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Tuesday, November 13, 2018

सिनेमालोक : क्या बिखर रहा है अमिताभ बच्चन का जादू?


सिनेमालोक
क्या बिखर रहा है अमिताभ बच्चन का जादू?
-अजय ब्रह्मात्मज
दिवाली के मौके पर रिलीज हुई ‘ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान’ को दर्शकों ने नापसंद कर दिया.सोशल मीडिया को ध्यान से पढ़ें तो फिल्म की असफलता का ठीकरा आमिर खान के माथे फूटा.यह स्वाभाविक है,क्योंकि आज की तारिख में आमिर खान अधिक सफल और भरोसेमंद एक्टर-स्टार हैं.उनकी असामान्य फ़िल्में भी अच्छा व्यवसाय करती रही हैं.अपनी हर फिल्म से कमाई के नए रिकॉर्ड स्थापित कर रहे आमिर खान ने दर्शकों की नापसंदगी के बावजूद दीवाली पर रिलीज हुई सबसे अधिक कलेक्शन का रिकॉर्ड तो बना ही लिया.इस फिल्म को पहले दिन 50 करोड़ से अधिक का कलेक्शन मिला.
फिल्मों की असफलता का असर फिल्म से जुड़े कलाकारों के भविष्य पर पड़ता है. इस लिहाज से ‘ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान’ के कलाकारों में आमिर खान के चमकते करियर को अचानक ग्रहण लग गया है और फातिमा सना शेख को दूसरी फिल्म में बड़ा झटका लगा है. अमिताभ बच्चन महफूज़ रहेंगे.अपनी दूसरी पारी की शुरुआत से ही खुद की सुरक्षा में अमिताभ बचचन ने इंटरव्यू में कहना शुरू कर दिया था कि अब फिल्मों का बोझ मेरे कन्धों पर नहीं रहता.उनकी इस सफाई के बावजूद हम जानते हैं कि उन्हें ध्यान में रख कर स्क्रिप्ट लिखी जा रही हैं.जिस फिल्म में भी वे रहते हैं,उसमें उनकी खास भूमिका होती है.फिल्म की सम्भावना और कामयाबी में उनकी भी शिरकत होती है.अगर ‘ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान नहीं चली है तो यह मान लेना चाहिए कि अमिताभ बच्चन भी नहीं चले हैं.
‘ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान’ देख कर निकले अमिताभ बच्चन के प्रशंसक फ़िल्मकार की टिपण्णी ठ,’अमित जी थक गए हैं.थकान उनके चेहरे पर दिखने लगी है.’ फ़िल्मकार की आवाज़ में उदासी थी.अपने प्रिय अभिनेता के लिए यह चिंता वाजिब है.अमिताभ बच्चन 76 की उम्र में भी किसी युवा अभिनेता से अधिक सक्रिय हैं.उन्हें फ़िल्में मिल रही हैं. फिल्मों के साथ विज्ञापन मिल रहे हैं. उद्घाटन और समरोहों में आज भी उन्हें खास मेहमान के तौर पर बुलाया जा रहा है.मज़ेदार तथ्य है कि वे सभी को उपकृत भी कर रहे हैं.अपने ब्लॉग और ट्विटर पर अनेक दफा वह बता और लिख चुके हैं कि देर रात को सोने जा रहे हैं और सुबह जल्दी ही उन्हें काम पर जाना है.दैनिक जीवन में कर्मयोगी दिख रहे अमिताभ बच्चन पहले की तरह स्वस्थ नहीं हैं.वे कई बीमारियों के रोगी हैं.उन्हें बेहतर आराम और देखभाल की ज़रुरत है,लेकिन वे किसी भी आम भारतीय परिवार के जिद्दी बुजुर्ग की तरह व्यवहार कर रहे हैं.बिखर रहे हैं.
‘ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान’ और उसके पहले की कुछ फिल्मों में अब यह दिखने लगा है कि उनकी प्रतिक्रिया विलंबित होती है.उम्र बढ़ने के साथ प्रतिक्रियाओं,बोलचाल और गतिविधि में शिथिलता आती है.वह अब परदे पर दिखने लगी है.दूसरे कलाकारों के साथ के दृश्यों में इसकी झंलक मिलती है.सीधे शब्दों में कहें तो अपने अभिनय में तत्परता के लिए मशहूर अमिताभ बच्चन दृश्यों में तीव्रता और आवेग खो रहे हैं.’कौन बनेगा करोडपति में भी यह शिथिलता जाहिर हो रही है.हिंदी भाषा के उच्चारण और व्याकरण के लिए विख्यात अमिताभ बच्चन की पकड़ भाषा पर छूट रही है.उनकी हिंदी पिछली सदी के एक दशक विशेष की है और कुछ शब्दों को वे गलत ‘अर्थ में प्रयोग करते हैं.पिछले साल मामी फिल्म फेस्टिवल में उन्होंने ‘निरर्थक शब्द का उपयोग ‘प्रयास के साथ ‘सार्थक सन्दर्भ में किया था...अन्य अवसरों पर भी चूकें हो रही हैं.निस्संदेह हिंदी का उनका उच्चारण अधिकांश अभिनेताओं से बेहतर है,लेकिन शब्दों के अर्थ और प्रयोग में वे छोटी भूलें करने लगे हैं.स्क्रिप्ट सामने रहने पर गलतियाँ कम होती हैं.खुद बोलते समय वे आज की हिंदी की चाल में नहीं आ पाते.
प्रशंसक होने के नाते अमित जी की प्रतिभा की आभा के सीमित होने का उल्लेख करते हुए मन में विषाद घना हो रहा है,लेकिन समय का चक्र ऐसे ही चलता है.यही सच्चाई है कि दिन ढलने के साथ सूरज भी ढलता है.अस्ताचल होता है.

Monday, November 12, 2018

फिल्म लॉन्ड्री : आज़ादी के बाद की ऐतिहासिक फ़िल्में



आज़ादी के बाद की ऐतिहासिक फ़िल्में
ऐतिहासिक फिल्में पार्ट 3: यथार्थ और ख्याली दुनिया का कॉकटेल
-अजय ब्रह्मात्मज
(अभी तक हम ने मूक फिल्मों और उसके बाद आज़ादी तक की बोलती फिल्मों के दौर की ऐतिहासिक फिल्मों का उल्लेख और आकलन किया.इस कड़ी में हम आज़ादी के बाद से लेकर 20वीं सदी के आखिरी दशक तक की ऐतिहासिक फिल्मों की चर्चा करेंगे.)

