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Sunday, May 29, 2016

दुनिया में अच्‍छे लोग हैं - नागेश कुकुनूर


-स्मिता श्रीवास्‍तव


नागेश कुकनूर की अगली फिल्म ‘धनक’ है। धनकका अर्थ इंद्रधनुष है। फिल्‍म को अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर काफी सराहाना मिली है। बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में बच्चों की श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ फिल्म का अवार्ड भी मिला। पेश है नागेश से की गई बातचीत के प्रमुख अंश :
-‘राकफोर्ड’ के बाद आपने बच्चों साथ फिल्म न बनाने की कसम खाई थी। फिर धनककैसे बनाई?
मैंने यह बात इसलिए कही थी क्‍योंकि सेट पर बच्चों को डील करना बेहद कठिन काम होता है। रॉकफोर्ड में ढेर सारे बच्चे थे। उन्हें मैनेज करना बहुत मुश्किल रहा। मेरे खुद के बच्चे अभी नहीं है। लिहाजा मैं उनकी आदतों का आदी नहीं हूं। बच्चों साथ काम करने के दौरान बहुत बातों का ख्याल रखना पड़ता है। उनका मन बहुत कोमल होता है। आपकी कही बातें उनके मन मस्तिष्क में बैठ जाती हैं। आपकी किस बात पर वे क्या सोचते हैं? उसे उन्होंने किस प्रकार लिया? यह समझना बहुत मुश्किल है। एक्‍टर साथ यह समस्‍याएं नहीं आतीं। वे आपसे सहमत या असहमत हो सकते हैं। लिहाजा बच्‍चों साथ सोच-विचार कर काम करना होता है। हालांकि मैं सेट पर बच्चों को पुचकारने में यकीन नहीं रखता। मैं उनसे एक्टर सरीखा व्यवहार करता हूं। धनक में कृष सात वर्ष का और हेतल 11 वर्षीय बच्ची है। मैंने उन्हें शुरुआत में शूटिंग में आने वाली दिक्कतें बता दी थीं। मसलन हम राजस्थान में शूटिंग करेंगे। वहां भीषण गर्मी और धू के थपेड़े झेलने होंगे। अगल 35 दिन हमें प्रतिदिन सात-आठ घंटे शूटिंग करनी होगी। वगैरह-वगैरह। उन्‍होंने इसे सहजता से लिया। शूटिंग के दौरान कभी कोई नखरे नहीं किए।  
-धनक बनाने का ख्याल कैसे आया?
भारतीय में ढेरों अच्छाइयां हैं। मैं फिल्म के माध्यम से कहना चाहता हूं कि दुनिया में अभी भी अच्छाई कायम है। मेरे बचपन की देश की यादें बहुत सुहावनी हैं। हम स्कूल से पैदल घर आते थे। हम अजनबियों पर भी भरोसा कर लेते थे। अपहरण जैसी कोई आशंका नहीं होती थी। मैं उसी दुनिया को दिखाना चाहता हूं। अच्छाई-बुराई तो हर कल्चर में होती है। मैं अच्छाई को सेलिब्रेट करना चाहता हूं। यह फिल्म राजस्थान के दो भाई-बहनों परी और छोटू की कहानी है। भाई दृष्टिहीन है। बहन उसके नौवें जन्मदिन से पहले रौशनी वापस लाने के लिए प्रयासरत है। उन्हें उम्मीद है कि उनके सपने को शाह रुख खान साकार करेंगे। उन्हें पता चलता है कि शाह रुख राजस्थान के सुदूर इलाके में शूटिंग कर रहे हैं। दोनों उनसे मिलने निकल पड़ते हैं। रास्ते में वह अलग-अलग लोगों से मिलते हैं।
-शीर्षक धनक रखने की खास वजह?
कहानी आठ साल के बच्चे की कहानी है। अगर उसकी आंखों की रौशनी लौट आए तो क्या देखना चाहेंगे? फिल्म का शीर्षक उसी परिप्रेक्ष्य में रखा गया है। दरअसल, इंद्रधनुष देखने को हर कोई ललायित रहता है। वह आसमान में बेहद सुंदर दिखता है। उसके प्रति आकर्षण की वजह नहीं पता। आंखों की रौशनी वापस आने पर हर कोई खूबसूरत चीज देखना चाहेगा। यही वजह है कि मैंने शीर्षक धनक रखा। यह हैप्पी फिल्म है।

-आपकी फिल्मों में राजस्थान का किरदार रहता है। कोई खास वजह?
डोर के अलावा मेरी फिल्म ये हौसलाभी राजस्थान पृष्ठिभूमि में थी। अफसोस कि ये हौसलारिलीज नहीं हो पाई। मैं मजाक में अक्सर कहता हूं कि शायद पिछले जन्म में मैं राजस्थानी था। वहां की खूबसूरती और संस्कृति मुझे भाती है। वहां पर कहानी का कैनवस बढ़ जाता है। ‘धनक’ की कहानी सिंपल है। राजस्थान में यह कहानी निखर कर आई है। वहां ढेरों खूबसूरत जगह हैं। उन्हें कैप्चर करना बाकी है। फिल्म को जोधपुर से जैसलमेर के बीच 46 लोकेशन पर शूट किया गया है। शूटिंग 33 दिन में पूरी हुई।
-फिल्म का विचार निर्भया कांड के बाद आया था?
बिल्कुल नहीं। उस समय मैंने लक्ष्मी बनाई थी। तब भी यही सवाल उठा था। लक्ष्मी बाल वेश्यावृत्ति और तस्करी आधारित थी। वह निर्भया कांड से पहले ही बन गई थी। मैं उन्हीं मुद्दों पर फिल्म बनाता हूं जिनपर यकीन करता हूं। दूसरा मेरे घर में केबिल नहीं है। लिहाजा बाहरी दुनिया की जानकारी नहीं रहती। आसपास के लोगों से जानकारी मिल जाती है। कभी-कभी इंटरनेट पर खबरें जरूर खंगाल लेता हूं। मैं एनजीओ से जुड़ा हूं। लक्ष्मी की कहानी वहीं से निकली। वर्तमान में हम अपने नौकर, दूधवाले से लेकर सरकार तक किसी पर भरोसा नहीं करते। लिहाजा उस नजरिए से अलग कुछ बनाना था।

-आपकी फिल्मों में फिजिकली चैलेंज्ड किरदार रहने की खास वजह?
मेरी कहानियां यूनिक नहीं होती। उसमें मोमेंट यूनिक होते हैं। इकबाल एक छोटे से गांव के लडक़े की कहानी थी। वह देश के लिए क्रिकेट खेलना चाहता था। उसमें एक बधिर का एंगल जोडऩे से वह संवेदनशील विषय हो गया। मेरे मकसद सिर्फ यह बताना है कि दुनिया में कुछ ऐसे लोग भी हैं। उनके प्रति संवेदनशील रहे। मैं फिल्म में विकलांगता को मुद्दा कभी नहीं बनाता। ‘इकबाल’ आठवीं क्लास में एक चैप्टर भी बन गया है। इसके अलावा मैं कई एनजीओ से जुड़ा हूं। वे बताते है कि लोग उससे बेहद प्रभावित होते हैं।  
  -हमारे यहां बच्चों की फिल्में हाशिए पर रहती हैं...
डिज्नी को बच्चों की दुनिया बखूबी पता है। उनकी फिल्मों से बच्चे ही नहीं उनके पैरेंट्स भी जुड़ते हैं। यही वजह है कि जंगल बुकको बच्चों साथ वयस्क भी पसंद कर रहे।  हमारे यहां बच्चों की फिल्मों का बिजनेस सिफर होता है। ये फिल्‍में गंभीरता साथ नहीं बनाई जातीं। वयस्क ज्यादतर फिल्मों को बकवास ही बताते हैं। ‘धनक’ को बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में चिल्ड्रेन सेक्शन में चुना गया। मैं चौंका था। यह फिल्म दो बच्चों की कहानी है, लेकिन चिल्ड्रेन फिल्म नहीं है।
 -छोटी बजट की फिल्मों के लिए बड़े स्टारों का समर्थन कितना अहम है?
वर्तमान में फिल्म की मार्केटिंग और पब्लिसिटी बहुत महंगी हो गई है। शाह रुख खान ने मेरी फिल्म का सपोर्ट किया। करोड़ों लोगों का ध्यान उस ओर आकर्षित हुआ। उनके ट्विट से छोटी फिल्म लाइमलाइट में आ जाती है। लिहाजा उनके सपोर्ट को हल्के में नहीं ले सकते। उनके जैसे सुपरस्टार की बैकिंग बहुत जरूरी है।

-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराही गई फिल्में बॉक्स आफिस पर नहीं चलती। क्या वजह मानते हैं?
दरअसल इंटरनेशनल और इंडियन आडियंस की पसंद बेहद अलग हैं। लक्ष्मीको अंतरराष्ट्रीय पर बहुत पसंद किया गया। भारत में उसे कोई तवज्जो नहीं मिली। लक्ष्मी से मैं अपनी फिल्म के दो कट बनाने लगा हूं। एक इंटरनेशनल दूसरा इंडियंस आडियंस के लिए। इंडियन वजर्न में गाने भी होते हैं। हालांकि यह बैकग्राउंड में होते हैं। इंटरनेशनल वर्जन में एक दो गाने रखता हूं। हालांकि उसकी मिक्सिंग अलग तरह से करता हैं। मगर हां, मैं फिल्म को अलग से शूट नहीं करता।

