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Thursday, February 2, 2012

अनुष्का शर्मा को भविष्य की चिंता नही

अनुष्का को भविष्य की चिंता नहीयुवा अभिनेत्रियों की शाश्वत मुश्किल है कि हर प्रकार की सफलता हासिल करने के बाद भी वे खुश नहीं हो पातीं। मन में क्षोभ और लोभ रहेगा तो वह चेहरे से भी जाहिर होगा। अभिनय की दुनिया में आए सभी व्यक्तियों को अनुष्का से मुस्कराहट का मंत्र लेना चाहिए।

मॉडलिंग में दिलचस्पी

मूलत: उत्तराखंड की अनुष्का शर्मा की पढाई-लिखाई बंगलौर में हुई। किशोर उम्र में ही मॉडलिंग में उनकी रुचि बनी। वह रैंप पर उतरीं। पहचान बनी तो मॉडलिंग करने लगी। आरंभ में लाइमलाइट में आने पर भी फिल्मों में आने का इरादा नहीं था। संयोग से एक बार फिल्म जगत में आ गई तो अब अनुष्का का जाने का इरादा भी नहीं है। अनुष्का अछी तरह जानती हैं कि वह एक ऐसी इंडस्ट्री में अपनी पहचान हासिल करने की कोशिश में हैं, जहां एक फिल्म की असफलता भी नेपथ्य में भेज देती है। यह कहना जल्दबाजी होगी कि अनुष्का ने दर्शकों और निर्देशकों की नजरों में रहने का गुर सीख लिया है। 2008 से अभी तक के करियर में समान संख्या में हिट और फ्लॉप फिल्में दे चुकी अनुष्का को भविष्य की अधिक चिंता नहीं है। अभी उनके पास यश चोपडा और विशाल भारद्वाज की फिल्में हैं।

मिली खास पहचान

अनुष्का की शुरुआत या लॉन्चिंग से किसी भी नई अभिनेत्री को ईष्र्या हो सकती है। रब ने बना दी जोडी में एक साथ तीन सुनहरे अवसर मिले। सबसे पहले तो यशराज फिल्म्स, फिर शाहरुख खान और अंत में आदित्य चोपडा का निर्देशन पहली फिल्म ने उन्हें खास पहचान दी। उन्हें अपनी पहली फिल्म में ही दो-दो शाहरुख खान के साथ काम करने का मौका मिला। बैंड बाजा बारात से वह आम दर्शकों की पसंद बन गई। रणवीर सिंह के साथ उनकी जोडी भी बन गई। उनकी अगली फिल्म शाहरुख खान के साथ होगी। इसके अलावा विशाल भारद्वाज ने उन्हें मटरू की बिजली का मनडोला के लिए चुना है। इस फिल्म में वह मनडोला इमरान खान के साथ बिजली की भूमिका में दिखेंगी। इन दिनों इस फिल्म की वर्कशॉप चल रही है। विशाल भारद्वाज शूट पर जाने के पहले अनुष्का को बिजली में ढाल देना चाहते हैं। अनुष्का भी इसके लिए तैयार हैं। खबर है कि इस वर्कशॉप पर ध्यान देने के लिए ही उन्होंने अवार्ड समारोहों के मौसम में स्टेज परफॉर्मेस के लिए हां नहीं किया, जबकि दो-चार परफॉर्मेस से पैसे और चर्चा दोनों का लाभ होता।

भर देती हैं जोश से

गौर करें तो अनुष्का अभी ऐड फिल्मों और प्रोडक्ट एंडोर्समेंट में भी काफी सक्रिय हैं। टीवी से प्रसारित उनके विज्ञापनों में एक तत्व की समानता है। वह अपने सभी ऐड में अभिनय करती नजर आती हैं। उनके लिए ऐसी स्क्रिप्ट लिखी जाती है कि उनके परफॉर्मेस की क्षमता का उपयोग हो। वह लगातार साबित कर रही हैं कि उन पर भरोसा किया जा सकता है। बाजार का उनमें विश्वास बढा है। लेडीज वर्सेस रिकी बहल के गीत जगा ले जल्बा में झूमती और अपनी खुशी के लिए कदम उठाने का आह्वान करती अनुष्का दर्शकों को जोश से भर देती हैं। उनकी स्फूर्ति संक्रामक है। पर्दे से उसका वायरस दर्शकों तक पहुंचता है। यही वजह है कि वह अपनी पीढी की अभिनेत्रियों में दर्शकों की चहेती बनी हुई हैं।

Wednesday, February 1, 2012

ऑन स्‍क्रीन ऑफ स्‍क्रीन : रिश्तों के इर्द-गिर्द घूमती हैं करण जौहर की फिल्में

रिश्तों के इर्द-गिर्द घूमती हैं करण जौहर की फिल्में-अजय ब्रह्मात्‍मज

युवा फिल्मकारों में करण जौहर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के प्रतिनिधि चेहरे हैं। अपने व्यक्तित्व और फिल्मों से उन्होंने खास जगह हासिल की है। हिंदी फिल्मों की शैलीगत विशेषताओं को अपनाते हुए उसमें नए लोकप्रिय तत्व जोडने का काम उन्होंने बहुत खूबसूरती से किया है। वे एक साथ शर्मीले और मुखर हैं, संकोची और बेधडक हैं। स्पष्ट और गूढ हैं। खुशमिजाज और गंभीर हैं। विरोधी गुणों और पहलुओं के कारण वे एक ही समय में जटिल और सरल नजर आते हैं। व्यक्तित्व के इस द्वैत की वजह से उनमें अद्भुत आकर्षण है। वे यूथ आइकन हैं। वे देश के एकमात्र लोकप्रिय निर्देशक हैं, जिनकी लोकप्रियता और स्वीकृति किसी स्टार से कम नहीं है।

सुरक्षित माहौल की परवरिश

लोकप्रियता और स्वीकृति के इस मुकाम तक पहुंचने में करण जौहर की लंबी यात्रा रही है। यह यात्रा सिर्फ उम्र की नहीं है, बल्कि अनुभवों की सघनता सामान्य व्यक्ति को सलेब्रिटी बनाती है। करण जौहर ने खुद को गमले में लगे सुंदर पौधे की तरह ढाला है, जो धरती और मिट्टी से जुडे बिना भी हरा-भरा और खिला रहता है। महानगरों के सुरक्षित माहौल में पले-बढे सलेब्रिटी की आम समस्या है कि वे ज्ञानी, अनुभवी और प्रतिभासंपन्न होने के बावजूद अपने समाज और देश की वास्तविक आकांक्षाओं से थोडे कटे होते हैं।

करण जौहर 21वीं सदी के उत्तर आधुनिक दौर के सलेब्रिटी हैं, इसलिए उनकी सीमाएं स्पष्ट हैं। वे अपनी प्रगल्भता से इन सीमाओं को जाहिर नहीं होने देते।

सच और झूठ की दुविधा

करण के व्यक्तित्व में दोहरापन है। बचपन से वे सच और झूठ की दुविधा में जी रहे हैं। उनके खंडित व्यक्तित्व की शुरुआत स्कूल के दिनों से होती है। वे जिस स्कूल में पढते थे, वहां उनके सहपाठियों में से कोई भी हिंदी फिल्मों की बातें नहीं करता था। हिंदी फिल्में हीन समझी जाती थीं। लिहाजा करण ने अपने पिता की गलत पहचान दी थी। उन्होंने सहपाठियों को बता रखा था कि उनके पिता एक्सपोर्टर हैं। करण जौहर जब नौवीं कक्षा में थे तो उनके पिता की फिल्म मुकद्दर का फैसला की होर्डिग महालक्ष्मी में लगी। करण के सहपाठियों ने होर्डिग में जौहर का नाम देखा तो करण से पूछना शुरू किया, यश जौहर तो तुम्हारे पिता का नाम है न? क्या ये तुम्हारे पिता हैं? करण साफ मुकर गए। उन्होंने कहा, मेरे पिता तो एक्सपोर्टर हैं। हिंदी फिल्मों के निर्माण से उनका कोई रिश्ता नहीं है।

हिंदी फिल्मों से दूरी

उन दिनों करण दक्षिण मुंबई में रहते थे। सितारों के बेटे-बेटियों की बर्थडे पार्टी में वे कभी-कभार जुहू आते थे। जुहू में उनकी मुलाकात आदित्य चोपडा, अभिषेक बच्चन और उनकी बहन श्वेता से होती थी। इन पार्टियों से करण बहुत खुश नहीं होते थे। वे झल्ला कर घर लौटते थे और अपनी मां से कहते थे कि उन्हें जुहू न भेजा करें। जुहू की पार्टियों में केवल हिंदी फिल्मों की बातें होती हैं और वे लोग हिंदी में बातें करते हैं। हिंदी और हिंदी फिल्मों से बैर भाव के बावजूद करण को अमिताभ बच्चन की सिलसिला बहुत अच्छी लगी थी। स्कूल से लौटने के बाद वे सिलसिला देखा करते थे। उन्होंने कभी यह बात भी स्वीकार की थी कि कम से कम 40 बार उन्होंने यह फिल्म देखी है। फिल्मी माहौल, फिल्मी परिवार और फिल्मी दोस्तों की संगत का अप्रत्यक्ष असर उन पर पड रहा था। वह अंदर ही अंदर अंकुरित हो रहा था। इसका एहसास स्वयं करण को भी नहीं था।

इरादा तो कुछ और था

करण ने स्कूल की पढाई खत्म करने के बाद फ्रांसीसी भाषा सीखी। उनका इरादा मास कम्युनिकेशन की पढाई करके पत्रकार बनने का था। वे इसकी तैयारी कर चुके थे। पेरिस के एक इंस्टीट्यूट में प्रवेश भी मिल गया था। इस बीच एक क्रिएटिव संयोग हुआ। कॉलेज के दिनों में ही आदित्य चोपडा से नजदीकियां बढ गई थीं। दोनों मिलते थे और हिंदी फिल्मों की बातें किया करते थे। साथ में हिंदी फिल्में देखते थे। एक दिन आदित्य चोपडा ने उन्हें फोन किया कि उन्होंने एक फिल्म की कहानी सोची है और उसे वे करण को सुनाना चाहते हैं। तब करण मालाबार हिल में रहते थे। आदित्य चोपडा ने उन्हें दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे की कहानी सुनाई। कहानी करण को अच्छी लगी। इस फिल्म की स्क्रिप्ट पर दोनों लगातार बातें करते रहे। करण अपना इनपुट देते रहे और आदित्य करण की सलाह पर गौर करते रहे। तीन-चार हफ्तों तक चले इस सिलसिले के बाद आदित्य चोपडा ने करण के सामने प्रस्ताव रखा कि वह फिल्म के साथ अभिन्नता से जुडे हैं। इस फिल्म के निर्देशन में वह आदित्य को असिस्ट करें। अब करण के चौंकने की बारी थी। उनका जवाब था, हिंदी फिल्म और मैं, नो वे। मैं तो हिंदी फिल्मों के बारे में सोच ही नहीं सकता। मेरे अंदर वह बात ही नहीं है। आदित्य ने फिर भी करण को राजी किया। जब करण के पिता यश जौहर को यह बात पता चली तो उन्होंने कहा कि अच्छा होगा कि करण यश चोपडा को असिस्ट करें। बहरहाल, करण ने तय किया कि वे आदित्य को असिस्ट करेंगे। हिंदी फिल्मों को एक साल देंगे। अगर कोई राह निकलती है तो ठीक, अन्यथा लौट आएंगे।