देश की आज़ादी और बंटवारे के पहले मुंबई के साथ कोलकाता और लाहौर भी हिंदी फिल्मों का निर्माण केंद्र था.आज़ादी के बाद लाहौर पाकिस्तान का शहर हो गया और कोलकाता में हिंदी फिल्मों का निर्माण ठहर सा गया.न्यू थिएटर के साथ जुड़ी अनेक प्रतिभाएं बेहतर मौके की तलाश में मुंबई आ गयीं.हिंदी फिल्मों के निर्माण की गतिविधियाँ मुंबई में ऐसी सिमटीं की महाराष्ट्र के कोल्हापुर और पुणे से भी निर्माता,निर्देशक,कलाकार और तकनीशियन खिसक का मुंबई आ गए.
मुंबई में नयी रवानी थी.नया जोश था.लाहौर और कोलकाता से आई प्रतिभाओं ने हिंदी फिल्म इंदस्ट्री को मजबूत और समृद्ध किया.देश के विभिन्न शहरों से आई प्रतिभाओं ने हिंदी फिल्मों को बहुमुखी विस्तार दिया.इसी विविधता से माना जाता है कि पांचवा और छठा दशक हिंदी फिल्मों का स्वर्णकाल है,जिसकी आभा सातवें दशक में भी दिखाई पड़ती है.आज़ादी के तुरंत बाद के सालों में ऐतिहासिक फिल्मों के प्रति रुझान नहीं दिखाई देता,जबकि कुछ सालों पहले तक मुगलों,मराठों और राजस्थान के राजपूत राजाओं की शौर्य गाथाओं पर फ़िल्में बन रही थी.आज़ादी के पहले इन फिल्मों से राष्ट्रीय चेतना का उद्बोधन किया जा रहा था.मुमकिन है आज़ादी के बाद फिल्मकारों को ऐसे उद्बोधन की प्रासंगिकता नहीं दिखी हो.
सोहराब मोदी और उनकी ऐतिहासिक फ़िल्में
आज़ादी के पहले ‘पुकार(1939),’सिकंदर(1941) और ‘पृथ्वी वल्लभ(1943) जैसी ऐतिहासिक फ़िल्में निर्देशित कर चुके सोहराब मोदी ने अजाची के बाद पहले ‘शीशमहल(1950) नामक सोशल फिल्म का निर्देशन किया.फिर 1952 में उन्होंने महत्वाकांक्षी फिल्म ‘झाँसी की रानी का निर्माण और निर्देशन किया.यह फिल्म जनवरी 1953 में रिलीज हुई थी.इसका एक अंग्रेजी संस्करण भी बना था. अंग्रेजी में इसका शीर्षक था ‘द टाइगर एंड द फ्लेम. बता दें कि अंग्रेजी में डब करने के बजाय अलग से साथ में ही शूटिंग की गयी थी.इस वजह से फिल्म के सेट और शूटिंग पर भारी खर्च हुआ था.इस फिल्म की नायिका सोहराब मोदी की पत्नी महताब थीं.कहते हैं कि महताब रानी लक्ष्मीबाई की भूमिका में नहीं जंची थीं.उनकी उम्र किरदार की उम्र से ज्यादा लग रही थी.लिहाजा दर्शकों ने फिल्म नापसंद कर दी थी.हिंदी की पहली टेक्नीकलर फिल्म ‘झाँसी की रानी का अब सिर्फ श्वेत-श्याम प्रिंट ही बचा हुआ हैं.अध्येता बताते हैं कि अंग्रेजी संस्करण का टेक्नीकलर प्रिंट मौजूद है. इस फिल्म से सोहराब मोदी को बड़ा नुकसान हुआ.
फिर भी दो सालों के अन्दर सोहराब मोदी ने ‘मिर्ज़ा ग़ालिब का निर्माण और निर्देशन किया.किस्सा है कि पंडित जवाहरलाल नेहरु को एक साल जन्मदिन की बधाई देने पहुंचे सोहराब मोदी ने ग़ालिब का शेर सुनाया तुम सलामत रहो हज़ार बरस
हर बरस के दिन हों पचास हज़ार
नेहरु ने शायर का नाम पूछा और सोहराब मोदी से उनके ऊपर फिल्म बनाने की बात कही.सोहराब मोदी ने उनकी बात मान ली. भारत भूषण और सुरैया के साथ उन्होंने ‘मिर्ज़ा ग़ालिब बना डाली.इस फिल्म को पहला राष्ट्रपति पुरस्कार भी मिला.फिल्म में सुरैया ने ग़ालिब की ग़ज़लों को अपनी आवाज़ दी थी.जिन्हें सुन कर नेहरु ने सुरैया से कहा था,’आप ने तो मिर्ज़ा ग़ालिब की रूह को जिंदा कर दिया.’पुरस्कृत और प्रशंसित होने के बावजूद ‘मिर्ज़ा ग़ालिब नहीं चली थी.सोहराब मोदी इस उम्मीद में आगे फ़िल्में बनाते रहे कि किसी एक फिल्म के चलने से उनके स्टूडियो की गाड़ी पटरी पर आ जाएगी.ऐसा नहीं हो सका.एक दिन ऐसा आया कि मिनर्वा मूवीटोन बिक गया.
सोहराब मोदी ने बाद में ‘नौशेरवां-ए-एदिल’ और ‘यहूदी जैसी ऐतिहासिक फिल्मों का निर्माण किया.सोहराब मोदी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के अकेले फ़िल्मकार हैं,जिन्होंने आज़ादी के पहले और बाद के सालों में ऐतिहासिक फिल्मों के निर्माण और निर्देशन पर जोर दिया.उनके समकालीनों ने छिटपुट रूप से ही इस विधा पर ध्यान दिया.
सामान्य उदासीनता के बावजूद
यह अध्ययन का विषय हो सकता है कि आज़ादी के बाद के सालों में ऐतिहासिक फिल्मों के प्रति क्यों उदासीनता रही? देश के आजाद होने के बाद राष्ट्र निर्माण की भावना से नयी कहानी लिखने-रचने का जोश कहीं न कहीं नेहरु के सपनों के भारत के मेल में था.नए दौर में फ़िल्मकार आत्म निर्भरता की चेतना से सामाजिक बदलाव की भी कहानियां लिख रहे थे.और जैसा कि हम ने पहले कहा कि देशभक्ति की भावना और राष्ट्रीय चेतना का फोकस बदल जाने से सामाजिक और पारिवारिक फिल्मों का चलन बढ़ा.प्रेम कहानियों में नायक-नायिका के बीच सामाजिक,आर्थिक और शहर-देहात का फर्क रखा गया.उनके मिलन की बाधाओं के ड्रामे में पुरानी धारणाओं और रुढियों को तोड़ने का प्रयास दिखा.प्रगतिशील और सेक्युलर समाज की चिंताएं फिल्मकारों की कोशिशों में जाहिर हो रही थीं.
कुछ फिल्मकारों ने मुग़लों और मराठों की कहानियों को दोहराया.ऐतिहासिक फिल्मों के सन्दर्भ में हम बार-बार उल्लेख कर रहे हैं कि फ़िल्मकार नयी कहानियों की तलाश में कम रहे हैं.आज़ादी के बाद के दौर में भी सलीम-अनारकली,जहाँगीर,शाहजहाँ आदि मुग़ल बादशाहों के महलों के आसपास ही हमारे फ़िल्मकार भटकते रहे.सलीम-अनारकली की काल्पनिक प्रेमकहानी पर पहले ‘अनारकली और फिर ‘मुग़लेआज़म’ जैसी मनोरंजक और भव्य फिल्म आई.’अनारकली में प्रदीप कुमार और बीना राय की जोड़ी थी.इस फिल्म में अकबर की भूमिका मुबारक ने निभाई थी.फिल्म के निर्देशक नन्दलाल जसवंतलाल थे. ‘मुग़लेआज़म’ में के आसिफ ने पृथ्वीराज कपूर,दिलीप कुमार और मधुबाला के साथ ऐसी कहानी रची कि फिर कोई इस कमाल के साथ इसे नहीं दोहरा सका.हाँ,तीन सालों के बाद ए के नाडियाडवाला ने ज़रूर एम सादिक के निर्देशन में प्रदीप कुमार और बीना राय के साथ ‘ताजमहल का निर्माण किया.साहिर लुधियानवी और रोशन की जोड़ी के रचे गीत-संगीत ने धूम मचा दी थी.एम् सादिक ने फिर प्रदीप कुमार और मीना कुमारी के साथ ‘नूरजहाँ का निर्देशन किया.इसके निर्माता शेख मुख़्तार थे.उन्होंने इस फिल्म में एक किरदार भी निभाया था.इस फिल्म के बाद शेख मुख़्तार फिल्म लेकर पाकिस्तान चले गए थे.भारत में यह फिल्म दर्शकों को अधिक पसंद नहीं आई थी,जबकि पाकिस्तान में यह फिल्म खूब चली.
समकालीन नायक और जीवनीपरक फ़िल्में
ऐतिहासिक फिल्मों के विस्तार के रूप में हम राजनेताओं पर बनी जीवनीपरक फिल्मों को देख सकते हैं.अभी बायोपिक फैशन में है.गौर करें तो बायोपिक की शुरुआत स्वतंत्रता सेनानियों पर बनी फिल्मों से होती है.आज़ादी के पहले प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भी राजनेताओं का नाम लेना और उनके ऊपर फिल्म बनाना मुमकिन नहीं था.ब्रिटिश हुकूमत बर्दाश्त नहीं कर पाती थी.आज़ादी के बाद लोकमान्य तिलक,भगत सिंह,गाँधी,सुभाष चन्द्र बोस जैसे नेताओं पर फ़िल्में बनीं.आज़ादी के बाद 20वीं सदी के पांच दशकों में नौवें दशक में अनेक राजनेताओं पर फ़िल्में बनीं.रिचर्ड एटेनबरो की ‘गाँधी के निर्देशक भले ही विदेशी हों,लेकिन यह भारत सरकार के सहयोग से बनी फिल्म थी.’गाँधी(1982) और ‘मेकिंग ऑफ़ महात्मा(1996) एक साथ देख लें तो महात्मा गाँधी के जीवन और कार्य को आसानी से सम्पूर्णता में समझा जा सकता है.शहीदेआज़म भगत सिंह के जीवन पर बनी ‘शहीद ने बहुत खूबसूरती से किंवदंती बन चुके क्रान्तिकारी के जीवन को राष्ट्र धर्म और मर्म के सन्दर्भ में पेश किया.भगत सिंह की जन्म शताब्दी के समय 2002 में एक साथ अनेक फ़िल्में हिंदी और अन्य भाषाओँ में बनी.यहाँ तक कि राकेश ओमप्रकाश मेहरा की आमिर खान अभिनीत ‘रंग दे बसंती भी उनके जीवन से प्रेरित थी.
अन्य ऐतिहासिक फिल्मे
आज़ादी के बाद की अन्य ऐतिहासिक फिल्मों में हेमेश गुप्ता की ‘आनंद मठ(1952),केदार शर्मा की ‘नीलकमल(1947),सत्यजित राय की ‘शतरंज के खिलाडी(1977),लेख टंडन की ‘आम्रपाली(1966),एम् एस सथ्यू की ‘गर्म हवा(1974),श्याम बेनेगल की ‘जुनून’(1978),केतन मेहता की ‘सरदार(1993} आदि का उल्लेख आवश्यक होगा.इन फिल्मों के निर्देशकों ने समय की प्रवृतियों से अलग जाकर महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं पर काल्पनिक कथा बुनी या ऐतिहासिक प्रसंगों के सन्दर्भ के साथ उनका चित्रण किया.एक कमी तो खटकती है कि स्वाधीनता आन्दोलन,प्रथम स्वतंत्रता संग्राम,भारत-पाकिस्तान और भारत-चीन युद्ध,देश में चले सुधार आन्दोलन,किसानों और मजदूरों के अभियान और संघर्ष जैसे सामयिक विषयों पर फिल्मकारों ने ध्यान नहीं दिया.देश के विभाजन की राजनीतिक और मार्मिक कथा भी नहीं कही गयी.हम अपने अतीत के यथार्थ से भागते रहे.हिंदी फ़िल्में और कमोबेश सभी भारतीय फ़िल्में मुख्य रूप से ख्याली दुनिया में ही उलझी रहीं.अर्द्धसामन्ती देश में प्रेम कहानियां भी एक तरह से विद्रोह की ही दास्तानें हैं,लेकिन फिल्मों में इसकी अति दिखाई पड़ती है.
21वीं सदी में अलबत्ता अनेक ऐतिहासिक फ़िल्में बनती हैं.साधन और सुविधा के साथ भव्यता की चाहत ने फिल्मकारों को ऐतिहासिक फिल्मों के लिए प्रेरित किया है.पिछले दो सालों में अनेक फ़िल्में प्रदर्शित हुई हैं और अभी कुछ ऐतिहासिक फिल्मों के निर्माण में लोकप्रिय और बड़े बैनर संलग्न हैं.

 
प्रसंग  
पारसी परिवार में जन्मे सोहराब मोदी का बचपन मुंबई की पारसी कॉलोनी में बीता था.किशोर उम्र में वे अपने पिता के साथ उत्तर प्रदेश के रामपुर चले गए थे.उनके पिता रामपुर के राजा के मुलाजिम थे.सोहराब मोदी का मन पढ़ाई-लिखाई में अधिक नहीं लगता था.खास कर इतिहास में वे फिसड्डी थे.शिक्षकों ने कई बार उनके पिता को उलाहना भी दिया था.सोहराब का मन खेल और कसरत में अधिक लगता था.14-15 की उम्र में सोहराब को रंगमंच का शौक चढ़ा और वे शेक्सपियर के नाटक करने लगे,उनके भाई रुस्तम भी उनका साथ देते थे.विडम्बना देखें कि इतिहास की पढाई में कमज़ोर सोहराब मोदी भविष्य में ऐतिहासिक फिल्मों के बड़े फ़िल्मकार हुए.उन्होंने अनेक ऐतिहासिक फिल्मों का निर्माण और निर्देशन किया.उन्होंने एक बार कहा था,’हिंदी फिल्मों में प्रवेश करने के बाद मैंने ध्यान से इतिहास पढ़ना आरम्भ किया.फिर एहसास हुआ कि इतिहास में कितना ज्ञान छिपा है.अगर हम ऐतिहासिक व्यक्तियों के जीवन का अनुसरण करें और उनसे शिक्षा लें तो हम अपना जीवन बदल सकते हैं.मुझे लगा कि मेरी तरह अनेक छात्र इतिहास पढ़ने में रूचि नहीं रखते होंगे.क्यों न उन सभी के लिए ऐतिहासिक फिल्मों का निर्माण करूं? इन फिल्मों से उनकी इतिहास की समझदारी बढ़ेगी और वे इतिहास के सबक से अपना भविष्य संवार सकेंगे.

