Search This Blog

Loading...

Thursday, July 31, 2014

पीके का पोस्‍टर



दरअसल : पहली छमाही के संकेत


-अजय ब्रह्मात्मज

    2014 की पहली छमाही ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को उम्मीद और खुशी दी है। हिट और फ्लाप से परे जाकर देखें तो कुछ नए संकेत मिलते हैं। नए चेहरों की जोरदार दस्तक और दर्शकों के दिलखोल स्वागत ने जाहिर कर दिया है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री नई चुनौतियों के लिए तैयार है। नए विषयों की फिल्में पसंद की जा रही हैं। एक उल्लेखनीय बदलाव यह आया है कि पोस्टर पर अभिनेत्रियां दिख रही हैं। यह धारणा टूटी है कि बगैर हीरो की फिल्मों को दर्शकों का अच्छा रेस्पांस नहीं मिलता। पहली छमाही में अभिनेत्रियों की मुख्य भूमिका की कुछ फिल्मों ने साबित कर दिया है कि अगर फिल्मों को सही ढंग से पेश किया जाए तो दर्शक उन्हें लपकने को तैयार हैं। अगर कोताही हुई तो दर्शक दुत्कार भी देते हैं। ‘क्वीन’ और ‘रिवाल्वर रानी’ के उदाहरण से इसे समझा जा सकता है।
    अभिनेत्रियों की स्वीकृति में आए उभार और उनकी फिल्मों की बात करें तो पहली छमाही में माधरी दीक्षित और हुमा कुरेशी की ‘डेढ़ इश्किया’ और माधुरी दीक्षित की ‘गुलाब गैंग’ है। कमोबेश दोनों फिल्मों को दर्शकों का बहुत अच्छा रेस्पांस नहीं मिला। कहीं कुछ गड़बड़ हो गई। फिर भी इन फिल्मों के निर्माता-निर्देशकों की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने ऐसी फिल्म बनाने का प्रयास किया। आलिया भट्ट की ‘हाईवे’ इम्तियाज अली की फिल्म थी। उन्होंने बहुत खूबसूरती से अमीर परिवार की एक लडक़ी की कहानी कही। खुद को पहचानने के बाद वह बचपन से भुगत रही यंत्रणा से मुक्त होती है। ‘2 स्टेट्स’ में भी आलिया भट्ट ने अपने किरदार को दमदार तरीके से पेश किया। ‘हंसी तो फंसी’ में परिणीति चोपड़ा की मौजूदगी अहम थी। ‘रागिनी एमएमएस’ और ‘क्वीन’ दो छोरों पर नजर आ सकती हैं,लेकिन दोनों ही फिल्मों में नायिका की प्रधानता की समानता थी। सनी लियोनी और कंगना रनोट ने अपनी भूमिकाओं में निश्शंक दिखीं। दोनों के अभिनय में झेंप नहीं है। दोनों को एक ही श्रेणी में नहीं रखा जा सकता,लेकिन इस तथ्य से भी इंकार नहीं कर सकते कि सनी और कंगना की फिल्मों में पुरुष पात्र गौण थे।
    पहली छमाही में अर्जुन कपूर,वरुण धवन,सिद्धार्थ मल्होत्रा,टाइगर श्रॉफ और राजकुमार राव ने अपनी फिल्मों से बताया कि वे हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की बागडोर संभालने के लिए तैयार हैं। अर्जुन कपूर की ‘2 स्टेट्स’ 100 करोड़ क्लब में दाखिल हो गई। सिद्धार्थ मल्होत्रा की जुलाई में आई फिल्म ‘एक विलेन’ की कामयाबी ने उनकी योग्यता पर मोहर लगा दी। वरुण धवन की ‘हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया’ भी सफल हो चुकी है। टाइगर श्रॉफ की पहली फिल्म ‘हीरोपंथी’ ने भी दर्शकों का आकृष्ट किया। इन चारों से अलग राजकुमार राव अपने अभिनय और दर्शकों की सराहना के दम पर अगली कतार में शामिल हुए। इन अभिनेताओं की फिल्मों की कामयाबी स्पष्ट संकेत देती है कि नए सितारे पूरी तैयारी के साथ आ चुके हैं। समय और फिल्मों के साथ उनकी लोकप्रियता बढ़ेगी और उसी के अनुपात में उनके स्टारडम में इजाफा होगा।
    पहली छमाही में पुराने सितारों में सलमान खान और अक्षय कुमार की फिल्में आईं। ‘जय हो’ को सलमान की औसत फिल्म माना जाता है। लागत और प्रभाव की वजह से 100 करोड़ से अधिक का कलेक्शन करने के बावजूद ‘जय हो’ ने सलमान खान के स्टारडम पर प्रश्न चिह्न लगा दिया। अक्षय कुमार अलबत्ता ‘हॉलीडे’ की कामयाबी से फिर से सफल सितारों की तरह चमकने लगे। देखना यह है कि अगली छमाही में पुराने सितारों की चमक कैसी रहती है? बाक्स आफिस पर उनकी फिल्मों के प्रदर्शन का तमाशा रोचक होगा।