Saturday, May 28, 2016

फिल्‍म समीक्षा : वेटिंग




सुकून के दो पल
-अजय ब्रह्मात्‍मज

अवधि- 107 मिनट
स्‍टार साढ़े तीन स्‍टार 

दो उम्‍दा कलाकारों को पर्दे पर देखना आनंददायक होता है। अगर उनके बीच केमिस्‍ट्री बन जाए तो दर्शकों का आनंद दोगुना हो जाता है। अनु मेनन की वेटिंग देखते हुए हमें नसीरूद्दीन शाह और कल्कि कोइचलिन की अभिनय जुगलबंदी दिखाई पड़ती है। दोनों मिल कर हमारी रोजमर्रा जिंदगी के उन लमहों को चुनत और छेड़ते हैं,जिनसे हर दर्शक अपनी जिंदगी में कभी न कभी गुजरता है। अस्‍पताल में कोई मरणासन्‍न अवस्‍था में पड़ा हो तो नजदीकी रिश्‍तेदारों और मित्रों को असह्य वेदना सं गुजरना पड़ता है। अस्‍पताल में भर्ती मरीज अपनी बीमारी से जूझ रहा होता है और बाहर उसके करीबी अस्‍पताल और नार्मल जिंदगी में तालमेल बिठा रहे होते हैं।
अनु मेनन ने वेटिंग में शिव और तारा के रूप में दो ऐसे व्‍यक्तियों को चुना है। शिव(नसीरूद्दीन शाह) की पत्‍नी पिछले छह महीने से कोमा में है। डॉक्‍टर उम्‍मीद छोड़ चुके हैं,लेकिन शिव की उम्‍मीद बंधी हुई है। वह लाइफ सपोर्ट सिस्‍टम नहीं हटाने देता। वह डॉक्‍टर को दूसरे मरीजों की केस स्‍टडी बताता है,जहां महीनों और सालों के बाद कोई जाग उठा। शिव की पूरी जिंदगी अपनी पत्‍नी के इर्द-गिर्द ही सिमटी हुई है। उधर नवविवाहिता तारा का पति रजत एक दुर्घटना में मुरी तरह से घायल हो गया है। उसकी ब्रेन सर्जरी होनी है। रजत के घरवालों को अभी तक रजत और तारा की शादी की भी जानकारी नहीं है और यह दुर्घटना हो जाती है। तारा की दोस्‍त ईशिता मुसीबत में साथ देने आती है,लेकिन अपनी पारिवारिक जिम्‍मेदारियों की वजह से लौट जाती है। मुश्किल घड़ी में अकेली पड़ चुकी तारा गुस्‍से में कहती ळाी है कि ट्वीटर में मेरे पांच हजार से अधिक फॉलोअर हैं,लेकिन अभीर कोई नहीं है। ट्वीटर और सोशल मीडिया की दुनिया से अंजान शिव ऐसे वक्‍त में उम्र की वजह से तारा का सहारा बनता है। अपने अनुभवों से वह उसे दुख सहने की तरकीबें भी बताता है। वे डाक्‍टरों का मजाक उड़ाते हैं। अगले अड़तालीस घंटे क्रिटिकल है जैसे मेडिकल मुहावरों का मखौल उड़ाते हैं। वे एक-दूसरे के करीब आते हैं। अस्‍पताल के प्रतीक्षा कक्ष में हुआ उनका परिचय आजार एवं घर तक विस्‍तार पाता है। दोनों को एक-दूसरे से सुकून मिलता है। दुख की घड़ी में साथ रहने से उन्‍हें राहत मिलती है। एक खास दृश्‍य में दोनों मौज-मस्‍ती में रात बिताते हैं। सुबह होने पर हम पाते हैं कि तारा का सिर शिव की गोद में है। और वह निश्चिंत सोई हुई है।
अनु मेनन शिव और तारा के संबंध और रिश्‍तों को परिभाषित नहीं करती है। उनका मिलना एक संयोग है। फिल्‍म के लेखक और निर्देशक ने संबंधों की अलग दुनिया रची है,जो मौत और जिंदगी के बीच धड़कती हुई एक-दूसरे का संबल बनती है। पिछली कुछ फिल्‍मों में नाीरूद्दीन शाह की बेमतलब मौजूदगी से रिाश उनके प्रशंसकों को खुशी होगी। ऐसी जटिल भूमिकाएं नसीर के लिए सामान्‍य होती है। वे बगैर लाउड या अंडरप्‍ले किए ही किरदार को उसकी संपूर्णता में पेश करते हैं। समर्थ अभिनेता की तुलना में कल्कि नई हैं,लेकिन वह ईमानदारी से तारा को निभाती हैं। कल्कि अपनी पीढ़ी की उन अभिसनेत्रियों में हैं,जो हर भूमिका में कुछ विशेष कर जाती हैं। उनका अनोखा व्‍यक्तित्‍व और छवि उनकी मदद करता है।
इस फिल्‍म के संवादों में हिंदी,अंग्रेजी और मलयालम भाषाओं का उपयोग हुआ है।

 

फिल्‍म समीक्षा : फोबिया




डर का रोमांच


-अजय ब्रह्मात्‍मज
अवधि-113 मिनट
स्‍टार- तीन स्‍टार
 डर कहां रहता है ? दिमाग में,आंखों में या साउंड में? फिल्‍मों में यह साउंड के जरिए ही जाहिर होता है। बाकी इमोशन के लिए भी फिल्‍मकार साउंड का इस्‍तेमाल करते हैं। कोई भी नई फिल्‍म या अनदेखी फिल्‍म आप म्‍यूट कर के दखें तो आप पाएंगे कि किरदारों की मनोदशा को आप ढंग से समझ ही नहीं पाए। हॉरर फिल्‍मों में संगीत की खास भूमिका होती है। पवन कृपलानी ने फोबिया में संगीत का सटीक इस्‍तेमाल किया है। हालांकि उन्‍हें राधिका आप्‍टे जैसी समर्थ अभिनेत्री का सहयोग मिला है,लेकिन उनकी तकनीकी टीम को भी उचित श्रेय मिलना चाहिए। म्‍यूजिक डायरेक्‍टर डेनियल बी जार्ज,एडिटर पूजा लाढा सूरती और सिनेमैटोग्राफर जयकृष्‍ण गुम्‍मडी के सहयोग से पवन कृपलानी ने रोमांचक तरीके से डर की यह कहानी रची है।
महक पेंटर है। वह अपनी दुनिया में खुश है। एक रात एग्‍जीबिशन से लौटते समय टैक्‍सी ड्रायवर उसे अकेला और थका पाकर नाजायज फायदा उठाने की कोशिश करता है। वह उस हादसे को भूल नहीं पाती और एक मनोरोग का शिकार हो जाती है। बहन अनु और दोस्‍त शान उसकी मदद की कोशिश करते हैं। मनोचिकित्‍सक की सलाह पर उसके उपचार और सुरक्षा के लिए शान अपने दोस्‍त के खाली फ्लैट में उसे शिफ्ट कर देता है। यहां दसे विभ्रम होता है। उसे अजीब सी आवाजें चुनाई पड़ती हैं और अस्‍पष्‍ट आकृतियां और चलते-फिरते अंग दिखाई पड़ते हैं। उसकी सुरक्षा के लिए घर में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाते हैं। शान की मानें तो कहीं कुछ भी नहीं है। महक की सुनें तो उस घर में कोई साया है। लेखक और निर्देशक ने इन दोनों के बीच दो और पड़ोसी किरदारों को जोड़ा है। महक अभी जिस फ्लैट में रहने आई है,उस फ्लैट में पहले जिया रहती थी। वह अचानक गायब हो गई है। महक को शक है कि पड़ोसी ने उसकी हत्‍या कर दी है।

फिल्‍म के क्‍लाइमेक्‍स और भेद के बारे में लिखने से हॉरर फिल्‍म का रहस्‍य समाप्‍त हो जाएगा। पवन कृपलानी ने बहुत खूबसूरती से घटनाओं को गुंथा है। ऐसे अनेक प्रसंग आते हैं,जब लगता है कि भेद खुल जाएगा,लेकिन कहानी वहां से आगे बढ़ जाती है। फिल्‍म का रोमांच बना रहता है। यह फिल्‍म मुख्‍य रूप से राधिका आप्‍टे पर निर्भर करती है। शान के किरदार में सत्‍यदीप मिश्राा की सहयोगी भूमिका है। दोनों ने मिल कर पवन कृपलानी की सोच-समझ को उम्‍दा तरीके से प्रस्‍तुत किया है।

राधिका आप्‍टे अपनी पीढ़ी की टैलेंटेड अभिनेत्री हैं। अपनी फिल्‍मों और भूमिकाओं में भिन्‍नता रखते हुए वह आगे बढ़ रही हैं। फोबिया में हम उनके सामर्थ्‍य से फिर से परिचित होते हैं। मुश्किल दृश्‍यों में उनकी पकड़ नहीं छूटती है और चालू दृश्‍यों में वह हल्‍की नहीं पड़ती हैं। उनकी आंखें बहुत कुछ कहती हैं और होंठ बोलते हें। ऐगोराफोबिया मनोरोग की शिकार महक को राधिका आप्‍टे ने पूरे डर के साथ चित्रित किया है। सत्‍यदीप मिश्रा की सहयोगी भूमिका है। वे अपने स्‍पेस का सदुपयोग करते हें। पड़ोसियों के रूप में यशस्विनी दायम और अंकुर विकल भी अपनी मोजूदगी से कुछ न कुछ जोड़ते हैं।

खूबसूरत बात है कि इस हॉरर फिल्‍म में विकृत चेहरे और अकल्‍पनीय दृश्‍य नहीं है। और न ही तंत्र-मंत्र का इस्‍तेमाल दिखाया गया है। इसे हॉरर से अधिक सायकोलोजिकल थ्रिलर कहना उचित होगा।



Friday, May 27, 2016

फिल्‍म समीक्षा : वीरप्‍पन




लौटे हैं रामू
               -अजय ब्रह्मात्‍मज
एक अंतराल के बाद रामगोपाल वर्मा हिंदी फिल्‍मों में लौटे हैं। उन्‍होंने अपनी ही कन्‍नड़ फिल्‍म किंलिंग वीरप्‍पन को थोड़े फेरबदल के साथ हिंदी में प्रस्‍तुत किया है। रामगोपाल वर्मा की फिल्‍मोग्राफी पर गौर करें तो अपराधियों और अपराध जगत पर उन्‍होंने अनेक फिल्‍में निर्देशित की हैं। अंडरवर्ल्‍ड और क्रिमिनल किरदारों पर फिल्‍में बनाते समय जब रामगोपाल वर्मा अपराधियों के मानस को टटोलते हैं तो अच्‍छी और रोचक कहानी कह जाते हैं। और जब वे अपराधियों के कुक्त्‍यों और क्रिया-कलापों में रमते हैं तो उनकी फिल्‍में साधारण रह जाती हैं। वीरप्‍पन इन दोनों के बीच अटकी है।
वीरप्‍पन कर्नाटक और तमिलनाडु के सीमावर्ती जंगलों में उत्‍पात मचा रखा था। हत्‍या,लूट,अपहरण,हाथीदांत और चंदन की तस्‍करी आदि से उसने आतंक फैला रखा था। कर्नाटक और तमिलनाडु के एकजुट अभियान के पहले वह चकमा देकर दूसरे राज्‍य में प्रवेश कर जाता था। दोनों राज्‍यों के संयुक्‍त अभियान के बाद ही उसकी गतिविधियों पर अंकुश लग सका। आखिरकार आपरेशन कोकुन के तहत 2004 में उसे मारा जा सका। रामगोपाल वर्मा ने कन्‍न्‍ड़ फिल्‍म में हुई भूलों को नहीं दोहराया है। हिंदी दर्शकों के लिए वे थोड़े अलग कलेवर में वीरप्‍पन को पेश करते हैं। उन्‍होंने आईपीएस ऑफिसर कन्‍नन को विस्‍तार दिया है। फिलम के अंत में एक सवाल भी आता है कि वीरप्‍पन जैसे राक्षस को समाप्‍त करने के लिए कन्‍नन को महाराक्षस बनना पड़ा। देखना होगा कि दोनों में कौन अधिक नृशंस है। कानून की आड़ के हत्‍या करना किस कदर जायज है? रामगोपाल वर्मा की देखरेख में एनकाउंटर पर भी अनेक फिल्‍में बनी हैं। हालांकि रामगोपाल वर्मा कभी अपराधियों के समर्थन में नहीं आते,लेकिन वे सभ्‍य समाज के कानून और रवैए पर सवाल जरूर उठाते हैं।
वीरप्‍पन में लेखक-निर्देशक ने एक सामान्‍य लड़के के अपराधी बनने की कहानी संक्षेप में रखी है। खून और पैसों का स्‍वाद लग जाने के बाद वीरप्‍पन की आपराधिक गतिविधियां लगाातार बढ़ती गईं। उसने कर्नाटक और तमिलनाडु दोनों राज्‍यों की पुलिस के नाक में दम कर रखा था। यहां तक कि उसने कन्‍नड़ फिल्‍मों के सुप्रसिद्ध अभिनेता राजकुमार तक का अपहरण किया। रामगोपाल वर्मा ने उसकी आपराधिक गतिविधियों पर नजर डाली है। पुलिस और सरकारों के लिए चुनौती बने वीरप्‍पन का खात्‍मा तो होना ही था,लेकिन अपने असलाह और ताकत के बावजूद पुलिस का उस तक पहुंच पाना संभव नहीं होता था।
रामगोपाल वर्मा ने उसी पत्‍नी मुथुलक्ष्‍मी,एक पुलिस ऑफिसर की पत्‍नी श्रेया और आईपीएस अधिकारी कन्‍नन के किरदार जोड़े हैं। श्रेया के पति की वीरप्‍पन ने जघन्‍य हत्‍या की थी,इसलिए वह पुलिस की खुफियगिरी के लिए राजी हो गई है। वह मुथुलक्ष्‍मी को भरोसे में लेती है और वीरप्‍पन तक पहुंचने का सुराग हासिल करती है। लेखक-निर्देशक की मर्जी से श्रेया कहीं भी पहुंच सकती है। चौकसी और खुफियागिरी में लगा पुलिस महकमा को उस लड़के पर कोई शक नहीं होता जो मुथुलक्ष्‍मी और वीरप्‍पन के रिकार्डेड टेप एक-दूसरे तक पहुंचाता है...हा हा हा।
वीरप्‍पन में कन्‍नन का किरदार निभा रहे सचिन जोशी और श्रेया के भूमिका में लिजा रे निराश करते हैं। सचिन जोशी किसी भी तरह से प्रभावित नहीं करते,जबकि उन्‍हें जबरदस्‍त किरदार दिया गया है। लिजा रे का किरदार सही ढंग से परिभाषित नहीं है। मुथुलक्ष्‍मी की भूमिका में उषा जाध प्रभावकारी हैं। उन्‍होंने दिए गए दृश्‍यों को अपनी योग्‍यता से सार्थक किया है। नवोदित संदीप भारद्वाज की मेहनत भी दिखती है। किसी परिचित किरदार को पर्दे पर निभा पाने की चुनौती में वे सफल रहे हैं। समस्‍या उनके अभिनय से अधिक लेखक के चरित्र चित्रण की है। संदीप भारद्वाज को वीरप्‍पन का लुक देने में मेकअप के उस्‍ताद विक्रम गायकवाड़ की काबिलियत झलकती है। दो-चार क्‍लोजअप में संदीप भारद्वाज के चेहरे पर अपराधी वीरप्‍पन की नृशंसता उतर आई है।
रामगोपान वर्मा इस बार एक उम्‍मीद देते हैं कि वे फिर से अपना कौशल और दम-खम दिखा सकते हैं। उन्‍हें बैकग्राउंड स्‍कोर में लाउड साउंड का मोह छोड़ना चाहिए। इस फिल्‍म में जब गोलिया चलती हैं तो लगता है कि किसी ने चटाई बम सुलगा दिया हो।