हिंदी फिल्मों का नशा

हिंदी फिल्मों का नशा गोंद की तरह चिपकता है। इनके भंवर में फंसने पर कोई भी पार नहीं निकलता। करण जौहर के साथ वही हुआ। पहले असिस्टेंट और फिर स्वतंत्र निर्देशक के तौर पर उन्होंने पहचान बनाई। पहली ही फिल्म से अपना सिक्का जमाया। बाद में वे सफल प्रोड्यूसर बने। उनका करियर ग्राफ आदित्य चोपडा के समानांतर विकसित होता गया। यशराज फिल्म्स और धर्मा प्रोडक्शन के विस्तार और विकास का अध्ययन फिल्म इंडस्ट्री का रोचक अध्ययन हो सकता है। आदित्य चोपडा और करण जौहर के योगदान से उनकी कंपनियां आज देश की प्रमुख प्रोडक्शन कंपनियां बन चुकी हैं। दोनों बैनरों में नए निर्देशकों और फिल्म निर्माण से संबंधित अन्य प्रतिभाओं को मौके मिल रहे हैं। आदित्य चोपडा और करण जौहर की कार्यप्रणाली में कई समानताएं हैं, लेकिन कुछ अंतर भी हैं। करण जौहर ने यह अंतर पैदा किया है। इस अंतर के साथ वे धर्मा प्रोडक्शन को नई ऊंचाइयों पर ले जा रहे हैं।

करण जौहर की स्वतंत्र शुरुआत और पहचान में शाहरुख खान का मजबूत हाथ रहा है। वही करण की प्रेरणा और वही गाइड हैं। स्विट्जरलैंड में फिल्म दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे की शूटिंग में आपसी बातचीत के दौरान शाहरुख खान ने करण को अपनी फिल्म बनाने की सलाह दी। शाहरुख की बात का समर्थन फिल्म की नायिका काजोल ने भी किया। हालांकि करण कहते हैं कि इस सलाह को उन्होंने मजाक में लिया और कहा कि अगले सात-आठ सालों में वह जरूर निर्देशक बन जाएंगे। शाहरुख ने करण के बहाने नहीं सुने। उन्होंने जोर देकर करण की निर्देशित फिल्म में काम करने की भी पेशकश की। काजोल ने भी फिल्म में काम करने का वादा किया। फिर भी करण जौहर इसे हंसी-मजाक समझते रहे। फिल्म शूटिंग के दरम्यान कई बार ऐसे हलके-फुलके प्रसंग आते हैं, जब फिल्म स्टार किसी असिस्टेंट की झूठी तारीफ करके उसे बेवकूफ बनाते हैं। करण कहते हैं, मुझे लगा कि आज बेवकूफ बनने की मेरी बारी है। हालांकि तब मैंने शाहरुख खान को पूरी गंभीरता से जवाब देते हुए कहा कि कुछ समय की ट्रेनिंग के बाद ही मैं निर्देशन की बात सोच सकता हूं।

ऐसे बनी पहली फिल्म

करण ने एक इंटरव्यू में शाहरुख खान से अपने लगाव और उनके पितातुल्य व्यवहार का जिक्र किया था। उन्होंने कहा था, शाहरुख खान मेरे बडे भाई, पिता और संरक्षक की तरह हैं। उन्होंने हर मौके पर मुझे प्रोत्साहित किया। हमेशा वे मेरे साथ रहे। दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे की शूटिंग के समय उन्होंने मुझे निर्देशक बनने के लिए प्रेरित किया। शूटिंग के बाद मुंबई लौटने पर उन्होंने एक बार मुझे बुलाया और कहा कि वह अक्टूबर-नवंबर में खाली हैं। उन तारीखों में मैं अपनी फिल्म की शूटिंग प्लान कर सकता हूं। तब तक न तो मैंने निर्देशक बनने का मन बनाया था और न मेरे पास कोई कहानी थी। खैर, शाहरुख खान के दबाव और आदित्य चोपडा के प्रोत्साहन में करण ने फिल्म की कहानी सोचनी शुरू कर दी। आरंभ में दो कहानियों पर काम किया, जो बाद में एक ही फिल्म कुछ कुछ होता है की स्क्रिप्ट बन गई। इस फिल्म के कथ्य के स्तर पर कुछ भी नया नहीं था, लेकिन प्रस्तुति और कलाकारों की केमिस्ट्री और स्फूर्ति ने दर्शकों को बांधे रखा। कुछ कुछ होता है ने भारत से ज्यादा विदेशों में बिजनेस किया। इस फिल्म की सफलता ने शाहरुख को अप्रवासी भारतीयों का चहेता स्टार बना दिया। आदित्य चोपडा ने दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे से एनआरआई या डॉलर सिनेमा की जो शुरुआत की, उसे करण जौहर ने ठोस स्वरूप और आकार दिया।

रिश्तों की आत्मीयता पर जोर

करण ने अभी तक कुल चार फिल्में निर्देशित की हैं। कुछ कुछ होता है, कभी खुशी कभी गम, कभी अलविदा न कहना और माय नेम इज खान। इन चारों फिल्मों में से आरंभिक तीन फिल्में एक स्वरूप और स्तर की हैं, लेकिन अपनी अंतिम फिल्म माय नेम इज खान में करण अलग नजरिये और कथ्य के साथ आए। उन्होंने के अक्षर से अपना मोह और अंधविश्वास तोडा। कहते हैं कि लगे रहो मुन्नाभाई में अंक और अक्षर ज्योतिष की आलोचना देखकर करण को एहसास हुआ कि के अक्षर से फिल्में नहीं चलतीं, बल्कि फिल्मों के चलने के लिए उनका बेहतर होना आवश्यक है। इसके अलावा उन्होंने हिंदी फिल्मों के फॉम्र्युले का अपना ढर्रा भी तोडा। करण जौहर की फिल्मों में भारतीय मूल्यों के साथ रिश्तों की आत्मीयता पर जोर रहता है। अंतिम फिल्म में उनके किरदार समाज और अपने समय की धारणाओं से टकराते नजर आते हैं। हालांकि करण जौहर अपनी सोच की सीमाओं के कारण भावनात्मक निदान ही सोचते हैं, लेकिन इससे उनकी फिल्मों का क्रिएटिव शिफ्ट जाहिर हुआ।

कडवाहट जाहिर नहीं करते

धर्मा प्रोडक्शन के बैनर के तहत करण जौहर ने फिल्में प्रोड्यूस करने का सिलसिला जारी रखा है। इन फिल्मों में उन्होंने नए निर्देशकों को मौका दिया। दूसरे निर्देशकों-निर्माताओं की तरह उन्होंने फिल्मों की प्रस्तुति में अपनी सोच डालने की कोशिश नहीं की। उनकी फिल्मों में निर्देशकों को विषयों के स्वतंत्र निर्वाह की छूट रहती है। विषय-चुनाव के समय ही करण अपना प्रभाव डालते हैं। अभी भी उनके प्रोडक्शन की फिल्मों की मोटी समानताएं खोजी जा सकती हैं। कल हो न हो, काल, दोस्ताना, वेकअप सिड, आई हेट लव स्टोरीज, वी आर फैमिली, अग्निपथ और एक मैं एक तू में करण ने मुख्य रूप से नए निर्देशकों को मौके दिए। कुछ फिल्में सफल रहीं। कुछ निर्देशकों से संबंध टूटे, लेकिन करण ने कभी अपनी खटास जाहिर नहीं की। वे मृदु स्वभाव के हैं। किसी के प्रति कटु हों तो भी कटुता जाहिर नहीं करते। मैंने गौर किया है कि कैमरा ऑन होते ही उनके चेहरे की भंगिमा बदल जाती है। वे मुस्कराने लगते हैं। कैमरा ऑफ होते ही गंभीर हो जाते हैं।

..और किया वजन कम

करण के सार्वजनिक व्यक्तित्व में निखार कॉफी विद करण से आया। वर्ष 2004 में आरंभ हुए इस सलेब्रिटी शो में करण ने फिल्म इंडस्ट्री के सभी चर्चित स्टारों को बुलाया और उनसे बेलाग बातचीत की। बातचीत में स्टारों ने अपनी जिंदगी के वे राज भी बताए, जिन्हें प्राइवेट और निजी कहते हुए वे पत्रकारों से छिपा लेते हैं या टाल देते हैं। फिल्म बिरादरी से उनके संबंधों के कारण कॉफी विद करण बेहद पॉपुलर हुआ। टीवी पर आने और लोगों के घरों में सीधे पहुंचने के इस अवसर का लाभ करण ने अपने व्यक्तित्व में लिया। उन्होंने वजन कम किया, डिजाइनर कपडे पहने और किसी स्टार की तरह प्रभामंडल विकसित किया।

िफलहाल करण हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के सबसे चर्चित व लोकप्रिय निर्देशक हैं। वे सभा-सोसाइटी और सेमिनार में भी बोलते नजर आते हैं। एक तरफ वे यश चोपडा के उत्तराधिकारी प्रतीत होते हैं तो दूसरी तरफ फिल्म इंडस्ट्री के मुखर प्रवक्ता के रूप में प्रभावित करते हैं। इन दिनों वे अपनी नई फिल्मों की तैयारी कर रहे हैं। वे परिपक्व और सचेत हुए हैं। उम्मीद है कि भविष्य में हिंदी सिनेमा की दिशा तय करने में उनकी सक्रिय भूमिका बनी रहेगी।