Sunday, July 27, 2014

अपनी लुक के लिए मैं क्‍यों शर्मिंदगी महसूस करूं ? -हुमा कुरेशी

(हुमा कुरेशी ने यह लेख इंडियन एक्‍सप्रेस के लिए शनिवार,26 जुलाई को लिखा थ। मुझे अच्‍छा और जरूरी लगा तो उनके जन्‍मदिन 28 जुलाई के तोहफे के रूप में मैंने इस का अनुवाद कर दिया।) 
मेरी हमेशा से तमन्‍ना थी कि अभिेनेत्री बनूंगी,लेकिन इसे स्‍वीकार करने के लिए हिम्‍मत की जरूरत पड़ी। खुद को समझाने के लिए भी।हां,मैं मध्‍यवर्गीय मुसलमान परिवर की लड़की थी,एक हद तक रुढि़वादी। पढ़ाई-लिखाई में हेड गर्ल टाइप। मैं पारंपरिक 'बॉलीवुड हीरोइन' मैटेरियल नहीं थी।
      औरत के रूप में जन्‍म लेने के अनेक नुकसान हैं...भले ही आप कहीं पैदा हो या जैसी भी परवरिश मिले। इंदिरा नूई,शेरल सैंडबर्ग और करोड़ों महिलाएं इस तथ्‍य से सहमत होंगी। निस्‍संदेह लड़की होने की वजह से हमरा पहला खिलौना बार्बी होती है। ग्‍लोबलसाइजेशन की यह विडंबना है कि हमारे खेलों का भी मानकीकरण हो गया है। पांच साल की उम्र में मिला वह खिलौना हमारे शारीरिक सौंदर्य और अपीयरेंस का आजीवन मानदंड बन जाता है।(मैं दक्षिण दिल्‍ली की लड़की के तौर पर यह कह रही हूं।) संक्षेप में परफेक्‍शन। परफेक्‍शन का पैमाना बन जाता है।
     दुनिया ने मेरे अंदर वैसी ही आकांक्षा डाली। बाद में मुझे पता चला कि बार्बी गेहुंआ और काली भी हो सकती है।अउसके घुघराले बाल हो सकते हैं। वह छिद्रदार टीशर्ट पहन सकती है। वह पका सकती है। अगर आप उसे खेलने भेजें तो वह छक्‍का भी मार सकती है। आप जैसा चाहें,बार्बी चैसी हो सकती है। मैंने समझ लिया कि कोई भी अपनी बार्बी हो सकती है और शायद मैं भी बार्बी हो सकती हूं।
     पारंपरिक तरीके से देखें तो मैं सुंदर हूं। लेकिन मैं उसका 'भार' समझती हूं। विचित्र लग सकता है,लेकिन मुझे अपने श्‍ारीर,कटाव और रूप से प्रेम नहीं है। मुझे अच्‍छा लगता है कि मेरे दांत टूटे हुए हैं,एडवेचरस होने के निशान मौजूद हैं।मेरे हॉबिट पांव हैं। और हां,पहली बार स्‍वीकार कर रही हूं कि मेरे पांव कुछ ज्‍यादा ही बड़े हैं।
     मुझे फिल्‍में पसंद हैं। फिल्‍में देखना और उनका हिस्‍सा बनना पसंद है। लेकिन एक्‍टर के तौर पर जब मेरे शरीर की निरंतर जंचाई होती है तो कोफ्त होती है। एक्‍टर होने के नाते मुझे इसके लिए तैयार रहना पड़ता है। हां,सभी औरतें इस गुण और कला में माहिर नहीं होतीं। उन्‍हें जरूरत भ्‍ाी नहीं पड़ती।
       हम ऐसी संस्‍कृति में जी रहे हैं,जहां फिल्‍मों,टीवी,विज्ञापन,पत्रिकाओं के कवर से पिरंतर बताया जा रहा है कि परफेक्‍ट शरीर की एक ही परिभाषा है... और उुपर से यह भी संदेश दिया जाता है कि आप उसके काबिल नहीं हैं और कभी हो भी नहीं पाएंगी। 