अवधि- 127 मिनट
स्‍टार तीन स्‍टार

Thursday, May 26, 2016

उदासियों के वो पांच दिन- विक्‍की कोशल



-अमित कर्ण

विक्की कौशल नवोदित कलाकार हैं। उन्होंने अब तक दो फिल्में ‘मसान’ व ‘जुबान’ की हैं। दोनों दुनिया के प्रतिष्ठित फिल्म फेस्टिवल की शान रही है। ‘मसान’ के बाद अब उनकी ‘रमन राघव 2.0’ भी कान फिल्म फेस्टिवल में चयनित हुई है।
- कभी ऐसा ख्‍याल आता है कि क्यों ने फ्रांस में बस जाऊं।
नहीं ऐसे विचार मन में कभी नहीं आते हैं। वहां गया या बसा भी तो कुछ दिनों बाद ही मुझे घर की दाल चाहिए होगी, जो वहां तो मिलने से रही। हां, वहां की आबोहवा मुझे पसंद है। उसमें रचनात्‍मकता घुली हुई है। लगता है वहां के लोग पैदाइशी रचनात्‍मक होते हैं। कान में पिछली बार ‘मसान’ के लिए जब नाम की घोषणा हुई तो लगा कि कदम जमीं पर नहीं हैं। दोनों के बीच कुछ पनीली सी चीज है, जिस पर तैरता हुआ मैं मंच तक जा रहा हूं। वह पल व माहौल सपना सा लगने लगा था। सिनेमा को बतौर क्राफ्ट वहां बड़ी गंभीरता से लिया जाता है। वहां सिने प्रेमियों को एक मुकम्मल व प्रतिस्पर्धी सिने माहौल दिया जाता है।
-वहां फिल्मों की प्रीमियर के बाद क्या कुछ होता है। विश्‍वसिनेमा के विविधभाषी फिल्मकार कैसे संवाद स्‍थापित करते हैं।
प्रीमियर बाद की पार्टियों में खाने की मेज देश या सिनेमा विशेष के आधार पर आरक्षित नहीं किया जाता। उस मेज पर कोई भी आ-जा, बैठ सकता है। मेरी कोशिश उन दिग्‍गज सिने प्रतिभाओं से तकनीक से ज्यादा मानवीय खूबी-खामी का निरीक्षण और आत्‍मसात करने की होती है। मिसाल के तौर पर पिछली बार मुझे उस जलसे में ‘यूथ’ के माइकल केन व हार्वे कीटल मिले। दोनों विश्‍वस्‍तरीय कलाकार हैं। उस फिल्म की स्‍क्रीनिंग वहां स्थित दुनिया के सबसे बड़े ल्‍यूमिए थिएटर में हुई थी। मैं ठहरा माइकल केन का बहुत बड़ा फैन। उनके वीडियो देख-देखकर अदाकारी के गुर सीखे हैं। उनसे मिल सादगी का पाठ पढ़ने को मिला। बातचीत में उन्होंने बताया कि उनकी पत्‍नी भी भारतीय ही है। एक तो वे पूरी विनम्रता से मिले। उनके संग तस्‍वीर का आग्रह किया तो कैमरा उन्होंने अपनी पत्‍नी के हाथों में थमाया। हमसे पूछा कि आप किस पोज में तस्‍वीर लेना पसंद करेंगे। मैं दंग रह गया कि इतना बड़ा स्‍टार और इतनी सरलता। ठीक ‘पाकर भी क्या पा लोगे’ सा मिजाज।
-और किस्‍सागोई के स्‍तर पर क्या कुछ सीखने को मिला।
यही कि दर्शक फिल्मों से अचंभित होने को तैयार बैठे हैं। आप वैसी कहानियां तो लेकर आएं। इसके चलते स्‍टार के साथ-साथ नवोदित कलाकारों की मांग में भी खासा इजाफा हुआ है। कहानी किंग व किंग मेकर बनने की राह पर है। ‘यूथ’ दो बुजुर्ग दोस्‍तों की कहानी है, जो ताउम्र रोजी-रोटी की भाग-दौड़ पूरी कर चुके हैं। आगे वे क्या-क्या गुल खिलाते हैं, कहानी उस बारे में थी। मतलब यह कि वहां के फिल्मकार दर्शकों को इंप्रेस करने के चक्कर में नहीं रहते। वे खुद को एक्प्रेस करते हैं। अधिसंख्‍य दर्शकों की पसंद का ख्‍याल रखा ही जाए, वैसा वे नहीं करते। कला के जरिए उन्हें क्या जाहिर करना है, वे बस उसकी फिक्र करते हैं। तभी वहां चौंकाने वाला सिनेमा बनता है।
-ऐसा तभी हो पाता है, जब वहां के दर्शक ज्‍यादा सिने जागरूक हैं।
ऐसा नहीं है। हमारे दर्शक भी काफी समझदार हैं। फर्क कल्चर से आता है। यहां ‘मसान’ का अलग रूप दिखाया गया, वहां अलग। दरअसल वहां के लोग अपनी भावनाओं को जल्दी जाहिर नहीं करते। उस पर उनका नियंत्रण होता है। हमारे यहां तो लोग ताक में रहते हैं कि कहां मौका मिले कि भावनाओं में बह जाएं। वह खुशी हो, रुलाई हो या गुस्‍सा । सब में अतिरेक है। वे लोग बड़े सोबर हैं। तभी हमारी फिल्मों के मेलोड्रामे उन्हें अजीब लगते हैं। वे सिनेमा में परम सत्य ढूंढते हैं। हम मनोरंजन। यह फर्क है।
-‘रमन राघव 2.0’ को अनसर्टेन रिगार्ड की जगह डायरेक्टर्स फोर्टनाइट में क्यों भेजा गया है।
कान में यह कै‍टेगरी आठ-दस साल पहले शुरू हुई है। यह प्रतिस्‍पर्धी श्रेणी नहीं है, पर इसमें आई फिल्मों पर दुनिया भर के वितरकों की नजर रहती है। ऑस्‍कर अवार्ड में भी विदेशी भाषाओं की फिल्मों के लिए भी ऐसी श्रेणी शुरू की गई है। इस श्रेणी में मिलने वाली फिल्मों को विदेशी खरीदार बहुत मिल जाते हैं। 
-फिल्म में राघव के रूप में किस किस्‍म के इंस्‍पेक्टर का रोल प्‍ले कर रहे हैं। टाइटिल में ‘2.0’ का क्या तात्‍पर्य यह है।
रमन के बारे में तो सब जानते ही हैं कि वह सायको किलर था। 1960 से लेकर 1969 तक उस इंसान ने 41 मर्डर किए थे। फुटपॉथ पर सोए लोगों को बेवजह मार चला जाता था। उसकी कहानी पर अनुराग कश्‍यप ने एक अलग स्‍टैंड लिया है। मैं राघव बना हूं। रमन के साथ दिमागी नूराकुश्‍ती में ऊंट किस करवट लेता है, ‘रमन राघव 2.0’ उस बारे में है। राघव भी सरल-सपाट नहीं है। अतीत में उसकी निजी जिंदगी में खासी दिक्कतें रही हैं। उनके अंदर क्षोभ और निराशा का लावा सुलग रहा है, पर वह अपनी भड़ास किसी पर डायरेक्टली नहीं निकाल सकता। ऐसे में वह सनकी सा बन चुका है। कहीं सुकून भी मिलता है तो उसे बेचैनी होने लगती है। अपनी प्रेमिका से प्‍यार भरी कम, तंज भरी बातें ज्यादा करता है, मगर उससे बहुत प्यार करता है। उसकी प्रेमिका भी इस बात से वाकिफ है। वह जानती है कि राघव अपना असली चेहरा, अपनी भड़ास उसके पास ही जाहिर कर सकता है। ऐसे में राघव की भड़ास को भी वह प्‍यार से लेती है। 
-उसे आत्मसात कैसे किया ।
उसका सफर ऑडिशन से शुरू हो गया। चूंकि असल जिंदगी में मैं राघव जैसों से मिला नहीं और मेरे पास उसके ज्यादा रेफ्रेंस नहीं थे। मैंने बैग पैक किया और मड आयलैंड स्थित अपने दूसरे घर अकेले चला गया। लोखंडवाला स्थित घर पर अपने परिजनों को बोल दिया कि मैं अगले पांच दिन किसी के संपर्क में नहीं रहने वाला। लिहाजा चिंता न करें। मैंने पांच दिन खुद को न्‍यूनतम सुविधाओं के साथ कैद कर लिया। न फोन था। न टीवी। लोगों के संपर्क में भी नहीं रहा। चारों तरफ निराशा व तन्हाई का माहौल क्रिएट कर लिया। संवाद के लिए अनुराग कश्‍यप सर से मिले दो पन्नों की स्क्रिप्‍ट थी। उस पर ही लगातार चिंतन-मनन करता रहा। दो दिनों में ही भावनात्मक तौर पर मुझ में तब्दीली आने लगी। चौथे दिन तक राघव की मानसिकता से काफी हद तक मैं अवगत हो गया। पांचवें दिन आते-आते तो लगा कि दिमाग ही ब्लास्‍ट कर जाएगा। उस दिन मेरा ऑडिशन था। मैं मड आयलैंड से सीधे वहीं पहुंचा। फिर बीते पांच दिनों से मेरे भीतर उपजे मनोभावों ने ऑडिशन में जादू किया। मैं इस रोल के लिए चुन लिया गया।
-अमित कर्ण 



