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Monday, September 1, 2014

तस्‍वीरों में मैरी काॅम



















Sunday, August 31, 2014

सवालों में सेंसरशिप



-अजय ब्रह्मत्मज

    होमी अदजानिया की नई फिल्म ‘फाइडिंग फैनी’ में दीपिका पादुकोण के एक संवाद में ‘वर्जिन’ शब्द के प्रयोग पर सेंसर बोर्ड के एक अधिकारी ने आपत्ति की है। फिल्म के प्रमाणन के लिए नियुक्त सदस्यों की सम्मिलित राय व्यक्त करते हुए उन्होंने यह बात रखी है। उन्होंने फिल्म के ट्रेलर में दिखाए जा रहे उस दृश्य को भी टोन डाउन करने की सलाह दी है,जिसमें डिंपल कपाडिय़ा झुकी हुई मुद्रा में पीछे पलट कर देख रही हैं और उनके स्कर्ट की सिलाई उघड़ जाती है। फिल्म को अगर यूए सर्टिफिकेट चाहिए तो निर्माता-निर्देशक को सलाह माननी पड़ेगी। वे इसे चुनौती भी दे सकते हैं। ट्रिब्यूनल और कोर्ट के रास्ते खुले हैं,लेकिन ‘फाइडिंग फैनी’ 12 सितंबर को रिलीज होनी है। निर्माता-निर्देशक अपनी जिद पर अड़े रहें तो फिल्म समय पर रिलीज नहीं होगी और फिर करोड़ों का नुकसान होगा। प्रदीप सरकार की चर्चित और प्रशंसित ‘मर्दानी’ के निर्माता भी चाहते थे कि उनकी फिल्म को यूए सर्टिफिकेट मिले। फिल्म में गालियां और गोलियां थीं,इस वजह से उसे ए सर्टिफिकेट ही मिला। इधर सेंसर बोर्ड अतिरिक्त तौर पर सजग हो गया है। उसके सदस्य चौकस हैं। हाल ही में सेसर बोर्ड के प्रमुख अधिकारी राकेश कुमार की गिरफ्तारी के बाद से अन्य अधिकारी सक्रिय और सचेत हो गए हैं। वे अतिरिक्त सावधानी बरत रहे हैं।
    सेंसर बोर्ड में फैला कदाचार सदस्यों और निर्माताओं की मिलीभगत और जरूरत से होता है। फिल्मों की रिलीज तारीख तय हो चुकी रहती है। रिलीज के ठीक पहले सेंसर सर्टिफिकेट और सही कैटेगरी पाने की अफरातफरी में निर्माता गांठ ढीली करने में नहीं हिचकते। एजेंट के माध्यम से अधिकारियों के पास पैसे और उपहार भेजे जाते हैं। मकसद यही रहता है कि फिल्म को ऐन समय पर सर्टिफिकेट मिल जाए। कुछ अधिकारियों ने इसे कमाई का जरिया बना लिया है। वे चुन कर कुछ फिल्मों को सर्टिफिकेट देने में देरी करते हैं। निर्माता जल्दी का आग्रह करे तो उससे पैसे ऐंठते हैं। सेंसर बोर्ड की कार्य प्रणाली में फिल्मकारों को दलालों की मदद लेनी पड़ती है। न लें तो उन्हें सेंसर बोर्ड के दफ्तर के चक्कर लगाने में समय व्यर्थ करना पड़ेगा। सेंसर बोर्ड का यह पक्ष भी चिंतनीय है,लेकिन उससे ज्यादा अहम और जरूरी मुद्दा है कि आजादी के 67 सालों के बाद भी देश में स्पष्ट सेंसर नीति की कमी महसूस की जाती रही है। अभी सेंसर बोर्ड 1952 में पारित और 1983 में संशोधित सिनैमैटोग्राफ एक्ट के तहत काम करता है। 2008 में आवश्यक सुधार के बाद एक बिल पेश किया गया था,जो अभी तक स्थायी समिति के विचाराधीन है। ऐसी स्थिति में सेंसर बोर्ड के फैसलों में विरोधाभास और पिछड़ापन दिखना स्वाभाविक है।
    सेंसर बोर्ड की मौजूदगी और सेंसर के औचित्य एवं प्रासंगिकता पर भी सवाल उठते रहे हैं। जिस देश में संविधान से हर नागरिक को अभिव्यक्ति की आजादी मिली हुई है,उस देश में किसी प्रकार के सेंसर की जरूरत भी है क्या? देश के जागरुक फिल्मकार,दर्शक और नागरिक यह सवाल उठाते रहे हैं। समय-समय पर जिस प्रकार से फिल्में प्रतिबंधित की जाती हैं,उनसे इस सवाल की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। दूसरी तरफ,समाज का एक तबका मानता है कि अद्र्धशिक्षित भारतीय समाज में सेंसर की अनिवार्यता बनी रहेगी। 1970 में एक मामले की सुनवाई में न्यायालय ने भी माना था कि सेंसर के मामले में सरकारी दखल जरूरी है। भारत में मनोरंजन और रसास्वादन में सांस्कृतिक और सामाजिक विविधता के कारण यह जरूरी हो जाता है कि सभी के हितों का खयाल रखा जाए। फिल्मों में कोई ऐसी बात न आए,जिससे कोई आहत और दुखी हो। सेंसर के इस अदृश्य दबाव का असर फिल्मों के विषय पर होता है। हिंदी फिल्मों पर सरलीकरण के आरोप लगाए जाते हैं। वास्तव में यह मजबूरी और आसान राह है। निर्माता प्रेमकहानी,हॉरर और एक्शन की ऐसी कहानियां उठाते हैं,जिनका कोई सामाजिक और सामयिक आधार नहीं हो। न रहेगा बांस,न बजेगी बांसुरी ़ ़ ़किसी भी प्रकार के संभावित विवाद में फंसने से बचने की इस कोशिश में वायवीय कहानियों के फिल्मांकन पर जोर रहता है। हिंदी फिल्मों में सामजिकता,राजनीति,आधुनिक सोच और विचारोत्तेजक विषयों की कमी महसूस करनेवाले आलोचकों और बुद्धिजीवियों को इस दबाव और संकट का खयाल रखना चाहिए।
