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Thursday, February 26, 2015

दरअसल : असुरक्षा रहती है साथ


-अजय ब्रह्मात्मज
    कल दो फिल्मकारों से मिला। दोनों धुर विरोधी शैली के फिल्मकार हैं। एक की फिल्मों में सामाजिक सच्चाई और विसंगतियां मनोरंजक तरीके से आती हैं। उन्हें अभी तक लोकप्रिय स्टार नहीं मिल पाए हैं। दूसरे स्टायलिश फिल्मकार माने जाते हैं। उनकी नहीं चली फिल्मों की स्टायल भी पसंद की जाती रही है। फिल्म इंडस्ट्री के कामयाब स्आर उनके साथ काम करने को लालायित रहते हैं। अभी पहले फिल्मकार अपनी फिल्म को अंतिम रूप दे रहे हैं। यह फिल्म एक स्टूडियो से बनी है। दूसरे फिल्मकार अपनी फिल्म की तैयारी में हैं। उन्हें यकीन है कि उन्हें मनचाहे सितारे मिल जाएंगे। वे अपनी फिल्म की सही माउंटिंग कर लें। दोनों व्यस्त हैं। उन दोनों में फिल्म निर्माण की चिंताओं की अनेक समानताओं में से एक बड़ी समानता असुरक्षा की है। दोनों असुरक्षित हैं।
    हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की यह आम समस्या है। शुरूआत की पहली सीढ़ी से लेकर सफलता के शीर्ष पर विराजमान तक असुरक्षित हैं। अमिताभ बच्चन बार-बार कहते हैं कि मैं अपनी हर नई फिल्म के समय असुरक्षित महसूस करता हूं। हम सभी जानते हें कि उन्होंने अपने फिल्मी करिअर में एक दौर ऐसा भी देखा है,जब उनके पास फिल्में नहीं थीं। उनकी कंपनी ठप्प हो चुकी थी। उन पर देनदारी थी। इस मुसीबत से वे आखिरकार निकले। उन्होंने धैर्य और मेहनत से काम लिया। आज वे फिर से शीर्ष पर हैं। उनका आसन थोडुा अलग है। अगर हम सभी सफल सितारों और फिल्मकारों के करिअर और जिंदगी में झांके तो पाएंगे कि सभी कभी न कभी धरातल पर आए और फिर से अमरपक्षी की तरह उठे। मैंने अपने साक्षात्कारों में उनकी इस असुरक्षा की आहटें सुनी हैं। मुझे अभी तक कोई ऐसा नहीं मिला जो गहन आत्मविश्वास के बावजूद डरा हुआ न हो।
    यह असुरक्षा सभी के साथ रहती है। सामान्य जिंदगी में एक नौकरीपेशा या व्यापारी अधिक सुरक्षित भाव से बसर करता है। फिल्म इंडस्ट्री में सारा खेल परफारमेंस का है। इसे करतब भी कह सकते हैं। न जाने किस करतब पर दर्शकों की तालियां न बजें। हमेशा डर का कीड़ा दिल-ओ-दिमाग में रेंगता रहता है। इस डर और असुरक्षा की वजह से वे हर बार विजयी होने की कोशिश करते हैं। कभी कामयाब होते हैं और कभी मुंहकी खाते हैं। यकीन करें परफारमिंग आर्ट के किसी भी क्षेत्र में यह असुरक्षा ही नए प्रयोग करवाती है। संतुष्ट व्यक्ति प्रयोग नहीं कर सकता। हिंदी फिल्मों में कथ्य और शिल्प में डरे हुए असुरक्षित लोगों ने ही प्रभावशाली प्रयोग किए हैं। यह कहना गलत है कि फिल्म इंडस्ट्री में सभी लकीर के फकीर हैं। वे केवल आजमायी और सफल प्रयासों को ही दोहराना चाहते हैं। ऐसा रहता तो हमारे पास श्रेष्ठ हिंदी फिल्मों का खजाना नहीं रहता।
    मैं जिन दो फिल्मकारों की बात शुरू में कर रहा था,वे दोनों युवा और सफल फिल्मकार हैं। दोनों के अनुभवों से यह पता चला कि अभी के दौर में बाजार के दबाव से नए किस्म की असुरक्षा फैल गई है। सीमित बजट की छोटी से छोटी फिल्म के प्रचार में इतना खर्च करना पड़ रहा है कि लागत और लाभ निकालना असंभव कार्य हो जाता है। फिल्म में लोकप्रिय स्टार हों तो फिल्म को आरंभिक दर्शक मिल जाते हैं। इन फिल्मों की लागत इतनी ज्यादा हो जाती है कि मुनाफे में आने के लिए उन्हें लागत से दोगुना कलेक्शन ले आना होता है। इस आधार पर कुछ 100 करोड़ी फिल्में भी घाटे का सौदा रही हैं। क्रिएटिविटी की असुरक्षा ज्यादा क्रिएटिविटी से कम की जा सकती है,लेकिन मुनाफे की असुरक्षा तो बिल्कुल वश में नहीं है। दर्शक कैसे रिएक्ट करेंगे। इसका अनुमान अभी तक नहीं लगाया जा सका है। हर नई फिल्म अंधेरी सुरंग से निकलती है। कुछ फिल्में ही दूसरे छोर के उजाले तक पहुंच पाती हैं। असुरक्षित फिल्मकार ही सफल होते हैं।

Tuesday, February 24, 2015

सिनेमा मेरी जान की भूमिका

सिनेमा मेरी जान आ गयी। इसमें अंजलि कुजूर, अनुज खरे, अविनाश, आकांक्षा पारे, आनंद भारती, आर अनुराधा, गिरींद्र, गीता श्री, चंडीदत्त शुक्‍ल, जीके संतोष, जेब अख्‍तर, तनु शर्मा, दिनेश श्रीनेत, दीपांकर गिरी, दुर्गेश उपाध्‍याय, नचिकेता देसाई, निधि सक्‍सेना, निशांत मिश्रा, नीरज गोस्‍वामी, पंकज शुक्‍ला, पूजा उपाध्‍याय, पूनम चौबे, मंजीत ठाकुर, डॉ मंजू गुप्‍ता, मनीषा पांडे, ममता श्रीवास्‍तव, मीना श्रीवास्‍तव, मुन्‍ना पांडे (कुणाल), यूनुस खान, रघुवेंद्र सिंह, रवि रतलामी,रवि शेखर, रश्मि रवीजा, रवीश कुमार, राजीव जैन, रेखा श्रीवास्‍तव, विजय कुमार झा, विनीत उत्‍पल, विनीत कुमार, विनोद अनुपम, विपिन चंद्र राय, विपिन चौधरी, विभा रानी, विमल वर्मा, विष्‍णु बैरागी, सचिन श्रीवास्‍तव, सुदीप्ति, सुयश सुप्रभ, सोनाली सिंह, शशि सिंह, श्‍याम दिवाकर और श्रीधरम शामिल हैं।
सभी लेखक मित्रों से आग्रह है कि वे अपना डाक पता मुझे इनबॉक्‍स या मेल में भेज दें। प्रकाशक ने आश्‍वस्‍त किया है कि सभी को प्रति भेज दी जाएगी।
बाकी मित्र शिल्‍पायन प्रकाशन से किताब मंगवा सकते हैं। पता है- शिल्‍पायन,10295,लेन नंबर-1,वैस्‍ट गोरखपार्क,शाहदरा,दिल्‍ली-110032
मेल आईडी- shilpayanboks@gmail.com
पुस्‍तक मूल्‍य- 400 रुपए
(किताब पढ़ने पर प्रतिक्रिया अवश्‍य दें। और खुद भी लिखें। मुझे chavannichap@gmail.com पर भेजें।)