दरअसल : रमन राघव के साथ अनुराग कश्‍यप



-अजय ब्रह्मात्‍मज
अनुराग कश्‍यप ने बांबे वेलवेट की असफलता की कसक को अपने साथ रखा है। उसे एक सबक के तौर पर वे हमेशा याद रखेंगे। उन्‍होंने हिंदी फिल्‍मों के ढांचे में कुछ नया और बड़ा करने की कोशिश की थी। मीडिया और फिल्‍म समीक्षकों ने बांबे वेलवेट को आड़े हाथों लिया। फिल्‍म रिलीज होने के पहले से हवा बन चुकी थी। तय सा हो चुका था कि फिल्‍म के फेवर में कुछ नहीं लिखना है। ‍यह क्‍यों और कैसे हुआ? उसके पीछे भी एक कहानी है। स्‍वयं अनुराग कश्‍यप के एटीट्यूड ने दर्जनों फिल्‍म पत्रकारों और समीक्षकों को नाराज किया। हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री और फिल्‍म पत्रकारिता में दावा तो किया जाता है कि सब कुछ प्रोफेशनल है,लेकिन मैंने बार-बार यही देखा कि ज्‍यादातर चीजें पर्सनल हैं। व्‍यक्तिगत संबंधों,मान-अपमान और लाभ-हानि के आधार पर फिल्‍मों और फिल्‍मकारों का मूल्‍यांकन होता है। इसमें सिर्फ मीडिया ही गुनहगार नहीं है। फिल्‍म इंडस्‍ट्री का असमान व्‍यवहार भी एक कारक है। कहते हैं न कि जैसा बोएंगे,वैसा ही काटेंगे।
बहरहाल, बांबे वेलवेट की असफलता को पीछे छोड़ कर अनुराग कश्‍यप ने रमन राघव 2.0 निर्देशित की है। इसमें उन्‍होंने अपने प्रिय कलकार नवाजुद्दीन सिद्दीकी प्रतिभा के नए पहलू का बखूबी इस्‍तेमाल किया है। उन्‍होंने विकी कौशल को भी कुछ कर दिखाने का नया मौका दिया है। अनुराग कश्‍यप की रमन राघव 2.0 सातवें दशक के उत्‍तरार्द्ध में मुंबई के कुख्‍यात सीरियल किलर रमन की कहानी है। कहते हैं उसने 40 हत्‍याएं की थीं। पकड़े जाने पर उसने कहा था कि उसे ऊपर से आदेश मिलता था। उसके जघन्‍य अपराधों और हत्‍या के लिए कोर्ट ने उसे फांसी की सजा सुनाई थी। बाद में जेल में उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं रही तो फांसी की सजा आजीवन कारावास तब्‍दील कर दी गई। जेल में ही उसकी मृत्‍यु हो गई थी।
अनुराग कश्‍यप ने इसी वास्‍तविक किरदार के जीवन पर बनी श्रीराम राघवन की फिल्‍म रमन राघवख्‍ए सिटी,ए किलर देख रखी थी। वह फिल्‍म उन्‍हें इतनी पसंद है कि उन्‍होंने ही श्रीराम राघवन का रामगोपाल वर्मा से मिलवाया था। रामगोपाल वर्मा ने श्रीराम राघवन को एक हसीना थी डायरेक्‍ट करने के लिए दी थी। हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में श्रीराम राघवन क्राइम थ्रिलर के सफल निर्देशक माने जाते हें। खुद अनुराग की रुचि अपराध कथाओं में रहती है। देखें तो अनुराग की इस रुचि की जड़ें बहुत गहरी हैं। किशोर उम्र में उन्‍होंने हिंदी में प्रकाशित अपराध पत्रिकाएं मनोंहर कहानियां और सत्‍यकथा बड़े चाव से पढ़ी हैं। लेखक अनुराग कश्‍यप के विकास में ऐसी कहानियां का योगदान रहा है। बहुत पहले से वे  रमन राघव पर फिल्‍म बनाने की सोचते रहे हैं। उन्‍होंने नवाज से बात भी कर रखी थी। इस बीच गैाग्‍स ऑफ वासेपुर और बांबे वलवेट जैसी बड़ी फिल्‍मों की व्‍यस्‍तता से उन्‍होंने रमन राघव के नवचार को ताक पर रख दिया था।
बांबे वेलवेट की असफलता और सभी की प्रतिक्रिया ने उन्‍हें झकझोर दिया था। उन्‍हें लगने लगा था कि शायद फिल्‍म इंडस्‍ट्री को उनकी जरूरत नहीं है। उन्‍होंने घोषणा भी कर दी थी कि वे फ्रांस जाकर बसने की बात सोच रहे हें। उन्‍होंने बांबे वेलवेट के बाद के अवसाद के क्षणों में कहा था कि मैा यहां से हार कर नहीं जाऊंगा। मैं साबित करूंगा कि मैा दर्शकों की पसंद की हिट फिल्‍में बना सकता हूं। इसी क्रम में फिलहाल रून राघव 2.0 आ रही है। कान फिल्‍म समारोह में इस फिल्‍म को देख चुके सुधि दर्शकों की राय मानें तो अनुराग कश्‍यप फिर से अपने फॉर्म में दिख रहे हैं। उन्‍होंने रमन राघव2.0 के जरिए कुछ वाजिब सवाल भी उठाए हैं और समाज के दोहरे चरित्र और चेहरे को पेश किया है। यह फिल्‍म विदेशों के वितरकों को भी पसंद आई है। उम्‍मीद है कि भारत के दर्शक भी अनुराग कश्‍यप को उन्‍के पुराने रंग-ढंग में फिर से पसंद करेंगे। किसी एक फिल्‍म की असफलता से फिल्‍मकार की योग्‍यता पर सवाल उठाने वाले आलोचकों को भी रमन राघव2.0 जवाब देगी।

