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Thursday, April 27, 2017

रोज़ाना : सुनील शेट्टी का 'स्वस्थ भारत'

रोज़ाना

सुनील शेट्टी का 'स्वस्थ भारत'                                
- अजय ब्रह्मात्मज

गोवा में 'इंडियाज़ असली चैंपियन' की शूटिंग कर रहे सुनील शेट्टी का रंग धूप और गर्मी की वजह से गाढ़ा हो गया है। अगले महीने से ऐंड टीवी पर आने वाले इस शो के मेजबानी में तल्लीन सुनील शेट्टी को मनमाफिक काम मिला है। 12 प्रतिभागियों के साथ गोवा में लगातार शूटिंग कर रहे सुनील शेट्टी चाहते हैं कि दर्शक उनके शो से कुछ सीखें। 12 प्रतिभागियों के माध्यम से सुनील शेट्टी दर्शकों के बीच शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहने का संदेश भी देना चाहते हैं। उनकी पहल पर इस शो के साथ 'स्वस्थ भारत अभियान' जोड़ दिया गया है। ध्वनि और उद्देश्य में यह 'स्वच्छ भारत अभियान' से मिलता-जुलता है। सुनील मानते हैं कि स्वच्छता और स्वास्थ्य का सीधा संबंध है।

पिछले कुछ समय से सुर्खियों से गायब सुनील शेट्टी ने काम से छुट्टी ले रखी थी। उनके पिता सख्त बीमार थे। पिता की तीमारदारी में दिल-ओ-जान से लगे सुनील शेट्टी ने लगभग तीन सालों तक खुद को लाइमलाइट से बाहर रखा। पिता के दिवंगत होने के बाद उन्होंने अपनी सक्रियता बढ़ाई। मिल रहे ऑफर में से उन्होंने टीवी शो 'इंडियाज़ असली चैंपियन' चुना। सुनील शेट्टी के मुताबिक यह शो उ के दिल और जीवन के करीब है। काम लोगों को याद होगा कि संजय दत्त और सलमान खान के पहले युवकों के बीच सुनील शेट्टी का क्रेज था। एक्शन फिल्मों में अपने सुगठित शरीर की वजह से वह काफी पसंद किए जाते थे। आज भी हिंदी समाज के अंदरूनी इलाकों में सुनील शेट्टी का जादू कायम है। उनकी फिल्में आज भी खूब देखी जाती हैं। कस्बों और छोटे शहरों के दर्शक उनके मुरीद हैं।

सुनील शेट्टी के 'स्वस्थ भारत अभियान' और टीवी शो में 'शरीर चुस्त और दिमाग दुरुस्त' पर जोरबड़िया जा रहा है। शिवम शरीर के अभ्यास और वृंदा दिमाग के प्रयास का प्रशिक्षण दे रहे हैं। सुनील की टीम का मानना है कि आज सभी की सबसे बड़ी परेशानी दिमागी है। नियमित कसरत और जिम जाने के बाद भी लोग बीमार पड़ रहे हैं। अधिकांश व्याधियां जीवन शैली से सम्बंधित हैं,जिन्हें योग के प्राणायाम से बहुत आसानी से संशोधित किया जा सकता है। बीमारी और ताकत दोनों ही पहले दिमाग में पैदा होती है। बाद में शरीर उसका अनुपालन करता है। सुनील शेट्टी कहते हैं कि साधारण अनुशासन और अभ्यास से हु। स्वस्थ राह सकते हैं। इस लिहाज से यह अनोखा शो ह्योग,जो मनोरंजन के साथ दर्शकों की सेहत का भी ख्याल रखेगा।



