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Saturday, April 23, 2016

रिश्‍ते संजो कर रखते हैं मनोज बाजपेयी



-अविनाश दास 
हिंदी सिने जगत उन चंद फिल्‍मकारों व कलाकारों का शुक्रगुजार रहेगा, जिन्‍होंने हिंदी सिनेमा का मान दुनिया भर में बढ़ाया है। मनोज बाजपेयी उन्हीं चंद लोगों में से एक है। 23 अप्रैल को उनका जन्‍मदिन है। पेशे से पत्रकार और मशहूर ब्‍लॉग ‘मोहल्ला लाइव’ के कर्ता-धर्ता रह चुके अविनाश दास उन्हें करीब से जानते हैं। अविनाश अब सिने जगत में सक्रिय हैं। उनकी फिल्‍म ‘अनारकली आरावाली’ इन गर्मियों में आ रही है। बहरहाल, मनोज बाजपेयी के बारे में अविनाश दास की बातें उन्हीं की जुबानी :   
-अविनाश दास

1998 में सत्‍या रिलीज हुई थी। उससे एक साल पहले मनोज वाजपेयी पटना गए थे। वहां उनकी फिल्‍म तमन्‍ना का प्रीमियर था। साथ में पूजा भट्ट थीं। महेश भट्ट भी थे। जाहिर है प्रेस कांफ्रेंस होना था। जाड़े की सुबह दस बजे मौर्या होटल का कांफ्रेंस हॉल पत्रकारों से भरा हुआ था। बहुत सारे सवालों के बीच एक सवाल पूजा भट्ट से मनोज वाजपेयी के संभावित रोमांस को लेकर था। लगभग दस सेकंड का सन्‍नाटा पसर गया। फिर अचानक मनोज उठे और सवाल पूछने वाले पत्रकार को एक ज़ोरदार थप्‍पड़ लगा दिया। अफरा-तफरी मच गयी। कांफ्रेंस हॉल दो खेमों में बंट गया। महेश भट्ट ने आगे बढ़ कर मामले को शांत किया। यह पूरा दृश्‍य मेरे ज़ेहन में आज भी तैरता रहता है। आज भी मैं मनोज वाजपेयी के साथ बैठ कर उनका हाथ देखता रहता हूं और सतर्क रहता हूं।

बैंडिट क्‍वीन से अलीगढ़ तक की यात्रा में मनोज वाजपेयी ने फिल्‍मी उतार-चढ़ाव के कई रंग देखे हैं। ये तमाम रंग उनकी शख्‍सियत को उस मूल-मंत्र से डिगा नहीं सके, जो उन्‍हें थिएटर के दिनों में मिला था। वह यह कि अभिनय को उस किसान की तरह देखो, जिसकी आंखों में फसल की उम्‍मीद होती है और पसीने में मेहनत, मिट्टी और नमक की खुशबू।

मनोज बिहार में चंपारण के एक ठेठ गांव में पैदा हुए। वहीं पले-बढ़े भी। गांव के उनके घर से सिर्फ पांच-सात मिलोमीटर की दूरी पर गांधी का भितिहरवा आश्रम है। निजी बातचीत में अक्‍सर मनोज को मैंने मनुष्‍यता की बड़ी परिधि पर सामाजिक-राजनीतिक बातें करते हुए देखा है। उन बातों में गांधीवादी आग्रह की एक बारीक सी परत तैरती रहती है। दो साल पहले मनोज के साथ गांव जब मैं उनके गांव गया, तो लोगों से मिल कर उनकी दुख-तकलीफ में शामिल होने का उनका शगल देखा। यह उनकी जिंदगी का वह पहलू है, जो आमतौर पर सफल अभिनेताओं में देखने को नहीं मिलता।

पहले हमारी मुलाकात अक्‍सर दिल्‍ली में हुआ करती थी, जब मनोज आते थे। मैं टीवी में था। हर बार दो दिनों में दस से अधिक लोगों से मिलने का टार्गेट रहता था। ये वे लोग होते थे, जो थिएटर के दिनों में उनके संगी-साथी थे। जब आप सार्वजनिक जिंदगी में होते हैं, तो रोज़ नये रिश्‍ते बनते हैं। ऐसे में सहज रूप से पुराने रिश्‍ते छूटते चले जाते हैं -लेकिन मनोज को उन रिश्‍तों से अपनी पहचान को अलग करते हुए नहीं देखा। नये-पुराने तमाम रिश्‍तों से संवाद की निरंतरता में उनका भरोसा है। गुलज़ार की इन पंक्तियों की तरह, ‘’हाथ छूटे भी तो रिश्‍ते नहीं छोड़ा करते, वक्‍त की शाख से लम्‍हें नहीं तोड़ा करते।‘’

छोटे शहरों या गांवों से आने वाले तमाम संघर्षशील लोगों के लिए मनोज एक प्रेरक व्‍यक्तित्‍व हैं - लेकिन सिर्फ प्रेरणा ही किसी को मनोज जैसा बनने के लिए आसान राह नहीं दे सकती। बहुत कम लोग जानते हैं कि आज जो मनोज वाजपेयी हैं, वहां तक पहुंचने के लिए उन्‍होंने कितनी हाड़-तोड़ मेहनत की है। जिस नेटुआ नाटक से उन्‍होंने दिल्‍ली में एक समर्थ रंग-अभिनेता के बतौर अपनी पहचान स्‍थापित की, उस नेटुआ की तैयारी का किस्‍सा बताते हुए वे अक्‍सर कहते हैं कि उन दिनों सिर्फ दो-तीन घंटे सोते थे और अठारह-अठारह घंटे नृत्‍य का अभ्‍यास किया करते थे। उनके उन दिनों के मित्र भी इस तथ्‍य की तस्‍दीक़ करते हैं।

हसरतों से भरी हुई झोली लेकर बिहार से मुंबई में आना वाला हर आदमी मदद की भरी-पूरी उम्‍मीद के साथ उनसे मिलना चाहता है। बहुतों की मुलाकात हो जाती है और मैंने अनजान लोगों के लिए काम की संभावनाओं पर बात करते हुए मनोज वाजपेयी को देखा है। न सिर्फ बिहार के लोगों के लिए, बल्कि देश के किसी भी कोने से आने वाले लोगों के लिए।

एक बात, जो मुझे यहां लिखनी चाहिए या नहीं, नहीं जानता, पर बात है तो बतायी जानी चाहिए। मनोज की एक बहन दिल्‍ली में रहती हैं। उन्‍होंने एक बार मुझे फोन किया और कहा कि वे फिल्‍मों में कॉस्‍ट्यूम डिज़ाइनिंग का काम करना चाहती हैं। मैंने मनोज से बात की। उन्‍होंने कहा कि उसे आकर संघर्ष करना चाहिए और अपनी प्रतिभा और अपने हुनर से संघर्ष का सफर तय करना चाहिए। यह बात मनोज ने ऐसे समय में कही, जब परिवारवाद का वर्चस्‍व ज्‍यादातर क्षेत्रों में सर चढ़ कर बोल रहा है।

मनोज के बारे में एक बड़ी अच्‍छी बात मैं बताना चाहता हूं। जब भी कोई निर्देशक उनके पास अपनी फिल्‍म की कहानी लेकर जाता है, वे विनम्रतापूर्वक आग्रह करते हैं कि उन्‍हें पटकथा हिंदी में पढ़ने को दी जाए। हिंदी सिनेमा जगत में आमतौर पर पटकथा अंग्रेज़ी में लिखने का चलन है - लेकिन मनोज के पास मैंने ज़्यादातर पटकथाएं हिंदी में देखी हैं। यह हिंदी के लिए किसी भी किस्‍म के गौरव से ज्‍यादा एक अभिनेता की भाषा के प्रति एक सजग संवेदनशीलता दिखाता है।

