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Friday, July 20, 2018

दरअसल : ‘धड़क’ में ‘सैराट’ की धड़कन



दरअसल
धड़कमेंसैराटकी धड़कन
- अजय ब्रह्मात्मज

दो साल पहले नागराज मंजुले की मराठी फिल्मसैराटआई थी.किसी आम मराठी फिल्म की तरह रिलीज हुई सैराट कुछ ही दिनों में खास फिल्म बन गई. विशेष कर मुंबई में  इसकी बेहद चर्चा हुई. फिल्म बिरादरी और फिल्म प्रेमी समाज में  उन दिनों एक ही जिज्ञासा थी किआपने सैराट देखी क्या?’ फिल्म की सराहना और कमाई से अभिभूत गैरमराठी दर्शकों ने भी यह फिल्म देखी. हर साल एक-दो ऐसी मराठी फिल्में आ ही जाती हैं,जिनकी राष्ट्रीय चर्चा होती है. सिनेमा के भारतीय  परिदृश्य में मराठी सिनेमा की कलात्मक धमक महसूस की जा रही है. सैराट कलात्मक होने के साथ व्यावसायिक सफलता हासिल कर सभी को चौंकाया. यह अधिकतम व्यवसाय करने वाली मराठी फिल्म है.
सैराटकी लोकप्रियता और स्वीकृति से प्रभावित निर्माताओं ने इसे अन्य भारतीय भाषाओं में रीमेक किया.यहा अभी तक कन्नड़,उड़िया, पंजाबी और बंगाली में बन चुकी है. हिंदी में यहधड़कनाम से रिलीज हो रही है.धड़कके निर्माता  करण जोंहर हैं. इसके निर्देशक शशांक खेतान हैं,जिन्होंने करण जौहर के लिए दुल्हनिया सीरीज  में दो सफल लव स्टोरी फिल्में निर्देशित की हैं. उन्हें लव स्टोरी रोमांटिक फिल्मों का नया उस्ताद माना जा रहा है.
शशांक की अपनी खूबियां हैं जो उन्हें पिछली संगतों और पढ़ाई से मिली है. आदित्य चोपड़ा कीदिलवाले  दुल्हनिया ले जाएंगेके मुरीद शशांक खेतान की सिनेमाई समझ मैं सुभाष घई, नसीरुद्दीन शाह और करण जौहर की सीख और शैली का स्पष्ट असर है. इस अवसर में उनकी फिल्में मेनस्ट्रीम ढांचे में रहते हुए रियलिस्ट फील देती हैं.निश्चित ही उनकी इस खूबी को ध्यान में रखकर ही करण जौहर ने उन्हेंसैराटको हिंदी में लिखने और बनाने की मंजूरी दी होगी.
करण जौहर खास किस्म के फिल्मकार हैं.कुछ कुछ होता हैसे लेकरऐ दिल है मुश्किलमें अपने विषयों के चुनाव और निर्वाह  उनकी अलग रूमानी छवि बनी है.  उनके व्यक्तित्व और व्यवहार में  रूमानियत झलकती है. ऐसा  लग सकता है और लगता  भी है  कि जिंदगी की कठोर सच्चाइयों से करण जौहर का कोई वास्ता नहीं है इसलिए उनकी फिल्मों में वास्तविकता की गुंजाइश नहीं बनती है.किन्तु गौर करें तो बतौर निर्माता  करण जौहर नई कथाभूमियों की तलाश में दिखते हैं. हिंदी में सरकार बनाने का फैसला इसी तलाश का सबूत है. वे भिन्न सोच के निर्देशकों को मौके देते रहे हैं.धड़ककी घोषणा के समय से ही या आशंका व्यक्त की जा रही है की क्या उसमें  सैराटकी धड़कन होगी?
इस फिल्म के ट्रेलर पर मिक्स रिएक्शन आए.सैराटखोज रहे प्रशंसकों को घोर निराशा हुई, लेकिन नई फिल्म के तौर परधड़क' को देख रहे दर्शकों ने तारीफ की. इसके ट्रेलर और गानों को उन्होंने खूब पसंद किया. दरअसल,हम भारतीय किसी भी प्रकार की तुलना में गहरी रुचि और आनंद लेते हैं. पहले और पुराने की तुलना में नए की निंदा और आलोचना करना हमारा प्रिय शगल है. धोने,गिराने और कूटने में हमें मज़ा आता है.हमें आशंका रहती है कि नई फिल्म में पुरानी फिल्म जैसी  बात हो ही नहीं सकती.और फिर सैराट ने तो सफलता और सराहना का कीर्तिमान रचा है. भलाधड़कउसे दोहरा पाएगी?
हिंदी फिल्मों के इतिहास में हर पांच-आठ सालों के बाद आई लव स्टोरी  ने नया ट्रेंड शुरू किया है.बॉबी'(1973),’लव स्टोरी'(1981),’एक दूजे के लिए'(1981),’क़यामत से कयामत तक'(1988) औरमैंने प्यार किया’(1989) का उदहारण हमारे सामने है.इधर लम्बे समय से कपि प्रेमकहानी नहीं आई है,खासकर टीनएज उम्र की लव स्टोरी.इस बार तो ईशान खट्टर और जान्हवी कपूर दो नए चेहरे इस फिल्म के साथ लांच हो रहे हैं.मुझे लगता है किधड़क' देखते समयसैराटका चश्मा नहीं लगाना होगा.फिर हमेंधड़क' की धड़कन सुनाई देगी.