सिनेमालोक : लोकप्रियता का नया पैमाना


सिनेमालोक
लोकप्रियता का नया पैमाना
-अजय ब्रह्मात्मज
सोशल मीडिया के विस्तार से फिल्मों के प्रचार को नए प्लेटफार्म मिल गए हैं.फेसबुक,इंस्टाग्राम,ट्विटर और यूट्यूब....सोशल मीडिया के चरों प्लेटफार्म किसी भी फिल्म के प्रचार के लिए मह्त्वपूर्ण हो गए हैं.उनके लिए खास रणनीति अपनाई जा रही है.कोशिश हो रही है कि ज्यादा से ज्यादा यूजर और व्यूअर इन प्लेटफार्म पर आयें.जितनी ज्याद तादाद,निर्माता-निर्देशक और स्टार की उतनी बड़ी संतुष्टि.आरंभिक ख़ुशी तो मिल ही जाती है.ख़ुशी होती है तो जोश बढ़ता है और फिल्म के प्रति उत्सूकता घनी होती है.इन दिनों फिल्मों की कमाई और कामयाबी के लिए वीकेंड के तीन दिन ही थर्मामीटर हो गए हैं.वीकेंड के तीन दिन के कलेक्शन से पता चल जाता है कि फिल्म का लाइफ टाइम बिज़नस क्या होगा?शायद ही कोई फिल्म सोमवार के बाद नए सिरे से दर्शकों को आकर्षित कर पा रही है.
पिछले हफ्ते ‘जीरो’ और ‘2.0’ के ट्रेलर जारी हुए.मुंबई के आईमैक्स वदला में प्रशंसकों और मीडिया के बीच ट्रेलर जरी कर निर्देश आनद एल राय ने अपने स्टार श रुख खान,अनुष्का शर्मा और कट्रीना कैफ के साथ मीडिया को संबोधित किया.मुख्या रूप से शाह रुख खान से ही सवाल किये जा रहे थे और वही जवाब भी दे रहे थे.निर्माता-निर्देशक ने फिल्म की कथाभूमि मेरठ का फील देने के लिए वहां के घंटाघर का कटआउट लगाया था.मेरठ के स्वाद की भी व्यवस्था की गयी थी.इन आकर्षणों के साथ शाह रुख खान का जन्मदिन भी था.लिहाजा ट्रेलर के यूट्यूब पर आते ही दर्शक और प्रशंसक टूट पड़े.दूसरी तरफ रजनीकांत और निर्देशक शंकर की टीम ने ‘2.0 के ट्रेलर लांच का आयोजन चेन्नई में किया था.मुंबई से अक्षय कुमार भी वहां गए थे.’2.0 मूल रूप से तमिल फिल्म है.इसे हिंदी समेत अन्य भाषाओँ में भी डब किया गया है.ट्रेलर भी अनेक भाषाओँ में यूट्यूब पर चल रहे हैं.दोनोंओ ही फिल्मों के त्रलेर के व्यूअर की संख्या करोड़ों में पहुँच चुकी है और अभी गिनती जारी है.
‘जीरो के बारे में तो अनुमान था कि इसे दर्शकों का प्यार मिलेगा.बौने शाह रुख खान के तेवर और अंदाज को सभी देखना चाहते थे.निर्माता-निर्देशक ने ट्रेलर में कुछ छिपाया नहीं है.खास कर तीनों प्रमुख किरदारों के बारे में बता दिया है.बऊआ का खिलंदड़ा और आक्रामक अंदाज पसंद आ रहा है.बऊआ ग्रंथिहीन हीरो है.उसे अपने अधूरेपन का कोई रंज नहीं है.वह मस्त रहता है और किसी के साथ भी जुड़ कर उसकी ज़िन्दगी बदल देता है.देखते ही देखते ‘जीरो के ट्रेलर के व्यूअर की संख्या करोड़ों में पहुँच गयी.’2.0 का भी यही हाल रहा.उसके व्यूअर भाषाओँ की वजह से बंट गए.इन दोनों के पहले आये ‘ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान के ट्रेलर के व्यूअर की संख्या 8 करोड़ पार कर चुकी है.क्या ये सभी इन फिल्मों के दर्शक भी होंगे?
फिल्मों के ट्रेलर के व्यूअर दर्शक में तब्दील हो पते हैं क्या?इसे मापने का अभी तक कोई सूत्र विकसित नहीं हुआ है.पिछली कुछ फिल्मों के ट्रेलर ने भी यूट्यूब पर आग लगा दी थी,लेकिन बॉक्स ऑफिस तक उस आग की गर्मी नहीं पहुंची.मीडिया के विशेषज्ञ मानते हैं कि यूट्यूब के व्यूअर और थिएटर के दर्शक अलग होते हैं.यूँ समझें कि किसी भी मॉल में रोजाना फूटफॉल हजारों और लाखों में होता है,लेकिन वास्तविक खरीददारों की संख्या उनके अनुपात में बहुत कम होती है.यही हाल व्यूअर और दर्शक के बीच के गैप में नज़र आता है.
फिर भी यूट्यूब फिल्मों की प्रति उत्सुकता और लोकप्रियता का नया पैमाना बन गया है.उसके विशेषज्ञ आ गए हैं.ट्रेलर के व्यूअर जुटाने के लिए भी ऐड दिए जाते है.उन्हें बूस्ट किया जाता है.व्यूअर की संख्या के खोखलेपन को समझते हुए भी निर्माता-निर्देशक उन तरकीबों और रणनीतियों के मद में भारी राशि खर्च कर रहे हैं.मीडिया के इन्फ़्लुऐंसर की भी मदद ली जा रही है.देखें तो सोशल मीडिया और खास कर यूट्यूब नया मैदान-ए-जंग बना हुआ है.लोकप्रियता की पहली झड़प यहाँ जीतनी होती है.

Sunday, November 4, 2018

आयुष्मान खुराना : रुपहले परदे के राहुल द्रविड़


आयुष्मान खुराना : रुपहले परदे के राहुल द्रविड़ 
-अजय ब्रह्मात्मज

क्रिकेट और फिल्म में अनायास रिकॉर्ड बनते हैं.अचानक कोई खिलाडी या एक्टर उभरता है और अपने नियमित प्रदर्शन से ही नया रिकॉर्ड बना जाता है.अक्टूबर का महीना हमें चौंका गया है.आयुष्मान खुराना की दो फ़िल्में 15 दिनों के अंतराल पर रिलीज हुईं और दोनों फिल्मों ने अच्छा प्रदर्शन किया.दोनों ने बॉक्स ऑफिस पर बेहतर परफॉर्म किया और आयुष्मान खुराना को एक्टर से स्टार की कतार में ला खडा किया.पिछले शनिवार को उनकी ताज़ा फिल्म ‘बधाई हो ने 8.15 करोड़ का कलेक्शन किया.यह आंकड़ा ‘बधाई हो के पहले दिन के कलेक्शन से भी ज्यादा है,जबकि यह दूसरा शनिवार था.लोकप्रिय स्टार की फ़िल्में भी दूसरे हफ्ते के वीकेंड तक आते-आते दम तोड़ देती हैं.इस लिहाज से आयुष्मान खुराना ‘अंधाधुन और ‘बधाई हो की कामयाबी से भरोसेमंद एक्टर-स्टार की श्रेणी में आ गए हैं.

गौर करने वाली बात है कि ‘बधाई हो अर्जुन कपूर और परिणीति चोपड़ा की ‘नमस्ते इंग्लैंड के साथ रिलीज हुई थी.विपुल शाह निर्देशित यह फिल्म ‘नमस्ते लंदन की कड़ी में पंजाब की पृष्ठभूमि की कहानी थी.स्वाभाविक तौर पर माना जा रहा था कि यह फिल्म अच्छा कारोबार करेगी.आजमाए हुए सफल फार्मुले की ‘नमस्ते इंग्लैंड के सामने ‘बधाई हो जैसी ‘आउटऑफ़ बॉक्स फिल्म थी.’बधाई हो के कलाकारों की स्टार वैल्यू ‘नमस्ते इंग्लैंड के कलाकारों से कम और कमज़ोर थी.फिर भी दर्शकों के रुझान से पहले ही दिन जाहिर हो गया कि पंजाब की देखी-सुनी कहानी से वे विरक्त हैं.उन्होंने ‘बधाई हो को पसंद किया और उमड़ कर सिनेमाघरों में पहुंचे.और अभी तक जा रहे हैं.

आज बासु चटर्जी,हृषीकेश मुखर्जी,सई परांजपे आदि डायरेक्टर एक्टिव होते तो अमोल पालेकर और फारुख शेख की तरह आयुष्मान खुराना उनके पसंदीदा एक्टर-स्टार होते.यह भी हो सकता था कि कुछ अनोखी कहानियां लिखी जातीं.आयुष्मान खुराना ने फिल्मों के चुनाव से यह स्पष्ट संकेत दिया है कि वे अपारंपरिक हीरो की भूमिका निभाने के लिए तैयार और सक्षम हैं.उनकी पहली फिल्म ‘विकी डोनर’ स्पर्म डोनेशन के अनोखे विषय पर बनी रोचक फिल्म थी.शूजित सरकार की इस फिल्म को दूसरे अभिनेताओं ने ठुकरा दिया था.फिल्म इंडस्ट्री के रिवाज से किसी भी नए एक्टर के लिए ऐसा विषय चुनना पूरी तरह से जोखिम का काम था,लेकिन शूजित सरकार के सधे हाथों और पैनी नज़र से यह फिल्म मानवीय संवेदना के अनछुए पहलू को लेकर आई.आयुष्मान खुराना,अन्नू कपूर और अन्य सहयोगी कलाकारों ने इसे फूहड़ और साधारण होने से बचा लिया.दर्शक फिल्म देखते हुए आनंदित हुए.

हाल ही में राष्टीय पुरस्कारों से सम्मानित और प्रशंसित एक्टर मनोज बाजपेयी से इधर तेज़ी से उभरे तीन अभिनेताओं राजकुमार राव,विकी कौशल और आयुष्मान खुराना की मौजूदगी पर बात हो रही थी.उन्होंने आयुष्मान खुराना के बारे में मार्के की बात कही.उनके मुताबिक,’ आयुष्मान खुराना का दिल और दिमाग सही जगह पर है.वह इंटेलीजेंट एक्टर हैं.उन्होंने अपना स्ट्रेंग्थ जान लिया है.वह फिल्मों के राहुल द्रविड़ हैं.वह खेलते रहेंगे.’ किसी सीनियर अभिनेता का यह ऑब्जरवेशन गौरतलब है.आयुष्मान खुराना मामूली विफलताओं के बावजूद समय बीतने के साथ लोकप्रियता और स्वीकृति की सीढियां चढ़ते गए हैं.’विकी डोनर के बाद उनसे भी ‘बेवकूफियां हुई हैं.’बेवकूफियां,’नौटंकी साला और ‘हवाईजादा’ उनकी कमज़ोर फ़िल्में रहीं.उन्होंने 2016 में आई ‘दम लगा के हईसा से बताया कि अपनी असफलता से वह बेदम नहीं हुए हैं.इस फिल्म में प्रेम प्रकाश तिवारी जैसे फेलियर और ग्रंथिपूर्ण किरदार को वह पूरी संजीदगी और प्रभाव के साथ जीते हैं.इस फिल्म के बाद उनके चढ़ते कदम अभी तक नहीं लड़खड़ायें हैं.2017 में ‘बरेली की बर्फी और ‘शुभ मंगल सावधान की कामयाबी से ‘मेरी प्यारी बिंदु को गौण कर दिया.उनके प्रशंसकों को उस फिल्म का नाम याद भी नहीं होगा.