नये किस्‍म के प्रयोगों को लेकर वे उत्‍साहित रहते हैं। चाहे ये प्रयोग सिनेमा के मोर्चे पर हो या जीवन के मोर्चे पर हो। पिछले दिनों तीन लघु फिल्‍मों में उन्‍होंने अभिनय किया। वे छोटी जगहों पर भी अच्‍छे विषय पर बातचीत वाली गोष्ठियों में उत्‍साह से जाते हैं और बड़े शहरों के चमकीले सभा-सेमिनारों से कन्‍नी काटते रहते हैं। उनका घर हिंदी-मुस्लिम एकता का खूबसूरत प्रतीक चिन्‍ह जैसा है, जहां एक ही जगह पर हम कुरान और गीता को साथ-साथ रखा हुआ पाते हैं। मनोज अपनी पत्‍नी शबाना रजा और बेटी आवा नायला बाजपेयी के संग खुशहाल जीवन जी रहे हैं। 

गंगा के लिए प्रेम जगाना है - दीया मिर्जा



सिर्फ एक नदी नहीं है गंगा - दीया मिर्जा
-अजय ब्रह्मात्मज
दीया मिर्जा हाल ही में गंगा की यात्रा से लौटी हैं। वह लिविंग फूड्ज के शो गंगा-द सोल ऑफ इंडिया की मेजबान हैं। यह शो 1 मई से आरंभ होगा। इस शो में दीया ने गंगा के किनारे-किनारे और कभी गंगा की धार में यात्रा की। उन्‍होंने गंगा के किनारे बसे गांव,कस्‍बों और शहरों को करीब से देखा। इस नदी की विरासत को समझा। दीया पिछले कई सालों से पर्यावरण और प्रकृति के मुद्दों से जुड़ी हुई हैं। वे इनसे संबंधित अनेक संस्‍थाओं की सदस्‍य हैं। उनकी गतिविधियों में जम कर हिस्‍सा लेती हैं। 
 बातचीत के क्रम में उन्‍होंने बताया कि वह संचार माध्‍यमों में काम कर रहे लोगों की समझ के लिए प्रकृति के गंभीर विषयों पर बैठक करती हैं। इसमें परिचित और प्रभावशाली लोग आते हैं। ऐसी बैठकों में उनकी जागरूकता बढ़ती है,जिसे वे अपने काम और संपर्क के लोगों के बीच बांटते हैं। वह कहती हैं,शहरों की स्‍कूली शिक्षा में हम प्रकृति और पर्यावरण के बारे में पढ़ते हैं। बड़े होने पर अपनी नौकरी या कारोबार में इस कदर व्‍यस्‍त हो जाते हैं कि हम उन जानकारियों का इस्‍तेमाल नहीं करते। मेरी कोशिश है कि फिल्‍म बिरादरी के दोस्‍तों के बीच प्रकृतिकी बातें करूं,जो किसी न किसी रूप में उनकी फिल्‍मों में आए। हमें संचार माध्‍यमों में प्रकृति के गुणों और सुंदरता को दिखाने-बताने की जरूरत है। पहले की फिल्‍मों में प्रकृति के दृश्‍य रहते थे। उसकी खूबियों पर गीत लिखे जाते थे। अभी हमारी फिल्‍मों की कहानियों से प्रकृति गायब है। टीवी के शो में सिर्फ हादसों के समय ही प्रकृति की बातें होती है। हमें कुदरत के नशे में धुत्‍त होना होगा। यह वाइल्‍डलाइफ ट्रस्‍ट ऑफ इंडिया का आयोजन है।
 गंगा... उनका पहला टीवी शो है।दीया मिर्जा के पास गंगा द सोल ऑफ इंडिया का प्रस्‍ताव आया तो वह कूद पड़ीं। मानो मन चाही मुराद पुरी हो रही हो। दीया को प्रकृति से जुड़ने,उसके बारे में बताने और उसे नजदीक से समझने का मौका मिल गया। दीया कहती हैं, गंगा आम नदी है। इसकी अपनी खासियतें हैं। सदियों से मानव सभ्‍यता का विकास इससे जुड़ा है। संस्‍कृतियां इसके आगोश में पली और बढ़ी हैं। अभी तो उसका अस्तित्‍व ही खतरे में पड़ गया है। जरूरत है कि हम गंगा के योगदान को समझें और सेलिब्रेट करें। नई पीढ़ी को बताएं। किसी भी चीज से मोहब्‍बत करने के लिए जरूरी है कि हम पहले उसके बारे में जानें। अभी गंगा के बारे में बताने की जरूरत है। उसकी खासियतों के बारे में बताना होगा। नई पीढ़ी को पता चलेगा तो वह गंगा से मोहब्‍बत करेगी। हम जिससे मोहब्‍बत करते हैं,उसे कोई नुकसान नहीं पहुंचाते। उसकी रक्षा करते हैं। 
इस कार्यक्रम की शूटिंग भी अनोखे तरीके से की गई। नदी के संग यात्रा करनी थीं। डाक्‍यूमेंट्री के लिए पहले से कुछ भी तय नहीं था। दीया बताती हैं, मुझे कुछ भी लिख कर नहीं दिया गया था। कोई स्क्रिप्‍ट नहीं थी। ऐसे शो और कार्यक्रम में आप तय भी नहीं कर सकते। यह स्‍लो ट्रैवल शो है। इसमें रुक-रुक कर लोगों से मिलना और उन्‍हें शूट करना था। यहां हम भागते हुए नजारे नहीं देखते। हम हर स्‍थान की धड़कन और स्‍पंदन को कैच करते हैं। हमारी कोशिश रही कि हम रुके,बतियाएं,महसूस करें,आत्‍मसात करें,उनसे एकाकार हों और उनकी बातें कहें। यह यूनिक और खूबसूरत शो है। दर्शक पहली बार मुझे असली रंग-रूप में देखेंगे। 
इस शो की शूटिंग किस्‍तों में हुई। तीन किस्‍तों में पूरी यात्रा हुई। दीया अपना अनुभव बताती है, इस नही के साथ यात्रा करने के बाद डिप्रेशन भी होता है। यात्रा आरंभ होती है तो एकदम साफ पानी है। नीचे उतरने के साथ गंगा प्रदूषित और गंदी होती चली जाती है। गंगावासियों के पास अपनी कहानियां हैं। दूसरी तरफ गंगा अपनी कहानी कह रही थी बगैर बोले। मैं अपने अनुभव को किसी एक विशेषण से व्‍यक्‍त नहीं कर सकती। मजा आया तो तकलीफ भी हुई। मेरे अंदर कुछ गहरा बदलाव हुआ। तीन भाव थे...वॉव,ओह माय गॉड और थैंक्‍यू। इस देश में बहुत अच्‍छे लोग हैं। वे अपनी बेहतरीन सोच के साथ खामोशी से काम कर रहे हैं। हमें अपनी अच्‍छाइयों को भी सामने लाने की जरूरत है।