     महिलाओं को लगातार सिखाया जाता है कि वे खुद से प्‍यार ना करें।आप जानती हैं कि दुनिया आप को किस रूप में देखना चाहती है। 'छह फीट दो इंच लंबी','साइज जीरो'  या 'साइज माइनस वन' या खान-पान की जो अनियमितता इस हफ्ते हम बता रहे हैं,प्रोत्‍साहित कर रहे हैं। जब बोला जाए तभी बोलें,दिखाई पड़ें,सुनाई न पड़ें,कोई सुनेगा नहीं। दुनिया आप की नीरव खामोशी चाहती है। 
    इसके बावजूद दुनिया में ऐसी औरते हैं,जो खामोश बैठ कर दुनिया की कसौटी पर खरी नहीं उतरना चाहतीं। उन्‍हें दुनिया की मंजूरी नहीं चाहिए। जीवन की पूर्णता के लिए उन्‍हें किसी की अनुमति नहीं चाहिए। उन्‍होंने खुद को सिखाया कि वे स्‍वयं से प्‍यार करें,अपने वजूद को पसंद करें,अपनी कमियों से मोहब्‍बत करें। एक बार इसे हासिल करने के बाद उन्‍हें किसी से कुछ और नहीं चाहिए। यह उन्‍होंने हासिल किया है। यह हम भी हासिल कर सकती हैं। क्‍योंकि दुनिया आप की अावाज सुनना चाहती है। 
       औरतें हर किस्‍म के मर्तबान में आती हैं- भिन्‍न आकार-प्रकार,भिन्‍न उम्र,भिन्‍न रंग,भिन्‍न बाल.... उनकी सामाजिक-सांस्‍कृतिक पृरूठभूमि भी अलग-अलग होती है। वे सभी खूबसूरत होती हैं। और जब हमें अपनी वास्‍तविकता से प्रेम हो जाता है,जब हम दुनिया की निगाहों में कमी समझी जाने वाली चीजों को अपना लेती हैं और उसका जश्‍न मनाती हैं तो फिर हमें कोई नहीं रोक पाता। हमें रुकना भी नहीं चाहिए। 
     मेरी प्रिय कवयित्री माया एंगलो ने 'फेनोमेनल वीमैन' में लिखा है, Now you understand/Just why my head's not bowed/I dont shout or jump about/Or have to talk real loud/When you see me passing/It ought to make you proud/I say/Its in the click of my heels/The bend of my hair/The palm of my hand/The need of my care/'Cause i am a woman/Phenomenally/Phenomenal woman/That's me.
    मैं फेमनिस्‍ट नहीं हूं। मुझ पर ऐसा लेबल न लगाएं। दूसरों की तरह ही मैं भी आत्‍म गौरव के मुद्दों के साथ बड़ी हुई हूं। यह अस्‍वस्‍थ या अनफिट रहने का बहाना नहीं है। यह सिर्फ याद दिलाने के लिए है कि हम सभी अलग-अलग मर्तबान में आती हैं। और एक मर्तबान दूसरे से बेहतर नहीं होता। वे सभी अलग होते हैं। 
    कल को एक एथलीट की भूमिका के लिए मैंने अपना वजन कम किया तो भी मैं 'कटावदार जिस्‍म की लड़की' की वजह नहीं छोड़ूंगी या 'साइज जीरो की महामार' की चपेट में नहीं आऊंगी। ऐसा फिल्‍म के किरदार को निभाने के लिए होगा। मुझ से या किसी और लड़की से यह कभी नहीं कहें कि हम अपनी लुक या व्‍यवहार के लिए शर्मिंदगी महसूस करें।