Wednesday, July 18, 2018

सिनेमालोक : कहाँ गए सिनेमाघर?


सिनेमालोक
कहाँ गए सिनेमाघर?
-अजय ब्रह्मात्मज  

मधुबनी के जिस होटल में ठहरा हूं,उसके मैनेजर से मैंने पूछा कि क्या उन्होंने संजू देखी है? उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया,'जी देखी है।पिछले हफ्ते जमशेदपुर गया था तो वहां प्रकाश झा के नए मल्टीप्लेक्स में मैंने राजकुमार हिरानी की 'संजू' देखी।' इस सामान्य से जवाब से मैं थोड़ा हैरान हुआ। मेरा अगला सवाल था, 'क्यों,मधुबनी में देखने का मौका नहीं मिला या यहां यह फ़िल्म नहीं लगी है?' उनका जवाब था, 'फिल्म लगने के लिए सिनेमाघर चाहिए। मधुबनी का आखिरी सिनेमाघर शंकर टॉकीज अभी पिछले दिनों बंद हो गया। कभी इस शहर में तीन सिनेमाघर थे। सभी में भीड़ उमड़ती थी। अभी तीनों सिनेमाघर बंद पड़े हैं।सुना है जल्दी ही एक मल्टीप्लेक्स बनने वाला है।

मधुबनी शहर में चार मॉल आ गए हैं। इनमें पॉपुलर ब्रांड के कपड़े और दूसरे उपभोक्ता सामान मिलते हैं। मैंने शहर के कुछ युवकों से बात की कि आखिर वे फिल्में कैसे देखते हैं? उनसे पता चला कि शहर के सिनेमा प्रेमियों का सहारा स्मार्टफोन है। कोई भी फिल्म रिलीज हो। वह गैरकानूनी तरीके से बाजार में आ ही जाती है। चंद रुपयों में वह मोबाइल में लोड कर ली जाती है और फिर दोस्तों के बीच बंटती है। जिन शहरों और कस्बों में सिनेमाघर नहीं हैं,वहां यही तरीका अपनाया जा रहा है। थिएटर सम्पन्न शहरों के दर्शकों की तरह सिनेमाघरों से वंचित शहरों के दर्शकों भी पहले हफ्ते में ही फ़िल्म देखने का तरीका खोज चुके हैं। क्या वितरक और प्रदर्शक इस तरफ ध्यान दे रहे हैं? निर्माताओं की यह चिंता रहती है कि वे कैसे देश के अधिकांश दर्शकों तक पहुंचें? उन्हें मालूम तो है कि देश उनकी फिल्में देख रहा है,लेकिन पैसे उन तक नहीं पहुंच रहे हैं।