Friday, April 22, 2016

फिल्‍म समीक्षा : संता बंता प्रायवेट लिमिटेड


फूहड़ हास्‍य,लचर अभिनय

-अजय ब्रह्मात्‍मज
आकाशदीप साबिर की फिल्‍म संता बंता प्रायवेट लिमिटेड हर लिहाज से एक फूहड़ और लचर फिल्‍म है। अगर कुछ देखने लायक है तो वह केवल फिजी की खूबसूरती है। यह फिल्‍म नमूना है कि कैसे बमन ईरानी,संजय मिश्रा और जॉनी लीवर जैसे अभिनेताओं का बेजा इस्‍तेमाल किया जा सकता है। ताज्‍जुब है कि इसे वॉयकॉम 18 का सहयोग भी मिला है। अगर वे किसी होनहार और संभावनाशील निर्देशक की सोच को ऐसा समर्थन दें तो फिल्‍म इंडस्‍ट्री में कुछ नई प्रतिभाएं भी आएं।
बहरहाल,बमन ईरासनी और वीर दास लतीफों से मशहूर हुए संता और बंता के किरदार में हैं। कुद लतीफों को सीन में तब्‍दील कर दिया गया है। उनमें जरूर हंसी आ जाती है। ऐसी हंसी तो ह्वाट्स ऐप के लतीफे पढ़ कर भी आती है। लतीफों से आगे बढ़ कर जैसे ही फिल्‍म में ड्रामा आता है,वैसे ही निर्देशक आकाशदीप साबिर अपनी अयोग्‍यता जाहिर कर देते हैं।
बमन ईरानी,संजय मिश्रा और जॉनी लीवर घिसे-पिटे लतीफों से ही हंसाने की कोशिश करते हैं। अपनी कोशिशों में वे ज्‍यादातर असफल रहते हैं,क्‍योंकि उन्‍हें कोई सपोर्ट नहीं मिलता।
अवधि- 112 मिनट
स्‍टार- आधा स्‍टार


फिल्‍म समीक्षा : लाल रंग




माटी की खुश्‍बू और रंग

-अजय ब्रह्मात्‍मज

सय्यद अहमद अफजाल की लाल रंग को नजरअंदाज या दरकिनार नहीं कर सकते। हिंदी की यह ठेठ फिल्‍म है,जिसमें एक अंचल अपनी भाषा,रंग और किरदारों के साथ मौजूद है। फिल्‍म का विषय नया और मौजूं है। पर्दे परदिख रहे नए चेहरे हैं। और साथ ही पर्दे के नीछे से भी नई प्रतिभाओं का योगदान है। यह फिल्‍म अनगढ़,अधपकी और थोड़ी कच्‍ची है। यही इसकी खूबी और सीमा है,जो अंतिम प्रभाव में कसर छोड़ जाती है।
अफजाल ने दिल्‍ली से सटे हरियाणा के करनाल इलाके की कथाभूमि ली है। यहां शंकर मलिक है। वह लाल रंग के धंधे में है। उसके घर में एक पोस्‍टर है,जिस पर सुभाष चंद्र बोस की तस्‍वीर है। उनके प्रसिद्ध नारे में आजादी काट कर पैसे लिख दिया गया है- तुम मुझे खून दो,मैं तुम्‍हें पैसे दूंगा। शंकर मलिक अपने धंधे में इस कदर लिप्‍त है कि उसकी प्रेमिका परिवार के दबाव में उसे छोड़ जाती है। नृशंस कारोबार में होने के बावजूद वह दोस्‍तों की फिक्र करता है। इस कारोबार में वह एक नए लड़के(अक्षय ओबेराय) को शामिल करता है। धंधे के गुर सिखता है,जो आगे चल कर उसका गुरू बनने की कोशिश करता है। हिस्‍से के लिए कॉलर तक पकड़ लेता है। दूसरी तरफ कुछ ही दृश्‍यों के बाद दिलदार शंकर है,जो पूरी कमाई उसके लिए न्‍योछावर कर देता है। शंकर जटिल किरदार है।
यह फिल्‍म रणदीप हुडा और पिया बाजपेयी के लिए देखी जानी चाहिए। रणदीप हुडा ने पिछली कुछ फिल्‍मों में अभिनय को साधा है। वे पूरे आत्‍मविश्‍वास में इतने सहज और तरल होते जा रहे हैं कि आसानी से नए किदारों में ढल जाते हैं। इस फिल्‍म की जमीन तो उनकी अपनी है। भाषा और तेवर में इसी कारण वास्‍तविकता नजर आती है। उन्‍होंने फिल्‍म के मुश्किल दृश्‍यों को भी आसान कर दिया है। दोस्‍त,प्रेमी,कारोबारी और दुस्‍साहसी व्‍यक्ति के रूप में वे सभी आयामों में प्रभावशाली लगते हैं। पूनम के किरदार में आई पिया बाजपेयी की सादगी और निश्‍छलता मोहती है। फिल्‍म का यह सबसे शुद्ध चरित्र है। पिया बाजपेयी ने अपनी अदायगी से उसे और प्रिय बना दिया है। लाल रंग की यह नई लड़की के रंग भविष्‍य में और चटखदार हो सकते हैं। मीनाक्षी दीक्षित ने राशि के किरदार को विश्‍वसनीय तरीके से पेश किया है। चूंकि इस किरदार को अधिक स्‍पेस नहीं मिला है,इसलिए मीनाक्षी को अपना कौशल दिखाने का मौका नहीं मिला है। फिल्‍म के सहयोगी किरदारों को निभा रहे कलाकार भी उल्‍लेखनीय हैं।
सय्यद अहमद अफजाल ने एक साथ कई भावों और विषयों को फिल्‍म में बुना है। इसकी वजह से फिल्‍म कहीं थोड़ी बिखरी तो कहीं थोड़ी ठहरी महसूस होती है। लाल रंग के धंधे के विस्‍तार और गहराई में कहानी नहीं उतरती। खून का कारोबार पृष्‍ठभूमि में चला जाता है। फिर रिश्‍तों,दोस्‍ती और त्‍याग की कहानी चलने लगती है। रणदीप हुडा को अक्षय ओबेराय से बराबर का सहयोग नहीं मिलता। वे कमजोर पड़ते हैं। नतीजे में दोनों के साथ के दृ
य भी कमजोर हो जाते हैं। कलाकारों की सही संगत न हो तो परफारमेंस की जुबलबंदी नहीं हो पाती।
इस फिल्‍म के संगीत में माटी के सुर और शब्‍द हैं। गीतकारों,गायकों और संगीतकारों ने हरियाणा के संगीत की खूबियों से फिल्‍म को सजाया है। फिल्‍म का छायांकन खूबसूरत है। आकाश से देखने पर करनाल भी व्‍यवस्थित और सुंदर नजर आता है।
फिल्‍म के कई संवादों में हरियाणवी समझने में दिक्‍कत होती है। प्रवाह में भाव तो समझ में आता है। अर्थ भी मालूम होता तो प्रभाव बढ़ जाता।
अवधि- 147 मिनट
स्‍टार- ढाई स्‍टार