रोज़ाना : क्‍यों नहीं होती दक्षिण भारत के फिल्‍मकारों की चर्चा



रोज़ाना
क्‍यों नहीं होती दक्षिण भारत के फिल्‍मकारों की चर्चा
-अजय ब्रह्मात्‍मज
हिंदी सिनेमा की चर्चा और खबरों के बीच हमारा ध्‍यान दक्षिण भारत की भाषाओं की फिल्‍मों की ओर कम ही जाता है। हम वहां के कलाकारों और निर्देशकों से अपरिचित हैं। तमिल फिल्‍मों के रजनीकांत और कमल हासन के अलावा हम तेलुगू,कन्‍नड़ और मलयालम के कलाकरों के नाम तक नहीं जानते। हालांकि टीवी पर इन दिनों दक्षिण भारतीय भाषाओं की डब फिल्‍मों की बहार है। पिछले साल तूलुगू के पावर स्‍टार पवन कल्‍याण ने बताया था कि बनारस भ्रमण के दौरान वे इस तथ्‍य से चौंक गए कि वहां की गलियों में भी लोगों ने उन्‍हें पहचाल लिया। पता चला के टीवी के जरिए ही उनकी यह पहचान बनी थी। भारत सरकार और प्रदेशों के सिनेमा संबंधी मंत्रालय देश में ही सभी भाषाओं की फिल्‍मों के आदान-प्रदान और प्रदर्शन में यकीन नहीं रख्‍ते। पिछले साल बिहार सरकार में फिल्‍म वित्‍त निगम के अध्‍यक्ष बनने पर गंगा कुमार प्रादेशिक भाषाओं की फिल्‍मों का फस्टिवल किया था। ऐसी कोशिशें हर प्रदेश में होनी चाहिए।
हाल ही में तेलुगू के श्रेष्‍ठ फिल्‍मकार के विश्‍वनाथ को दादा साहेब फालके पुरस्‍कार से सम्‍ममानित करने की घोषणा हुई है। इस घोषणा के बावजूद हिंदी पत्र-पत्रिकाओं और न्‍यूज चैनलों पर उनके बारे में न के बराबर ही लिखा और बताया गया। के विश्‍वनाथ का पूरा नाम काशीनाधुनी विश्‍वनाथ है। 1930 में पैदा हुए के विश्‍वनाथ तेलुगू समाज में प्रात: स्‍मरणीय नाम हैं। हिंदी फिल्‍मों में अभी ऐसी कोई हस्‍ती नहीं है,जिन्‍हें इस स्‍तर का आदर हासिल हो।  1960 से सक्रिय के विश्‍वनाथ ने पचास से अधिक फिल्‍मों का निर्देशन किया है। उनकी प्रमुख फिल्‍मों में शंकरभरणम,सागर संगमम,स्‍वाति मुतयम,स्‍वयंकृषि और सिरी सिरी मुवा उल्‍लेखनीय हैं। हिंदी के दर्शकों को उनकी ईश्‍वर याद होगी। अनिल कपूर और विजया शांति की यह फिल्‍म के विश्‍वनाथ की ही तेलुगू फिल्‍म की रीमेक थी। के विश्‍वनाथ ने तूलुगू,तमिल और हिंदी में फिल्‍में निर्देशित की हैं।
के विश्‍वनाथ तेलुगू सिनेमा को आम दर्शकों के बीच ले आए। उन्‍होंने अपनी फिल्‍मों में परिचित किरदारों को पेश किया। तेलुगू समाज के पाखंड को उन्‍होंने पर्दे पर बेनकाब किया। सजग चेतना के फिल्‍मकार के विश्‍वनाथ मानते हैं कि सिनेमा से समाज में बदलाव लाश जा सकता है। उन्‍होंने आर्ट फिल्‍में बनाने का दावा नहीं किया। उन्‍की फिल्‍में मध्‍यमार्गी कही जा सकती हैं। मनोरंजन के उद्देश्‍य को पूरा करती उनकी फिल्‍मों में निहित संदेश अवश्‍य रहता था।
फिल्‍म निदेशालय दादा साहेब फालके से सम्‍मानित फिल्‍मकार और कलाकारों की चुनिंदा फिल्‍मों का प्रदर्शन सभी प्रदेशों की राजधानियों और प्रमुख शहरो में आयोजित करे तो हम अने देश की सिनेमाई विविधता और खूबियों से परिचित हो सकते हें।

Wednesday, April 26, 2017

रोज़ाना : लौट आई हैं प्रियंका चोपड़ा

रोज़ाना
लौट आई हैं प्रियंका चोपड़ा
-अजय ब्रह्मात्मज
अमेरिका में अभिनय अभियान का पहला चक्र पूरा कर प्रियंका चोपड़ा मुंबई लौट आई हैं। पिछले शनिवार को मुंबई लौटी प्रियंका चोपड़ा अभी दोस्तों से मिल रही हैं और ज़्यादातर शामें पार्टियों में बिता रही हैं। एक अरसे के बाद दोस्तों से मिल रही प्रियंका के पास सुनने-बताने के लिए बहुत कुछ है। रितः सिधवानी ने उनकी वापसी पर दी पार्टी में : दिल धड़कने दो' के कलाकार रणवीर सिंह और निर्देशक ज़ोया अख्तर को भी बुलाया था। रणवीर और प्रियंका की अच्छी छनती है। पर्दे पर दोनों ने भाई-बहन और पति-पत्नी की भूमिकाएं भी निभाई हैं। माना जाता है कि दीपिका पादुकोण और प्रियंका चोपड़ा में कड़ी टक्कर है,लेकिन रणवीर और प्रियंका की दोस्ती एक अलग स्तर की है।
प्रियंका चोपड़ा अपने कैरियर में अभी खास मोड़ पर हैं। अपना उत्कर्ष देने के पहले ही उनके कैरियर में हॉलीवुड का विक्षेप आया। अमेरिका जाकर उन्होंने 'क्वांटिको' टीवी शो के दो सीजन और एक फ़िल्म 'बेवाच' की। फ़िल्म की रिलीज बाकी है। फ़िल्म आने के बाद सही अंदाज लगेगा कि हॉलीवुड में उनके लिए संभावनाओं के पट पूरी तरह से खुलते हैं या नहीं? फिलहाल यही खुशी की बात है कि दीपिका और प्रियंका ने हॉलीवुड की मेनस्ट्रीम फिल्मों से दस्तक दी। हिंदी फिल्मों के कलाकार एक अरसे से इंटरनेशनल प्रोजेक्ट कर रहे हैं,लेकिन अभी तक किसी की पुरज़ोर मौजूदगी जाहिर नहीं हुई है। जानकार बताते हैं कि हॉलीवुड और हिंदी सिनेमा के बीच कलाकारों और तकनीशियनों की आवाजाही और बढ़ेगी। हाल ही में राजकुमार राव ने 'राब्ता' का अपना लुक शेयर किया। उनके इस लुक का प्रोस्थेटिक मेकअप हॉलीवुड के आर्टिस्ट ने भारतीय टीम के सहयोग से तैयार किया।

