स्टार परिवार में पैदा हुई लड़की मुझसे हिंदी में स्क्रिप्ट मांग रही है जबकि हिंदी पट्टी से आए कई लड़के-लड़की ज्यादा मुंबई और बॉलीवुड जैसा होने-दिखने के लिए अंग्रेजी में स्क्रिप्ट मांगते हैं!! 
सोनम की एक और खासियत है। जैसे यूनिवर्सिटी का अधिकांश प्यार कोर्स खत्म होने के साथ खत्म हो जाता है वैसे ही फिल्म के सेट पर बने अधिकांश रिश्ते भी फिल्म खत्म होने के साथ ही खत्म हो जाते हैं। पर सोनम के साथ ऐसा बिल्कुल नहीं है। ‘रांझणा’ के लेखक हिमांशु शर्मा, ‘रांझणा’ में सोनम की सहअभिनेत्री स्वरा भास्‍कर और जीशान अयूब जैसे उसके दोस्त सेट पर ही बने हैं। जीशान डीयू का मेरा एक साल जूनियर है। इस नाते वह मुझे भैय्या कहता है,  जो मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है। जीशान को भी मेरे नासंदगी की कोई परवाह नहीं है और वह यही कहता है। एक बार इसी बात पर मैं जीशान से दोस्ताना झगड़ा कर रहा था। अपना शॉट देकर आई सोनम ने पूछा क्या हुआ?? मैंने मजाक को आगे बढ़ाते हुए सोनम से कहा कि मैं बिहार से बिलांग करता हूं इसलिए ये मुझे भैय्या कहता है। सोनम ने जीशान को पांच मिनट तक जीशान दिस इज वन काइंड और रेसिज्म से लेकर क्या-क्या नहीं समझाया!! मजाक की बात थी। हम हंसते रहे पर उस दिन हमें पता चला की उसकी आधुनिकता सिर्फ पहनावे और रहन-सहन की नहीं है। वह विचारों की भी है। 40 दिनों के शूट के दरम्यान सोनम के कई और रूप दिखे। वह प्रोडयूर्सस एक्टर है। उसकी वजह से फिल्म अनावश्यक रूप से महंगी ना हो, शेड्यूल लंबा ना खींचे, इसका वह खास ख्याल रखती है। अपनी फिल्म में कम से तीन दिन ऐसा हुआ जब हम लगातार सोनम के साथ करीब चौबीस घंटे तक शूट करते रहे। अपने टाइटिल सांग की शूटिंग हमने सिर्फ तीन दिन में की। जबकि उसमें सोनम के लगभग 14 गेटअप थे और हर गेटअप के लिए उसे दो से तीन घंटा मेकअप करना पड़ता था। उसी तरह जब हम 'फट्टे तक नचना' गाना शूट कर रहे थे जिसे रेमो ने कोरियोग्राफ किया है, तो उसे फीवर हो गया था। हमारा फिल्म सिटी में एक बड़ा सेट लगा था। शूट को टालना फिल्म को थोड़ा और महंगा कर देता। सोनम ने पेन किलर खाकर वह गाना शूट किया। इसके बावजूद उस गाने में सोनम ने जो एनर्जी दिखाई है वह कमाल की है। एक हीरोइन के रूप में सोनम नॉट इजी टू हैंडल है। वह डायरेक्टर्स हीरोइन है। मगर उसके लिए आपका डायरेक्टर्स कैप पहने होना काफी नहीं है।  डायरेक्टर के रूप में आपको अपने विजन का लोहा मनवाना पड़ेगा। वह रायटर्स एक्टर है मगर एक लेखक के रूप में आपके पास उसके किरदार से जुड़े हर क्योका जवाब होना चाहिए। फिर देखिये आप सोनम का सर्पोट। वह आपकी फिल्म को आप से ज्यादा अपनी फिल्म बनाके काम करेगी। फिर एक इंटिलैक्चुल हीरोइन होने के जो भी लाभ होते हैं वो भी आपको मिलेंगे। हीरोइन के रूप में 'सांवरिया' से लेकर 'नीरजा' तक उन्‍होंने लगातार ग्रो किया है। फिल्मों को चुनने में जितनी जोखिम सोनम ने ली है उतनी किसी कंटेम्पररी हीरोइनों ने नहीं ली है। साफगोई वह इतनी बरतती है कि कई लोग उसे मुंहफट कहते हैं। विश यू वैरी वैरी हैप्पी बर्थ डे सोनम। अपना ये सोनमपना हमेशा बनाए रखना।