Sunday, January 29, 2012

रिलीज के दिन तक बनती हैं फिल्में

-अजय ब्रह्मात्‍मज

साल में आठ-दस शुक्रवार ऐसे होते ही हैं, जब तीन से ज्यादा फिल्में एक साथ रिलीज होती हैं। अब तो फिल्मों की रिलीज कम हो गई हैं। जरा सोचें, जब 300-400 फिल्में रिलीज होती थीं तो हफ्तों का क्या हाल होता होगा? इसी साल की बात करें तो 6 जनवरी को एक फिल्म प्लेयर्स रिलीज हुई, लेकिन 13 जनवरी को चार फिल्में एक साथ रिलीज हुई। 20 जनवरी का शुक्रवार खाली गया। कोई फिल्म ही नहीं थी। अगर 13 जनवरी की एक-दो फिल्में आगे खिसका दी जातीं तो नई फिल्म के नाम पर कुछ और दर्शक मिल सकते थे। इन दिनों बड़ी फिल्मों के अगले-पिछले हफ्ते में निर्माता-फिल्में रिलीज करने से बचते हैं। डर रहता है कि दर्शक नहीं मिलेंगे। लेकिन सच यही है कि दर्शकों को पसंद आ जाए तो लगान और गदर या गोलमाल और फैशन एक ही हफ्ते में रिलीज होकर खूब चली थीं। दरअसल, हिंदी फिल्मों के निर्माता फिल्मों की सही प्लानिंग नहीं कर पाते। मैं एक निर्देशक को जानता हूं। उनकी फिल्म की शूटिंग पिछले साल मार्च में समाप्त हो चुकी है, लेकिन उचित ध्यान न देने की वजह से फिल्म अभी तक पोस्ट प्रोडक्शन में अटकी हुई है। किसी को नहीं मालूम कि फिल्म कब रिलीज होगी। होगा यह कि आनन-फानन में बगैर योजना के फिल्म रिलीज कर दी जाएगी। आजकल ज्यादातर मामलों में यही हो रहा है। हर साल लगभग 20-25 फिल्में बगैर प्रचार के जल्दबाजी में रिलीज कर दी जाती हैं। दर्शकों को पता नहीं होता और उनके अभाव में थिएटरों के मालिक उसे बमुश्किल एक हफ्ता खींच पाते हैं। लोगों ने गौर किया होगा कि कुछ फिल्मों की रिलीज आगे खिसकती जाती है। ऐसी फिल्मों के प्रति दर्शक शंकालु हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि फिल्म में कोई गड़बड़ी या फिल्म को संभालने के लिए किसी प्रकार की पच्चीकारी की गई है। बड़ी फिल्में भी दर्शकों की ऐसी आशंका का शिकार हो जाती हैं। छोटी फिल्मों की स्थिति ज्यादा नाजुक रहती है। बगैर रिजर्वेशन के कोच में चढ़ गए यात्रियों की तरह वे सीट और बर्थ के इंतजार में रहती हैं।

इधर यह देखने में आ रहा है कि रिलीज की तारीख निश्चित हो जाने के बाद भी अंतिम दिन तक फिल्म को सुधारने-सजाने का काम चलता रहता है। कुछ जोड़ना और घटाना आम बात है। कई दफा रिलीज के हफ्ते में ही सोमवार से गुरुवार के बीच फिल्मों का सेंसर सर्टिफिकेट लिया जाता है। देखा जाता है कि मेकर फिल्म की औपचारिकताओं में फंसे होने के कारण प्रचार पर ध्यान नहीं दे पाते। अगर निर्माता या निर्देशक स्टार हो गया तो वह सबसे पहले मीडिया के लिए निश्चित किए गए समय से कटौती करता है। नतीजा यह होता है कि दर्शकों तक फिल्म की सही जानकारी नहीं पहुंच पाती। पितृपक्ष, आईपीएल, रमजान और व‌र्ल्ड कप के वक्त फिल्मों की रिलीज आगे-पीछे की जाती है। दर्शक इन दिनों थिएटरों में नहीं जाते।

यशराज फिल्म्स और अजय देवगन की फिल्मों की सुनिश्चित प्लानिंग होती है। ये दोनों फिल्मों की रिलीज की रिवर्स प्लानिंग करते हैं। वे फिल्मों की रिलीज की तारीख पहले तय कर देते हैं और फिर उसके अनुकूल ही सारी प्लानिंग करते हैं। इससे फायदा यह होता है कि शूटिंग, एडीटिंग, पोस्ट प्रोडक्शन और प्रोमोशन के लिए सभी को पर्याप्त समय मिलता है। इस मामले में विशेष फिल्म्स के भ˜ बंधुओं का रिकॉर्ड भी बेहतर है। इनके अलावा आमिर खान, सलमान खान और शाहरुख खान की फिल्में त्योहार विशेष पर रिलीज के हिसाब से प्लान की जाती हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में मजाक में कहा भी जाता है कि इन खानों ने एक-एक त्योहार को अपने लिए रिजर्व कर लिया है। इनमें केवल आमिर खान फिल्मों के प्रचार पर सुनियोजित ध्यान दे पाते हैं। रॉ. वन के समय शाहरुख खान ने भी आक्रामक प्रचार किया, लेकिन सभी जानते हैं कि अंतिम घड़ी तक फिल्म के पोस्ट प्रोडक्शन का काम चल रहा था। इसी इंडस्ट्री में अनुराग कश्यप सरीखे निर्देशक भी हैं। वे फिल्में बना कर रख लेते हैं और फिर अधिकाधिक दर्शकों तक पहुंचाने के लिए उसे प्लानिंग के तहत रिलीज करते हैं।

फिल्मों की रिलीज और उसके लॉक होने के बीच प्रचार, प्रतिक्रिया और अन्य तैयारियों के लिए सही अंतर रखने का तरीका हमें हॉलीवुड से सीखना होगा। वे 6 महीने से 9 महीने तक का समय फिल्म की उचित रिलीज और प्रचार में लगाते हैं। उन्हें उसका लाभ भी मिलता है।

Friday, January 27, 2012

फिल्‍म समीक्षा : अग्निपथ

अग्निपथ: मसालेदार मनोरंजन-अजय ब्रह्मात्‍मज

प्रचार और जोर रितिक रोशन और संजय दत्त का था, लेकिन प्रभावित कर गए ऋषि कपूर और प्रियंका चोपड़ा। अग्निपथ में ऋषि कपूर चौंकाते हैं। हमने उन्हें ज्यादातर रोमांटिक और पॉजीटिव किरदारों में देखा है। निरंतर सद्चरित्र में दिखे ऋषि कपूर अपने खल चरित्र से विस्मित करते हैं। प्रियंका चोपड़ा में अनदेखी संभावनाएं हैं। इस फिल्म के कुछ दृश्यों में वह अपने भाव और अभिनय से मुग्ध करती हैं। शादी से पहले के दृश्य में काली की मनोदशा (खुशी और आगत दुख) को एक साथ जाहिर करने में वह कामयाब रही हैं। कांचा का दाहिना हाथ बने सूर्या के किरदार में पंकज त्रिपाठी हकलाहट और बेफिक्र अंदाज से अपनी अभिनय क्षमता का परिचय देते हैं। दीनानाथ चौहान की भूमिका में चेतन पंडित सादगी और आदर्श के प्रतिरूप नजर आते हैं। इन किरदारों और कलाकारों के विशेष उल्लेख की वजह है। फिल्म के प्रोमोशन में इन्हें दरकिनार रखा गया है। स्टार रितिक रोशन और संजय दत्त की बात करें तो रितिक हमेशा की तरह अपने किरदार को परफेक्ट ढंग से चित्रित करते हैं। संजय दत्त के व्यक्तित्व का आकर्षण उनके परफारमेंस की कमी को ढक देता है। कांचा की खलनायकी एक आयामी है, जबकि रऊफ लाला जटिल और परतदार खलनायक है।

निर्माता करण जौहर और निर्देशक करण मल्होत्रा अग्निपथ को पुरानी फिल्म की रीमेक नहीं कहते। उन्होंने इसे फिर से रचा है। मूल कहानी कांचा और विजय के द्वंद्व की है, लेकिन पूरी संरचना नयी है। रिश्तों में भी थोड़ा बदलाव आया है। नयी अग्निपथ सिर्फ कांचा और विजय की कहानी नहीं रह गई हैं। इसमें नए किरदार आ गए हैं। पुराने किरदार छंट गए हैं। अग्निपथ हिंदी फिल्मों की परंपरा की घनघोर मसालेदार फिल्म है, जिसमें एक्शन, इमोशन और मेलोड्रामा है। नायक-खलनायक की व्यक्तिगत लड़ाई हो तो दर्शकों को ज्यादा मजा आता है। ऐसी फिल्मों को देखते समय खयाल नहीं रहता कि हम किस काल विशेष और समाज की फिल्म देख रहे हैं। लेखक निर्देशक अपनी मर्जी से दृश्य गढ़ते हैं। एक अलग दुनिया बना दी जाती है, जो समय, परिवेश और समाज से परे हो जाती है। तभी तो अग्निपथ में लड़कियों की नीलामी जैसे दृश्य भी असंगत नहीं लगते।

करण मल्होत्रा ने पुरानी कहानी, पुरानी शैली और घिसे-पिटे किरदारों को नयी तकनीक और प्रस्तुति दे दी है। उनका पूरा जोर फिल्म के कुछ प्रसंगों और घटनाओं को प्रभावपूर्ण बनाने पर रहा है। फिल्म का तारतम्य टूटता है। कहानी भी बिखरती है। इसके बावजूद इंतजार रहता है कि अगली मुलाकात और भिड़ंत में क्या होगा? लेखक-निर्देशक पूरी फिल्म में यह जिज्ञासा बनाए रखने में कामयाब होते हैं। मांडवा और मुंबई को अलग रंगों में दिखाकर निर्देशक ने एक कंट्रास्ट भी पैदा किया है।

फिल्म के प्रोमोशन और ट्रेलर में कांचा के हाथ में गीता दिखी थी। गीता यहां काली किताब में बदल गई है। फिर भी कांचा गीता के श्लोकों को दोहराता सुनाई पड़ता है। कांचा के मुंह से गीता के संदेश की तार्किकता समझ के परे हैं। ओम पुरी इस फिल्म में भी प्रभावहीन रहे हैं। वे इन दिनों फिल्म से असंपृक्त नजर आते हैं। फिल्म के एक महत्वपूर्ण इमोशनल दृश्य में मां के घर रितिक रोशन को थाली में खाना खाते दिखाया गया है। इस दृश्य में साफ नजर आता है कि क्या रितिक रोशन को कौर उठाने नहीं आता या उन्होंने इसे लापरवाही से निभा दिया है। वे चावल का कौर ऐसे उठाते हैं मानो भूंजा उठा रहे हो। परफेक्ट अभिनेता से ऐसी लापरवाही की उम्मीद नहीं की जा सकती।

रेटिंग- *** 1/2 साढ़े तीन स्टार

प्रेम-रोमांस : द रोड होम


प्रेम-रोमांस-2

प्रेम-रोमांस सीरिज में दूसरा लेख राहुल सिंह का है। राहुल ने चीनी फिल्‍म 'द रोड होम' के बारे में लिख है। राहुल सिंह देवघर में रहते हैं। पेशे से अध्‍यापक है। उनसे हिन्दी विभाग, ए एस महाविद्यालय, देवघर, पिन-814112, झारखण्ड, मो॰-09308990184 ई मेल- alochakrahul@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।
मृत्यु की छांह में प्रेम की दास्तानः द रोड होम
-राहुल सिंह