Friday, July 25, 2014

फिल्‍म समीक्षा : किक

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
कुछ फिल्में समीक्षाओं के परे होती हैं। सलमान खान की इधर की फिल्में उसी श्रेणी में आती हैं। सलमान खान की लोकप्रियता का यह आलम है कि अगर कल को कोई उनकी एक हफ्ते की गतिविधियों की चुस्त एडीटिंग कर फिल्म या डाक्यूमेंट्री बना दे तो भी उनके फैन उसे देखने जाएंगे। ब्रांड सलमान को ध्यान में रख कर बनाई गई फिल्मों में सारे उपादानों के केंद्र में वही रहते हैं। साजिद नाडियाडवाला ने इसी ब्रांड से जुड़ी कहानियों, किंवदंतियो और कार्यों को फिल्म की कहानी में गुंथा है। मूल तेलुगू में 'किक' देख चुके दर्शक बता सकेगे कि हिंदी की 'किक' कितनी भिन्न है। सलमान खान ने इस 'किक' को भव्यता जरूर दी है। फिल्म में हुआ खर्च हर दृश्य में टपकता है।
देवी उच्छृंखल स्वभाव का लड़का है। इन दिनों हिंदी फिल्मों के ज्यादातर नायक उच्छृंखल ही होते हैं। अत्यंत प्रतिभाशाली देवी वही काम करता है, जिसमें उसे किक मिले। इस किक के लिए वह अपनी जान भी जोखिम में डाल सकता है। एक दोस्त की शादी के लिए वह हैरतअंगेज भागदौड़ करता है। इसी भागदौड़ में उसकी मुलाकात शायना से हो जाती है। शायना उसे अच्छी लगती है। देवी उसके साथ बूढ़ा होना चाहता है। शायना चाहती है कि देवी किसी नियमित जॉब में आ जाए। उधर देवी की दिक्कत है कि हर नए काम से कुछ ही दिनों में उसका मन उचट जाता है। शायना उसे टोकती है। उसकी एक बात देवी को लग जाती है। इसके बाद वह किक के लिए देवी से डेविल में बदल जाता है। डेविल और पुलिस अधिकारी हिमांशु की अलग लुकाछिपी चल रही होती है। इनके बीच भ्रष्ट नेता और उसका भतीजा भी है।
रोमांस, एक्शन, चेज, कॉमेडी, सॉन्ग एंड डांस और इमोशन से भरपूर 'किक' से साजिद नाडियाडवाला केवल सलमान खान के प्रशंसकों को खुश करने की कोशिश में हैं। दृश्य विधान ऐसे रचे गए हैं कि कैमरा आखिरकार हर बार सलमान की भाव-भंगिमाओं पर आकर ठहर जाता है। अगर कभी दूसरे किरदार पर्दे पर दिखते हैं तो वे भी देवी या डेविल की ही बातें कर रहे होते हैं। हिंदी फिल्मों में स्क्रिप्ट लेखन का यह खास कौशल है, जो पॉपुलर स्टार की फिल्मों में आजमाया जाता है। एकांगी होने से बचते हुए ढाई घंटे की ऐसी स्क्रिप्ट तैयार करने में अलहदा मेहनत लगती है। 'किक' जैसी फिल्मों का एकमात्र उद्देश्य आम दर्शकों का मनोरंजन करना है। आम दर्शक अपने परिवार के सदस्यों के साथ उसका आनंद उठा सकें।
'किक' अपनी इन सीमाओं और खूबियों में कहीं बिखरती और कहीं प्रभावित करती है। इंटरवल के पहले का विस्तार लंबा हो गया है। देवी और उसके पिता के रिश्ते को स्थापित करने वाले दृश्य नाहक खींचे गए हैं। इसी तरह नायक-नायिका की मुलाकात के दृश्य में दोहराव है। हम दशकों से ऐसी छेड़खानियां और बदमाशियां देखते आए हैं। अगर फिल्म के नायक सलमान खान हैं तो सीधे व सामान्य की उम्मीद ही नहीं करनी चाहिए। देवी और डेविल की हरकतों में कई बार लॉजिक की परवाह नहीं की गई है, लेकिन क्या सलमान खान के प्रशंसक इन पर गौर करते हैं? बेहतर है कि दिल में आने वाले इस नायक को समझने में दिमाग न लगाया जाए।
'किक' में सलमान खान पूरे फॉर्म में हैं। उम्र चेहरे और शरीर पर दिखती है, लेकिन ऊर्जा में कोई कमी नहीं है। सलमान ने एक्शन के दृश्यों में आवश्यक फुर्ती दिखाई है। रोमांस और डांस का उनका खास अंदाज यहां भी मौजूद है। सलमान खान की इस फिल्म में रणदीप हुडा और नवाजुद्दीन सिद्दिकी अपनी उपस्थिति दर्ज करते हैं। रणदीप हुड्डा ने पुलिस अधिकारी हिमांशु के किरदार में स्फूर्ति बरती है। कुछ दृश्यों में वे अवश्य लड़खड़ा गए हैं। नवाज की तारीफ करनी होगी कि चंद दृश्यों के अपने किरदार का उन्होंने अदायगी से यादगार बना दिया है। चटखारे लेकर उनके बोलने के अंदाज की नकल होगी। जैकलीन फर्नांडीज के लिए कुछ डांस स्टेप्स और रोमांस के सीन थे। उनमें वह जंचती हैं। संवाद अदायगी और नाटकीय दृश्यों के लिए उन्हें और मेहनत करनी होगी। सौरभ शुक्ला, मिथुन चक्रवर्ती, विपिन शर्मा और संजय मिश्रा अपनी भूमिकाओं में उपयुक्त हैं।
ईद के मौके पर सलमान खान और साजिद नाडियाडवाला की पेशकश 'किक' आम दर्शकों का ध्यान में रख कर बनाई गई सलमान खान की विशेषताओं की फिल्म है।
अवधि: 146 मिनट
***  तीन स्‍टार