भूमिका
सिनेमा मेरी जान
चवननी चैप ब्‍लॉग के लिए सिनेमा से साक्षात्‍कार के संस्‍मरणों के इस सीरिज के पीछे बस इतना ही उद्देश्‍य था कि हमसभी बचपन की गलियों में लौट कर एक बार फिर उन यादों को ताजा करें। भारत में सिनेमा की शिक्षा नहीं दी जाती। अभी तक माता5पिता बच्‍चों के साथ सिनेमा की बातें नहीं करते हैं। अगर कभी चर्चा चले भी तो हम स्‍टारों की चर्चा कर संतुष्‍ट हो लेते हैं। मेरी राय है कि घर-परिवार या स्‍कूल से हमें सिनेमा का कोई संस्‍कार नहीं मिलता। हमारी सोहबत,संगत और सामाजिकता से सिनेमा का संस्‍कार बनता है। ज्‍यादातर खुद सीखते हैं और सिनेमा का भवसागर पार करते हैं। कुछ सिनेमा के मूढ़ मगज छलांग मारते ही डूब जाते हैं।
यह सीरिज मैंने हिंदी टाकीज नाम से शुरु की थी। इस सीरिज में सम्मिलित गीताश्री ने अपने संस्‍मरण खूब मन से लिखे थे। वे बार-बार कहती थीं कि सारे संस्‍मरणों को संकलित कर किताब के रूप में लाएं। सभी लेखकों ने सिनेमा का उल्‍लेख और वर्णन प्रेमिकाओं की तरह किया हैत्र उन्‍होंने ने नाम तय करने के अंदाज में सुझाया सिनेमा मेरी जान। मैंने स्‍वीकार कर लिया। उनके आधिकारिक आग्रह को मैं कभी नहीं टाल सका। इस पुस्‍तक के शीर्षक के सुझाव में सम्‍मोहन था।
इस संकलन के संस्‍मरणों को पढ़ते हुए हिंदी पट्टी से आए पाठक महसूस करेंगे कि उनके बचपन में ही किसी ने झांक लिया है। किसी ने भी फिल्‍मी ज्ञान देने या झाड़ने की कोशिश नहीं की है। यह बचपन के अनुभवों को सहेजती मार्मिक चिट्ठी है,जो खुद के लिए ही लिखी गई है। इसमें से कुछ संस्‍मरण इस सीरिज के लिए नहीं लिखे गए थे। मैंने अधिकारपूर्वक उन लेाकों के ब्‍लॉग से उठा लिए। ऐसे एक लेखक रवीश कुमार हैं। अगर उन्‍हें बुरा लगा तो वे फरिया लेंगे।
हिंदी में सिनेमा पर या तो गुरू गंभीर और अमूर्त्‍त लेखन होता है या फिर अत्‍संत साधारण और फूहड़। हिंदी सिनेमा की तरह ही आर्ट और कमर्शियल किस्‍म का लेखन चल रहा है। यह सीरिज एक छोटी कोशिश है यह बताने की कि लेखन में भी सिनेमा की तरह मध्‍यमार्ग हो सकता है। सभी के संस्‍मरण पर्सनल हैं। उनमें लेखक आज के व्‍यक्तित्‍व का कदापि न खोजें। हिंदी पट्टी में सिनेमा देखना एक प्रकार की गुरिल्‍ला कार्रवाई होती थी। सुना है कि अभी परिदृश्‍य बदला है। 45 से अधिक उम्र का शायद ही कोई उत्‍तर भारतीय होगा,जिसने सिनेमा देखने के लिए मार या कम से कम डांट नहीं खाई होगी। इसके बावजूद हम सभी सिनेमा देखते रहे। सिपेमा हमारा शौक बना। सिनेमा हमारा व्‍यसन बना।
अक्‍सर मैं सोचता हूं कि हिंदी पट्टी से प्रतिभाएं हिंदी फिल्‍मों में क्‍यों नहीं आती ? मेरी धारणा है कि सिनेमा के प्रति हमारे अभिभावकों की असहज घृणा एक बड़ा कारण है। हिंदी समाज सिनेमा देखने के लिए बच्‍चों को प्रेरित नहीं करता। हम सिनेमा की बातें चेरी-छिपे करते हैं। फिल्‍मों और फिल्‍म स्‍आरों के प्रति हिकारत और शरारत का भाव रहता है। नतीजा यह होता है कि सिनेमा का हमारा प्रेम अपराध भाव से दब और कुचल जाता है। भारत के अन्‍य भाषाओं के समाज में कमोबेश यही स्थिति है। ये संस्‍मरण हमारे अव्‍यक्‍त प्रेम की सामूहिक बानगी हैं।
मेरा दावा है कि हर एक संस्‍मरण का अनुभव आप को संपन्‍न करने के साथ सिनेमा के संस्‍कार भी देगा। अगर बारीक अध्‍ययन करेंगे तो कुछ समान सूत्र मिलेंगे,जो सिनेमा के सौंदर्यशास्‍त्र निरूपण के लिए सहायक होंगे।

अजय ब्रह्मात्‍मज
 

पूरी हुई ख्‍वाहिश - नवाजुद्दीन सिद्दीकी


-अजय ब्रह्मात्मज
श्रीराम राघवन की फिल्म ‘बदलापुर’ के प्रचार के लिए नवाजुद्दीन सिद्दिकी को अपनी फिल्मों की शूटिंग और अन्य व्यस्तताओं के बीच समय निकालना पड़ा है। वे इस आपाधापी के बीच फिल्म इंडस्ट्री के बदलते तौर-तरीकों से भी वाकिफ हो रहे हैं। उन्हें अपने महत्व का भी एहसास हो रहा है। दर्शकों के बीच उनकी इमेज बदली है। वे ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के समय से कई कदम आगे आ गए हैं। जब भीड़ में थे तो पहचान का संघर्ष था। अब पहचान मिली है तो भीड़ घेर लेती है। भीड़ और पहचान के इस द्वंद्व के साथ नवाज लगातार आग बढ़ते जा रहे हैं। ‘बदलापुर’ में वे वरुण धवन के ऑपोजिट खड़े हैं। इस फिल्म में दोनों के किरदार पर्दे पर पंद्रह साल का सफर तय करते हैं।
    श्रीराम राघवन ने करिअर के आरंभ में रमण राघव की जिंदगी पर एक शॉर्ट फिल्म बनाई थी। इस फि ल्म से नवाज प्रभावित हुए थे। बाद में उनकी ‘एक हसीना थी’ देखने पर उन्होंने तय कर लिया था कि कभी न कभी उनके साथ काम करेंगे। दोनों अपने संघर्ष में लगे रहे। यह संयोग ‘बदलापुर’ में संभव हुआ। नवाज बताते हैं,‘एक दिन मुझे फोन आया कि आकर मिलो। तुम्हें एक स्क्रिप्ट सुनानी है। मैं गया तो उन्होंने दो पंक्तियों में फिल्म के थीम की जानकारी दी।’ हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में वन लाइन स्टोरी बतायी और सुनायी जाती है। लेखक-निर्देशक की वन लाइन स्टोरी सुनने के बाद ही निर्माता और स्टार जुड़ते हैं। श्रीराम राघवन ने तो टू लाइन सुना दी थी। पूछने पर नवाज बताते हैं,‘वह टू लाइन स्टोरी इतनी थी कि अच्छे-बुरे दो किरदार है? दोनों किरदारों में फिल्म के दौरान ट्रांसफॉर्मेशन होता है।’ यों इन वन-टू लाइन के साथ निर्देशक यह भी बताता है कि उसका ट्रीटमेंट क्या होगा और फिल्म कैसे आगे बढ़ेगी? बहरहरल,नवाज को श्रीराम के साथ काम करना था और उन्हें पक्का यकीन था कि वे कुछ नया करने का मौका देंगे।
    श्रीराम ने नवाज से बिल्कुल अलग तरीके से काम लिया। वे नवाज को दृश्य बता देते थे और उन्हें खुद ही सिचुण्शन के अनुसार संवाद बोलने की आजादी दे देते थे। पहले से कुछ भी लिखा नहीं होता था। श्रीराम के सुझाव और नवाज की समझ से ही शूटिंग के दौरान संवाद रचे गए। निर्देशकों को अमूमन अपने एक्टरों पर ऐसा भरोसा नहीं होता। सभी जानते हैं फिल्ममेकिंग महंगी प्रक्रिया है। अगर मनपसंद शॉट न मिले तो मेहनत और पैसों की बर्बादी होती है। नवाज कहते हैं,‘मुझे कैरेक्टर मालूम था। सिचुएशन और सीन मिलने पर श्रीराम के बताए भाव के अनुसार मैं कुछ बोलता था,उन्हें ही संवादों के रूप में रख लिया गया।’ ‘बदलापुर’ में नवाज का किरदार अजीबोगरीब है। वह चाहता कुछ और है,लेकिन कहता कुछ और है। नवाज बताते हैं कि यह मेरे लिए चैलेंज था।
    बातचीत के दरम्यान नवाज रोचक जानकारी देते हैं कि डेविड धवन ने मुझे ‘मैं तेरा हीरो’ के लिए बुलाया था। उसमें मुझे अरुणोदय सिंह वाली भूमिका मिली थी,लेकिन तारीखों की दिक्कत की वजह से मुझे वह फिल्म छोड़नी पड़ी। मुझे अफसोस रहा कि डेविड सर के साथ कॉमेडी नहीं कर सका। ‘बदलापुर’ में वरुण धवन मिल गए। वरुण के बारे में वे कहते हैं,‘जैसे मेरी इच्छा डेविड सर के साथ काम करने की थी,वैसे ही वरुण मेरे साथ काम करना चाहते थे। देखिए उनकी इच्छा पूरी हो गई। वरुण अपनी पीढ़ी के अलहदा अभिनेता हैं। उनमें सीखने की ललक है। कुछ नया करना चाहते हैं। शूटिंग के दौरान वे मुझ से पूछते रहते थे और मैं उन्हें निहारता रहता था। हम दोनों के बीच के बनते-बदलते रिश्ते और उनके तनाव में दर्शकों को भरपूर रोमांच मिलेगा।’   

Monday, February 23, 2015

पार्टीशन के बैकड्राप पर निजी ‘किस्सा’