छोटे शहरों और कस्बों से आये 40 से अधिक उम्र के पाठक बता सकते हैं कि उनके बचपन को चलती-फिरती तस्वीरों से मुग्ध करने के ठिकानों पर अब कोई चहल-पहल नहीं है। ना तो समाजशास्त्रियों और ना फ़िल्म व्यवसाय से जुड़े व्यक्तियों ने कम और खत्म होते सिनेमाघरों के कारणों का अध्ययन किया और ना कहीं यह चिंता है कि देश के तमाम दर्शकों तक फिल्में कैसे पहुंचे? लगातार आंकड़े आ रहे हैं कि जिस तेजी से सिनेमाघर बैंड हो रहे हैं,उसी रफ्तार से मल्टीप्लेक्स नहीं खुल रहे हैं। पहले फिल्मों देखने के लिए आसपास के कस्बों और शहरों की यात्रा होती थी। कोई फ़िल्म लोकप्रिय हो जाती थी तो पूरा परिवार फिल्में देखने जय करता था।

 मधुबनी शहर में ही 'नदिया के पार' देखने के लिए आसपास के गांवों से परिवार बैलगाड़ियों में लद कर आये थे। आठवें दशक के आरंभ में फारबिसगंज के वार्षिक मेले ऐसे पारिवारिक जत्थों को मैंने टेंट सिनेमा में फिल्में देखते देखा है। अभी दर्शकों का प्रोफाइल और मिजाज बदल गया है। पहले वीडियो और फिर सीडी-डीवीडी ने दर्शकों को सुविधा दी कि वे बगैर सिनेमाघर गए फिल्मों का आनद टीवी या कंप्यूटर पर  उठा सकते हैं। उसके बाद स्मार्ट फोन और पेन ड्राइव व यूएसबी ने ऐसी सहूलियत दी कि रही-सही उम्मीद भी खत्म हो गयी। सिनेमाघरों के दर्शक कम होने और सिनेमाघर खत्म होने की प्रक्रिया लगभग साथ चली। 

फिलहाल ज्यादातर सिंगल स्क्रीन बंद हो चुके हैं या बंद होने की कगार पर हैं। उनकी जगह भरने के लिए मल्टीप्लेक्स का विकल्प लागत,प्रचलन और मुनाफे के लिहाज से कस्बों के लिए मुनासिब नहीं है। एक रास्ता छोटे सिंगल स्क्रीन का है। उस तरफ उद्यमियों का ध्यान नहीं है। बीच में सुगबुगाहट हुई थी। कुछ नए वेंचर उभर रहे थे कि वर्तमान सरकार के आर्थिक फैसलों और अधिकतम कर बटोरने की मंशा ने योजनाओं का बंटाधार कर दिया। फ़िल्म इंडस्ट्री इस साल लाभ दिखा रही है। उसी अनुपात में सरकार भी फायदे में रहेगी,लेकिन मनोरंजन कर के रूप में वसूली गयी रकम भी सिनेमा के वितरण और प्रदर्शन को दर्शकों के अनुरूप करने का प्रयास नहीं दिखता। नतीजतन सिनेमाघर निरंतर गायब होते जा रहे हैं।