    सेंसर बोर्ड का प्रमुख कार्य स्वस्थ मनोरंजन और शिक्षा के लिए फिल्मों को प्रमाण पत्र देना है। भारत में चार कैटेगरी में प्रमाण पत्र दिए जाते हैं- यू,यूूए,ए और एस। 2008 के प्रस्तावित सिनैमैटोग्राफ में 12 साल और 15 साल के दर्शकों के लिए विशेष कैटेगरी की सलाह दी गई है। अभी इस पर विचार ही चल रहा है। कुछ देशों में सेंसर की 7 से 10 कैटेगरी तक हैं। इतिहास में जाएं तो भारत में फिल्मों को लकर पहली सेंसर नीति 1918 में बनी थी। तब अंग्रेजों का शासन था। भारत में सिनेमा को आए पांच साल हो गए थे। अंग्रेज शासकों को खतरा था की फिल्मों से स्वतंत्रता की राष्ट्रीय भावनाएं फैलायी जा सकती हैं। तब जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधिकारी मिल कर तय करते थे कि फिल्मों को प्रदर्शन की अनुमति दी जाए या नहीं? उनका सारा जोर इसी पर रहता था कि फिल्मों में अंग्रेजो के खिलाफ कोई संदेश न हो,जबकि फिल्मकार राष्ट्रीय भावनाओं के बातें कहने और दिखाने के अप्रत्यक्ष तरीके खोज निकालते थे। आजादी के पहले अनेक फिल्में राष्ट्रीय भावनाओं के प्रचार-प्रसार की वजह से प्रतिबंधित भी की गईं। देश में आजादी के पांच साल बाद तक अंग्रेजों के एक्ट के मुताबिक ही फिल्मों का प्रमाणन चलता रहा।
    गौर करें तो सेंसर बोर्ड का मुख्य काम शालीनता और नैतिकता का पालन करवाना रह गया है। धूम्रपान,मदिरापान,अंग प्रदर्शन,चुंबन,अश्लीलता,हिंसा,गाली,गोली आदि की मात्रा और पात्रता ही अधिकारी जांचते रहते हैं। लंबे समय तक हीरो। हीरोइन के चुंबन,आलिंगन और सहवास के दृश्यों के लिए फूलों को झूमते और टकराते दिखाया गया। ‘चुंबन चर्चा’ फिल्म के प्रचार का एक बहाना बन गया है। पिछली सदी के आखिरी दशक में धर्म और जाति के नाम पर बढ़े वैमनस्य की पृष्ठभूमि में अब यह भी खयाल रखा जाता है कि किसी भी जाति,समुदाय और समूह की भावना को ठेस नहीं पहुंचे। हम सामाजिक तौर पर इतने असहिष्णु और संवेदनशील हो गए है कि जरा सी बात भी खल जाती है। पिछले कुछ सालों में अनेक फिल्में इसलिए प्रतिबंधित और प्रद्रर्शन से बाधित की गईं कि देश के किसी कोने में बैठे समूह और समुदाय को फिल्म के संवाद,दृश्य और बोल के किसी शब्द पर आापत्ति थी। हाल ही में रिलीज ‘सिंघम रिटन्र्स’ में ऐसे ही दबाव में ‘प्रवचन’ को बदल कर ‘भाषण’ करना पड़ा।
    राकेश कुमार प्रसंग के बाद मुंबई से टीवी और फिल्म के प्रोड्यूसर्स गिल्ड ने सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्री प्रकाश जावडेकरको एक पत्र लिखा है। उन्होंने बताया है कि देश में हर साल 2000 से अधिक फिल्मों और ट्रेलर को प्रमाणन की जरूरत पड़ती है। निर्माता करोड़ों के निवेश के बाद फिल्म की रिलीज के समय दबाव में रहते हैं। स्पष्ट नीति के अभाव और देरी की वजह से कदाचार की संंभावनाएं बढ़ती हैं। दुनिया के कुछ देशों की तरह सेल्फ सेंसरशिप या सेंसर की प्रक्रिया का सरलीकरण किया जाए। उन्होंने कुछ सलाहें भी दी हैं। प्रमुख कार्यकारी अधिकारी ऐसा हो,जिसे फिल्मों का अनुभव और ज्ञान हो। बोर्ड के सदस्य भी सक्षम और जानकार हों। फिल्म प्रमाणन की प्रक्रिया में हालीवुड की तरह फिल्म बिरादरी की मदद ली जाए। साथ ही प्रोड्यूसर्स गिल्ड ने पूछा है कि नया सिनैमैटोग्राफ एक्ट कब तक पारित और लागू होगा। प्रोड्यूसर्स गिल्ड की सलाह और मांग पर माननीय मंत्री पहल करें तो समस्याएं सुलझ सकती हैं।
    सेंसर बोर्ड खुद कठघरे में खड़ा है। फिल्मकार,दर्शक और नागरिक सरकारी पहल की आस लगाए बैठे हैं। केंद्र में मौजूद सरकार की राजनीतिक समझ की पृष्ठभूमि में अनेक आशंकाएं तैर रही हैं कि अब सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष,प्रमुख अधिकारी और सदस्यों के चुनाव में किस एहतियात और पसंद का खयाल रखा जाएगा। अभी तो यह भी देखना होगा कि सोशल मीडिया के उफान के बाद नैतिकता और शालीनता की चादर कितनी फैलती है? सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर प्रतिबंधों और सीमाओं को परिभाषित और नियमित किया गया तो नई समस्याएं खड़ी होंगी। सवाल के साथ बवाल भी बढ़ेगा।