Thursday, July 24, 2014

दरअसल : खान बनाम खान बनाम खान


-अजय ब्रह्मात्मज
    ईद के मौके पर सलमान खान की ‘किक’ रिलीज होगी। पिछले कुछ सालों से सलमान खान की फिल्में ईद पर ही रिलीज हो रही हैं। दर्शकों के प्रेम और सराहना से उन्हें कामयाबी के रूप में ईदी मिल जाती है। अगले साल की ईद के लिए भी उनकी फिल्म घोषित हो चुकी है। ‘किक’ के निर्माता-निर्देशक साजिद नाडियाडवाला हैं। अपनी पहली फिल्म के निर्माण और प्रमोशन में वे किसी प्रकार की कमी नहीं रहने देना चाहते। इस साल की अभी तक की यह बहुप्रचारित फिल्म है। हालांकि इस बीच प्रेस फोटोग्राफरों से सलमान खान की अनबन हुई है। फिर भी ‘किक’ और सलमान खान में दर्शकों की मांग की वजह से मीडिया की रुचि कम नहीं हुई है। सलमान खान स्वयं आगे बढ़ कर सहयोग कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि वे ‘जय हो’ की गलती नहीं दोहराना चाहते। हालांकि ‘जय हो’ 100 करोड़ क्लब में आ गई थी,लेकिन वह सलमान खान की इमेज और हैसियत के हिसाब से बिजनेस के मामले में कमजोर फिल्म रही।
    सलमान खान की तरह ही शाहरुख खान और आमिर खान भी अपनी फिल्मों के प्रचार और विज्ञापन की तैयारी में जुटे हैं। शाहरूख खान की ‘हैप्पी न्यू ईयर’ दीपावली के मौके पर आएगी और आमिर खान ने ‘पीके’ के लिए क्रिसमस का समय चुन रखा है। देश के तीन बड़े त्योहारों पर खानत्रयी ने कब्जा कर रखा है। इनकी फिल्मों की रिलीज की पूर्वघोषणा हो जाती है। देखा जाता है कि इनकी फिल्मों के साथ उन तारीखों को ही अपनी फिल्में रिलीज करने की हिमाकत कोई निर्माता नहीं करता। बिजनेस के लिहाज से इसे ठीक नहीं माना जाता। पिछले कुछ सालों से तीनों खानों की यही रणनीति चल रही है। तीनों अपने करिअर के शीर्ष पर हैं। वहीं टिके रहने का सारा इंतजाम करते हैं। संयोग और मेहनत से उनकी फिल्में औसत से बेहतर व्यापार करती हैं। वे चमकते रहते हैं।
    तीनों खानों को अक्षय कुमार,अजय देवगन और रितिक रोशन से कभी-कभी टकराना पड़ता है,लेकिन अपनी ख्याति और रुतबे से वे आगे बने रहते हैं। खानत्रयी के करिअर पर गौर करें तो उनके भी बुरे फेज आए हैं। लगातार फिल्में फ्लॉप होती रही हैं। अब स्थितियां बदल चुकी हैं।  अभी तीनों में से कोई भी फ्लॉप का जोखिम नहीं ले सकता। इसी साल का उदाहरण लें तो अर्जुन कपूर और सिद्धार्थ मल्होत्रा पहले ही 100 करोड़ क्लब में पहुंच चुके हैं। वरुण धवन की फिल्म ‘हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया’ भी सफलता के संकेत दे रही है। अपने स्टारडम को बरकरार रखने के लिए तीनों खानों को बाक्स आफिस पर तीनों नए स्टारों से बेहतर प्रदर्शन करना होगा।
    यों 25 सालों से दर्शकों के दिलों पर राज कर रहे तीनों खानों के अवसान का समय आ चुका है। दूसरी तरफ,नए स्टारों की धमक को दर्शकों का समर्थन मिल रहा है। शाहरुख खान रोहित शेट्टी की ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ की मदद से फिर से सेंटर में आ चुके हैं। फराह खान की ‘हैप्पी न्यू ईयर’ से उन्हें और उनके प्रशंसकों को उम्मीदें हैं। ‘ओम शांति ओम’ के बाद फिर से शाहरुख खान,दीपिका पादुकोण और फराह खान की तिगड़ी पुराने जादू के प्रयास में है। चुनौती आमिर खान के लिए भी है। ‘3 इडियट’ के बाद वे एक बार फिर राजकुमार हिरानी के साथ आ रहे हैं। उनकी पिछली फिल्म ‘धूम 3’ ने नए रिकॉर्ड बनाए थे। सलमान खान और शाहरुख खान की इच्छा है कि वे आमिर खान से आगे निकलें। आमिर खान अपनी बढ़त बनाए रखना चाहते हैं। हिंदी फिल्मों में प्रेमत्रिकोण होता है,जिसमें कोई एक छूट जाता है। यह हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का फेमत्रिकोण है,इसमें किसी एक को आगे बढऩा है। दो छूट जाएंगे। सवाल है कि 2014 में खान बनाम खान बनाम खान में कौन में कौन बाजी मारेगा? सलमान,शाहरुख या आमिर?