एक बेहद प्यारी फिल्म जिसकी शुरुआत मौत की खबर और समापन शवयात्रा से होती है। अमूमन फ्लैश बैक में फिल्में ब्लैक एंड व्हाईट हो जाया करती हैं लेकिन द रोड होमइसके उलट फ्लैश बैक में रंगों से लबरेज और वर्तमान में स्याह-सफेद में सिमटी रहती है। अतीत का अंततः खुशनुमा होना और वर्तमान का अंततः दुःखदायी होना रंग विन्यास के इस उलटफेर को जस्टिफाई करता है। पिता की मृत्यु की खबर सुनकर उनके अंतिम संस्कार को लौटा बेटा ल्‍वो य्वीशंग (हुगलेई सुन) के स्मृतियों के गर्भ में लगायी गयी डुबकी के साथ फिल्म कायदन शुरु होती है। उत्‍तरी चीन की एक पहाड़ी गांव सैन्ह्यून में साल 1958 में फिल्म की कहानी शुरु होती है। जब उस गांव को उसका अपना पहला प्राथमिक शिक्षक ल्‍वो छांगय्वी ( हाओ चंग) मिलता है। उसकी अगुवानी में पूरा गांव खड़ा है, उसी भीड़ में खड़ी एक कमसिन की निगाहें बार-बार उस शिक्षक से उलझती हैं। पहली निगाह के इस प्यार के पनपने को जिस शिद्दत और संजीदगी के साथ चांग इमओ ने दृश्यों में बांधा है, उसे शब्दों में बांधना मुश्किल है ।

फोटोग्राफिक स्मृति के लिए एक शब्द है मैंडेरिन मेमोरी। चीन की लिपि चित्रात्मक है। चित्रात्मकता और प्रकृति के सौन्दर्य को बखूबी कैप्चर करना चीनी फिल्मों की, वे चाहे एक्शन फिल्में ही क्यों न हो, बुनियादी विशेषता है। द रोड होमचीन के रिवाजों और जीवन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में दोनों खासियत को आत्मसात करती एक बेमिसाल प्रेम कहानी है। कुदरत की बदलती रंगतों के बीच से बिना किसी संवाद के बस दृश्यों की लड़ियों में महीन बाँसुरी का पारम्परिक भीना-गुनगुना-सा चीनी संगीत और उस ध्वनि पथ पर तिरती कहानी, बस जिसे अद्भुत ही कहा जा सकता है। एक छोटा-सा गांव, छोटी-सी आबादी, मर्यादा का बंधन और रिवाजों की ओट। उन रिवाजों की ओट में अपने प्यार को बयां कर पाने की ऐसी मासूम और निष्पाप कोशिशें जो बरबस आपकी आत्मा तक को गुदगुदा जायें। हाउ यंग की सिनेमेटोग्राफी, पाओ शी की स्क्रीनप्ले और पाओ सान की साउण्डट्रेक की स्ट्रक्चरल यूनिटी मिल कर दृश्यों की जिन लड़ियो को पिरोते हैं, वह सिनेमाई व्याकरण को समझने की लिहाज से भी महत्‍वपूर्ण है। किसी क्रिया की निरंतरता को फिल्माने के क्रम में जिस रुप से उगते और धुंधलाते दृश्यों की कोख से अगले दृश्यों को उभरते दिखलाया गया है, वह शानदार है। ऑडियो विजुअल माध्यम होने के कारण सिनेमा किस तरह अभिव्यक्ति के मामले में अन्य कला रुपों से भिन्न है, झांग यिमोउ की सिनेमाई चेतना इसे साबित करने के लिए पर्याप्त है।

एक अर्थ में फिल्म रिवाज से शुरु होकर रिवाज पर खत्म होती है लेकिन उस रिवाज के दरम्यान प्रकृति, संगीत, फलसफा और स्मृतियाँ, एक दूसरे के पोर-पोर में इस कदर समाये हुए हैं कि उसे अलगाकर देखना ज्यादती होगी। तकनीक से लेकर कंटेट के स्तर पर सादगी का सौन्दर्य क्या होता है, फिल्म इसकी नजीर खुद है।

साधारण-सी शुरुआत के साथ लगातार असाधारण होती जाती फिल्म, खास कर उन हिस्सों में जहाँ फिल्म फ्लैश बैक में चलती है। एक निरीह और निश्च्छल प्यार के लगातार गहराने की कहानी जिसे मौत भी धुंधलाने में असमर्थ है। चालीस साल के साहचर्य के बाद अचानक मौत की दस्तक, पिता की अंत्येष्टि के लिए शहर से लौटा पुत्र, उसकी मां की अपने पति के पारंपरिक तरीके से दफनाने की जिद और उस जिद से जुड़ी संवेदनाओं की दास्तान है, ‘द रोड होम। फिल्म की खासियत वे दृश्यावलियाँ हैं जो कुछ अविश्वसनीय-सा पर्दे पर साकार कर पाने में समर्थ है। उन तमाम दृश्यों को यहाँ रख पाना संभव नहीं है इसलिए कुछेक ही। गांव में दो कुएं हैं, एक नया और एक पुराना। नये वाले से पूरा गांव पानी लेता है क्योंकि वह नजदीक है। लेकिन चाओ काफी ऊँचाई पर स्थित कुंए से पानी लेने के लिए सिर्फ इसलिए जाती है कि रास्ते में विद्यालय पड़ता है, जहाँ से पढ़ाते हुए शिक्षक की आवाज सुनी जा सकती है और कभी-कभार उसे ऊँचाई से देखा भी जा सकता है। छुट्टी के बाद शिक्षक दूर के गांव के बच्चों को छोड़ने के लिए जाता है। चाओ गांव के मुहाने पर स्थित ऊँची जगहों से छिपकर रोज शिक्षक को उन बच्चों को छोड़ने जाते देखती है। यह जो पूरी दृश्यावली है उसे लिखकर बयां नहीं किया जा सकता है। रंगों की जो छटा पर्दे पर बिखरती है बस उसे महसूसा जा सकता है। गेंहू की बालियों के बीच से झांकती और पगडण्डियों में कुलांचे भरती चाओ, उसकी देह की भंगिमाएं, उसकी मासूमियत मन को छूती है। वह दिन, जब गांव के रिवाज के हिसाब से शिक्षक के आतिथ्य की बारी चाओ की है। चाओ भोर से उठ कर खाने की तैयारी में जुटी है। खाना बनाकर, इंतजार में दरवाजे के चौखट से लगी चाओ किसी नायाब पेन्टिंग की तरह लगती है। उसके बाद शिक्षक को खाना परोसकर उसे दूर आईने के जरिये देखना, माशा अल्लाह। चाओ की अंधी मां का अपनी बेटी के उस टूटे बर्तन को बर्तन मरम्मत करानेवाले से जुड़वाने का दृश्य, या गुम हो चूके बालों के क्लिप को चाओ के द्वारा रोज ढूंढने की कोशिश, या फिर शिक्षक की अनुपस्थिति में विद्यालय को अपने दम सजाने की कोशिश या लाल जैकेट में बालों में वही क्लिप लगाये शिक्षक के लौटने का इंतजार का दृश्य। खैर, शिक्षक की मृत्यु हो चुकी है और चाओ चाहती है कि उसके पति का अंतिम संस्कार पारम्परिक तरीके से हो। पारम्परिक तरीका यह है कि ताबूत को हाथों से ढोकर पैदल गांव तक लाया जाये। समस्या यह है कि गांव के सारे युवक रोजगार के सिलसिले में गांव से पलायन कर चुके हैं। बर्फ और बारिश के मौसम में गांव के बूढ़े और बच्चे इस काम को अंजाम नहीं दे सकते हैं। किराये पर आदमी बुलाये जाते हैं। हथकरघे को फिर से उसका बेटा मरम्मत के लिए लेकर जाता है। मरम्मत करनेवाला कहता है कि शायद यह इस गांव और इसके आस-पास बचा आखिरी हथकरघा होगा और उसे शायद जानबूझकर इसी काम के लिए अब तक बचा कर रखा गया था। वह काम यह है कि चाओ अपने हाथों से वैसा ही प्यारा कफन बुनना चाहती है, जैसा कि उसने ने उसी हथकरघे पर स्कूल के शुभंकर प्रतीक के रुप में लाल बैनर बुनी थी। उस शवयात्रा में न सिर्फ गांव के बल्कि आस-पास के गांव और शहरों से बड़ी संख्या में लोग शामिल होते है यह वे लोग थे जिन्हें उसके पति ने पढ़ाया था। रास्ते में वे चीनी रिवाज के अनुसार शव को संबोधित करते चलते हैं कि यह रास्ता जिस पर हम तुम्हें लेकर जा रहें हैं तुम्हारे घर को जाता है (द रोड होम)। चाओ को मालूम है कि उसके पति ने कई पीढ़ियों को पढ़ाया है इसलिए मृत्यु के बाद उसके पति को अगर कुछ जोड़ी हाथ और पैर भी कांधा देने को न मिले तो यह शर्म और अपमान की बात होगी। दूसरे, यह सड़क उनके प्रेम का गवाह रहा है। वह सड़क शहर को गांव से जोड़ने का काम करती है। चाओ की जिंदगी में खुशियां उसी रोड के जरिये आयीं थी। उस रोड ने उसको मायूस नहीं किया था। और शायद इसलिए वह आखिरी बार अपने पति के साथ उसी रास्ते से गुजरना चाहती है। कहते हैं कि पैदल चलने से रास्ता याद रहता है। चाओ नहीं चाहती थी कि उसका पति घर की राह भूल जाये, इसलिए कार या टैक्टर से शवयात्रा के प्रस्ताव को वह सिरे से खारिज कर देती है। फिल्म के अंत में चाओ अपने जीवन भर की बचत स्कूल की नयी इमारत के निर्माण के लिए देती है। अगली सुबह चाओ के कान में फिर से वही आवाज सुनाई पड़ती है जो वह वर्षों से सुनती आयी थी। ल्‍वो के पिता चाहते थे कि ल्‍वो बड़ा होकर शिक्षक बने, ल्‍वो शहर जाने से पहले एक दिन के लिए उसी विद्यालय में अपने पिता की बनाई पाठ्य पुस्तक से एक सबक बच्चों को सुना रहा है। अंत में इस नामालूम-सी फिल्म के बारे में कुछ मालूम-सी बातें। इस फिल्म के निर्देशक चांग इमओ वही हैं जिन्होंने रेड लैन्टर्नऔर क्राउचिंग टाइगर हिडेन ड्रेगन बनायी थी। और इस फिल्म की कमसिन और गुड़ियों-सी दिखने वाली चाओ (चांग चियी) की यह डेब्यू फिल्म थी जिसे हम क्राउचिंग टाइगरमें तलवारबाजी और हैरतंगेज स्टंट करते हुए देख चुके हैं और फिल्म पाओ शी के उपन्यास रिमेम्बरेन्स पर आधारित है, जिसकी पटकथा भी पाओ शी ने ही लिखी है।

Wednesday, January 25, 2012

प्रेम-रोमांस : खुद से रोमांस करता है फॉरेस्‍ट गम्‍प

मैंने बसंत के मौसम में प्रेम-रोमांस से संबंधित फिल्‍मों पर लिखने का आग्रह फेसबुक पर किया तो राजेश कुमार का पहलाख आया हैत्र उन्‍होंने फॉरेस्‍ट गम्‍प पर लिखा है। आप इसका आनंद लें और अपनी पसंद की पिफल्‍म के बारे में लिख भेजें। उम्‍मीद है कि चवन्‍नी का यह आयोजन रससिक्‍त होगा। आप brahmatmaj@gmail.com पर लेख भेजें।