Saturday, August 30, 2014

निर्माण में आ सकते हैं नवाज


-अजय ब्रह्मात्मज
   
    लंबे अभ्यास और प्रयास के बाद कामयाबी मिलने पर इतराने के खतरे कम हो जाते हैं। नवाजुद्दीन सिद्दिकी के साथ ऐसा ही हुआ है। ‘सरफरोश’ से ‘किक’ तक के सफर में बारहां मान-अपमान से गुजर चुके नवाज को आखिरकार अब पहचान मिली है। इसकी शुरुआत ‘न्यूयार्क’ और कहानी से हो चुकी थी। ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ से उनकी योग्यता पर मुहर लगी और प्रतिष्ठा मिली। अभी स्थिति यह है कि उनके पास मेनस्ट्रीम फिल्मों के भी ऑफर आ रहे हैं। पिछली कामयाबी ‘किक’ के बाद भी नवाज ने तय कर रखा है कि वे साल में एक-दो ऐसी फिल्में करने के साथ अपने मिजाज की फिल्में करते रहेंगे। वे स्पष्ट कहते हैं कि इस पहचान से मेरी छोटी फिल्मों को फायदा होगा। पिछले दिनों मेरी ‘मिस लवली’ रिलीज हुई थी। उसके बारे में दर्शकों का पता ही नहीं चला। उस फिल्म में मैंने काफी मेहनत की थी।
    आमिर खान और सलमान खान के साथ काम कर चुके नवाज दोनों की शैली की भिन्नता के बारे में बताते हैं,‘आमिर खान के बारे में सभी जानते हैं कि वे परफेक्शनिस्ट हैं। उनके साथ रिहर्सल और सीन पर चर्चा होती है। सलमान खान के साथ अलग अनुभव रहा। ज्यादातर स्पॉनटेनियस काम होता रहा। दोनों की निजी खूबियों का असर सीन और फिल्म में दिखता है। मेरे लिए अच्छी बात रही कि लिखने के समय ही साजिद नाडियाडवाला ने इस किरदार के लिए मुझे चुन लिया था। उन्हें मालूम था कि मुझ से क्या चाहिए?’ नवाज आमिर और सलमान की फिल्मों की पहुंच से वाकिफ हैं। उनकी ख्वाहिश है कि भविष्य में उनकी फिल्मों को इस कमर्शियल पहचान का लाभ हो। अभी उनकी कुछ फिल्में तैयार हैं। वे बताते हैं,‘केतन मेहता के साथ मैंने दशरथ मांझी की जिंदगी पर बनी ‘माउंटेन मैन’ की है। बुद्धदेव भट्टाचार्य के साथ ‘अनवर का किस्सा’ कर चुका हूं। एक फिल्म ‘लायर्स डाइस’ है। फैंटम के साथ ‘घूमकेतु’ पूरी हो चुकी है। अभी श्रीराम राघवन के साथ ‘बदलापुर’ की शूटिंग कर रहा हूं।’
    एक कलकार के तौर पर नवाज चाहते हैं कि उन्हें केंद्रीय भूमिकाओं की फिल्में मिलती रहें। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के पुराने तौर-तरीके और व्यावसायिक दृष्टिकोण से फिलहाल ऐसा संभव नहीं हो पा रहा है। नवाज किसी भ्रम में नहीं हैं। वह कहते हैं,‘मुझे अपनी सीमा और पहुंच मालूम है। मैं किसी गलतफहमी में नहीं हूं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में लंबे अनुभव ने बहुत कुछ सिखा दिया है। मैं संतुलन के साथ आगे बढऩे की कोशिश में रहूंगा। मैं तो रोमांटिक लव स्टोरी करना चाहता हूं। उसमें रोमांस का मेरा अपना तरीका होगा।’ नवाज भविष्य में अपनी खूबियों के साथ ऐसी फिल्में करना चाहते हैं,जो पहुंच और बजट में भले ही छोटी हों,लेकिन उनका इंपैक्ट बड़ा हो।
     नवाज बड़े गर्व से कहते हैं कि छोटी फिल्मों ने मुझे निराशा से बचा लिया। मैंने कभी छोटी-बड़ी के खांचे में फिल्मों या रोल को नहीं रखा। काम करता रहा और बेहतर का प्रयास करता रहा। अनुराग कश्यप और कुछ अन्य निर्देशकों ने मुझ पर विश्वास किया। उन अवसरों की वजह से यहां आ सका। नवाज स्पष्ट हैं कि किसी भी सूरत में वह निर्देशन या लेखन की कोशिश नहीं करेंगे। भविष्य में हो सकरी है कि प्रोडक्शन कंपनी आरंभ करें।
   


Friday, August 29, 2014

फिल्‍म समीक्षा : राजा नटवरलाल

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
 ठगों के बादशाह नटवरलाल उर्फ मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव के नाम-काम को समर्पित 'राजा नटवरलाल' कुणाल देशमुख और इमरान हाशमी की जोड़ी की ताजा फिल्म है। दोनों ने इसके पहले 'जन्नत' और 'जन्नत 2' में दर्शकों को लूभाया था। इस बीच इमरान हाशमी अपनी प्रचलित इमेज से निकल कर कुछ नया करने की कोशिश में अधिक सफल नहीं रहे। कहा जा रहा है कि अपने प्रशंसकों के लिए इमरान हाशमी पुराने अंदाज में आ रहे हैं। इस बीच बहुत कुछ बदल चुका है। ठग ज्यादा होशियार हो गए हैं और ठगी के दांव बड़े हो गए हैं। राजा बड़ा हाथ मारने के चक्कर में योगी को अपना गुरु बनाता है। एक और मकसद है। उसे अपने बड़े भाई के समान दोस्त राघव के हत्यारे को सबक भी सिखाना है। उसे बर्बाद कर देना है।
कहानी मुंबई से शुरू होती है और फिर धर्मशाला होते हुए दक्षिण अफ्रीका के शहर केप टाउन पहुंचती है। इमरान हाशमी भी योगी की मदद से राजा से बढ़ कर राजा नटवरलाल बनता है। वह अपना नाम भी मिथिलेश बताता है। फिल्म में ठगी के दृश्य या तो बचकाने हैं या फिर अविश्वसनीय। फिल्म की पटकथा सधी और कसी हुई नहीं है। साफ दिखता है कि डांस और गाने के लिए हीरोइन को बार डांसर बना दिया गया है। पाकिस्तान से आई हुमैमा मलिक को इस फिल्म में करने से अधिक दिखाने का काम मिला है। फुर्सत मिलते ही वह चुंबन और आलिंगन में मशगूल हो जाती हैं। वह समर्थ अभिनेत्री हैं, लेकिन स्क्रिप्ट की मांग ही न हो तो प्रतिभा का क्या करें? इस तरह की फिल्म की जरूरत के मुताबिक वह ढलने की कोशिश करती हैं, लेकिन झिझक उभर कर आ जाती है। हां, इमरान हाशमी अपने पुराने अंदाज में हैं। ऐसे किरदारों को उन्होंने साध लिया है। उन्होंने गाने, तेवर और प्रेजेंस में रौनक बिखेरी है।
'राजा नटवरलाल' में सभी किरदारों को कुछ चुटीले संवाद मिले है। संजय मासूम ने इन संवादों में देसी अनुभवों को शब्दों से सजा दिया है। ये संवाद फिल्म के कथ्य और दृश्यों के अनुरूप हैं और भाव को मारक बना देते हैं। हिंदी फिल्मों में बोलचाल की भाषा के बढ़ते असर में डायलॉग और डायलॉगबाजी की मनोरंजक परंपरा को यह फिल्म वापस ले आती है। कलाकारों में परेश रावल ऐसे किरदारों के लिए पुराने और अनुभवी अभिनेता हैं। लंबे समय के बाद दीपक तिजोरी छोटी सी भूमिका में भी अपनी मौजूदगी दर्ज करते हैं। के के मेनन निराश करते हैं। दरअसल, उनके चरित्र को ढंग से गढ़ा ही नहीं गया है। उनकी एक्टिंग मूंछ और विग संभालने में ही निकल गई है।
अगर आप फिल्म देखें तो अवश्य बताएं कि केके मेनन के किरदार का क्या नाम हैं? मुझे कभी वरदा, कभी वरधा, कभी वर्धा तो कभी वर्दा सुनाई पड़ा। हिंदी फिल्मों में उच्चारण की दुर्गति बढ़ती जा रही है?
अवधि: 141 मिनट
**1/2 ढाई स्‍टार-