ताजिंदगी 27 साल का रहूं मैं-सलमान खान


-अजय ब्रह्मात्मज
ऐसा कम होता है। जीवन के किसी भी क्षेत्र में सीनियर बाद की पीढ़ी की खुले दिल से तारीफ नहीं करते। सलमान खान इस लिहाज से भिन्न हैं। वे अपनी फिल्मों में नई प्रतिभाओं को मौका देते और दिलवाते हैं। पिछली मुलाकात में उन्होंने शुरुआत ही नए और युवा स्टारों की तारीफ से की। फिल्मों की रिलीज के समय उनके अपार्टमेंट गैलेक्सी के पास स्थित महबूब  स्टूडियो उनका दूसरा घर हो जाता है। एक अस्थायी कैंप बन जाता है। उनके सारे सहयोगी तत्पर मिलते हैं। यहीं वे मीडिया के लोगों से मिलते हैं। पिछले कुछ सालों से यही सिलसिला चल रहा है। ‘किक’ के लिए हुई इस मुलाकात में सलमान खान ने सबसे पहले अर्जुन कपूर ,आलिया भट्टऔर वरुण धवन समेत सभी नए टैलेंट की तारीफ की। उन्होंने अपने अनुभव से कहा कि वे खुले मिजाज के हैं। बातचीत और मेलजोल में किसी प्रकार का संकोच नहीं रखते। मैंने देखा है कि वे आपस में एक-दूसरे की खिंचाई भी करते हैं। खिल्ली उड़ाते हैं। मेरी पीढ़ी में केवल मैं हंसी-मजाक करता हूं। दूसरे तो सीरियस रहते हैं। अपनी पीढ़ी की बातें करते समय उन्होने जाहिर किया कि संजू यानी संजय दत्त के साथ उनकी ऐसी दोस्ती रही है। बाकी से भी मित्रता है,लेकिन वैसी अंतरंगता नहीं है।
    सलमान ने अपने दर्शकों से आग्रह किया कि वे ‘किक’ के टिकट ब्लैक में न खरीदें और न ही पायरेटेड डीवीडी पर घर में देखें। वे सिनेमाघरों में जाएं और सामान्य टिकट के लिए थोड़ा इंतजार कर लें। फस्र्ट डे फस्र्ट शो देखने के चक्कर में ब्लैक में डेढ़ हजार रुपए में टिकट खरीदने का कोई मतलब नहीं है। ब्लैक में खर्च किया दर्शकों का पैसा किसी निर्माता के पास नहीं आता। सोम-मंगल को देखने से कम पैसे खर्च होंगे। मेरी या किसी और की फिल्म हो। आप सोचो और फिर देखो। ‘किक’ में सलमान खान ने अपने लुक पर भी काम किया है। मास्क के अलावा फ्रेंच दाढ़ी भी रखी है। यह फैसला साजिद नाडियाडवाला का है। सलमान ने बताया, साजिद ने मुझे मेरी छह-सत साल पुरानी तस्वीर दिखाई। उसमें मैंने गोटी रखी थी। उन्हें वह लुक अच्छा लगा। ‘हर दिल जो प्यार करेगा’ के समय मैंने उस लुक की होर्डिंग जुहू में लगवाई थी। मजेदार बात है कि फिल्म में कहीं भी मेरा वैसा लुक नहीं था। बहरहाल,साजिद ने सोचा की डेविड का लुक ऐसा रखते हैं और देवी का लुक तो नार्मल रहेगा। मास्क का आयडिया भी साजिद का था। देवी करी ड्रेसिंग स्टायल भी अलग है। वह जींस और कुर्ते में रहता है।
     कुछ सालों पहले सलमान खान ने फैसला किया था कि वे अब दोस्ती-यारी में फिल्में नहीं करेंगे। क्या उन्होंने साजिद नाडियाडवाला के लिए उस फैसले को बदला? इस सवाल पर सलमान की परिचित हंसी फूट पड़ी। उन्होंने हंसते हुए कहा,यह प्रोफेशनल फैसला है। वैसे साजिद मेरे पुराने दोस्त हैं,लेकिन दोस्ती में हम दोनों इतनी राशि का रिस्क नहीं ले सकते। फिल्म बिजनेस में थोड़ी भी कमजोर हुई तो लोग साजिद को कोसेंगे। साजिद के लिए यह परीक्षा की घड़ी है। निर्माता होना और बात है। वे इस फिल्म के निर्देशक भी हैं। अरबाज और सोहेल के साथ भी इसलिए फिल्म नहीं करता कि वे मेरे भाई हैं। हमलोग बहुत मेहनत करते हैं। इस फिल्म में तो रिलीज के दस दिनों पहले तक हम कुछ न कुड जोड़ते रहे हैं। शुक्रवार को सब पता चल जाएगा। हां,देख लेंगे,संभाल लेंगे,तू है न जैसे प्रपोजल की फिल्में अब नहीं करता। फिल्म लिख ली गई हो और पूरी फिल्म का खाका सामने हो तभी हो करता हूं। अभी कंपीटिशन बढ़ गया है।
    सलमान खान यह तो मानते हैं कि उम्र बढऩे के साथ उन्हें भी सीनियर एक्टर की तरह कैरेक्टर रोल में जाना पड़ेगा। उन्होंने शरारती मुस्कान के साथ जोड़ा,यह देखना रोचक होगा कि हम तीनों में से कौन पहले कैरेक्टर रोल में जाता है। मैं 27 दिसंबर को पैदा हुआ हूं। मेरी उम्र हर साल 27 दिसंबर को 27 की हो जाती है। मैं तो हमेयाा 27 की उम्र में ही रहना चाहता हूं। तो क्या 2027 तक आप हीरो ही रहेंगे? सलमान ने 27 से 14 घटा कर देखा। क्या कह रहे हैं? अभी से सिर्फ 13 साल और? ना ना कम से कम 27 साल और दें मुझे। इतने दिनों तक तो मैं दर्शकों का चहेता बने रहना चाहता हूं।