प्रियंका चोपड़ा फ़िल्म प्रोडक्शन में आ गयी हैं।उनकी माँ प्रोडक्शन देख रही हैं। माँ- बेटी ने एक भोजपुरी और एक मराठी फिल्म का निर्माण किया है। अभी मराठी जितनी सराही जा रही है,उतनी ही भोजुरी कि निंदा हुई थी। प्रियंका की माँ भोकपुरी भाषी हैं,फिर भी उन्हें किसी ने बरगला दिया। प्रियंका चोपड़ा के पास अभी कोई हिंदी फिल्म नहीं है। वह थोड़ी दुविधा में हैं।हॉलीवुड के आफर के लिए वह खुद को खाली रख रही हैं।कई बार ऐसे इंतज़ार में कलाकार खुद का ही नुकसान कर लेते हैं। पुरानी कहावत है...दुविधा में दोनों गए,माया मिली न राम। प्रियंका चोपड़ा ने हिंदी फिल्मों के बाहरी इंतज़ार से बेहतर अपना प्रोडक्शन आरम्भ कर दिया है।वह कल्पना चावला के जीवन पर एक बॉयोपिक की तैयारी कर रही हैं। इसका निर्देशन प्रिया मिश्रा करेंगी। यह उम्दा निर्णय है,क्योंकि हिंदी की प्रचलित फिल्मों में प्रियंका के लिए फिल्में लिखनी होंगी। उम्र और अनुभव से वह सामान्य फिल्में नहीं कर सकतीं। और उनके बाद नई अभिनेत्रियों की कामयाब टुकड़ी आ चुकी है।

Saturday, April 22, 2017

रोज़ाना : अनारकली... को मिल रहे दर्शक



रोज़ाना
अनारकली... को मिल रहे दर्शक
-अजय ब्रह्मात्‍मज
हाल ही में अनारकली ऑफ आरा के निर्माता संदीप कपूर और निर्देशक अविनाश दास ने सोशल मीडिया पर शेयर किया कि उनकी फिल्‍म पांचवें हफ्ते में प्रवेश कर गई है। दिल्‍ली और मुंबई के कुछ थिएटरों में वह अभी तक चल रही है। रांची और जामनगर में वह इस हफ्ते लगी है। किसी स्‍वतंत्र और छोटी फिल्‍म की यह खुशखबर खुद में बड़ी खबर है। हम सभी जानते हैं कि छोटी फिल्‍मों का वितरण और प्रदर्शन एक बड़ी समस्‍या है। पीवीआर के साथ होने पर भी अनारकली ऑफ आरा केवल 277 स्‍क्रीन में रिलीज हुई थी। इस सीमित रिलीज को भी उम्‍त कंपनी ने कायदे से प्रचारित और प्रदर्शित नहीं किया था।
मजेदार तथ्‍य है कि मुंबई में अंधेरी स्थित पीवीआर के एक थिएटर में इम्तियाज अली ने यह फिल्‍म देखी। फिल्‍म देखने के बाद उन्‍होंने निर्देशक अविनाश दास के साथ सेल्‍फी लेने के लिए फिल्‍म के पोस्‍टर या स्‍टैंडी की खाज की तो वह नदारद...उन्‍होंने ताकीद की तो थिएटर के कर्मचारियों ने स्‍टैंडी का इंतजाम किया। तात्‍पर्य यह कों की रुचि कैसी बढ़गी? बहरहाल,अनारकली ऑफ आरा दर्शकों के समर्थन से अभी तक थिएटर में बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया और जॉली एलएलबी2 के साथ टिकी है।
फिल्‍म के विषय के अनुरूप संभावित दर्शकों को टारगेट किया जाता तो इस फिल्‍म को ज्‍यादा दर्शक मिले होते। हर फिल्‍म के खास दर्शक होते हैं। अगर उन दर्शकों के बीच फिल्‍म पहुंच जाए तो उसे लाभ होता है। अनारकली ऑफ आरा मुख्‍य रूप से दिल्‍ली और मुंबई में रिलीज की गई। फिल्‍म के विषय के मुताबिक इसे मझोले और छोटे शहरों में आक्रामक प्रचार के साथ प्रदर्शित किया जाता तो आंकड़े कुछ और होते। दर्शक तो अब भी संकेत दे रहे हैं। अगर इसे नए उत्‍साह और प्रचार के साथ नए शहरों में रिलीज किया जाए तो अवश्‍य ही दर्शक मिलेंगे। अनारकली ऑफ आरा नया उदाहरण पेश करेगी।
सीमित बजट और साधनों के साथ बनी यह फिल्‍म अपने कंटेंट और स्‍वरा भास्‍कर की अदाकारी की वजह से खूब पसंद की गई है। हाल-फिलहाल में किसी दूसरे फिल्‍मकार पर पत्र-पत्रिकाओं में इतना लिखा भी नहीं गया है। यह फिल्‍म आम दर्शकों को टच करती है। सहमति के सवाल को प्रासंगिक संदर्भ में सटीक तरीके से उठाती ंयह फिल्‍म हिंदी सिनेमा के देशज स्‍वर को मुखर करती है। यही वजह है कि इस फिल्‍म के दर्शक बढ़ रहे हैं।
अनारकली ऑफ आरा भाषा,परिवेश और अदाकारी के लि‍हाज से बिहार लक्षणों की खांटी हिंदी फिल्‍म है।