Thursday, August 28, 2014

दरअसल : कागज के फूल की पटकथा


-अजय ब्रह्मात्मज
    दिनेश रहेजा और जितेन्द्र कोठारी बड़े मनोयोग से फिल्मों पर लिखते हैं। उनके लेखन में शोध से मिली जानकारी का पुट रहता है। सच्ची बातें गॉसिप से अधिक रोचक और रोमांचक होती हैं। इधर फिल्म पत्रकारिता प्रचलित फिल्मों की तरह ही रंगीन और चमकदार हो गई है। इसमें फिल्म के अलावा सभी विषयों और पहलुओं पर बातें होती हैं? अफसोस यह है कि स्टार,पीआर और पत्रकार का त्रिकोण इसमें रमा हुआ है। बहरहाल,दिनेश रहेजा और जितेन्द्र कोठारी अपने अध्श्वसाय में लगे हुए हैं। इधर उन्होंने पटकथा संरक्षण का कार्य आरंभ किया है। इसके तहत वे गुरु दत्त की फिल्मों की पटकथा प्रकाशित कर रहे हैं। इस कार्य में उन्हें विधु विनोद चोपड़ा और ओम बुक्स की पूरी मद मिल रही है। इस बार उन्होंने गुरु दत्त की क्लासिक फिल्म ‘कागज के फूल’ की पटकथा संरक्षित की है।
    इस सीरिज में दिनेश रहेजा और जितेन्द्र कोठारी गुरु दत्त की फिल्मों की पटकथा को अंग्रेजी,हिंदी और रोमन हिंदी में एक साथ प्रस्तुत करते हैं। हिंदी की मूल पटकथा को उसके भावार्थ के साथ अंग्रेजी में अनुवाद करना कठिन प्रक्रिया है। संवादों के साथ ही लेखकद्वय फिल्म के गीतों का भी भावानुवाद करते हैं। अपनी रोचक शैली में वे अंग्रेजी में भी तुक मिलाने की सफल कोशिश करते हैं। संवादों के भावानुवाद में कभी-कभी कुछ महत्वपूर्ण शब्द छूट जाते हैं। उन्हें थोड़ा सचेत रहना चाहिए। इसके अलावा पटकथा में निर्देश और एक्शन सिर्फ अंग्रेजी में ही दिए जाते हैं। उन्हें हिंदी में भी लिखा जाना चाहिए। हिंदी पाठक इसकी कमी महसूस करते हैं। ‘कागज के फूल’ के बारे में कहा जाता है कि श्ह गुरु दत्त की आत्मकथात्मक फिल्म है।
    पुस्तक के आरंभ में गुरु दत्त की शैली और संघर्ष पर लिखा लेख उनके द्वंद्वों को जाहिर करता है। प्रसिद्धि और सफलता के साथ गुरु दत्त का सही तालमेल नहीं बैठ पाया। उनकी फिल्में अवसाद और उदासी से भरी हैं। दुनियावी सफलता सभी के लिए आवश्यक होती है। खास कर अगर आप फिल्म जैसे जन उपभोग के माध्यम में सक्रिय हैं तो दर्शकों के बीच पहचान बनाने के साथ ही सराहना की भी उम्मीद रहती है। इस फिल्म के मुख्य किरदार सुरेश सिन्हा के जरिए गुरु दत्त ने एक फिल्ममेकर के एकाकीपन को सही संदर्भ में पेश किया है। सफलता की चढ़ाई मुश्किल होती है। सफलता हासिल होने के बाद की फिसलन तो दर्दनाक होती है। बहुत कम लोग ही इस पीड़ा को संभाल पाते हैं। असंयत हो जाना स्वाभाविक है। दर्प और अभिमान आड़े आता है। नए माहौल और स्थिति से एडजस्ट नहीं कर पाने के दुष्परिणाम भी सामने आते हैं। ‘कागज के फूल’ हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के बैकड्राप पर बनी फिल्म है,जिसमें सफलता के अप्रिय सच को गुरु दत्त ने पेश किया है।
    ऐसी पुस्तकों में अगर संबंधित कलाकारों और तकनीशियनों के अनुभव रहते हैं तो फिल्म समझने में बाहरी मदद मिलती है। आम तौर पर फिल्म या उसकी पटकथा से फिल्म का मर्म समझ में आता है। समकालीनों के अनुभव से उस मर्म की सच्चाई भी पता चलती है। इस पुस्तक में उनके बेटे अरुण दत्त,भाई देवी दत्त,दोस्त देव आनंद,कैमरामैन वी के मूत्र्ति और सहायक श्याम कपूर के साक्षात्कारों के जरिए दिनेश और जितेन्द्र ने ‘कागज के फूल’ से संबंधित अंतर्कथाएं भी दे दी हैं।
कागज के फूल
संरक्षण,अनुवाद,लेख और साक्षात्कार-दिनेश रहेजा और जितेन्द्र कोठारी
ओम बुक्स इंटरनेशनल
विनोद चोपड़ा फिल्म्स की पहल
मूल्य- 595 रुपए