-राजेश कुमार

हिंदी फिल्‍में में तो अमूमन रोमांस से सराबोर होती हैं, लेकिन शायद अतिरेक दोहराव की वजह से वो जेहन से जल्‍द ही उतर जाती हैं. फिर चाहे वो यशराजनुमा बिग बजट रोमांस हो या सत्‍यजीत रे का साहित्‍यिक टच लिए रोमांटिक लव. अमर प्रेम और द जैपेनीज वाइफ जैसी फिल्‍मों का रोमांस भी यादगार है लेकिन टॉम हैंक्‍स की बेहतरीन फिल्‍म फॉरेस्‍ट गम्‍प फिल्‍म मुझे रोमांस की बेहतरीन दास्‍तान लगती है. यह फिल्‍म सिर्फ प्रेमी-प्रेमिका के रोमांस तक नहीं सिमटती बल्कि यह मां बेटे, दोस्‍त, बेटे और बेमेल पत्‍नी के रोमांस को बयां करती हैं. और सबसे बडी बात यह कि फॉरेस्‍ट गम्‍प में नायक का अंत तक खुद से रोमांस गजब का है. इस फिल्‍म में नायक किसी भी कीमत में खुद से रोमांस करना नहीं छोडता. चाहे वो तब हो, जब उसकी तथाकथित प्रेमिका उसे छोडकर बार-बार जाती है या फिर तब उसको प्रेम का पाठ पढाने वाली मां का दुनिया से अलविदा कहकर उसे सचमुच अकेला छोड देती है. फॉरेस्‍ट गम्‍प अच्‍छी तरह से जानता है कि वह जिससे प्‍यार करता है वह खुद नहीं जानती कि वो किससे प्यार करती है. असल में वह न जाने किसकी तलाश में दुनिया भर के लोगों के साथ भटक रही है. लेकिव वो हताश होकर जब भी फॉरेस्‍ट गम्‍प के पास आती है, वह उसे तब तुम मेरे पास आना प्रिये की तर्ज पर खुले दिल से स्‍वीकारता है. किसी भी हाल में वह उससे रोमांस करना नहीं छेाडता. अंत में जब नायिका असफल और जानलेवा बीमारी लेकर वापस आती है, तब भी फॉरेस्‍ट गम्‍प न उसे स्‍वीकार करता है बल्कि उसे ठहराव और शांति देने के लिए विवाह भी करता है. फौज में उसके अफ्रीकी मित्र को अपने पैतृक व्‍यवसाय से रोमांस है और उसके इस रोमांस का फॉरेस्‍ट गम्‍प निभाता है. उसका जिंदगी से रोमांस ही है कि वो अपने अपाहिज लेफटीनेंट को जीने पर मजबूर कर देता है. जिंदगी से हरदम रोमांस करने से उसमें पनपी उर्जा ही उसे जिंदगी में अप्रत्‍याशित कामयाबी दिलाती है. कभी वह अकेला होता है तो रास्‍तों से रोमांस करता हुआ अनवरत दौडने लगता है. कभी अस्‍पताल के बैड से तंग आकर पिंग पॉन्‍ग का उस्‍ताद बनता है. पहली नजर में सबको फॉरेस्‍ट गम्‍प से सहानुभति होने लगती है, लेकिन सच्‍चाई यह है कि वो सबसे सहानुभूति रखता है. उसका रोमांस इतना जबरदस्‍त है कि वह बस स्‍टैंड पर बैठे लोगों से अपनी जिंदगी की की कहानी शेयर करने लगता है. दुनिया की हर वो चीज जिससे कभी न कभी किसी को नफरत हुई होगी, फॉरेस्‍ट गम्‍प उन चीजों से जरूर प्‍यार करता है. वह सफल है और कामयाब भी. लेकिन अंदर से अकेला होने के बावजूद वह किसी भी जीच को खरीदने में विश्‍वास नहीं करता. वह हर चीज से रोमांस करता है. अपने बचपन से, अपने जूतों से, अपनी नाव से, अपने मित्र से, अपनी मां से, अपनी प्रेमिका से, अपनी दौड से, अपने यूनीफॉर्म से, अपने देश से, अपने पिंग पॉन्‍ग से, अपने बच्‍चे से और अपनी जिंदगी से. असल में फॉरेस्‍ट गम्‍प का हर रोमांस अपने आप में महाकथा है जो इस फिल्‍म में समेटने की कोशिश मात्र है.

राजेश कुमार चौथी दुनिया में कार्यरत हैं। उनसे rajeshy549@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

Sunday, January 22, 2012

प्रोड्यूसर भी होते हैं क्रिएटिव

प्रोड्यूसर भी होते हैं क्रिएटिव-अजय ब्रह्मात्‍मज

हिंदी फिल्मों में प्रोड्यूसर की भूमिका खास और अहम होती है। सामान्य शब्दों में प्रोड्यूसर वह व्यक्ति होता है, जो दो पैसे कमाने की उम्मीद में किसी और के सपने में निवेश करता है। फिल्म पूरी तरह से निर्देशक का माध्यम है। निर्देशक को फिल्म रूपी जहाज का कप्तान भी कहा जाता है, लेकिन निर्देशक के हाथों में जहाज सौंपने का काम निर्माता ही करता है। लेकिन हिंदी फिल्मों ने निर्माताओं की अजीब छवि बना रखी है। फिल्मों में प्रोड्यूसर को काइयां किस्म का व्यक्ति दिखाया जाता है। उसके हाथ में एक नोटों से भरा ब्रीफकेस होता है। शूटिंग समाप्त होने के बाद वह रोजाना सेट पर आता है और सभी के पारिश्रमिक का एक हिस्सा मारने की फिक्र में रहता है। प्रोड्यूसर की यह छवि कोरी कल्पना नहीं है। ऐसे प्रोड्यूसर आज भी दिख जाते हैं जो सिर्फ पैसे मारने और कमाई की फिक्र में रहते हैं।

हिंदी फिल्मों को उद्योग का दर्जा मिलने के बाद एक परिवर्तन साफ दिख रहा है। अब फिल्मों के निवेश, व्यय और आय में पारदर्शिता आई है। फिल्म कंपनियों के पब्लिक इश्यू आने के बाद उनकी जवाबदेही बढ़ी है। सालाना जेनरल बॉडी मीटिंग में इन कंपनियों को निवेशकों की आशंकाओं और सवालों का जवाब देना पड़ता है। निवेशक अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए कंपनी को सचेत रखता है। जिस फिल्म इंडस्ट्री में लेन-देन में नोटों के बंडल चलते थे, अब वहां चेक, ड्राफ्ट और नेटबैंकिंग से काम होने लगा है। आयकर विभाग की सख्ती और चौकसी ने भी निर्माताओं को बड़ी हद तक पारदर्शी होने के लिए मजबूर किया है।

अफसोस है कि इन निर्माताओं के बारे में आम दर्शक नहीं जानता। बोनी कपूर, भरत शाह और मुकेश भट्ट जैसे कुछ नामचीन निर्माताओं को अपवाद कहा जा सकता है। निर्माताओं के इंटरव्यू भी नहीं छपते। निर्माताओं में मीडिया की कोई रुचि नहीं होती। किसी भी फिल्म के बारे में उनके मंतव्य नहीं दिया जाता। निर्माताओं के बारे में यही धारणा मजबूत है कि वह नॉन क्रिएटिव व्यक्ति होता है। फिल्मों के कंटेंट से उसका कोई वास्ता नहीं होता। यह बात कभी सच नहीं रही। हिंदी फिल्मों के आरंभिक दौर से ही ऐसे निर्माताओं की एक जमात क्रिएटिव और इनवॉल्व रही है। उन्होंने निर्देशकों और स्टारों पर भरोसा किया। निर्माता और निर्देशक का परस्पर विश्वास हो तो फिल्में अच्छी बनती हैं।

अभी के निर्माताओं का फिल्मों में क्रिएटिव इनपुट काफी बढ़ गया है। एक तो लगभग सारे स्टार निर्माता बन गए हैं। वे सभी फिल्म के निर्माण में पर्याप्त क्रिएटिव इनपुट देते हैं और फिल्म की मार्केटिंग में भी आगे बढ़कर हिस्सा लेते हैं। आमिर खान, शाहरुख खान, सलमान खान, रितिक रोशन, फरहान अख्तर आदि स्टार निर्माता हैं। दूसरे, निर्माताओं का एक समूह निर्देशकों की जमात से आया है। यश चोपड़ा, आदित्य चोपड़ा, करण जौहर, सूरज बड़जात्या, राम गोपाल वर्मा, विपुल शाह, विधु विनोद चोपड़ा, अनुराग कश्यप आदि इस समूह के उल्लेखनीय नाम हैं। एक्टिंग और डायरेक्शन से प्रोडक्शन में आए निर्माताओं को क्रिएटिव प्रोड्यूसर कहना उचित होगा। इनमें से कुछ ही फिल्म के कंटेंट और उसे अंतिम शेप देने में हस्तक्षेप करते हैं। ज्यादातर क्रिएटिव प्रोड्यूसर फिल्म के फ्लोर पर जाने के पहले ही सारी चीजें तय कर लेते हैं। स्क्रिप्ट लॉक हो जाने के बाद वे आमतौर पर फेरबदल नहीं करते।

इनके अलावा कारपोरेट कंपनियों के प्रमुखों की एक कैटगरी है। हालांकि हर कारपोरेट हाउस में निर्माण की रोजाना जरूरतों के लिए कर्मचारी और अधिकारी नियुक्त कर लिए गए हैं, लेकिन फिल्म के लिए हां कहने या लागत में कतरब्योंत न सोचने के लिए ऐसे निर्माताओं को धन्यवाद देना होगा। मुख्य रूप से यूटीवी, इरोज, रिलायंस, वायकॉम 18 आदि ऐसे कारपोरेट हाउस हैं, जिनमें फिल्म निर्माण को महज बिजनेस या लाभ के लिहाज से नहीं देखा जाता। इन कंपनियों को अपनी कुछ चूकों से भारी नुकसान भी उठाना पड़ा है, लेकिन उन्होंने नए प्रोजेक्ट के खर्च से सहमत होने के बाद कभी तंगदिली नहीं दिखाई।

उम्मीद की जानी चाहिए कि भविष्य में निर्देशक की सोच और कल्पना को साकार करने में ऐसे क्रिएटिव प्रोड्यूसर का सहयोग बढ़ेगा। आखिरकार ऐसे सहयोग से फिल्में निखर जाती हैं और दर्शकों का भरपूर मनोरंजन होता है।

Friday, January 13, 2012

टीवी के लिए फिल्मों की काट-छांट

टीवी के लिए फिल्मों की काट-छांट-अजय ब्रह्मात्‍मज

पिछले दिनों तिग्मांशु धूलिया बहुत परेशान थे। उनकी फिल्म साहब बीवी और गैंगस्टर को सेंसर बोर्ड के कुछ सदस्यों ने अटका दिया था। लोग शायद जानते हों कि फिल्म की रिलीज के बाद निर्माताओं को हर फिल्म के सैटेलाइट या टीवी प्रसारण के लिए अलग से सेंसर सर्टिफिकेट लेने पड़ते हैं। माना जाता है कि टीवी पर प्रसारित हो रही फिल्में घर के सभी सदस्य देखते हैं, इसलिए उसमें जरूरी कांट-छांट हो जानी चाहिए। यू-ए और ए सर्टिफिकेट मिलीं सभी फिल्मों को फैमिली फिल्म का दर्जा हासिल करना पड़ता है। लिहाजा जरूरी हो जाता है कि फिल्म से एडल्ट सीन, मैटेरियल और अन्य चीजें छांट दी जाएं। टीवी पर एडल्ट फिल्में प्रसारित नहीं की जा सकतीं। निर्माता टीवी प्रसारण से होने वाली आय के कारण इस काट-छांट के लिए सहज ही तैयार हो जाते हैं। कोई अतिरिक्त आय क्यों छोड़े?