-अजय ब्रह्मात्मज
अनूप सिंह की फिल्म ‘किस्सा’ देश-विदेश के फिल्म समारोहों की सैर के बाद सिनेमाघरों में आ रही है। अंतर्निहित कारणों से यह फिल्म देश के चुनिंदा शहरों के कुछ सिनेमाघरों में रिलीज हो रही है। मल्टीप्लेक्स के आने के बाद माना गया था कि बेहतरीन फिल्मों के प्रदर्शन की राह आसान होगी,लेकिन हआ इसके विपरीत। अब छोटी और बेहतरीन फिल्मों का प्रदर्शन और भी मुश्किल हो गया है। बहरहाल, ‘किस्सा’ के निर्देशक अनूप सिंह ने फिल्म के बारे में बताया। पार्टीशन की पृष्ठभूमि की यह फिल्म पंजाबी भाषा में बनी है। प्रस्तुत हैं निर्देशक अनूप सिंह की बातों के अंश-:
‘किस्सा’ का खयाल
 पार्टीशन को 67-68 साल हो गए,लेकिन हम सभी देख रहे हैं कि अभी तक दंगे-फसाद हो रहे हैं। आए दिन एक नया नरसंहार होता है। हर दूसरे साल कोई नया सांप्रदायिक संघर्ष होता है। लोग गायब हो जाते हैं। कुछ मारे जाते हैं। हम अगले दंगों तक उन्हें आसानी से भूल जाते हैं। देश के नागरिकों को यह सवाल मथता होगा कि आखिर क्यों देश में दंगे होते रहते हैं? इस सवाल से ही फिल्म का खयाल आया। सिर्फ अपने देश में ही नहीं। पिछले 20 सालों में अनेक देश टूटे हैं। राजनीतिक सत्ता बदली है। लाखों लोग बेघर और शरणार्थी हुए हैं। हम भयंकर हिंसा के दौर में जी रहे हैं। हमें हिंसा की मूलभूत वजहों को खोजना होगा। ‘किस्सा’ ऐसी ही एक तलाश है।
    इस फिल्म को बनाने का दूसरा कारण निजी है। पार्टीशन में मेरे दादा जी मक्खन सिंह ने अपना वतन छोड़ा था। उनके लिए भारत आना भी दूसरे देश में आना था। वे बिल्कुल नए देश तंजानिया चले गए। वे बहुत नाराज थे। एक दिन में उनके घर-बार,दोस्त और देश छिन गए। उनके किस्से सुनते हुए मैं बड़ा हुआ। मेरे रिश्तेदारों की कहानियों में भी पार्टीशन की गूंज रहती थी। विछोह और अवसाद के उन संस्मरणों से मेरा बचपन घबराया रहा। 25 सालों के बाद मेरे दादा जी को फिर से दरबदर होना पड़ा। इस बार मैं भी उनके साथ था। ईदी अमीन की वजह से हम फिर से उखड़ गए। मेरी उम्र 14 साल की थी। हमलोग पानी के जहाज से निकले थे। मैं गहरी उदासी में था। मूझे अच्छी तरह याद है तीसरी रात बीच समुद्र में खुले आकाश और नीचे अनंत सागर के बीच जहाज पर किसी ने फिल्म लगा दी। मैं विस्मित था। सिनेमा ने मुझे अपना नागरिक बना लिया। मैंने राहत की सांस ली। मुझे लगा कि अब मैं होमलेस नहीं रहूंगा। मैं विश्व नागरिक बन गया। मैंने अपनी स्थितियों को स्वीकार कर लिया। मैंने 1984 के सिख विरोधी दंगों को भी जज्ब किया।
इन दोनों कारणों से ‘किस्सा’ की कहानी और किरदारों ने आकार लिया। ‘किस्सा’ एक पिता और उसकी बेटी की कहानी है। पार्टीशन से तबाह होने के बाद वह अपनी चौथी बेटी को बेटे के रूप में पालता है। उम्र के साथ आने वाली समस्याओं से जूझती उस बेटी की शादी एक लड़की से कर दी जाती है। जटिलताएं और बढ़ती है। फिर भी खुद को सही मानता अंबर स्थिितियों की दुरूहता को नजरअंदाज करता है। इस किरदार को इरफान ने भावपूर्ण तरीके से जीवंत किया है। बेटी के रूप में तिलोत्तमा बोस हैं। टिस्का चोपड़ा और रसिका दुग्गल अन्य खास रोल में हैं।
    यह फिल्म 20 फरवरी को एक साथ सभी फार्मेट में रिलीज की जा रही है। सिनेमाघरों में रिलीज के साथ डीवीडी और वीडियो ऑन डिमांड के जरिए दर्शकों के बीच पहुंचने की यह कोशिश नयी और अप्रचलित है।

बदलापुर : उज्जड़ हिंसा की बाढ़ में एक अहिंसक - गजेन्‍द्र सिंह भाटी

गजेंद्र सिंह भाटी


फिल्म जिस अफ्रीकी लोकोक्ति पर शुरू में खड़ी होती है कि कुल्हाड़ी भूल जाती है लेकिन पेड़ याद रखता है, उससे अंत में हट जाती है। यहीं पर ये फिल्म बॉलीवुड में तेजी से बन रही सैकड़ों हिंसक और घटिया फिल्मों से अलग हो जाती है। महानता की ओर बढ़ जाती है। पूरी फिल्म में मनोरंजन कहीं कम नहीं होता। कंटेंट, एक्टिंग, प्रस्तुतिकरण, थ्रिलर उच्च कोटि का और मौलिक लगता है। फिल्म को हिंसा व अन्य कारणों से एडल्ट सर्टिफिकेट मिला है तो बच्चे नहीं देख सकते। पारंपरिक ख़यालों वाले परिवार भी एक-दो दृश्यों से साथ में असहज हो सकते हैं। बाकी ये फिल्म जरूर देखनी चाहिए। ऐसा सिनेमा उम्मीद जगाता है।
नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने जैसा काम किया है वैसा शाहरुख, सलमान, अमिताभ, अक्षय अपने महाकाय करियर में नहीं कर पाए हैं। फिल्म का श्रेष्ठ व सिहरन पैदा करता दृश्य वो है जहां लायक रघु से कहता है, "मेरा तो गरम दिमाग था। तेरा तो ठंडा दिमाग था? तूने लोगों को मार दिया। हथौड़े से। वो भी निर्दोष। क्या फर्क रह गया...?’ यहां से फिल्म नतमस्तक करती है। कुछ चीप थ्रिल्स हैं जिन्हें भूल जाएं तो इस श्रेणी में इससे श्रेष्ठ फिल्म याद्दाश्त में नहीं आती। अक्लमंदी और एक्टिंग के लिए "बदलापुर’ कई बार देखी जा सकती है।

Story [3/5] पत्नी और बेटे की मौत का बदला लायक (नवाजुद्दीन) से लेने रघु (वरुण) 15 साल इंतजार करता है। यहां से आगे फिल्म घिसी-पिटी हो सकती थी, पर नहीं होती। फिल्म का अंत समझदारी भरा है।
direction [4/5] श्रीराम की ये सर्वश्रेष्ठ फिल्म लगी। रिवेंज-क्राइम जॉनर में आज निर्देशक लोग जहां सिर्फ हिंसा ठूंस देते हैं वहां श्रीराम ने मैच्योर व बुद्धिमत्तापूर्ण राह ली है। अंत बेहद सुलझा है। दशकों में न देखा गया।
music [3/5] प्रिया सरैया और निर्माता दिनेश विजन ने गीत लिखे हैं। कंपोजर सचिन-जिगर हैं। जीना-जीना, चंदरिया झीनी और अज मेरा जी करदा कुछ दिन याद रहेंगे। बैकग्राउंड स्कोर न्यूनतम है, जो अच्छी बात है।
acting [4/5] नवाज जिस सीन में होते हैं, दर्शकों की सांसें थम सी जाती हैं। वरुण का ये काम ऐसा बेंचमार्क है जिसे आगे छूना उन्हीं के लिए बड़ा कठिन होगा। राधिका आप्टे ने चंद दृश्यों में काफी प्रभािवत किया। हुमा ने भी।