Friday, July 13, 2018

फिल्म समीक्षा : सूरमा


फिल्म समीक्षा
सूरमा
प्रेरक ज़िन्दगी और फिल्म
-अजय ब्रह्मात्मज

सूरमाअर्जुन अवार्ड से सम्मानित हॉकी खिलाडी संदीप सिंह के जीवन पर आधारित शाद अली निर्देशित फिल्म है. इसमें दिलजीत सिंह ने संदीप सिंह की भावपूर्ण और ओजपूर्ण भूमिका निभाई है. संदीप सिंह हॉकी के नामी खिलाड़ी रहे हैं.यह फिल्म उनकी जिंदगी और खेत न्याय उतार चढ़ाव को पूरी संजीदगी के साथ दिखाती हैं खिलाड़ियों पर बन रहे बायोपिक का भी धीरे-धीरे एक फार्मूला बनता जा रहा है. यह फिल्म भी उस फार्मूले से अंशतः प्रभावित है.

हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के शाहाबाद गांव के गुरुचरण सिंह औरदलजीत कौर के छोटे बेटे संदीप सिंह स्थानीय कोच से आतंकित होकर हॉकी खेलना छोड़ देता है. उसका भाई बिक्रमजीत हॉकी का अभ्यास जारी रखता है और राष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी बनता है.इस बीच संदीप सिंह अपने ताऊ के खेतों में चिड़िया भगाने के लिए हॉकी स्टिक और गेंद का इस्तेमाल करता है अनजाने में वह बहुत साधा हुआ फ्लिकर बन जाता है.  पड़ोस की हरप्रीत उसे बहुत पसंद है. वह भी हॉकी खेलती है. संदीप उसके खेल से प्रभावित होकर और उसे लुभाने के लिए हॉकी खेलना शुरू करता है.

शुरू में हॉकी की तरफ आकर्षित होने के संदीप सिंह के पास दो कार है एक तो वह प्रीत की नजरों में आना चाहता है और दूसरे इंडिया टीम में भाई के ना चुने जाने पर वह  हॉकी टीम में शामिल होने की कोशिश करता है.कठिन अभ्यास से वह अपनी टीम का अच्छा डिफेंडर और ड्रैग फ्लिकर बन जाता है. राष्ट्रीय टीम में उसका चुनाव होता है. अपनी टीम के साथ जर्मनी से आने के लिए वह ट्रेन से दिल्ली जा रहा होता है कि अचानक एक गोली चलती है हंसता खेलता संदीप सिंह जख्मी हो जाता है.अस्पताल पहुंचने पर मालूम होता है कि वह कमर के नीचे लाचार हो चुका है वह अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सकता हॉकी खेलना तो दूर की बात है.

चलो यहां से नाटकीय मोड़ लेती है सूखे संदीप सिंह की कहानी सबको मालूम है और सभी जानते हैं कि वह अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति से ना केवल पैरों पर खड़े हुए,बल्कि फिर से नेशनल टीम में चुने गए उन्होंने टीम का नेतृत्व किया वर्ल्ड कप जीत कर भारत लौटे.सूरमाइसी जीवट के  खिलाड़ी संदीप सिंह के जोश और इरादे का खूबसूरत चित्रण करती है. फिल्म में अति भावुकता कहीं-कहीं खटकती है,लेकिन भारतीय दर्शकों को प्रेम और परिवार की ऐसी भावुकता पसंद आती है. फिल्म बहुत अच्छे तरीके से दिखाती है कि किसी एक के ऊपर मुसीबत आने पर कैसे पूरा परिवार उसकी मदद में खड़ा होता है.सूरमा' टिपिकल इंडियन फैमिली फिल्म भी है.