हिंदी फिल्मों के इतिहास में हर अभिनेता को कुछ साल ऐसे मिलते हैं,जब उसकी जबरदस्त स्वीकृति रहती है.इस दौर में उसके उन्नीस-बीस परफॉरमेंस को दर्शक-प्रशंसक नज़रअंदाज कर देते हैं.वे किसी प्रेमी/प्रेमिका की तरह अपने प्रिय स्टार की मामूली चूकों पर ध्यान नहीं देते. आयुष्मान खुराना का अभी ऐसा ही वक़्त चल रहा है. अगर उनकी फिल्मों के विषय देखें तो हम पाते हैं कि अपनी अधिकांश फिल्मों में आयुष्मान खुराना पारंपरिक नायक नहीं होते.वे मध्यवर्गीय परिवारों के औसत युवक होते हैं,जो कभी शारीरिक तो कभी पारिवारिक उलझनों में फंसा है.वह उनसे निबटने का कोई ‘ओवर द टॉप’ या अतिरंजित युक्ति नहीं अपनाता.उसमें हिंदी फिल्मों के नियमित नायकों की अविश्वसनीय शक्तियां नहीं रहतीं.अपनी नायिकाओं के साथ उसकी गलतफहमियां चलती रहती हैं.आयुष्मान खुराना की फिल्मों की नायिकाएं दमदार और स्वतंत्र व्यक्तित्व की होती हैं.वे शरमाती या सिफोन की साड़ियाँ लहराती उसके पास नहीं आतीं.वे कामकाजी भी होती हैं.ऐसी नायिकाओं के साथ नायक के प्रेम संबंध दिखाने के लिए लेखकों और निर्देशकों को भी मशक्कत करनी पड़ती है.और फिर आयुष्मान खुराना अपनी सामान्य कद-काठी से उन नायकों को सहज भाव-भंगिमा देते हैं.आयुष्मान अपनी फिल्मों में अधिक नाटकीय या हाइपर नहीं दिखते.’बरेली की बर्फी में उनका किरदार आक्रामक और चालाक था,लेकिन अपनी मासूमियत से वह ठगा भी जाता है.उस फिल्म में तो राजकुमार राव अपने दोरंगी किरदार से दर्शकों के चहेते बन गए थे और आयुष्मान खुराना से लाइमलाइट छीन ली थी.

आयुष्मान खुराना ने पिछले छह सालों में खुद की मेहनत और दर्शकों के प्रेम से यह ऊंचाई हासिल की है.शादीशुदा आयुष्मान खुराना एक समझदार और सहयोगी पति की छवि पेश करते हैं और पारिवारिक गरिमा का पालन करते हैं.वे गायक,कवि और लेखक भी हैं.कहीं न कहीं माँ से उन्हें सारी सृजनात्मकता मिली है.अभिनय कौशल पर उनकी किताब आ चुकी है.और खबर है कि वे जल्दी ही अपनी कविताओं का संग्रह प्रकाशित करना चाहते हैं.सफलता के साथ हर एक्टर-स्टार के आसपास एक हुजूम खड़ा हो जाता है.शुभचिंतक बना यह हुजूम स्टार को खास दिशा में ले जाना चाहता है और शीर्ष पर ले जाने का भुलावा देकर ग्लैमर की गलियों में भटका भी देता है.बस,आयुष्मान खुराना सावधान रहें और बहके नहीं तो उनकी पारी राहुल द्रविड़ की तरह मजबूत और यादगार होगी.



Wednesday, October 31, 2018

सिनेमालोक : मुंबई में फिल्मों की फुहार


सिनेमालोक
मुंबई में फिल्मों की फुहार  
-अजय ब्रह्मात्मज
मुंबई में इन दिनों फिल्मों की बहार है.खास कर पश्चिमी उपनगर के तीन मल्टीप्लेक्स में चल रही फिल्मों की फुहार से सिनेप्रेमी भीग रहे हैं. वे सिक्त हो रहे हैं.देश-विदेश से लायी गयी चुनिन्दा फिम्लें देखने के लिए उमड़ी दर्शकों की भीड़ आश्वस्त करती है कि इन्टरनेट प्रसार के बाद फिल्मों की ऑन लाइन उपलब्धता के बावजूद दर्शक सिनेमाघरों के स्क्रीन पर फ़िल्में देखना पसंद करते हैं.फेस्टिवल सिनेमा का सामूहिक उत्सव है.दर्शकों को मौका मिलता है कि वे अपनी रिची और पसंद के मुताबिक फ़िल्में देखें और सह्दर्शक के साथ उस पर बातचीत करें.ज्यादातर नयी फिल्मों के निर्माता,निर्देशक और कलाकार फिल्मों के प्रदर्शन के बाद दर्शकों से मुखातिब होते हैं. वे उनकी जिज्ञासाओं के जवाब देते हैं.यह सुखद अनुभव होता है.फेस्टिवल के मास्टरक्लास से अंतर्दृष्टि मिलती है और विमर्शों से सिनेमहौल की दिशा और दृष्टि मिलती है.
देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने आज़ादी के बाद देश में विभिन्न कला माध्यमों के विकास के लिए अनेक संस्थाओं का गठन किया,जिनके तहत कला चेतना के विकास के लिए गतिविधियाँ आयोजित की गईं.उनमें से एक महत्वपूर्ण गतिविधि इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का आयोजन था.1952 में पहला फिल्म फेस्टिवल आयोजित किया गया था,जिसमें सिर्फ 23 देशों की फ़िल्में आ सकी थीं.इस साल ख़बरों के अनुसार 100 से अधिक देशों की फ़िल्में प्रदर्शित होंगीं.पिछले अनेक सालों से यह फेस्टिवल अब गोवा में आयोजित होने लगा है.फिल्म फेस्टिवल के प्रति सूचना और प्रसारण मंत्रालय की बेरुखी और फिल्म निदेशालय की नौकरशाही से यह फिल्म फेस्टिवल अपनी गरिमा खो चुका है. देश के दूसरे शहरों में ज्यादा सुगठित और सुविचारित फिल्म फेस्टिवल हो रहे हैं.दर्शक अपने आसपास के शहरों के फेस्टिवल में शिरकत कर लेते हैं.देखा यह जा रहा है कि सभी फेस्टिवल में 60 से 70 प्रतिशत फ़िल्में एक सी होती हैं.दुनिया भर से चर्चित 200 फिल्मों से ही सभी काम चलाते हैं.ऐसी स्थिति में हर फेस्टिवल में जाना ज़रूरी नहीं रह जाता.अब समय आ गया है कि ये फेस्टिवल सोच-विचार का भिन्नता जाहिर करें.तात्पर्य यह की सभी फेस्टिवल की अपनी खासियत हो.मुंबई में इस तरह के कुछ आयोजन इधर पॉपुलर हुए हैं.
मुंबई का फिल्म फेस्टिवल मुंबई अकादमी ऑफ़ मूविंग इमेजेज(मामी) के तहत आयोजित होता है.श्याम बेनेगल के नेतृत्व में इसकी शुरुआत इस उद्देश्य के साथ की गयी थी कि फिल्म इंडस्ट्री का एक अपना फेस्टिवल हो,जिसमें इंडस्ट्री के कलाकार और तकनीशियन भी शामिल हो सकें.साथ ही हिंदी फिल्मों की केन्द्रीय नगरी होने की वजह से भी मुंबई में ऐसे फेस्टिवल की आवश्यकता महसूस की जाने लगी थी.आरंभिक वर्षों में महराष्ट्र सर्कार ने भी इस फेस्टिवल की मदद की.फिर अंबानी बंधुओं ने बारी-बारी से इस फेस्टिवल के लिए आवश्यक धन प्रदान किये.अभी यह फेस्टिवल जियो और स्टार के सहयोग से संचालित हो रहा है.
अनुपमा चोपड़ा और किरण राव के नेत्रित्व में मामी फिल्म फेस्टिवल अधिक पॉपुलर और व्यापक हुआ है.अनुपमा चोपड़ा फ़िल्मकार विधु विनोद चोपड़ा की पत्नी हैं और किरण राव फिल्म स्टार आमिर खान की पत्नी हैं.दोनों की पृष्ठभूमि और पहुँच से फिल्म फेस्टिवल में लोकप्रिय चेहरों की मौजूदगी बढी.आम दर्शक भी खींचे आये.इस साल तो दर्शकों और डेलिगेट की भागीदारी इतनी ज्यादा हो गयी है कि पहले दिन टिकट बुक करने की ऑन लाइन व्यवस्था कुछ घंटों के लिए बैठ गयी.बाद में स्थिति सुधरी तो भी दर्शकों को मनपसंद फ़िल्में चुनने और देखने में भी दिक्कतें हो रही हैं.बढती भीड़ और भागीदारी को देखते हुए फेस्टिवल के नियंताओं को नयी तरकीब खोजनी पड़ेगी या मल्टीप्लेक्स की संख्या बढानी पड़ेगी.
सीमाओं और कमियों के बावजूद मामी फिल्म फेस्टिवल देश का अग्रणी फिल्म फेस्टिवल बन चूका है.यह लोकतान्त्रिक,मुखर और उदार फेस्टिवल है.गोवा का सरकारी फिल्म फेस्टिवल सरकारी सोच की संकीर्णता का शिकार है.नयी सरकार के नुमाइंदों ने अपने खेमे के अयोग्य लोगों को ज़िम्मेदारी देकर इस फेस्टिवल का स्वरुप नष्ट कर दिया है.पिछले साल के आयोजन की कमियां फेस्टिवल के दौरान ही उजागर हो गयी थीं.इस साल सिनेप्रेमियों का उत्साह नज़र नहीं आ रहा है.



Friday, October 26, 2018

मी टू से मची खलबली


मी टू से मची खलबली
अजय ब्रह्मात्मज

भविष्य में भारत के सामाजिक इतिहास में 2018 का अक्टूबर महीना #MeToo अभियान के लिए याद किया जायेगा. मुख्य रूप से कार्यस्थल पर यौन शोषण और उत्पीडन की शिकायतों को समेटते इस अभियान को पहले सोशल मीडिया और फिर ट्रेडिशनल मीडिया से भरपूर समर्थन मिला.सोशल मीडिया पर इससे संबंधित हर अपडेट को पात्र-पत्रिकाओं ने सुर्ख़ियों में छापा.ज्यादा तफसील और तहकीकात की कोशिश नहीं की गयी.हाँ,हर नए उद्घाटन के साथ सार्वजानिक शर्मिंदगी ज़रूर हुई.कुछ मामलों में आरोपियों को उनकी तात्कालिक ज़िम्मेदारी और कार्य से अलग कर दिया गया.कुछ शिकायतों की जांच चल रही है.कयास लगाये जा रहे हैं कि जल्दी ही कोई फैसला लिया जायेगा.आरोप और इंकार के गुंफित महौल अभी स्पष्टता नहीं है कि न्यायालय भारतीय दंड संहिता की किस धारा में इन मामलों का निबटान करे.महिला और बाल विकास मंत्रालय ने अवश्य कुछ सालों पहले 2013 में ‘महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीडन (निवारण,प्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनयम ‘ जरी किया था. इस अधिनियम के मुताबिक सभी कार्यस्थलों पर लैंगिक उत्पीडन की शिकायतों को सुलझाने के लिए आतंरिक समिति के गठन की अनिवार्यता तय की गयी थी.इस साल जब कुछ शिकायतें प्रकाश में आईं तो पता चला कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की चंद कंपनियों ने ही इसका पालन किया था.