फिल्‍म समीक्षा : निल बटे सन्‍नाटा





मलिन बस्‍ती में उजास

-अजय ब्रह्मात्‍मज
स्‍वरा भास्‍कर अपनी पीढ़ी की साहसी अभिनेत्री हैं। दो कलाकारों में किसी प्रकार की तुलना नहीं करनी चाहिए। फिर भी कहा जा सकता है कि नवाजुद्दी सिद्दीकी की तरह उन्‍होंने मुख्‍यधारा और स्‍वतंत्र स्‍वभाव की फिल्‍मों में एक संतुलन बिठाया है। हम ने उन्‍हें हाल ही में प्रेम रतन धन पायो में देखा। निल बटे सन्‍नाटा में उन्‍होंने 15 साल की बेटी की मां की भूमिका निभाई है। हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में इमेज के प्रति अतिरिक्‍त सजगता के दौर में ऐसी भूमिका के लिए हां कहना और उसे पूरी संजीदगी और तैयारी के साथ निभाना उल्‍लेखनीय है।
आगरा की इस कहानी में ताजमहल के पीछे की मलिन बस्‍ती में रह रही चंदा सहाय बर्तन-बासन और खाना बनाने का काम करती है। उसकी एक ही ख्‍वाहिश है कि उसकी बेटी अपेक्षा पढ़-लिख जाए। मगर बेटी है कि उसका पढ़ाई में ज्‍यादा मन नहीं लगता। गणित में उसका डब्‍बा गोल है। बेटी की पढाई के लिए वह हाड़-तोड़ मेहनत करती है। बेटी है कि मां की कोशिशों से बिदक गई है। वह एक नहीं सुनती। उल्‍टा मां को दुखी करने की पूरी कोशिश करती है। कुछ उम्र का असर और कुछ मां से नाराजगी... उसे लगता है कि मां अपने सपने उसके ऊपर थोप रही है। चंदा के सपनों की हमराज हैं दीदी। दीदी के सुझाव पर वह ऐसा कदम उठाती है,जिससे बेटी और भी नाराज हो जाती है। इस कहानी में दीदी के साथ प्रिंसिपल श्रीवास्‍तव जी भी हैं। अपेक्षा के सहपाठियों की फिल्‍म में खास भूमिका है।
निर्देशक अश्विनी अय्यर तिवारी ने निल बटे सन्‍नाटा को मां-बेटी के रिश्‍ते और पढ़ाई पर केंद्रित रखा है। उन्‍होंने इस फिल्‍म में उदासी और मलिनता नहीं आने दी है। मलिन बस्‍ती में अधिक देर तक कैमरा नहीं ठहरता। दुख दर्शाने की अतिरिक्‍त कोशिश नहीं है। उल्‍लास भी नहीं है,लेकिन मुख्‍य कलाकार में अदम्‍य उत्‍साह है। मुख्‍य किरदार की कोई बैक स्‍टोरी भी नहीं है,जिससे पता चले कि चंदा सहाय क्‍यों बर्तन-चौका का काम कर रही है? जो है से वर्तमान है और उस वर्तमान में बेहतर भविष्‍य के सपने और संघर्ष हैं। फिल्‍म कुछ दृश्‍यों में उपदेशात्‍मक होती है,लेकिन प्रवचन पर नहीं टिकती। अगले ही दृश्‍य में सहज और विनोदी संवाद आ जाते हैं। निर्देशक ने दृश्‍य संरचना से कथ्‍य को बोझिल नहीं होने दिया है। भावनाओं का घनत्‍व गाढ़ा नहीं किया है। निर्देशक ने लेखकों की मदद से सरल शब्‍दों में गंभीर बातें की हैं। यह मलिन बस्‍ती के वंचित चरित्रों के सपनों और उजास की फिल्‍म है।
निल बटे सन्‍नाटा स्‍वरा भास्‍कर की उम्‍दा कोशिश है। चंदा सहाय को आत्‍मसात करने और उसे पर्दे पर उतारने में उन्‍होंने संवाद अदायगी से लेकर बॉडी लैंग्‍वेज तक पर मेहनत की है। अनुभव और जानकारी की कमी से कुछ चीजें छूट जाती है या खटकती हैं तो वह अकेले एक्‍टर का दोष नहीं है। स्‍वरा ने चंदा सहाय को पर्दे पर यथासंभव सही तरीके से उतारा है। अपेक्षा के दोस्‍त सहपाठी और गण्ति में मदद करने वाले कलाकार ने उम्‍दा काम किया है। सारे बच्‍चे नैचुरल और सहज हैं। दीदी की भूमिका में आई रत्‍ना पाठक शाह ने चंदा का मनोबल बढा़ने में पूरी मदद की है। उनकी सहायता से चंदा सहाय का किरदार निखरता है। निल बटे सन्‍नाटा में पंकज त्रिपाठी याद रह जाते हैं। उन्‍होंने खुशमिजाज टीचर की भूमिका को दमदार बना दिया है। वे आर्गेनिक एक्‍सप्रेशन के कलाकार हैं। उनकी अदाओं में हमेशा नवीनता रहती है। यों लगता है कि आसपास का कोई चरित्र उठ कर पर्दे पर चला गया हो।
निल बटे सन्‍नाटा। वैसी चंद फिल्‍मों में शुमार होगी,जिसमें हिंदी समाज और मिजाज है। हिंदी फिल्‍मों से गायब हो रहे हिंदी समाज की बहुत चार्चा होती है। निल बटे सन्‍नाटा भरोसा देती है कि उम्‍मीद कायम है। कलाकार और निर्देशक अपने तई कोशिश कर रहे हैं।
अवधि- 100 मिनट
स्‍टार- साढ़े तीन

Thursday, April 21, 2016

दरअसल : छोटे शहरों से आए कलाकार



-अजय ब्रह्मात्‍मज

इन दिनों पत्र-पत्रिकाओं में लगातार लेख,कॉलम और विश्‍लेषण छप रहे हैं कि छोटे शहरों से आए कलाकार मुंबई में मिली सफलता पचा नहीं पाते। असफलता तो और भी हताश करती है। पिछले दिनों एक टीवी कलाकार की आत्‍महत्‍या के बाद सभी के प्रवचन चालू हो गए हैं। ज्ञान बंट रहा है। ज्‍यादातर स्‍तंभकार,लेखक और पत्रकार छोटे शहरों से आए कलाकारों के दबाव और चुनाव पर व्‍यवस्थित बातें करने के बजाए एक हादसे को सभी पर थोप रहे हें। यह संदेश दिया जा रहा है कि छोटे शहरों के युवा हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री और टीवी इंडस्‍ट्री के काबिल नहीं होते। अगर किसी को कामयाबी मिल भी गई तो उसका हश्र दुखद होता है। वे गलत फैसले लेते हैं। अपनी अर्जित कामयाबी में ही घुट जाते हैं। ऐसे लोग चंद घटनाओं को सच बताने लगते हैं,जबकि छोटे शहरों से आकर मिले मौके के सदुपयोग से लहलहाती प्रतिभाओं को भी हम देख रहे हें। हम हादसों की खबर देते हें। जलसों को नजरअंदाज करते हैं।
मैं स्‍वयं एक गांव से हूं। वहां से कस्‍बे में पढ़ने आया। फिर कथित छोटे शहर में पढ़ाई की। उसके बाद जेएनयू में छह साल रहा। जेएनयू ने आंखें खोल दी। यहीं दुनिया को समझने की विश्‍वदृघ्टि मिली। देश-दुनिया और दीन-दुनिया की समझ बढ़ी। गांव-कस्‍बे से मिली ग्रंथियां धीरे-धीरे खत्‍म हुईं। मुंबई आने और फिल्‍म पत्रकारिता से जुड़ने पर हिंदी अखबार और फिल्‍मों के हिंदी पत्रकार होने की वजह से अपमान और तिरस्‍कार भी झेले। फिर भी लगे रहे। आज इतना तो कह ही सकते हैं कि अब कोई नजरअंदाज नहीं करता। जरूरत के अनुसार संपर्क बना रहता है और अखबार के लिए आवश्‍यक इंटरव्‍यू और कवरेज की सुविधाएं मिल जाती हैं। हम ने निरंतर प्रयास से हिंदी के प्रसार और प्रभाव का महत्‍व समझाया है। अगर आरंभिक अपमानों से निराश हो जाते और हिम्‍मत हारते तो खुद के साथ हिंदी फिल्‍म पत्रकारिता का भी नुकसान करते। अध्‍ययन,लगन,धैर्य और कोशिश से रास्‍ते सुगम होते हैं। फिल्‍म पत्रकारितो के दो दशकों में छोटे शहरों से आए अनेक कलाकारों से मिला। उनके संघर्ष को समझा। यहां सभी का संघर्ष अलग होता है,क्‍योंकि सभी की परिस्थितियां अलग होती हैं। सभी के सपने कमोबेश समान होते हैं।
मुंबई के ग्‍लैमर जगत से जुड़ने आए कलाकारों पर कई तरह के दबाव रहते हें। अगर आंकड़े जुटाए जाएं तो बमुश्किल बीस प्रतिशत ही ऐसे कलाकार और तकनीशियन मिलेंगे,जिन्‍हें परिवार का पूर्ण समर्थन मिला है। घर के लोगों को नाराज कर अपने सपनों के पीछे मुंबई आए अस्‍सी प्रतिशत लोगों के पास मुसीबत में सहारे के लिए कंधे नहीं होते। सबसे जरूरी है कि कुछ भरोसेमंद दोस्‍त और परिचित हों,जो बगैर किसी पूर्वाग्रह के आप के जय-पराजय की कहानियां सुन सकें। शायद यकीन न हो,लेकिन यह सच्‍चाई है कि यहां खुशियां बांटने के लिए भी ढंग के दोस्‍त नहीं मिलते। प्रतिस्‍पर्धा में कटुता और ईर्ष्‍या इतनी बढ़ गई है कि अपनी जीत से ज्‍यादा खुशी दूसरों की हार में मिलती है। इस चकाचौंध के पीछे का अंधेरा निगलने को तैयार रहता है। कुछ इसके शिकार होते हैं। लेकिन जो समझदारी से काम लेता है। सही संगत में रहता है। अपने सधे कदमों से आगे बढ1ता है। वह कामयाब भी होता है। ग्‍लैमर जगत में कामयाबी का प्रतिशत हजारों में एक होता है और ऊपर के दस की गिनती में सघन मेहनत और उपयोगी अवसरों की जरूरत पड़ती है। असफल और कमजोर के साथ सफल और मजबूत भी इसे किस्‍मत का नाम देते हें। वास्‍तव में हम जिसे किस्‍मत कहते हैं,उसकी बुनियाद में मेहनत होती है। हाथ पर हाथ रखे भाग्‍य के भरोसे बैठे लोगों को फिल्‍म इंडस्‍ट्री तो क्‍या,किसी भी क्षेत्र में कुछ नहीं मिलता।
छोटे शहरों से आए आउटसाइडर के लिए राह आसान नहीं होती। उन्‍हें हर बार परीक्षा से गुजरना पड़ता है और हमेशा उत्‍तीर्ण होना होता है। उनमें से कोई हठात आत्‍महत्‍या जैसा गलत कदम उठा ले तो सभी आउटसाइडर की थू-थू होती है। विशेषज्ञ बताने लगते हैं कि कामयाबी इनकी औकात में नहीं है।     