संदीप सिंह का किरदार दिलजीत दोसांझ ने निभाया है. उनकी प्रेरणा और प्रेमिका हरप्रीत की भूमिका में तापसी पन्नू है. पंजाबी परिवेश के दोनों कलाकार पंजाबी चरित्रों में आसानी से घुल गए हैं. दिलजीत की मासूमियत संदीप के किरदार को मजबूत करती है. इस फिल्म के लिए उन्होंने हॉकी का भी अभ्यास किया है इसलिए कभी किरदार से बाहर जाते नहीं दिखाई पड़ते हैं. फिल्म के नाटकीय और घटनापूर्ण दृश्यों में और एकाग्रता देखते ही बनती है. दिलजीत दोसांझ को अभी तक फिल्मी भूमिकाओं के लिए न तो पगड़ी खोलनी पड़ी है और ना बाल-दाढ़ी छोटे करने पड़े हैं.
तापसी पन्नू सरदार है इस परिवेश के लड़कियों को वह विश्वसनीय तरीके से निभाती हैं. हरप्रीत के किरदार में उन्होंने आज साज-संवार का  मोहनी किया है. हॉकी खेलने के दृश्यों में वह जंची हैं.बड़े भाई विक्रमजीत की भूमिका में अंगद बेदी दिल जीत लेते हैं. उन्होंने पूरी संजीदगी से इसे निभाया है. लेखक-निर्देशक की तरफ से उन्हें कुछ अच्छे दृश्य भी मिले हैं. छोटी भूमिका में सतीश कौशिक एक साथ भावुक और दृढ दिखे हैं.तारों में आए कलाकार भी फिल्में जरूरत के मुताबिक उसने को जोड़ते हैं.सूरमा' में दो कोच हैं.दोनों का किरदार प्रहसनकारी.है.उनके संवाद व्यवहार फिल्में छिटपुट हंसी बिखेरते हैं.

सूरमाप्रेरक फिल्म है यह देखी जानी चाहिए.एक नई तरह की कहानी कहने में शाद अली सफल रहे हैं.
अवधि - 131 मिनट
.**** चार स्टार


Tuesday, July 10, 2018

सिनेमालोक : बेहतरीन प्रयास है ‘सेक्रेड गेम्स’


सिनेमालोक

बेहतरीन प्रयास हैसेक्रेड गेम्स

-अजय ब्रह्मात्मज
अश्वत्थामा,हलाहल,अतापी वतापी,ब्रह्मास्त्र सरम,प्रेतकल्प,रूद्र और ययाति… यह नेटफ्लिक्स पर आरंभ हुए सेक्रेड गेम्स के 8 अध्याय हैं. इन्हें हम 8 एपिसोड के रूप मे देखेंगे.सेक्रेड गेम्स’  विक्रम चंद्रा का उपन्यास है. यह 2006 में प्रकाशित हुआ था. 900 से अधिक पृष्ठों के इस उपन्यास को वरुण ग्रोवर,वसंत नाथ और स्मिता सिंह ने वेब सीरीज के रूप में ढाला है. रूपांतरण की प्रक्रिया लंबी और श्रमसाध्य रही. तीनों लेखकों ने वेब सीरीज के लिए उचित प्रसंगों,किरदारों और विवरणों में काट-छांट की है. कुछ घटाया है तो कुछ जोड़ा भी है. दरअसल, अभिव्यक्ति के दो भिन्न माध्यम होने की वजह से यह रूपांतरण जरूरी हो जाता है. उपन्यास पढ़ते वक्त हम लेखक के विवरणों के आधार पर दृश्य और किरदारों की कल्पना करते हैं. लेखक शब्दों के माध्यम से स्थान,माहौल और चरित्रों का चित्रण करता है. वह पाठक की कल्पना को उड़ान देता है. लेखक और पाठक के बीच कोई तीसरा नहीं होता. इससे भिन्न दृश्य माध्यम में उस उपन्यास को एक लेखक स्क्रिप्ट में बदलता है और फिर निर्देशक अपनी तकनीकी टीम की मदद से स्थिति एवं मनःस्थिति को दृश्य और संवाद में बदलता है. दृश्य माध्यम दर्शकों की कल्पना कतर देता है. दर्शक पर्दे पर सब कुछ देख रहा होता है और संवादों से चरित्रों का व्यवहार समझ रहा होता है.