Sunday, February 22, 2015

दरअसल : फिल्‍म इंडस्‍ट्री के फरजी

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
 बहुत पहले रहीम ने लिखा था ¸ ¸ ¸
जो रहीम ओछो बढ़ै,तो अति ही इतराय।
प्यादा से फरजी भयो,टेढ़ो टेढ़ो जाय।।
    हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में आए दिन कोई न कोई प्यादा से फरजी होता है और उसकी चाल बदल जाती है। हर शुक्रवार के साथ जहां कलाकारों,निर्देशकों और निर्माताओं की पोजीशन बदलती है,वहां बदलाव ही नियमित प्रक्रिया है। रोजाना हजारों महात्वाकांक्षी हिंदी फिल्मों में अपनी मेहनत से जगह बनाने मुंबई पहुंचते हैं। उनमें से कुछ की ही मेहनत रंग लाती है। धर्मभीरू और भाग्यवादी समाज में सफलता के विश्लेषण के बजाए सभी उसे किस्मत से जोड़ देते हैं। अजीब सी बात है कि सफल और कामयाब भी आनी कामयाबी को नसीब और किस्मत का नतीजा मानते हैं। सच्चाई यह है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में लगनशील और मेहनती ही सफल होते हैं। प्रतिभा हो तो सहूलियत होती है। रास्ते सुगम होते हैं। किस्मत और संयोग तो महज कहने की बातें हैं।
    फिल्म इंडस्ट्री में कहा और माना जाता है कि यहां धैर्य के साथ लक्ष्य की ओर बढ़ता व्यक्ति अवश्य सफल होता है। शायद ही किसी को एकबारगी कामयाबी नहीं मिलती। पिछले डेढ़ दशकों में सैकड़ों कामयाब व्यक्तियों से बात करने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हू कि हर किसी को पांच से आठ सालों तक एड़ी-चोटी की मेहनत करनी पड़ी है। फिल्म इंडस्ट्री से सीधे जुड़े व्यक्तियों की बात अलग है। वह तो भारतीय समाज के हर क्षेत्र में पिता के पेशे में आई संतान को आरंभिक सुविधाएं मिल जाती हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में भी स्टारपुत्रों और अन्यों को शुरूआती सहूलियत मिलती है। उसके बाद उनकी प्रतिभा और मेहनत ही काम आती है। अनेक उदाहरण हैं जहां दर्शकों ने साधारण और प्रतिभाहीनों को उभरने और जमने नहीं दिया। कई ऐसे भी उदाहरण हैं जब एक छोटी शुरूआत से कुछ ने ऊंची ऊंचाई और मशहूरियत हासिल की।
    सफलता की इस चढ़ाई में थोड़ी सी भी गफलत हो तो पांव फिसलते हैं। और फिर ढलान और पतन ही होता है। मैंने गौर किया है कि बाहर से फिल्म इंडस्ट्री में आई प्रतिभाएं ऐसी द¸र्घटनाओं की ज्यादा शिकार होती है। उन्हें समय पर संभलने का सपोर्ट नहीं मिल पाता। सफलता के साथ मिली चमक-दमक में आंखें चौंधिया जाती हैं और पता नहीं चलता कि अगला कदत सही और सीधा पड़ा या टेढ़ा। कई बर एहसास होने तक चाल और राह टेढ़ी हो चुकी रहती है। प्यादा से फरजी होना वास्तव में सामान्य से विशेष होने की प्रक्रिया है। दिक्कत यह है कि विशेष होते ही अहंकार हावी होता है। अहंकार आने के बाद व्यक्ति सबसे पहले उनसे दूर होता है,जिनके सहारे या दम पर वह आरंभिक पहचान हासिल करता है। फिल्म इंडस्ट्री में कुछ लोग ऐसे मिल जाएंगे जो पहला मौका देने वालों से अधिक मशहूर और बड़े हो जाने पर उनका हाथ थामे रहते हैं। वहीं ज्यादातर सफलता मिलते ही सबसे पहले सीढ़ी को लात मार देते हैं। पुराने दोस्तों और परिचितों के प्रति उनका रवैया और व्यवहार बदल जाता है। वे सामान्य शिष्टाचार का भी पालन नहीं करते। दरअसल,ऐसे मतलबी लोग कामयाबी के बाद पुराने संबंधों को काट देते हैं। उन्हें उन संबंधों को ढोना भारी लगने लगता है।
    रहीम ने सही देखा और कहा है कि प्यादा से फरजी बनते ही कुछ की चाल बदल जाती है। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में हमेशा से ऐसे फरजी रहे हैं। वे अपनी कामयाबी नहीं संभाल पाते। बहुत कम लोग ऐसे होते हैं,जो कामयाबी के बाद भी विनम्र बने रहें। पिछले दिनों ऐसे फरजियों से सामना हुआ। अभी-अभी उन्हें कामयाबी और पहचान मिली है। वे उग्र और बदतमीज हो गए हैं। उन्होंने लगे हाथ मीडिया के लोगों को गाली देना और अपने साथ के लोगों को नजरअंदाज करना आरंभ कर दिया है। दुख की बात है कि उन्होंने अपने उन साथियों से दूरी बना ली है,जिनके साथ कभी स्ट्रगल किया और उनसे मदद ली। ऐसे लोगों में से कुछ तो संबंध की कीमत लगा कर रिश्तों को पैसों में तब्दील कर देते हैं। आर्थिक मदद कर वे पिछले और मिले सहयोग की इतिश्री कर लेते हैं।


Friday, February 20, 2015

फिल्‍म समीक्षा : बदलापुर

-अजय ब्रह़मात्‍मज 
श्रीराम राघवन की 'बदलापुर' हिंदी फिल्मों के प्रचलित जोनर बदले की कहानी है। हिंदी फिल्मों में बदले की कहानी अमिताभ बच्चन के दौर में उत्कर्ष पर पहुंची। उस दौर में नायक के बदले की हर कोशिश को लेखक-निर्देशक वाजिब ठहराते थे। उसके लिए तर्क जुटा लिए जाते थे। 'बदलापुर' में भी नायक रघु की बीवी और बच्चे की हत्या हो जाती है। दो में से एक अपराधी लायक पुलिस से घिर जाने पर समर्पण कर देता है और बताता है कि हत्यारे तो फरार हो गए, हत्या उसके साथी जीयु ने की। रघु उसके साथी की तलाश की युक्ति में जुट जाता है। इधर कोर्ट से लायक को 20 साल की सजा हो जाती है। रघु लायक के साथी की तलाश के साथ उस 20वें साल का इंतजार भी कर रहा है, जब लायक जेल से छूटे और वह खुद उससे बदला ले सके।
इस हिस्से में घटनाएं तेजी से घटती हैं। फिल्म की गति धीमी नहीं पड़ती। श्रीराम राघवन पहले ही फ्रेम से दर्शकों को सावधान की मुद्रा में बिठा देते हैं। अच्छी बात है कि टर्न और ट्विस्ट लगातार बनी रहती है। परिवार को खोने की तड़प और बदले की चाहत में रघु न्याय और औचित्य की परवाह नहीं करता। बदले की इस भावना में वह सही और गलत का भेद भूल जाता है। यहां तक कि लायक की दोस्त झिमली को तकलीफ देने से भी वह बाज नहीं आता। नेकी और बदी गड्डमड्ड होने लगती है। श्रीराम राघवन का यही ध्येय भी है। वे अन्य फिल्मों की तरह अपने नायक को दूध का धुला नहीं दिखाते। हम नेक नायक को खल नायक में बदलते देखते हैं। रघु किसी भी सूरत में लायक और उसके साथी से अपनी बीवी और बच्चे की हत्या का बदला लेना चाहता है। इस प्रक्रिया में वह निर्मम होता जाता है।
कहानी पंद्रह साल का जंप लेती है। लायक पंद्रह साल की सजा काट चुका है। पता चलता है कि उसे कैंसर हो चुका है और अब उसकी जिंदगी का एक साल ही बचा है। कैदियों की भलाई के लिए काम कर रहे एक एनजीओ की कार्यकर्ता अकेली जिंदगी बसर कर रहे रघु से मिलती है। वह उससे आग्रह करती है कि अगर वह चाहे तो लायक की रिहाई हो सकती है। लायक का आखिरी साल राहत में गुजर सकता है। रघु पहले मना कर देता है, लेकिन लायक के साथी तक पहुंचने की उम्मीद में वह उसकी रिहाई के लिए तैयार हो जाता है। लायक की रिहाई, दूसरे साथी की पहचान और रघु की पूरी होती दिखती रंजिश के साथ घटनाएं तेज हो जाती हैं। थोड़ी देर के लिए लगता है कि कहानी किरदारों और घटनाओं के बीच उलझ गई है। श्रीराम स्पष्ट हैं। वे फिल्म के क्लाईमेक्स और निष्कर्ष तक बगैर लाग-लपेट के पहुंचते हैं। यहां आगे की घटनाएं और किरदारों के व्यवहार के विस्तार व उल्लेख से दर्शकों की जिज्ञासा बाधित होगी। मजा किरकिरा होगा।
श्रीराम राघवन ने बदले की इस अनोखी कहानी में ग्रे किरदार भी अपना रंग बदलते हैं। 'बदलापुर' सिर्फ बदले की कहानी नहीं है। यह बदले में आए बदलाव की भी कहानी है। सब कुछ बदल जाता है। अच्छा अच्छा नहीं रहता और बुरे का बदला हुआ आचरण सोचने पर मजबूर करता है कि क्या वह सचमुच बुरा था? नैतिकता और आदर्श को परिस्थितियों और मनोभावों के बरक्स देखना होगा। रघु और लायक के व्यवहारों को हम पारंपरिक चश्मे से नहीं आंक सकते। इस फिल्म में गौर करें तो अच्छा बुरा है और बुरा अच्छा है। श्रीराम दोनों किरदारों की जटिलताओं में गहरे घुसते हैं और उनके अंतस को उजागर कर देते हैं। हम जो देखते और पाते हैं, वह हमारे समय के उलझे समाज का द्वंद्व है। फिल्म समाप्त होने के बाद उलझन बढ़ जाती है कि किसे सही कहें और किसे गलत?
मेरे खयाल में फिल्म का कथ्य उस सामान्य दृश्य में है जब लायक अपनी मां से पिता के बारे में पूछता है। मां कहती है-क्यों पुराने चावल मे कीड़े ढ़ूंढ रहा है। मां के पास पिता के बारे में अच्छा बताने के लिए कुछ भी नहीं है। लायक को गहरी चोट लगती है। उसका एहसास जागता है। वह मां को कुछ कहता हुआ निकलता है। उसके बाद की घटना बताना उचित नहीं होगा। फिल्म के अंत में लेखक-निर्देशक ने झिमली के जरिए अनावश्यक ही अपनी बात और लायक की मंशा स्पष्ट कर दी है। वह अव्यक्त रहता तो ज्यादा प्रभावी बात होती।
वरुण धवन अपेक्षाकृत नए एक्टर हैं। उनकी मेहनत जाहिर है। उन्होंने रघु के बदलते भावों को व्यक्त करने में अच्छी-खासी मेहनत की है। दूसरी तरफ नवाजुद्दीन सिद्दीकी की फितरत प्रभावित करती है। वरुण की मेहनत और नवाज की फितरत से 'बदलापुर' रोचक और रोमांचक हुई है। वरुण सधे अभिनेता नवाज के आगे टिके रहते हैं। नवाज हमारे समय के सिद्ध अभिनेता हैं। लायक हमारे मन में एक साथ घृणा और हास्य पैदा करता है। वह शातिर है, लेकिन कहीं भोला भी है। वह हिंदी फिल्मों के पारंपरिक खल चरित्रों की तरह खूंखार नहीं है, लेकिन उसकी कुटिलता से सिहरन होती है। खूंखार तो हमारा नायक हो जाता है जो जान लेने के लिए आवेश में दस हथौड़े मारते हुए हांफने लगता है। यह फिल्म वरुण और नवाज के अभिनय के लिए याद रखी जाएगी। फिल्म में महिला किरदारों को सीमित स्पेस में ही पर्याप्त महत्व दिया गया है। उन्हें अच्छी तरह गढ़ा गया है। पांचों महिला किरदारों ने अपनी भूमिकाओं को संजीदगी से निभाया है। प्रभावशाली दृश्य राधिका आप्टे और हुमा कुरैशी को मिले हैं। यों दिव्या दत्ता, प्रतिमा कण्णन और यामी गौतम लेश मात्र भी कम असरदार नहीं हैं। कुमुद मिश्रा की सहजता और स्वाभाविकता उल्लेखनीय है।
श्रीराम राघवन ने बदले की रोमांचक फिल्म को नया ट्विस्ट दे दिया है।
अवधि: 147 मिनट
चार स्‍टार ****