Tuesday, August 26, 2014

करें टिप्‍पणी या लिखें कहानी : रणवीर सिंह और अजय ब्रह्मात्‍मज

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रणवीर सिंह पिछले दिनों एक चायनीज नूडल्‍स और अन्‍य खाद्य पदार्थ के उत्‍पादों के ऐड की शूटिंग कर रहे थे। मैं वहां पहुंच गया। उस मुलाकात के इन दृश्‍यों पर आप की टिप्‍पणी और कहानी की अपेक्षा है। सर्वाधिक रोचक और टिप्‍पण्‍ी के लिए एक-एक पुरस्‍कार सुनिश्चित है।


इंस्पायरिंग कहानी है मैरी कॉम की-प्रियंका चोपड़ा


-अजय ब्रह्मात्मज   
प्रियंका चोपड़ा निर्माता संजय लीला भंसाली की ओमंग कुमार निर्देशित ‘मैरी कॉम’ में शीर्षक भूमिका निभा रही हैं। इस भूमिका के लिए उन्हें शारीरिक और मानसिक मेहनत करनी पड़ी है। ‘मैरी कॉम’ तक के सफर में प्रियंका चोपड़ा का उत्साह कभी कम नहीं हुआ। फिल्मों के प्रभाव और सफलता-असफलता के अनुसार उन्हें सराहना और आलोचना दोनों मिली। सीखते-समझते हुए आगे बढऩे के साथ प्रियंका चोपड़ा ने नई विधाओं में भी प्रतिभा का इस्तेमाल किया। ‘मैरी कॉम’ के प्रति वह अतिरिक्त जोश में हैं। इस फिल्म को वह अपने अभिनय करिअर की उपलब्धि मानती हैं।
- इतने साल हो गए,लेकिन आप के उत्साह में कभी कोई कमी नजर नहीं आती। आखिर वह कौन सी प्रेरणा है,जो आप को सक्रिय और सकारात्मक रखती है?
0 मेरे लिए मेरा काम बहुत जरूरी है। जिस दिन काम की भूख खत्म हो जाएगी या असफलता का डर नहीं रहेगा,उस दिन शायद मैं काम करना बंद कर दूंगी। मैं अपने काम को आधात्मिक स्तर पर लेती हूं। फिल्मों में आई तो बच्ची थी। विभिन्न निर्देशकों के साथ काम करते हुए मैंने समझा कि एक्टिंग हुनर है। यह एक क्राफ्ट है। अभ्यास करने से ही हम बेहतर होंगे। अभी तो वैरायटी की फिल्में बन रही हैं। मेरे लिए किरदार लिखे जा रहे हैं। ‘फैशन’,‘सात खून माफ’,‘बर्फी’ और अभी ‘मैरी कॉम’ में मुझे अलग-अलग किरदार मिले। एक आसान रास्ता है कि मैं घिसी-पिटी फिल्में कर खुद को दोहराती रहूं। मुझे कमर्शियल मसाला फिल्मों से गुरेज नहीं है। मैं वैसी फिल्में भी करती रहूंगी ताकि ऐसी फिल्में कर सकूं। मेरे लिए यह संतुलन जरूरी है।
-दस साल पहले ऐसे पोस्टर की कल्पना नहीं की जा सकती थी,जिसके पोस्टर पर सिर्फ अभिनेत्री हो और वह भी अपने किरदार के पोज में। यह हिंदी फिल्मों का सहज विकास है या आप अभिनेत्रियों की उपलब्धि है?
0 यह तो और मुश्किल होता है ‘इन एंड ऐज’। पोस्टर दिखा कर मुग्ध होती हैं प्रियंका। इसमें दोनों का रोल है। अभी ऐसी अभिनेत्रियां आई हैं,जो हर जोखिम के लिए तैयार हैं। आप ने सुना होगा कि हीरोइनें पूछती हैं कि हीरो कौन है? वह भी जरूरी है। कुछ फिल्मों की कहानी पावरफुल होती है। दर्शक भी अच्छी कहानियां सुनने और देखने के लिए तैयार हैं। अभी ज्यादा एक्सपोजर हो चुका है। रायटर और फिल्ममेकर भी नए विषयों पर फिल्में बना रहे हैं। यह दौर हम अभिनेत्रियों और फिल्मों के लिए बहुत अच्छा है।
-‘मैरी कॉम’ को किस तरह की फिल्म कहें? क्या यह एक अचीवर की कहानी है या एक औरत की बॉयोपिक है या किसी औा श्रेणी की फिल्म है ?
0 यह एक ऐसे इंसान की कहानी है,जिसने सीमा में रहने से इंकार कर दिया। वह डिब्बाबंद नहीं रहना चाहती थी। चावल उगाने वाले किसान की बेटी होने के बावजूद बॉक्सर होने के ख्वाब देख सकती हूं। जिस साल भारत में महिलाओं की बॉक्सिंग आरंभ हुई,वह मैरी कॉम का भी पहला साल था। बंदिशों को तोड़ कर अपने बड़ेे सपनों के लिए कुछ भी करूंगी।  इस फिल्म से हर दर्शक जुड़ाव महसूस करेगा,क्योंकि हम सभी पर बंदिशें लगी रहती है।
-मैरी कॉम से हुई बातों-मुलाकातों में उनकी कौन सी बात आप को सबसे अच्छी लगी?
0 वह खुशमिजाज हैं। किसी की सहानुभूति नहीं चाहतीं। किसी भी लडक़ी के आत्मविश्वास के लिए गर्व सबसे जरूरी है। आत्मसम्मान की धनी है। मुझ में और उनमें कई समानताएं हैं।
-कुछ आलोचकों को लगता है कि यह फिल्म मशहूर हो चुकी मैरी कॉम का इस्तेमाल है? क्या कहेंगी?
0 अगर कोई इंसान परिचित और मशहूर है तो उसकी कहानी नहीं कही जानी चाहिए। मुझे लगता है कि लोग जजमेंटल हो गए है? फट से फैसले सुना देते हैं। मैरी कॉम अर्जुन पुरस्कार से सम्मनित सबसे कम उम्र की एथलीट हैं। वह किन परिस्थितियों से यहां तक आईं? मुझे नहीं मालूम कितने लोग उनके बारे में जानते हैं। यह एक मौका है उन्हें देखने और जाने का। मुझे मैरी कॉम की स्टोरी इसलिए अच्छी लगी कि उसने अपने घर-परिवार और समाज के साथ सब हासिल किया है। मैं उनके साथ रह चुकी हूं। उनकी कहानी इंस्पायरिंग है। लिजेंड होने के लिए लाइफटाइम बिताना जरूरी नहीं है। फिल्में एक बिजनेस भी हैं। हम ऐसी फिल्में चुनते और बनाते हैं,जो दर्शकों को पसंद आएं।
- लिविंग लिजेंड के बॉयोपिक में चेहरे की समानता आवश्यक होती है। क्या आप को लगता है कि दर्शक संतुष्ट होंगे?
0 हम दोनों एक जैसे नहीं लगते। पहले नार्थ ईस्ट के कलाकारों का ऑडिशन किया गया। यह फिल्म बड़े स्केल की हो गई तो उसके लिए ऐसे एक्टर की जरूरत पड़ी,जो बिजनेस के लिहाज से सही हो। छोटे स्तर पर बनती तो शायद रिस्क लिया जा सकता था। ओमंग और संजय सर ने सहायक भूमिकाओं मं नार्थ ईस्ट के कलाकारों को ही लिया गया है। मुझे उम्मीद है कि मैं दर्शकों को निराश नहीं करूंगी। इस फिल्म के जरिए नार्थ ईस्ट पहली बार हिंदी सिनेमा के मेनस्ट्रीम में आएगा। देश के आम दर्शक अपने ही देश के एक हिस्से को करीब से जानेंगे।