Friday, April 21, 2017

दरअसल : पक्ष और निष्‍पक्ष



दरअसल...
पक्ष और निष्‍पक्ष
-अजय ब्रह्मात्‍मज
पिछले दिनों सोनू निगम अपने पक्ष को रखने की वजह से चर्चा में रहे। उसके कुछ दिनों पहले सुशांत सिंह राजपूत अपना पक्ष नहीं रखने की वजह से खबरों में आए। फिल्‍म जगत के सेलिब्रिटी आए दिन अपने पक्ष और मंतव्‍य के कारण सोशल मीडिया,चैनल और पत्र-पत्रिकाओं की सुर्खियों में रहते हैं। कुछ अपने अनुभवों और मीडिया मैनेजर के सहयोग से बहुत खूबसूरती से बगैर विवादों में आए ऐसी घटनाओं से डील कर लेते हैं। और कुछ नाहक फंस जाते हैं। अभी एक नया दौर है,जब सारे मंतव्‍य राष्‍ट्रवाद और सत्‍तासीन राजनीतिक पार्टी के हित के नजरिए से आंके जाते हैं। नतीजतन अधिकांश सेलिब्रिटी किसी भी मुद्दे पर अपना पक्ष रखने से बचते हैं। वे निष्‍पक्ष और उदासीन होने का नाटक करते हैं। आप अकेले में मिले तो ऑफ द रिकॉर्ड वे अपनी राय शेयर करते हैं,लेकिन सार्वजनिक मंचों से कुछ भी कहने से कतराते हैं।
कुछ समय पहले सहिष्‍णुता के मसले पर आमिर खान और शाह रूख खान के खिलाफ चढ़ी त्‍योरियां सभी को याद होंगी। गौर करें तो एक जिम्‍मेदार नागरिक के तौर पर उन्‍होंने अपना सहज पक्ष रखा था,लेकिन उन्‍हें लोकप्रिय राजनीति के समर्थकों की नाराजगी का शिकार होना पड़ा। उसके बाद से फिल्‍म सेलिब्रिटी ने खामोश रहने या कुछ न कहने का ढोंग ओढ़ लिया है। डर से वे जरूरी मुद्दों पर स्‍वीकृत राय रखने से भी हिचकते हें। राब्‍ता के ट्रेलर लांच में एक पत्रकार के यह पूछने पर कि कुलभूषण जाधव को पाकिस्‍तान में मिली फांसी की सजा पर आप सभी की क्‍या राय है? उन्‍होंने कुछ भी कहने के बजाए सवाल को टाला। यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर दो राय की गुंजाइश नहीं है। एक स्‍वर से पूरा देश चाहता है कि कुलभूषण जाधव सुरक्षित भारत लौटें। भारत सरकार इस मसले को गंभीरता से ले रही है। अपनी नादानी में ट्रेलर लांच में शरीक फिल्‍म स्‍टारों ने चुप्‍पी साधी। सवाल को टाला और दोबारा जोर देने पर भिड़ गए कि इस मुद्ृदे की हमें सही जानकारी नहीं है। यह भी कहा गया कि ट्रेलर लांच में ऐसे सवाल नहीं पूछे जाने चाहिए।
अगला सवाल बनता है कि सार्वजनिक व्‍यक्तियों से कोई सवाल कब पूछा जाए? ऐसी कोई संहिता नहीं है। सार्वजनिक मंचों पर किसी इवेंट में ही ऐसे सवाल पूछे जा सकते हैं। मुमकिन है कि सेलिब्रिटी किसी मुद्दे से वाकिफ न हों। वैसे ममामले पर वे ईमानदारी से अपनी अनभिज्ञता जाहिर कर सकते हैं,लेकिन कन्‍नी काटना तो उचित नहीं है। अब तो ऐसा समय आ गया है कि सभी सेलिब्रिटी को आसपास की घटनाओं और गतिविधियों पर नजर रखनी होगी। उन्‍हें तैयार रहना होगा। जरूरत पड़े तो उन्‍हें सामान्‍य ज्ञान और सामयिक घटनाओं की अद्यतन जानकारी के लिए सलाहकार भी रखनी होगी। सेलिब्रिटी होने के बाद उनसे अपेक्षा बढ़ जाती है कि वे सभी विषयों की सामान्‍य जानकारी रखें। इन दिनों तो फोरम और सेमिनार में चिंतको,अध्‍येताओं और विचारकों के साथ उन्‍हें बुलाया जाने लगा है। उनके व्‍यावहारिक ज्ञान को भी महत्‍व दिया जा रहा है।
यह तटस्‍थ्र या निष्‍पक्ष रहने का समय नहीं है। निष्‍पक्षता वास्‍तव में विवादों से बचने का कवच है। अमिताभ बच्‍चन अपने ब्‍लॉग पर हमेशा सेलिब्रिटी होने की चुनौतियों पर लिखते हैं। वे मानते हैं कि हमें इसके लिए तैयार रहना चाहिए। गालियों और निंदा के रूप में मिले खट्टे बादामों का भी स्‍वाद लेना चाहिए। सच में सेलिब्रिटी घोर असुरक्षित व्‍यक्ति होता है,जो हर वक्‍त सभी के निशाने पर रहता है। सेलिब्रिटी की निजता लगभग खत्‍म हो जाती है। हमेशा उसकी स्‍क्रूटनी चल रही होती है। जाहिर है कि ऐसी स्थिति में उन्‍हें अपना पक्ष मजबूत रखना चाहिए और उसके लिए सामाजिक सरोकार बढ़ाना चाहिए।