इसी महीने ज़ूम को दिए एक वीडियो इंटरव्यू में तनुश्री दत्ता ने बताया कि ‘हॉर्न ओके प्लीज के सेट पर एक डांस सीक्वेंस की शूटिंग के समय नाना पाटेकर ने उनके साथ बदतमीजी की. तनुश्री ने जब सेट पर मौजूद निर्माता सामी सिद्दीकी,निर्देशक राकेश सारंग और कोरियोग्राफर से इसका ज़िक्र किया और नाना को सेट से हटाने की मांग की तो उन्होंने तनुश्री की मांग नहीं सुनी.मजबूरन तनुश्री को सेट छोड़ कर जाना पड़ा.तनुश्री ने पुलिस में शिकायत दर्ज की तो एफ़आईआर में बदतमीजी(यौन उत्पीडन) का उल्लेख नहीं किया गया. 2008 में यह मामला दब गया.प्रतिकूल स्थितियों में तनुश्री को फिल्म इंडस्ट्री छोडनी पड़ी. 10 सालों के बाद तनुश्री ने इस मामले को फिर से उठाया तो पहले कोई खास सुगबुगाहट नहीं दिखी,लेकी इस बार सोशल मीडिया और कुछ सितारों ने तनुश्री से हमदर्दी दिखाई.उन्होंने तनुश्री की शिकायतों पर गौर करने की अपील की.इसी समय फैंटम के एक निदेशक विकास बहल के मामला प्रकाशित हुआ.उन्होंने फैंटम की फिल्म ‘बॉम्बे वेलवेट के गोवा इवेंट के समय एक महिला सहयोगी के साथ बदतमीजी की थी.एक वेब पोर्टल में आई विस्तृत रिपोर्ट के बाद आनन्-फानन में फैंटम का विलयन हो गया और विकास बहल सवालों के घेरे में आ गए.इन दोनों मामलों की ख़बरों और चर्चा के साथ ही आमिर खान का बयां आया कि वे निर्माणाधीन फिल्म ‘मुग़ल से खुद को अलग कर रहे हैं.फिल्म के निर्देशक पर यौन उत्पीडन का आरोप है,जो अभी न्यायालय के अधीन है.इसके बाद तो झड़ी लग गयी.हर दिन किसी न किसी पुरुष सेलिब्रिटी पर अभियोग और आरोप लगा.मीडिया ने खबरें छापीं.तत्काल प्रभाव से संबंधित व्यक्ति की छवि धूमिल हुई और उसे सार्वजानिक शर्मिदगी से गुजरना पड़ा.अभी तक दर्जन से अधिक नामों पर आरोप लग चुके हैं.ज्यादातर आरोपियों ने खुद को दोषमुक्त कहा है.कुछ ही मामलों में जांच या कारर्वाई हो पाई है.बाकी सारे मामले हवा में तैर रहे हैं.सभी चुस्की लेकर उन्हें सुना-बता रहे हैं.निदान या समाधान की किसी को चिंता नहीं है.मी टू विवादों में जिनके नाम आ गए हैं,वे अपनी सामाजिक छवि और शोहरत के साथ भविष्य के काम को लेकर थोड़े चिंतित ज़रूर हैं.यूँ लग रहा है कि उनका सामाजिक बहिष्कार हो चुका है.एक तबका यह भी पूछ रहा है कि आरोप साबित हो जाने पर क्या सजा होगी और फिर सजा काट लेने के बाद पुनर्वसन कैसे होगी?ढेर सारे प्रश्न अनुत्तरित हैं.

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री समेत भारतीय समाज की बात करें तो सभी जानते हैं कि पितृसत्तात्मक अर्धसामंती और अविकसित पूंजीवादी मूल्यों से संचालित भारतीय समाज में स्त्री-पुरूष को सामान अधिकार नहीं मिले हुए हैं.घर,समाज और कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ अन्याय होता है.उनका शोषण एक स्थापित तथ्य और सत्य है.भारतीय संविधान के तहत समानता के अधिकार के आश्वासन के बावजूद महिलाओं को अवसर,पारिश्रमिक और अधिकारों के लिए जूझना पड़ता है.व्यवहारिक तौर पर उन्हें दोयम दर्जे का समझा जाता है.हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की बात करें तो चमक और ग्लैमर के बावजूद कमरे के आगे-पीछे काम करने वाली महिलाओं की अच्छी स्थिति नहीं है.पहले तो उन्हें मौके ही नहीं मिलते थे.एक अभिनय के अलावा किसी और विभाग के लिए उन्हें काबिल नहीं समझा जाता था.फिल्मों की शुरूआत के दिनों में महिलाएं अभिनय के लिए भी नहीं मिल पाती थीं.दादा साहेब फाल्के ने तो मजबूरी में महिला चरित्रों के लिए भी पुरूष अभिनेताओं को ही चुना.बाद में कोठेवालियों.रेड लाइट एरिया के सेक्स वर्करों और एंग्लो-इंडियन परिवारों की महिलाओं को आकृष्ट किया गया.धीरे-धीरे पहले मुस्लिम और फिर हिन्दू परिवारों की लड़कियों ने फिल्मों में कदम रखा.फिल्मों में उनके चुनाव(कास्टिंग की प्रक्रिया) को लेकर किस्से बताये जाते रहे हैं.आज भी कास्टिंग काउच अहम् मसला है.माना जाता है और कुछ हद तक इसमें सच्चाई भी है कि अधिकांश लड़कियों को रोल पाने के लिए समझौते करने पड़ते हैं.पुरुषों का एक तबका तर्क देता है कि लड़कियों को जबरन बिस्तर या काउच तक नहीं ले जाया जाता.वे खुद तैयार होती हैं.सवाल है कि वे आखिर क्यों तैयार होती हैं...उनकी सहमती और स्वीकृति के दबाव और मजबूरी को समझना होगा.नासमझी में सरोज खान जैसी अनुभवी कोरियोग्राफर तर्क गढ़ लेती हैं कि इन सबके बावजूद फिल्म इंडस्ट्री के लोग काम तो देते हैं.यह अजीब से संतुष्टि है.समझौतों से करियर में शीर्ष तक पहुंची महिलाएं इस संतुष्टि भाव से ही ग्लानी से बहार आ जाती हैं और अपनी समृधि और लोकप्रियता के मज़े लेने लगती हैं.फिल्मों में अभिनेत्रियोंकी स्थिति की वास्तविकता इस तथ्य से भी समझी जा सकती है कि स्थापित फ़िल्मी हस्तियाँ अपनी बेटियों को फिल्मों में आने से रोकती और हतोसाहित करती हैं.फ़िल्मी परिवारों से आई ज्यादातर अभिनेत्रियों की माताओं ने उन्हें सपोर्ट किया है.इस सन्दर्भ में अनेक अभिनेत्रियों के नाम गिनाये जा सकते हैं.

ताज़ा मी टू अभियान में अभी तक कोई भी बड़ा नाम सामने नहीं आया है.लोकप्रिय अभिनेता और निर्देशक भी दूध के धुले नहीं हैं.बड़े नामों में एक सुभाष घई का ज़िक्र आया है.वे सिरे से खुद पर लगे आरोप ख़ारिज कर रहे हैं.कंगना रनोट ने विकास बहल के बारे में सुविधा देख कर पुरानी बातें बता दिन,उनके साथ शोषण के दूसरे किस्से भी हैं.उनमें कुछ बड़े नाम भी हो सकते हैं.फ़िलहाल कंगना ने उनका उल्लेख नहीं किया है.निजी बातचीत में अनेक आउटसाइडर अभिनेत्रियां ऑफ द रिकॉर्ड अनेक निर्देशकों और कास्टिंग डायरेक्टरों के इशारों और सजेशन के बारे में बताती हैं.वे डरती नहीं हैं,लेकिन अलग-थलग कर दिए जाने और काम न दिए जाने के खौफ से घबरा जाती हैं.ऐसी अनेक अभिनेत्रियों ने बड़े अवसर छोड़े.वे खुद दूसरी अभिनेत्रियों की सफलता की सीढ़ियों के तौर पर काम आए अभिनेताओं और निर्देशकों के नाम तक बेहिचक बता देती हैं.यह भी बताती हैं कि किस अभिनेता ने किस नवोदिता को क्यों काम दिलवाया? ‘क्यों का एक ही अर्थ होता है...सहवास.अभी यह कहा जा रहा कि स्थिति में कुछ सुधार होगा.लड़कियां इज्ज़त के साथ अभिनेत्रियाँ बन सकेंगी.यह सिर्फ एक उम्मीद भर है.कहा तो यह भी जा रहा है कि अब लड़कियों के लिए काम और अवसर पाना ‘टफ हो जायेगा.