Monday, August 25, 2014

टीवी सीरिज ‘होमलैंड 4’ में निम्रत कौर


-अजय ब्रह्मात्मज
    2013 में आई फिल्म ‘लंचबाक्स’ में इला की भूमिका निभा कर मशहूर हुई निम्रत कौर हाल ही में अमेरिकी टीवी सीरिज ‘होमलैंड 4’ की आरंभिक शूटिंग कर लौटी हैं। इस टीवी सीरिज की शूटिंग दक्षिण अफ्रीका के शहर केप टाउन में चल रही है। वहां इस्लामबाद का सेट लगाया गया है। निम्रत कौर इस टीवी सीरिज में पाकिस्तानी आईएसआई अधिकारी तसनीम कुरेशी की भूमिका निभा रही हैं। पहले योजना थी कि इजरायल में ही शूटिंग की जाए।  बाद में इसे केपटाउन में शिफ्ट कर दिया गया। ‘होमलैंड’ इजरायली टीवी सीरिज का अमेरिकी संस्करण है। निम्रत कौर के मुताबिक केपटाउन में ही इस्लामबाद का सेट लगाया गया है। मेरा सारा काम यहीं होना है। ‘होमलैंड 4’ की कहानी पाकिस्तान और अफगानिस्तान में घूमती है।
      ‘होमलैंड’ इजरायली टीवी सीरिज का अमेरिकी संस्करण है। ‘होमलैंड’ एक अमेरिकी फौजी की कहानी है। अफगानिस्तान से उसे बचा कर लाया तो जाता है,लेकिन शक है कि वह आतंकवादियों का एजेंट बन गया है। युद्धवीर की सीधी तहकीकात नहीं की जा सकती,इसलिए अप्रत्यक्ष घेराबंदी की जाती है। ‘होमलैंड’ के तीन सीजन आ चुके हैं। तीनों सीजन अमेरिका के शोटाइम चैनल पर बहुत पॉपुलर रहे हैं। चौथे सीजन का प्रसारण 5 अक्टूबर से आरंभ होगा। चौथे सीजन के चौथे एपीसोड में निम्रत कौर नजर आएंगी और उसके बाद बारहवें एपीसोड तक रहेंगी। ‘होमलैंड’ का हर सीजन 12 एपीसोड का होता है।
    मजेदार घटना है कि हाल ही में निम्रत कौर पहली बार लंदन गई थीं। वहां उन्हें अपने एजेंट से ‘होमलैंड 4’ के ऑडिशन की जानकारी मिली। लंदन में पहले दिन ही उन्होंने ऑडिशन दे दिया। तब तक उन्होंने ‘होमलैंड’ के पिछले सीजन नहीं देखें थे। निम्रत कहती हैं,‘जब कुछ खास होना होता है तो यों ही हो जाता है। अमेरकी टीवी सीरिज में काम करने की कोई योजना नहीं थी,लेकिन अभी मैं उसकी शूटिंग कर रही हूं। मुंबई में ‘लंचबाक्स’ की रिलीज के बाद दर्जनों डायरेक्टर से मिल चुकी हूं और 30-32 स्क्रिप्ट पढ़ डाली। कहीं बात नहीं बनी। इंतजार में हूं कि अगली फिल्म शुरु हो। ‘लंचबाक्स’ पिछले साल 20 सितंबर को रिलीज हुई थी। लगभग एक साल हो गए। यह तो अच्छा हुआ कि ‘होमलैंड 4’ का ऑफर मिल गया।’
    निम्रत कौर समझ नहीं पातीं कि उन्हें उचित किस्म की हिंदी फिल्में क्यों नहीं मिल पा रही हैं? वह स्वीकार करती है कि शायद ‘लंचबाक्स’ को मिली सराहना से एक धारणा बन गई होगी। सभी को लगता होगा कि मैं घरेलू महिला की भूमिका के लिए ही उपयुक्त हूं। वह बताती हैं,‘फिल्मों से पहले जब मैं ऐड कर रही थी,तब दोस्त यही कहते थे कि तुम्हारा रेगुलर लुक नहीं है। तुम्हें हिंदी फिल्में कैसे मिलेंगी? मतलब मैं शहरी लगती हूं। अभी ‘लंचबाक्स’ कर ली तो यह धारणा सी बन गई है कि मैं इला जैसी ही भूमिकाएं कर सकती हूं। यह तो ज्यादती है। मैं अच्छी स्क्रिप्ट के इंतजार में हूं। मुझे बड़ी या छोटी फिल्म से फर्क नहीं पड़ता। मुझे अपना किरदार पसंद आना चाहिए। अभी कुछ निर्देशकों से बातें चल रही हैं। उनमें से एक निखिल आडवाणी हैं। उनके साथ एक फिल्म करूंगी। अपनी उम्र और लुक का सही एहसास है मुझे। मैं छरहरी हीरोइन नहीं हो सकती हूं। अभी इतनी तरह की फिल्में बन रही हैं। यकीनन कोई मेरी पर्सनैलिटी के हिसाब से स्क्रिप्ट लिख रहा होगा। बस,उसी स्क्रिप्ट की प्रतीक्षा है।’
    ‘होमलैंड 4’ से विदेशी फिल्मों और टीवी सीरिज के द्वार खुल सकते हैं ना? निम्रत कौर फिलहाल ऐसी हड़बड़ी में नहीं हैं। वह ‘होमलैंड 4’ के प्रसारण और उस पर मिली प्रतिक्रिया के बाद ही कोई बड़ा फैसला लेंगी। फिलहाल वह इस सीरिज में काम करने का आनंद उठा रही हैं। वह कहती हैं,‘उनके काम करने का तरीका बहुत अनुशासित है। सारी तैयारियां पहले हो चुकी होती हैं। इस सीरिज के निर्माता-निर्देशक चौकस रहते हैं। मुझे मालूम नहीं कि मेरा किरदार आगे क्या रूप लेगा। भारत की तरह वहीं भी टीवी सीरिज के किरदारों का भविष्य उनकी लोकप्रियता के अनुसार प्रभावित होता है।’ वह आगे जोड़ती हैं,‘स्वयं ‘लंचबाक्स’ अमेरिका और अन्य देशों में इतना पॉपुलर रहा और देखा-सराहा गया है कि हमें आरंभिक पहचान मिल गई है। अगर विदेशों में काम मिलता है तो क्यों नहीं करूंगी? अभी के दौर में कलाकारों के लिए अनेक अवसर हैं। पहला ब्रेक मिलने के बाद चीजें आसान हो जाती हैं। ’