Wednesday, May 25, 2016

सिस्‍टम की खामियों की पड़ताल



तारणहार बनते कैरेक्‍टर कलाकार




-अमित कर्ण
हाल की कुछ फिल्‍मों पर नजर डालते हैं। खासकर बजरंगी भाईजान, दिलवाले, ‘मसान’, बदलापुर, मांझी- द माउंटेनमैन, हंटर, पर। उक्‍त फिल्‍मों में एक कॉमन पैटर्न है। वह यह कि उन्‍हें लोकप्रिय करने में जितनी अहम भूमिका नामी सितारों की थी, उससे कम उन फिल्‍मों के ‘कैरेक्‍टर आर्टिस्‍ट‘ की नहीं थी। बजरंगी भाईजान और बदलापुर से नवाजुद्यीन सिद्यीकी का काम गौण कर दें तो वे फिल्‍में उस प्रतिष्‍ठा को हासिल नहीं कर पाती, जहां वे आज हैं। ‘मसान’ के किरदार आध्‍यात्मिक सफर की ओर ले जा रहे होते हैं कि बीच में पंकज त्रिपाठी आते हैं। शांत और सौम्‍य चित्‍त इंसान के किरदार में दिल को छू जाते हैं।
दिलवाले में शाह रुख-काजोल की मौजूदगी के बावजूद दर्शक बड़ी बेसब्री से संजय मिश्रा का इंतजार कर रहे होते हैं। थोड़ा और पीछे चलें तो ‘नो वन किल्‍ड जेसिका’ में सिस्‍टम के हाथों मजबूर जांच अधिकारी और ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्‍स’ में दत्‍तों के भाई बने राजेश शर्मा की अदाकारी अाज भी लोगों के जहन में है। ‘विकी डोनर’ की बिंदास दादी कमलेश गिल और सिंगल मदर बनी डॉली अहलूवालिया को कौन भूल सकता है भला। मांझी – द माउंटेनमैन और हंटर में तो कमाल ही हो गया। कथित कैरेक्‍टर कलाकारों की टोली दोनों फिल्‍मों के मेन लीड बन जाते हैं। दोनों फिल्‍में चर्चा व कलेक्‍शन दोनों हाथों से बटोर ले जाते हैं। सार यह है कि अब सितारों व कमर्शियल फिल्‍में बनाने वाले भी कैरेक्‍टर आर्टिस्‍ट की अहमियत भली’-भांति समझ चुके हैं। वे जान चुके हैं कि फिल्‍मों को वीकेंड की सीमा से बाहर निकाल अगले हफ्ते तक ले जाने की अहम भूमिका कथित कैरेक्‍टर आर्टिस्‍ट ही करते हैं। सौभाग्‍य से अब पुराने दिनों जैसी बात भी नहीं है, जब कैरेक्‍टर रोल के लिए अधिकांश फिल्‍मों में किरदार विशेष के लिए कलाकार विशेष ही रिपीट किए जाते थे।
मसलन, सातवें दशक में इंस्‍पेक्‍टर के रोल के लिए इफ्तेकार, जगदीश राज लगातार रिपीट होते थे। खडूस पिता या बॉस के लिए उत्‍पल दत्त और चाचा के लिए नासिर हुसैन और मजबूर पिता के लिए एके हंगल कास्‍ट कर लिए जाते थे। नरमदिल मामा, नाना व दादू के लिए डेविड इब्राहिम होते थे और काइंया पुलिस अधिकारी के लिए ओम शिवपुरी। आठवें व नौंवे दशक में वह विरासत अनुपम खेर, कादर खान, आलोक नाथ, श्रीराम लागू व उन जैसे अन्‍य कलाकारों ने आगे बढ़ाई। नतीजतन दोहराव की अति हुई और दर्शकों का उन कलाकारों से मोहभंग हो गया। अब ऐसे हालात नहीं हैं। हमारे पास समर्थ कलाकारों की अच्‍छी-खासी खेप है। उनका यथोचित सम्‍मान सितारा व निर्माता दोनों बिरादरी करती है। अब वे महज ‘कैरेक्‍टर आर्टिस्‍ट’ भर नहीं रहे।  
मौजूदा बदलाव पर पंकज त्रिपाठी कहते हैं, ‘ सितारे ओपनिंग दिलाते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है, मगर दर्शक संडे के बाद आगे देखने तब जाते हैं, जब उसमें उन्‍हें कोई जानदार परफारमेंस दिखे। वह जानदार परफारमेंस यकीनन नवाज भाई, केके मेनन, दीपक डोबरियाल व अन्‍य कलाकारों का होता है। उन सबका काम लोगों को अलग अनुभूति व संतुष्टि प्रदान करता है। यह बात हमारे निर्माता समझ चुके हैं। तभी अपनी फिल्‍मों में वे कथित कैरेक्‍टर कलाकारों का चयन भी पूरी सावधानी से करते हैं। फिल्‍म में सितारों से कम अहमियत नहीं देते।‘
    पंकज त्रिपाठी की बातों में दम है। यही वजह है, जो सुल्‍तान और रईस की कॉमन धुरी नवाजुद्यीन सिद्यीकी हैं। वे उन चंद चर्चित कलाकारों में शुमार हो गए हैं, जिन्‍होंने खानत्रयी के संग काम कर लिया है। उनके मौजूदा कद का अंदाजा इसी बात से लगता है कि सुल्‍तान में जहां उनकी आवाज का इस्‍तेमाल फिल्‍म के सर्वप्रथम टीजर के लिए हुआ, वहीं रईस में वे शाह रुख खान के किरदार के मंसूबों का सबसे बड़े रोड़े बने हैं। ‘
सिने इतिहासकार जयप्रकाश चौकसे कहते हैं, ‘अब यदि फिल्‍मों में समर्थ कलाकार होंगे तो बजट छोटा हो या बड़ा दर्शकों को कोई फर्क नहीं पड़ेगा। वे घरों से निकल सिनेमाघर यकीनन जाएंगे। नवाज और उन जैसे कलाकारों की नस्‍ल मोतीलाला, बलराज साहनी, संजीव कुमार और ओमपुरी की परंपरा से वास्‍ता रखते हैं। जिस काल खंड में देव साहब और राज कपूर की तूती बोली जाती थी, मोतीलाल भी उस दौर में मशहूर थे। संजीव कुमार भी अपने समकालीन सितारों को बराबर टक्‍क्‍र देते थे। अब वह काम नवाज वगैरह बाकी कलाकार कर रहे हैं। ‘
तभी आने वाला समय कथित कैरेक्‍टर आर्टिस्‍ट के लिए पलक-पांवड़े बिछा कर बैठा हुआ है। नए साल में एयरलिफ़ट, जय गंगाजल, जुगनी,फितूर,वजीर, मोहनजो दाड़ो जैसी बड़े बजट की फिल्‍में कैरेक्‍टर आर्टिस्‍ट से गुलजार हैं।
     ऐसा अचानक क्‍या हुआ कि कैरेक्‍टर आर्टिस्‍ट इतने डिमांडिंग हो गए। वजीर में यजाद कुरेशी बने मानव कौल कारण जाहिर करते हैं, डिजिटल क्रांति ने दर्शकों को क्‍वॉलिटी फिल्‍मों का स्‍वाद चखाया है। औसत काम खारिज होने लगे हैं। अब वरायटी परफॉर्मर की डिमांड बढ़ चुकी है। वजीर में मेरे काम की भी सराहना हो रही है। उसके तुरंत बाद बिजॉय नांबियार ने मुझे एक रॉम’-कॉम ऑफर की है। वहां मैं हीरो हूं। ‘
सिने जानकार इस बदलाव की वजह कास्टिंग डायरेक्‍टर और युवा फिल्‍मकारों को भी मानते हैं। ‘शाहिद’, ‘दम लगा के हईसा’, ‘मसान’, ‘पान सिंह तोमर’, ‘काय पो छे’, ‘फिल्मिस्‍तान’ में नायाब कलाकार ढूंढकर लाए गए। उनकी परफारमेंस से फिल्‍म में चार चांद लग गए। ‘दम लगा के हईसा’ में शीबा चड्ढा ने बुआ की रोचक भूमिका निभाई। ‘काय पो छे’ में सुशांत सिंह राजपूत, राजकुमार राव और अमित साध को एक साथ ला उनकी केमिस्‍ट्री से फिल्‍म निखर गई। मानव कौल उस फिल्‍म की खोज बने, जबकि ‘हैदर’ में शाहिद कपूर के पिता बने नरेंद्र झा को चौतरफा तारीफ मिली। फिल्‍म के प्रमोशन में उनका वॉयस ओवर जमकर इस्‍तेमाल हुआ। इस साल वे ‘मोहनजो दाड़ो’ व ‘घायल वंस अगेन’ में मेन विलेन हैं।
कास्टिंग डायरेक्‍टर के अलावा युवा फिल्‍मकारों ने भी पूरा सिनेरियो बदल दिया है। पहले पैसे वाले ही फिल्‍म बनाते थे। वे सिनेमा को मनी मेकिंग मशीन मानते थे। अब वह चलन बदला है।   मानव कौल कहते हैं, ‘25 साल के चैतन्‍य तम्‍हाणे कोर्ट बना उसे ऑस्‍कर तक ले जाते हैं। वह भी तब, जब उससे पहले उनके पास कोई सिनेमाई अनुभव नहीं था। उस फिल्‍म में कथित नामी चेहरे नहीं थे। उसके बावजूद वह अपील कर गई। यही अच्‍छी ही बात है। सितारों पर से हमारी निर्भरता कम होती जा रही है।      
एयरलिफ्ट में कुवैती आर्मी अफसर बने इनामुल हक के मुताबिक, सिने लिटरेसी में खासा इजाफा हुआ है। ईरानी फिल्‍मकार माजिद मजीदी व जफर पनाही जैसों ने भी यहां के फिल्‍मकारों को प्रेरित किया। उन्‍हें बात समझ में आ गई कि कैरेक्‍टर आर्टिस्‍ट की मौजूदगी से एक तो किफायत में फिल्‍म बन जाएगी, दूसरा हर इलाके व तबके की कहानियां लोगों के पास आएंगी। वे दिल को छूने के अलावा रोमांचक और प्रेरक रहेंगी।
लब्‍बोलुआब यह कि अब अब सितारों व कलाकारों के बीच को-एग्‍जिस्‍टेंस का मामला बन चुका है। सलमान खान जैसे सितारे भी अपने उन सहकलाकारों की मदद करने लगे हैं। लोगों को याद होगा कि  उन्‍होंने ट्वीट कर अपने प्रशंसकों व जनता-जनार्दन से मांझी- द माउंटेनमैन देखने की अपील की। यह ट्रेंड हाल के बरसों की ही उपज है। किरण राव शिप ऑफ थीसियस के सपोर्ट में खड़ी होती हैं और कैरेक्‍टर आर्टिस्‍ट से सजी फिल्‍म को बड़ा फलक मिलक जाता है। यह उम्‍दा सिनेमा व कलाकारों को स्‍थापित करने के लिए शुभ संकेत हैं।

Tuesday, May 24, 2016

मनोरोग के इलाज में शर्म कैसी - राधिका आप्‍टे

- स्मिता श्रीवास्‍तव
राधिका आप्टे सधे व सटीक कदम बढ़ा रही हैं। वह शॉर्ट फिल्म, थिएटर, वेब सीरीज और फिल्मों में संतुलन बना कर चल रही हैं। साउथ में भी सक्रिय हैं। हाल में उन्होंने रजनीकांत के साथ तमिल फिल्म की शूटिंग पूरी की है। 29 मई को उनकी फिल्म फोबियारिलीज हो रही। यह एग्रोफोबिया पर आधारित है। इस बीमारी से पीडि़त शख्स को अपने आसपास के माहौल से जुड़ी किसी भी सामाजिक स्थिति का सामना करने में घबराहट होती है। भीड़भाड़ वाली जगहों पर जाने से डरता है। वैसे लोगों को हमेशा डर सताता रहता है कि घर से बाहर निकलते ही बाहर की दुनिया उसे खत्म कर देगी। फिल्म के निर्देशक रागिनी एमएमएसडर: एट द मॉलबना चुके पवन कृपलानी हैं।

        राधिका कहती हैं,‘फोबिया एक लडक़ी महक की कहानी है। वह पेंटर है। मुंबई में अकेले रहती है। आत्मनिर्भर है। बहुत आत्मविश्वासी हैं। उसके साथ एक हादसा हो जाता है। उसकी वजह से वह एग्रोफोबिया से पीडि़त हो जाती है। हमारे देश में लोग इस बीमारी से ज्यादा वाकिफ नहीं हैं। अगर किसी को पैनिक अटैक आ जाए तो उसे पागल समझने लगते हैं। फिल्म के लिए पवन कृपलानी ने दो साल पहले मुझसे संपर्क किया था। मैं उनसे पहले से परिचित नहीं थी। उन्होंने फोन करके मिलने को कहा था। मुलाकात होने पर उन्होंने दस मिनट के भीतर आइडिया शेयर किया था। तब इसकी स्क्रिप्ट भी तैयार नहीं थी। संयोग से उस समय मैं पैनिक डिसआर्डर पर काम कर रही थी। यह किसी अन्य प्रोजेक्ट के सिलसिले में था। उस प्रोजेक्ट का फिल्म से कोई वास्ता नहीं था। खैर कहानी डेवलप होने पर पवन ने फिर संपर्क किया। थ्रिलर का ट्विस्ट मुझे बहुत पसंद आया। मैंने रोल स्वीकार लिया। 

        मेरे दो दोस्त भी एग्रोफोबिया से पीडि़त हैं। लिहाजा बीमारी से थोड़ा परिचित थी। मेरे पिता खुद भी न्यूरोसर्जन हैं। मेरे एक परिचित साइकोलॉजिस्ट हैं। दोनों ने इस बीमारी के संबंध में मेरी बहुत मदद की। उनकी वजह से मैं किरदार को आत्मसात कर पाई। इसके अलावा मैंने कुछ किताबें पढ़ी। मैंने कुछ वीडियो भी देखे। जिसमें पैनिक अटैक होने की जानकारी मिली। पैनिक अटैक होने पर दिल की धडक़नें बढ़ जाती हैं। पसीना बहुत आता है। मसल खींच जाने के कारण गले से आवाज नहीं निकलती। सांस लेने में दिक्कत लेने जैसी कई समस्याएं आती हैं। इसे निभाना मेरे लिए काफी चैलेंजिंग रहा। फिल्म में हमने मनोरोग के इलाज को शर्म का विषय मानने वालों को आड़े हाथों लिया गया है। यह फिल्म मनोरोग को गंभीरता से लेने पैरवी करती है। ताकि आने वाले दिनों में आत्महत्या के मामले कम हों।’ 

        राधिका कथक प्रशिक्षित डांसर हैं। उन्होंने लंदन में रहकर कंटेंपरेरी डांस भी सीखा था। फिल्म के विभिन्न जोनर में वह हाथ आजमा रही हैं। उनकी इच्छा डांस आधारित फिल्म करने की भी है। बकौल राधिका,‘डांस से मेरा गहरा लगाव है। अब हमारे देश में भी डांस आधारित फिल्में बन रही हैं। बॉक्स आफिस पर भी उन्हें सफलता मिल रही है। उम्मीद है कि किसी फिल्म में मुझे भी अपना यह हुनर दिखाने का मौका अवश्य मिलेगा।फिल्म इंडस्ट्री में करियर की सफलता की कोई गारंटी नहीं होती। राधिका का कोई फिल्मी बैकग्राउंड नहीं रहा है। उन्होंने भी काफी संघर्ष के बाद अपना मुकाम बनाया है। वह मानती हैं कि इनसिक्योरनेस हर इंसान में होती हैं। राधिका के शब्दों में,‘दुनिया में शायद ही कोई ऐसा शख्स हो जो इनसिक्योर न हो। बस उसके कारण अलग-अलग हो सकते हैं। कोई करियर को लेकर असुरक्षित महसूस करता है कोई अपनों को लेकर। यह हर व्यक्ति पर निर्भर करता है। मेरा मानना है कि इनसिक्योरनेस से बचना चाहिए। इनसिक्योरनेस नकारात्मक सोच से भी आती है। लिहाजा सोच हमेशा सकारात्मक रखनी चाहिए। नकारात्मक सोच आपकी तरक्की में बाधक बनती है। हालांकि कभी-कभी मैं भी इनसिक्योर महसूस होती हूं। उसका कोई एक खास कारण नहीं बता सकती। मगर जल्द ही उससे उबर भी लेती हूं। मैं उसे खुद पर हॉबी नहीं होने देती।’ 