अच्छी बात यह हुई है कि पुरुष डरे हुए हैं.उन्हें डर है कि न जाने कब उनकी करतूतों का पर्दाफाश हो जाये.उन्हें डर है कि कब उनकी किसी हरकत पर शोर मच जाये.उन्हें डर है कि पॉवर और पौरुष का प्रभाव ख़त्म हो जायेगा.और लड़कियां जागरूक हुई हैं.परस्पर ज़रूरतें बनी रहेगीं,लेकिन कोई जबरन फायदा उठाने या मजबूर करने की कोशिश करेगा तो आवाज़ उठेगी.खलबली सी मची और हर खलबली यथास्थिति बदल देती है.
यहाँ प्रकाशित हुआ था 

Tuesday, October 23, 2018

फिल्म लॉन्ड्री : भारत में भी लाहौरी ही रहे प्राण नेविले


फिल्म लॉन्ड्री
भारत में भी लाहौरी ही रहे प्राण नेविले
-अजय ब्रह्मात्मज
प्राण नेविले से मेरा परिचय सबसे पहले ट्विटर के जरिए हुआ.पार्टीशन म्यूजियम के एक अपडेट में मुझे प्राण नेविले का छोटा विडियो दिखा.उस विडियो में वे लाहौर में 1941 में बनी फिल्म ‘खजांची का ज़िक्र कर रहे थे.इस फिल्म ने पूरे देश में हंगामा मचा दिया था.यह अविभाजित भारत की बात है.तब लाहौर भारत का हिस्सा था.उसे ‘पूर्व का पेरिस’ कहा जाता था. अविभाजित भारत में कलकत्ता और बॉम्बे के अलावा लाहौर में भी फिल्म निर्माण की गतिविधियाँ आरम्भ हो चुकी थीं.कलकत्ता और बॉम्बे की तुलना में निर्माण की संख्या और क्वालिटी के हिसाब से लाहौर की फ़िल्में कम और कमतर थीं.हालांकि लाहौर से निकले अभिनेता,अभिनेत्री,गायक और निर्देशक देश भर में अपनी प्रतिभा और कामयाबी से खास जगह बना रहे थे,लेकिन लाहौर में निर्मित फ़िल्में कमाई और कामयाबी में पिछड़ जाती थीं. निर्माता दलसुख पंचोली और निर्देशक मोती बी गिडवानी की फिल्म ‘खजांची की नायिका रमोला थीं.इस फिल्म के एक गीत में रमोला ‘सावन के नज़ारे हैं गाती सहेलियों के साथ साइकिल पर सवार हैं.उनका दुपट्टा लहरा रहा है.प्राण नेविले बता रहे थे कि इस गीत की वजह से ‘खजांची को आधुनिक फिल्म कहा गया था,जिसमें आजाद ख्याल नायिका फिल्म के नायक की तरह साइकिल चला रही थी और बेफिक्र अंदाज में गाना गा रही थी.आज़ादी और विभाजन के पहले की इस फिल्म ने हिंदी सिनेमा पर दूरगामी प्रभाव डाला.
‘खजांची की रिलीज के समय प्राण नेविले की उम्र 19 साल थी.उन्हें उस फिल्म के बारे में सब कुछ याद रहा.उनकी याददाश्त का यह आलम था कि 1937 में के एल सहगल की लाहौर यात्रा के बारे में उन्होंने विस्तार से अपनी पुस्तक ‘के एल सैगल- द डेफिनीटिव बायोग्राफी में लिखा है.तब वे सिर्फ 15 साल के थे.अपने दोस्त के साथ वे के एल सैगल को सुनने गए थे.उन्होंने उमड़ी भीड़ के बीच दो रुपये के टिकट ब्लैक में तीन रुपये में खरीदे थे.उनकी याददाश्त जबरदस्त थी.इसी साल अप्रैल में उनके गुरुग्राम निवास में हुई बातचीत मुझे अच्छी तरह याद है.लाहौर और लाहौर की फिल्म इंडस्ट्री से संबंधित मेरे हर सवाल का उन्होंने दो टूक जवाब दिया था.उन्हें इस बात की ख़ुशी थी कि मैं लाहौर की फिल्म इंडस्ट्री के योगदान को रेखांकित कर रहा हूँ.स्रोत और सामग्री की दिक्कतों का प्रसंग आने पर जब मैंने बताया कि अभी के हालत में लाहौर जाना मुम्किन नहीं है.मैं तो सूचना और प्रसारण मंत्रालय से किसी प्रकार के सहयोग की उम्मीद नहीं कर सकता,क्योंकि अपने लेखों और टिप्पणियों में मैं सत्तारूढ़ पार्टी का विरोधी घोषित हो चूका हूँ.उन्होंने मेरी बात धयान से सुनी और फिर धीमे स्वर में अनोखी सलाह दी. उन्होंने सुझाया कि भाजपा की सरकार के मंत्री के पास तुम पत्र भेजो.उस पत्र में लिखों कि विभाजन के पहले लाहौर में सक्रिय अधिकांश निर्माता और स्टूडियो के मालिक हिन्दू थे. मुझे उनके बारे में पता करना है.देखना सरकार तुम्हारी हर मदद करेगी.मैं अभी तक वह पत्र नहीं लिख सका,लेकिन उनके इस सुझाव से मुझे एहसास हुआ कि वे बिल्कुल व्यवहारिक व्यक्ति और विचारक थे.सार्वजानिक हित में सत्ता का इस्तेमाल उन्हें आता था.हो सकता लम्बे समय तक भारतीय विदेश सेवा में रहने के कारन वे सत्ता के गलियारों और कार्यप्रणाली से वाकिफ हों.
उनके बारे में जानने और उनकी किताबें पढने के बाद मिलने की इच्छा होने पर भी उनसे संपर्क करने का मन नहीं कर रहा था.मुझे हमेशा लगता है कि सक्रिय बुजुर्गों को नाहक तंग नहीं करना चाहिए.मिलने-मिलाने की औपचारिकता में उनका वक़्त खर्च होता है.बहरहाल,ट्विटर की पाकिस्तानी दोस्त अमारा अहमद ने उनसे मुलाक़ात का कहीं ज़िक्र किया था.मैंने अमारा से ही इस बाबत पूछा.अमारा ने सलाह दी कि मुझे उनसे संपर्क कर मिलने का वक़्त माँगना चाहिए.और सचमुच तब मुझे विस्मित ख़ुशी हुई,जब उन्होंने मेरा आग्रह मान लिया और मिलने के लिए तैयार हो गए.निश्चित तारीख को वक़्त से कुछ पहले ही मैं उनके गुरुग्राम निवास पर हाज़िर था.मुझे उनकी स्टडी में बिठा दिया गया.स्टडी में जाते समय मैंने उनकी झलक पा ली थी और यही सोच कर खड़ा रहा कि वे पीछे से आते ही होंगे.5 से 10 मिनट हो गए,लेकिन वे नहीं आये.थोड़ी देर तक उनकी किताबों को निहारने के बाद मैं बैठ गया.ठीक 11 बजे वे आये....11 का वक़्त ही मुकम्मल हुआ था.आने के साथ उन्होंने कहा कि मैं वक़्त पर आ गया.तुम पहले आ गए थे,इसलिए इंतजार करना पड़ा.मेरी हंसी छूट गयी और वे भी हंसने लगे.फिर तो घंटे भर से ज्यादा देर तक मैं कुछ न कुछ पूछता रहा और वे पूरी संजीदगी से मेरी हर जिज्ञासा का जवाब देते रहे.अप्रैल 2018 में उनकी उम्र 96 साल थी.
जी हाँ, उम्र उन्हें छू नहीं पाई थी.वे लगातार सक्रिय और सचेत रहे.भारतीय बुजुर्ग इस उम्र में घर,परिवार और समाज से नाराज़ रहते हैं.उन्हें लगता है कि आज की पीढ़ी नाकारा और नासमझ है.अपनी बातचीत में मैंने महसूस किया कि उन्हें ऐसी कोई शिकायत नहीं है.वे आज की पीढ़ी को संबोधित करना चाहते हैं.उनके संपर्क में रहते हैं.उनके पास ठोस योजनायें थीं.वे उन पर काम कर रहे थे.जब मैंने निवेदन किया कि आप की किताबें हिंदी में आयें और आप हिंदी में भी लेख लिकहें.उन्होंने झट से सूफी संगीत पर लिखा एक लेख थमा दिया और कहा कि इसे छपवा लो.वे अपनी किताबें हिंदी में लाना चाहते थे.इन किताबों का हिंदी अनुवाद आना ही चाहिए.प्राण नेविले लाहौर शहर पर केन्द्रित ‘लाहौर-ए सेंटीमेंटल जर्नी’ नामक किताब लिखी है.इस किताब में उन्होंने अपने दौर के लाहौर का सजीव चित्र शब्दांकित किया है.छोटी-छोटी रवायतों पर विस्तार से लिखा है.वे सही लिखते हैं,’शहर केवल अपने बाज़ार और इमारतों में नहीं होता.यह माहौल,परिवेश,ख़ुशी और ग़म के आलम,पागलपन और उदासी,मौज-मस्ती और सबसे बढ़ कर अपने बाशिंदों में होता है. वे ही उसकी आत्मा होते है.’प्राण नेविले की यह पुस्तक किसी भी शहर की धड़कन को समझने का कारगर टूल देती है.प्राण साहेब ने लाहौर के राजनीतिक और आर्थिक हलचल पर अधिक ध्यान नहीं दिया है.वे लाहौर के उस सांस्कृतिक पहलू को सामने ले आते हैं,जो भारत और पाकिस्तान से अलग लाहौर को उजागर करता है.लाहौरी इस तथ्य में फख्र महसूस करते हैं कि एक भारत है और एक पाकिस्तान है....और एक लाहौर है.विभाजन के पहले के लाहौर के बारे में पढने-जानने पर शिद्दत से यह बात महसूस होती है.
प्राण नेविले का प्राण लाहौर में ही था.वे भारत ज़रूर आ गए थे,लेकिन किसी ब्याहता की तरह वे अपने मायके लाहौर को कभी नहीं भूल पाए.मौका मिलते ही वे लाहौर जाते थे.लाहौर के बारे में खूब लिखते थे. कोठेवालियों पर उनकी किताब शोधपूर्ण मानी जाती है. ब्रिटिश राज के विशेषज्ञ के रूप में उनकी खास पहचान थी.इसके साथ ही भारतीय चित्रकला और कंपनी स्कूल के अवसान पर उनकी महत्वपूर्ण किताब है.उन्होंने सुगम संगीत और फ़िल्मी संगीत पर भी भरपूर लिखा है. वे ठुमरी गायिका नैना देवी के मुरीद और दोस्त थे.उनके जरिए वे बेगम अख्तर से मिले.उन्होंने इन दोनों गायिकाओं पर भी लिखा है.उन्होंने बेगम अख्तर की गायी कुछ ठुमरी और ग़ज़ल एक वक़्त के बाद उनके प्रशंसकों के बीच बिखेरी.दिल्ली में हर साल संगीत सभा का आयोजन उनका खास शगल था.के एल सैगल पर किताब लिखने के साथ ही उनकी गायकी और खूबियों की याद बनाये रखने के लिए उनकी जन्म शताब्दी पर भारत सरकार के सहयोग से भव्य आयोजन करने में वे सफल रहे थे.
चौथे और पांचवे दशक के लाहौर में सांस्कृतिक सामूहिकता थी.अविभाजित भारत का यह शहर उत्तर भारत के पश्चिम का सांस्कृतिक,शैक्षणिक और राजनीतिक केंद्र था.इसके समानान्तर पूर्व में स्थित इलाहाबाद ही प्रभाव में इसके समक्ष ठहरता है.यह तुलनात्मक अध्ययन का विषय हो सकता है कि कैसे और क्यों उत्तर भारत के दोनों शहर आज़ादी के बाद अपनी चमक और धमक बरक़रार नहीं रख सके.और अब तो इलाहाबाद का नाम बदल कर प्रयागराज रखने के साथ योगी आदित्यनाथ ने बची-खुची गरिमा भी समाप्त कर दी.