साहित्य और सिनेमा के जटिल रिश्ते पर बहुत कुछ लिखा गया है. प्रायः सुनाई पड़ता है कि लेखक निर्देशक के काम से असंतुष्ट रहे. कहा जाता है कि दृश्य माध्यम में साहित्य की आत्मा को खो जाती है.सेक्रेड गेम्सउपन्यास पढ़ चुके पाठकों को वेब सीरीज देखते हुए ऐसी दिक्कत हो सकती है. इसके लेखकों और निर्देशकों ने उपयोगिता और सुविधा के अनुसार फेरबदल किए हैं. इस फेरबदल में विक्रम चंद्रा की सहमति रही है, लेकिन पाठक असहमत हो सकते हैं. किसी भी रूपांतरण में माध्यमों की भिन्नता की वजह से स्वभाविक रुप स कुछ चीजें खो या जुड़ जाती हैं. पाठक और दर्शकों के लिए बेहतर तो यही होता है कि हर माध्यम का अलग आनंद लें, क्योंकि रसास्वादन की प्रक्रिया माध्यमों के हिसाब से बदल जाती है. ;सेक्रेड गेम्स; उपन्यास औरसेक्रेड गेम्सवेब सीरीज दो भिन्न सृजनात्मक कृतियां हैं. उपन्यास विक्रम चंद्रा ने लिखा है, जबकि वेब सीरीज के सृजन में लेखकों और निर्देशकों के साथ पूरी तकनीकी टीम रही है. वेब सीरीज उन सभी का सम्मिलित प्रयास है.

विक्रमादित्य मोटवानी और अनुराग कश्यप अलग शैली और सोच के निर्देशक हैं. दोनों के युगल प्रयास और सामंजस्य का खूबसूरत उदाहरण हैसेक्रेड गेम्स. इसके दो मुख्य किरदार हैं - गणेश गायतोंडे और सरताज सिंह. सूचना के मुताबिक गणेश गायतोंडे के ट्रैक का निर्देशन अनुराग कश्यप ने किया है. वह ऐसी कहानियों को पर्दे पर लाने में माहिर हैं. हिंसा,अपराध और अंडरवर्ल्ड की काली दुनिया रचने में उनका मन रमता है. समाज के वंचित और वर्जित किरदार उन्हें प्रिय रहे हैं. इस सीरीज में उन्होंने जी गैंग के सरगना गणेश गायतोंडे की मानसिकता,चिंता और महत्वकांक्षा पर रोशनी डाली है. वह खतरनाक अपराधी है. दूसरी तरफ ईमानदार पुलिस अधिकारी सरताज सिंह है. गणेश गाय गायतोंडे ने पहले ही एपिसोड में सरताज सिंह को सूचना देने के साथ चुनौती भी दे दी है. पहले तो वह अपने लौटने की सूचना देता है, सरताज सिंह जब तक उसके पास पहुंचे गणेश गायतोंडे खुद को ही गोली मार देता है. मरने से पहले वह सरताज सिंह को बता चुका है कि 25 दिनों में बचा सकते हो तो मुंबई को बचा लो. उसकी यह चेतावनीसेक्रेड गेम्सका रोचक और रोमांचक ड्रामा रचती ह

नेटफ्लिक्स पर ओरिजिनल इंडियन कंटेंट के तौर पर सेक्रेड गेम्स का प्रसारण एक नई शुरुआत है. पहली बार किसी भारतीय शो को एक साथ 100 से अधिक देशों के दर्शक मिले हैं. यह एक बड़ी उपलब्धि है. अभी तक हम दुनिया के शो देखते-सराहते रहे हैं. अब दुनिया भी भारतीय कंटेंट देखेगी. दृश्य माध्यम में काम कर रहे हैं लेखकों, निर्देशकों और कलाकारों को बड़ा अवसर मिला है.फिलहालसेक्रेड गेम्सदेखें और फिर उसकी खूबियों और खामियों पर चर्चा करें.