        हिंदी सिनेमा में हीरो-हीरोइन की फीस में असमानता को लेकर कई बार कुछ अभिनेत्रियों ने आवाज बुलंद की है। उसके बावजूद कोई सार्थक पहल नहीं हुई है। समानता के संदर्भ में राधिका कहती हैं,‘हमारी इंडस्ट्री में भी उतनी असमानता है जितना समाज में। जब समाज बदलेगा तो इंडस्ट्री भी बदलेगी। दोनों एक दूसरे से जुड़ी हैं। समाज में बदलाव तभी आएगा जब आप खुद को बदलेंगे। सिनेमा भी इसमें भूमिका निभा रहा। हालांकि उसकी सीमित दायरा है। हमारे यहां महिला केंद्रित फिल्में ज्यादा कारोबार क्यों नहीं करती? वजह सोसाइटी को पसंद नहीं आती।उन्‍होंने उसके प्रति अपनी धारणा बना रखी है। हालांकि यह धीरे-धीरे दरक रही है।राधिका की अगली फिल्म बमबारियां हैं। उसके संबंध में वह बताती हैं,‘उसमें मैं कॉमेडी कर रही हूं। मैं पीआर एजेंट की भूमिका में हूं। पीआर मेरे आसपास रहते हैं। लिहाजा उस किरदार से थोड़ा वाकिफ भी हूं। उसकी रिलीज में थोड़ा वक्त है। इसके अलावा जून में एक अंग्रेजी में प्ले कर रही हूं। उसके अलावा भी कुछ फिल्में पाइपलाइन में हैं।’ 

        इंडस्ट्री में तकनीक और कंटेंट के स्तर पर काफी बदलाव आया है। अगले पांच साल वर्षों में निरंतर बड़े बदलाव की उम्मीद की जा रही है। इस संबंध में राधिका कहती हैं,‘पिछले कुछ वर्षों में सिनेमा में कई बदलाव आए हैं। पहले गिनी चुनी महिला प्रधान फिल्में बन रही थीं। अब उनकी संख्या में इजाफा होता ही जा रहा। यह बदलाव की बड़ी बयार है। उम्मीद है कि नई कहानियों को कहने का ट्रेंड जारी रहेगा। तकनीक के स्तर पर भी और उन्नत होंगे। मैं खुद कुछ वूमन ओरियंटेड फिल्में कर रही। हालांकि यह महिला मुद्दों पर आधारित नहीं होंगी। उसमें महिला मुख्य किरदार में होगी। यह पीकू’, ‘तनु वेड्स मनु रिटन्र्ससरीखी होगी। यानी उसमें मनोरंजन भी होगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारतीय सिनेमा की पैठ बढ़ी है। हमारी फिल्में इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में सराही जा रहीं। नतीजन विदेशी फिल्ममेकर भारत की ओर आकर्षित हो रहे हैं। वे भारतीय फिल्ममेकर साथ मिलकर फिल्में बना रहे हैं। फिल्मों का बाजार बढ़ रहा है। यह क्रिएटिवली और फाइनेंशली देश और फिल्ममेकरों के हित में है।राधिका कई शार्ट फिल्मों का भी हिस्सा रही हैं। उससे उन्हें काफी शोहत मिली है। इस बाबत राधिका कहती हैं,‘मैंने शार्ट फिल्में पहचान बनाने के लिए नहीं की। मुझे कांसेप्ट अच्छा लगा था। मेरे पास समय भी था। लिहाजा मैंने किया। मेरे लिए प्लेटफार्म मायने नहीं रखता। मैं बस अच्छा काम करना चाहती हूं।


Sunday, May 22, 2016

इरफान के साथ बातचीत




इरफान से हुई बात-मुलाकात में हर बार मुलाकात का समय खत्‍म हो जाता है,लेकिन बातें पूरी नहीं हो पातीं।एक अधूरापन बना रहता है। उनकी फिल्‍म 'मदारी' आ रही है। इस मौके पर हुई बातचीत में संभव है कि कोई तारतम्‍य न दिखे। यह इंटरव्‍यू अलग मायने में रोचक है। पढ़ कर देख लें..., 

-अजय ब्रह्मात्‍मज

-मदारी का बेसिक आइडिया क्या है?
0 यह एक थ्रिलर फिल्म है, जो कि सच्ची घटना से प्रेरित है। इस फिल्म में हमने कई सच्ची घटनाओं का इस्तेमाल किया है। ये घटनाएं बहुत सारी चीजों पर हमें बांध कर रखती है। हर आदमी में एक नायक छुपा होता है। वह अपनी पसंद से किस तरह चीजों को चुनता है। उससे कैसे चीजें आकार लेती हैं। उस व्यक्ति के व्यक्तित्व में बदलाव होता है।मेरी सोच यही है कि कहीं ना कहीं आदमी वह काम करने को मजबूर हो,जिससे उसे अपने अंदर के नायक के बारे में पता चले। हमें कई बार किसी को फॅालो करने की आदत हो जाती है। हमें लगता है कि कोई आएगा और हमारी जिंदगी सुधार देगा। हमारी यह सोच पहले से है। हम कहीं ना कहीं उस सोच को चैलेंज कर रहे हैं। हम उस सोच को बदलने का प्रयास कर रहे हैं। हमें खुद के  हीरो की तलाश करनी है।

-इस फिल्म में आपका किरदार क्या है। और कौन –कौन हैं?

0 तलवार में जिस तरह कई एक्टर थे। पर वह अनजाने चेहरे थे। यहां पर भी ठीक वैसा ही है। जिमी भी हैं इस फिल्म के अंदर। बाकी सब थिएटर एक्टर हैं।कोई बड़ा नाम नहीं है। बहुत ही साधारण आदमी ,जो सबकुछ अपना कर चलता है।उस तरह का एक इंसान है।उसके जीवन में क्राइसेस आता है। फिर बड़ा बदलाव होता है।

-मैं सीधे पूछता हूं कि आपका किरदार क्या है। उसका नाम क्या है? वह क्या करता है?कहां से आता है?
0 मेरा किरदार निर्बल है।वह छोटे-मोटे काम करता है। जैसे कम्प्यूटर वगैरह ठीक करना। साफ्टवेयर का काम करता है। वह इसी तरह का काम करता है। वह अपने बच्चे के साथ रहता है। पत्नी के साथ उसका तलाक हो गया है। पत्नी अमेरिका चली गई है। वह अपने बेटे के साथ अकेले रहता है। वह अपनी दुनिया में खुश है। वह हमेशा खुश रहता है। बेटा उसकी जिंदगी है। वह बेटे की अच्छी परवरिश करना चाहता है। पर क्राइसिस आने पर सारी चीजें बदल जाती हैं।

-इंडस्ट्री में अपनाएं जाने के बावजूद आपके अंदर एक छटपटाहट सी रही है।अपनी फिल्म में आप क्या कर पाएं। अपनी फिल्म से मतलब हिंदी फिल्म के दायरे में रहकर आप क्या  कुछ नया कर सकते हैं? क्या यह फिल्म उसको पूरी कर पाएगी। या एक कोशिश होगी।
0 यह फिल्म किसी हद तक छुने की कोशिश करती है। निशिकांत कामत इसके निर्देशक हैं। इस वजह से इसकी भाषा आम दर्शकों के लिए है। यह फिल्म आपको सोचने पर मजबूर कर देगी। कुछ फिल्में बुध्दिजीवी होती हैं। यह फिल्म सीधे इमोशनल कहानी है। निशिकांत का जैसा अपना स्टाइल है। यह फिल्म उसी फेज में है। उसका नरेटिव का तरीका होता है। यह फिल्म सीधे लोगों से बातचीत करेगी। इमोशनल कहानी है पूरी। इमोशन पॅावर फुल है।यह देखा हुआ नहीं है। मैं पहले सोच भी रहा था कि इस किरदार में जाऊं या ना जाऊं। कुछ सीन ऐसे हैं जो आपके लिए तकलीफदेह हो सकते हैं।
 
-फिल्म के अंदर है वो सीन? 
0 जी। पहले थोड़ा लगा। पर कहानी सुनने के बाद लगा कि करना चाहिए। जवाबदेही होनी चाहिए। किसी भी अच्छी कहानी के पनपने के लिए. लोगों का विश्वास जीतने के लिए सिस्टम में दायित्व होना चाहिए।
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   -किस हद तक यह फिल्म नजारा दिखाती है और नजरिया पेश करती है? फिल्म की बात नजारे तक जाती है या नजरिए तक?

0यह फिल्म नजरिया पेश करती है। कुछ लोग भले ही इसके लिए राजी हो या ना हो।जैसा कि आप देखें । कोई आम आदमी क्राइसेस से गुजरता है, सिस्टम से उसका वास्ता पड़ता है।इसमें उसकी बेबसी की जांच होती है कि वह कहां जाएं। वह क्या करें। उसने एक बार लोगों को चुन लिया। उसने मान लिया कि यह लोग मेरी जिंदगी को ठीक करेंगे। फिर क्या उसकी जिम्मेदारी वहां खत्म हो जाती है। क्या उसकी जिम्मेदारी बनी रहती है कि वह खुद से सवाल पूछता रहे। सिस्टम लोगों के लिए है या लोगों को इस्तेमाल करने के लिए है।
-इसकी पेशगी में क्या नई चीजें की हैं। फार्म के लेवल पर?इसका स्ट्रक्चर क्या हैं  इसका स्ट्रक्चर लीनियर नहीं है । फिल्म आज और बीते हुए कल में चलती रहती है। आगे पीछे होती रहती है। निशिकांत के लिए भी यह चैलेंज था। वह कहता था कि जब भी मैं सेट पर आता . तो सोचता कि यह होगा कैसे। जब हम इसका गाना सूट कर रहे थे,तब भी चितिंत थे। हम दोनों सोच रहे थे कि दो बजे यह गाना शुरू कर रहे हैं। शाम तक कैसे पूरा होगा। कई बार इस तरह का प्रोसेस समृध्द हो जाता है। क्योंकि हमें आगे की जानकारी नहीं होती है। फिर चीजें अपने आप सेप लेना शुरू कर देती है। हमें फिल्म की एनर्जी दिखने लगती है। फिल्म की एनर्जी आपसे क्या करवा रही है। वो हमें गाइड करने लगती है। इस तरह के प्रोसेस में बहुत आनंद आता है। क्योंकि आप डिक्टेक्ट नहीं कर रहे हैं।आप सिर्फ उस प्रोसेस का हिस्सा बन रहे हो। फिल्म की एनर्जी गाइड कर रही है। आप उसी हिसाब से अपना काम किए जा रहे हो। आप खुद को समर्पित कर देते हो। वह सेप करती है।ऐसे ही गाने के साथ हुआ। मैं दो बजे दोपहर में पहुंचा। मैं डरा हुआ था। थो़ड़ी देर निशिकांत सेबातचीत हुई।उन्होंने कहां कि मैं आपको शॅाट लगाकर बुलाता हूं। वह भी देख रहा था कि क्या होगा क्या नहीं होगा। मैंने पहुंचते ही कहा कि रिहर्सल देखना है। जैसे ही मैंने रिहर्सल देखते ही पहले फ्रेम में कहा कि यह सुर है।

-गाना लिप सिंक   है?
जी।

-क्या बात है।
इसी वजह से मैं डरा हुआ था। मैंने बहुत तैयारी की थी। मैं दो रोज से यह गाना सुन रहा था। उसने एक लाइन की तो मैंने चार लाइन वैसे कर दी। इस तरह करते हुए पूरा गाना आराम से हो गया।