Thursday, April 20, 2017

फिल्‍म समीक्षा : नूर



फिल्‍म रिव्‍यू
बेअसर और बहकी
नूर
-अजय ब्रह्मात्‍मज
जब फिल्‍म का मुख्‍य किरदार एक्‍शन के बजाए नैरेशन से खुद के बारे में बताने लगे और वह भी फिल्‍म आरंभ होने के पंद्रह मिनट तक जारी रहे तो फिल्‍म में गड़बड़ी होनी ही है। सुनील सिप्‍पी ने पाकिस्‍तानी पत्रकार और लेखिका सबा इम्तियाज के 2014 में प्रकाशित उपन्‍यास कराची,यू आर किलिंग मी का फिल्‍मी रूपांतर करने में नाम और परिवेश के साथ दूसरी तब्‍दीलियां भी कर दी हैं। बड़ी समस्‍या कराची की पृष्‍ठभूमि के उपन्‍यास को मुंबई में रोपना और मुख्‍य किरदार को आयशा खान से बदल कर नूर राय चौधरी कर देना है। मूल उपन्‍यास पढ़ चुके पाठक मानेंगे कि फिल्‍म में उपन्‍यास का रस नहीं है। कम से कम नूर उपन्‍यास की नायिका आयशा की छाया मात्र है।
फिल्‍म देखते हुए साफ पता चलता है कि लेखक और निर्देशक को पत्रकार और पत्रकारिता की कोई जानकारी नहीं है। और कोई नहीं तो उपन्‍यासकार सबा इम्तियाज के साथ ही लेखक,निर्देशक और अभिनेत्री की संगत हो जाती तो फिल्‍म मूल के करीब होती। ऐसा आग्रह करना उचित नहीं है कि फिल्‍म उपन्‍यास का अनुसरण करें,नेकिन किसी भी रूपांतरण में यह अपेक्षा की जाती है कि मूल के सार का आधार या विस्‍तार हो। इस पहलू से चुनील सिन्‍हा की नूर निराश करती है। हिंदी में फिल्‍म बनाते समय भाषा,लहजा और मानस पर भी ध्‍यान देना चाहिए।
नूर महात्‍वाकांक्षी नूर राय चौधरी की कहानी है। वह समाज को प्रभावित करने वाली स्‍टोरी करना चाहती है,लेकिन उसे एजंसी की जरूरत के मुताबिक सनी लियोनी का इंटरव्‍यू करना पड़ता है। उसके और भी गम है। उसका कोई प्रेमी नहीं है। बचपन के दोस्‍त पर वह भरोसा करती है,लेकिन उससे प्रेम नहीं करती। नौकरी और मोहब्‍बत दोनों ही क्षेत्रों में मनमाफिक न होने से वह बिखर-बिखरी सी रहती है। एक बार वह कुछ कोशिश भी करती है तो उसकी मेहनत कोई और हड़प लेता है। बहरहाल,उसका विवेक जागता है और मुंबई को लांछित करती अपनी स्‍टोरी से वह सोशल मीडिया पर छा जाती है। उसे अपनी स्‍टोरी का असर दिखता है,फिर भी उसकी जिंदगी में कसर रह जाती है। फिल्‍म आगे बढ़ती है और उसकी भावनात्‍मक उलझनों को भी सुलझाती है। इस विस्‍तार में धीमी फिल्‍म और बोझिल हो जाती है।
अफसोस है कि नूर को पर्दे पर जीने की कोशिश में अपनी सीमाओं को लांघती सोनाक्षी सिन्‍हा का प्रयास बेअसर रह जाता है। नूर में बतौर अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्‍हा कुछ नया करती हैं। वह अपने निषेधों को तोड़ती है। खिलती और खुलती हैं,लेकिन लेखक और निर्देशक उनकी मेहनत पर पानी फेर देते हैं। 21 वीं सदी की मुबई की एक कामकाजी लड़की की दुविधाओं और आकांक्षाओं की यह फिल्‍म अपने उद्देश्‍य तक नहीं पहुंच पाती।
अवधि- 116 मिनट
** दो स्‍टार