दिखने लगी है मेरी मेहनत - रणदीप हुडा


-अजय ब्रह्मात्‍मज
रणदीप हुडा व्‍यस्‍त हैं। बहुत काम कर रहे हैं। तीन फिल्‍में पूरी कीं। तीनों बिल्‍कुल अलग-अलग और तीनों में काफी मेहनत करनी पड़ी। एक साल में 35 किलाग्राम वजन घटाना और बढ़ाना पड़ा। घुड़सवारी को शौक स्‍थगित रखना पड़ा। घोड़ों के साथ वे भी थोड़े अस्‍वस्‍थ चल रहे हैं।
-वजन घटाना और बढ़ाना दोनों ही मुश्किल प्रक्रिया है। उधर आमिर ने वजन बढ़ाया और फिर घटाया। आप ने वजन घटाया और फिर बढ़ाया।
0 मैं तो फिर भी जवान हूं। आमिर की उम्र ज्‍यादा है। उनके लिए अधिक मुश्किल रही होगी। उम्र बढ़ने के साथ दिक्‍क्‍ते बढ़ती हैं। सरबजीत के लिए वजन कम किया और दो लफ्जों की कहानी के लिए 95 किलो वजन करना पड़ा। सिफग्‍ चर्बी नहीं घटानी होती। मांसपेशियों को भी घटाना होता है। उससे तनाव होता रहता है।
- इन दोनों फिल्‍मों के बीच में लाल रंग आया? क्‍या फिल्‍म है?
0 जी,यह अच्‍छा ही रहा। हिंदुस्‍तान में ज्‍यादातर फिल्‍में हवा में होती हैं। उनके शहर या ठिकानों के नाम नहीं होते। मेरी रुचि ऐसी कहानियों में रहती है,जिनका ठिकाना हो। पता हो कि किस देश के किस इलाके की कहानी कही जा रही है। यह हरियाणा की एक सच्‍ची घटना पर आधारित है। मुझे अफजाल के साथ काम करना था। इस फिल्‍म में पहली बार मुझे जाट किरदार निभाने का मौका मिला। हाईवे में मैं हरियाणवी नहीं था। वह एनसीआर का गूजर था। इस फिल्‍म में फ्रेंच मथाई डुप्‍लेसी ने संगीत दिया है। उनके संगीत से फिल्‍म की खूबसूरती बढ़ गई है। यह दुनिया के सबसे घिनौने अपराध पर है। खून बेच कर पैसे कमाने की कहानी है। इसके साथ ही यह दोस्‍ती और मोहब्‍बत की भी कहानी है। छल है,अपराध है,प्रपंच है और पछतावा है।
-ऐसी फिल्‍में करते समय अपनी माटी की खुश्‍बू और रंग को पर्दे पर लाने का एहसास कैसा होता है?
0 मैंने हर तरह के किरदार निभाए हैं और उनकी भाषाएं बोली हैं। अपनी भाषा बोलते हुए पहली बार थोड़ा अजीब सा लगा। फिल्‍म के लिए बोलते समय यह खयाल रखना था कि भाष ज्‍यादा गाढ़ी न हो जाए। दूसरी भाषाओं के दर्शकों की समझ में आए...खास कर हिंदी दर्शकों को। मैंने अपने किरदारों पर हमेशा मेहनत की। अब लोगों को मेरी मेहनत दिखने लगी है। वे ध्‍यान देने लगे हैं। लाल रंग में मुझे अपनी माटी के रंग दिखाने का मौका मिला है।
-मेनस्‍ट्रीम सिनेमा में रहने के साथ आप छोटी फिल्‍में भी समान शिद्दत के साथ करते हैं। आप की यह खूबी नोटिस हो रही है। आप इंटरेस्टिंग एक्‍टर के तौर पर उभरे हैं।
0 शुरू में तो जो मौके मिले,मैं करता गया। फिर मेनस्‍ट्रीम की भी फिल्‍में कीं। मैंने आठ साल पहले रंगरसिया की थी। उसकी वजह से मुझे कई मेनस्‍ट्रीम फिल्‍में छोड़नी पड़ी। थोड़ा दुखी भी हुआ कि मैं पिछड़ रहा हूं। अब लगता है कि अच्‍छा ही हुआ। मेरी कॉलिंग और पहचान अलग है। उसे दर्शक पहचान रहे हैं। मुझे दर्शक मिल रहे हैं। मैंने कभी किसी रणनीति के तहत फिल्‍में नहीं कीं। अपनी सीमाओं में काम करता रहा और अब वही पसंद आ रहा है। इंटरेस्टिंग लग रहा है। मेरी अकेली कोशिश है कि में देख हुआ न दिखूं। हर किरदार में अलग दिखूं। लाल रंग का मेरा किरदार सबसे ज्‍यादा खिलंदड़ है। मेरा नाम शंकर मलिक है।
-दादी समेत सभी रिश्‍तेदारों को आप सेट पर ले आए थे। उनका अनुभव कैसा रहा?
0 पहली बार मौका मिला था। सभी को बुलाया। रोहतक और पास के गांव से बाकी रिश्‍तेदार भी आए। मुझे सबसे ज्‍यादा खुशी दादी ने दी। सेट पर सभी को काम करते देख उन्‍होंने पूछा कि इतने सारे लोग यहां क्‍या कर रहे हें? बाद में इतनी मगन हो गई कि उन्‍हें अपनी सेहत खराब होने का भी खयाल नहीं रहा। चंगी हो गईं। वापस जाने का नाम नहीं ले रही थीं। अभी गांव गया था तो मैंने उसे ट्रेलर और गाने दिखाए। वह बहुत खुश हुईं। उनका खुश होना मेरे लिए किसी भी क्रिटिक की तारीफ से बढ़ कर है।