-इरफान को जब हम दर्शक के तौर पर देखने जाते हैं तो इरफान ने अपनी एक जगह बनाई है। जब इरफान पैरलल लीड या दूसरे लीड में आते हैं तो अलग किस्म किरदार में चले जाते हैं। जब वह अपनी फिल्मों में थोड़ा सा इंटेस, मैं डार्क नहीं कहूंगा। थोड़ा ग्रे में चले जाते हैं। पान सिंह तोमर देख लें। लंच बाक्स और किस्सा देख लें। यह क्या आपने खुद चुना है या फिर ऐसा रोल ही मिलता है?
0जी नहीं। मेरे पास चॅाइसेस की कमी है। मैं अब थोड़ी बेहतर हालात में हूं।मैं अब अपने किरदार चुन रहा हूं।मेरी आगे की जो फिल्में हैं, वह लाइटर किरदार में है। यह  फिल्में बात तो कर रही हैं। ऐसा नहीं है कि उनमें मुद्दा नहीं है। वह किसी चीज को रिफलेक्ट जरूर कर रही हैं। पर उनका सुर लाइटर है। मैं बहुत कोशिश करता हूं कि हल्की फुल्की कहानियां मिलें। जिस तरह मैंने तिग्मांशु और अनुराग के साथ काम किया है। वैसा मिलें। थोड़ा सा यह भी है कि हमारे यहां राइटर पनप रहे हैं। दर्शकों की मांग को कोप अप नहीं कर पा रहे हैं। उतना टैलेंट नहीं है। इस वजह से हम पीछे हैं। जो खाचा बच रहा है, उसमे हॅालीवुड फिट हो रहा है। हॅालीवुड जोर शोर से धका देकर बीच में आ रहा है।उसकी वजह यही है कि हमारे पास राइटर नहीं हैं। हमारे यहां राइटर को इतना महत्तव नहीं दिया जाता है। और राइटर बनते भी नहीं हैं। नई पीढ़ी से बहुत उम्मीद है। नई पीढ़ी तैयार हो रही है।

-लेकिन हम क्या ऐसी छोटी फिल्मों के जरिए मुकाबला कर पायेंगे?
मुझे मुकाबला ही नहीं करना है। मुझे अपनी फिल्म को वाइबल...

-मैं मुकाबले की बात केवल आपके लिए नहीं कर रहा हूं।मुकाबला हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से पूछरहा हूं।
अच्छा।हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का हॅालीवुड से मुकाबला।

-जी...
हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को टैलेंट चाहिए। वह आवाज बहुत जरूरी है,जो कि विश्व के दर्शकों तक पहुंच सके। जिस दिन वह आवाज खनेगी, उस दिन मुकाबला हो जाएगा।

-नहीं जैसे,लंच बाक्स आई। कहने को यह छोटीफिल्म थी। पर इसने सब जगह अपील की।उसने क्रास कर दिया।क्रास ओवर सिनेमा जिसे कहते हैं। वह कर दिया। हां, उसने किया।उसको तीन साल हो गए।
जी हां। यही तो गेप  है।

-तीन साल मैं कोई दूसरा सामने नहीं आया।
जी अभी वह पीढ़ी तैयार हो रही है। हालांकि कनवेक्शन इंडस्ट्री के लिए यह थोडा चैलेंजिंग होती है। उसका कोई सपोर्ट नहीं है। पर आनेवाली नई पीढ़ी इसे बदलेगी।

-एक्टर के तौर पर इरफान को कई स्तरों पर जीना पड़ रहा है।विदेशों की फिल्में अलग हैं। यहां की फिल्में अलग हैं। आप कैसे शिफ्ट करते हैं और कैसे रिस्क तय करते हैं?
हॅालीवुड में काम चुनकर करता हूं। वहां पर निर्वाह करने के लिए मैं काम नहीं कर रहा हूं। यहां की फिल्में सरवाइवल के तौर पर करनी पड़ती है। पांच महीने यहां पर काम  नहीं किया तो हम चल नहीं पायेंगे। इस वजह से हमें कुछ फिल्में निर्वाह करने के लिए करनी पड़ती हैं। वहां पर मैं..

-लेकिन अहमत तो होती होगी?
0अहमत बहुत है। हर महीने एक दो स्क्रिप्ट पढ़ता रहता हूं। मुझे लगा कि सब चीजें नहीं करनी चाहिए। मैं पूरी तरह से विश्वस्त नहीं था। मैंने अभी बीच में किसी की स्क्रिप्ट पढ़ी। हॅालीवुड में दिलचल्पी बहुत है।

-अहमत के साथ आमदनी भी होगी?
आमदनी कम है। वहां की फिल्मों में जितना समय देता हूं., यहां में जितना कमाता हूं उसका एक चौथाई वहां कमाता हूं। वहां डबल टैक्स रहता है। फिर यहां से अप्लाई करना पड़ता है।तब जाकर टैक्स मिलता है। फिर दस प्रतिशत इसका दस प्रतिशत उसका। कई सारी चीजें होती हैं।

-केवल शोहरत ले पा रहे हैं आप?
शोहरत के साथ अनुभव भी है।साथ ही मैं अपने दर्शकों का दायरा भी बढ़ा रहा हूं। उसका भी असर आपको पीकू मे दिखता है।कहीं ना कहीं आपके मार्केट पर उसका असर होता है। यूरोप में लंच बाक्स के बाद फ्रेंच निर्माता मेरे नाम पर पैसा लगाने के लिए तैयार हो जाएगा। उस तरह का ग्रांउड वर्क करना पड़ता है। मैं कहीं भी जाकर फिल्म करने के लिए तैयार हूं। जैसे मैं बांग्लादेश की फिल्म की।  क्योंकि मुझे वहां के बंदों पर भरोसा हो गया है। मुझे उनके कहानी कहने का तरीका बेहद पसंद है। कहानी ने मुझे अपनी तरफ खींचा। मेरे लिए पार्ट बोरिंग था। पार्ट मेरे लिए दिलचस्प नहीं था। मैं उसे एक्सपलोर भी नहीं करना चाहता था।

-क्या नाम था उस फिल्म का?
 नो बेटर प्रोजेस। फिल्म ने मुझे अपनी तरफ खीचा। मेरे लिए नया अनुभव रहा। मेरे लिए वह मुल्क  नया था। वहां के लोग कैसे जी रहे हैं। बाकी की सारी चीजे। अच्छा अनुभव रहा। मेरे लिए यह बहुत मायने रखता है। मैं कहां जाकर शूट कर रहा हूं। किन लोगों के साथकाम कर रहा हूं। मैँ जैसलमेर में किश ऑफ़ थे स्पाइडर'  था।  मेरे लिए वह नायाब अनुभव था । हजार साल पहले आदमी कैसे रह रहे होंगे। उसके भी अवशेष अभी बाकी हैं।

-हां बिल्कुल
आदमी, प्रकृति  और जानवर की परस्पर निर्भरता जो है,वह हैं वहां। यह बदलता रहा है। आज धीरे-धीरे चीजे बदल रही हैं। मुझे आपको एक बड़ाही दिलचस्प किस्सा बताना है। पहली बार ऐसा देखा जा रहा है, जो लोकल कुत्ते हैं।वो ग्रुप में मिलकर बकरे को मार रहे हैं।यह पहले कभी नहीं देखा गया। पहली बार ऐसा हो रहा है कि कुत्तों का ग्रुप मिलकर बकरा मार रहा है। अब ये क्या है वह पता नहीं। यह नया कुछ है। मुझे वहां के लोगों ने बोला कि यह नई बात है।ऐसा पहले कभी होता देखा नहीं गया है। पहली बार ऐसा हो रहाहै। इसकी वजह पता नहीं। बहुत सी ऐसी दिलचस्प चीजें हैं,जिन्हें हमने कभी देखा नहीं है।ऊंट जैसे जानवर को मैंने कभी पास से देखा नहीं है। ऊंट का अलगाव पना कमाल का है। इतना बिंदाश है वह। वह आपको सुविधा दिए जा रहा हैं।बाकी की चीजों से उसका कोई लेना-देना नहीं है। 

- ऊंट पालतू होते हैं?
जी हां। लेकिन वह अलग है। उसमें अजीब सा बेलगाव है।

-कुत्ते हो या घोड़े वह आपसे प्यार चाहते हैं।
जी। वैसा ही।ऊंट अपना खाने में मस्त है। वह आपको अपने ऊपर बिठाएगा और चल पडेंगा। मैं बहुत रहा हूं। उसके पैर में कभी कांटा चुभ जाता है। वह एक दम अंदर घुस जाताहै।उसको निकालने का कोई तरीका नहीं है। ऑपरेशन करना पड़ा तो ऊंट बेकार हो जाएगा। आप देखिए प्रकृति का जानवर से कैसा ताल्लुक है। इतने बड़े शरीर के अंदर केवल एक लौंग उसे खिलाया जाता है। इसे खाने के बाद कांटा आपो आप बाहर आ जाता है। यह बात सुनने में अजीब लगती है। वहां रेगिस्तान में एक फल पैदा होता है। वह गोल आकार का खरबूज जैसा होता है। आप उस पर खड़े हो जाइए, उसका टेस्ट आपके मुंह में आ जाएगा।

-हां ऐसा कुछ लोग बताते हैं।
0 हमारे शरीर का और प्रकृति का जो जुड़ाव है, वह आज भी जैसलमेर में जिंदा है। ट्रेवल के समय आप आवाज का अहसास कर सकते हैं। वहां पर लैंडस्केप है। कुल मिलाकर फिल्म के साथ के यह अनुभव नायाब होते हैं। यह अनुभव ना हो तो मैकेनिकल हो जाता है।इसलिए शहरों में शूटिंग का अनुभव नहीं मिलता है।दूसरी जगह पर अनुभव मिलता है। खैर, नई पीढ़ी सिनेमा क्रिएट करेगी।ऐसा कभी नहीं हुआ है कि दर्शक बाहें फैला कर खड़े हैं औऱ आपके पास देने के लिए कुछ नहीं है। इस वजह हॅालीवुड अपनी जगह तेजी से बना रहा है। ऐसा कभी नहीं हुआ है कि हॅालीवुड की फिल्म के कारण हमारे सुपरस्टार की फिल्म पर प्रभाव पड़ा हो। पर इस बार जगंल बुक ने यह कर दिया। लोकल फिल्में बुध्दिमान तरीके से बनाई जाएगी। जो विश्व को प्रभावित करेगी।तब हम हॅालीवुड की फिल्मों से मुकाबला कर सकते हैं। वरना नहीं कर पायेंगे। हॅालीवुड ने अलग-अलग देशों के सिनेमा की दुकानें बंद कर दी हैं।

-बतौर निर्माता कैसा अनुभव रहा आपका?
0 निर्माता के तौर पर मैं बताना चाहता हूं कि मेरा क्या रोल है। मुझे जो कहानी वाइबल लगती है। मुझे लगे कि यह स्टोरी लोगों को इंटरटेन कर सकती है। फिर एक विषयका अपना दायरा होता है। इस विषय को आप इतने ही पैसे में बना सकते हो। वह एक समझ होना जरूरी है। मैं उदाहरण देता हूं गुजारिश का। गुजारिश जैसी फिल्म बीसकरोड़ में होगी तो वह वाइबल होगी।लंच बाक्स को आप चालीस करोड़ में नहीं बना सकते हैं।विषयकी अपनी एक अपील है।उसका अपना एक दायरा है। मैं वह देखता हूं। साथ ही टीम देखता हूं। इस फिल्म के लिए अच्छा डायरेक्टर कौन होगा। वहां तक मैं जाता हूं। उसके आगे मुझे कुछनहीं आता है। मैं यह चाह रहा हूं कि ऐसा कंटेंटे मुझे मिलें।