रोज़ाना : सबा इम्तियाज की ‘नूर’



रोज़ाना
सबा इम्तियाज की नूर
-अजय ब्रह्मात्‍मज

इस हफ्ते रिलीज हो रही सोनाक्षी सिन्‍हा की नूर 2014 में प्रकाशित पाकिस्‍तानी अंग्रेजी उपन्‍यास कराची,यू आर किलिंग मी का फिलमी रूपांतरण है। सबा इमित्‍याज का यह उपन्‍यास पाकिस्‍तान के शहर कराची की पृष्‍ठभूमि में एक महिला पत्रकार की रचनात्‍मक और भावनात्‍मक द्वंद्वों पर आधारित है। उपन्‍यास में कराची शहर,वहां की मुश्किलें और मीडिया हाउस की अंदरूनी उठापटक के बीच अपने वजूद की तलाश में आगे बढ़ रही आयशा खान का चित्रण है। यह उपन्‍यास लेखिका सबा इमित्‍याज के जीवन और अनुभवों पर आधारित है। सबा पेशे से पत्रकार हैं। फिलहाल वह जार्डन में रहती हैं और अनेक इंटरनेशनल अखबारों के लिए लिखती हैं। कराची,यू आर किलिंग मी उनका पहला उपन्‍यास है। अभी वह नो टीम ऑफ एंजेल्‍स लिख रही हैं।
सबा इम्तियाज सभी पाकिस्‍तानी लड़कियों की तरह हिंदी फिल्‍मों की फैन हैं। वह हिंदी फिल्‍में देखती हैं। जब भारतीय निर्माताओं ने फिल्‍म के लिए उनके उपन्‍यास के अधिकार लिए तो वह बहुत खुश हुईं। उन्‍होंने तब इसकी परवाह भी नहीं की कि उनके उपन्‍यास पर आधारित फिल्‍म की नायिका कौन होगी? सबा यही मानती हैं कि कराची और मुंबई महानगर हैं। दक्षिण एशिया के सभी महानगरों की हालत लगभग एक जैसी है,इसलिए उनकी समस्‍याएं भी एक जैसी हैं। सब को उम्‍मीद है कि कराची की पृष्‍ठभूमि के उपन्‍यास का मुंबई की पृष्‍ठभूमि की फिल्‍म में उचित रूपसंतरण किया गया होगा।
नूर इस लिहाज से उल्‍लेखनीय है कि यह महानगर में अपनी अस्मिता की खोज में निकली आधुनिक महानगरीय लड़की की कहानी कहती है। उसकी समस्‍याएं दफ्तर तक ही सीमित नहीं हैं। उसे अपनी जिंदगी में प्‍यार की भी तलाश है। वह नौकरी और मोहब्‍बत दोनों में अच्‍छा करना चाहती है। उपन्‍यास कराची,यू आर किलिंग मी में कराची की आयशा खान फिल्‍म नूर में मुंबई नूर बन चुकी है। फिल्‍मी रूपांतरण में सबा का योगदान नहीं है। इसकी स्े्रिप्‍ब्ट फिल्‍म के निर्देशक सुनील सिप्‍पी ने शिखा शर्मा और अलथिया डेलास-कौशल की मदद से लिखी है। संवाद इशिता मोइत्रा ने लिखे हैं। पाकिस्‍तानी परिवेश से भारतीय परिवेश में आ चुकी आयशा खान की यह तब्‍दीली रोचक होगी।
रोचक तो यह भी है कि नूर की रिलीज के कुछ हफ्तों के बाद हाफ गर्लफ्रेंड आ रही है। दोनों फिल्‍में पाकिस्‍तान और भारत पॉपुलर अंग्रेजी उपन्‍यासों पर आधारित हैं।
@brahmatmajay