Saturday, July 19, 2014

मुंबई की बिमल राय प्रदर्शनी









सभी तस्‍वीरें रीडिफ डॉट कॉम के सौजन्‍य से....

Friday, July 18, 2014

फिल्‍म समीक्षा : हेट स्‍टोरी 2

 -अजय ब्रह्मात्‍मज 
           यह पिछली फिल्म की सीक्वल नहीं है। वैसे यहां भी बदला है। फिल्म की हीरोइन इस मुहिम में निकलती हैं और कामयाब होती हैं। विशाल पांड्या की 'हेट स्टोरी 2' को 'जख्मी औरत' और 'खून भरी मांग' जैसी फिल्मों की विधा में रख सकते हैं। सोनिका अपने साथ हुई ज्यादती का बदला लेती है। विशाल पांड्या ने सुरवीन चावला और सुशांत सिंह को लेकर रोचक कहानी बुनी है। फिल्म की सबसे बड़ी खूबी है कि अंत तक यह जिज्ञासा बनी रहती है कि वह मंदार से प्रतिशोध कैसे लेगी?

सीक्वल और फ्रेंचाइजी में अभी तक यह परंपरा रही है कि उसकी कहानी, किरदार या कलाकार अगली फिल्मों में रहते हैं। 'हेट स्टोरी 2' में विशाल इस परंपरा से अलग जाते हैं। उन्होंने बिल्कुल नई कहानी और किरदार लिए हैं। उनके कलाकार भी नए हैं। इस बार सोनिका (सुरवीन चावला) किसी मजबूरी में मंदार (सुशांत सिंह) की चपेट में आ जाती है। भ्रष्ट, लोलुप और अत्याचारी मंदार उसे अपनी रखैल बना लेता है। वह उसकी निजी जिंदगी पर फन काढ़ कर बैठ जाता है। स्थिति इतनी बदतर हो गई है कि सोनिका अपनी मर्जी से कुछ भी नहीं कर सकती है। उसके ताजा प्रेम को मंदार बर्दाश्त नहीं कर पाता। सोनिका को फिर से अपनी गिरफ्त में लेने के लिए वह सीधी खतरनाक चाल चलता है। मौत के करीब पहुंच चुकी सोनिका जिंदगी में वापस लौटती है। अब उसका एक ही मकसद है। मंदार और उसके साथियों का सफाया।
अगर हम ऐसी कहानियों की सामाजिकता, कानूनी दांव-पेंच और तर्क पर गौर करें तो हिंदी की अनेक फिल्में लचर साबित होंगी। 'हेट स्टोरी 2' भी इन कमियों की शिकार है। इन कमियों के बावजूद विशाल पांड्या ने 'हेट स्टोरी 2' को दो किरदारों के आमने-सामने की लड़ाई बनाकर इसे इंटरेस्टिंग तरीके से रचा है। सुरवीन चावला और सुशांत सिंह ने अपने किरदारों को ढंग से आत्मसात किया है। वे जरूरी भावों और अभिनय की वजह से प्रभावित करते हैं। हिंदी फिल्मों की अपेक्षाकृत नई अभिनेत्री सुरवीन चावला ने सोनिका की जद्दोजहद और बदले की भावना जाहिर करने में असरदार हैं। 'हेट स्टोरी 2' में सुशांत सिंह ने अपने दमदार अभिनय से किरदार के प्रति दर्शकों में नफरत पैदा की है। यही निगेटिव किरदार की सफलता होती है। लंबे समय के बाद पर्दे पर उन्हें देखकर यह कसक हो सकती है कि उन्हें लगातार मौके क्यों नहीं मिलते? जय भानुशाली की भूमिका छोटी है। उन्हें अधिक दृश्य और अवसर नहीं मिले हैं।
     पिछली फिल्म की वजह से यह धारणा बन सकती है कि ‘हेट स्टोरी 2’ भी पहली की तरह अश्लील या इरोटिक होगी, लेकिन ऐसा नहीं है। यह फिल्म पूरी तरह से बदले की कहानी है, जिसमें एक अत्याचारी पुरुष के खिलाफ स्त्री की जंग है। इस जंग में अप्रत्यक्ष रूप से औरतों का पक्ष भी आता है। उनका बहनापा और सहयोग भी दिखता है। अपने संवादों में ‘हेट स्टोरी 2’ औरतों के पक्ष में अघोषित सवाल भी खड़ा करती है। आखिर क्यों उन्हें हर काम करना ‘पड़ता’ है। उनकी मर्जी और चाहत को पुरुष प्रधान समाज हमेशा नजरअंदाज करता है।
अवधि-129 मिनट 
तीन स्‍टार ***