Friday, August 22, 2014

फिल्‍म समीक्षा : मर्दानी

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
यशराज फिल्म्स की प्रदीप सरकार निर्देशित 'मर्दानी' में रानी मुखर्जी मुंबई पुलिस के क्राइम ब्रांच की दिलेर पुलिस इंस्पेक्टर शिवानी शिवाजी राव की भूमिका निभा रही हैं। इस फिल्म का नाम शिवानी भी रहता तो ऐसी ही फिल्म बनती और दर्शकों पर भी ऐसा ही असर रहता। फिल्म का टाइटल 'मर्दानी' में अतिरिक्त आकर्षण है। यशराज फिल्म्स और प्रदीप सरकार ने महज इसी आकर्षण के लिए सुभद्रा कुमारी चौहान की मशहूर कविता 'खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी' 'मर्दानी' शब्द ले लिया है। हिंदी फिल्मों के हाल-फिलहाल की फिल्मों से रेफरेंस लें तो यह 'दबंग' और 'सिंघम' की श्रेणी और जोनर की फिल्म है। फिल्मों की नायिका मर्दानी हो तो उसकी जिंदगी से रोमांस गायब हो जाता है। यहां रानी मुखर्जी पुलिस इंस्पेक्टर के साथ जिम्मेदार गृहिणी की भी भूमिका निभाती हैं। बतौर एक्टर स्क्रिप्ट की मांग के मुताबिक वह दोनों भूमिकाओं में सक्षम दिखने की कोशिश करती हैं। उन्हें बाल संवारने भी आता है। गोली चलाना तो उनकी ड्यूटी का हिस्सा है। उल्लेखनीय है कि किसी पुरुष पुलिस इंस्पेक्टर को फिल्मों में घरेलू काम करते हुए नहीं दिखाया जाता है, लेकिन वह महिला हो तो उसके क्रिया-कलाप में घरेलू काम दिखाए ही जाते हैं।
शिवानी शिवाजी राव या राय दबंग पलिस इंस्पेक्टर हैं। क्राइम ब्रांच की जरूरतों के मुताबिक वह खतरनाक अपराधियों को गिरफ्तार करने से लेकर उन्हें सबक सिखाने तक का काम कर्मठता से करती हैं। अपनी भाषा और लतीफों में वह किसी आम पुलिस अधिकारी की तरह ही गाली-गलौज इस्तेमाल करने से नहीं हिचकती। फिल्म का आरंभ बहुत ही सहज और नया है, लेकिन पहली भिडंत के साथ ही 'मर्दानी' आम पुलिसिया फिल्मों की तरह लकीर की फकीर हो जाती है। सिर्फ एक ही फर्क रहता है कि यहां पुलिस इंस्पेक्टर महिला है। बाकी उसके बात-व्यवहार और काम करने के तरीके में कोई फर्क नहीं होता। हालांकि फिल्म का खलनायक कहता है कि औरतें सभी बातों को पर्सनल ले लेती हैं। उसे कहना चाहिए था कि मुख्य किरदार किसी घटना को पर्सनली लेने पर ही एक्टिव होते हैं। शिवानी की दत्तक पुत्री प्यारी का अपहरण नहीं हुआ रहता तो शायद उसे चाइल्ड ट्रैफिकिंग के बारे में पता भी नहीं चलता। प्यारी को हासिल करने के चक्कर में वह चाइल्ड ट्रैफिकिं ग और ड्रग्स के अवैध कारोबार के का पर्दाफाश करने की मुहिम में शामिल हो जाती है।
इस फिल्म का मकसद रानी मुखर्जी की प्रतिभा के आयाम और विस्तार कि चित्रध के लिए ही किया गया है। लेखक-निर्देशक की कोशिश किरदार को निखारने से अधिक कलाकार को मौके देने की रही है। इस प्रयास में किरदार और कलाकार की संगत टूटती है। इसका एक फायदा हुआ है कि फिल्म के खलनायक को पहचान मिल गई है। वाल्ट के किरदार में ताहिर राज भसीन अपनी अदायगी से ध्यान खींचते हैं। निश्चित ही उन्होंने इस किरदार को खास बना दिया है। वाल्ट की क्रूरता उसकी सहजता में ज्यादा उभरी है। फिल्म में वकील की भूमिका निभा रहे कलाकार ने भी ऐसे चालू किरदार को अलग अंदाज दिया है। रानी मुखर्जी जांबाज पुलिस इंस्पेक्टर की भूमिका के लिए आवश्यक स्फूर्ति का प्रदर्शन करती हैं। उन्हें एक्शन और खलनायक से अकेले भिडऩे का भी मौका मिला है, लेकिन वह नियोजित और साधारण दिखता है। रानी की खूबी संवाद अदायगी और शिवानी के किरदार की पेशगी में है। रानी ने शिवानी के किरदार को मर्दानी बनाने में जी-तोड़ मेहनत की है। महिला होने के वजह से उन्हें गर्दा उड़ाऊ और धरतीछोड़ एक्शन नहीं दिए गए हैं।
हालांकि फिल्म में चाइल्ड ट्रैफिकिंग के आंकड़े और रेफरेंस देकर फिल्म को मुद्दापरक बताने की कोशिश है, लेकिन पूरी फिल्म मसाला एंटरटेनमेंट की चालू परंपरा का महिला संस्करण है। नायिका प्रधान होने के बावजूद यह महिला प्रधान फिल्म नहीं है। फिल्म के अंत में औरतों के एहसास और आत्मानूभूति से प्रेरित एक स्त्री गान भी है, जो फिल्म के मनोरंजक प्रभाव को जबरदस्ती फेमिनिस्ट रंग देने की असफल कोशिश करता है। प्रदीप सरकार 'परिणीता' के बाद के दो असफल प्रयासों के पश्चात 'मर्दानी' में रानी मुखर्जी की मदद से थोड़े रंग मे दिखते हैं।
अवधि-114 मिनट
*** तीन स्‍टार 