Wednesday, February 18, 2015

'रॉय' ने मेरे भीतर के ज्ञान-चक्षु खोल दिए हैं! - अनु सिंह चौधरी

राॅय का यह रोचक रिव्‍यू जानकीपुल से लिया गया है।
फिल्म 'रॉय' की आपने कई समीक्षाएं पढ़ी होंगी. यह समीक्षा लिखी है हिंदी की जानी-मानी लेखिका अनु सिंह चौधरी ने. जरूर पढ़िए. इस फिल्म को देखने के लिए नहीं, क्यों नहीं देखना चाहिए यह जानने के लिए- मॉडरेटर.
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इस 'रॉय' ने मेरे भीतर के ज्ञान-चक्षु खोल दिए हैं। फिल्म ने मेरे तन-मन-दिल-दिमाग पर ऐसी गहरी छाप छोड़ी है कि इसके असर को मिटाने के लिए टॉरेन्ट पर टैरेन्टिनो की कम से कम पांच फ़िल्में डाउनलोड करके देखनी होंगी। बहरहाल, महानुभाव रॉय और उनसे भी बड़े महापुरुष फिल्मकार-लेखक विक्रमजीत सिंह की बदौलत मैंने ढाई सौ रुपए गंवाकर सिनेमा हॉल में जो ज्ञान अर्जित किया, वो आपसे बांटना चाहूंगी। (वैसे भी ज्ञान बांटने से जितना बढ़ता है, सदमा बांटने से उतना ही कम होता है।) 
ज्ञान नंबर १ - अगर आप कबीर ग्रेवाल (अर्जुन रामपाल) की तरह सेलीब्रेटेड फ़िल्म राईटर-डायरेक्टर बनना चाहते हैं, तो आप सिर्फ़ और सिर्फ़ टाईपराईटर पर अपनी स्क्रिप्ट लिखें। फ़िल्म लिखने के लिए 'प्रेरणा' का होना जितना ज़रूरी है, उतना ही ज़रूरी आपके सिर पर फेडोरा स्टाईल टोपी का होना। 'प्रेरणा' मलेशिया जैसे किसी देश में मिलती है। मलेशिया जाकर शूट किया जाए तो आधे-अधूरे स्क्रीनप्ले से भी काम निकल जाता है। 
ज्ञान नंबर २ - एक सफल फिल्मकार और लेखक होने के लिए आपका चेन स्मोकर और एल्कोहॉलिक होना अत्यंत आवश्यक है। हां, ध्यान रहे कि आप बार में ड्रिंक मांगे तो द मैकेलैन, वो भी तीन आईस क्यूब्स हों। सिर्फ़ तीन। उसके बाद ही आप गर्लफ्रेंड नंबर २३ को पटाने की ज़ुर्रत करें। ('What were you smoking when you wrote this' जुमले का मतलब आज जाकर समझ में आया है!
ज्ञान नंबर ३ - आपकी फ़िल्म बन सके, इसलिए लिए ईरानी नाम का कोई पपलू फाइनैंसर ढूंढ लें। मीरा नाम की एक असिस्टेंट हो तो और भी अच्छा। बाकी 'प्रेरणाएं' तो आती-जाती रहती हैं।
ज्ञान नंबर ४ - एक फ़िल्म लिख पाने के लिए अपने भीतर के ऑल्टर ईगो को तलाशना ज़रूरी होता है। आप अपने ऑल्टर ईगो के जितने करीब होंगे, फ़िल्म उतनी ही ऐब्स्ट्रैक्ट और कमाल की बनेगी। दर्शक ख़ुद को फ़िल्म और फ़िल्म के किरदारों के करीब महसूस करें, इसकी बिल्कुल ज़रूरत नहीं है।
ज्ञान नंबर ५ - संगीत के लिए तीन किस्म के रिहैश का इस्तेमाल किया जा सकता है - अंकित तिवारी स्टाईल रिहैश, बेबी डॉल स्टाईल रिहैश और ईडीएम यानी इलेक्ट्रॉनिक डांस म्यूज़िक स्टाईल रिहैश।
ज्ञान नंबर ६ - फ़िल्मों तीन किस्म की होती हैं - एक वो जो दर्शकों के लिए बनाई जाती है - मसाला फ़िल्में टाईप की। दूसरी वो, जो आलोचकों और फेस्टिवल सर्किट के लिए बनाई जाती है। तीसरी किस्म का पता मुझे 'रॉय' फ़िल्म देखकर चला है - वो जो ख़ुद को समझने के लिए बनाई जाती है।
ज्ञान नंबर ७ - डायलॉग लिखने के लिए रॉन्डा बायर्न और पॉलो कोएल्हो को पढ़ना और आत्मसात करना ज़रूरी है। बाद में आपके डायलॉग इनकी बहुत ख़राब कॉपी लगें भी तो कोई बात नहीं।
ज्ञान नंबर ८ - - आप किस तरह के इंसान हैं, ये बात आपकी राईटिंग से पता चलती है। ये ज्ञान मैंने नहीं बघारा, फ़िल्म में जैक़लीन फर्नान्डीज़ कहती हैं।
 ज्ञान नंबर ९ - रणबीर कपूर के मासूम चेहरे पर बिल्कुल नहीं जाना चाहिए। लड़का जितना भोला दिखता है, उतना है नहीं। उसको पता था कि ये फ़िल्म देखकर लोग उसे गालियां देंगे। लेकिन हॉट बेब जैकलीन की कंपनी का लालच गालियों से बढ़कर होता है।

ज्ञान नंबर १० - ब्रेकअप की कोई वजह और बहाना न सूझ रहा हो तो इस वैलेंटाईन अपने बॉयफ्रेंड को रॉय का टिकट तोहफ़े में दें। वो आपको इस धोखे के लिए कभी माफ़ नहीं कर पाएगा, और बैठे बिठाए आपका काम निकल आएगा। (आपको साथ जाने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं। जो ढाई सौ रुपए बच जाएं उसकी मुझे कॉफ़ी पिला दीजिएगा।)