Tuesday, April 19, 2016

हंसमुख है मेरा किरदार :पंकज त्रिपाठी



-अमित कर्ण
पंकज त्रिपाठी उन चंद कलाकारों में से एक हैं, जो कमर्शियल व ऑफबीट फिल्‍मों के बीच उम्‍दा संतुलन साध रहे हैं। मसलन हाल के दिनों में मसान और दिलवाले। अब उनकी निल बटे सन्‍नाटा आ रही है। वे इसमें स्‍कूल प्रिसिंपल बने हैं।
-फिल्‍म में आप लोग कहीं प्रौढ़ शिक्षा अभियान का प्रचार तो नहीं कर रहे हैं?
पहली नजर में मुझे भी यही लगा था, पर ऐसा नहीं है। यह आप को हंसा-रुला व प्रेरित कर घर भेजेगी। इसमें मनोरंजन करने के लिए किसी प्रकार के हथकंडों का इस्‍तेमाल नहीं है। बड़ी प्‍यारी व प्‍योर फिल्‍म है। इससे हर वे लोग जुड़ाव महसूस करेंगे, जो अपने दम पर मकबूल हुए हैं। मैं इसमें हंसमुख श्रीवास्‍तव की भूमिका में हूं। वह शिक्षक है।
-वह किस किस्‍म का शिक्षक है। खडूस या नाम के अनुरूप हंसमुख। साथ ही इसमें आप ने क्‍या रंग भरे हैं?
मैं निजी जीवन में जिन तीन-चार शिक्षकों का मुरीद रहा हूं, उनकी खूबियों-खामियों को मैंने इसमें समेटा है। एक लक्ष्‍मण प्रसाद थे। जगतकुमार जी थे। राम जी मास्‍टर साहब थे। गणित पढ़ाने वाले टीचर अमूमन बोरिंग होते हैं, मगर श्रीवास्‍तव जी ऐसा नहीं है। वह आशावादी है। वह कमजोर छात्रों को भी प्रखर बनाना चाहता है।
-कई बार वैसे लोग भी टीचर बन जाते हैं, जो कुछ और बनना चाहते थे, पर वह न हो सका। नतीजतन, उन्‍होंने बीएड की और बन गए शिक्षक। वे बड़े बेकार अध्‍यापक साबित होते हैं। वह कुंठा इस फिल्‍म में है?
उस मसले पर हम नहीं गए हैं। यहां संतोषम परम सुखम की बात है। किसी किरदार को भौतिक सुखों की लालसा नहीं है। वे अपनी-अपनी  जगहों से खुद की लड़ाई लड़ रहे हैं। वे शिकायती नहीं हैं। लक्ष्‍य प्राप्ति को वे निरंतर लगे हुए हैं। वे अपने चाहने वालों का भरोसा नहीं तोड़ना चाहते। वह चीज सीखने योग्‍य है। मैंने सीख लेते हुए तय किया है कि मैंने अब तक जो फैन फोलोइंग अर्जित की है, उनका भरोसा न तोडूं। उन्‍हें पसंद पड़ने वाली फिल्‍में ही करता रहूं।
-जिन लोगों से आप कभी टकराए न हों, उस किस्‍म के किरदारों को कैसे क्रिएट करते हैं?
मैं किरदारों की बैक स्‍टोरी पर काफी काम करता हूं। मेरा मानना है कि दुनिया का कोई व्‍यक्ति पूरी तरह ब्‍लैक या ह्वाइट नहीं होता। हर कोई ग्रे है। उसके बाद मैं उसके कार्यकलापों के कारणों की तह में जाता हूं।
-इतनी डिटेलिंग स्क्रिप्‍ट में तो नहीं ही मिलती होगी?
जी। वह रूपरेखा तैयार करना तो कलाकारों की जिम्मेदारी है। मिली भूमिका के अतीत की कल्‍पना कर उसके मुताबिक अदाकारी करने से रोल जीवंत हो जाता है।
-‘…वासेपुर से लेकर दिलवाले तक आप अपने किरदारों को ठहराव व सुकून पसंद रखते रहे हैं। यह आप का सिग्‍नेचर टोन बनता जा रहा है?आप कह सकते हैं। दरअसल हम, आप या दूसरे किसी में गांधी भी है और हिटलर भी है। लिहाजा वैसी भूमिकाएं निभाते व्यक्ति विशेष के व्‍यक्तित्‍्व की आभा संबंधित रोल पर दिखेगी। हालांकि मैं पिछले किए गए काम को रिपीट न करने की पूरी कोशिश करता हूं।
- जो जिंदगी कभी जी न हो, उसे कैसे निभाना चाहिए? 
कल्‍पनाशक्ति। वह यथार्थ के मुकाबले कहीं ज्‍यादा अनूठी होती है। आप असल में कभी हवा में नहीं उड़ सकते, मगर कल्‍पना करें तो मिनटों में हवा से बातें करने लगेंगे। आप की भाव-भंगिमा बदल जाती है। हां आप को क्राफ्ट की बुनियादी जानकारी होनी चाहिए। वे जितनी पुख्‍ता होंगी, आप की धारणा बचकानी नहीं लगेंगी। उन जानकारियों में कल्‍पना के रंग भरते रहें। आज उस जैसी कल्‍पनाशक्ति के आधार पर जंगल बुक, अवतार, इंटरस्‍टेलर जैसी फिल्‍म तक बन गई, जो कहीं से महज फंतासी नहीं लगती। ‘…वासेपुर में मैं कसाई सुल्‍तान कुरेशी बना था। उससे पहले मैं कभी किसी बूचड़खाने में नहीं गया था। शूटिंग दरअसल बूचड़खाने में ही हुई तो वहां चंद कसाइयों से कुछ देर बातें कर लीं। उसके बाद मैंने अपना सुल्‍तान कुरेशी गढ़ा।
-अमित कर्ण    

    
   

Sunday, April 17, 2016

ख्‍वाब कोई बड़ा नहीं होता - स्‍वरा भास्‍कर





-अमित कर्ण


स्‍वरा भास्‍कर मेनस्‍ट्रीम सिनेमा में अपनी दखल लगातार बढ़ा रही हैं। वे ‘प्रेम रतन धन पायो’ के बाद अब एक और बड़े बैनर की ‘निल बटे सन्‍नाटा’ में हैं। वह भी फिल्‍म की बतौर मेन लीड। इसके अलावा ‘आरावाली अनारकली’ भी उन्‍हीं के कंधों पर टिकी है।
-बहुत दिनों बाद विशुद्ध हिंदी में टाइटिल आया है। साथ ही देवनागिरी लिपि में पोस्‍टर। क्‍या कुछ है ‘निल बटे सन्‍नाटा’ में।

पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश और दिल्‍ली के इलाकों में ‘निल बटे सन्‍नाटा’ बड़ी जाना-पहचाना तकियाकलाम है। यह उन लोगों के लिए प्रयुक्‍त होता है, जो गया-गुजरा है। जो गौण है और जिसका जिंदगी में कुछ नहीं हो सकता हो। बहरहाल इसकी कहानी एक मां और उसकी 13 साल की ढीठ बेटी के रिश्‍तों पर केंद्रित है। मां लोगों के घरों में नौकरानी है। वह दसवीं फेल है। वह नहीं चाहती कि उसकी बेटी का भी वही हश्र हो, मगर उसकी बेटी फेल होने की पूरी तैयारी में है। दिलचस्‍प मोड़ तब आता है, जब उसकी मां खुद दसवीं पास करने को उसी के क्‍लास में दाखिला ले लेती है। दोनों का द्वंद्व क्‍या रंग लाता है, वह इस फिल्‍म में है। यह फिल्‍म दरअसल कहना चाहती है कि कोई सपना बहुत बड़ा नहीं होता और उसे देखने वाला बहुत छोटा नहीं होता। इसे हमने मजेदार अंदाज व कमर्शियल स्‍पेस में रखते हुए पेश किया है।