Wednesday, April 19, 2017

रोज़ाना : अशांत सुशांत



रोज़ाना
अशांत सुशांत
-अजय ब्रह्मात्‍मज
दिनेश विजन की फिल्‍म राब्‍ता के ट्रेलर लांच पर सुशांत सिंह राजपूत और फिल्‍म पत्रकार भारती प्रधान के बीच हुई झड़प के मामले में सोशल मीडिया और मीडिया दो पलड़ों में आ गया है। सुशांत का पलड़ा भारी है। फैंस और मीडिया फैंस उनके समर्थन में उतर आए हैं। ऐसा लग रहा है कि गलती भारती प्रधान से ही हुई। अगर उस लांच के वीडियों को गौर से देखें तो पूरी स्थिति स्‍पष्‍ट होगी।
हुआ यों कि सवाल-जवाब के बीच एक टीवी पत्रकार ने कुलभूषण जाधव के बारे में सवाल पूछा,जिन्‍हे कथित जासूसी के अपराध में पाकिस्‍तान ने फांसी की सजा सुनाई है। इस सवाल को सुनते ही थोड़ी देर के लिए खामोशी छा गई। फिर कृति सैनन ने निर्देशक दिनेश विजन का फुसफुसाकर सुझााया कि इस सवाल का जवाब नहीं दिया जाएं। दिनेश विजन ने कहा कि अभी हमलोग इस पर बातें ना करें। सवालों का सिलसिला आगे बढ़ गया। मंच के ठीक सामने बैठी सीनियर भारती प्रधान को यह बात नागवार गुजरी। उन्‍होंने खड़े होकर सवाल किया कि राष्‍ट्रीय महत्‍व के इस सवाल से कैसे बच सकते हैं? मौजूद फिल्‍म स्‍टारों का इसका जवाब देना चाहिए। सुशांत ने कमान संभाली और जवाब नहीं देने के तर्क देने लगे। वही घिसा-पिटा जवाब कि हमें इस विषय की पूरी जानकारी नहीं है। भारती प्रधान ने फिर से जोर दिया तो सुशांत बिफर गए। शब्‍दों को चबाते हुए उन्‍होंने भारती से पूछा कि क्‍या आप राष्‍ट्रीय मुद्दों के सभी सवालों के उत्‍तर दे सकती हैं? सामान्‍य बातचीत अभद्र और एकतरफा हो गई। टी सीरिज के भूषण कुमार ने मामले की नजाकत को समझा और उन्‍होंने सुशांत को शांत किया।
सवाल ही कि पहली बार ही फिल्‍म स्‍टार और निर्देशक कह देते कि हम इस मुद्दे पर नहीं बोलना चाहते या हमें सही जानकारी नहीं है। वैसे देश के जागरूक नागरिक और एक्‍टर होने के नाते उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे सभी समसामयिक घटनाओं से वाकिफ रहें। ऐसे इवेंट में ही पत्रकारों को गैरफिल्‍मी जरूरी मुद्ददों पर सवाल करने के मौके मिलते हैं। बच्‍चन और खान जैसे अनुभवी स्‍टार सवालों को ढंग से डील कर लेते हैं। नए स्‍टार अहंकार और स्‍टारडम के नशे में जरूरी सवालों का मजाक बनाते हैं और उन्‍हें टालते हैं। सुशांत को अशांत होने की जरूरत नहीं थी।  

Tuesday, April 18, 2017

रोज़ाना : अशोभनीय प्रयोग



रोज़ाना
अशोभनीय प्रयोग
-अजय ब्रह्मात्‍मज
पिछले दिनों श्रीजित मुखर्जी निर्देशित बेगम जान आई। बेगम जान में विद्या बालन नायिका हैं और फिल्‍म के निर्माता हैं विशेष फिल्‍म्‍स के महेश भट्ट और मुकेश भट्ट। इस फिल्‍म ने विद्या बालन और महेश भट्ट के अपने प्रशंसकों को बहुत निराश किया।