फिल्‍म समीक्षा : मैड अबाउट डांस

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
 पांच रुपैया बारह आना प्रोडक्शन की 'मैड अबाउट डांस' साहिल प्रेम की पहली फिल्म है। पहली फिल्म में अभिनय के साथ लेखन और निर्देशन की भी जिम्मेदारी उन्होंने संभाली है। डांस जोनर की यह फिल्म किशोर और युवा दर्शकों की रुचि का खयाल रखती है। साहिल प्रेम ने ऐसी फिल्मों की परंपरा में ही कुछ नया करने की कोशिश की है। डांस जोनर की फिल्मों में नायक या नायिका शिद्दत से डांस के जरिए अपने पैशन को पूरा करना चाहते हैं। प्राइज मनी और शोहरत से ज्यादा उनका इंटरेस्ट श्रेष्ठ होने की तरफ रहता है। साहिल प्रेम की फिल्म में आरव आनंद की ख्वाहिश है कि वह दुनिया के सर्वश्रेष्ठ डांसर सीजर के ग्रुप में शामिल हो।
भारतीय माता-पिता अभी तक गैरपारंपरिक पढ़ाई और पैशन को नजरअंदाज कर अपने बज्चों को परिचित पेशों में जाने के उद्देश्य से पड़ाई करने की व्यावहारिक सलाह देते हैं। हिंदी फिल्मों और समाज में अब यह दिखने लगा है कि बच्चे अपनी जिद्द किसी बहाने या सीधे तरीके से पूरी करना चाहते हैं। आरव भी किसी और पढ़ाई के बहाने विदेश में सीजर के शहर पहुंचता है। उसका एक ही मकसद है कि वह सीजर से मिल ले और उसके ग्रुप में शामिल हो जाए। परिस्थितियां कुछ ऐसी बनती हैं कि वह सीजर के मुकाबले में आ जाता है। डांस कंपीटिशन में उसे सीजर के ग्रुप को हराना है। इस मुश्किल काम में इमोशन भी जोड़ दिए गए हैं।
साहिल प्रेम की 'मैड अबाउट डांस' में डांस के प्रति आरव की दीवानगी को अच्छी तरह चित्रित किया गया है। आरव के सामने अनेक चुनौतियां हैं। अपने मित्रों की मदद से वह उन चुनौतियों के बीच ही अपना ग्रुप तैयार करता है। यह फिल्म आरव के संघर्ष के साथ ही भारतीय और एशियाई मूल के लोगों के प्रति श्वेतरंगी समुदाय की श्रेष्ठ ग्रंथि को भी दर्शाती है। एक दूश्य में आरव को 'ब्राउनी' संबोधित करते हुए एक श्वेत किरदार कहता भी है कि तुम लोग टैक्सी चलाने, रसोई बनाने और बैरे के काम करने के उपयुक्त हो। डांस करना तुम्हारा काम नहीं है। यह प्रतिक्रिया कहीं न कहीं हमारे समाज की कमियों की तरफ भी इशारा करती है,जहां अभी तक परफॉर्मेंस की विधाओं को पेशेवर नहीं माना जाता। बहरहाल,आरव अपने ग्रुप के साथ साबित करता है कि पैशन और प्रैक्टिस से 'ब्राउनी' भी डांस में विजय हासिल कर सकते हैं।
साहिल प्रेम लेखन और निर्देशन के पहले प्रयास में उम्मीद जगाते हैं। आरव की भूमिका निभा रहे साहिल प्रेम में अपने किरदार की चपलता और एनर्जी है। उन्होंने सहयोगी कलाकारों के चुनाव में उनके नृत्य कौशल का ध्यान रखा है। यही वजह है कि डांस के सभी सिक्वेंस में गति और ऊर्जा नजर आती है। साहिल प्रेम नाटकीय और संवाद के दृश्यों में थोड़े अनगढ़ हैं, जिसकी भरपाई वह अपने डांस से कर देते हैं। नायिका के तौर पर अमृत मघेरा ने उनका बराबर साथ दिया है। आरव के अमीर और जिंदादिल दोस्त के रूप राशुल आनंद अपने किरदार और अदायगी की वजह से याद रह जाते हैं।
अवधि:125 मिनट
**r1/2 ढाई स्‍टार