- इसकी कहानी किसी सच्‍ची घटना से प्रेरित है। साथ ही क्‍या यह मौजूदा एडुकेशन सिस्‍टम की कलई भी खोलती है।

कहानी वाली बात तो निर्देशक अश्विनी ही बता सकेंगी। यह फिल्‍म बेसिकली उन लोगों की कहानी बयां करती है, जिनके लिए जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए पढ़ाई के सिवा और कोई विकल्‍प है ही नहीं। जिनके पास बाप-दादा की जायदाद नहीं है। इसकी अपील व्‍यापक है। हर इंसान की इच्‍छा होती है कि उनके बच्‍चे उनसे तो बेहतर करें हीं। यह शिक्षा प्रणाली के बाकी पहलुओं में नहीं जाती। यह ‘मुन्‍नाभाई एमबीबीएस’ और ‘3इडियट’ के जोन में नहीं है। यह ‘पीकू’ और ‘क्‍वीन’ वाले मिजाज की फिल्‍म है। यह बुनियादी संघर्ष की कहानी है।

-मां-बेटी के रिश्‍तों में सहज भाव तो है, पर पिता के साथ अब भी बेटियां खुली नहीं हैं।

जी हां। खासकर भारत में। यहां तो पिता के साथ तो आज भी बेटियां मासिक धर्म व यौन शिक्षा से संबंधित बातें नहीं कर सकती। हमारी फिल्‍म में भी एक जगह बच्‍ची मां को धमकाती है वह उसकी बाप बनने की कोशिश न करे। यानी बच्‍चे भी यह मानकर चलते हैं कि उसकी मां अपनी हदों में ही रहा करे।

-विज्ञापन पृष्‍ठभूमि से आए फिल्‍मकार अनूठी कहानियां लेकर आ रहे हैं। उन्‍हें सिनेमा को किस दिशा में ले जाते देख रही हैं।
 
वाकई शुजित सरकार, जूही चतुर्वेदी हों या राजकुमार हिरानी। अब राम माधवानी व अश्विनी अय्यर तिवारी। वे नाजुक पलों से प्‍यारे इमोशन खोद निकालने में बड़े माहिर होते हैं, क्‍योंकि वे बरसों से वही करते रहे हैं। हिंदी सिने जगत इस दौर का कर्जदार रहेगा कि ऐसी किस्‍सागोई करने वाले लोग हैं, जो  हाशिए पर पड़े लोगों व नजरअंदाज कर दिए जाने वाले मुद्दों को पूरी दुनिया के समक्ष ला रहे हैं। अच्‍छी बात यह हो रही है उस पृष्‍ठभूमि के फिल्‍मकार व कहानीकार महिलाओं के सशक्तिकरण की पैरोकारी कर रहे हैं। वे घिस चुके तर्क ‘यही चलता है’ को ठेंगा दिखा रहे हैं।

-कलाकार को जब कमर्शियल स्‍वीकृति मिल जाए तो उसे आगे किस किस्‍म की रणनीति अख्तियार करनी चाहिए।
अच्‍छी कहानी व किरदार जिस किसी जॉनर में मिले कर लेनी चाहिए। एक्‍टर की कौम वैसे भी अच्‍छे किरदारों की भूखी होती है। लिहाजा उसे जॉनर का मोहताज नहीं होना चाहिए। जो लोग ऐसा करते हैं, वे घाटे में रहेंगे। ‘गाइड’ अपने पति को छोड़ चुकी विधवा महिला की कहानी थी। वहीदा जी जॉनर के फेर में पड़तीं तो आज यकीनन उन्‍हें मलाल रहता। ‘नीरजा’ आठ हफ्ते तक चली। मैंने ‘मछली जल की रानी’ कर ली थी। वह मेरे कंफर्ट जोन की नहीं थी, मगर मैंने फिर भी की। ‘रांझणा’ लगा था कि लोगों को पसंद नहीं आएगी, पर उसकी वजह से मुझे ‘प्रेम रतन धन पायो’ मिल गई। अच्‍छी कहानी की परख बेहद जरूरी है। अब तो कमर्शियल फिल्‍मों की परिभाषा भी बदल गई है। टिपिकल जन रुचि की फिल्‍में भी जरूरी हैं। मुझे जितनी ज्‍यादा लोकप्रियता ‘प्रेम रतन धन पायो’ से मिली, उतनी ‘ लिसेन अमाया’ से नहीं मिली, जबकि वह भी मेरे दिल के उतनी ही करीब थी। मुझे ‘तनु वेड्स मनु’ ढेर सारी ‘लिसने अमाया’, ‘आरावाली अनारकली’ और ‘नील बटे सन्‍नाटा’ दे रही है।

-आप पॉलिटिकली करेक्‍ट नहीं हैं। अब तक बेबाक बोलती रही हैं, जबकि वैसी बयानबाजी से हाल में एक बड़ी फिल्‍म को नुकसान हुआ है। आप आगे कैसे रहने वाली हैं।

जी हाल में जेएनयू मुद्दे पर मैं बड़ी मुखर रही हूं। हालांकि आनंद एल राय सर  और अश्विनी ने मुझे रोका नहीं। मजाक-मजाक में इतना भर कहा, ‘तू हमारी फिल्‍म टैक्‍स फ्री तो करवा नहीं रही, ऊपर से कहीं उसे बैन न कर दिया जाए।‘ मुझे धक्‍का तब लगा, जब मुझे प्रतिबंधित करने के कॉल आने लगे। मैं ‘रंगोली’ कर रही हूं तो वहां भी अधिकारियों को फोन गए कि यह तो देशद्रोही है। इससे आप लोग कैसे कार्यक्रम होस्‍ट करवा रहे हैं। इतना ही नहीं मुझे नेशनल अवार्ड की सूची से भी बाहर करने की खबरें हैं। तो मुझे डर लगा है, पर भय के मौजूदा  माहौल से संस्‍थानों व फिर आर्ट का कबाड़ा करना गलत है। यह माहौल देश के सुनहरे भविष्‍य पर प्रश्‍नचिन्‍ह लगा सकता है।   