बेगम जान पंजाब में कहीं कोठा चलाती है। उसे वहां के राजा साहब की शह हासिल है। आजादी के समय देश का बंटवारा होता है। रेडक्लिफ लाइन बेगम जान के कोठे को चीरती हुई निकलती है। भारत और पाकिस्‍तान के अधिकारी चाहते हैं कि बेगम जान कोठा खाली कर दे। 11 लड़कियों के साथ कोठे में रह रही बेगम जान अधिकारियों के जिस्‍म के पार्टीशन कर देने का दावा करती है,लेकिन ताकत उसके हाथ से निकलती जाती है। आखिरकार वह कोठे में लगी आग में बची हुई लड़कियों के साथ जौहर कर लेती है। आत्‍म सम्‍मान की रक्षा की इस कथित मध्‍ययुगीन प्रक्रिया को 1947 गौरवान्वित करते हुए दोहराना एक प्रकार की पिछड़ी सोच का ही परिचायक है। उनकी बेबसी और लाचारगी के चित्रण के और भी तरीके हो सकते थे। प्रगतिशील महेश भट्ट का यह विचलन सोचने पर मजबूर करता है,क्‍योंकि इस फिल्‍म की रिलीज के पहले उन्‍होंने कहा था कि वे अपनी पुरानी लकीर का विस्‍तार कर रहे हैं। विशेष फिल्‍म्‍स के 30 वें साल में वे फिर से अर्थ और सारांश की जमीन पर लौटना चाहते हैं।
इतना ही नहीं फिल्‍म के एक किरदार का नाम कबीर रखा गया है। वह खल चरित्र है। वह जनेऊ पहनता है और उसने खतना भी करवा रखा है। जरूरत के अनुसार पैसे लेकर वह हिंदू और मुसलमान दोनों की तरफ से दंगे-फसाद करवाता है। ऐसे किरदार का नाम कबीर रखने का क्‍या तात्‍पर्य हो सकता है? कवि और सामाजिक संत के रूप में हम कबीर को जानते हैं। उन्‍होंने अपनी रचनाओं में दोनों धर्मों के कट्टरपंथियों की आलोचना की है। ऐसे सेक्‍युलर संत का नाम एक भ्रष्‍ट ग़ुंडे को देकर महेश भट्ट और श्रीजित मुखर्जी ने कबीर की प्रतिष्‍ठा और योगदान का धूमिल किया है। कबीर हमारी सांस्‍कृतिक और साहित्यिक प्रतिमा(आयकॉन) हैं। उनके नाम के साथ ऐसा भद्दा कृत्‍य अशोभनीय है।
फिल्‍मकारों को ऐसे प्रयोगों में अतिारक्‍त सावधानी बरतनी चाहिए।  

Saturday, April 15, 2017

रोज़ाना : अपवाद हैं अभय देओल



रोज़ाना
अपवाद हैं अभय देओल
-अजय ब्रह्मात्‍मज  

देओल परिवार के अभय देओल अपने चचेरे भाइयों सनी देओल और बॉबी देओल से मिजाज में अलग हैं। उनकी जीवन शैली और फिल्‍मों की पसंद-नापसंद में साफ फर्क दिखता है। स्‍टार परिवार से होने के बावजूद उनमें स्‍टारों के नखरे नहीं हैं। वे दिखावे में नहीं रहते। पंजाबी परिवारों के गुणों-अवगुणों से भी वे दूर हैं। पढ़ाई के लिए विदेश में रहने और वहां हर रंग व वर्ण के दोस्‍तों के साथ बिताई जिंदगी ने उनकी पारंपरिक सोच बदल दी। भारत लौटने और सोचा न था जैसी फिल्‍म से शुरूआत करने के साथ ही उन्‍होंने स्‍पष्‍ट कर दिया था कि उनमें देओल परिवार के फिल्‍मी और पंजाबी लक्षण नहीं हैं।
अभय देओल ने आउट ऑफ बॉक्‍स फिल्‍में कीं। जिंदगी ना मिलेगी दोबारा जैसी कमर्शियल फिल्‍म में उनकी असहजता आसानी से देखी जा सकती है। कुछ अलग और बेहतरीन करने की कोशिश में उन्‍हें अभी तक बड़ी कामयाबी नहीं मिली है,लेकिन अपने फसलों और बयानों से उन्‍होंने हमेशा जारि किया कि दूसरे स्‍टारसन की तरह लकीर के फकीर नहीं हैं। 2014 में उन्‍होंने अपनी फिल्‍म वन बा टू डिजीटल रिलीज कर सकेत दे दिया था कि मनोरंजन की दुनिया किधर खिसक रही है। तब इंडस्‍ट्री के पंडितों ने उनकी खिल्‍ली उड़ाई थी और कहा था कि उनका दिमाग फिर गया है।
फिल्‍म इंडस्‍ट्री में जब भी कोई कुछ नया करना चाहता है तो उसका मखौल उड़ाया जाता है। आरंभिक प्रयासों में सफलता नहीं मिले तो मखौल ही व्‍यक्ति का मुहावरा और परिख्‍य बन जाता है। हाल ही में गोरेपन के ऐड और एंडोर्समेंट करनेवाले फिल्‍म कलाकारों के बारे में उन्‍होंने अपनी रय जाहिर की तो उनकी प्रशंसा हुई,लेकिन सोनम कपूर ने नाराजगी में एषा देओल के एक ऐड की तस्‍वीर लगा कर सवाल किए। सोनम कपूर की इस बचकानी हरकत पर अभय देओल ने शांतचित्‍त भाव से कहा कि यह भी गलत है। अभय देओल मानते हें कि फिल्‍म कलाकरों को ऐसे विज्ञापनों का हिस्‍सा नहीं बनना चाहिए।
गोरापन एक गंथि है,जो भारतीय समाज में गोरों(अंग्रेजों) के दो सदी के शासन में मजबूत हुआ। भारतीय शास्‍त्रों और रीतिकाल की रचनाओं में श्‍याम वर्ण की तारीफ मिलती है। हमारे आदर्श और पूज्‍य राम और कृष्‍ण भी तो श्‍याम वर्ण के थे।