-बैलेंस सीटपर आपका ध्यान नहीं होता।
0जी नहीं। इस पर मेरा अनुभव हो चुका है। मैं कान पकड़ चुका हूं। मैं उस वे से कट आऊट हो चुका हूं।मैं यह कभी नहीं कर पाऊंगा।

-कब अनुभव हुआ था?
0वारियर के पहले मैं अपने आपको व्यस्त रखना चाहता था। मैं टीवी सीरिज का निर्माता बन गया था। मैंने अपनी सारी कमाई लगा दी थी।पांच एपिसोड में पैसा लगा दिया। तभी वारियर आ गया। मैंने सोचा कि निर्माता बनना सही नहीं है। इसके आगे अंधेरा है। शिल्पा को बहुत चिंता हुई थी। पर मुझे नहीं करना था। यह मैंने तयकर लियाथा। वह पूरे प्रोसेस का अनुभव अच्छा नहीं था। इसमें कितना बचाएं।उसमे क्याकरें। यह करना जरूरी था। पर मैं इस काम के लिए पैदा नहीं हुआ हूं। निर्माता के तौर पर पैसा बचाना ही पडे़गा।नहीं को एक हाथ से पैसा आया दूसरे हाथ से चला गया। हर जगह से कांटना पड़ता था। प्रोसेस मेरे मिजाज का नहीं था। मैंने तभी यह सोचलिया था। मैं चाहता हूं कि कोई ऐसा आदमी मिलें।जो मेरा पैसा रेज करें।मुझे कहीं जाना ना पड़े। यह मेरी कोशिश है।

-इरफान किन चीजों से नाखुश हैं?
0मैं उनके बारे में बात नहीं करना चाहता।

-अच्छा तो किन चीजों से खुश हैं?
0इस तरह इंडस्ट्री का माहौल है।नई पीढ़ी आ रही है। रिजनल सिनेमा पिकअप कर रहा है। यह बहुत अच्छा है। दर्शकों से रिश्ता बन रहा है। दर्शक उम्मीद लगा कर बैठे हैं। दर्शक चाहत भरी नजरों से देखने लगे हैं। यह मुझे खुशी देता है।

- आप इंडस्ट्री का कितना हिस्सा बन चुके हैं?
0इंडस्ट्री को अभी तक समझ में नहीं आ पा रहा है कि मुझे कैसे इस्तेमाल किया जाएं। मैं खुद अपनी चीजों को ब्रेक कर रहा हूं। मैं अपनी फितरत की वजह से फिट नहीं हो पा रहा हूं। इसमें इंडस्ट्री का दोष नहीं है। मुझे यहां का हिस्सा बनने की जरूरत नहीं है। मैं अपनी तरह की कहानियां लेकर आ रहा हूं।एक माहौल क्रिएट कर रहा हूं। कुछ माइलस्टोन दे रहा हूं। चाहे वह तलवार,पान सिंह तोमर या लंचबाक्स हो। कहानी के फॉर्मेट  को मैं चैंलेंज कर रहा हूं। हीरो हीरोईन को फिर से खोज रहे हैं। यह मैं कर रहा हूं।मैं अपने आप से यही उम्मीद करता हूं। नया नया प्रयोग ही हमें उत्साहित रखता है। हमारे काम को सही दिशा में लेकर जाता है।

-लेकिन दुख नहीं होता है।आपको पीकू जैसी फिल्म के लिए सराहया जाता है।पर जो मिलना चाहिए वह नहीं मिलता है। अभी भी कसर बाकी है?
 0सर,मैं इस तरह  से सोचने लगूं तो बहुत कुछ सोचने के लिए है। मैं लगातार उस तरफ सोचता नहीं हूं। ऊपर वाला जो मेरे लिए चाह रहा है , मैं करताजा रहा हूं।मैंने तो कभी नहीं सोचा था कि बड़े डायरेक्टर की कहानियों का हिस्सा बन पाऊंगा। उसको मैं कहां रखूंगा।बिना किसी कोशिश के मुझे काम मिलता रहा है। मेरी गोद में  काम आ जाता है।मुझे काम पाने केलिए मेहनत नहीं करनी पड़ी। लोग मुझे घर से बुलाते हैं।

-लेकिन आपने इंतजार किया।बहुत सारे लोग गुस्से में चले जाते हैं। परेशान हो जाते हैं।पर आपने ऐसा नहीं किया।
0मेरे ख्याल से जीवन सिखाता है। मेरे जीवन का रिश्ता अहम है। जीवन हमेशा मुझे घेरे रखता है। मैं चौंकना रहता हूं।

-मुझे ऐसा लगता है कि आप किसी एक दिशा में नहीं जा रहे हैं। हमेशा खुद का रास्ता बदलते रहते हैं।
0मेरी दिशा खुदका रास्ता बनाने में हैं। मैं अपने लिए रास्ता बना रहा हूं। उसके लिए मैं भिन्न तरह की चीजें करने की कोशिश करता हूं। मुझे दर्शकों से एक ऐसा विश्वास कायम करना हैकि मेरी फिल्मों में उन्हें कुछ ना कुछ वश्य मिलेगा। मेरा कहानी चुनने का उद्देश्य भी यही रहता है। मैं जब फिल्म देखकर बचपन में बाहर निकलता था ऊबासी आती थी।फिल्म देखतेसमय अच्छा लगता था। उसके बाद खाली सा लगता था। मुझे यह समझ नहीं आता थाक्या है। ड्रामा स्कूल में जाने के बाद मैंने सही फिल्में देखना शुरू की।उन फिल्मों को देखने के बाद एक ऐसी दुनिया क्रिेएट होती थी, जिसमें से आपको निकलने का मन ही नहीं करताथा। वह नशे की तरह होता है। हम एक जोन में चले जाते हैं। मेरी मंशा है कि ऐसी कहानी लोगों को दूं,जो उनके साथरहें।घर जाकर कहानियां उनसे बात करें। मैं वन नाइट स्टैंड नहीं चाहताहूं। अभी भी ऐसे दस साल पहले की फिल्में देखते हैं, उससेकनेक्ट करतेहैं तो अच्छालगता है। आज सेचालीस साल पहले की फिल्म की आज की बड़ी सी बड़ी फिल्म का मुकाबला नहीं कर सकती है। यह कहानी हमारा धर्म है। इसे अच्छे से निभाना चाहिए। मेरा विश्वास है कि काम आपका निडर होना चाहिए।

-लेकिन कहीं ना कहीं फिल्में देखने के बाद मुझे लगता है कि हम नई चीजें का विस्तार करते हैं। हम उसको बड़ा नहीं कर पाते हैं।सब लाइन तक नहीं ले जा पाते हैं।कई बार हम विस्तार करते हैं। पर बड़ासिनेमा नहीं कर पाते हैं। जैसे पीकू भी एक स्तर पर जाकर रूक जाती है। आपको जो दिया आपने किया। देखा जाएंतोराइटर और डायरेक्टर का विजन है। आप जिस फिल्म का नाम लिए हैं, वह भी किरदार की कहानी है। पर वह थोड़ा सा छिटक कर ऊपर चली जाती है। जैसे कोई कविता पढ़ते हैं।कविता केवल शब्दों का जोड़ नहीं है। सिनेमा में केवल सीन नहीं है।
0आप बिजनेस की बात कर रहे हैं क्या 
--जी नहीं,यह सवाल बिजनेस के लिए नहीं है। उससे अलग है। एक अहसास होता है। जैसे कि आपने आज जी भर के खाना खाया नहीं। स्वाद से खाना खाया।

0उसका अब क्या कियाजा सकता है। उस तरह का अनुभव मुझे.नहीं है।.

-आप हाल फिलहाल की किसी हिंदी फिल्म का नाम लीजिए। जो आपको अनुभव देकर गई हो।
पीकू और तलवार थी। हॅालीवुड में लाइफ ऑफ  पाई थी। पान सिंह तोमर का  नाम  भी शामिल है।इन फिल्मों ने मुझे अलग तरह के अनुभव दिए।लोगों पर इनका नशा सा हो गया। इन फिल्मों को नहीं पब्लिकसिटी मिली।हफ्ते भर का समय दिया।फिल्म रिलीज हुई।इस बारे में किसी को पता भी नहीं है। अस्सी लाख का बिजनेस पहले दिन हुआ। उस फिल्म का ऐसा नशा हुआ। वह फिर ट्रेंड बन गया। उसी हद तक है। आपके आस पास जो है वैसा ही है। लेकिन हॅालीवुड में दूसरा सबसे ज्यादा बिजनेस जुरासिक पार्क  का हुआ है। उन्होंने मुझे बहुत इज्जत दी। उन्होंने मेरा नाम टाइटल में दिया। मुझे बस यह करतेरहना है। कब ऐसा हो जाएगा पता नहीं।

-यह जब होता है तो ईगो संतुष्ट हो जाता है।
जी बिल्कुल।

-अचानक आप  इंडिविजुअल परफॉर्म  कर रहे हैं। अचानक आप पूरे देश को रिप्रेजेंट  कर रहे हैं।

0यह अहसास अच्छा लगता है। सामने वाले से लड़ना पड़ता है।

-सुशील कुमार पूरे देश को रिप्रेजेंट कर रहा है। क्रिकेट वालों को छोड़ दीजिए। कलाकार भी देश को रिप्रेजेंट करते हैं। कभी आपके मन में आया कि मैं देश के लिए कर रहा हूं। यह तो ख्याल नहीं रहता है पर देश रोशन रहता है।
0देश के लिए कुछ करना है यह तो दिमाग में आता है। हम लोगों को रिफलेक्ट कर रहे हैं। उन्हीं के बारे में बता रहे हैं।मैं अपनी ईमेज को लेकर बनाना नहीं चाहता हूं। मैं क्या कर सकता हूं, यह मुझे नहीं बताना है। मैं उनके महसूसकरवाना चाह रहा हूं कि आपके अंदर क्या है। यही मेरा उद्देश्य है। और क्या चीज मुझे गुस्सा दिलाती है, उसके लिए मैं एक ही बातकहूंगा। हमारे मीडिया के जरिए जो एस्परेशन वाले लोग क्रिकेटर और फिल्म स्टार हैं। इसका मुझे बड़ा दुख है। एक बिंदी लगाए हुए मोटी सी महिला पर्स लेकर खड़ी है। साड़ी पहनती है। वह वैज्ञानिक है।बड़ा काम कर रही है। वो हीरो क्यों नहीं है। हीरोईजम को क्रिकेट और फिल्मों पर क्रेंदित किया गया है। इस वजह से स्टार शब्द से मुझे समस्या होती है। मैं आपसे कहानी शेयरकरना आया हूं। मैं समाज, लोगों के बारे में आपके बारे में इंसानों के बारे में हम विस्तार करेंगे। तभी मैं अपना एक्टर धर्म निभा पाऊंगा।

-मदारी को कैसे कैटगरी में डालेंगे?
यह थ्रिलर है। इमोशनल है।

-इस मदारी का बंदर कौन है?
इसमें खेल है।खेल का उलट-पलट है। कोई जमूरा है तो कोई मदारी है। आपका यह जानना जरूरी है कि आप क्या हो।जमूरे को जमूरे होने का अहसास होना चाहिए। और मदारी को मदारी होने का। तभी शुरुआत होगी। इस फिल्म में कोई उठा-पटक नहीं है। यह फिल्म आपको भावुक करेगी।

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