सिनेमालोक दीपिका-रणवीर की शादी


सिनेमालोक
दीपिका-रणवीर की शादी
-अजय ब्रह्मात्मज
दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह की शादी की ट्विटर पर की गयी संयुक्त घोषणा ने मीडिया की संडे की शांति में खलबली मचा दी. धडाधड अपडेट होने लगे और उनकी पंक्तियों को दोहराया और उद्धृत किया जाने लगा.हाल-फिलहाल में शादी की घोषणा कर रही किसी फिल्म स्टार जोड़ी ने पहली बार हिंदी में भी अपना सन्देश जारी किया.इस बात के लिए हिंदी फिल्मों के दोनों स्टार बधाई के पात्र हैं.ठीक है कि वर्तनी और व्याकरण की कुछ गलतियाँ हैं.जैसे कि दीपिका का नाम ही दीपीका लिखा गया है.फिर भी जिस इंडस्ट्री में अंग्रेजी का बोलबाला है,वहां पॉपुलर स्टार की ऐसी पहल के दूरगामी प्रभाव होते हैं.
बताते हैं कि 2012 में संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘गोलियों की रासलीला राम-लीला की शूटिंग के दरम्यान दोनों करीब आये.संजय लीला भंसाली की अगली दो फिल्मों में वे फिर से साथ रहे.शूटिंग के दिनों के लम्बे साथ में दोनों एक-दूसरे को अच्छी तरह समझ सके.पहली फिल्म की रिलीज के बाद से ही दोनों की नजदीकियां नज़र आने लगी थीं,लेकिन शुरू में इसे रणवीर सिंह का हाइपर अंदाज माना गया.रणवीर मौके-बेमौके अपने प्रेम का सार्वजानिक इजहार करते रहे.दीपिका की स्मित मुस्कान से स्पष्ट था कि वह भी राज़ी हैं.दीपिका का व्यवहार हमेशा संयत रहा,जबकि रणवीर सिंह बेहिचक प्रेम प्रदर्शन करते रहे.
पलट कर देखें तो दीपिका पादुकोण पुराने प्रेम संबंध से निकलने के बाद डिप्रेशन की शिकार हो गयी थीं.उस दौर में उन्हें अपने परिवार से पूरा प्यार और समर्थन मिला.मुंबई में रणवीर सिंह की समझदार संवेदना और हमदर्दी से दीपिका को संबल मिला.याद करें तो दीपिका संबंध टूटने से बिखर गयी थीं.उन्हें रणवीर सिंह ने मजबूत सहारा दिया.वह उनके साथ रहे.अपने खिलंदडपने से उन्हें हंसाते रहे.रणवीर सिंह की हरकतें ऊलजलूल लग सकती हैं,लेकिन आप ठहर कर देखें तो उनके पीछे एक सिस्टम है.एनर्जी से लबालब रणवीर अपने रिएक्शन रोक नहीं पाते हैं.वे दूसरे फिल्म स्टार की तरह गले मिलने की सिर्फ औपचारिकता नहीं निभाते.मैंने पाया है कि वे प्यार से भींचते हैं.निहाल कर देते हैं.उन्होंने डिप्रेशन में डूबी दीपिका की उंगली थामी और समय पर ज़रूरी सहारा दिया.शुरू में कुछ लोगों को यही लगता रहा कि रणवीर जबरदस्ती दीपिका से चिपकने की कोशिश करते हैं.अब उन आलोचकों की समझ में आ गया होगा कि दोनों एक-दूसरे से कितना प्रेम करते हैं.
रणवीर सिंह का फ़िल्मी करियर दीपिका के आगमन के चार साल बाद शुरू हुआ. यशराज फिल्म्स की ‘बैंड बाजा बारात से सफल लेकिन छोटी शुरुआत के बावजूद रणवीर सिंह कामयाबी की छलांगे मारते हुए अपनी पीढ़ी के पॉपुलर स्टारों की कतार में आ गए. दीपिका के साथ आई तीनों फिल्मों ने बतौर स्टार और एक्टर उनकी पोजीशन मजबूत कर दी.आखिरी फिल्म ‘पद्मावत के बाद रणवीर सिंह ने जोया अख्तर की ‘गली बॉय पूरी कर ली है और अभी रोहित शेट्टी की ‘सिम्बा’ पूरी कर रहे हैं.दीपिका ने अलबत्ता ‘पद्मावत के बाद केवल एक फिल्म की घोषणा की है.तेजाब हमले की शिकार लक्ष्मी अग्रवाल के जीवन पर बन रही बायोपिक में वह मेघना गुलज़ार के निर्देशन में काम करेंगी.वह इस फिल्म की एक निर्माता भी हैं.
कयास लगाये जा रहे हैं कि दीपिका-रणवीर की शादी के बाद उनका फ़िल्मी करियर क्या करवट लेगा? अब इस तरह का सवाल बेमानी है कि क्या शादी के बाद दीपिका फिल्मों में काम करेंगी? समय बदल चुका है.अभी की अभिनेत्रियाँ न तो प्रेम छिपाती हैं और ना शादी के बाद अपने करियर को विराम देती हैं.दर्शकों की मानसिकता और स्वीकृति भी बदली है.अब वे शादीशुदा अभिनेत्रियों को बराबर पसंद करते हैं.यह हो सकता है कि भविष्य में फिल्मों के चुनाव के मामले में दीपिका की पसंद और प्राथमिकतायें बदल जाएं.समृद्धि और सम्मान हासिल कर चुकी दीपिका से यह उम्मीद भी रहेगी कि वह फिल्मों सार्थक भूमिकाएं निभाएं.अपने स्टारडम का लाभ लेकर ऐसी फ़िल्में करें जो अबी तक किसी और दबाव की वजह से वह नहीं कर पायी हों.
दोनों के सुखी दांपत्य जीवन और फ़िल्मी करियर के लिए शुभकामनाएं!


Wednesday, October 17, 2018

संडे नवजीवन : राष्ट्रवाद का नवाचार


संडे नवजीवन
राष्ट्रवाद का नवाचार
-अजय ब्रह्मात्मज
सर्जिकल स्ट्राइक की दूसरी वर्षगांठ पर हिंदी फिल्म ‘उरी – द सर्जिकल स्ट्राइक’ का टीजर आया. इस फिल्म में विकी कौशल प्रमुख नायक की भूमिका में है. 1 मिनट 17 सेकंड के टीजर में किसी संय अधिकारी की अनुभवी.आधिकारिक और भारी आवाज़ में वाइस् ओवर है. बताया जाता है कि ‘हिंदुस्तान के आज तक के इतिहास में हम ने किसी भी मुल्क पर पहला वार नहीं किया. 1947,61,75,99... यही मौका है उनके दिल में डरर बिठाने का. एक हिन्दुस्तानी चुप नहीं बैठेगा. यह नया हिंदुस्तान है. यह हिंदुस्तान घर में घुसेगा और मारेगा भी.’ वरिष्ठ अधिकारी की इस अधिकारिक स्वीकारोक्ति और घोषणा के बीच जवान ‘अहिंसा परमो धर्मः’ उद्घोष दोहराते सुनाई पड़ते हैं. सभी जानते हैं कि पाकिस्तान ने 18 सितम्बर 2016 को कश्मीर के उरी बेस कैंप में घुसपैठ की थी और 19 जवानों की हत्या कर दी थी. भारत ने डर बिठाने की भावना से सर्जिकल स्ट्राइक किया था. इस सर्जिकल स्ट्राइक को देश की वर्तमान सरकार ने राष्ट्रीय गर्व और शोर्य की तरह पेश कर अपनी झेंप मिटाई थी. गौर करें तो इस संवाद में पाकिस्तान का नाम नहीं लिया गया है,लेकिन युद्ध के सालों से पाकिस्तान का ही संकेत मिलता है.इसमें 196 की ज़िक्र नहीं आता. जिस नया हिंदुस्तान’ की बात की जा रही है,वह सीधे तौर पर वर्तमान प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘न्यू इंडिया’ का अनुवाद है.
याद करे कभी हिंदी फिल्मों के नायक ‘ ये पूरब है पूरबवाले,हर जान की कीमत जानते हैं’ और ‘है प्रीत जहां की रीत सदा,मैं गीत वहां के गता हूँ. भारत का रहनेवाला हूँ,भारत की बात सुनाता हूँ’ जैसे गीतों से भारत की विशेषताओं का बक्कन किया करते थे. राष्ट्र और राष्ट्रवाद फिल्मों के लिए नयी चिंता या टूल नहीं है. आज़ादी के पहले की मूक और बोलती फिल्मों में कभी प्रछन्न और अप्रत्यक्ष रूप से तो कभी सीधे शब्दों में भारतीय अस्मिता की पहचान और राष्ट्र गौरव का उल्लेख होता था. आज़ादी के पहले स्वतंत्रता की लडाई के दौर में मुक्ति  की चेतना और गुलामी के विरुद्ध जागरूकता फैलाने में फ़िल्मों की छोटी-बड़ी भूमिका रही है. विश्वविद्यालयों में राष्ट्रवाद में फिल्मों की भूमिका और योगदान पर पारंपरिक पर्चे तो लिखे गए हैं,लेकिन फिल्मों का व्यवहारिक और उपयोगी अध्ययन और विश्लेषण नहीं किया गया है. मुग़ल बादशाहों और राजपूत राजाओं की हाथों का मकसद कहीं न कहीं दर्शकों को यह बताना और जाताना रहा है कि गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा हिंदुस्तान कभी शांति,समृदधि और संस्कृति का केंद्र था. सत्य,धर्म,अहिंसा और लोकतंत्र की राह पर चल रहे भारत ने कभी पडोसी देशों पर आक्रामण नहीं किया. भारत की भूमि में कदम रखे व्यक्तियों को मेहमान माना और उन्हें बार-बार सत्ता तक सौंप दी. कुछ तो यहीं बस हाय और भारतीय समाज में घुलमिल गए,जिनमें से कुछ को अलगाने और छांटने की कोशिश की जा रही है. और कुछ शासक बन कर लूटते रहे. हिंदी फिल्मों में में इनका यशोगान मिलता है तो साथ ही शासकों के खिलाफ छटपटाहट भी जाहिर होती है.
हिंदी फिल्मों में राष्ट्रवाद कभी मुखर तरीके से व्यक्त नहीं हुआ.आज़ादी के पहले अंग्रेजों के सेंसर का डर रहता था. आज़ादी के बाद राष्ट्र गौरव के बदले राष्ट्र निर्माण पर जोर दिया जाने लगा नेहरु के सपनों के सेक्युलर भारत के चरित्र गधे गए. इन फिल्मों में विविधता में एकता और राष्ट्रीय एकता के संवैधानिक सिद्धांतों को चरित्रों और संवादों में पिरोया जाता था. तब फिल्मों में वर्णित राष्ट्रवाद ‘भारत’ के लिए लक्षित होता था. वह किसी राजनीतिक पार्टी के एजेंडा या किसी नेता के भाषण से निर्दिष्ट या संचालित नहीं होता था.यह शोध और अध्ययन का विषय हो सकता है कि कैसे नेहरु और शास्त्री के आह्वान देश के प्रधानमंत्री के आग्रह के रूप में फ़िल्मकारों ,कलाकारों और नागरिकों तक संप्रेषित होते थे,जबकि आज प्रधानमंत्री का आह्वान किसी राजनीतिक पार्टी के नेता मोदी के आदेश के रूप में सुनाई पड़ता है. यही कारण है कि आज की फिल्मों में राष्ट्रगान,भारतीय तिरंगा या भारत की गौरव गाथा सुन कर राष्ट्रीय भावना का संचार नहीं होता. ‘वन्दे मातरम’ का उद्घोष ‘बोलो वन्दे मातरम’ का आदेश बन जाता है. डर लगता है कि जयघोष नहीं किया या बीच फिल्म में ‘जन गण मन’ सुन कर खड़े नहीं हुए तो कोई अदृश्य हाथ कालर पकड़ कर खींचेगा और ‘मॉब लिंचिंग’ के लिए ‘न्यू इंडिया’ के भक्तों के बीच ड्राप कर देगा. राष्ट्रवाद धीरे से अंधराष्ट्रवाद और फिर फर्जी राष्ट्रवाद में बदल गया है.
यह अनायास नहीं हुआ है. हम इसी सदी की बात करें तो ‘लगान’ या ‘चक दे इंडिया’ देखते हुए कतई भान नहीं होता कि देशभक्ति की घुट्टी पिलाई जा रही है. भुवन और कबीर खान का संघर्ष और प्रयत्न भारत के लिए है. वे अपे परिवेश और माहौल में गुलामी और क्षेत्रीयता से निकलना चाहते हैं. उनकी एकजुटता उस विजय के लिए है,जो सामूहिक है.’चक दे इंडिया’ और ‘गोल्ड’ को आगे-पीछे देखें तो स्पष्ट हो जायेगा कि फ़िल्मकार किस तरह के दबाव में सृजनात्मक एकांगिता के शिकार हो रहे हैं. ‘चक दे इंडिया’ का कबीर खान भी ‘इंडिया’ के लिए टीम बना रहा है और ‘गोल्ड’ के तपन दास की ‘इंडिया’ की जीत की आकांक्षा में फर्क है. एक खेल में जीत चाहता है तो दूसरा देश के रूप में जीत चाहता है.’हमरी टीम लंदन में ब्रिटेन को हरा कर 200 सालों की गुलामी का बदला लेगी’ या ‘हम अपना झंडा फहराएंगे और राष्ट्र गान गायेंगे’ जैसे संवाद बोलता तपन दास फर्जी देशभक्त जान पड़ता है. यह थोपा गया राष्ट्रवाद है,जो इन दिनों फैशन में है. इसे संयोग कहें या सुनियोजित चुनाव कि अक्षय कुमार  ‘न्यू इंडिया’ के भारत कुमार के रूप में उभरे हैं. उनकी फिल्मों ‘एयरलिफ्ट’,‘टॉयलेट एक प्रेमकथा’ और ‘पैडमैन’ में भी राष्ट्रवाद छलकाया गया है है. नीरज पाण्डेय ने ‘बेबी’ में उन्हें देशभक्ति दिखाने का पहला मौका दिया. उसके बाद उनकी फिल्मों में लगातार देशभक्ति और राष्ट्रवाद के सचेत संदेशात्मक संवाद होते हैं. मनोज कुमार और अक्षय कुमार की प्रस्तुति और धरना में बड़ा फर्क है. हम सभी जानते हैं कि प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के कहने पर मनोज कुमार ने ‘जय जान जय किसान’ के नारे को लेकर ‘उपकार’ लिखी और निर्देशित की. अभी प्रधानमंत्री ने नहीं कहा है,लेकिन सभी उन्हें सुननाने में लगे हैं. कभी जॉन अब्राहम तो कभी कोई और देशभक्ति के ‘समूह गान’ में शामिल होता दिखता है.
अभी का फर्जी राष्ट्रवाद हिन्दू राष्ट्रवाद से प्रेरित है,जो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर रचा जा रहा है.इसकी शुरुवात तो ‘आज़ादी’ के नारे से होती है,लेकिन आखिर में ‘हर हर महादेव’ सुनात्यी पड़ता है. कंगना रनोट की ‘मणिकर्णिका’ का टीजर आप सभी ने देख ही लिया होगा. समस्या हिन्दू प्रतीकों और जयकारों से नहीं है. समस्या उनके जबरन उपयोग या दुरुपयोग को लेकर है. फिल्म शुरू होने के पहले सिनेमाघरों में राष्ट्र गान कई साल पहले से अनिवार्य हो चुका है,उसके सम्मान में खड़े होने या न हो पाने का विवाद पिछले चार सालों में समाचारों में आने लगा है.’भाग मिल्खा भाग’ में मिल्खा सिंह का संघर्ष भारत के एक खिलाडी का संघर्ष ‘सूरमा’ तक आते-आते भिन्न अर्थ ले लेता है.न्यू इंडिया के ‘राष्ट्रवाद’ का दवाब इतना ज्यादा है की सामान्य प्रेम कहानियों एन भी किसी न किसी बहने इसे लेप और थोपा जा रहा है..