संजय मिश्रा : अभिनय में घोल दी जिंदगी

-अमित कर्ण

समर्थ अभिनेता संजय मिश्रा का सफर बिहार, बनारस और दिल्ली होते हुए अब मुंबई में जारी है। देश के प्रतिष्ठित नाट्य संस्थान एनएसडी से पास आउट होने के बाद वे नौंवे दशक में मुंबई की सरजमीं पर दस्तक दे चुके थे। उसके बावजूद उन्हें सालों बिना काम के मुंबई रहना पड़ा। अब फिल्मफेयर जैसे पॉपुलर अवार्ड ने उनके ‘आंखोदेखी’ के बाउजी के काम को सराहा है। उन्हें क्रिटिक कैटिगरी में बेस्ट एक्टर का अवार्ड मिला। संजय मिश्रा खुश हैं कि पॉपुलर अवार्ड समारोहों में ‘आंखोदेखी’, ‘क्वीन’ और  ‘हैदर’ जैसी फिल्मों के खाते में सबसे ज्यादा अवार्ड आए हैं। वैसी फिल्में इस बात की ताकीद करते हैं कि अब हिंदी सिनेमा बदल रहा है। आगे सिर्फ नाच-गाने व बेसिर-पैर की कहानियां दर्शक खारिज कर देंगे। जो कलाकार डिजर्व करते हैं, वे ही नाम और दाम दोनों के हकदार होंगे। मुंबई के अंधेरी उपनगरीय इलाके में उन्होंने बयां की अपना सफर अपनी जुबानी : 
    मैं मूलत : बिहार के दरभंगा के पास सकरी नारायणपुर इलाके का हूं। वहां मेरा पैतृक स्थल है, पर मेरी पैदाइश पटना की है। पिताजी प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो में थे तो मेरी पढ़ाई-लिखाई पहले बनारस, दिल्ली में हुई। दिल्ली प्रवास केदौरान जब मैं महज आठवीं-नौंवी में ही था तभी से फिल्म फेस्टिवलों से वल्र्ड सिनेमा से मेरा राब्ता गहरा हुआ। वहां से कला के प्रति प्यार ऐसा उमड़ा कि सब कुछ छोड़ कला की विभिन्न विधाओं को आत्मसात करने में रम गया। पिताजी ने वापस बुला लिया कि कम से कम दसवीं तो कर ही लो ताकि नाटक-नौटंकी से पिंड छूटे और कम से कम तुम्हें चपरासी की नौकरी तो दिला दें। मेरी दसवीं मुजफ्फरपुर के पास महुआ के स्कूल से हुई। वहां भी नाटकों में मेरा ज्यादातर वक्त गुजरता। सौभाग्य से वहां की भोली ऑडिएंस से इतनी वाहवाही मिलती कि मन पूरी तरह बन चुका था कि रंगमंच व अदाकारी के काम में ही राह बनानी है।
    बाद में मेरे पिताजी को मशहूर कथाकार मनोहर श्याम जोशी ने कहा कि यह लडक़ा दफ्तर में कलम घिसने के लिए नहीं बना है। इसे इसके मिजाज के काम में लगाओ। फिर मुझे वह करने की छूट मिली। मैंने पूरे मनोयोग से उस काम को अंजाम दिया। स्नातक कर नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा आया। यहां मैं एक चीज स्पष्ट कर दूं कि मैं आज जो कुछ भी हूं, उसमें ड्रामा स्कूल ने मुझे कुछ नहीं दिया। लोग आज कहते हैं कि मेरी अदाकारी अच्छी है। उसके लिए ड्रामा स्कूल जिम्मेदार नहीं है। वहां से मुझे मिले बस कुछ अच्छे दोस्त। मसलन, तिग्मांशु धूलिया व अन्य। अदाकारी के गुर तो मैं जिंदगी से मिले अनुभवों से सीखता गया। सुख-दुख, हर्ष-विषाद जो कुछ जिंदगी ने दिया, उनका इस्तेमाल अदाकारी में करता रहा। बहरहाल, ड्रामा स्कूल से पढ़ाई कर भी मैं व्याकुल नहीं था कि मुझे अदाकार बनना ही है। नाम कमाना है। मैं बंधकर जिंदगी जीने में यकीन नहीं रखता, मगर परिजनों के दवाब के बाद मुंबई आया। वहां काम मिलने में नौ साल लग गए, लेकिन उससे मैं टूटा नहीं। न ही मैंने वैकल्पिक फिल्म इंडस्ट्रियों में जाने की सोची। मैं यथावत अपनी जगह पर बना रहा। छोटे-मोटे रोल्स करता रहा। मिनी टीवी सीरिज करता, लेकिन उसमें अपनी मौजूदगी दमदार दिखाने की कोशिश मेरी रहती। फिर 99 के वल्र्ड कप क्रिकेट के दौरान ईएसपीएन के एप्पल सिंह किरदार से थोड़ा पॉपुलर हुआ। 1995 से फिल्में मिलती रहीं, पर उनमें मैं नोटिस नहीं हुआ।
     अंग्रेजी में कहते हैं ‘लाइफ बिगिन्स आफ्टर 40’। क्यों कहते हैं, पता नहीं, पर मेरे मामले में कुछ ऐसा ही हुआ। मैं उम्र के 50 वसंत पार कर चुका हूं और अब कथित ‘पॉपुलैरिटी’ मिल रही है। ‘आंखोदेखी’ के काम को खासी तारीफें मिल रही हैं। उस फिल्म के हिस्सा बनने की कहानी ‘फंस गए रे ओबामा’ से शुरू हुई थी। ‘फंस गए रे ओबामा’ से एक्टर-राइटर-डायरेक्टर रजत कपूर से दोस्ती गहरी हो गई थी। उन्होंने उसी दौरान मुझसे कहा कि संजय भाई मैं आप के लिए एक रोल लिख रहा हूं। मैंने उन्हें साधुवाद दिया। ‘फंस गए रे ओबामा’ की रिलीज के तीन साल बाद उन्होंने ‘आंखोदेखी’ की स्क्रिप्ट पूरी की, मगर वह स्क्रिप्ट उन्होंने नसीरुद्दीन शाह को सुनाई। नसीर साहब ने बड़े प्यार से रजत जी को कहा कि फिल्म में बाऊजी की भूमिका संजय निभाए तो उन्हें बड़ा अच्छा लगेगा। बेहतर होगा कि आप उन्हें ही सुनाओ। नसीर साहब ने उनसे यह भी कहा कि अगर वह रोल संजय जी के अलावा किसी और को सुनाया गया तो उन्हें बहुत बुरा लगेगा।
    तब रजत जी मेरे पास आए। हमने स्क्रिप्ट रीडिंग की। संयोग से फिल्म दर्शकों व समीक्षक दोनों बिरादारी को बहुत पसंद पड़ी। सबसे बड़ी बात तो यह रही कि उसकी शूटिंग के दौरान मैं रोया। बाद में फिल्म देखकर नसीरुद्दीन शाह जैसे शख्स रोए। ओमपुरी बड़ी मुश्किल से फिल्म की स्क्रीनिंग पर आने को राजी हुए, लेकिन जब उन्होंने फिल्म देखी तो 1000 का नोट निकाल कर रजत कपूर को दिया। उन्होंने रजत जी से कहा कि मैं इस किस्म की फिल्म मुफ्त में नहीं देख सकता। मुझे बड़ी खुशी है कि इस फिल्म के चलते हिंदी फिल्मों में नई हवा चली। मेरी परम ख्वाहिश है कि उस मिजाज की फिल्मों की रीच बढ़े। वह तब मुमकिन है, जब मीडिया, फिल्मफेयर जैसे पॉपुलर अवार्ड समारोह व बाकी जनों का भी समग्र सहयोग मिले। हम जनता-जर्नादन पर यह तोहमत नहीं लगा सकते कि वे फलां किस्म की फिल्में ही पसंद करते हैं। अगर उन्हें टिपिकल मसाला फिल्में ही पसंद होती तो ‘हैदर’, ‘क्वीन’ जैसी फिल्मों का नाम आज सबकी जुबान पर नहीं होता।
        आज ऑडिएंस नई कहानियों में खुद को तलाशना चाहती है। वह हतप्रभ होना चाहती है। उन्हें वैसी कहानियों की दरकार है। सवाल जहां तक मेरा है तो मैं रोहित शेट्टी की एक फिल्म कर रहा हूं, जिसमें शाह रुख और वरुण धवन हैं। एक यशराज की दम लगा के हइसा है। मैं साउथ की फिल्मों में भी बड़ा व्यस्त हूं। क्या कहूं महीने के 28 दिन शूट कर रहा हूं।


Tuesday, February 17, 2015

हिंदी टाकीज 2 (5) : सिनेमा विनेमा से सिनेमा सिनेमा तक.... :प्रतिभा कटियार

हिंदी टाकीज सीरिज में इस बार प्रतिभा कटियार। उन्‍होंने मेरा आग्रह स्‍वीकार किया और यह संस्‍मरण लिखा। प्रतिभा को मैं पढ़ता रहा हूं और उनकी गतिविधियों से थोड़ा-बहुत वाकिफ रहा हूं। वह निरंतर लिख रही हैं। उन्‍होंने साहित्‍य और पत्रकारिता की भिन्‍न विधाओं में लेखन किया है। उनका यह संस्‍मरण नौवें दशक के आखिरी सालों और पिछली सदी के अंतिम दशक में लखनऊ की किशोरियों और युवतियों के सिनेमाई व्‍यवहार की भी झलक देता है। यह संस्‍मरण सिनेमा के साथ प्रतिभा कटियार के गाढ़े होते संबंध की भी जानकारी देता है।
- प्रतिभा कटियार 