Friday, April 15, 2016

फिल्‍म समीक्षा : फैन




फैन
**** चार स्‍टार पहचान और परछाई के बीच

-अजय ब्रह्मात्‍मज
यशराज फिल्‍म्‍स की फैन के निर्देशक मनीष शर्मा हैं। मनीष शर्मा और हबीब फजल की जोड़ी ने यशराज फिल्‍म्‍स की फिल्‍मों को नया आयाम दिया है। आदित्‍य चोपड़ा के सहयोग और समर्थन से यशराज फिल्‍म्‍स की फिल्‍मों को नए आयाम दे रहे हैं। फैन के पहले मनीष शर्मा ने अपेक्षाकृत नए चेहरों को लेकर फिल्‍में बनाईं। इस बार उन्‍हें शाह रुख खान मिले हैं। शाह रुख खान के स्‍तर के पॉपुलर स्टार हों तो फिल्‍म की कहानी उनके किरदार के आसपास ही घूमती है। मनीष शर्मा और हबीब फैजल ने उसका तोड़ निकालने के लिए नायक आर्यन खन्‍ना के साथ एक और किरदार गौरव चान्‍दना गढ़ा है। फैन इन्‍हीं दोनों किरदारों के रोचक और रोमांचक कहानी है।
मनीष शर्मा की फैन गौरव चान्‍दना की कहानी है। दिल्‍ली के मध्‍यवर्गीय मोहल्‍ले का यह लड़का आर्यन खन्‍ना का जबरा फैन है। उसकी जिंदगी आर्यन खन्‍ना की धुरी पर नाचती है। वह उनकी नकल से अपने मोहल्‍ले की प्रतियोगिता में विजयी होता है। उसकी ख्‍वाहिश है कि एक बार आर्यन खन्‍ना से पांच मिनट की मुलाकात हो जाए तो उसकी जिंदगी सार्थक हो जाए। अपनी इसी ख्‍वाहिश के साथ वह विदाउट टिकट राजधानी से मुंबई जाता है। मुंबई पहुंचने पर वह डिलाइट होटल के कमरा नंबर 205 में ही ठहरता है। आर्यन खन्‍ना के जन्‍मदिन के मौके पर वह आर्यन खन्‍ना से मिलने की कोशिश करता है। उसकी भेंट तो हो जाती है,लेकिन पांच मिनट की मुलाकात नहीं हो पाती। आर्यन खन्‍ना उसे पांच सेंकेंड भी देने के लिए तैयार नहीं है। गौरव चान्‍दना को आर्यन खन्‍ना का यह रवैया अखर जाता है। वह अब बदले पर उतर आता है। यहां से फिल्‍म की कहानी किसी दूसरी फिल्‍म की तरह ही नायक-खलनायक या चूहे-बिल्‍ली के पकड़ा-पकड़ी में तब्‍दील हो जाती है। चूंकि किरदार थोड़े अलग हैं और उनके बीच का झगड़ा एक अना पर टिका है,इसलिण्‍ फिल्‍म रोचक और रोमांचक लगती है।
आर्यन खन्‍ना का किरदार शाह रुख खान की प्रचलित छवि और किस्‍सों से प्रेरित है। आर्यन खन्‍ना किरदार और शाह रुख खान कलाकार यों घुलमिल कर पर्दे पर आते हैं कि दर्शकों का कनेक्‍ट बनता है। शाह रुख खान पर आरोप रहता है कि वे हर फिल्‍म में शाह रुख खान ही रहते हैं। यहां उन्‍हें छूट मिल गई है। यहां तक कि फैन के रूप में आए नए किरदार गौरव चानना को भी इम्‍पोस्‍टर के रूप में शाह रुख खान की ही नकल करनी है। निस्‍संदेह फिल्‍म देखते हुए आनंद मिलता है। शाह रुख खान को बोनते हुए सुनना और उनके निराले अंदाज को देखना हिंदी फिल्‍मों के दर्शकों को बहुत पसंद है। फैन में शाह रुख खान पूरे फॉर्म में हैं और किरदार के मनोभावों को बखूबी निभाते हैं। शाह रुख खान की प्रचलित छवि में में उनका अक्‍खड़पन शामिल है। निर्देशक मनीष शर्मा ने उसे भी उभारा है।
फिल्‍म आरंभ में स्‍टार और फैन के रिश्‍ते को लकर चलती है। हम इस रिश्‍ते के पहलुओं से वाकिफ होते हैं। लेखक एक फैन के मानस में सफलता से प्रेश करते हैं और उसकी दीवानगी को पर्दे पर ले आते हैं। स्‍टार से बिफरने के बाद फैन के कारनामे अविश्‍वसनीय तरीके से नाटकीय और अतार्किक हो गए हैं। गौरव चान्‍दना और आर्यन खन्‍ना के इगो की लड़ाई क्‍लाइमेक्‍स के पहले फैन के पक्ष में जाती है। थोड़ी देर के लिए यकीन नहीं होता कि गौरव चान्‍दना के पास सारे संसाधन कहां से आए कि वह आर्यन खन्‍ना जैसे पावरफुल सुपरस्‍टार से दो कदम आगे चल रहा है। वह आर्यन खन्‍ना को ऐसे मोड़ पर ला देता है कि आर्यन खन्‍ना को लगाम अपने हाथों में लेनी पड़ती है। वह गौरव चान्‍दना को सबक देने के आक्रामक तेवर के साथ निकलता है। हिंदी फिल्‍मों में नेक और खल की लड़ाई व्‍यक्तिगत हो जाती है। फैन उस परिपाटी से अलग नहीं हो पाती। फिर भी मनीष शर्मा को दाद देनी पड़ेगी कि उन्‍होंने हिंदी फिल्‍मों के ढांचे में रहते हुए शाह रुख खान के प्रशंसकों का कुछ नया दिया है।‍
मनीष शर्मा ने इस फिल्‍म के निर्देशन में साहस का परिचय दिया है। उनके साहस को शाह रुख खान कां संबल मिला है। लकीर की फकीर बनी हिंदी फिल्‍मों में जब कुछ नया होता है तो उसे भरपूर सराहना मिलती है। फैन में स्टार और डायरेक्‍टर के संयुक्‍त प्रयास को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दिक्‍कत या शिकायत यह है कि फिल्‍म आरंभ मे जिस तीव्रता,संलग्‍नता और नएपन के साथ चलती है,वह दूसरे हिस्‍से में कायम नहीं रह पाती। कहानी कई वार पुरानी लकीर पर आने या उसे छूने के बाद बिखरने लगती है। हिंदी की ज्‍यादातर फिल्‍मों के साथ इंटरवल के बाद निर्वाह की समस्‍या रहती है।
यह फिल्‍म शाह रुख खान की है। उनकी पॉपुलर भाव-भंगिमाओं को निर्देशक ने तरजीह दी है। उनके बोल-वचन का सटीक उपयोग किया है। फिल्‍म देखते समय कई बार यह एहसास होता है कि हम कहीं शाह रुख खान की बॉयोग्राफी तो नहीं देख रहे हैं। पुराने वीडियो फुटेज और इंटरव्‍यू से आर्यन खन्‍ना में शाह रुख खान का सत्‍व मिलाया गया है। शाह रुख खान के लिए यह फिल्‍म एक स्‍तर पर चुनौतीपूर्ण है,क्‍योंकि उन्‍हें गौरव की भी किरदार निभाना है। गौरव शक्‍ल-ओ-सूरत में आर्यन खन्‍ना से मिलता-जुलता है। शाह रुख खान ने उसे अलग तरीके से पेश किया है। गेटअप और मेकअप से आगे की निकलकर उसकी चाल-ढाल में भिन्‍नता लाने में कठिन अभ्‍यास करना पड़ा होगा। कुछ दृश्‍यों में शाह रुख खान की स्‍वाभाविकता पुरअसर है। यह उनकी आत्‍मुग्‍धता भी लग सकती है। गौरव चान्‍दना और शाह रुख खान की मुलाकात और भिड़ंत के सारे दृश्‍य मजेदार हैं। उन्‍हें आकर्षक लोकेशन पर शूट भी किया गया है।
एक अंतराल के बाद शाह रुख खान की ऐसी फिल्‍म आई है,जिसमें एक कहानी है। उन्‍हें अपनी अभिनय योग्‍यता और क्षमता भी दिखाने का अवसर भी मिला है। साथ ही निर्देशक मनीष शर्मा का स्‍पष्‍ट सिग्‍नेचर है। इस फिल्‍म में भी दिल्‍ली है। यह फिल्‍म पहचान और परछाई के द्वंद्व पर केंद्रित है। मिथक और मिथ्‍या में लिपटी फैन देखने लायक फिल्‍म है।
अवधि-143 मिनट
स्‍टार- चार स्‍टार