Tuesday, October 16, 2018

सिनेमालोक : लाहौर के दूसरे प्राण भी नहीं रहे

सिनेमालोक
लाहौर के दूसरे प्राण भी नहीं रहे
-अजय ब्रह्मात्मज
देश के विभाजन के बाद लाहौर के दो प्राण वहां से निकले – प्राण सिकंद और प्राण नेविले. प्राण सिकंद मुंबई आये.उन्होंने लाहौर में ही एक्टिंग आरम्भ कर दी थी. मुंबई आने के बाद वे प्राण के नाम से मशहूर हुए.पहले खलनायक और फिर चरित्र भिनेता के तौर पर अपनी अदाकारी से उन्होंने दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया. दूसरे प्राण दिल्ली में रुके. उन्होंने भारतीय विदेश सेवा की नौकरी की.कला,संगीत और फिल्मों में उनकी खास रूचि रही.उन्होंने लाहौर की यादों को सह्ब्दों में लिखा और भारतीय संगीत में ठुमरी और फ़िल्मी संगीत पर अनेक निबन्ध और पुस्तकें लिखीं. उन्हें के एल सहगल खास पसंद रहे.उन्होंने के एल सहगल मेमोरियल सर्किल की स्थापना की और सहगल की यादों और संगीत को जोंदा रखा. उन्होंने भारत सरकार की मदद से सहगल की जन्म शताब्दी पर खास आयोजन किया और उनके ऊपर एक पुस्तक भी लिखी.
पिछले गुरुवार को दिल्ली में उनका निधन हुआ.उनके निधन की ख़बरें अख़बारों की सुर्खिउयाँ नहीं बन पायीं.हम नेताओं,अभिनेताओं और खिलाडियों की ज़िन्दगी के इर्द-गिर्द ही मंडराते रहते हैं.हमें अपने समाज के साहित्यकारों,कलाकारों और इतिहासकारों की सुधि नहीं रहती.हम उनके बारे में बेखबर रहते हैं.प्राण नेविले भारत सर्कार की विदेश सेवा से मुक्त होने के पहले से कला और संगीत के अध्ययन और दस्तावेजीकरण में व्यस्त रहे.उन्होंने ब्रिटिश राज के दिनों पर गहरा रिसर्च किया था.उनकी पुस्तकों और लेखों में उस ज़माने की कहानियों और घटनाओं का विस्तृत चित्रण हुआ है.कोठेवालियों पर उनकी पुस्तक महत्वपूर्ण मानी जाती है.नैना देवी और बेगम अख्तर के मुरीद प्राण नेविले ने दोनों प्रतिभाओं पर मन से लिखा है.
प्राण नेविले से मेरा परिचय लाहौर की वजह से हुआ.नौकरी से मुक्ति और निवृति के बाद मैं लाहौर की फिल्म इंडस्ट्री पर शोध कर रहा हूँ.मुझे स्पष्ट रूप से लगता है कि विभाजन के पहले फिल्म निर्माण में सक्रिय लाहौर के योगदान का संचयन और उल्लेख नहीं हुआ है.भारतीय इतिहासकारों ने नए देश पाकिस्तान में होने की वजह से लाहौर का उल्लेख ज़रूरी नहीं समझा और पाकिस्तान ने विभाजन के पहले के लाहौर की गतिविधियों को पाकिस्तानी सिनेमा से बहार रखा.जाहिर तौर पर पाकिस्तान का सिनेमा 1947 के बाद आरम्भ होता है.भारतीय और हिंदी सिनेमा के इतिहास की इस लुप्त कड़ी पर ध्यान देने की ज़रुरत है.शोध के सिलसिले में ही मुझे प्राण नेविले की पुस्तक लाहोर – ए सेंटीमेंटल जर्नी की जानकारी मिली.इस पुस्तक के कई चैप्टर में उन्होंने आज़ादी के पहले के लाहौरी सिनेमा के बारे में लिखा है. इसके साथ लाहौर के रोज़मर्रा ज़िन्दगी को भी उन्होंने अपने संस्मरणों में याद किया है.
पिछले दिनों लाहौर फिल्म इंडस्ट्री के अध्ययन और शोध के सिलसिले में दिल्ली में उनसे मुलाक़ात का अवसर मिला.मेरी सोच रही है कि वयोवृद्ध चिंतकों को तंग नहीं किया जाना चाहिए.इसी संकोच में उनका संपर्क मिल जाने पर भी मैंने उनसे बात नहीं की.फिर लगा कि पता नहीं आज़ादी और विभाजन के पहले के लाहौर की धडकनों को महसूस किये किसी और शख्स से मेरी कब मुलाक़ात होगी?मैंने उनसे मिलने की इच्छा प्रकट की तो वे सहज ही तैयार हो गए.उन्होंने २८ अप्रैल २०१८ को 11 बजे का समय दिया. मैं आदतन समय से पहले पहुँच गया,लेकिन वे ठीक 11 बजे ही मिले.खूब साडी बातें हुईं.उनकी बातचीत से लाहौर और वहां की फिल्म इंडस्ट्री को समझने की अंतर्दृष्टि मिली.उन्होंने अपनी किताबें मुझे भेंट में दीं.वे चाहते थे कि उनकी पुस्तकें हिंदी में प्रकाशित होकर हिंदी पाठकों के बीच पहुंचे.एक प्रकाशन के संपादक आश्वासन देकर निष्क्रिय हो गए.प्राण साहेब हिंदी पत्र-पत्रिकाओं के लिए लिखना चाहते थे.एक दैनिक अख़बार के फीचर प्रभारी ने सूफी संगीत पर लिखे उनके शोधपूर्ण लेक को छपने का आश्वासन दिया था.वह लेख उनके जीते जी नहीं छप पाया.
तय था कि हम फिर मिलेंगे.उन्होंने मेरे काम में रूचि दिखाई थी और हर प्रकार की मदद का वादा किया था.वे चाहते थे कि मैं जल्दी से अपना काम पूरा करूं और उन्हें दिखाऊँ.मेरा शोध अब उन जैसे लाहौरियों के लिए समर्पित होगा.