स्मृतियों का कुछ पता नहीं कब किस गली का फेरा लगाने पहुंच जायें और जाने क्या-क्या न खंगालने लगें। ऐसे ही एक रोज सिनेमा की बात चली तो वो बात जा पहुंची बचपन की उन गलियों में जहां यह तक दर्ज नहीं कि पहली फिल्म कौन थी। 
भले ही न दर्ज हो किसी फिल्म का नाम लेकिन सिनेमा की किसी रील की तरह मेरी जिंदगी में सिनेमा की आमद, बसावट और उससे मुझ पर पड़े असर के न जाने कितने पन्ने फड़फडाने लगे। 

महबूब सी आमद-
कनखियों से इधर-उधर देखता, छुपते-छुपाते, सहमते हुए डरते हुए से दाखिल हुआ सिनेमा जिंदगी में। मैंने भी डरते-डरते ही उसकी ओर देखा, और हाथ बढ़ा दिया। कैसी तो शिद्दत होती थी कयामत से कयामत टाइप फिल्मों की...जैसे नशा कोई...कोई कैसे बचता भला...आखिर प्यार हो ही गया। 

लेकिन कयामत से कयामत तक से पहले भी कुछ फिल्में गिरी थीं जेहन के आंगन में। अर्थ, कथा, अर्ध सत्य, सारांश, अंकुर जैसी फिल्में ही याद रह पाईं...यह बेलटेक के ब्लैक एंड व्हाइट टीवी पर देखी गई फिल्में थीं। दूरदर्शन का तोहफा। उस वक्त इन फिल्मों में क्या समझ में आता था यह तो पता नहीं लेकिन याद यही रह गई हैं...हालांकि उस बुद्धू बक्से पर कुछ भी चलते-फिरते देखने के मोह में देखा तो बहुत कुछ होगा यकीनन। ये वो वक्त था जब विज्ञापन देखने के लिए भी इंतजार होता था। शाम को दूरदर्शन खुलने के वक्त की धुन भी अच्छी लगती थी। कृषि दर्शन भी देख ही लिया जाता था कि शायद कोई लोक गीत आ जायेगा कुछ देर में। आज के जमाने के बच्चों को यह सब अजीब लग सकता है कि बुधवार को चित्रहार देखने को कैसे पूरा मोहल्ला जमा होता था और इतवार की फिल्म देखने को कैसी महफिल सजती थी। कौन सी फिल्म है, किसकी है इससे कोई खास सरोकार नहीं बस कि फिल्म है। 

पाकीजा सी वो याद
पापा सूचना अधिकारी थे। हम सरकारी आवास में रहते थे। आॅफिस और घर एक ही बिल्डिंग में। इसके चलते भी बचपन में काफी बदलाव आते गये। उनमें से एक बदलाव था लाइब्रेरी को प्ले हाउस बना पाने का, यानी गुड्डे गुडि़यों से खेलने की बजाय दुनिया भर के साहित्य से खेलना शुरू हो गया था दूसरे सिनेमा भी मुहैयया था। हर शनिवार पापा सार्वजनिक फिल्म शो करवाते थे। जाहिर है हम भी देखते ही थे। चूंकि लाइब्रेरी में सीमित फिल्में थीं ज्यादातर डाक्यूमेंटी फिल्में थीं बोर किस्म की तो जो भी रंगीन हिंदी फीचर फिल्में मौजूद थीं उन्हें बार-बार देखा। पाकीजा उन्हीं में से एक थी। एक-एक डाॅयलाॅग याद हो चुका था। मीना कुमारी का हाथ किस संवाद में कितने आराम से उठेगा और कितने सेकेंड में वो अपना चेहरा जरा सा घुमायेंगी सब रट सा गया था। यह भी कि किस जगह पर रील अटकती है और किस गाने के आखिर में गोली चलती है। 

तब तो पता नहीं था लेकिन बाद में जब दोस्त मजाक में कहने लगे कि तुमको मीना कुमारी सिंड्रोम तो नहीं तो यक-ब-यक पाकीजा ही याद आती है।

एक रात तीन फिल्में-
स्कूल के दिन थे, वो जब वीसीआर लगवाकर फिल्में देखने का रिवाज शुरू हुआ था। एक रात में तीन फिल्में। शादियों में यह विशेष आकर्षण हुआ करता था। लोग खुश होकर बताते थे कि वीडियो आया है बारात में। कयामत से कयामत तक, शहंशाह, मैंने प्यार किया ये सब फिल्में वीडियो पर देखी गईं। अब तक सिनेमा अपने व्यापक फलक और मनोरंजन की ताकत से खींच तो रहा था लेकिन वो फिल्में जो मनोरंजन तो शायद नहीं करती थीं फिर भी दिमाग में अपने असर छोड़ती जाती थीं। मनोरंजन भी खींचता ही था आखिर अंगूर, गोलमाल, चुपके-चुपके, जाने भी दो यारो...कोई भूल सकता है क्या। 

जादू जो चले नहीं-
मेरे भीतर का सिनेमा प्रेम कितना गहन है यह तो अब तक पता नहीं है लेकिन हम आपके हैं कौन को लेकर जो हंगामा बरपा हुआ था, उसने अभिभूत नहीं किया था यह याद है। जबकि सीतापुर के मेले में टूरिन टाकीज में जमीन पर बैठकर देखी गई नदिया के पार की खुशबू जे़हन में ताजा ही थी। दीदी तेरा देवर दीवाना का जादू चारो ओर छाया हुआ था, जाने क्यों मुझ पर ही नहीं चल पा रहा था हालांकि माधुरी दीक्षित मुझेे तब भी पसंद थी अब भी पसंद है। हम आपके हैं कौन उन फिल्मों में से है जो हाॅल में देखी गई फिल्मों में पहली स्मृति के तौर पर दर्ज हुई। मोहल्ले की बहुत सारी आंटियां, दीदियां एक साथ देखने गयी थीं। अपने घर से सिनेमा हाॅल तक पैदल। लखनऊ के नाॅवेल्टी सिनेमा हाॅल में इस फिल्म के जाने कितने रिकाॅर्ड दर्ज हुए। साडि़यों, गहनों, बारात, शादी गाने, अंताक्षरी का कोलाज यह फिल्म जादुई नशा कर रही थी उस वक्त। 

उसके बाद दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे...यह फिल्म मेरे जे़हन में करवाचैथ के ग्लैमराइजेशन के तौर पर दर्ज है। और यह डायलाॅग कि इंगेजमेंट रिंग वाली उंगली की नस सीधे दिल से जुड़ती है। कितना सच कितना झूठ पता नहीं।  शाहरुख का जादू टीवी सीरियल फौजी और सर्कस के बाद चक दे इंडिया और स्वदेश फिल्मों तक ही सिमटा रहा शायद इसलिए घनघोर रूमान लिए यह फिल्म भी कुछ खास कर न सकी मेरे तई। हालांकि काजोल तब भी पसंद थी अब भी पसंद है। इस फिल्म में सिमरन की मां का किरदार याद रह गया। मनोरंजन भरपूर होने के बाद भी जेहन में ठहरा नहीं ये सिनेमाई इश्क। दरवाजे पर घंटी लगाना मुझे बहुत पसंद है, शायद वो भी इसी फिल्म के अच्छे लगने से जुड़ा हो। 

वो पहली बार-
अब तक सिनेमा परिवार का हाथ पकड़कर बाकायदा प्लान बनाकर देखने का नाम ही हुआ करता था। सिनेमा हाॅल में पहली ऐसी फिल्म जिसे बिना घर में बताये, पूछे काॅलेज से बंक मारकर ढेर सारी सहेलियों ने एक साथ देखी, वो थी 1942 अ लव स्टोरी। लखनऊ का हजरतगंज, साहू सिनेमा। हम करीब दर्जन भर लड़कियां साथ में थीं, लेकिन सब खुसुर-फुसुर करती हुई। अंदर-अंदर डरी हुई और ऊपर से मजबूत दिखती हुई। टिकट कौन ले...तू ले तू ले...कहीं कोई जानने वाला न मिल जाये यह भी डर, लेकिन पहली बार इस तरह फिल्म देखने का रोमांच भी। यह फिल्म कई मायनों में बतौर फिल्म दर्ज हुई स्मृतियों में। 17-18 बरस की उम्र में प्यार हुआ चुपके से सुनने का रूमान जेहन पर काबिज हो रहा था। इसी फिल्म के साथ अनिल कपूर अपना हीरो हो गया। ये सफर बहुत है कठिन मगर न उदास हो मेरे हमसफर...पता नहीं फिल्म में क्या था कि एक ही बार में अपना बना लिया था इसने। मेरी बहुत सी दोस्तों को नहीं भी अच्छी लगी थी फिल्म। पहली बार अकेले, काॅलेज बंक करके घर में बिना बताये फिल्म देखने के रोमांच को समेटे जब घर लौटी तो घर में किसी का न होना बहुत अच्छा लगा। कैसेट रिकाॅर्डर पर रिपीट में फिल्म के गाने सुने...चाय पी और मनीषा कोईराला और अनिल कपूर को याद किया। 