इन दिनों सेंसर और टीवी प्रसारण की शर्तो और जरूरतों को ध्यान में रखते हुए निर्माता-निर्देशक शूटिंग के समय ही दो तरीके से शॉट ले लेते हैं। बाद में काट-छांट कर फिल्म को बिगाड़ने से अच्छा है कि पहले ही इस तरह शूट कर लो कि फिल्म की रवानी बनी रहे। हालांकि इससे फिल्म की शूटिंग का खर्च बढ़ता है, लेकिन लेखक-निर्देशक को संतुष्टि रहती है कि उन्होंने टीवी के हिसाब से खुद ही एडिट कर दिया या नए शॉट ले लिए। देल्ही बेली समेत कुछ फिल्मों की खास शूटिंग और एडिटिंग की गई है।

दरअसल, फिल्मों के एडल्ट कंटेंट और उसके टीवी प्रसारण पर हमें नई नीति की जरूरत है। कुछ महीने पहले एक टीवी चैनल पर अचानक महेश भ˜ की अर्थ दिखी। विवाहेतर संबंध पर बनी इस संवेदनशील फिल्म के मर्म और प्रभाव को टीवी पर देखकर नहीं समझा सकता। मैंने गौर किया कि इस फिल्म के महत्वपूर्ण दृश्य टीवी प्रसारण की सीमाओं के कारण कट चुके थे। स्मिता पाटिल और शबाना आजमी की भिड़ंत के दृश्य और कुलभूषण खरबंदा और शबाना आजमी के बीच की बहस के दृश्य कट चुके थे। उन दृश्यों के बगैर अर्थ देखने का मतलब नहीं रह जाता। अर्थ की तरह सभी एडल्ट और यू-ए फिल्मों के दृश्य कट जाते हैं। क्या यह संभव नहीं है कि फिल्मों को ज्यों का त्यों प्रसारित किया जा सके। फिलहाल ऐसी फिल्मों को देर रात में प्रसारित किया जा सकता है। इस तात्कालिक व्यवस्था के साथ ही सेंसर बोर्ड और अन्य संबंधित संस्थाओं को इस संदर्भ में पुनर्विचार करने की जरूरत है।

हमें नई प्रसारण नीति बनाने की जरूरत है। पिछले दस सालों में टीवी परिदृश्य बदल चुका है। दुनिया भर के चैनल भारतीय घरों में बेधड़क प्रवेश कर चुके हैं। उनके जरिए एडल्ट कंटेंट की फिल्मों और टीवी शो किसी सेंसर के बगैर घर-घर पहुंच रहे हैं। यहां तक कि भारतीय सैटेलाइट चैनलों के कंटेंट में भी गुणात्मक परिवर्तन आया है। अब वर्जित विषयों पर टीवी शो और सीरियल बन रहे हैं। कॉमेडी शो में सुनाए और दिखाए जा रहे लतीफों का सार स्त्री-पुरुष संबंधों पर ही रहता है। यहां तक कि एंकरों की हंसी और प्रतिभागियों के पॉज और अंदाज लतीफों के सेक्सुअल कंटेंट को रेखांकित कर देते हैं। मनोरंजन के व्यभिचार के इस दौर में जरूरत है कि एक स्पष्ट नीति बने। यह नीति एक तरफ टीवी की फूहड़ता रोके और दूसरी तरफ एडल्ट कंटेंट की फिल्मों और टीवी शो के प्रसारण को रेगुलेट कर सके।

ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में नाक पर रुमाल रखने के रवैए से काम नहीं चलेगा। समाज बदल चुका है। द डर्टी पिक्चर में आइटम गर्ल सिल्क की कहानी को दर्शक स्वीकार कर रहे हैं। इस फिल्म को ही प्रसारित करना हो तो क्या काट-छांट कर देने पर फिल्म का वही प्रभाव बना रहेगा। बिल्कुल नहीं। तिग्मांशु धूलिया को कहा गया कि साहब बीवी और गैंगस्टर विवाहेतर संबंध पर बनी फिल्म है, इसलिए इसे टीवी प्रसारण का सर्टिफिकेट देने में दिक्कत हो रही है। यही सेंसर बोर्ड और इसके सदस्य किसी नामचीन फिल्मकार या स्टार की फिल्म को सर्टिफिकेट देते समय सारे नियम ढीले कर देते हैं, लेकिन नए फिल्मकार और फिल्मों के लिए वे मुसीबतें खड़ी करने से बाज नहीं आते। सेंसर बोर्ड के सदस्यों की नीति तो बदलती नहीं। बस, फिल्मों और फिल्मकारों की हैसियत के आधार पर रवैया बदला जाता है।

Tuesday, January 10, 2012

ऑन स्‍क्रीन ऑफ स्‍क्रीन : गढ़ते-बढ़ते अनुराग कश्‍यप

क्रिएटिव लेकिन अराजक है अनुराग कश्यप-अजय ब्रह्मात्‍मज

फिल्मों से संबंधित सारे बौद्धिक और कमर्शियल इवेंट में एक युवा चेहरा इन दिनों हर जगह दिखाई देता है। मोटे फ्रेम का चश्मा, बेतरतीब बाल, हल्की-घनी दाढी, टी-शर्ट और जींस में इस युवक को हर इवेंट में अपनी ठस्स के साथ देखा जा सकता है। मैं अनुराग कश्यप की बात कर रहा हूं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के इस मुखर, वाचाल, निर्भीक और साहसी लेखक-निर्देशक ने अपनी फिल्मों और गतिविधियों से साबित कर दिया है कि चमक-दमक से भरी इस दुनिया में भी धैर्य और कार्य से अपनी जगह बनाई जा सकती है। बाहर से आकर भी अपना सिक्का जमाया जा सकता है। लंबे तिरस्कार, अपमान व संघर्ष से गुजर चुके अनुराग कश्यप में एक रचनात्मक आक्रामकता है। उनका एक हाथ मुक्के की तरह गलीज फिल्म इंडस्ट्री के ध्वंस के लिए तना है तो दूसरे हाथ की कसी मुट्ठी में अनेक कहानियां व सपने फिल्म की शक्ल लेने के लिए अंकुरा रहे होते हैं। अनुराग ने युवा निर्देशकों को राह दिखाई है। मंजिल की तलाश में वाया दिल्ली बनारस से मुंबई निहत्था पहुंचा यह युवक आज पथ प्रदर्शक बन चुका है और अब वह हथियारों से लैस है।

जख्म हरे हैं अब तक

इस तैयारी में अनुराग ने मुंबई में अनेक साल बिताए। थिएटर, टीवी, विज्ञापन और फिर फिल्मों तक पहुंचने का रास्ता सुगम तो बिलकुल नहीं रहा। निराशा हमेशा साथ रही, लेकिन निराशा में छिपी आशा ने उम्मीद का दामन थामे रखा। दोस्ती, बैठकी और सोहबत के शौकीन अनुराग ने कई-कई दिनों तक खुद को कमरे में बंद रखा, लेकिन अवसाद के क्षणों में भी आत्मघाती कदम नहीं उठाए। असमंजस और दुविधा के उस दौर में करीबी दोस्तों ने भी लानत-मलामत की। निकम्मा और फेल्योर कहा, दिल व दिमाग पर गहरे जख्म दिए। उन्हें अनुराग ने बडे जतन से पाल रखा है, क्योंकि उन जख्मों की टीस ही उन्हें नई चुनौतियों से जूझने और सरवाइव करने का जज्बा देती है। अभी अनुराग से अकेले मिल पाना मुश्किल काम है, लेकिन अगर आप उनके साथ समय बिताएं तो महसूस करेंगे वह भरी सभा में निर्लिप्त हो जाते हैं। अचानक खो जाना और फिर मुस्कराते हुए अपनी मौजूदगी जाहिर करना उनकी खासियत है। वे अपनी मौजूदगी से शांत झील में फेंके गए कंकड की तरह हिलोर पैदा करते हैं। उनसे हाथ मिलाते ही साथ हो जाने का गुमान फिल्मों में आने को उत्सुक और महत्वाकांक्षी युवकों को कालांतर में भारी तकलीफ देता है, लेकिन अनुराग अपने साथियों को हाथ मिला कर ही चुनते हैं। उन्हें अपना अनुगामी नहीं, सहयात्री बनाते हैं और यकीन करें कि उनसे दो-दो हाथ भी करने को तैयार रहते हैं। वे अपने युवा मित्रों एवं प्रशंसकों को साहस और मजबूती देकर अपनी चुनौती बढाते हैं। मैंने देखा है अपने कटु आलोचकों से उनका लाड-प्यार। उन्होंने रहीम के दोहे को जीवन में उतार लिया है। निंदक नियरे राखिए का वह आस्था से पालन करते हैं।

लुगदी साहित्य से प्रेम

अनुराग मुंबई आने के बाद सभी की तरह थोडा भटके और अटके। फिर उनकी मुलाकात राघवन बंधु (श्रीराम-श्रीधर), शिवम नायर और शिव सुब्रमण्यम से हुई। इनकी संगत और बातचीत में सिनेमा का ज्ञान बढा। लेखन का कौशल था, उसे और धार मिल गई। दरअसल फिल्मों में आने की प्रेरणा उन्हें फिल्म फेस्टिवल में देखी रिअलिस्टिक फिल्मों से मिली। उससे पहले की देखी हिंदी फिल्में भी अछी लगती थीं, उनसे रिश्ता भी महसूस होता था, लेकिन फिल्म बनाने का एहसास फेस्टिवल में देखी गई फिल्मों से ही जागा। लगा कि यह तो वह भी कर सकते हैं।