फिल्‍म समीक्षा : पिज्‍जा

- अजय ब्रह्मात्‍मज 
निर्माता बिजॉय नांबियार और निर्देशक अक्षय अक्किनेनी की फिल्म 'पिज्जा' तमिल में बन चुकी इसी नाम की फिल्म की रीमेक है। अक्षय अक्किनेनी ने हिंदी दर्शकों के लिहाज से स्क्रिप्ट में कुछ बदलाव किए हैं। उन्होंने अपने कलाकारों अक्षय ओबरॉय और पार्वती ओमनाकुट्टन की खूबियों व सीमाओं को ध्यान में रखते हुए कथा बुनी है। 'पिज्जा' हॉरर फिल्म है, इसलिए हॉरर फिल्म के लिए जरूरी आत्मा, भूत-प्रेत, खून-खराबा सारे उपादानों का इस्तेमाल किया गया है। अक्षय की विशेषता कह सकते हैं कि वे इन उपादानों में रमते नहीं हैं। बस आवश्यकता भर उनका इस्तेमाल कर अपनी कहानी पर टिके रहते हैं।
'पिज्जा' डिलीवरी ब्वॉय कुणाल और उसकी प्रेमिका निकिता की प्रेम कहानी भी है। दोनों इस शहर में अपनी जगह बनाने की कोशिश में हैं। निकिता अपनी कल्पना से घोस्ट स्टोरी लिखा करती है। उसकी कल्पना एक समय पर इतनी विस्तृत और पेचीदा हो जाती है कि वह कुणाल के साथ खुद भी उसमें शामिल हो जाती है। इस हॉरर फिल्म में अक्षय ने जबरदस्त रहस्य रचा है। आखिरी दृश्य तक फिल्म बांधे रखती है और जब रहस्य खुलता है तो दर्शक भी सरप्राइज महसूस करते हैं। फिल्म की कहानी पर बात करने से भेद खुल जाएगा, इसलिए बेहतर है कि आप स्वंय इस रहस्य के राजदार बनें।
अक्षय अक्किनेनी ने 'पिज्जा' 3 डी में शूट की है। उन्होंने बैकग्राउंड के लिए साउंड की नई तकनीक इस्तेमाल की है। इन दोनों तकनीकी खूबियों से यह फिल्म नए किस्म का प्रभाव डालती है। नयापन कलाकारों के चुनाव और दृश्यों की संरचना में भी है। उनकी वजह से फिल्म में ताजगी बनी रहती है। हिंदी की सामान्य हॉरर फिल्मों की तरह 'पिज्जा' सिर्फ डराने की कोशिश नहीं करती। यह अपनी रोचकता और रहस्यात्मकता से इंटरेस्ट बनाए रखती है।
कुणाल की भूमिका में अक्षय ओबेरॉय ने फिल्म के लिए जरूरी डर के भाव को पकड़ा है। चीखने-चिल्लाने से अधिक वे इन दृश्यों में जूझते दिखाई पड़ते हैं। 'पिज्जा' पारंपरिक तंत्र-मंत्र का भी इस्तेमाल नहीं करती और न ही किसी वैज्ञानिक या मनोवैज्ञानिक तर्क का सहारा लेती है। यह शुद्ध काल्पनिक हॉरर फिल्म है, जो नई तरह से कही गई है।
अवधि: 107 मिनट
तीन स्‍टार ***