यह इस रूप में भी पहली फिल्म थी कि फिल्म की कहानी में दिमाग बार-बार उलझ रहा था। अब फिल्म के तमाम पक्षों पर सोच पाना संभव हो पा रहा था। सिनेमा सिर्फ मनोरंजन भर होने की हद के पार जा चुका था। 
काॅलेज कैम्पस और हाय मेरा हीरो-
सिनेमा अपनी पर्तों के साथ खुल रहा था। अब हम काॅलेज में फिल्मों पर उन की कहानियों पर चर्चा करते थे। हालांकि ज्यादातर चर्चाओं में ज्यादा समय शाहरुख खान, सलमान की चहेतियां हाय, ही इज सो क्यूट के चक्कर में धम्म से गिर पड़ती थीं फिर भी जे़हन में उथल-पुथल शुरू हो चुकी थी। मैं देखती थी कि काॅलेज में फिल्मों का काफी असर था। टीवी का भी। अक्सर काॅलेज के कैम्पस या कैंटीन ब्वाॅयफ्रेंड के झूठे-सच्चे किस्सों या शाहरुख, सलमान के लुक्स की चर्चा से उफनाये रहते थे। यहीं से हम आॅड मैन आउट फील करना शुरू कर चुके थे। दोस्तों को लगता था कि मुझमें ही कोई दिक्कत है जो सबको पसंद है वो मुझे पसंद क्यों नहीं...और उनका वो लगना अब तक कायम है। 

हालांकि जिस वक्त हाय मेरा हीरो वाला दौर सहेलियों में भयंकर उफान पर था तो मैं भी सोचती थी अक्सर कि मेरा फेवरेट हीरो कौन है...और जाने कैसे शेखर कपूर का चेहरा ही आंखों के आगे घूम जाता था। शायद स्कूल के दिनों में देखे गये धारावाहिक उड़ान के उस डीएम सीतापुर का नशा चढ़ गया था। शेखर कपूर अब भी मेरे पसंदीदा हैं....बतौर हीरो भी और निर्देशक भी। 

फिल्मची दोस्त की संगत-
इस बीच ज्योति से दोस्ती हो चुकी थी। वो बड़ी फिल्मची ठहरी। जाने क्या-क्या तो उसे पता होता था। अब सिनेमा का दूसरा ही संसार खुलने लगा था, काॅमर्शियल सिनेमा, पैरेलल सिनेमा, हाॅलीवुड, ईरानी फिल्मों का, जापानी फिल्मों का संसार, मराठी, बंगाली फिल्मों का संसार...बहुत सी फिल्में उसने हाथ पकड़कर खींच के दिर्खाईं बीच-बीच में समझाते हुए...कितनी ही ग्रे फिल्में देखते वक्त वो मेरा हाथ भी थामती और डांटती भी कि देखो चुपचाप. हालांकि जिन फिल्मों को देखकर बाहर निकलते हुए यह संकोच खाए जाता था कि कोई जानने वाला दिख न जाए....उन्हीं पर बाद में लेख लिखना, बहसें करना अच्छा भी लगता था। यह सिनेमा के संसार में शायद ग्रो करना था। मुझे याद है बैंडिट क्वीन देखने के बाद महीनों एक भयावहता घेरे रही थी। 
वो तंग पाॅकेट और सिनेमा की भूख और बहानेबाजियां- 
सिनेमा अब सिनेमा हाॅल में देखने में ही अच्छा लगता था और पाॅकेट मुंह फाड़े खड़े रहती थी। इसका तोड़ निकाला हमने माॅर्निंग शो। सुबह-सुबह साढ़े नौ बजे फिल्म देखने के लिए बिना नाश्ता किए हुआ भागना। आखिर दस रुपये का टिकट जो होता था। दूसरी मुश्किल होती थी घर में मां को क्या बताया जायेगा। मां बहुत स्टिक्ट थीं। फिल्म देखना उनके लिए एकदम फालतू काम तब भी था अब भी है....तो उनसे झूठ बोलने की हिम्मत...सही बहाना बनाने का दिमाग दोनों नहीं थे अपने पास। तो यह ठीकरा भी दोस्तों के सर...आंटी...एक जरूरी सेमिनार है...प्रतिभा को ले जाएं...टाइप बहाने। बाद में लगने लगा काॅलेज बंक करना आसान आॅप्शन है घर में मां से झूठ बोलने के मुकाबले...बहरहाल, बहाने भी चलते रहे और फिल्में भी देखी जाती रहीं।
आता न जाता बने फिल्म समीक्षक-
एक दिलचस्प किस्सा जरूरी है, कि किस तरह मेरे जैसे अनाड़ी को अखबार ज्वाइन करते ही फिल्मों की समीक्षा की जिम्मेदारी दे दी गई। आजकल के ट्रेनी तो काफी अपडेट रहते हैं मेरे जैसी लड़की...फिल्म समीक्षा करने चल पड़ी। फस्र्ट डे फस्र्ट शो बड़ा मजा आता था। पहली समीक्षा लिखी और फिल्म को खूब पानी पी पीकर कोसा...दूसरी में भी...तीसरी में भी...जल्दी ही यह मेरा और एडीटर दोनों का सरदर्द होने लगा। एडीटर जो कहना चाहते थे वो सीधे कह नहीं सकते थे कि इस तरह आलोचना मत करो भाई, फिल्म समीक्षा फिल्म प्रमोशन के लिए भी करवाई जाती है, और मेरी दिक्कत ये कि कैसी-कैसी फिल्में झेलनी पड़ती हैं...बाद में इस बात की गंभीरता भी समझ में आई कि क्यों अक्सर अखबारी फिल्मी समीक्षाएं गड़बड़ होती हैं क्योंकि एक बेहद गंभीर काम को बेहद हल्का जो समझ लिया जाता है। 
जरूर मेरे ही भीतर कोई कैमिकल लोचा है कि अब तक अगर एक आध अपवाद को छोड़ दें तो मार्केट में धूम मचाती फिल्मों का रुख करना अक्सर सजा सी मालूम होती है अब तक।

बदलता सिनेमा बदलता समाज-
ब्लैक एंड व्हाइट टीवी के जरिये सिनेमा के संसार से जुड़ने के बाद से संसार और सिनेमा के संसार में बहुत अंतर आते देखा है। 

फिल्ममेकर्स में भी बदलाव आते देखा है, दर्शकों में भी। आस्था, क्या कहना, जैसी फिल्मों पर दर्शकों का गुस्सा, सरोगेट मदर जैसे मुद्दों पर बनी फिल्मों को नकार दिया जाना, हम दिल दे चुके सनम तक मंगलसूत्र के महिमामंडन में फंसी फिल्मों का कभी अलविदा न कहना से बाहर आना, इस सच तक भी कि किसी से प्यार न होने के लिए उसका बुरा होना जरूरी नहंीं, किसी से प्यार होने के लिए उसका बहुत अच्छा होना और पति होना, कुंवारा होना जरूरी नहीं...

नये संसार में खुलती खिड़कियां-
इस बीच मुझ जैसी अनाड़ी लड़की को हिंदी ब्लाॅग जगत का पता मिला। वहां से साहित्य और सिनेमा के संसार की तमाम खिाडकियां खुलीं। बना रहे बनारस ने बहुत सारी फिल्मों के पते दिये, उन पर आये लेखों ने फिल्मों को देखने की नज़र भी दी। नये-नये दोस्तों ने कई देशों की, भाषाओं की फिल्मों से दोस्ती करायी, अब तोहफे में फिल्में मिलने लगी थीं और गुरु दत्त, श्याम बेनगल, मणिरत्नम, मझााल सेन, रितुपर्णो घोष, रित्विक घटक, सत्यजीत रे, बिमल राॅय, बासु भट्टाचार्या के अलावा अब्बास किरोस्तामी, जफर पनाही, माजिद मजीदी, अकीरा कुरोसावा, आन्द्रेई तारकोवस्की के नाम का संसार भी खुलने लगा था। 

अनुराग कश्यप, विशाल भारद्वाज के अलावा जहां भी कुछ नया गढ़ा जा रहा था वहां पहुंचना अच्छा लगने लगा है अब। करन जौहर, रोहित शेट्टी वगैरह आते हैं गुदगुदाते हैं गुजर जाते हैं लेकिन कोई खोज जारी रहती है। फेसबुक पर कोई स्टेटस देखकर टैगोर की कहानी पर बनी कश्मकश ढूंढती हूं, देखती हूं या फिर कोई डाक्यूमेंटरी....

इंटरनेट का संसार आज सामने लहरा रहा है...जिन खोजा तिन पाइयां...कितना कुछ ढूंढा...पाया...ढूंढ रही हूं और हर दिन महसूस होता है कि दुनिया भर के सिनेमा के जादुई संसार में कितना कुछ रचा जा चुका है, चंद बूंदें ही समेट पाई हूं बस....जितनी बूंदें समेटती हूं उतनी ही प्यास बढ़ती जाती है सिनेमा की...लेकिन एक बात तो तय है कि मैं पहली दर्शक हिंदी सिनेमा की ही हूं....