बहरहाल, मुंबई में पृथ्वी थिएटर और रंगमंच में थोडी सक्रियता बढी। तब इरादा ऐक्टिंग में भी किस्मत आजमाने का था। छोटे-मोटे काम भी किए। दो-चार संवाद बोले, मगर ऐक्टिंग का संघर्ष फालतू व लंबा लगने से लेखन की तरफ रुझान हो गया। उनके भाई-बहन बताते हैं कि कहानी सुनाना उन्हें बचपन से आता है। ड्रामा गढने में बचपन व किशोरावस्था में पढे लुगदी साहित्य से मदद मिली। अनुराग ने एक इंटरव्यू में बताया था कि वे सत्य कथा और मनोहर कहानियां बडे शौक से पढा करते थे।

पहली फिल्म डिब्बे में बंद आरंभिक दिनों में ही ऑटोशंकर के ऊपर एक स्क्रिप्ट लिखी। मजेदार वाकया है कि शूटिंग आरंभ होने वाली थी, मगर स्क्रिप्ट फाइनल नहीं थी। अनुराग ने जब जाना कि स्क्रिप्ट वर्क नहीं कर रही है तो राघवन बंधु से अनुमति लेकर लिखने की हिम्मत जुटाई। जोश और ऊर्जा की कमी थी नहीं। रातों-रात स्क्रिप्ट लिखी। उसी स्क्रिप्ट पर ऑटोशंकर की शूटिंग हुई। इससे प्रोत्साहित होकर अनुराग ने अपनी फिल्म लिखनी शुरू कर दी। फिल्म का नाम मिराज रखा था। बाद में वही स्क्रिप्ट पांच के नाम से बनी। हालांकि अनुराग की पहली सोची, लिखी और निर्देशित पांच अभी तक रिलीज नहीं हो सकी है। कैसी विडंबना है कि अंतरराष्ट्रीय ख्याति के इस युवा निर्देशक की पहली फिल्म पांच अभी तक डब्बे में बंद है!

मेनस्ट्रीम से दूरी

इसी बीच दिल्ली के मित्र मनोज बाजपेयी को महेश भट्ट की कुछ फिल्मों के बाद राम गोपाल वर्मा की दौड मिली। कहते हैं कि राम गोपाल वर्मा ने पहली मुलाकात में ही मनोज को भांपने के बाद भीखू म्हात्रे के बारे में सोच लिया था। उन्होंने मनोज को एक बार मना भी किया, तुम इतना छोटा काम मत करो, क्योंकि अगली बार मैं तुम्हें केंद्रीय भूमिका में लेकर फिल्म बनाऊंगा। एक स्ट्रगलर के लिए भविष्य से बेहतर विकल्प वर्तमान होता है। मनोज ने दौड में मामूली रोल किया। धुन के पक्के राम गोपाल वर्मा ने उन्हें सत्या का आइडिया सुनाया और कहा कि किसी नए लेखक को ले आओ। मनोज ने राम गोपाल वर्मा से अनुराग कश्यप की मुलाकात करवा दी। अनुराग ने बताया था, कुछ ही दिन पहले श्रीराम राघवन और दोस्तों के साथ मैंने रंगीला देखी थी। वह फिल्म मुझे इंटरेस्टिंग लगी थी। जब मनोज ने बताया कि राम गोपाल वर्मा मुझसे मिलना चाहते हैं तो मैं चौंका। मेरे मुंह से निकला- हां..और मुंह खुला रह गया। मुलाकात हुई। सत्या का लेखन आरंभ हुआ तो अनुराग की सारी योजनाएं धरी रह गई। अनुराग स्वीकार करते हैं, राम गोपाल वर्मा के साथ काम करने और सत्या, कौन और शूल फिल्म लिखने से मेरा आत्मविश्वास बढा। सत्या हिट होते ही सक्रियता और मांग बढ गई, लेकिन इंडस्ट्री की मुख्यधारा के निर्माता-निर्देशक अनुराग को लेकर आशंकित ही रहे। उन्हें यह ढीठ युवक नहीं सुहाता था।

अराजकता भी-एकाग्रता भी

अनुराग में लडने का दम है। अपने जीवन में अनुराग जितने भी अराजक व लापरवाह हों, काम को लेकर वह अनुशासित और एकाग्र रहते हैं। मैंने देखा है कि फिल्म की शूटिंग हो या राइटिंग, एक बार लीन हो जाने के बाद वे किसी और चीज पर ध्यान नहीं देते। पिछले 15-16 सालों में अनुराग ने यह विश्वास हासिल कर लिया है कि आप उन्हें जिम्मेदारी सौंप कर निश्िचत हो सकते हैं। यही कारण है कि अभी उन्हें निर्माता के तौर पर शामिल कर अनेक प्रोडक्शन कंपनियां चालू हो गई हैं। कॉरपोरेट हाउस हों या स्वतंत्र निर्माता, सभी को ब्रैंड अनुराग में भरोसा है। वे उनके नाम पर आज निवेश के लिए तैयार हैं। बडी से बडी फिल्म के लिए उत्सुक निर्देशकों-निर्माताओं के लिए उनका यह व्यवहार अनुकरणीय हो सकता है। देव डी की कामयाबी के बाद वह चाहते तो बडे स्टार्स को लेकर बडे बजट की महंगी फिल्म प्लान कर सकते थे। उनके समर्थन में कई निर्माता तैयार थे, लेकिन अनुराग ने दैट गर्ल इन येलो बूट्स जैसी छोटे बजट की फिल्म बनाई। इस फिल्म में कल्कि कोइचलिन मुख्य भूमिका में थीं। फिल्म के लिए बजट जुटा पाना मुश्किल था। लेकिन अनुराग ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने फिल्म पूरी की और एक साल के बाद उसे रिलीज किया। इसे कुछ लोग एक कलाकार की सनक के रूप में देख सकते हैं, लेकिन प्रलोभन से खुद को बचा लेने पर आर्टिस्ट भ्रष्ट होने से बचा रह जाता है। अनुराग के समकालीन दूसरे निर्देशकों में आ रहे भटकाव और पतन पर गौर करें तो इसे आसानी से समझा जा सकता है।

शादी ने दिया ठहराव

पति-पत्नी और प्रेमियों के बीच के संबंध को उनके अलावा कोई नहीं जान सकता। अनुराग पहली पत्नी आरती बजाज से कानूनी रूप से अलग हो चुके हैं। उन्होंने कल्कि कोइचलिन से शादी कर ली है। उनके नजदीकी बताते हैं कि इससे उनके जीवन और काम में व्यवस्था देखने को मिली है। उल्लेखनीय है कि अलगाव और झगडे के दिनों में कभी अनुराग ने आरती के लिए अपशब्द का इस्तेमाल नहीं किया और न शिकायत की। एकांतिक बातचीत में आत्मालोचना के स्वर में कहा, शायद मैं ही गलत था, निर्वाह नहीं कर सका। लेकिन आरती से उनके प्रोफेशनल संबंध बने रहे। इज्जत कायम रही। आरती ने उनकी फिल्में एडिट कीं। वे अपनी इकलौती बेटी के लिए पूरा समय निकालते हैं। उसके मन का काम करते हैं। उनके नए फ्लैट में बेटी का कमरा हमेशा सजा-धजा रहता है। पिछले दिनों वे अपने बेटी के साथ यूरोप की यात्रा पर गए थे। वे इसे अपने जीवन की यादगार यात्रा मानते हैं। उसके बाद कल्कि के साथ की गई दक्षिण अमेरिकी देशों की यात्रा ने उन्हें जिंदगी जीने व समझने का नया सलीका दिया है। मुझे साफ दिखता है कि शादी के बाद अनुराग की ग्रंथियां कम हुई हैं।

समकालीनों की तारीफ

पिछले दिनों इम्तियाज अली की फिल्म रॉकस्टार रिलीज हुई तो अनुराग ने दावा किया कि आलोचक अगर इसी फिल्म को दोबारा देखें तो उनकी राय बदल जाएगी। यही हुआ भी। उन्होंने असंतुष्ट और मुखर आलोचकों के बीच इम्तियाज अली को बिठाया। रात के एक से साढे तीन बजे तक मुंबई के सिनेमैक्स थिएटर की सीढियों पर चले उस प्रश्नोत्तर प्रसंग में शामिल मित्रों में से कोई भी ता-जिंदगी नहीं भूल पाएगा। अनुराग ने ऐसा क्यों किया? कायदे से देखें तो इम्तियाज और अनुराग की शैली की भिन्नता स्पष्ट है, लेकिन सोचा न था के समय से वे इम्तियाज के समर्थन में खडे दिखाई देते हैं। इम्तियाज का ऐसा ही समर्थन अनुराग को भी हासिल है। फर्क यही है कि इम्तियाज छाती ठोक कर समर्थन नहीं करते, जबकि अनुराग कश्यप बेशर्मी की हद तक समर्थन पर उतर आते हैं। अपने समकालीनों से परस्पर सम्मान और समर्थन का ऐसा व्यवहार हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में नहीं दिखता।

नए लोगों को दिया मौका

हाल ही में मध्य प्रदेश के एक शहर से आए युवा महत्वाकांक्षी निर्देशक से मुलाकात हुई। वह अपनी स्क्रिप्ट के साथ फिल्म बनाने की इछा लिए घूम रहा है। मैंने पूछा कि कहां रहते हो? जीवन कैसे चलता है? उसने तपाक से बताया, अनुराग सर ने ऑफिस में रहने की अनुमति दे दी है। कुछ दिन-महीने वहां रह लूंगा। मेरे जैसे कई स्वप्नजीवी वहां हैं। पता चला कि अनुराग थोडी नाराजगी और झडप के साथ सभी को अपने ऑफिस में रहने, टिकने और खुद को संभालने का मौका देते हैं। वे प्रतिभाशाली लडकों को कभी निराश नहीं करते। मौके देते और दिलवाते हैं, लेकिन उनका नारा है बी द चेंज (स्वयं परिवर्तन बनो)। उनकी यही सलाह है कि जो करना चाहते हो, खुद करो। किसी के सहारे या भरोसे मत रहो। हालांकि उनके इस तर्क से कई पुराने व अभिन्न मित्र नाराज भी हुए, क्योंकि अनुराग ने पुराने परिचितों-मित्रों के बजाय नए लोगों को फिल्में बनाने के मौके दिए।

हिंदी साहित्य से लगाव

अनुराग की खासियत है कि वे एक साथ विदेशों में पैदा हो रही नई प्रवृत्तियों और देश में आकार ले रहे नए विचारों से वाकिफ हैं। अधिकतर लेखक और निर्देशक कामयाब होने के साथ देखना, पढना और मिलना छोड देते हैं, लेकिन मैंने देखा है कि अनुराग बहुत पढते हैं। हिंदी साहित्य से लेकर विश्व सिनेमा तक से परिचित हैं। कारण पूछने पर वे हंसते हुए कहते हैं, वाकिफ नहीं रहूंगा तो दो साल बाद आप ही गाली देने लगोगे और मुझसे बातें करना बंद कर दोगे। अनुराग की ताजा कामयाबी है कि जिस यशराज कैंप से कभी उन्हें बहिष्कृत कर दिया गया था, अब उसी में अनुराग ने अपने मित्रों के साथ नई प्रोडक्शन कंपनी फैंटम की लॉन्चिंग की है। फिल्म इंडस्ट्री में कदम रख रहे सहमे-घबराए युवकों के लिए अनुराग सफल प्रेरणा हैं।

Friday, January 6, 2012

संग-संग : ठहराव देती है शादी : सलीम आरिफ-लुबना सलीम

ठहराव देती है शादी सलीम-लुबना-अजय ब्रह्मात्‍मज सलीम आरिफ और लुबना सलीम दोनों थिएटर की दुनिया में हैं। लखनऊ के सलीम ने दिल्ली स्थित राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से अभिनय का प्रशिक्षण लेने के बाद श्याम बेनेगल और डॉ. चंद्र प्रकाश द्विवेदी के साथ कॉस्टयूम और सेट डिजाइन पर काम किया। लुबना ने इप्टा के नाटकों से शुरुआत की और धारावाहिकों में भी मुख्य भूमिकाएं निभाई।

संपर्क, पहचान और रिश्ता

सलीम आरिफ: मैं श्याम बेनेगल का धारावाहिक भारत एक खोज कर रहा था तो लुबना की मम्मी मेरी को-डिजाइनर थीं। मैं इनके घर आता-जाता था। तब लुबना इप्टा के नाटक अंधे चूहे का रिहर्सल कर रही थीं। मेरे अम्मी-अब्बा से भी उनकी मुलाकात हुई।

लुबना: मम्मी के कलीग थे सलीम। वह अकेले रहते थे। अकसर पापा उन्हें खाने को रोक लेते। मुझे अजीब लगता कि पापा एक यंग लडके से इतनी बात कैसे करते हैं। सलीम के अम्मी-अब्बा आए तो तय हुआ कि दावत होनी चाहिए। यह 1989 की बात है। तब मैं सेकंड ईयर में थी। एक महीने के बाद अम्मी का खत मेरे मम्मी-पापा के पास आया कि बिटिया हमें पसंद है। मेरे घर में सब चौंक गए।

सलीम: अम्मी को लुबना व इनका परिवार काफी पसंद आया। मेरी शादी को लेकर वे सोच भी रहे थे, इसलिए उन्होंने खत लिखा।

लुबना: हर लडकी के लिए उसका पिता आदर्श होता है। मुझे लगता था कि जिस लडके से पापा इतनी बातचीत करते हैं, वह अच्छा ही होगा। जब रिश्ता आया तो मैंने गंभीरता से सोचना शुरू किया।

सलीम: हालांकि हमारे बीच औपचारिक रिश्ता था। कुछ कॉमन बातें ही होती थीं।

लुबना: हम थिएटर, ऐक्टिंग, कॉस्ट्यूम को लेकर बातें करते थे। मेरे मन में कभी यह बात नहीं आई थी कि ये मेरे पति हो जाएंगे।

सलीम: अम्मी-अब्बा के अलावा अबरार अल्वी (मेरे मामू) की बडी भूमिका रही हमें मिलाने में। मामू के कारण ज्यादा पूछताछ नहीं हुई। घर, खानदान जैसी जानकारियां मामू ने दे दीं। घर वालों को लगा कि मुंबई की लडकी है, ठीक रहेगा। लडके के काम के बारे में भी नहीं बताना पडेगा, क्योंकि मेरे काम के बारे में लुबना के माता-पिता अच्छी तरह जानते थे। इससे अम्मी-अब्बा को भी राहत मिली। एक फ्रीलांसर लडके को अच्छी लडकी मिल गई।

लुबना: अगर मुस्लिम परिवारों के लिहाज से देखें तो हमारे लिए भी अच्छी बात थी। वर्ना लोग पूछते कि लडकी थिएटर करती है? शादी के बाद भी करेगी? ऐसे कई हजार सवालों के जवाब हमें देने पडते। अच्छा हुआ कि इनकी अम्मी को मैं पसंद आ गई और सब कुछ ठीक हो गया।

सलीम: अब मुझे लगता है कि मैं शादी करने ही मुंबई आया था। अपने काम के लिहाज से तो दिल्ली मेरे लिए ज्यादा मुफीद जगह थी। दोनों परिवारों को राहत मिली।

शादी और आरंभिक दिन

लुबना: 20-21 की उम्र में शादी हो गई। जल्दी ही बडा बेटा फराज जिंदगी में आ गया।

सलीम: हम फराज को साथ लेकर काम पर जाते थे। इसके बाद छोटा बेटा हुआ। काफी मुश्किलें हुई, लेकिन धीरे-धीरे वह वक्त भी निकल गया। जिम्मेदारियां जल्दी पूरी हो गई।

लुबना: मेरी फ्रेंड्स कहती थीं कि मैं जल्दी शादी क्यों कर रही हूं? करियर का क्या होगा?

सलीम: लेकिन अब हम मजे से काम कर रहे हैं। दस सालों से पूरी तरह थिएटर में हैं।

लुबना: दोनों बच्चे पढ रहे हैं। एक हॉस्टल में है, एक हमारे साथ। अब हमें उनकी फिक्र नहीं है। जिम्मेदारियां पूरी हो गई।

सलीम: अब शादी को लेकर एटीट्यूड बदल गया है। हम लोग ओल्ड स्कूल के थे, इसलिए अभिभावकों की बात मान कर शादी कर ली। हमने पारिवारिक मूल्यों को माना।

लुबना: हम जिस परिवार, परिवेश, संस्कृति में पले-बढे, उसी हिसाब से करियर बनाया और शादी की। हमारे फैसले ठीक रहे। मैं भाग्यशाली हूं कि मुझे सलीम जैसे पति मिले।

करियर और समझदारी

लुबना: अच्छी बात यह थी कि एक-दूसरे के काम के बारे में हमें जानकारी थी। शूटिंग में देर-सबेर हो जाती है, यह पता था। इस तरह एक पारस्परिक समझदारी विकसित हुई।

सलीम: हमने एक-दूसरे के काम की जरूरत को समझा, लिहाजा दिक्कत नहीं हुई।

लुबना: सलीम ने न कभी मुझसे सवाल पूछे और न मांग की। मुझ पर इनका अटूट भरोसा रहा। मैं शादी में भी आजाद रही। सलीम के कारण ही मुझे खुद को समझने में मदद मिली। आज ये मेरे सबसे अच्छे दोस्त हैं। शादी के बाद हमने भी कई स्तरों पर सामंजस्य बिठाया। असुरक्षा हुई, मगर डरे नहीं।

सलीम: इनके कारण मैं मनपसंद जिंदगी जी सका। इन्हें कभी कुछ समझाने की जरूरत नहीं पडी। इसलिए हमारी शादी टिकी है। हमारे करियर में अनिश्चितता व रोमांच दोनों हैं। हमने कम खर्च में घर चलाया, जरूरतें सीमित रखीं, बच्चों पर ज्यादा खर्च नहीं किया।

बीवी-शौहर का रिश्ता

लुबना: मैं अच्छी बीवी हूं। इनसे कभी सोने के कंगन नहीं मांगे। हमारे बीच कभी लडाई नहीं हुई। वैसे हमारी जिंदगी बोहेमियन रही है।

सलीम: मैं डायरेक्शन में हूं और लुबना ऐक्टिंग में। करियर को लेकर हमारे रास्ते कभी क्रॉस नहीं हुए। हमने तय किया कि टीवी या फिल्म नहीं करनी है तो नहीं किया। देर से सही, हमें सफलता मिली। हम तो मानते हैं कि हमारी तीसरी औलाद थिएटर है।

लुबना: बीवी को ऐक्टिंग करनी है, इसलिए शौहर ने ग्रुप बना लिया, ऐसी कोई बात नहीं रही। मैंने खुद को साबित किया, बाहर निकल कर काम किया, तब सलीम ने मुझे काम दिया। हम अलग-अलग व्यक्तित्व वाले हैं। मुझे पता है कि कभी-कभी इन्हें एकांत चाहिए, लिहाजा मैंने इसका ध्यान रखा।

सलीम: हमें एक-दूसरे की आदत हो गई है।

घर-परिवार और फैसले

सलीम: घर के जरूरी फैसले लुबना लेती हैं।

लुबना: सलीम ने हर कदम पर मेरा साथ दिया। शादी के बाद मेरे हाथ का बुरा खाना भी खाया। बाद में मैंने खाना बनाना सीखा। घरेलू जरूरतों के लिए मैंने इन्हें परेशान नहीं किया। सलीम हर महीने निश्चित खर्च मुझे देते हैं, उसी में घर चलाती हूं।

सलीम: कई दफा मैं कुछ न करके कंट्रीब्यूट करता हूं। लुबना अतिरिक्त खर्च नहीं मांगतीं। इस मामले में बहस नहीं है, हां घर की मरम्मत करानी पडे तो बहसें हो जाती हैं।

लुबना: शुरू में मैं थोडा अधीर थी। धीरे-धीरे हम एक राह पर चल पडे।

बच्चों को आजादी

सलीम: हमने अपने फैसले ख्ुाद लिए, इसलिए बच्चों को भी ये आजादी है।

लुबना: सलीम बेहद उदार पिता हैं।

सलीम: मेरा बस एक ही कंसर्न है कि बच्चे कभी विफल न हों। उन्हें केवल यही कहता हूं कि इतना ज्ञान अवश्य होना चाहिए कि किसी के सामने बैठने पर हीन भावना न महसूस हो।

लुबना: आजकल बच्चों को मालूम है कि उन्हें क्या चाहिए। वे जल्दी समझदार हो रहे हैं। हमने कभी उन पर दबाव नहीं डाला। मैं भाई-बहनों में सबसे बडी हूं। मुझ पर कोई पाबंदी नहीं रही। बचपन से इप्टा के नाटक करती थी। इसलिए हमने बच्चों को भी वैसे ही पाला।

मनमुटाव और सुलह

लुबना: झगडे थिएटर को ही लेकर होते हैं। कई बार तो बात इतनी बढती है कि सोचते हैं कि साथ काम नहीं करेंगे। मगर घर की सीढियां चढते हुए झगडा खत्म हो जाता है।

सलीम: काम के तनाव को घर नहीं लाते।

लुबना: कोई भी बात हो, उसे आपस में ही निपटा लेते हैं। मैं पहले ही सॉरी बोल देती हूं। सलीम से बात किए बिना मैं रह नहीं सकती।

सलीम: मैं कभी सॉरी नहीं बोलता। हालांकि यह भी नहीं कह सकता कि मैं कम गलत होता हूं। वैसे मैं मन में कोई बात नहीं रखता।

लुबना: ये झगडते नहीं, खामोशी से मुद्दे से बाहर निकल जाते हैं। ज्यादातर ये सही होते हैं। इनमें गजब का धैर्य है। यकीन करेंगे, मैं शादी के बाद कभी एक दिन के लिए भी मायके नहीं रुकी। घर, बच्चे, सलीम याद आने लगते हैं। मैं इन लोगों के बिना रह ही नहीं पाती।